कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 191–200
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 191–200
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कर्मविपाकसंहिता १८३ भा० टी० - हे वरानने! फिर मनुष्य योनि को प्राप्त होता हुआ । पुत्र और कन्या- संतान से रहित ( अर्श ) बवासीर रोग से पीड़ित हुआ ॥ ५ ॥
अस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि पूर्वपापविशुद्धये ।
सूर्य्यमाराधयेन्नित्यं व्रतं सूर्यस्य वासरे ॥ ६ ॥
भा० टी० – अब इसकी शांति को कहता हूँ, पूर्व पाप की शुद्धि के लिये प्रतिदिन सूर्य्य नारायण का आराधन करें तथा आदित्य के दिन व्रत करें ॥ ६ ॥
गायत्रीमूलमन्त्रेण दशायुतजपं तथा ।
प्रयागे नियतः स्नानं माघवैशाखकार्तिके ॥ ७ ॥
भा० टी० — गायत्री के मूल मंत्र का जप दश हजार तक करायें, प्रयाग में नियम पूर्वक माघ, वैशाख, कार्तिक-इन महीनों में स्नान करें ॥७ ॥
भूमिदानं ततो देव वित्तशाठ्यं न कारयेत् ।
गोमिथुनं ततो दद्यात्सर्वालंकारभूषितम्॥ ८ ॥
भा० टी० — हे देवि! फिर भूमि का दान करें और श्रद्धाहीन कर्म न करें और सब गहनों से युक्त दो गायों का दान करें ॥ ८ ॥
कूष्माण्डं नारिकेरं च पञ्चरत्नसमन्वितम् ।
गङ्गामध्ये प्रदातव्यं तुलसीपत्रसंयुतम् ।
माल्यस्य रचना कार्या स्वर्णैर्दशपलैः शुभा ॥ ९ ॥
भा० टी० - पेठे और नारियल को पंचरत्न से तथा तुलसी पत्र से युक्त कर गंगाजी के मध्य में दान करें और दशपल सुवर्ण की सुंदर माला बनवायें ॥ ९ ॥
विधिपूर्वं विशेषेण विविधं गन्धचर्चितम् ।
आचार्याय ततो दद्यात् सर्वपापविशुद्धये ॥ १० ॥
भा० टी० - फिर विधिपूर्वक गंधादि से पूजन कर आचार्य को सर्वपाप की शुद्धि के लिये संकल्प करके दे दें ॥ १० ॥
पुत्रश्च जायते देवि कन्यका नैव जायते ।
सर्वे रोगाः क्षयं यान्ति वन्ध्यात्वं च प्रणश्यति ।
काकवन्ध्या लभेत्पुत्रं मृतवत्सा च पुत्रिणी ॥ ११ ॥
भा० टी० – ऐसा करने से हे देवि! पुत्र संतान होती है कन्या का जन्म नहीं होती और सब रोग नष्ट होते हैं वन्ध्यापन शांत होता है काकवन्ध्या और मृतवत्सा भी पुत्रों को प्राप्त करती है ॥ ११ ॥
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१८४ कर्मविपाकसंहिता अधनो धनमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा । इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे हस्तनक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥
भा० टी० –निर्धन पुरुष धन को प्राप्त करता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं करना ॥ इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां० हस्तनक्ष० नाम चतुःपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥
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॥५५ ॥
हस्तनक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥ हस्तिनानगरे कश्चित्कायस्थो वसति प्रिये! कवलेति समाख्यातस्तस्य स्त्री कमला शुभे! ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे प्रिये! हे शुभे!! हस्तिनापुर में एक कायस्थ निवास करता था, कवल नाम से विख्यात था, उसकी स्त्री कमला नाम वाली थी ॥१ ॥
