कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 201–210
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 201–210
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कर्मविपाकसंहिता १ ९ ३ भा० टी ० — हे देवि! कृष्ण महाराज के सौ नामों को चारों तरफ से भोज पत्र पर लिखवाकर अपने घर में स्थापित करें ॥ १३ ॥
हरिवंशश्रुतिं कुर्यादेकादश्यां व्रतं चरेत् ।
एवं कृत्वा वरारोहे सर्वरोगक्षयो भवेत्॥ १४ ॥
भा० टी० – हे वरारोहे! हरिवंश का श्रवण करें एकादशीतिथी का व्रत करने से सब रोग नष्ट होते हैं ॥ १४ ॥
पुत्रश्च जायते देवि नात्र कार्या विचारणा । इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे चित्रानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामसप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥
भा ० टी० — हे देवि! पुत्र उत्पन्न होता है । इसमें कुछ भी सन्देह नहीं करना ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां० नाम सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥
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॥५८ ॥
चित्रानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
अयोध्यापुरतो देवि योजनत्रयदक्षिणे ।
सुधर्मपुरविख्याते न्यवसन् बहवो जनाः ॥ १ ॥
भा० टी० – शिवजी कहते हैं — हे देवि! अयोध्यापुरी से तीन योजन दूर दक्षिणदिशा में सुधर्म नामक वाला पुर ( एक नगर) विख्यात है, वहाँ बहुत से जन निवास करते हैं ॥१ ॥
रतिदासेति विख्यातो बभूव वस्तुविक्रयी ।
दलाक्षीति समाख्याता तस्य पत्नी च स्वैरिणी ॥ २ ॥
भा० टी० — वहाँ एक रतिदास नामक वस्तु बेचने वाला ( वैश्य ) रहता था और दलाक्षी नाम वाली इच्छापूर्वक विचरने वाली उसकी स्त्री थी ॥ २ ॥
पतिं न पूजयेद्देवि रूपगर्ववशा तथा ।
महिष्यो बहुला आसन् गावो विक्रयकारणात्॥ ३ ॥
भा० टी० — हे देवि! वह रूप के गर्व में रहकर पति का पूजन नहीं करती थी उस वैश्य के पास क्रय- विक्रय के व्यापार के कारण महिषी और गौ बहुत थीं ॥ ३ ॥
महिषीपुत्रघातं च प्रत्यहं खलु जायते ।
छागस्य विक्रयो नित्यं छागानां वध एव च ॥४ ॥
भा० टी० – वह महिषी के पुत्र की हत्या नित्य प्रति किया करता था और नित्य ही छाग अर्थात् बकरियों को बेचा करता था इससे बकरियों का भी वध किया करता ॥४ ॥
गोप एको महाप्राज्ञो धनार्थी स्वर्णसंयुतः ।
तत्र जातो महादेवि वैश्यमित्रं हि बाल्यतः ॥ ५ ॥
भा० टी० — वहाँ हे देवि! एक ग्वाला महाबुद्धिमान् धन की इच्छा वाला स्वर्ण से युक्त'होकर आया बाल्यावस्था से ही वह वैश्य का मित्र था ॥ ५ ॥
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कर्मविपाकसंहिता १ ९ ५
