कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 221–230

कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 221–230

पृष्ठ 221

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॥६४ ॥

विशाखानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

कपिले नगरे देवि क्षत्री वै न्यवसत्पुरा ।

क्षत्रधर्मविहीनश्च वैश्यकर्मरतः सदा ॥ १ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं -हे देवि! पहले कपिल नामक नगर में एक क्षत्रिय वास करता था, वह क्षत्रिय- धर्म से रहित और सदा वैश्य के धर्मों में रत रहता था ॥ १ ॥

प्रत्यहं वैश्यवृत्त्या तु व्ययं कुर्याद्दिने दिने ।

बहुद्रव्यं तदा तेन संचितं त्यक्तधर्मणा ॥ २ ॥

भा० टी० - वैश्य कर्म से प्रतिदिन व्यापार करके तथा अपना धर्म त्यागकर उसने बहुत - सा द्रव्य इकठ्ठा किया ॥ २ ॥

महालोभेन संयुक्तो धर्मचर्चा न कुत्रचित् ।

पत्नी पुत्राय भोगार्थं नादात्कृपणकेसरी ॥ ३ ॥

भा० टी० — और महालोभ से युक्त होकर उसने कभी भी धर्म की चर्चा न की और अपनी स्त्री अथवा पुत्र को भी भोगने के लिए कुछ नहीं देता था वह ऐसा कृपण शिरोमणि था ॥ ३ ॥

एवं बहुतिथे काले मरणं सर्पतस्तदा ॥ ४ ॥

भा० टी ० – ऐसे ही बहुत-सा काल व्यतीत होने पर सर्प के द्वारा काटने से उसकी मृत्यु हुई ॥४ ॥

आसीत्तदीयप्रमदापि तादृक् यतो जनो योग्यमुपैति सर्वम्। यथार्थतः क्षिप्तमतीवदुःखे यमस्य दूतैः कृतपादशृङ्खलः ॥ ५ ॥

भा० टी० - और उसकी स्त्री भी वैसी ही होती गई, क्योंकि जो जिस धर्म में

पृष्ठ 222

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२१४ कर्मविपाकसंहिता युक्त हो, उसको सब वैसा ही मिलता है, तब यमराज के दूतोंनें पैरों में श्रृंखला अर्थात् शांकल डाल कर उसे महाघोर नरक में डाला ॥ ५ ॥

युगमेकं वरारोहे कष्टं भुक्त्वा सुदारुणम् ।

ततोऽभूत्स ततो देवि महिषी वृषभो हयः ॥ ६ ॥

भा० टी० — हे वरारोहे! हे देवि!! एक युग तक नरक के दुःखों को भोगकर फिर महिषी की योनि को प्राप्त हुआ, तदनन्तर बैल की योनि को प्राप्त होकर वहाँ से घोड़े की योनि को प्राप्त हुआ ॥ ६ ॥

पुनश्च मानुषो भूत्वा तस्य भार्या च या पुरा ।

विवाहिता च सा देवि तस्यां पुत्रो न जायते ॥ ७ ॥

भा० टी ० — हे देवि! फिर मनुष्य योनि को प्राप्त होकर, जो पहले उसकी भार्या थी, वही फिर उसे विवाहित हुई किन्तु पुत्र की संतान न हुई ॥ ७ ॥

पुरा ह्येकाऽभवत्कन्या पुनः सूतिविवर्जिता ।

रोगो भवति देहे च मध्ये मध्ये ज्वरो भवेत्॥ ८ ॥

भा० टी० - पहली कन्या की संतान होने के पश्चात् उसको गर्भ नहीं ठहरता और देह में रोग तथा मध्य- मध्य में ज्वर की पीड़ा होती है ॥ ८ ॥

अस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु देवि वरानने! कल्पवृक्षवरं कुर्यात् स्वाङ्गुष्ठपरिमाणकम्॥ ९ ॥

भा० टी० — हे देवि! हे वरानने!! इसकी शांति को कहता हूँ, तुम सुनो, एक अंगुष्ठ के परिमाण वाला कल्पवृक्ष बनवायें ॥ ९ ॥

