कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 271–280
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 271–280
पृष्ठ 271
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कर्मविपाकसंहिता २६३ भा० टी० – वहाँ तीनों की मृत्यु हो गयी पश्चात् लवणकार ने अपने बन्धु- बान्धवों के साथ मिलकर अपनी मरी हुई स्त्री और दोनों बैलों को बाहर निकाल कर
फेंक दिया ।॥ ६ ॥
ततः सर्वं वयो जातं वृद्धे सति वरानने! मरणं तस्य वै जातं लवणकारस्य पार्वति! ॥ ७ ॥
भा० टी० - हे वरानने! हे पार्वति! वृद्ध होने पर उस लवणकार की सारी आयु बीतने पर उस की मृत्यु हो गयी ॥७ ॥
यमदूतैर्महाघोरैर्नरके घोरसंज्ञके ।
पातितस्तत्र देवेशि द्वाविंशतिसहस्रकम्॥ ८ ॥
भा० टी० – और हे देवि! यमराज की आज्ञा पाकर यम के दूतों नें उसे घोर नरक में डाला । तब बाईस हजार वर्ष पर्यंत उसने घोर नरक भोगा ॥ ८ ॥
वर्षं सुभुज्यते देवि कृमिसूचिमुखैर्युतम्।
नरकान्निःसृतो देवि व्याघ्रयोनावजायत ॥ ९ ॥
भा० टी० - हे देवि! सुई के समान मुख वाले जीवों से युक्त नरकों के दुःखों को भोगकर फिर नरक से निकलकर बाघ की योनि को प्राप्त होता हुआ ॥ ९ ॥
पुनश्छागस्य वै योनिं बिडालस्य ततोऽगमत् ।
मानुषत्वं ततो लेभे देशे पुण्यतमे शुभे ॥ १० ॥
भा० टी० - फिर हे शुभे! छाग की योनि को प्राप्त होकर वहाँ से बिडाल की योनि को प्राप्त हुआ, फिर शुभ युक्त देश में मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ ॥ १० ॥
स्वकर्मवशगो नित्यं धनधान्यसमन्वितः ।
गुणज्ञः सर्वविद्यानां कन्यापुत्रैश्च वर्जितः ॥ ११ ॥
भा० टी० - और अपने पूर्व कर्मों के प्रताप से धनधान्य से युक्त, गुणज्ञ, सब विद्याओं में चतुर, कन्या और पुत्र से रहित है ॥ ११ ॥
लवणकारस्य मरणं गङ्गायां पूर्वजन्मतः ।
तत्फलेन महादेवि धनाढ्यत्वं प्रजायते ॥ १२ ॥
भा० टी० - हे महादेवि! पूर्वजन्म में उस लवणकार का मरण गंगा के तट पर हुआ था, इससे वह धनाढ्य होता गया ॥ १२ ॥
स्वभार्या पतिता देवि लवणकूपे निशामुखे ।
नैव निःसारिता देवि ततः कन्या प्रजायते ॥ १३ ॥
पृष्ठ 272
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२६४ कर्मविपाकसंहिता भा० टी ० — हे देवि! रात्रि में उसकी अपनी भार्य्या लवण कूप में गिरी थी उसने उसे नहीं निकाला जिसके कारण उसकी कन्या हुई ॥ १३ ॥
वृषभौ पतितौ कूपे पातितौ मृत्युभागतौ ।
तेन दोषेण देवेशि पुत्रो नैव प्रजायते ॥ १४ ॥
भा ० टी ० - और हे देवेशि! वृषभ जो कूप में पड़े थे और मृत्यु को प्राप्त हुए थे इस दोष से उसके पुत्र नहीं हुए ॥ १४ ॥
परस्त्रीरतिसंयोगं यत्कृतं पूर्वजन्मनि ।
तेन पापेन भो देवि शरीरे रोगसंभवः ॥ १५ ॥
भा० टी० — और हे देवि! पूर्वजन्म में जो उसने परस्त्री से भोग किया, उससे उसके शरीर में रोगों की उत्पत्ति हो गयी ॥ १५ ॥
