कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 241–250

कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 241–250

पृष्ठ 241

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1190 11 अनुराधानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥ सुकर्मनगरं ख्यातं सौराष्ट्रविषये शुभे! तत्रातिष्ठत्खलो विप्रो ब्रह्मकर्मविवर्जितः ॥ १ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! सौराष्ट्रनामक शुभ देश में सुकर्म नाम वाला विख्यात पुर था, वहाँ एक खल अर्थात् दुष्ट, ब्रह्म कर्म से रहित विप्र रहता था ॥ १ ॥

विक्रेता सर्ववस्तूनां गोवाजिकरिणां तथा ।

राजमृत्युं समालोक्य ग्रामदाहस्तथा कृतः ॥ २ ॥

भा० टी० — वह सब प्रकार की वस्तुओं को बेचा करता था तथा गौ, अश्व अर्थात् घोड़ा, हस्ती ( हाथी ) आदि को भी बेचा करता था, उसने राजा की मृत्यु को देख कर ग्राम का दाह कर दिया ॥ २ ॥

ब्राह्मणाः बहवस्तत्र ब्राह्मण्यश्च तथा शिवे! मृता ग्रामस्य वै दाहे बह्वो गावो मृताः खलु ॥ ३ ॥

भा० टी ० — हे शिवे! वहाँ बहुत से ब्राह्मण और ब्राह्मणियाँ उस ग्राम में दाह होने से मर गये और बहुत सी गायें भी मर गयीं ॥ ३ ॥

ततो बहुतिथे काले मृतः सोऽपि द्विजाधमः ।

ततस्तु यमदूतेन नरके घोरकर्दमे ॥ ४ ॥

भा० टी० - फिर बहुत सा काल व्यतीत होने पर उस अधम ब्राह्मण की भी मृत्यु हुई, फिर उसे यमराज के दूतों ने घोर कर्द्दम नाम नरक में डाला ॥ ४ ॥

यमाज्ञया च निक्षिप्तः कष्टं भुक्तं मुहुर्मुहुः ।

नरकान्निर्गतो देवि गजयोनिं ततोऽलभत् ॥ ५ ॥

भा० टी० - यम की आज्ञा पाकर यम के दूतों द्वारा उसे नरक में डाल दिया गया, वहाँ बार - बार कष्टों को भोग नरक से निकलकर हस्ती की योनि को प्राप्त हुआ ॥५ ॥

पृष्ठ 242

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२३४ कर्मविपाकसंहिता

कच्छपत्वं ततो यातः काकयोनिस्ततोऽभवत् ।

मानुषत्वं ततो यातः कुले महति शोभने ॥ ६ ॥

भा० टी० — हे शोभने! फिर कछुए की योनि को प्राप्त हुए, वहाँ से फिर काक ( कौए ) की योनि को प्राप्त हुआ, फिर उत्तम कुल में मनुष्य योनि को प्राप्त हो गया ॥६ ॥

सर्वसंपत्तिसंयुक्तो वंशस्तस्य न जायते ।

बहुकन्यासमायुक्तो रोगयुक्तो भवेन्नरः ॥ ७ ॥

भा० टी० — और सब संपत्ति से युक्त होकर भी, वह वंश से हीन हो गया और बहुत सी कन्याएँ हो गयीं तथा रोग से युक्त हो गया ॥७ ॥

भार्या तस्य ज्वरग्रस्ता मासे वर्षे भवेज्ज्वरः ।

अतः शान्तिं प्रवक्ष्यामि यतः खलु सुखी भवेत् ॥ ८ ॥

भा० टी० — और उसकी भार्या ज्वर से पीड़ित प्रति महीने और वर्ष में ज्वर की पीड़ा को प्राप्त होती है, अब इस पाप की शांति को कहता हूँ जिससे निश्चय ही सुख की प्राप्ति होती है ॥ ८ ॥

चतुर्भागं गृहद्रव्यं ब्राह्मणाय समर्पयेत् ।

प्रयागे मकरे मासि पल्या सह वरानने! ॥ ९ ॥

भा० टी० - हे वरानने! अपने घर के द्रव्य में से चौथा भाग ब्राह्मण को दान करें और माघ के महीने में प्रयाग में स्त्रीसहित स्नान करें ॥ ९ ॥