सुवर्णस्य महादेवि पलपञ्चदशस्य तु ।

वेदीं रौप्यमयीं कुर्यात् पलपञ्चदशस्य तु ॥ १० ॥

भा० टी ० — हे महादेवि! पंद्रह पल वाले सुवर्ण का वृक्ष बनवायें और पंद्रह पल परिमाण वाली चांदी की वेदी बनवायें ॥ १० ॥

तत्र वृक्षं समारोप्य फलपुष्पेण संयुतम् ।

अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां च सुरेश्वरि! ॥ ११ ॥

भा० टी० — और हे सुरेश्वरि! वहाँ फल- पुष्प से युक्त उस वृक्ष को स्थापित कर अष्टमी, चतुर्दशी तथा नवमी के दिन ॥ ११ ॥

तस्य वृक्षस्य वै मूले वृषकेतुं सुरेश्वरि! सगणं देवमीशानमर्चयित्वा यथाविधि ॥ १२ ॥

पृष्ठ 223

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कर्मविपाकसंहिता २१५ भा० टी० - हे सुरेश्वरि! उस वृक्ष के मूल में यथाविधि गणों सहित महादेव की पूजा करें ॥१२ ॥

यथाशक्ति वरारोहे गन्धधूपादिभिस्तथा ।

साष्टाङ्गं दण्डवत्तत्र देवदेवं समापयेत्॥ १३ ॥

भा० टी ० — हे वरारोहे! यथाशक्ति गंधधूपादि से पूजन करें और देवों के देव को साष्टांग दंडवत् प्रणाम कर समाप्त करें ॥ १३ ॥

मन्त्रेणानेन भो देवि विसर्जनमथाचरेत् ।

ॐ नमः शिवाय देवाय शिवायै सततं नमः ॥ १४ ॥

भा० टी० - और हे देवि! "ॐ नमः शिवाय शिवायै सततं नमः " इस मंत्र से पार्वती और महादेव का विसर्जन करें ॥ १४ ॥

मम पूर्वकृतं पापं जन्मजन्मसमुद्भवम् ।

तत्सर्वं क्षम्यतां देव देव्या सह महेश्वर! ॥ १५ ॥

भा० टी० — हे देव! हे महेश्वर! देवी के सहित तुम मेरे जन्म-जन्मों के पापों को शांत करो ॥ १५ ॥

ततो वै पूजयेद्विप्रं वेदब्रह्मस्वरूपिणम् ।

पट्टवस्त्राद्यलंकारैर्विविधैर्मोदकैरपि ॥ १६ ॥

भा० टी० - फिर वेद ब्रह्म के स्वरूप विप्र का पट्ट वस्त्रादि अलंकार से तथा नाना प्रकार के मोदकों से पूजन करें ॥ १६ ॥

ततो वृक्षं च वेदीं च कपिलां गां सवत्सकाम् ।

ब्राह्मणाय ततो दद्यात् पूर्वपापविशुद्धये ॥ १७ ॥

भा० टी० - फिर पूर्वपाप की शुद्धि के लिये वेदी के सहित वृक्ष और बछड़े से युक्त कपिला गौ को ब्राह्मण को दान दें ॥ १७ ॥

भक्त्या मम महादेवि शिवरात्र्यां विशेषतः ।

आ जन्ममरणाद्देवि व्रतं कुर्यात्प्रयत्नतः ॥ १८ ॥

भा० टी० — हे महादेवि! भक्ति पूर्वक शिवरात्रि के दिन विशेषता से जन्म से मरण पर्यंत यत्न पूर्वक व्रत करें ॥ १८ ॥

एवंकृते महादेवि शीघ्रं पुत्रः प्रजायते ।

रोगाः सर्वे क्षयं यान्ति वन्ध्या च लभते सुतम्॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 224