तस्य गेहे स्थितो देवि धनधान्यसमन्वितः ।
वैश्यपत्नी तदा देवि गोपं प्रति तदाऽभजत् ॥ ६ ॥
भा० टी० — हे देवि! उसके घर में वह ग्वाला रहने लगा वह धनधान्य से युक्त था तब वैश्य की पत्नी उस ग्वाले के साथ रमण करती थी ॥ ६ ॥
एवं बहुगते काले तस्य गोपस्य वै मृतिः ।
वैश्यगेहे महादेवि धनं गोपस्य वै खलुः ॥ ७ ॥
भा० टी० — हे देवि! ऐसे ही बहुत काल बीतने पर उस गोप की मृत्यु हो गयी और उसका द्रव्य सम्पत्ति वैश्य के घर में रही ॥ ७ ॥
वैश्येनैव तु तत्सर्वं धनं तस्य व्ययं कृतम् ।
ततः सर्वं वयो यातं वैश्यमृत्युरभूत्तदा ॥ ८ ॥
भा० टी० - और उस ग्वाले के सारे द्रव्य को वैश्य ने ही भोगा, फिर समय व्यतीत होने पर वैश्य की मृत्यु हो गयी ॥ ८ ॥
गङ्गायां च विशालाक्षि पत्नी तस्य तथा मृता ।
वैश्यस्याऽभूत्तथा स्वर्गो वर्षषष्टिसहस्रकम्॥ ९ ॥
भा० टी० - हे विशाल नेत्रों वाली! उसकी वह स्त्री भी मृत्यु को प्राप्त हुई तब वैश्य को साठ हजार वर्षों का स्वर्गवास हुआ ॥ ९ ॥
वैश्यपत्नी ततो देवि कर्दमे नरके गता ।
षष्टिवर्षसहस्राणि भुक्त्वा नरकयातनाम्॥ १० ॥
भा० टी० - हे देवि! वैश्य की स्त्री को साठ हजार वर्षों तक कर्दम नाम वाले नरक का वास हुआ और नरक का भोग पूरा होने पर ॥ १० ॥
नरकान्निसृता सा तु सर्पयोनिं तथा गता ।
सर्पयोनिं ततो भुक्त्वा गङ्गायां मरणात् खलु ॥ ११ ॥
भा० टी० - नरक से निकलकर वह स्त्री सर्प की योनि को प्राप्त हुई फिर सर्प-योनि को भोग कर गंगाजी पर मृत्यु को प्राप्त हुई ॥ ११ ॥
शूद्रं प्रति पुरा स्नेहस्ततः शूद्रस्य चाऽभवत् ।
वैश्यः स्वर्गफलं भुक्त्वा मानुषत्वं ततोऽगमत्॥ १२ ॥
भा० टी० - शूद्र से पूर्वजन्म में वह वैश्य स्नेह रखा करता था उसके घर में आया तब भी स्नेह ही रखा इस लिए वह वैश्य स्वर्ग के फल को भोगकर मनुष्य योनि में शूद्र जाति को प्राप्त हुआ ॥ १२ ॥
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१ ९ ६ कर्मविपाकसंहिता
धनधान्यसमायुक्तो रूपवानतिथिर्हितः ।
बहुधनी गुणी ज्ञानी पुत्रकन्याविवर्जितः ॥ १३ ॥
भा० टी० – धनधान्य से युक्त, रूप वाला आभ्यागत का पूजन करने वाला, बहुत धनी, गुणवान्, ज्ञान से युक्त, पुत्र और कन्या से रहित है ॥ १३ ॥
वैश्यस्य शूद्रजातित्वं पूर्वस्नेहफलं यतः ।
पत्नी सा च समायाता पूर्वसंबन्धकारणात्॥ १४ ॥
भा० टी० - पूर्वजन्म में शूद्र से स्नेह करने कारण तथा शूद्रता में लीन होने से और पहले ही अनैतिक संबंध के कारण उसकी पत्नी भी अपने कर्मों से शूद्र जाति को प्राप्त हुई ॥ १४ ॥
यतो द्रव्यं समायुक्तं सर्वं शूद्रस्य पापिना ।
ततश्चैव समुत्पन्नाः कन्या बह्वयः सुरेश्वरि! ॥ १५ ॥
