कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 231–240

कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 231–240

पृष्ठ 231

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॥६७ ॥

विशाखानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

मायापुर्य्यां महादेवि क्षत्री ह्येकोऽवसत्पुरा ।

स शूरश्च धनी मानी देवताऽतिथिपूजकः ॥ १ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! मायापुरी में पहले एक क्षत्रिय रहता था, वह शूरवीर तथा धन से युक्त, सम्मानित देवता और अभ्यागत का पूजन करने वाला था ॥ १ ॥

तस्य भार्या विशालाक्षी शतानाम्नी वराङ्गना ।

ब्राह्मणातिथिदेवानां पूजने चातितत्परा ॥ २ ॥

भा० टी० – उसकी भार्या सुंदर नेत्रों वाली शता नाम से विख्यात, श्रेष्ठ अंगों वाली ब्राह्मण, अतिथि, देवता-इन के पूजन में रत रहती थी ॥२ ॥

एकस्मिन् समये देवि हेमकारः समागतः ।

धनाढ्यः स्वर्णसंयुक्तो गृहे तस्यावसत्स च ॥ ३ ॥

भा० टी० — हे देवि! एक समय वहाँ सुवर्णकार आया, धन तथा सुवर्ण सहित उस क्षत्रिय के घर में उसने निवास किया ॥ ३ ॥

क्षत्रियाय स्वमित्राय शतं स्वर्णस्य वै पलम् ।

प्रदत्तं हेमकारेण चान्यत्स्वर्णं समर्पितम् ॥ ४ ॥

भा० टी० – उस स्वर्णकार को क्षत्रिय ने अपना मित्र समझकर उसको सौ पल मात्रा वाला सुवर्ण तथा अन्य सुवर्ण भी सारा दे दिया ॥४ ॥

अत्रान्तरे महादेवि स्वर्णकारस्ततो मृतः ।

दष्टः सर्पेण तीव्रेणः पुत्रहीनः सुवर्णकृत्॥ ५ ॥

भा० टी० - हे देवि! कुछ समय के अंतर में वह स्वर्णकार तीव्र सर्प के डँसने

से मृत्यु को प्राप्त हुआ । वह सुवर्णकार ( सुनार ) पुत्रादि से हीन था ॥ ५ ॥

पृष्ठ 232

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२२४ कर्मविपाकसंहिता

स्वर्णं सर्वं गृहीत्वा तु प्रभुक्तं क्षत्रियेण तत् ।

पुत्रदारयुते जाते न दत्तं तद्विजाय च ॥ ६ ॥

भा० टी ० - और वह सारा सुवर्ण क्षत्रि ने ले लिया पुत्रदारा से युक्त होकर सारे द्रव्य को भोगता गया और ब्राह्मण को किंचित् मात्र भी दान नहीं दिया ॥ ६ ॥

ततो बहुगते काले तस्य मृत्युरभूत्किल ।

क्षत्रियस्य महादेवि सुरलोकस्ततोऽभवत् ॥ ७ ॥

भा० टी ० — हे देवि! तब बहुत -सा काल व्यतीत होने पर उस क्षत्रिय का मृत्यु हो गयी और सुरलोक का वास उसको मिला ॥ ७ ॥

सौख्यं सुराङ्गनासार्द्धं षष्टिवर्षप्रमाणकम् ।

ततः पुण्यक्षये जाते बभूव मनुजः क्षितौ ॥ ८ ॥

भा० टी० - और वहाँ देवांगनाओं के साथ साठ हजार वर्षों तक भोगों को भोगकर वहाँ से पुण्य क्षीण होने पर पृथ्वी पर मनुष्य शरीर लेकर जन्मा ॥ ८ ॥

धनधान्ययुतस्तस्य भूयो भार्याऽभवत् किल ।

कन्यका चैव पुत्रौ च जातौ तस्यां वरानने! ॥ ९ ॥

भा० टी० — हे वरानने! धनधान्य से युक्त हुए उसके फिर वही पूर्वजन्म वाली भार्य्या हो गयी और उनके एक कन्या तथा दो पुत्र पैदा हुए ॥ ९ ॥

गर्भं च जायते देवि तद्गर्भपतनं भवेत् ।

रोगमुग्रं भवेद्देवि न सुखं जायते खलु ॥ १० ॥

भा० टी ० — हे देवि! उसके अन्य गर्भों का पात हो गया और उसे बड़ा उग्ररोग हुआ सुख की प्राप्ति उसको किंचित् भी नहीं हुई ॥ १० ॥