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२१६ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० — हे देवि! ऐसा करने से शीघ्र पुत्र की प्राप्ति होती है और सब रोग नाश को प्राप्त होते हैं और वन्ध्या भी पुत्र को प्राप्त करती है ॥ १ ९ ॥ मृतवत्सा लभेत्पुत्रं चिरञ्जीविनमुत्तमम् । इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे विशाखानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चितकथनं नाम चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥

भा० टी ० — मृतवत्सा भी बहुत काल तक जीने वाले पुत्र को प्राप्त करती है ॥ इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादेविशाखानक्ष० प्रथमचर० प्रायश्चित्तकथनं नाम चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥

पृष्ठ 225

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॥ ६५ ॥

विशाखानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

विष्णुकाञ्च्यां महादेवि ब्राह्मणो वेदपारगः ।

अत्याचाररतः शान्तो विष्णुभक्तिपरायणः ॥ १ ॥

भा० टी० – शिवजी कहते हैं - हे महादेवि! विष्णुकांचिपुरी में एक ब्राह्मण वेद का पारायण करने वाला, अति आचार में रत शांतस्वभाव विष्णु की भक्ति में परायण रहता था ॥ १ ॥

लाञ्छितो विष्णुचक्रेण विप्रो विद्याविवर्जितः ।

न वेदः पाठ्यते तेन न विप्रः स्पृश्यते क्वचित्॥ २ ॥

भा० टी००.- वह विष्णु चक्र के चिह्न वाला अर्थात् चक्रांकित था । वह ब्राह्मण विद्या से रहित होकर वेद को नहीं पढ़ने वाला तथा ब्राह्मण वृत्ति को भी कभी स्पर्श न करने वाला हुआ ॥ २ ॥

द्विजानां स्मार्तवृत्तीनां विद्वेषं च करोति सः ।

शिवशक्तिरतानां च नाभिवादनमाचरेत् ॥ ३ ॥

भा० टी ० – ऐसा वह स्मार्तवृत्ति वाले ब्राह्मणों के प्रति वैरभाव रखता था और शिव की भक्ति में रत रहने वालों को नमस्कार भी नहीं करता था ॥ ३ ॥

एवं वयोगते देवि वृद्धे जाते वरानने! मरणं तस्य वै जातं ब्राह्मणस्य वरानने! ॥ ४ ॥

भा ० टी ० — हे देवि! हे वरारनने!! इस प्रकार वृद्ध होने पर जब उसकी अवस्था बीत गयी तो उसकी मृत्यु हो गयी ॥ ४ ॥

यमदूतैर्महाघोरे नरके पातितस्तदा ।

रौरवे च तदा देवि षष्टिवर्षसहस्रकम्॥ ५ ॥

भा० टी० – और यमराज के दूतों न यम की आज्ञा पाकर साठ हजार वर्षों तक महाघोर नरक में तथा रौरव संज्ञक नरक में उसे डाला ॥ ५ ॥

पृष्ठ 226

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२१८ कर्मविपाकसंहिता

भुक्त्वा नरककष्टं च पुनर्जातः सरीसृपः ।

मानुषत्वं पुनर्जातः कष्टानि विविधानि च ॥ ६ ॥

भा० टी० — तब वह नरक के दुःखों को भोगकर विच्छू की योनि को प्राप्त हुआ, फिर अनेक कष्टों सहित मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ ॥ ६ ॥

पुत्रस्य मरणं कान्ते प्रतिवर्षे महाव्यथा ।

पुनः स्त्री काकवन्ध्या स्यात्पूर्वजन्म प्रसङ्गतः ॥ ७ ॥

भा० टी० — हे कांते! पुत्र का मरण और प्रतिवर्ष महादुःख को प्राप्त होता है और उसकी स्त्री पूर्वजन्म के प्रसंग से काकवन्ध्या हो गयी है ॥७ ॥

धनधान्यसमायुक्तोऽप्येवं दुःखं महद्भवेत् ।

अथ वक्ष्ये महादेवि पूर्वपापस्य निष्कृतिम्॥ ८ ॥

भा० टी० — और धनधान्य से युक्त होकर भी वह दु:खों को प्राप्त होता है, अब हे देवि! पूर्वपाप की शुद्धि को कहता हूँ, तुम सुनो ॥ ८ ॥