अस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु देवि सुशोभने! गृहवित्ताष्टमं भागं ब्राह्मणाय समर्पयेत् ॥ १६ ॥
भा० टी००. - अब हे देवि! हे सुशोभने इसकी शांति को कहता हूँ, तुम ध्यान से सुनो अपने घर के द्रव्य में से आठवें भाग का दान कर ब्राह्मण को दें ॥ १६ ॥
गायत्रीलक्षजाप्यं च विप्रद्वारा च कारयेत् ।
हवनं तद्दशांशेन मार्जनं तर्पणं तथा ॥ १७ ॥
भा० टी० - एक लाख तक गायत्री का जप ब्राह्मण के द्वारा करायें और उसका दशांश हवन, दशांश तर्पण और उसका दशांश मार्जन करवायें ॥ १७ ॥
सुवर्णप्रतिमां कृत्वा लक्ष्म्याः पञ्चपलेन वै ।
रौप्यस्यैव वरारोहे वृषभौ द्वौ सुनिर्मलौ ॥ १८ ॥
भा० टी० – पांच पल, २० तोले प्रमाण की सुवर्ण की लक्ष्मीजी की मूर्ति बनवायें और हे वरारोहे! चांदी की पांच- पांच पल प्रमाण वाली अर्थात् दश पल की दो बैलों की निर्मल मूर्ति बनवायें ॥ १८ ॥
पलैर्दशमितैः कुर्य्यात्पूजयित्वा यथाविधि ।
मन्त्रेणानेन देवेशि स्वोपचारैः पृथक् पृथक् ॥ १ ९ ॥
भा० टी ० — तथा दश पल से मूर्ति बनायें और हे देवेशि! यथाविधि इस मंत्र से अपने उपचार से पृथक् पृथक् पूजन करायें ॥ १ ९ ॥ ॐ लक्ष्मि देवि महालक्ष्मि कमले सर्वसिद्धिदे! मम पूर्वकृतं पापं तत्क्षमस्व दयानिधे! ॥ २० ॥
पृष्ठ 273
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कर्मविपाकसंहिता २६५ भा० टी० - ॐ हे लक्ष्मि! हे देवि! हे महालक्ष्मि! हे कमले! हे सर्वसिद्धिदे! इस प्रकार मंत्र का उच्चारण करें ' मेरा पहले किया हुआ पाप, हे दयानिधे! दूर करो' ॥२० ॥
ॐ लक्ष्म्यै नमः पाद्यं समर्पयामि ॐ लक्ष्म्यै नमः अर्घ्यं समर्पयामि ॐ देव्यै नमः स्नानं समर्पयामि ॐ कमलायै नमः गन्धं समर्पयामि ॐ सर्वायै नमः धूपं समर्पयामि ॐ सिद्धिदायै नमः दीपं समर्पयामि ॐ पाद्यादिसर्वाणि दापयेत् ॥
ॐ नन्दिकेश्वर भूतेश गणानामधिपो भवान् ।
मम पूर्वकृतं पापं क्षम्यतां परमेश्वर! ॥ २१ ॥
भा० टी० - मंत्र० ॐ लक्ष्म्यै नमः पाद्यं समर्पयामि ॐ लक्ष्म्यै नमः अर्घ्यं समर्पयामि ॐ देव्यै नमः स्नानं समर्पयामि ॐ कमलायै नमः गन्धं समर्पयामि ॐ सर्वायै नमः धूपं समर्पयामि ॐ सिद्धिदायै नमः दीपं समर्पयामि ॐ पाद्यादिसर्वाणि दापयेत्- ऐसे पाद्यादि सब देकर हे नंदिकेश्वर! हे भूतेश! हे परमेश्वर! तुम गणों के अधिष्ठाता हो । मेरे पहले किये हुए पाप दूर करो ॥ २१ ॥
इति मन्त्रेण वृषभौ पूजितौ शुभ्ररूपिणौ ।
पूजयित्वा यथान्यायं ब्राह्मणाय ददेत्ततः ॥ २२ ॥
भा० टी००.- इस मंत्र से श्वेत वर्ण के पवित्र रूप बैलों का पूजन कर विधि-विधान पूर्वक संकल्प कर ब्राह्मण को दान करें ॥ २२ ॥
ततो गां कपिलां दद्यात् स्वर्णशृङ्गीं सुभूषिताम् ।
एवं कृते वरारोहे यत्कृतं पूर्वजन्मनि ॥ २३ ॥
भा० टी० — फिर पश्चात् कपिला गौ को स्वर्णशृंग से युक्त विभूषित करके दान करें ऐसा करने से हे वरारोहे! पहले जन्म का किया हुआ पाप ॥ २३ ॥
तत्सर्वं नाशमायाति शीघ्रमेव न संशयः ।