शान्तिं शृणु वरारोहे यतः पापक्षयो भवेत् ।

षडंशं च ततो देवि ब्राह्मणाय समर्पयेत् ॥ ११ ॥

भा० टी० - हे वरारोहे! उसकी शांति को तुम सुनो मैं कहता हूं जिससे पाप शांत हों, घर के द्रव्य में से छठे भाग पुण्य के लिए ब्राह्मण को दें ॥ ११ ॥

दशवर्णां ततो दद्याद्विप्राय ज्ञानिने प्रिये! गायत्रीमूलमन्त्रेण लक्षजाप्यं च कारयेत् ॥ १२ ॥

भा० टी० - हे प्रिये! दशवर्णों वाली गायों का दान ज्ञानवान् ब्राह्मण को दें और गायत्री के मूलमंत्र का एक लाख तक जप करवायें ॥ १२ ॥

पृष्ठ 233

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कर्मविपाकसंहिता २२५

पक्वान्नेनैव भो देवि ब्राह्मणान् भोजयेच्छतम् ।

वृक्षं स्वर्णस्य वै देवि फलपुष्पसमन्वितम् ॥ १३ ॥

भा० टी० – और हे देवि! पक्वान्न भोग से सौ ब्राह्मणों को भोजन करवायें और सुवर्ण से वृक्ष को बनाकर फलपुष्पों से युक्त कर ॥ १३ ॥

दद्याद्विप्राय विदुषे पलं दशप्रमाणकम् ।

सूर्यस्य पूजनं चैव रविवारे विशेषतः ॥ १४ ॥

भा० टी ० – दश पल प्रमाण वाले सुवर्ण से युक्त कराकर वेद पाठी ब्राह्मण को दान करके दें और विशेषकर रविवार के दिन सूर्य की पूजा करें ॥ १४ ॥

एवं कृते वरारोहे शीघ्रं पुत्रश्च जायते ।

ज्वरस्य वै भवेन्मुक्तिः काकवन्ध्या सुतं लभेत् ॥ १५ ॥

भा० टी० — हे वरारोहे! ऐसा करने से शीघ्र पुत्र पैदा होता है और ज्वर से व्यक्ति छूट जाता है, काकवन्ध्या स्त्री भी पुत्र को प्राप्त करती है ॥ १५ ॥

मृतवत्सा लभेत्पुत्रं चिरञ्जीविनमुत्तमम् । इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे विशाखानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥६७ ॥

भा० टी० - मृतवत्सा भी बहुत काल की आयु वाले पुत्र को पैदा करती है ॥ इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे विशाखानक्षत्रस्य चतुर्थ० प्रायश्चित्त० सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥

पृष्ठ 234

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॥६८ ॥

अनुराधानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

कल्याणनगरे गौरि मायापुर्याः समीपतः ।

वणिग्जनोऽवसत्तत्र धनाढ्यो धनगर्वितः ॥ १ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे गौरि! कल्याण नाम वाले नगर में मायापुरी के समीप एक बनियां धन से युक्त था, किन्तु धन के मद से अत्यधिक घमण्डी होकर वह वहाँ निवास करता था ॥ १ ॥

क्रयकृत्सर्ववस्तूनां विक्रयं च सदाऽकरोत् ।

महालोभवशाद्देवि न दत्तं पापिना क्वचित्॥ २ ॥

भा० टी० - हे देवि! वह वस्तुओं को लेने - देने का व्यापार सदा करता था, महालोभ वशीभूत होकर उस पापी ने कुछ भी दान नहीं किया ॥ २ ॥

तस्य भार्या विशालाक्षी पुंश्चली कुलटाऽधमा ।

यमौ पुत्रौ वरारोहे पुंश्चल्यां जज्ञिरे तदा ॥ ३ ॥

भा० टी० — हे वरारोहे! उसकी भार्या सुंदर नेत्रों वाली पुंश्चली ( जारिणी ) तथा कुलटा तथा अधमवृत्ति वाली थी, उसने दो पुत्रों को जुड़वा पैदा किया ॥ ३ ॥

एको द्यूतरतः पुत्रो द्वितीयो ब्राह्मणीरतः ।

वैश्येनैव विशालाक्षि धनं च बहु सञ्चितम् ॥४ ॥

भा० टी० — हे विशालाक्षि! उस वैश्य ने बहुत धन और साधन संचित किये और उसके दोनों पुत्रो में से एक तो द्यूत कर्म अर्थात् जुआ खेलने में और दूसरा ब्राह्मणी में रत रहता था ॥ ४ ॥

