कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 281–290
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 281–290
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कर्मविपाकसंहिता २७३
गामेकां कृष्णवर्णां वै स्वर्णयुक्तां सवत्सकाम् ।
ब्राह्मणाय ततो दद्यान्मुक्तालाङ्गूलसंयुताम् ॥ १३ ॥
भा० टी० - और एक कृष्णा वर्ण की गाय को सुवर्ण तथा वस्त्रादि से युक्त और मोतियों की पुच्छादि से युक्त कर ब्राह्मण को दान करें ॥ १३ ॥
भोजनं कारयेत्पूज्यान् ब्राह्मणान्वेदपारगान् ।
शतं वा द्विशतं देवि त्रिशतं वा विशेषतः ॥ १४ ॥
भा० टी० — और हे देवि! पवित्र वेदपाठी सौ अथवा दो सौ अथवा तीन सौ ब्राह्मणों को विशेष शुद्धता से भोजन करायें ॥ १४ ॥
पलैः शतैः सुवर्णस्य वेदीं कृत्वा विचक्षणः ।
तन्मध्ये च द्विजस्यैव रौप्यस्यैव च चाकृतिम्॥ १५ ॥
भा० टी० — और सौ पल मात्रा की सुवर्ण की वेदी बनाकर उसके मध्य में चांदी की ब्राह्मण की मूर्ति स्थापित करें ॥ १५ ॥
पूजयेच्छ्रद्धया देवि मन्त्रेणैव पुनः पुनः ।
ब्रह्मंस्त्वं कपिलो विष्णुः सर्वसाक्षी जगन्मयः ॥ १६ ॥
भा० टी० - हे देवि! श्रद्धा से इस मंत्र से उसका पूजन करें- हे ब्रह्मन्! तुम कपिल हो, विष्णु का रूप हो, सब के साक्षी हो, जगन्मय हो ॥ १६ ॥
ममापराधं देवेश क्षम्यतां पूर्वजन्मनः ।
द्रव्यं मित्रस्य भो देवि स्थापितं स्वगृहे मया ॥ १७ ॥
भा० टी० - हे देवेश! मेरा अपराध क्षमा करो जोकि पूर्व जन्म में मैंने मित्र का द्रव्य स्थापित किया था ॥ १७ ॥
न दत्तं वै मयाऽज्ञानात् क्षम्यतां परमेश्वर! मन्त्रेणानेन देवेशि पूजनं विधिपूर्वकम् ॥ १८ ॥
भा० टी० - हे देवेशि! अज्ञान से मैंने वह धन वापस नहीं दिया, हे परमेश्वर! तुम क्षमा करो इस मंत्र से विधिपूर्वक पूजन करें ॥ १८ ॥
पूजयित्वा ततो देवि ब्राह्मणाय प्रदापयेत् ।
एवं कृत्वा वरारोहे शीघ्रं पुत्रः प्रजायते ॥ १ ९ ॥
भा० टी० — हे देवि! हे वरारोहे!! पूजन करके ब्राह्मण को दान करें । ऐसा करने से शीघ्र पुत्र की प्राप्ति होती है ॥ १ ९ ॥
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२७४ कर्मविपाकसंहिता
काकवन्ध्या पुनर्देवि कन्यकाजननी तथा ।
पुत्रं प्रसूयते देवि न च कन्या प्रसूयते ॥ २० ॥
भा० टी० - हे देवि! काकवंध्या या कन्या को पैदा करने वाली स्त्री भी ऐसा करने से पुत्र को पैदा करती है और कन्या का जन्म नहीं होता है ॥ २० ॥
मृतवत्सा लभेत्पुत्रं चिरञ्जीविनमुत्तमम् ।
व्याधयः संक्षयं यान्ति नात्र कार्या विचारणा ॥ २१ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे पूर्वाषाढानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥
भा० टी ० — और मृतवत्सा भी बहुत काल तक जीने वाले पुत्र को पैदा करती है तथा सभी व्याधियाँ नष्ट होती हैं इसमें कुछ भी सन्देह नहीं करना ॥ २१ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पूर्वाषाढा० द्विती० प्रायश्चित्तकथनं नामैकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥
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॥८२ ॥
