कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 251–260

कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 251–260

पृष्ठ 251

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कर्मविपाकसंहिता २४३ भा० टी० — फिर हे देवि! बहुत-सा समय व्यतीत होने पर उस लोहकार की मृत्यु हो गयी और तत्पश्चात् यम की आज्ञा से ॥ ६ ॥

निक्षिप्तो नरके घोरे कृमिविष्ठादिसंयुतः ।

त्रिंशद्वर्षसहस्त्राणि भुक्त्वा नरकयातनाम् ॥ ७ ॥

भा० टी ० – यमदूतों ने उसे कृमिविष्ठादि से युक्त घोर नरक में डाला, वहाँ तीस हजार वर्ष पर्यंत नरक को भोग कर ॥ ७ ॥

नरकान्निर्गतो देव मानुषत्वं ततोऽलभत् ।

पुनः सर्पस्य योनिं च ततो नकुलतां गतः ॥ ८ ॥

भा० टी० - फिर हे देवि! नरक से निकल कर वह मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ पुनः सर्प की योनि को प्राप्त होकर नकुल की योनि को प्राप्त हुआ ॥ ८ ॥

मानुषत्वं ततो देवि धनधान्यसमाकुलः ।

शूरोऽभूत्किल विज्ञश्च ज्ञानवान् राजवल्लभः ॥ ९ ॥

भा० टी० – तत्पश्चात् हे देवि! धनधान्य से युक्त होकर मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ, वह शूरवीर और सब विषयों को जानने वाला ज्ञानवान् और राजा का प्यारा हुआ ॥ ९ ॥

पुरैव यत्कृतं सर्वं तत्प्राप्नोति न संशयः ।

पुरैव कार्तिके मासि पौर्णमास्यां सदा शिवे! ॥ १० ॥

भा० टी० — हे शिवे! पूर्वजन्म में जो किया वह सब फल के रूप में इस जन्म में उसे प्राप्त हुआ । कार्तिक के महीने में पूर्णिमा को जो उसने किया उसके फल को प्राप्त हुआ ॥ १० ॥

धेनुः प्रदत्ता युवती विधिवन्मम वल्लभे! तेन दानफलेनेह धनाढ्यत्वं प्रलब्धवान्॥ ११ ॥

भा० टी० - हे मम वल्लभे! पूर्वजन्म में जो उसने युवा का दान दिया, उसके फल से धनाढ्य जीवन को प्राप्त हुआ ॥ ११ ॥

स्वभार्या च परित्यज्य परकीयारतः स वै ।

अतः पुत्रस्य वै मृत्युः पुनः पुत्रो न जायते ॥ १२ ॥

भा० टी० - और अपनी भार्या का त्यागकर पर भार्या का गमन करने के कारण इसकी पुत्र संतान की मृत्यु होने के बाद फिर पुत्र नहीं हुआ ॥ १२ ॥

पृष्ठ 252

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२४४ कर्मविपाकसंहिता

कन्यकाजनयित्री च तस्य भार्याभवत्खलु ।

पुत्रस्त्रियोश्च कृतवान् त्यागं परकलत्रवान्॥ १३ ॥

भा० टी० – और उसकी स्त्री कन्या को जन्म देने वाली होती गई और पुत्र सहित भार्या का त्याग कर अन्य स्त्री का ग्रहण करने के कारण ॥ १३ ॥

तत्पापेन महादेवि रोगग्रस्तकलेवरः ।

व्याधयश्च समुत्पन्ना दद्रुपामादयस्तदा ॥ १४ ॥

भा० टी० - हे महादेवि! उसका रोगग्रस्त शरीर होता गया और उसके शरीर में दद्रुपामादि रोग उत्पन्न हो गये हैं ।॥ १४ ॥

ख्यातवंशे समुत्पन्नो भूमिभागो न लभ्यते ।

अथ शान्तिं प्रवक्ष्यामि पूर्वपापविशुद्धये ॥ १५ ॥

भा० टी००. - वह ख्याति वाले वंश में पैदा होकर भी भूमि के भाग को नहीं प्राप्त कर सका अब पूर्व पाप की शुद्धि के लिये उसकी शान्ति को कहता हूँ, तुम ध्यान से सुनो ॥ १५ ॥