महाधनसमायुक्तो मद्यपानरतः सदा ।
वेश्यासुरतसंतृप्तो ब्राह्मणस्य विदूषकः ॥ २ ॥
भा० टी० — वह महाधन से युक्त था, मदिरापान में रत, वेश्यासंगी और ब्राह्मण से द्वेष रखने वाला था ॥२ ॥
एकस्मिन् समये देवि कश्चिद्विप्रः समागतः ।
गङ्गाजलसमायुक्तं याचितं तेन भोजनम्॥ ३ ॥
भा० टी० - हे देवि! एक समय उसके घर एक ब्राह्मण आया, उसने उससे गंगा -जल- युक्त भोजन की कामना की ॥ ३ ॥
तच्छ्रुत्वा देहजक्रोधाद्ब्राह्मणं निरभर्त्सयत् ।
ताडितो भर्त्सितस्तेन विषं पीत्वा द्विजो मृतः ॥ ४ ॥
भा० टी० — उसके वचन को सुनकर क्रोध युक्त शरीर से उस ब्राह्मण को झिड़क दिया ताडित हुआ और झिडका हुआ ब्राह्मण विष अर्थात् जहर पीकर मृत्यु को प्राप्त हुआ ॥ ४ ॥
ततो बहुगते काले मरणं तस्य चाभवत् ।
तस्य पत्नी सती जाता तद्दिने च वरानने! ॥ ५ ॥
भा० टी० — तब हे वरानने! बहुत-सा काल व्यतीत होने पर उस कायस्थ की भी मृत्यु हुई तब उसी दिन उसकी स्त्री भी सती हो गयी ॥५ ॥
बहून्यब्दसहस्राणि सत्यलोकेऽवसत्तदा ।
सौख्यानि बहुधा तत्र प्रभुक्तानि वरानने! ॥ ६ ॥
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१८६ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० — हे वरानने! बहुत से वर्षों तक उन्होंने सत्यलोक में वास किया वहाँ अनेक प्रकार के सुखों को भोगा ॥ ६ ॥
ततः पुण्यक्षये जाते मानुषत्वं पुनर्गतः ।
धनधान्यसमायुक्तो विप्रवंशे प्रजायते ॥ ७ ॥
भा० टी० — फिर वहाँ से पुण्य क्षीण होने पर मनुष्य योनि को प्राप्त हो धनधान्य से युक्त विप्रवंश में पैदा हुआ ॥ ७ ॥
जाताश्च बहवः पुत्रा गौराङ्गप्रियदर्शनाः ।
गुणज्ञा रूपसंपन्नाम्रियन्ते प्रीतिवर्द्धनाः ॥ ८ ॥
भा० टी० - और उसके गौर अंग वाले तथा प्रियदर्शन वाले तथा गुणों को जानने वाले, प्रीति के बढ़ाने वाले ऐसे बहुत से पुत्र मरते गये ॥८ ॥
द्वौ पुत्रौ शीलसंपन्नौ चोद्वाहेन समायुतौ ।
पितुः कर्मवशाद्देवि ब्रह्महत्या पुरा यतः ॥ ९ ॥
भा ० टी ० — हे देवि! जिन में से दो पुत्र शील सम्पन्न विवाहे गए थे किन्तु पिता के कर्मों के वश क्योंकि पहले पिता ने ब्रह्म हत्या की थी ॥ ९ ॥
राजरोगसमायुक्तो जायागर्भो विनश्यति ।
अस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु देवि पतिव्रते ॥ १० ॥
भा० टी०} – पिता के पापों से क्षय -रोग से ग्रस्त हो गये और उसकी स्त्री की संतान गर्भ में ही नष्ट होती है, अब हे देवि! हे पतिव्रते!! इसकी शांति को कहता हूँ तुम सुनो ॥ १० ॥
विष्णोरराटमन्त्रेण लक्षजाप्यं च कारयेत् ।
दशांशं हवनं कुर्यात् तर्पणं मार्जनं तथा ॥ ११ ॥
भा० टी ० – ' विष्णोरराट ' इस मंत्र का एक लाख तक जप करायें दशांश हवन करवायें तथा तर्पण- मार्जन करायें ॥ ११ ॥
वित्तस्य च षडंशं च ब्राह्मणे दानमाचरेत् ।
वापीकूपतडागानि पथि मध्ये च कारयेत् ॥ १२ ॥
भा० टी० - और अपने घर के द्रव्य में से छठा भाग ब्राह्मण को दान कर दें और बावडी, कूप, तलाब इनको मार्ग के मध्य में बनवायें ॥ १२ ॥
गामेकां कपिलां दद्यात् सवत्सां वस्त्रभूषिताम् ।
सुवर्णस्य कृतं विप्रं पलपञ्चदशस्य तु ॥ १३ ॥