पूर्वाषाढानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
अन्तर्वेदे विशालाक्षि लोध्रोवात्सीत्स पुण्यकृत् ।
गन्धर्वाख्ये पुरे देवि विख्याते यमुनातटे ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं -हे विशालाक्षि! गंगा और यमुना के मध्य में गंधर्व नाम वाला प्रसिद्ध पुर है, उस पुर में यमुना तट पर पुण्यवान् एक लोधा निवास करता था ॥ १ ॥
सुभाग्यवान् गुणज्ञो हि बहुभृत्यैः सुपूजितः ।
भूपतिस्तस्य देशस्य दाता भोक्ता विचक्षणः ॥ २ ॥
भा० टी० — वह सौभाग्यवान् तथा गुणज्ञ बहुत से नौकरों से युक्त और पूजित था, उस देश का भूपति अर्थात् राजा दानी और भोगों को भोगने वाला, विद्वान् अर्थात् पंडित था ॥ २ ॥
ब्राह्मणस्य हृता भूमिरज्ञानाद्वै सुरेश्वरि! ब्राह्मणोऽपि विषं भुक्त्वा मृतस्तस्योपरि प्रिये! ॥ ३ ॥
भा० टी० — हे सुरेश्वरि! उसने अज्ञान से ब्राह्मण की भूमि छीन ली, फिर हे प्रिये! ब्राह्मण भी विषपान करके मृत्यु को प्राप्त हो गया ॥ ३ ॥
ततो बहुगते काले तस्य मृत्युरभूत्पुरा ।
यमदूतैर्महाघोरे कुम्भीपाके निपातितः ॥ ४ ॥
भा० टी० - फिर बहुत सा काल बीतने पर उस लोधा की भी मृत्यु हुई और वह यमराज के दूतों द्वारा कुंभीपाक नरक में डाला गया ॥४ ॥
यमाज्ञया वरारोहे युगमेकं च पातितः ।
महादुःखेन संतप्तो बहुकष्टं प्रलब्धवान्॥ ५ ॥
भा० टी ० — हे वरारोहे! यमराज ने उसे एक युग पर्यंत नरक में डालने की आज्ञा दी, वहाँ महादुःख से संतप्त होकर बहुत से कष्टों को प्राप्त हुआ ॥५ ॥
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२७६ कर्मविपाकसंहिता
नरकान्निःसृतो देवि सूकरत्वं ह्यजायत ।
ऋक्षयोनिं ततो भूत्वा शुकयोनिं ततोऽगमत् ॥ ६ ॥
भा० टी० - हे देवि! फिर नरक से निकलकर शूकर की योनि को प्राप्त हुआ, फिर वहाँ से रीछ की योनि को प्राप्त होकर फिर तोते की योनि को प्राप्त हुआ ॥ ६ ॥
पुनर्मानुषयोनिर्वै मध्यदेशे वरानने! धनधान्यसमायुक्तो वंशहीनो वरानने! ॥ ७ ॥
भा० टी० - हे वरानने! फिर मध्य देश में धनधान्य से युक्त होकर वंश से रहित मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ ॥ ७ ॥
पूर्वजन्मनि देवेशि ऋता भूमिर्वरानने! ब्राह्मणो वै मृतः पूर्वं तदुद्देशेन वै शिवे! ॥ ८ ॥
भा० टी० - हे देवेशि!! हे वरानने! पूर्व जन्म में जो उसने ब्राह्मण की भूमि छीनीं थी और उसके कारण विप्र की मृत्यु हुई थी ॥ ८ ॥
अतः पुत्रविहीनोऽयं कन्यका बहु जायते ।
महारोगेण संतप्तो मृतपुत्रः पुनः पुनः ॥ ९ ॥
भा० टी० – इसके कारण पुत्र रहित हुआ है, कन्याएँ बहुत पैदा होती हैं, महारोग युक्त है । बार - बार पुत्रादि उसके नष्ट होते गये ॥९ ॥
अस्य शान्तिमहं वक्ष्ये पूर्वपापस्य शान्तये ।
गायत्रीजातवेदाभ्यां त्र्यम्बकेन वरानने! ॥ १० ॥
भा० टी ० - अब हे वरानने! उसकी शांति को कहता हूँ तुम सुनो, पहले जन्म के पाप की शांति के लिये गायत्री, जातवेद, त्र्यंबक -इत्यादि मंत्र का जप करें ॥ १० ॥
दशायुतं जपः कार्यः प्रतिमन्त्रैः सुरेश्वरि! दशांशं हवनं तद्वत् तर्पणं मार्जनं तथा ॥ ११ ॥
भा० टी० – प्रत्येक मंत्र का एक लाख तक जाप और दशांश हवन उसके दशांश तर्पण तथा उसके दशांश मार्जन करायें ॥ ११ ॥