पुत्रोऽपि जायते देवि वन्ध्यात्वं च प्रशाम्यति ॥ २४ ॥
भा० टी०० - शीघ्र ही सब पाप नाश को प्राप्त होता है, इसमें संदेह नहीं है और हे देवि! पुत्र की प्राप्ति होती है तथा बांझपन दूर होता है ॥ २४ ॥
पृष्ठ 274
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२६६ कर्मविपाकसंहिता
रोगाः सर्वे क्षयं यान्ति नात्र कार्या विचारणा ।
मृतवत्सा लभेत्पुत्रं चिरञ्जीविनमुत्तमम् ॥ २५ ॥
भा० टी ० – और सब रोगों का नाश होता है इसमें कुछ भी सन्देह नहीं करना, मृत - वत्सा भी बहुत काल तक जीने वाले पुत्र को पैदा करती है ॥ २५ ॥
काकबन्ध्या लभेत्पुत्रं पुनर्देवि न संशयः ॥ २६ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे मूलनक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥
भा० टी ० – और हे देवि! काक - वंध्या भी पुत्र को प्राप्त करती है इसमें संशय नहीं है ॥ २६ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वती० मूलनक्ष० चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥
पृष्ठ 275
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
॥८० ॥
पूर्वाषाढानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
अयोध्यायां महादेवि वसिष्ठस्यैव चाश्रमे ।
श्रीधनेश्वरशर्मेति ब्राह्मणो न्यवसत्प्रिये! ॥१ ॥
भा ० टी ० – शिवजी कहते हैं - हे महादेवि! हे प्रिये! अयोध्यापुरी में वसिष्ठजी के आश्रम में श्रीधनेश्वरशर्मा नाम वाला एक ब्राह्मण रहता था ॥ १ ॥
स पण्डितो गुणज्ञश्च धनी मानी विचक्षणः ।
स्त्री च पतिव्रता तस्य पतिसेवासु तत्परा ॥ २ ॥
भा० टी० – वह पंडित, गुणज्ञ तथा धनवान् और मान से युक्त, विचक्षण अर्थात् विद्वान् था और उसकी स्त्री पतिव्रता और पति की सेवा में रत रहने वाली थी ॥२ ॥
पुत्रद्वयं तथा जातं विद्यावृत्तिर्बभूव सः ।
भागिनेयस्ततो देवि तद्धनेश्वरशर्मणः ॥ ३ ॥
भा० टी० - हे देवि! उसके दो पुत्र हुए तथा धनेश्वरशर्मा के स्थान पर उसका भागिनेय अर्थात् बहन का पुत्र आकर रहने लगा ॥३ ॥
तत्र वासार्थमायातः सपत्नीको वरानने! तीर्थयात्राप्रसङ्गेन गृहे तस्यावसद्विजः ॥ ४ ॥
भा० टी० - हे वरानने! वह भागिनेय स्त्री सहित वहाँ वास करने के लिए आया और तीर्थ यात्रा के प्रसंग से उसके घर में रहने गया ॥ ४ ॥
मासमेकं स्थितस्तत्र भागिनेयस्ततो मृतः ।
दष्टः सर्पेण देवेशि कालपाशावृतो द्विजः ॥ ५ ॥
भा० टी० - हे देवि! एक महीना वहाँ वास करके वह भागिनेय काल - पाश के वशीभूत सर्प के द्वारा डँसा गया और मृत्यु को प्राप्त हो गया ॥५ ॥
वर्षमात्रे ततो जाते भागिनेयस्य या वधूः ।
धनेश्वरे महाप्रीतिमकरोत्सा मम प्रिये! ॥ ६ ॥
पृष्ठ 276
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२६८ कर्मविपाकसंहिता भा० टी ० — जब भागिनेय को एक वर्ष व्यतीत हो चुका, तब भागिनेय की स्त्री धनेश्वरशर्मा से महाप्रीति युक्त होकर उससे रमण करने लगी ॥ ६ ॥