गङ्गामध्ये प्रदातव्यं पूर्वपापविशुद्धये ।

निष्कत्रयसुवर्णस्य कमलं निर्मितं शुभम्॥ ९ ॥

भा० टी० - हे देवि! पूर्वपाप की शुद्धि के लिए तीन निष्कप्रमाण वाले सुवर्ण का कमल बनाकर ब्राह्मण को दान कर दें ॥ ९ ॥

दद्याद्वेदविदे देवि ब्राह्मणाय शुभार्थिने ।

अष्टांशं विभवं देवि ब्राह्मणाय समर्पयेत् ॥ १० ॥

भा० टी ० — और हे देवि! शुभार्थी ब्राह्मण को अपने घर के द्रव्य में से आठवें भाग का दान कर के दें ॥१० ॥

गायत्रीजातवेदाभ्यां दशायुतजपं तथा ।

कूष्माण्डं नारिकेरं च पञ्चरत्नसमन्वितम् ॥ ११ ॥

भा० टी ० – गायत्री तथा जातवेद मंत्र का दश हजार तक जप करायें और पेठा वा नारियल को पंच रत्न से युक्त कर गंगा के मध्य में दान करें ॥ ११ ॥

एवं कृते भवेद्देवि पूर्वपापविशुद्धता ।

पुत्रं चैवं लभेद्देवि चिरञ्जीविनमुत्तमम्॥ १२ ॥

भा० टी ० — हे देवि! ऐसा करने से पूर्वपाप की शुद्धि होती है और बहुत काल तक जीने वाले पुत्र- संतान प्राप्त करता है ॥ १२ ॥

पृष्ठ 227

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कर्मविपाकसंहिता २१ ९

व्याधयः प्रशमं यान्ति ज्वराः सर्वे तथाविधाः ।

काकवन्ध्या लभेत्पुत्रं चिरञ्जीविनमुत्तमम्॥ १३ ॥

इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे विशाखानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥

भा० टी० - सब व्याधियों का नाश तथा सब ज्वरों का क्षय और काकवन्ध्या को भी बहुत काल तक जीवने वाले पुत्र की प्राप्ति होती है ॥ १३ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां० विशा० द्वितीयच० नाम पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥

पृष्ठ 228

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॥६६ ॥

विशाखानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

विदर्भनगरे देवि क्षत्री ह्येकोऽवसत्पुरा ।

तेजशर्मेति विख्यातो द्विजानां वृत्तिहारकः ॥१ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! पहले विदर्भ नामक पुर में एक क्षत्रिय वास करता था, वह तेजशर्मानाम से प्रसिद्ध था और ब्राह्मणों की जीविका को हरने वाला था ॥ १ ॥

प्रजानां दुःखदो नित्यं वेदानां चैव निन्दकः ।

तस्य त्रासवशात्सर्वा प्रजा ग्रामात्पलायिता ॥ २ ॥

भा० ०- वह प्रजा को नित्य दुःख देने वाला तथा देवों की निंदा करने वाला था उसके त्रास से सब प्रजा दुःखी होकर ग्राम से भाग गई ॥२ ॥

एवं बहुगते काले तस्य मृत्युरभूत्किल ।

यमदूतैर्महाघोरैर्निक्षिप्तो नरके ततः ॥ ३ ॥

भा० टी०-o - इस प्रकार बहुत- सा काल व्यतीत होने पर उसकी मृत्यु हुई, पश्चात् पीछे वह यमराज के भयंकर दूतों के द्वारा घोर नरक में डाला गया ॥ ३ ॥

द्विसप्ततिसहस्त्राणि घोरे नरककर्दमे ।

भुक्तं नरककष्टं च सूचीमुखसमुद्भवम्॥ ४ ॥

भा० टी ० — हे देवि! वह बहत्तर हजार वर्षों तक घोर नरक में रहा, वहाँ-सूची मुख नरक से उत्पन्न हुए कष्टों को भोगता रहा ॥ ४ ॥