भा० टी० — हे सुरेश्वरि! उसने शूद्र का द्रव्य पहले शूद्र ही होकर भोगा, उस पाप से उसके बहुत -सी कन्याएँ ही हुईं ॥ १५ ॥
महिषीपुत्रघातित्वाद्वायुरोगादयस्तथा ।
स्वपतेर्वञ्चनं कृत्वा परपुंसि रता यतः ॥ १६ ॥
भा० टी० – और महिषी के पुत्र मारने से वायु का रोग शरीर में हुआ और उसकी स्त्री पति को छोड़कर परपुरुष से रमण करती थी ॥ १६ ॥
तस्मात्पुत्रस्य मरणं गर्भपातः पुनः पुनः ।
अस्य शान्तिमहं वक्ष्ये शृणु देवि वरेऽनघे ॥ १७ ॥
भा० टी० - हे देवि! हे वरे! हेऽनघे! इससे उसका बार- बार गर्भपात हुआ, अब इसकी शांति को कहता हूँ, तुम सुनो ॥ १७ ॥
गृहवित्तषडंशेषु पुण्यं कार्य्यं च यत्नतः ।
वापीकूपतडागादि पथि मध्ये च कारयेत् ॥ १८ ॥
भा० टी० - अपने घर के धन में से छठे भाग द्रव्य को यत्न से पुण्य हेतु दान दें और मार्ग के मध्य में बावड़ी, कूप, तालाब इत्यादि बनवायें ॥ १८ ॥
शिवस्य पूजनं चैव शिवभक्तिमहर्निशम् ।
नमः शिवाय मन्त्रं च पञ्चलक्षं च जापयेत् ॥ १ ९ ॥
भा ० टी० - शिवजी का पूजन और शिव की रात- दिन भक्ति करें । ॐ नमः शिवाय -इस मंत्र का पांच लाख जप करायें ॥ १ ९ ॥
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कर्मविपाकसंहिता १ ९७
पार्थिवाँल्लक्षसंख्याकान् पूजयेच्च यथाविधि ।
ॐ नमः शिवाय मन्त्रस्तु सर्वपापप्रणाशनः ॥ २० ॥
भा० टी० — यथाविधि एक लाख संख्या वाले पार्थिवों का पूजन करायें ॐ नमः शिवाय यह मंत्र सब पापों का नाश करने वाला है ॥ २० ॥
देहान्ते मुक्तिदश्चैव मर्त्यलोके च कामदः ।
हवनं कारयद्देवि कुण्डे चैव तु शोभने ॥ २१ ॥
भा० टी० - और हे देवि! देह के अंत होने पर मुक्ति के देने वाला है और मृत्युलोक में मनोरथ सिद्ध करता है, इसका हवन सुंदरकुंड में करना चाहिए ॥ २१ ॥
चतुरस्त्रे विशालाक्षि तिलधान्यादितण्डुलैः ।
ताम्रवर्णां ततो देवि गां दद्याद्विदुषे प्रिये! ॥ २२ ॥
भा० टी० - हे विशालाक्षि! हे प्रिये! चौकोर कुंड में तिल, जौ तंडुल आदि से होम करें और तांबे के समान वर्ण वाली गौ को ब्राह्मण को दान करें ॥ २२ ॥
निष्कमात्रं ततः स्वर्णं ब्राह्मणाय प्रदापयेत् ।
एवं कृते न संदेहो व्याधिनाशो भवेद्ध्रुवम् ॥ २३ ॥
भा० टी० – और निष्क ( १ तोला) प्रमाण के सुवर्ण को ब्राह्मण को दान करें ऐसा करने से निश्चय ही व्याधि का नाश होता है ॥ २३ ॥
पुत्रश्च जायते देवि पुनर्गर्भो न नश्यति ।
काकबन्ध्या पुनः पुत्रं प्रसूयेत न संशयः ॥ २४ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे चित्रानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥
भा० टी ० — हे देवि! पुत्र की प्राप्ति होती है, फिर गर्भ नष्ट नहीं होता और काकवन्ध्या स्त्री भी फिर पुत्र को उत्पन्न करती है इसमें संशय नहीं ॥ २४ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वती० चित्रानक्षत्रस्य तृतीचरण० अष्टपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥
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॥५ ९ ॥ चित्रानक्षस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
देशे पुण्यतमे देवि प्रतिष्ठानपुरे तथा ।
ब्राह्मणो वेदविभ्रष्टस्तत्र वासमकारयत्॥ १ ॥
भा० टी ० — शिवजी कहते हैं - हे देवि! पुण्य से युक्त देश में प्रतिष्ठान नाम वाले पुर में एक वेद से भ्रष्ट ब्राह्मण निवास करता था ॥ १ ॥
सुरामांसस्य वै भोक्ता नित्यं मत्स्यामिषस्य च ।
पापकार्ये विशालाक्षि व्ययकर्ता दिने दिने ॥ २ ॥
भा० टी० - हे विशालाक्षि! प्रतिदिन वह मदिरापान तथा मांस आदि का भक्षण तथा मत्स्य आदि का भक्षण और इन का विक्रय किया करता था ॥ २ ॥
तस्य स्त्री परमानाम्नी भ्रष्टा चातीवसुन्दरी ।
पुरपुंसि रता नित्यं निर्भया पतिवञ्चिका ॥ ३ ॥
भा० टी० - और उसकी स्त्री अति सुंदरी परमा नाम से प्रसिद्ध थी वह भी भ्रष्टा और निर्भय होकर पति का वचन ( ठगना ) कर पर पुरुषों से रमण किया करती थी ॥ ३ ॥
एवं सर्वं वयो यातं तयोर्मृत्युरभूत्किल ।
पुण्यक्षेत्रे च गङ्गायां देवगन्धर्वपूजिते ॥ ४ ॥
भा० टी००. - इस प्रकार सारी अवस्था व्यतीत होने पर उनकी मृत्यु हुई वहाँ पवित्र क्षेत्र देव- गंधर्वों से पूजित गंगाजी में उनकी मृत्यु हुई ॥ ४ ॥
तस्य विप्रस्य वै स्वर्गः कल्पमेकं वरानने! भुक्ा च विविधं सौख्यं देवकन्याभिरावृतः ॥ ५ ॥
ततः पुण्यक्षये जाते मृत्युलोके सुरेश्वरि!॥ ६ ॥
भा० टी० - हे वरानने! उस विप्र को एक कल्प तक स्वर्ग का वास हुआ वहाँ
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कर्मविपाकसंहिता १९९ अनेक भोगों को भोगता हुआ देव - कन्याओं से युक्त रहा । तब हे सुरेश्वरि! वहाँ से पुण्य नष्ट होने पर ॥ ५ ॥ ६ ॥
जन्माऽभवत्तस्य नरस्य शुद्धे महत्कुले पुण्ययुते धनाढ्ये । कान्ता तु सैव प्रबभूव या पुरा स्थिता तदीया व्यभिचारचित्ता ॥ ७ ॥
भा० टी० - उत्तम कुल में धन से युक्त मनुष्य योनि में उसका जन्म हुआ और पूर्वजन्म में जो व्याभिचारिणी उसकी स्त्री थी वही कांता फिर पत्नी हो गयी ॥ ७ ॥
मद्यपानादिकं पापं पूर्वजन्मनि यत्कृतम् ।
तत्फलेन महादेवि व्याधिग्रस्तस्ततोऽभवत् ॥ ८ ॥
भा० टी० - हे देवि! पूर्वजन्म में जो उसने मदिरापानादि किये थे उस के फल से उसका व्याधि से ग्रस्त शरीर हुआ ॥ ८ ॥
अथ शान्तिं प्रवक्ष्यामि यतः पापक्षयो भवेत् ।
गायत्रीमूलमन्त्रेण लक्षजाप्यं वरानने! ॥ ९ ॥