पुत्राणां मरणं देवि जातं तस्याघरूपिणः ।
गृहे स्वर्णं च रौप्यं च सर्वं तस्यै न्यवेदयत् ॥ ७ ॥
भा० टी० - और भागिनेय की स्त्री से रमण करने वाले उस पापी के पुत्रादि की मृत्यु हो गयी, तब सब द्रव्य धनेश्वरशर्मा ने उस भागिनेय की स्त्री को दे दिया ॥ ७ ॥
ततो बहुगते काले तस्य मृत्युरभूत्किल ।
यमदूतैर्महाघोरे नरके पातितः शिवे! ॥ ८ ॥
भा० टी० - हे शिवे! तब काल के अत्यधिक व्यतीत होने पर धनेश्वरशर्मा भी मृत्यु को प्राप्त हो गया, तब यम के दूतों ने नरक में डाला ॥ ८ ॥
यमाज्ञया वरारोहे षष्टिवर्षसहस्रकम् ।
अन्यत्रापि कृतं पापं प्रयागे च विनश्यति ॥ ९ ॥
भा० टी० - हे वरारोहे! साठ हजार वर्षों तक उसे नरक प्राप्त हुआ, अन्यत्र जगह किया हुआ पाप प्रयाग में नष्ट हो जाता है ॥ ९ ॥
प्रयागे यत्कृतं पापं रामपुर्यां विनश्यति ।
अयोध्यायां कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति ॥ १० ॥
भा० टी ० — प्रयाग में किया हुआ पाप ( रामपुरी ) अयोध्या पुरी में नष्ट होता है और अयोध्या में किया हुआ पाप वज्रलेप अर्थात् कभी नष्ट ही नहीं होता है ॥ १० ॥
नरकान्निःसृतो देवि बकयोनावजायत ।
पुनर्दर्दुरयोनिं वै काकयोनिं ततोऽगमत्॥ ११ ॥
भा० टी० - फिर हे देवि! नरक से निकलकर बगुला पक्षी की योनि को प्राप्त हुआ, फिर वह मेंढ़क की योनि को प्राप्त होकर काक की योनि को प्राप्त हुआ ॥ ११ ॥
पुनर्मानुषयोन्यां वै धनधान्यसमन्वितः ।
जातः पुण्यतमे देशे देवगन्धर्वसेविते ॥ १२ ॥
भा० टी० — फिर गंधर्वों से सेवित पुण्यतम देश में धन- धान्य से युक्त होकर मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ है ॥ १२ ॥
सर्वविद्यासु विख्यातो गुणज्ञो रूपवांस्तथा ।
पूर्वजन्मनि देवेशि भागिनेयवधूं प्रति ॥ १३ ॥
पृष्ठ 277
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कर्मविपाकसंहिता २६९ भा० टी ० – हे देवेशि! सब विद्याओं में गुणज्ञ, रूपवान् और विख्यात है । उसने पूर्व जन्म में भागिनेय की भार्या से प्रीति की ॥ १३ ॥
संभोगं कृतवान् विप्रः कुक्षिपीडा ततः परम् ।
वंशच्छेदो विशालाक्षि कन्या वै बहवस्तथा ॥ १४ ॥
भा० टी० - हे विशालाक्षि! उससे संभोग किया जिससे उसकी कुक्षि में पीड़ा हुई और वंश नष्ट हुआ तथा बहुत सी कन्याएँ पैदा हुई ॥ १४ ॥
भागिनेयस्य वै द्रव्यं भुक्तं पूर्वमनेन वै ।
शरीरे बहुधा पीडा परस्त्रीगमनादनु ॥ १५ ॥
भा० टी० – और भागिनेय ( भानजे ) के द्रव्य को पूर्व जन्म में इसने भोगा था, जिससे इसके शरीर में अनेक प्रकार की पीड़ा परस्त्री - गमनादि कर्म से हुई ॥ १५ ॥
अस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु त्वं मम वल्लभे! गृहवित्तषडंशेन पुण्यकार्यं च कारयेत्॥ १६ ॥
भा० टी० - हे मेरी वल्लभे! अब इसकी शांति को कहता हूँ, तुम ध्यानपूर्वक सुनो, अपने घर के द्रव्य में से छठे भाग को पुण्य हेतु दान करें । ॥ १६ ॥