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कर्मविपाकसंहिता १८७ भा० टी० - वत्स सहित एक कपिला गौ का दान तथा वस्त्रादि आभूषण से युक्त कर और १५ पल सुवर्ण की ब्राह्मण मूर्ति बनवायें ॥ १३ ॥
दद्याद्विप्राय विदुषे सर्वप्राणिरताय वै ।
हरिवंशश्रुतिं देवि विधिपूर्वं च कारयेत्॥ १४ ॥
भा० टी० - फिर सब प्राणियों में रत वेदपाठी दान कर दें ब्राह्मण को तथा हरिवंश का श्रवण करें ॥ १४ ॥
पुत्रश्च जायते देवि गर्भपातश्च शाम्यति ।
काकवन्ध्या लभेत्पुत्रं निश्चयो नात्र संशयः ॥ १५ ॥
भा० टी० - हे देवि! गर्भपात की शांति होती है तथा काकवन्ध्यापन वाली भी निश्चय ही पुत्र को प्राप्त करती है, इसमें संशय नहीं ॥ १५ ॥
पुत्राणां मरणं देवि पूर्वपापप्रसङ्गतः ।
प्रायश्चित्तं विना देवि कुतः शान्तिमवाप्नुयात्॥ १६ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे हस्तनक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥
भा० टी० - हे देवि! पूर्वपाप के प्रसंग से जिसके पुत्रों का मरण हुआ हो, प्रायश्चित्त के विना कैसे शांति होगी अर्थात् इस पाप की शांति के लिये प्रायश्चित्त कराना आवश्यक है ॥ १६ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां० नाम पंचपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥
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॥५६ ॥
चित्रानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
गयापुर्यां महादेवि क्षत्री ह्येकोऽवसत्पुरा ।
कुकर्मणि रतो नित्यं धनाढ्यः कृपणः शठः ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि!! गया नाम वाली पुरी में एक क्षत्रिय वास करता था और खोटे कर्म में रत वह धन से युक्त किन्तु अतिकृपण शठ रहता था ॥ १ ॥
स्त्री भवेच्चञ्चला तस्य द्वौ पुत्रौ च वरानने! कन्या चैका विशालाक्षी जाता तस्यां वरानने! ॥ २ ॥
भा० टी० - हे वरानने! उसकी स्त्री चंचला और दो उसके पुत्र तथा एक कन्या सुंदर नेत्रों वाली थी ॥ २ ॥
उद्वाहिता तदा देवि कन्यका व्यभिचारिणी ।
महिषीपुत्रघातं च प्रत्यब्दमकरोत्प्रिये!॥ ३ ॥
भा० टी० - हे प्रिये! विवाह होते ही वह कन्या व्यभिचारिणी हो गई, वह प्रति वर्ष काटडे ( महिषी पुत्र ) को मारता था ॥ ३ ॥
अनेनैव प्रकारेण वयः सर्वं क्षयं गतम् ।
ततः सर्पेण वै दष्टस्तस्य मृत्युरभूत्तदा ॥ ४ ॥
भा० टी० - इस प्रकार से उसकी आयु व्यतीत हुई, फिर सर्प के दंशित होने से उसकी मृत्यु हो गयी ॥४ ॥
यमदूतैर्महाघोरे निक्षिप्तो नरकार्णवे ।
त्रिसप्ततिसहस्राणि वर्षाणि च वरानने! ॥ ५ ॥
भा० टी० — हे वरानने! उसे यमराज के दूतों ने महाघोर नरक में डाला और सत्तर हजार वर्षों तक नरक में दुःखों को भोगकर ॥ ५ ॥
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कर्मविपाकसंहिता १८९
भुक्त्वा कष्टं विशालाक्षि गर्भत्वं च ततो गतः ।
मध्यदेशे विशालाक्षि नरजन्मा च क्षत्रियः ॥६ ॥
पुत्रो न जायते देवि पूर्वपापानुसारतः ।
कन्यका रजसा युक्ता विधवा जायते प्रिये! ॥ ७ ॥
भा० टी० — हे विशालाक्षि! फिर मध्य देश में क्षत्रिय जन्म लेकर पुत्र से रहित हुआ, पूर्वपाप के प्रभाव से उसकी कन्या युवा अवस्था में विधवा होती है ॥ ६॥ ७ ॥
महिषीपुत्रघातेन रोगोत्पतिश्च जायते ।
अस्य पापस्य शान्त्यर्थं पुण्यं शृणु वरानने! ॥ ८ ॥