दशवर्णां ततो दद्याच्छतब्राह्मणभोजनम् ।
भूमिदानं ततः कुर्य्याच्छतविग्रहमानकम्॥ १२ ॥
भा० टी० - और दशवर्ण वाली गायों का दान करें सौ ब्राह्मणों को भोजन करायें और सौ बीघे प्रमाण वाली भूमि का दान दें ॥ १२ ॥
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कर्मविपाकसंहिता २७७
पलपञ्चसुवर्णस्य ब्राह्मणस्य तथाऽऽकृतिम् ।
पूजयित्वा यथान्यायं ब्राह्मणाय प्रदापयेत् ॥ १३ ॥
भा० टी ० — और पाँच पल सुवर्ण की, ब्राह्मण की मूर्ति बनवायें यथाविधि पूजन कर ब्राह्मण को दान करें ॥ १३ ॥
प्रयागे मकरे मासि पल्या सह वरानने! स्नानं कुर्याच्च देवेशि पूर्वपापस्य शुद्धये ॥ १४ ॥
भा० टी० - हे वरानने! हे देवेशि!! मकर के महीने में स्त्री सहित प्रयाग में स्नान करने से पूर्वपाप नष्ट होते हैं ॥ १४ ॥
एवं कृत्वा वरारोहे पुत्रोत्पत्तिर्भवेच्छिवे! वन्ध्यत्वं नाशमायाति काकवन्ध्या च गर्भिणी ॥ १५ ॥
भा० टी० — हे वरारोहे! ऐसा करने से शीघ्र ही पुत्र की उत्पत्ति होती है बाँझपन शांत होकर काकवंध्या गर्भिणी होती है ॥ १५ ॥
मृतवत्सा लभेत्पुत्रं चिरञ्जीविनमुत्तमम् ।
रोगाः सर्वे क्षयं यान्ति नात्र कार्या विचारणा ॥ १६ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे पूर्वाषाढानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामद्व्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥
भा० टी ० — और मृतवत्सा भी बहुत काल तक जीने वाले पुत्र को पैदा करती है, सब रोग नष्ट होते हैं, इसमें संदेह नहीं है ॥ १६ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे पूर्वाषाढा० तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम द्वयशीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥
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॥८३ ॥
पूर्वाषाढानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
अयोध्यायां विशालाक्षि मालाकारोऽवसत्पुरा ।
साधुवृत्तिरतः श्रीमान् ब्राह्मणानां च सेवकः ॥१ ॥
भा० टी ० – शिवजी कहते हैं - हे विशालाक्षि! बहुत पहले अयोध्यापुरी में साधुवृत्ति में रत ब्राह्मणों की सेवा करने वाला लक्ष्मीवान् एक मालाकार ( माली ) निवास करता था ॥ १ ॥
तस्य पत्नी महादुष्टा कुलटा व्यभिचारिणी ।
माल्यं कृत्वा विशालाक्षि जीवयामास बान्धवान्॥ १ ॥
भा० टी ० - हे विशालाक्षि! उसकी स्त्री महादुष्टा, कुलटा, जारकर्म में रत रहती थी । वह माला बनाकर बांधवों की आजीविका चलाता था ॥ २ ॥
तस्य मित्रं द्विजोऽप्येकः स्वर्णं लक्षद्वयं तथा ।
स्थापितं स्वगृहे तस्य गताश्च बहुवासराः ॥ ३ ॥
भा ० टी० — और उसका एक मित्र द्विज दो लाख सुवर्ण उसको देकर विदेश चला गया, तब उसको बहुत दिन बीत चुके ॥ ३ ॥
याचितं तेन स्वं द्रव्यमर्धं प्राप्तं तदा प्रिये! ।
तदर्थं च व्ययं जातं मालाकारस्य वै गृहे ॥ ४ ॥
भा० टी० - फिर हे प्रिये! उस ब्राह्मण ने वापस आकर अपना द्रव्य मांगा तब उसने आधा द्रव्य दिया आधा द्रव्य मालकार ने खर्च दिया ॥ ४ ॥
एवं बहुगते काले मालाकारो मृतः पुरा ।
अयोध्यायां विशालाक्षि स्वर्गंस्तस्याऽभवत्किल ॥ ५ ॥