गायत्री -जातवेदाभ्यां जपं वै कारयेत्ततः ।
दशांशं हवनं कृत्वा तर्पणं मार्जनं तथा ॥ १७ ॥
भा० टी० – गायत्री तथा जातवेद मंत्र का जप करायें और उसके दशांश का हवन उसके दशांश का तर्पण और उसके दशांश मार्जन करायें ॥ १७ ॥
जीर्णोद्धारं वरारोहे कूपं चैव तडागकम् ।
तद्वदेव च वै कुर्य्यात्षष्टिवृक्षप्ररोपणम्॥ १८ ॥
भा० टी० — और हे वरारोहे! जीर्ण- शीर्ण कुएँ, तालाबों का जीर्णोद्धार करें तथा साठ संख्या तक वृक्षों को लगायें ॥ १८ ॥
प्रयागे माघमासे तु तुलादानं प्रयत्नतः ।
धूम्रवर्णां तथा गां वै दद्याद्विप्राय सत्कृताम् ॥ १ ९ ॥
भा० टी० - और यत्न पूर्वक माघ के महीने में प्रयाग का स्नान करें और धूम्रवर्ण वाली श्रेष्ठ गायों का दान किसी ब्राह्मण को दें ॥ १ ९ ॥
एवं कृते वरारोहे पूर्वपापं विशुध्यति ।
पुत्रोऽपि जायते देवि वन्ध्यत्वं च प्रशाम्यति ॥ २० ॥
पृष्ठ 278
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२७० कर्मविपाकसंहिता भा० टी० — हे वरारोहे! ऐसा करने से पूर्वजन्म का पाप शुद्ध होता है और पुत्र की प्राप्ति होती है और बाँझपन की शांति होती है ॥ २० ॥
काकवन्ध्यत्वशान्त्यंर्थं रवियुक्तां तु सप्तमीम् ।
कृत्वा व्रतं वरारोहे सुवर्णं दानमाचरेत् ॥ २१ ॥
भा० टी० — और काकवन्ध्यापन की शांति के लिये आदित्य- युक्त सप्तमी के दिन व्रत करके पश्चात् सुवर्ण का दान करें ॥ २१ ॥
शय्यादानं ततो दद्यान्मृतवत्सा सुपुत्रिणी ।
सर्वे रोगाः क्षयं यान्ति नात्र कार्या विचारणा ॥ २२ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे पूर्वाषाढानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नामाऽशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
भा० टी० - फिर शय्या का दान करें ऐसा करने से मृतवत्सा भी पुत्र को पैदा करती है और सब रोगों का नाश होता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं करना ॥ २२ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां भाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे० पूर्वाषाढा० प्रथमच० प्रायश्चित्तकथनं नामाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
पृष्ठ 279
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
॥८१ ॥
पूर्वाषाढानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
कर्णाटे वै ततो देवि पुरं च शिवसंज्ञकम् ।
वसन्ति तत्र बहवो वैश्याः पण्योपजीविनः ॥ १ ॥
भा० टी ० — शिवजी कहते हैं - हे देवि! कर्नाटदेश में शिव नाम वाला नगर है, वहाँ पण्य अर्थात् दुकान से आजीविका युक्त बहुत से वैश्यजन निवास करते थे ॥१ ॥
तन्मध्ये वैश्य एको हि धरणीकरविश्रुतः ।
तस्य रूपवती भार्या सुन्दरी बहु संयुताः ॥ २ ॥
भा० टी० - उनमें से एक धरणीकर नामक वैश्य विख्यात होता गया और उसकी रूपवती स्त्री अत्यन्त सुन्दर थी ॥ २ ॥
व्यापारेण महादेवि धनं बहु च संचितम् ।
