गर्ग संहिता
Garga Samhita - Gita Press · Gita Press, Gorakhpur · 582 पृष्ठ · 59 खण्ड
विषय सूची
- । ॐ श्रीपरमात्मने नमः । 517 श्रीमन्महर्षि गर्गाचार्यप्रणीत श्रीगर्ग - संहिता श्रीकृष्ण - कथामृत ( हिन्दी - अनुवाद ) गीताप्रेस गोरखपुर गीताप्रेस गोरखपुर |… 1–10
- ( ९ ) अध्याय विषय पृष्ठ संख्या ४०- यज्ञ सम्बन्धी अश्वका व्रजमण्डलमें वृन्दावनके भीतर प्रवेश; श्रीदामाका उसे बाँधकर नन्दजीके पास ले जाना; नन्दजीका समस्त… 11–20
- h ब्रह्माजीद्वारा श्रीराधा - कृष्णका विवाह मिलन कृष्णका -श्रीराधा वियोगव्यथि वनमें कदली भगवान अध्याय २ ] ब्रह्मादि देवोंद्वारा गोलोकधामका दर्शन १७ हर्षमें… 21–30
- अध्याय ४ ] नन्द आदिके लक्षण; करेंगी? कारण, आपका वह स्थान तो योगियोंके लिये भी दुर्लभ है । १८ । श्रीभगवान् बोले – पूर्वकालमें श्रुतियोंने श्वेतद्वीपमें… 31–40
- अध्याय ८ ] सुचन्द्र और कलावतीके अधिक कहने से क्या लाभ । देवर्षे! श्रीराधाके साथ भूतलपर अवतीर्ण हुए साक्षात् परिपूर्णतम भगवान्ने व्रजमें कौन - सी लीलाएँ… 41–50
- अध्याय ११ ] भगवान्का वसुदेव - देवकीमें आवेश; देवताओंद्वारा उनका स्तवन ४५ बेटोंका वध कर दिया गया है । एकमात्र यह बेटी बची है, इसे मुझे भीखमें दे दीजिये… 51–60
- अध्याय १५ ] यशोदाद्वारा श्रीकृष्णके मुखमें श्रीनारदजीने कहा— आठ वसुओंमें प्रधान जो ' द्रोण ' नामक वसु हैं, उनकी स्त्रीका नाम ' धरा ' है… 61–70
- अध्याय १ ९ ] दामोदर कृष्णका उलूखल - बन्धन देवनायक - ये ' नौ नन्द ' कहे गये हैं, जो व्रजके गोकुलमें उत्पन्न हुए थे… 71–80
- अध्याय २ ] गिरिराज गोवर्धनकी उत्पत्ति तथा उसका व्रजमण्डलमें आगमन ७५ विराजमान हैं । मैं वहीं तुम्हारे पुत्रको स्थापित करूँगा, जहाँ दूसरा कोई पर्वत नहीं है… 81–90
- अध्याय ८ ] ब्रह्माजीके द्वारा श्रीकृष्णके सर्वव्यापी विश्वात्मा स्वरूपका दर्शन ८५ निहारकर आनन्द देनेवाले, करोड़ों कामदेवोंकी शोभासे सम्पन्न, नासिकास्थित… 91–100
- तेरहवाँ अध्याय मुनिवर वेदशिरा और अश्वशिराका परस्परके शापसे क्रमशः कालियनाग और काकभुशुण्ड होना तथा शेषनागका भूमण्डलको धारण करना विदेहराज बहुलाश्वने पूछा-… 101–110
- अठारहवाँ अध्याय श्रीकृष्णके द्वारा गोपदेवीरूपसे श्रीराधाके प्रेमकी परीक्षा तथा श्रीराधाको श्रीकृष्णका दर्शन श्रीनारदजी कहते हैं - मिथिलेश्वर! तदनन्तर रात… 111–120
- अध्याय २३ ] कंस और शङ्खचूडमें युद्ध तथा मैत्रीका वृत्तान्त; श्रीकृष्णद्वारा शङ्खचूडका वध ११५ वहीं चञ्चल तरङ्गमालाओंसे मण्डित क्षीरसागर प्रकट हो गया… 121–130
- । श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः । गिरिराजखण्ड पहला अध्याय श्रीकृष्णके द्वारा गोवर्धनपूजनका प्रस्ताव और उसकी विधिका वर्णन राजा बहुलाश्वने पूछा- देवर्षे! जैसे… 131–140