भा० टी०-० - अब हे वरानने! इसकी शांति को कहता हूँ, जिनसे पापों का क्षय हो, इसके लिए गायत्री के मूल मंत्र का एक लाख तक जप करायें ॥ ९ ॥
हवनं तद्दशांशेन तर्पणं मार्जनं तथा ।
देवस्याराधनं नित्यं सूर्य्यस्य व्रतमाचरेत्॥ १० ॥
भा० टी० - दशांश हवन, दशांश तर्पण, दशांश मार्जन तथा नित्य देवता का आराधन और सूर्य का व्रत करें ॥ १० ॥
प्रयागे नियतः स्नानं माघे मासि यथाविधि ।
पल्या सह विशालाक्षि ततः पापं प्रणश्यति ॥ ११ ॥
भा० टी ० — हे विशालाक्षि! प्रयाग में नियम पूर्वक स्नान यथाविधि माघ में स्त्री सहित करने से सम्पूर्ण पाप नष्ट होते हैं ॥ ११ ॥
षडंशं च ततो देवि विप्रेभ्यो दानमाचरेत् ।
ततो वर्षेण महतीं गां च दद्यात्पयस्विनीम् ॥ १२ ॥
भा० टी० - हे देवि! घर के द्रव्य में से छठे भाग को ब्राह्मण को दान करें और दूधवाली उत्तम गौ का भी दान करें ॥ १२ ॥
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२०० कर्मविपाकसंहिता
भूमिं वृत्तिकरीं दद्यात् पुत्रपौत्रानुजीविनीम् ।
एवं कृते न सन्देहो वंशो भवति नान्यथा ॥ १३ ॥
भा० टी ० — जोतने वाली भूमि का दान करें, जिसमें पुत्रपौत्रादि की आजीविका हो ऐसा करने से वंश- वृद्धि होती है, इसमें संदेह नहीं यह अन्यथा नहीं है ॥ १३ ॥
रोगार्तो मुच्यते रोगात्काकवन्ध्या सुतं लभेत् ।
गर्भभ्रष्टा लभेत्पुत्रं चिरञ्जीविनमुत्तमम्॥ १४ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे चित्रानक्षस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५ ९ ॥ भा० टी० – रोगी रोग से छूट जाता है, काकवन्ध्या पुत्र को प्राप्त करती है, गर्भ से भ्रष्टा भी बहुत काल तक जीने वाले पुत्र को प्राप्त करती है ॥ १४ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहर० चित्रानक्षत्र० प्रायश्चित्तकथनं नाम एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५ ९ ॥
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॥६० ॥
स्वातिनक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
कान्यकुब्जे महादेवि राजाप्येकोऽवसत्पुरा ।
राजधर्मरतः शान्तः प्रजापालनतत्परः ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! कान्यकुब्ज देश में एक राजा रहता था, वह धर्म में रत, शान्तिपूर्वक प्रजा पालन में तत्पर रहता था ॥ १ ॥
रुद्रधर्मेति विख्यातो भार्या तस्य प्रभावती ।
एकस्मिन् दिवसे देवि ब्राह्मणो भयपीडितः ॥ २ ॥
भा० टी० - हे देवि! रुद्रधर्म नामक उस राजा की भार्या प्रभावती नाम वाली थी, एक दिन भय से पीड़ित एक ब्राह्मण ॥ २ ॥
शरणं श्रावयामास शरणार्थी द्विजोत्तमः ।
तस्य भार्या महादेवि सुरूपाप्यतिसुन्दरी ॥ ३ ॥
भा० टी० - हे देवि! राजा से उस ब्राह्मण ने शरण की याचना की, वह द्विजोत्तम शरणार्थी था और उसकी भार्या रूपवती, अति सुंदरी थी ॥ ३ ॥