एकादशीव्रतं नित्यं षडंशं दानमाचरेत् ।

षडङ्गं पाठयेन्नित्यं रुद्रपूजनपूर्वकम् ॥ १६ ॥

भा० टी० – नित्य एकादशी का व्रत करें अपने घर के द्रव्य में से छठे भाग का दान करें षडंग पाठ करायें, रुद्र का पूजन करें – ये सब नियमपूर्वक करें ॥ १६ ॥

हरिवंशश्रुतिं कुर्याच्चण्डीपाठं निरन्तरम् ।

तिलधेनुप्रदानं वै ह्यमाश्राद्धं विशेषतः ॥ १७ ॥

भा० टी० - तथा हरिवंश का श्रवण, चंडी पाठ, निरंतर तिल धेनु का दान, अमावास्या को श्राद्ध –ये भी विशेषता से करने योग्य हैं ॥ १७ ॥

एवं कृते महादेवि पुत्रस्तस्य भविष्यति ।

वन्ध्यत्वं प्रशमं याति सर्वरोगक्षयो भवेत् ॥ १८ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे ज्येष्ठानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामत्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ॥

भा० टी० - हे महादेवि! ऐसा करने से उसका पुत्र होगा और वंध्यापन तथा सभी रोग दूर होंगे ॥ १८ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वती० ज्येष्ठानक्ष० द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ॥

पृष्ठ 253

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1198 11 ज्येष्ठानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

वीजापुरमिति ख्यातं पुरं देवि मनोहरम् ।

न्यवसन् बहवो वर्णा ब्राह्मणाश्च वणिग्जनाः ॥ १ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! वीजापुर नाम वाले एक प्रसिद्ध और सुंदर नगर में बहुत से जन वास करते थे वहाँ ब्राह्मण और बनिये रहते थे ॥१ ॥

तन्मध्ये शूद्र को हि ताम्बूलं च करोति सः ।

सुरापी च स वै नित्यं ताम्बूलविक्रयी शिवे ॥ २ ॥

भा० टी० - और हे शिवे! उनके मध्य में एक शूद्र दारू का पान करने वाला और तांबूलार्थ पानों को बेचा करता था ॥ २ ॥

तस्य पुत्रद्वयं जातं धनं च बहु संचितम् ।

ततस्तु दैवयोगेन महाधनमदेन च ॥ ३ ॥

भा ० टी० — हे वरानने! उसके दो पुत्र हुए उसने बहुत धन संचय किया और वह महाधन से युक्त हुआ ॥ ३ ॥

ज्येष्ठपुत्रस्य हननं कृतं तेन वरानने! स्वभार्यार्थे तदा नीता पत्नीं तस्य तु तेन हि ॥४ ॥

भा० टी० – अपने - अपने बड़े पुत्र का हनन किया, उस पुत्र की स्त्री को अपनी भार्या बनाने के लिये अपने घर में लाया ॥४ ॥

पुत्राभ्यां चाभवद्वैरं पल्या सह विशेषतः ।

प्रत्यहं भजते सोऽपि पुत्रपत्नीं तथाऽधमः ॥ ५ ॥

भा ० टी० - और उस शूद्र के पुत्रों के साथ तथा उसकी स्त्री के साथ उसका

विशेष वैर होता गया । वह अधम पुत्र की पत्नी को भोगता गया ॥५ ॥

पृष्ठ 254

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२४६ कर्मविपाकसंहिता एवं बहुदिने जाते तस्य मृत्युरभूच्छिवे! ततो वै नरके घोरे यमदूतैर्यमाज्ञया ॥ ६ ॥

भा० टी ० — हे शिवे! ऐसे बहुत- से दिन व्यतीत होने पर उसकी मृत्यु हुई फिर यम की आज्ञा पाकर उसे यमराज के दूतों ने घोर नरक में डाला ॥६ ॥