- अध्याय ७ ] गिरिराज गोवर्धनसम्बन्धी तीर्थोंका वर्णन १३५ हो गया, जो तीर्थोंका राजा है । जो वहाँ एक मोतीका तुमसे गिरिराज - महोत्सवका वर्णन किया, जो… 141–150
- अध्याय २ ] ऋषिरूपा उन सबका मनोरथ पूर्ण कर दिया था । ३ ९ –४१ । गोपियाँ बोलीं- प्रभो! हमने दुर्वासा मुनिका दर्शन उनके सामने जाकर किया है; किंतु आप दोनोंके… 151–160
- अध्याय ९ ] पूर्वकालमें एकादशी व्रत करके मनोवाञ्छित फल पानेवालोंका परिचय १५५ मनुष्योंद्वारा जो दान दिया गया हो, वह भी एकादशीके उपवासकी सोलहवीं कलाके बराबर… 161–170
- अध्याय १७ ] श्रीयमुनाका स्तोत्र १६५ यह श्रीयमुनाका परम अद्भुत कवच है । जो है । जो तीन महीनेकी अवधितक प्रतिदिन भक्तिभावसे भक्तिभावसे दस बार इसका पाठ करता… 171–180
- अध्याय १ ९ ] यमुना - सहस्त्रनाम १७५ ४७३. सागरी, ४७४. कामवादिनी, ४७५. वैभासी, ४७६. मङ्गला - ये भी रागिनियोंके ही नाम हैं… 181–190
- अध्याय २३ ] अम्बिकावनमें अजगरसे नन्दराजकी और वनमालासे सुशोभित थे । असंख्य कोटि सूर्योंके समान तेजस्वी स्वरूपसे वे शेषनागकी शय्यापर पौढ़े थे… 191–200
- अध्याय ५ ] अक्रूरको भगवान् श्रीकृष्णके परब्रह्मस्वरूपका साक्षात्कार १ ९ ५ ओरसे मेरे प्रति प्रेम ही करना चाहिये… 201–210
- अध्याय ८ ] चाणूरमुष्टिक आदि मल्लोंका तथा कंस और उसके भाइयोंका वध २०५ भी वज्रतुल्य अङ्गोंवाला कंस मन - ही - मन किंचित् व्याकुल होकर सहसा उठ गया और महात्मा… 211–220
- अध्याय १४ ] उद्धवका श्रीकृष्ण - सखाओंको नन्दराजने भी शय्यापर स्थित हो गद्गद वाणीमें कहा । ६-८… 221–230
- अध्याय १ ९ ] श्रीकृष्णका उद्धवके साथ व्रजमें प्रत्यागमन २२५ लेखनीसे संयुक्त किया, वह वह उनके नेत्र - कमलोंके नीरसे भीग गया… 231–240
- अध्याय २३ ] श्रीकृष्णका व्रजसे लौटकर मथुरामें आगमन २३५ करनेवाले हो और तुम्हीं व्रजवासियोंके जीवन हो… 241–250
- अध्याय २ ] मथुरापर जरासंध और कालयवनका आक्रमण २४५ बालकने कमण्डलु पटक दिया हो । बलरामने जरासंधके ऊपर चढ़कर उस शत्रुको मार डालनेके लिये क्रोधसे भरकर घोर मुसल… 251–260
- अध्याय ७ ] श्रीकृष्णके हाथोंसे रुक्मीकी पराजय तथा द्वारकामें रुक्मिणी और श्रीकृष्णका विवाह २५५ टेढ़ा दाँत बच रहा था, वह भी भूमिपर गिर पड़ा… 261–270
- अध्याय १३ ] प्रभास, सरस्वती, बोधपिप्पल और गोमती - सिन्धु- संगमका माहात्म्य २६५ नमस्कार है । द्रौपदीका चीर बढ़ाकर उसकी लाज बचानेवाले आप श्रीहरिको नमस्कार… 271–280
- अठारहवाँ अध्याय सिद्धाश्रममें व्रजाङ्गनाओं तथा सोलह सहस्त्र रानियोंके साथ श्यामसुन्दरकी रासक्रीड़ा-का वर्णन तथा श्रीराधाके मुखसे वृन्दावनके रासकी… 281–290