स्नानं तु नियतः कुर्यात्सप्ताहं च ततः शिवे! हेमदानं ततः कुर्य्याद्भूमिदानं च पार्वति! ॥ १० ॥

भा० टी० - हे शिवे! हे पार्वति! सात दिन तक नियम से वहाँ स्नान कर सुवर्ण तथा भूमि का दान करें ॥ १० ॥

गायत्रीजातवेदाभ्यां त्र्यम्बकेन तदा जपम् ।

दशायुतप्रमाणेन हवनं मार्जनं तथा ॥ ११ ॥

भा० टी० – गायत्री, जातवेद और त्र्यम्बकं० - इन मंत्रों का एक लाख तक जप करायें तथा उससे दशांश हवन तथा दशांश तर्पण और मार्जन करायें ॥ ११ ॥

ब्राह्मणान् भोजयेद्भक्त्या पक्वान्नैः पायसेन च ।

विप्रेभ्यो दक्षिणां दद्याद्वस्त्ररत्नविभूषिताम् ॥ १२ ॥

भा० टी० – भक्ति पूर्वक ब्राह्मणों को खीर पक्वान्न आदि भोजन करायें रत्न, आभूषण, वस्त्रादि दक्षिणा दान करें ॥ १२ ॥

पृष्ठ 243

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कर्मविपाकसंहिता २३५

दशवर्णां ततो दद्याद्धरिवंशश्रुतिस्तथा ।

एवं कृते वरारोहे शीघ्रं पुत्रमवाप्नुयात् ॥ १३ ॥

भा० टी० - हे वरारोहे! दश वर्णों वाली गायों का दान, हरिवंश का श्रवण इत्यादि करने से जल्दी ही पुत्र की प्राप्ति होती है ॥ १३ ॥

काकवन्ध्या लभेत्पुत्रं पुनर्देवि न संशयः ।

रोगाः सर्वे क्षयं यान्ति मृतवत्सा लभेत् सुतम्॥ १४ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे अनुराधानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥

भा० टी ० — हे देवि! काकवन्ध्या भी फिर पुत्र को प्राप्त करती है, इसमें संशय नहीं है और सब प्रकार केरोग क्षय होते हैं मृतवत्सा भी पुत्र को प्राप्त करती है ॥ १४ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहर० अनुराधान० तृतीयच० प्रायश्चित्तकथनं नाम सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥

पृष्ठ 244

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॥७१ ॥

अनुराधानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

बन्दीजनोऽवसच्चैकः सौराष्ट्रविषये शुभे ।

स कविर्भाग्यवान्देवि स्वधर्मनिरतः सदा ॥ १ ॥

भा० टी० – शिवजी कहते हैं - हे देवि! शुभ सौभाग्य से युक्त सौराष्ट्र देश में एक बंदीजन भाग्यवान् कवि था अपने धर्म में सदा रत रहता हुआ वहाँ निवास करता था ॥ १ ॥

तस्य स्त्री सुन्दरी देवि पतिसेवासु तत्परा ।

एकस्मिन् दिवसे देवि ब्रह्मचारी समागतः ॥ २ ॥

भा० टी० - हे देवि! उसकी स्त्री सुंदरी, पति-सेवा में परायण रहने वाली भी एक दिन वहाँ एक ब्रह्मचारी आ गया ॥ २ ॥

आतिथ्यकरणे तस्य चासमर्थस्तदा शिवे! उपोषणं कृतं तेन द्वारे बन्दिजनस्य च ॥ ३ ॥

भा० टी० - हे शिवे! तब उस ब्रह्मचारी के आतिथ्य सत्कार करने में असमर्थ होने पर फिर उस ब्रह्मचारी ने उस बंदीजन के घर पर व्रत किया ॥३ ॥

प्रभाते स वरारोहे शापं दत्त्वा गतस्तु वै ।

ततस्तु दैवयोगेन मार्जारी तत्र सूतिका ॥ ४ ॥

भा० टी० - हे वरारोहे! वहाँ से प्रातः काल उठकर ब्रह्मचारी ने उन को शाप देकर गमन किया और वहाँ एक मार्जारी अर्थात् बिल्ली के बच्चे हो रहे थे ॥४ ॥