निक्षिप्तो वै ततो देवि षष्टिवर्षसहस्त्रकम् ।

कृमिभिर्घोरवक्रैश्च भुक्त्वा नरकयातनाम्॥ ७ ॥

भा० टी० - फिर हे देवि! साठ हजार वर्षों तक नरक में रहकर उसने विकराल कीड़ों के द्वारा दिये जाने वाले दुःखों को भोगा ॥ ७ ॥

नरकान्निर्गतो देव शुनो योनिं ततोऽलभत् ।

ततो वृषभयोनिं च मानुषत्वं ततो गतः ॥ ८ ॥

भा० टी० – वहाँ से निकल कर श्वान योनि को प्राप्त हुआ, फिर बैल की योनि को प्राप्त होकर मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ ॥ ८ ॥

पूर्वजन्मनि भो देवि दशवर्णा ददौ बहु ।

तत्फलेनेह भो देवि धनधान्ययुतस्तदा ॥ ९ ॥

भा० टी० - हे देवि! पहले जन्म में उसने दश वर्णों वाली गौवों का दान दिया था, उस फल से वह धनधान्य से युक्त है॥९॥

पुत्रपल्यां च भोगार्थे पुत्रस्यैव वधः कृतः ।

तत्पापफलतो देवि ह्यपुत्रश्च ज्वरी तथा ॥ १० ॥

भा० टी० - पुत्र की पत्नी से मैथुन के लिए पुत्र का वध करने से उस पाप के फल के कारण इसके पुत्र नहीं हैं और शरीर में ज्वर हो गया है ॥ १० ॥

व्याधिश्च बहुधा तस्य चाङ्गे च महती तथा ।

महाचिन्तां समापन्नो ह्यतः शान्तिं शृणु प्रिये! ॥११ ॥

भा० टी० — हे प्रिये! उसको बहुत सी व्याधियाँ तथा अंग में पीड़ा होकर वह महाचिंता से युक्त होता गया अब उसकी शांति को कहता हूँ तुम सुनो ॥ ११ ॥

स्ववित्तस्य तृतीयांशं प्रगृह्य हरवल्लभे! कूपं च खनयेत्कान्ते तडागं जीर्णमुद्धरेत् ॥ १२ ॥

भा० टी० - हे कांते! हे हरवल्लभे! अपने घर के द्रव्य में से तीसरा भाग लेकर कूप बनवायें और पुराने तलाब का जीर्णोद्धार करें ॥ १२ ॥

पृष्ठ 255

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कर्मविपाकसंहिता २४७

पौर्णमासीव्रतं देवि सकलत्रः समाचरेत् ।

शिवस्य पूजनं लक्षं ब्राह्मणेभ्यश्च कारयेत् ॥ १३ ॥

भा० टी० - हे देवि! पौर्णिमा के व्रत को स्त्री सहित करें और एक लाख बार ब्राह्मणों से शिवजी का पूजन करायें ॥ १३ ॥

कृष्णां च गां च वृषभं ब्राह्मणाय प्रदापयेत् ।

गायत्रीमूलमन्त्रेण तथा लक्षप्रमाणतः ॥ १४ ॥

भा० टी० - कृष्णा गौ तथा बैल का दान करें और एक लाख बार गायत्री के मूल मंत्र का जप करवायें ॥ १४ ॥

जपं वै कारयेत्तत्र हवनं तद्दशांशतः ।

मार्जनं तर्पणं देवि दशांशं स च कारयेत्॥ १५ ॥

भा० टी० - हे देवि! उसके दशांश का हवन तथा मार्जन तथा दशांश तर्पण करवायें ॥ १५ ॥

पुत्रस्य प्रतिमां तद्वत्स्वर्णवस्त्रसमन्विताम् ।

पलपञ्चदशस्यैव निर्मितां रत्नभूषिताम्॥ १६ ॥

भा० टी० – पुत्र की सुवर्ण की एक मूर्ति बनवायें, उसको पंदरह पल प्रमाण सुवर्ण की बनवा कर वस्त्र तथा पंचरत्न से युक्त कर ब्राह्मण को दान कर दें ॥ १६ ॥