नरकान्निर्गतो देवि गर्दभत्वं ततोऽगमत् ।

रासभत्वात्ततो देवि मानुषत्वं ततोऽभवत् ॥ ५ ॥

भा० टी० – नरक से निकलकर वह गर्दभ की योनि को प्राप्त हुआ और वहाँ से फिर मनुष्य - योनि को प्राप्त हुआ ॥ ५ ॥

पृष्ठ 229

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कर्मविपाकसंहिता २२१ तस्य भार्याभवद्वन्ध्या पूर्वजन्मफलाच्छिवे! तस्माद्गात्रे भवेद्रोगो दद्रुरर्शादयस्तथा ॥ ६ ॥

भा० टी० - उसकी भार्य्या पिछले जन्म के कर्म - प्रसंग से वंध्या होती हो गयी तथा उसके गात्र में दद्रु अर्श ( बवासीर ) इत्यादि रोग पीड़ होती रहती है ॥ ६ ॥

न सुखं लभते देवि चिन्तया व्याकुलेन्द्रियः ।

शृणु सर्वं वरारोहे पूर्वपापस्य निग्रहे ॥ ७ ॥

भा० टी० - हे देवि! हे वरारोहे! वह चिंता से व्याकुल होकर कुछ भी सुख को नहीं प्राप्त करता, अब उस पाप की शांति को कहता हूँ, तुम सुनो ॥ ७ ॥

दशांशं विभवं देवि ब्राह्मणाय समर्पयेत् ।

वापीकूपतडागादि पथि मध्ये च कारयेत् ॥ ८ ॥

भा० टी० - हे देवि! अपने घर के द्रव्य में से दशांश ब्राह्मण को दान करें और मार्ग के मध्य में बावड़ी, कूप, तालाब इत्यादि बनवायें ॥ ८ ॥

गृहदानं ततो देवि सर्ववस्तुसमन्वितम् ।

प्रदद्याद्वेदविदुषे ब्राह्मणाय वराय च ॥ ९ ॥

भा० टी ० — हे देवि! सभी वस्तुओं से युक्त घर का दान वेद पाठी विद्वान् ब्राह्मण को करें ॥ ९ ॥

आकृष्णेति जपं देवि लक्षमेकं च कारयेत् ।

होमं कुर्यादद्रिसुते तिलाज्यमधुतण्डुलैः ॥ १० ॥

भा० टी० — हे देवि! हे अद्रिसुते!! ' आकृष्णे ० ' इस मंत्र का एक लाख तक जप करवायें, तिल, घृत, तंडुल इनको एकत्रित करके होम करवायें ॥ १० ॥

ततो गां कपिलां देवि ब्राह्मणाय प्रपूजिताम् ।

प्रदद्याद्विधिवच्चैव सर्वालंकारभूषिताम्॥ ११ ॥

भा० टी० - हे देवि! फिर ब्राह्मण को पूजन करके तथा विधिपूर्वक वस्त्रादि अलंकार से युक्त करके कपिला गौ का दान दें ॥ ११ ॥

सुवर्णनिष्कमात्रं तु ब्राह्मणाय ततो ददेत् ।

एवं कृते वरारोहे रोगनाशो भवेद्ध्रुवम्॥ १२ ॥

भा० टी० - और हे वरारोहे! निष्कमात्र प्रमाण के सुवर्ण का दान ब्राह्मण को दें ऐसा करने से निश्चय ही रोग का नाश होता है ॥ १२ ॥

पृष्ठ 230

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२२२ कर्मविपाकसंहिता

पुत्रश्च जायते देवि वन्ध्यत्वं च प्रशाम्यति ।

काकवन्ध्या लभेत्पुत्रं नात्र कार्या विचारणा ॥ १३ ॥

इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे विशाखानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥

भा० टी० — हे देवि! पुत्र- संतान होती है वन्ध्यापन दूर होता है, काकवन्ध्याभी पुत्र को प्राप्त करती है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ १३ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां० विशाखा० प्रायश्चित्तकथनं नामषट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