प्रत्यहं भुज्यते छागविक्रयं कुरुते सदा ।

वृद्धे सति महादेवि वैश्यस्य मरणं ह्यभूत् ॥ ५ ॥

भा० टी० - हे महादेवि! प्रतिदिन वे दोनों उस धन का भोग किया करते थे और

पृष्ठ 235

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कर्मविपाकसंहिता २२७ बकरियों का क्रयविक्रय भी करते थे । इस प्रकार वैश्य के वृद्ध होने पर उसकी मृत्यु हो गयी ॥५ ॥

यमदूतैस्तदा बद्ध्वा निक्षिप्तो नरकार्णवे ।

स्वरूपं दर्शयामास तस्मै वैश्याय सूर्यजः ॥ ६ ॥

नवत्यब्दसहस्त्राणि घोरे नरकदारुणे ।

महाकष्टं तदा दत्तं कृमिभिर्घोररुपिभिः ॥७ ॥

भा० टी० - तब सूर्य के पुत्र यमराज ने अपना रूप दिखाकर दूतों को आज्ञा देकर शृंखलों से बांधकर उसे नरक रूपी समुद्र में डाला । वहाँ घोर रूप वाले कृमियों से पीडित वह महादुःखों को प्राप्त हुआ ॥ ६ ॥ ७ ॥

ततो व्याघ्रस्य वै योनिं काककुक्कुटयोः पुनः ।

मानुषत्वं ततो यातः पुत्रकन्याविवर्जितः ॥ ८ ॥

भा० टी० - फिर वहाँ से निकलकर बाघ की योनि को प्राप्त हुआ, फिर काकयोनि को प्राप्त होकर मुरगे की योनि को प्राप्त हुआ, फिर मनुष्य योनि पार पुत्र तथा कन्या से रहित है ॥ ८ ॥

पुनर्विवाहिता सा तु या पत्नी पूर्वजन्मनि ।

रोगवान् सापि रोगार्त्ता मृतवत्सा पुनः पुनः ॥ ९ ॥

भा० टी० – जो उसकी पूर्व जन्म में स्त्री थी वही फिर विवाही गयी, वह भी रोगयुक्त है तथा स्त्री भी रोग से पीड़ित होकर बार- बार मृतवत्सावस्था को प्राप्त होती है अर्थात् उसके पुत्र मरते ॥९ ॥

एकापत्या भवेद्दुष्टा न स्यादन्यसुतः प्रिये! यदा सर्वस्वदानं वै सूर्यस्याऽऽराधनं यदा ॥ १० ॥

भा० टी० - हे प्रिये! उसकी एक दुष्ट कन्या पैदा होकर फिर पुत्रादि नहीं हुए अब उसकी शांति को कहता हूँ । इसके लिए सूर्य का आराधन तथा सर्वस्व का दान करें ॥ १० ॥

हरिवंशश्रुतेश्चैव दुर्गास्तोत्रजपस्तथा ।

गायत्रीमूलमन्त्रेण लक्षजाप्यं यदा भवेत्॥ ११ ॥

भा० टी०-० - जब हरिवंश का श्रवण, दुर्गा स्तोत्र का जप तथा गायत्री का एक लाख तक जप किया जाता है ॥ ११ ॥

पृष्ठ 236

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२२८ कर्मविपाकसंहिता तदा पुत्रो भवेद्देवि व्याधिनाशो भवेद्ध्रुवम्॥ १२ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे अनुराधानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम अष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥

भा० टी ० — तब इन कर्मों को करने से कर्त्ता को पुत्र की प्राप्ति होती और निश्चय ही व्याधि का नाश होता है ॥ १२ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे अनुराधान० प्रथमच० प्रायश्चित्तकथनं नामाष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥

पृष्ठ 237

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॥६ ९ ॥ अनुराधानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

मगधे वै शुभे देशे काष्ठकारोऽवसत् प्रिये!।

पुत्रपौत्रसमायुक्तो धनाढ्यो गुणवानपि ॥ १ ॥

भा० टी० – शिवजी कहते हैं - हे प्रिये! मगध देश में एक काष्ठकार पुत्र, पौत्रादि से युक्त, धनाढ्य बहुगुणवान् वास करता था ॥ १ ॥

यदा चार्द्धं वयो यातं दरिद्रत्वं तदाऽगमत् ।

गृहीतं यतिनो द्रव्यं शतपञ्चपलं तथा ॥ २ ॥

भा० टी ० – उसकी जब आधी आयु व्यतीत हुई, तब दारिद्र्य को प्राप्त होता गया और उसने किसी योगी से सौ पल द्रव्य ग्रहण किया ॥ २ ॥