भा० टी ० — हे वरानने! महिषी पुत्र को घात मारने से उसके शरीर में रोग की उत्पत्ति हुई इस पाप की शांति के लिए पुण्य को कहता हूँ, तुम सुनो ॥ ८ ॥
स्ववित्तस्याष्टमं भागं ब्राह्मणाय ददेत वै ।
एकां कृष्णां च गां देवि स्वर्णशृङ्गीं सवत्सकाम् ॥ ९ ॥
भा० टी० - अपने घर के द्रव्य से आठवें भाग को ब्राह्मण को दान दें और एक काली गौ स्वर्ण के शृंग बछड़े से तथा वस्त्रों से युक्त करके दान दें ॥ ९ ॥
सर्वलक्षणसंपन्नां वस्त्रमुक्तादिभूषिताम् ।
ब्राह्मणाय तदा दद्याच्छय्यादानं विशेषतः ॥ १० ॥
भा० टी० - सब लक्षणों से युक्त तथा भूषणादि से युक्त ब्राह्मण को दान दें उसी प्रकार सब सामग्री युक्त विशेषकर शय्या का दान दें ॥ १० ॥
गायत्रीजातवेदाभ्यां अयुतं जपमाचरेत् ।
हवनं तद्दशांशेन तर्पणं मार्जनं ततः ॥ ११ ॥
भा० टी० – ' गायत्री ' ' जातवेद'-इन मंत्रों से दश हजार जप करायें और उसके दशांश हवन तथा तर्पण तथा मार्जन करायें ॥ ११ ॥
पथि मध्ये वरारोहे पञ्चवृक्षस्य वाटिकाम् ।
कारयेद्विभवेनैव विष्णुवृक्षादिभिर्वृताम्॥ १२ ॥
भा० टी० — हे वरारोहे! मार्ग के मध्य में पांच वृक्षों की वाटिका लगायें ऐश्वर्य्ययुक्त होकर पीपलादि वृक्षों को लगायें ॥ १२ ॥
भोजयेद्देवि षट्षष्टि ब्राह्मणान्वेदपारगान् ।
निष्कत्रयसुवर्णस्य प्रतिमां वस्त्रभूषिताम्॥ १३ ॥
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१९ ० कर्मविपाकसंहिता भा० टी० — हे देवि! वेदपाठी ६६ ब्राह्मणों को भोजन करायें और तीन निष्क प्रमाण के तीन तोले सुवर्ण की मूर्ति बना आभूषण वस्त्र से युक्त करके ॥ १३ ॥
ब्राह्मणाय ततो दद्यात् विष्णुभक्ताय सुन्दरि! एवं कृत्वा विशालाक्षि पूर्वजन्मकृतं च यत् ॥ १४ ॥
भा ० टी० — हे विशालाक्षि! विष्णु के भक्त ब्राह्मण को दान दें हे सुंदरि! ऐसा करने से पूर्व जन्म में जो पाप किये हैं ॥ १४ ॥
पापं प्रणाशयेद्देवि नात्र कार्या विचारणा ।
काकवन्ध्या च या नारी लभते पुत्रमुत्तमम् ॥ १५ ॥
भा० टी० — हे देवि! वे नष्ट हो जाते हैं, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है और काकवन्ध्या स्त्री भी उत्तम पुत्र को पैदा करती है ॥ १५ ॥
पुत्रश्च जायते देवि सुरूपेण समन्वितः ।
रोगाः सर्वे क्षयं यान्ति नात्र कार्या विचारणा ॥ १६ ॥
भा० टी० - हे देवि! पुत्र भी रूपवान् उत्पन्न होता है और सब रोग नाश को प्राप्त होते हैं इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ १६ ॥
मृतवत्सा लभेत्पुत्रं चिरञ्जीविनमुत्तमम् । इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे चित्रानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥
भा० टी० – मरने वाले पुत्रों वाली स्त्री भी बहुत काल तक जीने वाले पुत्रों को पैदा करती है ॥ इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे चित्रानक्ष० नाम षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥
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॥५७ ॥
चित्रानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
पुण्येन जायते पुत्रः पुण्येन लभते श्रियम् ।