पञ्च पुत्रा वरारोहे घातितास्तस्य च स्त्रिया ।

मार्जारी च तदा देवि क्षुधार्ता च तदा मृता ॥ ५ ॥

भा० टी० – उस बिल्ली के पाँच बच्चे थे, हे वरारोहे! उस बंदीजन की स्त्री ने वे बिल्ली के पाँचों बच्चे मार दिये और हे देवि! वह बिल्ली भूख से पीड़ित होकर मृत्यु को प्राप्त हो गयी ॥ ५ ॥

पृष्ठ 245

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कर्मविपाकसंहिता २३७

ततो बहुतिथे काले तस्य मृत्युरभूत्पुरा ।

पत्नी पतिव्रता तस्य सती जाता च तत्क्षणात्॥ ६ ॥

भा० टी० - फिर बहुत सा-काल व्यतीत होने पर उस बंदीजन की मृत्यु हुई और उसकी स्त्री पतिव्रता होने के कारण साथ सती हो गयी ॥६ ॥

सत्यलोके वरारोहे युगमेकमुवास सः ।

पत्न्या सह वरारोहे सौख्यं हि मानसेप्सितम् ॥ ७ ॥

भा० टी० - हे वरारोहे! तब उन्होंने एक युग पर्यंत सत्य लोक का वास किया और पत्नी के साथ वहाँ मनोवांछित सुखों को भोगा ॥ ७ ॥

भुक्तं देवाङ्गनासार्द्धं पुनः पुण्यक्षये सति ।

मानुषत्वं ततो लेभे सह पत्न्या वरानने! ॥ ८ ॥

भा० टी० — और हे वरानने! देवांगनाओं के साथ सुख को भोगकर फिर पुण्य क्षीण होने पर स्त्री के सहित मनुष्य योनि को प्राप्त हो गये ॥ ८ ॥

धनधान्यसमायुक्तो वरा भार्या विवाहिता ।

पुत्राश्च बहवो जातास्तेषां मृत्युरभूत्किल ॥ ९ ॥

भा० टी० - और धनधान्य से युक्त होकर श्रेष्ठा भार्या उससे विवाही गयी और उसके बहुत से पुत्र हुए उनकी निश्चय ही मृत्यु हो गयी ॥ ९ ॥

सा ज्वरण समाविग्ग्रा मध्ये तापयता पुनः ।

तस्य पापस्य वै शान्तिं शृणु त्वं गिरिजे वरे! ॥ १० ॥

भा० टी० - हे गिरिजे! हे वरे!! उसकी स्त्री ज्वर से पीडित होती गई और मध्य -मध्य में ताप से युक्त होती रहती है अब उस पाप की शांति को कहता हूँ तुम सुनो ॥ १० ॥

जातवेदस्य मन्त्रेण लक्षजाप्यं च कारयेत् ।

बिडालीप्रतिमां कृत्वा पञ्चबालेन संयुताम्॥ ११ ॥

भा० टी ० – ‘ जात वेदसे ' - मंत्र का एक लाख तक जप और पांच पुत्रों सहित बिल्ली की मूर्ति बनवायें ॥ ११ ॥

स्वर्णस्याथ च रौप्यस्य पलपञ्चदशस्यतु ।

सवस्त्रां वै तदा दद्याद्ब्राह्मणाय वरानने! ॥ १२ ॥

भा० टी० - हे देवि! सुवर्ण तथा चांदी की १५ पल प्रमाण की वस्त्रादि से युक्त करवाकर के ब्राह्मण को दान कर दें ॥ १२ ॥

पृष्ठ 246

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२३८ कर्मविपाकसंहिता

गामेकां रक्तवर्णां च तां विप्राय प्रदापयेत् ।

अमायां पिण्डदानं च सोमवारे तथा गुरौ ॥ १३ ॥

भा० टी० - और एक लाल वर्ण वाली गौ ब्राह्मण को दान कर दें तथा सोमवार अथवा गुरुवार से युक्त आमावास्या के दिन पिंडदान दें ॥ १३ ॥

व्रतं च रविसप्तम्यां कुर्य्याद्वै भार्यया सह ।

ततः पुत्रो भवेद्देवि चिरञ्जीवी तथोत्तमः ॥ १४ ॥

भा० टी० - और हे देवि! आदित्यवासरीय सप्तमी का व्रत करें । ऐसा करने से बहुत काल तक जीने वाला उत्तम पुत्र पैदा होता है ॥ १४ ॥

व्याधिनाशो भवेद्देवि वन्ध्यात्वं च प्रशाम्यति । इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे अनुराधानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७१ ॥