भा० टी०-०- इस प्रकार हे विशालाक्षि! काल व्यतीत होने पर मालाकार का मृत्यु हुई अयोध्या में मरने से उसको स्वर्गवास हुआ ॥ ५ ॥
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कर्मविपाकसंहिता २७९
लक्षवर्षं वरारोहे भुक्तं स्वर्गफलं शुभम् ।
ततः पुण्यक्षये जाते मानुषत्वेऽभवत्पुनः ॥ ६ ॥
भा० टी० — हे वरारोहे! एक लाख वर्षों तक स्वर्ग के फल को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर फिर मनुष्य योनि में उसका जन्म हुआ ॥ ६ ॥
मध्यदेशे च देवेशि पुत्रकन्याविवर्जितः ।
तस्य पत्नी पुनर्देवि या स्थिता पूर्वजन्मनि ॥ ७ ॥
भा० टी० - हे देवेशि! वह मध्य देश में पुत्र तथा कन्या से रहित है और उसकी स्त्री जो पूर्वजन्म में थी, वही उससे विवाही गयी ॥७ ॥
विवाहिता च सा देवि व्याधियुक्ता ज्वरातुरा ।
अस्य शान्तिं वरारोहे शृणु मे परमेश्वरि! ॥ ८ ॥
भा० टी० - हे देवि! विवाहित होने के बाद उसकी स्त्री व्याधि युक्त होकर ज्वर से पीड़ित होती गई । अब हे परमेश्वरि! हे वरारोहे! इसकी शांति को कहता हूँ, तुम सुनो ॥ ८ ॥
षडङ्गं जापयेत् प्राज्ञैः शिवपूजनपूर्वकम् ।
षडक्षरेण मन्त्रेण लक्षजाप्यं वरानने! ॥ ९ ॥
भा० टी० - हे वरानने! पंडितों से षडंग का जप करायें, शिवपूजन पूर्वक षडक्षर मंत्र का एक लाख जप करायें ॥ ९ ॥
हवनं तद्दशांशेन मार्जनं तर्पणं तथा ।
श्रवणं मासमेकं तु चण्डिकाचरितत्रयम् ॥ १० ॥
भा० टी० - और उसका दशांश हवन, उसका दशांश मार्जन, उसका दशांश तर्पण करायें और एक मास पर्यंत चंडिका के तीनों चरित्रों ( कथाओं ) का पाठ और श्रवण करें ॥ १० ॥
ततः षडंशं देवेशि ब्राह्मणाय समर्पयेत् ।
ततो गां कपिलां दद्यात्तिलधेनुं सुपूजिताम्॥ ११ ॥
भा ० टी ० — हे देवेशि! अपने द्रव्य का छठे भाग को दान करें फिर पूजन करके गौ का दान तथा तिलधेनु का दान करें ॥ ११ ॥
अश्वं दद्याद्विशालाक्षि महिषीं दुग्धसंयुताम् ।
सुवर्णस्य कृतं वृक्षं फलपुष्पसमन्वितम्॥ १२ ॥
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२८० कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - हे विशालाक्षि! घोड़े का दान अथवा दुध युक्त महिषी का दान करें और फल पुष्प युक्त सुवर्ण का एक वृक्ष बनवायें ॥ १२ ॥
दद्याद्दशफलं देवि ततः पुत्रः प्रजायते ।
मृतवत्सा च या नारी काकवन्ध्या च रोगिणी ॥ १३ ॥
भा० टी० — हे देवि! दशपल का ऐसा वृक्ष बनवाकर दान करें इससे पुत्र की प्राप्ति होती है और जो मृतवत्सा काकवंध्या स्त्री और रोगिणी स्त्री है ॥ १३ ॥
सर्वासां वाञ्छितं कार्यं जायते नात्र संशयः । इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे पूर्वाषाढानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८३ ॥
भा० टी० - वह भी मनोरथ की सिद्धि को प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं है । इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पूर्वाषाढानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८३ ॥