ततो बहुदिने काले तस्य मित्रं द्विजोऽप्यभूत् ॥ ३ ॥
भा० टी० - हे महादेवि! उसने व्यापार से बहुत धन इकट्ठा किया, तब बहुत से दिन व्यतीत होने पर उसका एक ब्राह्मण मित्र बन गया ॥ ३ ॥
ब्राह्मणः सोऽपि वै भ्रष्टः कष्टं भुक्त्वा दिने दिने ।
स्वर्ण शतपलं देवि हीरकं मौक्तिकं तथा ॥४ ॥
भा० टी० - ऐश्वर्य्य से भ्रष्ट हुआ वह ब्राह्मण भी प्रतिदिन कष्टों भोग कर सौ पल सुवर्ण, हीरा तथा मोती॥ ४ ॥
स्थापितं ब्राह्मणद्रव्यं स्वगृहे मित्रकारणात् ।
ततो वृद्धे तु संजाते वैश्यमृत्युरभूत्पुरा ॥ ५ ॥
भा० टी० - इसप्रकार उस वैश्य ने मित्रता के कारण उस ब्राह्मण के अपने घर में स्थापित किये फिर वृद्ध होने पर उस वैश्य की मृत्यु हो गयी ॥ ५ ॥
पश्चात्पत्नी मृता तस्य व्रतिनी गर्ववर्जिता वैश्यस्य चाभवत्स्वर्गं दिव्यवर्षसहस्त्रकम् ॥ ६ ॥
पृष्ठ 280
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२७२ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - तदनन्तर गर्व से वर्जित व्रत में रत रहने वाली उसकी पत्नी की भी मृत्यु हो गयी और उसको हजार वर्ष वाला दिव्य स्वर्गवास हुआ ॥ ६ ॥
पल्या सह वरारोहे भुक्त्वा स्वर्गफलं ततः ।
बकयोनिं ततो लेभे चक्रवाको ततोऽभवत् ॥ ७ ॥
भा० टी० - हे वरारोहे! पत्नी सहित उस वैश्य ने स्वर्ग के फल को भोगा फिर बगुला पक्षी की योनि को प्राप्त हुआ फिर वहाँ से चक्रवाक की योनि को प्राप्त हुआ ॥७ ॥
हंसयोन्यां ततो जातो मानुषत्वं ततोऽगमत् ।
पूर्वसंबन्धतः पूर्वपुण्यात्पातिव्रतादपि ॥ ८ ॥
भा० टी ० – तत्पश्चात् हंस की योनि को प्राप्त हुआ, फिर पूर्व में किये हुए पुण्य के प्रभाव से तथा पातिव्रत्य धर्म वाली स्त्री के प्रभाव से मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ ॥८ ॥
पुनर्विवाहिता देवि ब्राह्मणस्वाऽपहारतः ।
वन्ध्या जाता तु सा नारी दुःखिता चाप्यऽहर्निशम्॥ ९ ॥
भा० टी० - और वही स्त्री फिर उससे विवाही गयी, किन्तु पूर्वजन्म में ब्राह्मण का धन नहीं देने से उसकी वह स्त्री भी वंध्या और रात दिन अति दुखी होती गई ॥ ९ ॥
तस्य देहेऽभवद्वयाधिः कफवातसमन्वितः ।
धनाढ्यो बहुधा कन्या जायन्ते च पुनः पुनः ॥ १० ॥
भा ० टी० — और उसके देह में व्याधि रहती है, कफवातादि रोगयुक्त है, धन से युक्त होन पर भी बार- बार उसकी कन्या जन्मती गयी ॥ १० ॥
अस्य निग्रहहेत्वर्थं शृणु सर्वं वरानने! यद्गृहे वित्तमर्द्धं तद्ब्राह्मणाय समर्पयेत् ॥ ११ ॥
भा० टी० - हे वरानने! इस पाप की शांति के लिए मैं उपाय बताता हूँ तुम ध्यान से सुनो अपने घर का आधा द्रव्य ब्राह्मण को संकल्प करके दान करें ॥ ११ ॥
ॐ लक्ष्म्यै नमोऽथ मन्त्रेण दशायुतजपं ततः ।
दशांशं हवनं तद्वत्तर्पणं मार्जनं तथा ॥ १२ ॥
भा० टी० – “ ॐ लक्ष्मै नमः " इस मंत्र का दश हजार जप करायें और उसके दशांश का हवन, और उसका दशांश तर्पण में उसका दशांश मार्जन करायें ॥ १२ ॥