भा० टी० - हे देवि! इसप्रकार व्याधि का नाश और वन्ध्यापन की शांति होती है । इति श्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वती० अनुराधा० चतुर्थच० प्रायश्चित्तकथनं नामैकसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७१ ॥

पृष्ठ 247

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॥७२ ॥

ज्येष्ठानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

ब्राह्मणो न्यवसच्चैको महाराष्ट्रपुरे शुभे ।

स वेदपाठतत्त्वज्ञो वेदपाठं सदाऽकरोत्॥ १ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे शुभे! महाराष्ट्रपुर में एक वेदों में गूढार्थ को जानने वाला ब्राह्मण ॥ १ ॥

तडागं खानयामास तत्र द्रव्यं च लब्धवान् ।

द्रव्यस्यार्थे तदा देवि विग्रहो भ्रातरं प्रति ॥ २ ॥

भा० टी० - हे देवि! उस ब्राह्मण ने एक तालाब को खोदा, वहाँ खोदने से उसको द्रव्य की प्राप्ति हुई और द्रव्य के लिए उसके भाइयों में विग्रह अर्थात् लड़ाई होती गई ॥२ ॥

भ्रात्रा तस्य महादेवि द्रव्यार्थं भक्षितं विषम् ।

बहुकाले तदा देवि व्ययं सर्वं धनं कृतम्॥ ३ ॥

भा० टी० - हे देवि! उसके भाई ने द्रव्य के लिए विष को खाया फिर इसने बहुत से काल व्यतीत होने पर वह सब द्रव्य खर्च कर दिया ॥ ३ ॥

ततश्च पञ्चतां यातो ब्राह्मणश्च सुरेश्वरि! यमदूतैर्महाघोरैर्नरके देवि कर्दमे ॥ ४ ॥

भा० टी ० - हे सुरेश्वरि! तब वह ब्राह्मण मर गया । हे देवि! यमराज के दूतों ने उसे घोर नरक में डाल दिया ॥ ४ ॥

षष्टिवर्षसहस्त्राणि निक्षिप्तश्च यमाज्ञया ।

भुक्त्वा नरकजं दुःखं काकयोनिरभूत्पुनः ॥ ५ ॥

भा० टी ० – साठ हजार वर्षों तक उसे नरक में यम की आज्ञा पाकर यमदूतों ने डाल दिया, बाद में फिर काक योनि को प्राप्त हो गया ॥ ५ ॥

पृष्ठ 248

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२४० कर्मविपाकसंहिता

पुनर्मानुषयोनिञ्च पुत्रकन्याविवर्जितः ।

पूर्वजन्मनि भो देवि भ्रात्रंशं नैव दत्तवान्॥ ६ ॥

भा० टी० — फिर हे देवि! मनुष्य योनि को प्राप्त होकर पुत्र और कन्या से हीन हो गया क्योंकि उसने पूर्व जन्म में भाई के अंश को नहीं दिया ॥ ६ ॥

तेन पापेन भो देवि महारोगसमुद्भवः ।

अस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु त्वं गिरिजे वरे! ॥७ ॥

भा० टी० - हे देवि! हे गिरिजे!! उस पाप के महारोग से वह पीडित रही अब उस पाप की शांति को कहता हूँ, तुम सुनो ॥ ७ ॥

गृहवित्ताष्टमैर्भागैः पुण्यकार्यं च कारयेत् ।

वापीकूपतडागादिजीर्णोद्धारं प्रयत्नतः ॥ ८ ॥

भा० टी० – अपने घर के द्रव्य में से आठवें भाग को पुण्य दान करें और बावड़ी, कूप, तालाब – इनका जीर्णोद्धार करें ॥ ८ ॥

प्रतिमां कारयेद्देवि स्वर्णं पलदशस्य तु ।

भ्रातुचित्रं तदा देवि पूजयित्वा यथाविधि ॥ ९ ॥

भा० टी० — हे देवि! दश पल प्रमाण की सुवर्ण की मूर्ति बनवा कर उसकी यथाविधि पूजा करें ॥ ९ ॥

गन्धधूपादिभिर्देवि भूषणैर्विविधैरपि ।

गायत्रीलक्षजाप्येन दशांशहवनेन तु ॥ १० ॥

भा० टी० — हे देवि! गंधधूपादि तथा भूषणों से अनेक प्रकार से पूजन करके ब्राह्मण को दान दें और गायत्री का एक लाख तक जप तथा उसका दशांश हवनादि करायें ॥ १० ॥