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1178 11 उत्तराषाढानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥ श्वेतपर्वे महातीर्थे रामपुर्यां वरानने! कान्यकुब्जोऽवसद्विप्रो व्यापारकरणे रतः ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे वरानने! श्वेतपर्व नाम वाले महातीर्थ पर रामपुरी नामक नगर में एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण व्यापार कर्म में रत रहते हुए निवास करता था ॥ १ ॥
अश्वादिकं वरारोहे वृषचर्माजिनाम्बरम् ।
प्रत्यहं गृह्यते देवि विक्रयं क्रियते सदा ॥ २ ॥
भा० टी० — हे वरारोहे! वह घोड़ा, वृषादि के चर्म (चमड़े ) को प्रतिदिन बेचा करता था ॥ २ ॥
द्यूतवेश्यारतो नित्यं परस्त्रीगमनं तथा ।
प्राकरोच्च सुरापानं गुरुदेवाऽपमानकृत्॥ ३ ॥
भा० टी० — और द्यूतकर्म ( जुआ ) वेश्या संग परस्त्रीगमन, दारु का पान इत्यादि कर्म करने वाला वह गुरु और देवता का अपमान किया करता था ॥ ३ ॥
एवं बहुगते काले मरणं प्रबभूव ह ।
यमदूतैर्महाघोरे लब्ध्वा क्षिप्तः सुदारुणे ॥ ४ ॥
भा० टी० - इस प्रकार बहुत-सा काल व्यतीत होने पर उसकी मृत्यु हुई ।
यमराज के दूतों ने यम की आज्ञा पाकर उसे दारुण संज्ञक नरक में डाला ॥ ४ ॥
षष्टिवर्षसहस्त्राणि भुक्त्वा नरकयातनाम् ।
नरकान्निःसृतो देवि वानरस्य गतिं गतः ॥ ५ ॥
भा० टी० — हे देवि! साठ हजार वर्षों तक नरक का दुःख को भोगकर फिर वहाँ से निकलकर वानर की योनि को प्राप्त हुआ ॥ ५ ॥
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२८२ कर्मविपाकसंहिता
ततो रासभयोन्यां वै तुरगस्य ततोऽगमत् ।
मानुषत्वं ततो लेभे पूर्वजन्मफलाच्च सः ॥ ६ ॥
भा० टी ० – फिर गधे की योनि को प्राप्त होकर तत्पश्चात्घोड़े की योनि को प्राप्त हुआ । फिर पहले जन्म के कर्म- भोग से मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ है ॥ ६ ॥
धनधान्यसमायुक्तो रोगयुक्तोऽप्य्पुत्रकः ।
कदाचिद्दैवयोगेन पुत्रो भवति भामिनि! ॥ ७ ॥
भा० टी० - हे भामिनि! धन - धान्यादि से युक्त होकर भी वह रोग से युक्त और कभी दैवयोग से पुत्र की भी प्राप्ति होती भी है तो ( उसकी तुरन्त मृत्यु हो जाती है) ॥ ७ ॥
मरणं तस्य वै शीघ्रं ततः कन्या प्रजायते ।
अस्य शान्तिं शृणुष्वादौ यथा पापं निवर्तते ॥ ८ ॥
भा० टी ० – तो उसका मरण शीघ्र ही होता है । उसे कन्या की प्राप्ति होती गई, अब उसकी शांति को कहता हूँ, तुम सुनो ॥ ८ ॥
गृहवित्तषडंशं च पुण्यकार्यं च कारयेत् ।
पूर्वजन्मनि देवेशि कनिष्ठं भ्रातरं निजम् ॥ ९ ॥
भा० टी० - हे देवेशि! अपने घर के द्रव्य में से छठे भाग का दान कर दें उसने पहले जन्म में अपने छोटे भाई को ॥ ९ ॥
रात्रौ खड्गेन हतवान् तत्पापाच्च सुतक्षयः ।
गायत्रीमूलमन्त्रेण पञ्च लक्षं वरानने!॥ १० ॥
भा० टी००.- तलवार से मारा था, हे वरानने! उस पाप से उसके पुत्र नष्ट हुए गायत्री के मूल मंत्र का पांच लाख जप करायें ॥ १० ॥
जपं वै कारयेत्प्राज्ञैर्नित्यं गोविन्दकीर्तनम् ।
होमं वै कारयेत्कान्ते कुण्डे षट्कोणसंयुते ॥ ११ ॥
भा० टी० — हे कान्ते! नित्य गोविंद का कीर्तन करें । षट्कोण कुंड के मध्य में हवन करवायें ॥ ११ ॥
पायसेन विशालाक्षि तिलसर्पिर्युतेन च ।
दशवर्णां ततो दद्याद्ब्राह्मणाय शिवात्मने! ॥ १२ ॥