- श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः विश्वजित्खण्ड पहला अध्याय राजा मरुत्तका उपाख्यान नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय साक्षिणे । प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः संकर्षणाय च । १… 291–300
- अध्याय ७ ] गुजरात - नरेश ऋष्यपर विजय प्राप्त करके यादव सेनाका दमघोषके यहाँ जाना २ ९ ५ राजसूययज्ञ करेंगे । ६… 301–310
- अध्याय १२ ] उशीनर आदि देशोंपर प्रद्युम्नकी विजय ३०५ पड़ता है । २४–३० । राजन्! जैसे हाथसे घुमाया जाता हुआ अलात-चक्र मण्डलाकार घूमता जान पड़ता है, उसी… 311–320
- सत्रहवाँ अध्याय मगधदेशपर यादवोंकी विजय तथा मगधराज जरासंधकी पराजय श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर मत्स्यके चिह्नसे सुशोभित ध्वजा फहरते हुए प्रद्युम्न… 321–330
- अध्याय २२ ] अर्जुनसहित प्रद्युम्नका कालयवन पुत्र दिया । राजन्! इतना ही नहीं, उन्होंने दस बाणोंसे द्रोणपुत्र अश्वत्थामाको, सोलह बाणोंसे धौम्यको, दस बाणोंसे… 331–340
- अध्याय २५ ] प्रद्युम्नका एक युक्तिके द्वारा गणेशजीको अपराधको भुला देंगे । आपकी कृपासे फिर मेरी ऐसी बुद्धि कभी न हो… 341–350
- अध्याय ३० ] रम्यकवर्षमें कलङ्क राक्षसपर श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! समस्त क्षत्रियोंके उन वृद्ध प्रपितामह श्राद्धदेव मनुका परिचय पाकर श्री कृष्णकुमार… 351–360
- अध्याय ३४ ] अनिरुद्धके हाथसे आकाशमें उन वीरोंको पतिरूपमें चुनते समय वे सुन्दरियाँ परस्पर कलह कर बैठती थीं… 361–370
- अध्याय ४० ] शकुनिके जीवस्वरूप शुकका निधन ३६५ महलमें होते हुए शकुनिके भवनमें जा पहुँचे । दैत्यके जीवस्वरूप शुककी खोज करते हुए गरुडजी क्षणभर वहाँ खड़े रहे… 371–380
- पैंतालीसवाँ अध्याय रागिनियों तथा राग - पुत्रोंद्वारा भगवान् श्रीकृष्णका स्तवन और उनका द्वारकापुरीके लिये प्रस्थान श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर… 381–390
- अध्याय ५० ] राजसूय यज्ञका बजने लगीं और देवता उग्रसेनके ऊपर फूल बरसाने लगे । सोनेके हारसे विभूषित चौदह लाख हाथी उग्रसेनने दान किये… 391–400
- अध्याय ६ ] प्राविपाक मुनिके द्वारा श्रीराम - कृष्णकी व्रजलीलाका वर्णन ३ ९ ५ लौट आये । इसके बाद कारागारमें बालककी रुदन-ध्वनि सुनायी पड़ी… 401–410
- ग्यारहवाँ अध्याय श्रीबलराम - स्तोत्र दुर्योधनने कहा – महामुनि प्राड्विपाकजी! अब भगवान् श्रीबलरामजीका वह स्तोत्र, जो साक्षात् समस्त सिद्धियोंको प्रदान… 411–420
- श्रीगणेशाय नमः श्रीविज्ञानखण्ड पहला अध्याय द्वारकामें वेदव्यासजीका आगमन और उग्रसेनद्वारा उनका स्वागत - पूजन राजा बहुलाश्वने कहा - मुने! भगवान्… 421–430
- अध्याय ९ ] पूजोपचार तथा पूजन - प्रकारका वर्णन ४२५ अष्टगन्ध और दीपमें कपूर देना चाहिये । पीले रंगका यज्ञोपवीत, वस्त्रमें पीताम्बर, भूषणके स्थानपर सोना और… 431–440