प्रयागे मकरे स्नानं सर्वपापक्षयो भवेत् ।

ब्राह्मणाय ततो दद्याद्गां च दद्यात्पयस्विनीम् ॥ ११ ॥

भा ० टी० — और मकर में सूर्य आने पर प्रयाग का स्नान इत्यादि करने से सब पाप दूर होते हैं और ब्राह्मण को दूध वाली गौ का तथा उस मूर्ति का दान दें ॥ ११ ॥

भूमिं वृत्तिकरीं दद्यात् पुत्रपौत्रानुयायिनीम् ।

अश्वदानं ततो दद्यात् ब्राह्मणान् भोजयेत्ततः ॥ १२ ॥

भा० टी ० — तथा जीविका प्रदान करने वाली पुत्र पौत्रादि के लिए कल्याणकारी पृथ्वी ( भूमि ) का दान दें, घोड़े का दान करें और ब्राह्मणों को भोजन करायें ॥ १२ ॥

पृष्ठ 249

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कर्मविपाकसंहिता २४१

एवं कृते वरारोहे पुत्रो भवति नान्यथा ।

व्याधिस्तस्य निवर्तेत काकवन्ध्या लभेत्सुतम्॥ १३ ॥

भा० टी० — हे वरारोहे! ऐसा करने से पुत्र की संतान होती है, यह अन्यथा नहीं है और व्याधि दूर होकर काकवंध्या भी पुत्र को प्राप्त करती है ॥ १३ ॥

मृतवत्सा लभेत्पुत्रं चिरञ्जीविनमुत्तमम् । इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे ज्येष्ठानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नामद्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥

भा० टी० – और मृतवत्सा भी बहुत आयु वाले उत्तम पुत्र को प्राप्त करती है ॥ इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां भाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे० ज्येष्ठान० प्रथमच० प्रायश्चित्तकथनंनामद्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥

पृष्ठ 250

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॥७३ ॥

ज्येष्ठानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

पट्टने वै पुरे शुभ्रे लोहकारोऽवसत्पुरा ।

गोवर्धनाभिधः पत्नीयुक्तोभूत्परमेश्वरि!॥ १ ॥

भा० टी० – शिवजी कहते हैं - हे परमेश्वरि! पट्टन नाम वाले शुभ्र पुर में एक लोहकार वास करता था, और उसका नाम गोवर्धन था ॥ १ ॥

धनधान्यसमायुक्तो धर्मकर्मरतस्तथा ।

तस्य पुत्रद्वयं जातं लोहकारस्य पार्वति! ॥ २ ॥

भा० टी० - हे पार्वति! धनधान्य से युक्त, अपने धर्म- कर्म में रत तथा उसके दो पुत्र उत्पन्न हुए ॥ २ ॥

ज्येष्ठपुत्रश्च भो देवि भार्यया सह तेन वै ।

निःसारितो गृहाद्देवि दत्तं तस्मै न किञ्चन ॥ ३ ॥

भा० टी ० — और हे देवि! उसने बड़े पुत्र को स्त्री सहित घर से निकाल दिया और उसको कुछ भी नहीं दिया ॥ ३ ॥

एको गृहे स्थितः पुत्रो द्रव्यं तस्मै प्रदत्तवान् ।

लोहकारेण भो देवि स्वभार्या पुत्रसंयुता ॥ ४ ॥

भा० टी० — हे देवि! एक पुत्र जो घर में था उसको सब द्रव्य दिया फिर तत्पश्चात् हे देवि! लोहकार ने दूसरे पुत्र को और अपनी भार्य्या का भी त्याग कर दिया ॥४ ॥

त्यक्ता चैव महादेवि गोपालस्य तु कन्यका ।

भार्या कृता पुनस्तेन पल्यास्त्यागश्च वै कृतः ॥ ५ ॥

भा० टी० - हे महादेवि! अपनी भार्य्या का त्याग करके एक गोपाल की कन्या से उसने अपना दूसरा विवाह किया ॥ ५ ॥

ततो बहुगते काले लोहकारस्य वै शिवे! व्याघ्रेण मरणं जातं यमदूतैर्यमाज्ञया ॥ ६ ॥