व्ययं कृत्वा तदा तेन न दत्तं यतिने शिवे! ततस्तस्य ह्यभून्मृत्युः काष्ठकारस्य मागधे ॥ ३ ॥

भा० टी० - हे शिवे! सब द्रव्य खर्च करके उसने यति का द्रव्य वापस नहीं दिया फिर उस मगध देश में ही उस काष्ठकार की मृत्यु हो गयी ॥ ३ ॥

द्वे दत्त्वा कपिले गावौ स्वर्णरौप्यविभूषिते ।

पुत्रेणापि कृतं श्राद्धं शास्त्ररीत्या गयादिकम् ॥ ४ ॥

भा० टी० - तब उसके पुत्र शास्त्र रीति से उसका श्राद्ध कराकर सुवर्ण तथा आभूषणों से युक्त दो कपिला गायों का दान दिया और गयादि ( पिण्डदान ) कर्म करवाया ॥ ४ ॥।

यक्षलोकं तदा यातो वर्षं शतसहस्रकम् ।

पुनः पुण्यक्षये जाते कपियोनिं ततोऽलभत्॥ ५ ॥

भा० टी० – तब वह काष्ठकार यक्ष के लोक में प्राप्त हुआ सौ हजार वर्षों तक वहाँ वास करके फिर पुण्य क्षीण होने पर वह वानर की योनि को प्राप्त हो गया ॥ ५ ॥

पृष्ठ 238

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२३० कर्मविपाकसंहिता

ऋक्षस्यैव पुनर्योनिं मानुषत्वं ततोऽगमत् ।

धनधान्यसमायुक्तो गुणज्ञोप्यतिसुन्दरः ॥ ६ ॥

भा० टी० - फिर उसने रीछ की योनि को प्राप्त कर बाद में मनुष्य शरीर को प्राप्त किया वह धनधान्य से युक्त गुणों को जानने वाला, अति सुंदर रूप वाला है ॥ ६ ॥

पूर्वजन्मनि भो देवि काष्ठच्छेदः कृतः सदा ।

तेन पापेन भो देवि शरीरे महती व्यथा ॥ ७ ॥

भा० टी० — हे देवि! पूर्व जन्म में उसने काष्ठच्छेदन किया, उस पाप से हे देवि! उसके शरीर में बड़ी व्यथा होती है ॥ ७ ॥

यतिद्रव्यं गृहीतं च न दत्तं यतिने यतः ।

तेन यातः सुतो देवि ऋणसम्बन्धकारणात् ॥ ८ ॥

भा० टी० - हे देवि! यति का द्रव्य ग्रहण करके फिर यति को वापस नहीं देनें के कारण तथा ऋण - संबंध से वह यति उसका पुत्र हुआ है ॥ ८ ॥

द्यूतवेश्यारतो नित्यं पितृमात्रोर्विरोधकृत् ।

युवरूपो यदा यातस्तदा मृत्युर्भवेद्ध्रुवम्॥ ९ ॥

भा० टी० – जुआ तथा वेश्या संग, में रत, माता- पिता से विरोध करने वाला होकर जिस समय युवा हुआ उसी समय वह मृत्यु को प्राप्त हो गया ॥ ९ ॥

पुनः पुत्रस्य संदेहः काकवन्ध्यत्वमाप्नुयात् ।

पत्नी तस्य वरारोहे मृतवत्सा पुनः पुनः ॥ १० ॥

भा० टी० — फिर हे वरारोहे! पुत्र के कारण मानसिक रोगी होकर उसकी स्त्री काकवन्ध्यापन को प्राप्त हो गयी और बार- बार मृतवत्सा बनकर दुःख उठा रही है अर्थात् उसके पुत्र मर जाते हैं ॥ १० ॥

अस्य शान्तिमहं वक्ष्ये शृणु देवि प्रयत्नतः ।

गृहवित्ताष्टमं भागं पुण्यकार्यं च कारयेत्॥ ११ ॥

भा० टी ० — हे देवि! अब इस पाप की शांति के उपाय को कहता हूँ तुम प्रयत्नपूर्वक से श्रवण करो अपने घर के द्रव्य में से आठवें भाग को पुण्य हेतु दान करके ब्राह्मण को दें ॥ ११ ॥

सूर्यमन्त्रस्य वै जायं वैदिकस्य वरानने! ।

आकृष्णेति महामन्त्रः सर्वव्याधिविनाशनः ॥ १२ ॥

पृष्ठ 239

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कर्मविपाकसंहिता २३१ भा० टी ० – और हे वरानने! सूर्य के मंत्र का जप तथा वैदिक मंत्र का जप तथा सारी प्रकार की व्याधि का नाश करने वाला ' आकृष्णेति ' मंत्र का जप करें ॥ १२ ॥