राजपुत्रेण तस्यां तु गमनं मुग्धतः कृतम् ।
शरणं दत्तवान् राजा पुत्रस्नेहेन यन्त्रितः ॥ ४ ॥
भा० टी० - उसकी सुन्दर पत्नी पर राजपुत्र मोहित हो गया, उसके संग राजपुत्र ने रमण किया और वह राजा पुत्र- स्नेह से यंत्रित होकर उसे शरण देता रहा ॥ ४ ॥
एवं बहुगते काले नृपस्य मरणं यदा ।
तदा यमाज्ञया दूतैः क्षिप्तो नरककर्दमे ॥ ५ ॥
भा० टी० - इस प्रकार बहुत -सा काल व्यतीत होने पर राजा का मरण हुआ तब यमराज के दूतों ने उसको कर्द्दमसंज्ञक नरक में डाला ॥५ ॥
षष्टिवर्षसहस्राणि नरके परिपच्यते ।
नरकान्निस्सृतो देवि शूकरत्वं ततोऽलभत् ॥ ६ ॥
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२०२ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - साठ हजार वर्षों तक नरक में दुःखों को भोगकर फिर नरक से निकलकर वह शूकर योनि को प्राप्त हुआ ॥ ६ ॥
पुनः शृगालयोनिं च मानुषत्वं ततोऽगमत् ।
धनधान्यसमायुक्तो बहुशो गुणवानपि ॥ ७ ॥
भा० टी० — फिर गीदड़ योनि को प्राप्त होकर मनुष्य योनि को प्राप्त हो धनधान्य से युक्त हुआ, वह बहुत जानने वाला गुणों से युक्त इस प्रकार का हुआ ॥ ७ ॥
पुनर्विवाहिता जाता पत्नी तस्य प्रभावती ।
पूर्वकर्मफलाद्देवि तस्य पुत्रो न जायते ॥ ८ ॥
भा० टी० - हे देवि! पूर्वजन्म के प्रसंग से पुनः विवाही हुई प्रभावती ( पूर्व रानी ) जिसकी पत्नी है, पुत्र की प्राप्ति उसको नहीं हुई ॥ ८ ॥
शरीरं सततं देवि ज्वरेणैव प्रपीडितम् ।
वातपित्तकफानां च संभवः स्याद्वयोगते ॥ ९ ॥
भा० टी० — हे देवि! उसका शरीर निरंतर ज्वर से पीड़ित रहता है और अवस्था व्यतीत होने पर वातपित्तकफादि रोगों से वह पीड़ित होता रहता है ॥ ९ ॥
अस्य दानं शृणु त्वं हि यथा पापक्षयस्तथा ।
गृहवित्ताष्टमं भागं पुण्यकार्यं च कारयेत् ॥ १० ॥
भा० टी० – जिससे पाप नष्ट हों इस प्रकार इसके दान को कहता हूँ, तुम सुनो अपने घर के द्रव्य में से आठवें भाग को पुण्य हेतु दान कर दें ॥ १० ॥
वापीकूपतडागानां जीर्णोद्धारं यदा भवेत् ।
तदा पापं क्षयं याति पूर्वजन्मसमुद्भवम्॥ ११ ॥
भा० टी० - जीर्ण - शीर्ण पुराने बावड़ी, कूप, तालाब इत्यादि का जीर्णोद्धार करें, तब पहले जन्म में किये हुए पाप नाश को प्राप्त होते हैं ॥ ११ ॥
विष्णोरराटमन्त्रेण जपं कुर्याद्विचक्षणः ।
दद्याद्गां वेदविदुषे सवत्सां चैव शोभने! ॥ १२ ॥
भा० टी० - हे शोभने! बुद्धिमान् पुरुष विष्णोरराट- इस मंत्र का जप करवायें तथा वेद पाठी ब्राह्मण को बछड़ा युक्त गौ का दान दें ॥ १२ ॥
वस्त्ररत्नसमायुक्तां घण्टाचामरभूषिताम् ।
ग्रहणेर्कहिमांश्वोश्च काश्यां स्नानं समाचरेत् ॥ १३ ॥