पुण्येन रोगनाशः स्यात् सर्वशास्त्रे च संमतः ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - पुण्य से पुत्र होता है, पुण्य से ही लक्ष्मी होती है, पुण्य से ही रोग का नाश होता है - यह सब शास्त्रों का मत है ॥ १ ॥
मध्यदेशे वरारोहे ब्राह्मणो न्यवसत्प्रिये! ।
सरय्वा दक्षिणे कूले कालिकापुरशोभने ॥ २ ॥
भा० टी० — हे वरारोहे! हे प्रिये!! मध्यदेश में सरयू के दाहिने किनारे पर कालिका नामक सुंदरपुर में एक ब्राह्मण रहता था ॥ २ ॥
तत्र कालीपुरे शुभ्रे द्विजोऽतिष्ठन्महाशनः ।
स्तेनवेश्यापरस्त्रीणां रतिसंसर्गतत्परः ॥ ३ ॥
भा० टी० - वहाँ शुभ कालीपुर में निवास करता हुआ वह ब्राह्मण चोरी, वेश्या, पर-स्त्री संग, इन में तत्पर रहता था ॥ ३ ॥
मद्यपानं विना देवि निद्रा तस्य न जायते ।
तस्य स्त्री सुभवा नाम्नी पतिसेवापरायणा ॥ ४ ॥
भा० टी० - हे देवि! मदिरा पान किये विना उसको नींद नहीं आती थी उसकी स्त्री सुभवा नाम वाली पति की सेवा में परायण थी ॥४ ॥
प्रत्यहं पूजयेद्देवि स्वपतिं पापकारिणम् ।
ततो बहुगते काले मरणं व्याघ्रतोऽभवत्॥ ५ ॥
भा० टी० - हे देवि! वह अपने पापकारी पति का पूजन करती थी, तब बहुत काल व्यतीत होने पर बाघ के खाने से उसकी मृत्यु हो गयी ॥ ५ ॥
तस्य पत्नी सती जाता चिताग्नौ च तदाहिता ।
सत्यलोके ततो देवि कल्पमेकं बुभोज सा ॥६ ॥
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१ ९ २ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - हे देवि! तब उसकी पत्नि चिता की अग्नि में सती हो गई तब उसके प्रभाव से एक कल्प पर्यंत सत्यलोक में उसने सुख भोगा ॥ ६ ॥
पत्या सह वरारोहे ततः पुण्यक्षये सति ।
मृत्युलोके भवेज्जन्म कुले महति पूजिते ॥ ७ ॥
भा ० टी ० — हे वरारोहे! पति के साथ सती हुई वह स्त्री फिर वहाँ से पुण्य क्षीण होने पर बड़ों से पूजित महान् कुल में पैदा हुई ॥ ७ ॥
धनधान्यसमायुक्तो बाल्यतो रोगवानपि ।
पुण्यसंबन्धयोगेन पुण्यस्त्री या च संस्थिता ॥८ ॥
भा० टी ० — वह ब्राह्मण धनधान्य से युक्त उसके बाल्यावस्था से ही शरीर में रोग है, पवित्र पुण्य के योग से जिस पुण्य स्त्री के साथ पूर्वजन्म में रहा था ॥ ८ ॥
पुनर्विवाहिता सैव यायात् पुत्रविवर्जिता ।
अस्य पापस्य शान्त्यर्थं पुण्यं शृणु वरानने! ॥ ९ ॥
भा० टी० - हे देवि! हे वरानने! वह स्त्री पुनर्विवाही गयी है । ऐसे वह पुत्रहीन है इस पाप की शांति के लिये शांति को कहता हूँ, तुम सुनो ॥ ९ ॥
गृहवित्तषडंशस्य पुण्यकार्यं च कारयेत् ।
गायत्रीमूलमन्त्रेण त्रिलक्षं जपमाचरेत् ॥ १० ॥
भा० टी० - अपने घर के द्रव्य के छठे भाग का पुण्य करें और गायत्री के मूल मंत्र का तीन लाख तक जप करवायें ॥ १० ॥
हवनं तद्दशांशेन तर्पणं मार्जनं तथा ।
दशवर्णास्ततो दानं भूमिदानं विशेषतः ॥ ११ ॥
भा० टी० - दशांश हवन तथा तर्पण और मार्जन करायें, दश वर्ण वाली गायों का दान करें विशेषकर भूमि का दान करें ॥ ११ ॥
गोविन्देति ततो नाम जपेन्नित्यं वरानने! प्रातः स्नानं सदा कुर्यान्माघवैशाखकार्तिके ॥ १२ ॥
भा० टी० — हे वरानने! फिर हे गोविंद -ऐसे नाम का स्मरण करें और माघ, वैशाख, कार्त्तिक-इन में प्रातः काल स्नान करें ॥ १२ ॥
कृष्णस्य शतकं देवि भूर्जपत्रेण संयुतम् ।
लेखयित्वा विधानेन स्थापयेत्स्वगृहं प्रति ॥ १३ ॥