सर्वकामप्रदो देवि मोक्षदो मुक्तिकारणम् ।

सूर्यदेवस्य यो भक्तिं कुरुते नियतो नरः ॥ १३ ॥

भा० टी० — हे देवि! मोक्ष को देने वाले सभी कामनाओं को देने वाले मुक्ति के कारण रूप ऐसे मंत्र का जप करने से और प्रतिदिन सावधान होकर सूर्य देवता की भक्ति करने से सब कष्ट दूर होते हैं ॥ १३ ॥

न किञ्चिद्दुर्लभं तस्य पुत्रश्चैव धनं बहु ।

ममातीव प्रियो नित्यं सूर्य्यदेवे ह्युपासिते ॥ १४ ॥

भा० टी ० – और संसार में ऐसी वस्तु कौन- सी है, जो नहीं मिल सकती है? पुत्र, द्रव्यादि की तो क्या बात है । और महादेव कहते हैं कि जो सूर्यदेव की उपासना करते हैं वे मुझे संसार में अत्यधिक प्रिय हैं ॥ १४ ॥

मणास्तं हि रक्षन्ति यतश्च मत्कला रविः ।

कमलं सूज्ज्वलं देवि वंशपात्रं सुशोभनम्॥ १५ ॥

भा० टी० - और हे देवि! जो सूर्य का उपासना करते हैं, उनकी सदैव रक्षा ये मेरे गण करते हैं क्योंकि सूर्य में मेरी कला है । हे देवि! उज्ज्वल कमल बनवा कर उसको बाँस के सुंदर पात्र पर रखें ॥ १५ ॥

तस्योपरि सुवर्णस्य सूर्य्यं रत्नविभूषितम् ।

पलपञ्चमितं देवि मन्त्रेणानेन पूजयेत्॥ १६ ॥

भा० टी० - फिर हे देवि! उस के ऊपर पाँच पल प्रमाण वाले सुवर्ण की मूर्ति बनाकर रत्नों से भूषित कर इस मंत्र के द्वारा पूजन करें ॥ १६ ॥

ॐ नमः सूर्याय देवाय भद्राय भद्ररूपिणे ।

पूर्वजन्मकृतं सर्वं मम पापं व्यपोहतु ॥ १७ ॥

भा० टी ० –‘ॐ नमः सूर्याय देवाय भद्राय भद्ररूपिणे ' – ऐसे उच्चारण करके यह कहें ( हे कल्याण रूप सूर्य भगवान्! ) कि पूर्वजन्मकृत मेरे पापों को नष्ट करो ॥१७ ॥

प्रतिमां पात्रसंयुक्तां ब्राह्मणाय च दापयेत् ।

ततो गां कपिलां शुभ्रां सवत्सां स्वर्णभूषिताम्॥ १८ ॥

भा० टी० – और पत्र- पुष्पादियुक्त उस मूर्ति को ब्राह्मण को दान दें, फिर कपिला शुद्धा सवत्सा गौ को स्वर्ण से भूषित कर ब्राह्मण को दान कर दें ॥ १८ ॥

पृष्ठ 240

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२३२ कर्मविपाकसंहिता

ब्राह्मणाय ततो दद्यात् पट्टवस्त्रेण संयुताम् ।

सप्तमी रविसंयुक्तोपोष्टव्याङ्गनया सह ॥ १ ९ ॥

भा० टी००.- और पट्टवस्त्रादि से सुशोभित की हुई गौ को संकल्प करके रविवार युक्त सप्तमी तिथि के दिन स्त्री अपनी के साथ उपवास करके ब्राह्मण को दान करें ॥१ ९ ॥ पूर्वजन्मकृतं पापं नश्यत्येवं कृते प्रिये! रोगाः सर्वे क्षयं यान्ति पुत्रलाभो भवेद्ध्रुवम् ॥ २० ॥

भा० टी० - हे प्रिये! ऐसा करने से सभी प्रकार के रोग समाप्त होते हैं और निश्चय ही पुत्र का लाभ होता है ॥ २० ॥

काकवन्ध्या लभेत्पुत्रं मृतवत्सा च पुत्रिणी । इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे अनुराधानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६ ९ ॥ भा० टी० — काकवन्ध्या स्त्री तथा मृतवत्सा स्त्री भी पुनः पुत्र को प्राप्त कर सकती है ॥ ६ ९ ॥ इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहर० अनुराधान० द्वितीयच० प्रायश्चित्तकथनंनामैकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६ ९ ॥