पूजां कृत्वा विधानेन ब्राह्मणाय प्रदापयेत् ।

एवं कृते न संदेहः शीघ्रं पुत्रमवाप्नुयात्॥ १७ ॥

भा० टी० — इसप्रकार विधि- विधान से पूजा कर ब्राह्मण को दान दें, इससे शीघ्र ही पुत्र की प्राप्ति हो, इसमें संशय नहीं ॥ १७ ॥

व्याधिश्च प्रशमं यायात् काकवन्ध्या लभेत्सुतम् ।

मृतवत्सा लभेत्पुत्रं चिरञ्जीविनमुत्तमम्॥ १८ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे ज्येष्ठानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥

भा० टी ० — इससे व्याधियाँ सारी दूर हों काकवन्ध्या भी पुत्र को प्राप्त होती है और मृतवत्सा भी उत्तम और बहुत काल तक जीने वाले पुत्र को प्राप्त होती है ॥ १८ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां ज्येष्ठानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥

पृष्ठ 256

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॥ ७५ ॥

ज्येष्ठानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥ चतुर्भुजाभिधे क्षेत्रे वेणीपश्चिमतः शिवे! पट्टकारोऽवसद्देवि लक्ष्मणेति च संज्ञकः ॥ १ ॥

भा० टी ० – शिवजी कहते हैं - हे शिवे! वेणी नदी से पश्चिम की तरफ चुतुर्भुज नामक क्षेत्र में एक पट्ट वस्त्र बनाने वाला लक्ष्मण नामक व्यक्ति निवास करता था ॥१ ॥

तस्य पत्नी विशालाक्षि परपुंसि रता सदा ।

पुत्राश्च बहवो जाता धनं च बहु संचितम् ॥ २ ॥

भा० टी० — हे विशालाक्षि! उसकी स्त्री सर्वदा पर- पुरुषों से रमण किया करती थी और उसके बहुत से पुत्र होते गये, उसने बहुत सा धन भी संचित किया ॥ २ ॥

क्रयविक्रयधर्मेण व्ययकारी दिने दिने ।

तस्य गेहेऽकरोद्वासं चटका नाम पक्षिणी ॥ ३ ॥

भा० टी० - इसनप्रकार क्रय -विक्रय का व्यापार करने से प्रतिदिन खर्च करता गया और उसके घर में एक चिड़िया वास करती ॥ 3 ॥

एकदा समये देवि चाण्डान्साऽसूत तत्र वै ।

बहून्वै पोषितांश्चाण्डान्सपक्षान्कृतवांस्तथा ॥ ४ ॥

भा० टी० — एक समय उस चिड़िया ने वहाँ बहुत से अंडों को पैदा किया, उन में से बहुत से अंडों को पालती गई और वे पंखों वाले होते गये ॥ ४ ॥

फलं गृह्य सदा पक्षी मध्याह्ने बालकान्प्रति ।

भोजनं प्रददौ नित्यं स्वकुलाय तदा शिवे! ॥ ५ ॥

भा० टी ० — हे शिवे! वह चिड़िया यहाँ से वहाँ उड़ती हुई फल को ग्रहण कर उन पक्षी - बालकों को मध्याह्न समय में अपने कुल को बढ़ाने के लिए नित्य भोजन देती थी ॥ ५ ॥

पृष्ठ 257

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कर्मविपाकसंहिता २४९

ततस्तु दैवयोगेन पट्टकारस्तु तद्गृहे ।

भोजनार्थं गतो देव पत्नी चाऽन्नं तदाप्यदात्॥ ६ ॥

भा० टी० — हे देवि! वहाँ दैवयोग से पट्ट वस्त्र बनाने वाला अपने घर में भोजन के लिए आया और उसकी भार्या उसके लिए अन्न लायी ॥ ६ ॥

भुक्तं च विविधं चान्नं तत्क्षणे पक्षिबालकाः ।

विष्ठां चक्रुस्तथा दृष्ट्वा पट्टकारो रुषा खलु ॥ ७ ॥

भा० टी० - तब पट्टकार ने अनेक प्रकार के भोजन किये । उसी समय वे पक्षी उस पर वीट करने लगे, तब पट्टकार विष्ठा -कर्म को देख कर क्रोध से युक्त हुआ ॥ ७ ॥