- अध्याय २ ] श्रीकृष्णावतारकी पूर्वार्द्धगत चले गये । शिष्यवत्सल गुरुदेव! आप ही बताइये, अब मैं किसके लिये जीवित रहूँ । आज ही वनको जाता हूँ… 441–450
- सातवाँ अध्याय देवर्षि नारदका ब्रह्मलोकसे आगमन; राजा उग्रसेनद्वारा उनका सत्कार; देवर्षिद्वारा अश्वमेध यज्ञकी महत्ताका वर्णन; श्रीकृष्णकी अनुमति एवं… 451–460
- अध्याय १३ ] अनिरुद्धका अन्तःपुरसे आज्ञा लेकर अश्वकी रक्षाके लिये प्रस्थान ४५५ भीतर सर्वत्र उसकी गति थी । वह छत्रसे सुशोभित वीणा आदि भी बजने लगे… 461–470
- अध्याय १७ ] स्त्री - राज्यपर विजय, रानी सुरूपाका और कब रात समाप्त हुई? वे सैकड़ों वर्षोंतक उसके साथ रमण करते रहे… 471–480
- अध्याय २४ ] अनुशाल्व और प्रकार युगव्यवस्था करते हैं, वह सुनो । सत्ययुगमें समस्त भूतोंके हितमें तत्पर रहनेवाले वे सर्वभूतात्मा श्रीहरि कपिल आदिका स्वरूप… 481–490
- अध्याय ३० ] ऊर्ध्वकेश और अनिरुद्धका तथा नद और गदका घोर युद्ध ४८५ श्रीकृष्णके दिये हुए उस कोदण्डपर एक बाण रखकर प्रकार उसे आकाशसे पृथ्वीपर गिरा दिया… 491–500
- अध्याय ३५ ] बल्वलके चारों मन्त्रिकुमारोंका वध; बल्वलद्वारा मायामय युद्ध ४ ९ ५ उस बलवान् वीरने युद्धस्थलमें साम्बको दस, मधुको पाँच, बृहद्बाहुको तीन,… 501–510
- अध्याय ३ ९ ] भगवान् शंकरद्वारा वृष्णिवंशियोंको मारा है । श्रीकृष्ण! यही कारण है कि संत पुरुष परमवाञ्छित महान् ऐश्वर्यको स्वयं छोड़कर आपके निर्भय चरणकमलका… 511–520
- अध्याय ४४ ] गोपियोंका श्रीकृष्णको खोजते हुए वंशीवटके निकट आना ५१५ उन पसीनोंको पोंछा । उन गोपाङ्गनाओंकी तपस्याके फलका मैं क्या वर्णन कर सकता हूँ? उन्होंने… 521–530
- अध्याय ४ ९ यादवों और कौरवोंका घोर युद्ध ५२५ हो गये । वे अधिक मात्रामें रक्तवमन करते हुए घायल पास गये और पूछनेपर बताया कि यादवोंने हमारी हो अपना क्षत -… 531–540
- चौवनवाँ अध्याय वसुदेव आदिके द्वारा अनिरुद्धकी अगवानी; सेना और अश्वसहित यादवोंका द्वारकापुरीमें लौटकर सबसे मिलना तथा श्रीकृष्ण और उग्रसेन आदिके द्वारा… 541–550
- अध्याय ५ ९ ] गर्गाचार्यके द्वारा राजा उग्रसेनके प्रति मधुररवकलेशं शं भजे भ्रातृशेषं व्रजजनवनितेशं माधवं राधिकेशम्… 551–560
- अध्याय ५ ९ ] गर्गाचार्यके द्वारा राजा उग्रसेनके प्रति कान्तिको खण्डित करनेवाले । ८२ । ६२०. भीमदुर्योधनज्ञानदाता- भीमसेन और दुर्योधनको ज्ञान देनेवाले, ६२१.… 561–570
- बासठवाँ अध्याय गुरु और गङ्गाकी महिमा; श्रीवज्रनाभद्वारा कृतज्ञता - प्रकाशन और गुरुदेवका पूजन तथा श्रीकृष्णके भजन - चिन्तन एवं गर्गसंहिताका माहात्म्य… 571–580
- गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित पुराण - साहित्य श्रीमद्भागवतमहापुराण, व्याख्यासहित ( कोड 26, 27 ) ग्रन्थाकार - श्रीमद्भागवत भारतीय वाङ्मयका मुकुटमणि है… 581–582