कुलं तस्याकरोन्नष्टं बालानां हननेन सः ।

एवं बहुगते काले पट्टकारस्य सुव्रते! ॥ ८ ॥

भा० टी० - हे सुव्रते! उसने उन पक्षियों के सब बालकों को नष्ट कर दिया, फिर बहुत सा समय व्यतीत होने पर पट्टकार ॥ ८ ॥

गङ्गायां मरणं जातं भार्यया सहितस्य वै ।

स्वर्गवासोऽभवद्देवि पट्टकारस्य सुव्रते!॥ ९ ॥

भा० टी० – उसका भार्य्या सहित गंगाजी में मरण हो गया, तब हे देवि! हे सुव्रते! उसको स्वर्ग का वास मिला ॥ ९ ॥

सप्ततिर्वै सहस्त्राणि स्वयं भुक्त्वा फलं बहु ।

पुनः पुण्यक्षये जाते स्वर्गभ्रष्टो यदाभवत् ॥ १० ॥

भा० टी ० — सत्तर हजार वर्षों तक स्वर्ग के सुखों को भोग कर पुण्य क्षीण होने पर स्वर्ग से भ्रष्ट अर्थात् पतित हो गया ॥ १० ॥

मनुष्यश्चाऽभवद्देवि गङ्गागण्डकिमध्ययोः ।

धनधान्यसमायुक्तो विवाहमकरोद्यदा ॥ ११ ॥

भा० टी० — हे देवि! तदनन्तर गंगा और गंडकी के मध्य में धनधान्य से युक्त मनुष्य यानि में उसका जन्म हुआ और जब उसने विवाह किया तो ॥ ११ ॥

पूर्वजन्मस्थिता भार्या सा तस्य गृहमेधिनी ।

प्रेष्ययुक्ताऽभवत्सा तु गर्भस्य पतनं मुहुः ॥ १२ ॥

भा० टी ० – तब पूर्व जन्म में जो उसकी स्त्री थी, वही उसकी भार्या हो गयी तब वह उसकी स्त्री गर्भ से युक्त होकर भी उसके गर्भ का पतन होता है ॥ १२ ॥

पृष्ठ 258

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२५० कर्मविपाकसंहिता

कन्यका नैव जायन्ते पुत्रस्यैव तु का कथा ।

ज्वरयुक्ता सदा नारी स्वशरीरेऽभवत्खलु ॥ १३ ॥

भा० टी० — उसकी कन्या भी पैदा नहीं होती पुत्र की तो क्या बात है और उसका शरीर ज्वर से युक्त रहता है ॥ १३ ॥

सुखं न लभते क्वापि दुःखं याति दिने दिने ।

अस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु सर्वं वरानने! ॥ १४ ॥

भा० टी० – और हे वरानने! कहीं भी उन को सुख की प्राप्ति नहीं होती है और प्रतिदिन दु: खी होते रहते हैं अब इसकी शांति को कहता हूँ तुम सुनो ॥ १४ ॥

चन्द्रार्कयोर्मन्त्रजपं गायत्रीजपमाचरेत् ।

लक्षमेकं वरारोहे पूर्वपापविशुद्धये ॥ १५ ॥

भा० टी० - चंद्रमा और सूर्य का जप तथा एक लाख गायत्री का जप, पूर्वपाप की शुद्धि के लिये इसप्रकार करते रहें ॥ १५ ॥

गृहवित्ताष्टमं भागं पुण्यकार्यं च कारयेत् ।

कपिलां गां सवत्सां च ब्राह्मणाय प्रदापयेत् ॥ १६ ॥

भा० टी० – अपने घर के द्रव्य में से आठवें भाग को पुण्य हेतु दान करें और बछड़ा से युक्त कपिला गौ ब्राह्मण को दान करें ॥ १६ ॥

दशवर्णास्ततो दद्याद्ब्राह्मणान्भोजयेत्ततः ।

चटकस्याकृतिं कृत्वा सार्भकस्य वरानने! ॥ १७ ॥

भा० टी० - हे वरानने । दश वर्णों वाली गायों का दान देकर ब्राह्मणों को भोजन करायें और बच्चों सहित चिड़िया की आकृति बनायें ॥ १७ ॥

रौप्यस्य ताम्रस्वर्णस्य पञ्चविंशपलस्य तु ।

ब्राह्मणाय ततो दद्याद्भूमिदानं विशेषतः ॥ १८ ॥

भा० टी० – रूपा, तांबा, स्वर्ण-इनकी पच्चीस पल प्रमाण की मूर्ति बनाकर ( संकल्प कर ) ब्राह्मण को दें और विशेषकर भूमि का दान दें ॥ १८ ॥

हरिवंशश्रुतिं कुर्याद्भार्यया सहितस्तु वै ।

हवनं तर्पणं कुर्यान्मार्जनं तु ततः परम्॥ १ ९ ॥

भा० टी० - भार्या सहित हरिवंश का श्रवण करें और तत्पश्चात् हवन, तर्पण, मार्जन इत्यादि करायें ॥ १८ ॥

पृष्ठ 259

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कर्मविपाकसंहिता २५१

जातवेदेति मन्त्रेण दशायुतजपं तथा ।

गोपालमन्त्रजपनात्पुत्रलाभो भवेदनु ॥ २० ॥

भा० टी० - और ' जातवेद० ' मंत्र का दश हजार तक जप तथा गोपाल मंत्र का जप कराने से निश्चित रूप से पुत्र की प्राप्ति होती है ॥ २० ॥

रोगनाशो भवेद्देवि काकवन्ध्या लभेत्सुतम् । इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे ज्येष्ठानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥

भा० टी० - हे देवि! रोग का नाश होकर काकवंध्या भी पुत्र को प्राप्त करती है । इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे ज्येष्ठानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥

पृष्ठ 260

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॥७६ ॥

मूलनक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

अयोध्यानगरे देवि कायस्थोऽवसदद्रिजे! ।

रामदास इति ख्यातस्तस्य भार्या तु देविका ॥ १ ॥

भा० टी० -शिवजी कहते हैं-हे देवि! हे पार्वति!! अयोध्या नगर में एक कायस्थ वास करता था और वह रामदास नाम से विख्यात था, देविका नाम वाली उसकी पत्नी थी ॥ १ ॥

विष्णुभक्तिरतो नित्यं ब्राह्मणस्य च सेवकः ।

भार्या पतिव्रता तस्य पतिसेवासु तत्परा ॥ २ ॥

भा० टी ० — नित्य विष्णु की भक्ति में रत रहता था और वह ब्राह्मणों का सम्मान करता था उसकी भार्या पतिव्रता थी, वह भी पति की सेवा में तत्पर रहती थी ॥ २ ॥

भाग्यवान् सर्ववस्तूनां विक्रेता गजवाजिनाम् ।

तस्य सखाऽभवद्विप्रो ब्राह्मणो वेदपारगः ॥ ३ ॥

भा० टी००.- वह भाग्यवान् था, विभिन्न वस्तुओं को तथा हाथी, घोड़ों को बेचने वाला था उसका मित्र एक विप्र वेद पाठी ब्राह्मण बन गया ॥ ३ ॥

आगतो वै गृहे तस्य प्रेम्णा मित्रस्य भामिनि! चातुर्मास्ये स्थितस्तत्र स्वर्णं शतपलं तदा ॥४ ॥

भा० टी० — हे भामिनि! वह विप्र चातुर्मास्य में प्रेम युक्त होकर उस कायस्थ के घर में आकर रहने लगा और सौ पल सुवर्ण, अर्थात् चार सौ तोले सुवर्ण उसके पास था ॥ ४ ॥

कायस्थस्य गृहे तत्तु स्थापितं ब्राह्मणेन वै ।

वाराणस्यां गतो देवि स्नानार्थं स द्विजोत्तमः ॥ ५ ॥

भा० टी० - वह ब्राह्मण अपना सारा धन कायस्थ के घर में स्थापित करने के पश्चात् हे देवि! काशीजी में स्नान करने के लिए चला गया ॥५ ॥