कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 371–373
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 371–373
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कर्मविपाकसंहिता ३६३
ततो बहुगते वर्षे मरणं क्षत्रियस्तु तु ।
यमदूतैर्महाघोरैर्नरके नाम दारुणे ॥ ६ ॥
भा० टी० - फिर बहुत वर्ष व्यतीत होने पर तब क्षत्रिय की भी मृत्यु हो गई ।
धर्मराज के महाघोर दूतों ने उसे दारुण नरक में डाला ॥६ ॥
कुम्भीपाके सदा घोरे क्षिप्तवान्यमशासनात् ।
युगानां त्रयसंख्यानां नरके वास एव च ॥ ७ ॥
भा० टी० - यमदूतों ने उसे धर्मराज की आज्ञा से कुंभीपाक में पटक दिया ।
तीन युग पर्यंत वह नरक में वास करता रहा ॥ ७ ॥
नरकान्निःसृतो देवि प्रेतत्वं समजायत ।
सूकरस्य पुनर्योनिं ततो भवति मानुषः ॥ ८ ॥
भा० टी० — हे देवि! अपने पूर्वकर्मफल को भोगते हुए नरक से निकलने के पश्चात् उसे प्रेत की योनि मिली, फिर शूकर की योनि मिली तदनन्तर मनुष्य योनि में उसका जन्म हुआ है ॥ ८ ॥
मध्यदेशे विशालाक्षि हिमविन्ध्याद्रिमध्यमे ।
धनधान्यसमायुक्तो ब्राह्मणानां च सेवकः ॥ ९ ॥
भा० टी० - हे विशालाक्षि! मध्य देश में हिमाचल और विंध्याचल के मध्य देश में वह धनधान्य से युक्त और ब्राह्मणों का सेवक है॥९॥
इह जन्मनि देवेशि मरणं संततेर्ध्रुवम् ।
काकवन्ध्या भवेन्नारी मृतवत्सा पुनः पुनः ॥ १० ॥
भा० टी० - हे देवि! इस जन्म में उसकी संतान नष्ट होती है और इसकी स्त्री काकवन्ध्या है अथवा मृतवत्सा होकर उसकी संतान मरती है ॥ १० ॥
शरीरे व्याधिरुत्पन्नो ज्वरश्चैव मुहुर्मुहुः ।
अस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु देवि वरानने! ॥ ११ ॥
भा० टी० - उसके शरीर में व्याधियाँ हैं और बार - बार उसे ज्वर आता है । अब इसकी शांति को कहता हूँ हे देवि! हे वरानने!! ध्यान से सुनो ॥ ११ ॥
गृहवित्तषडंशं तु ब्राह्मणाय प्रकल्पयेत् ।
गायत्रीमूलमंत्रेण पञ्चलक्षजपं तथा ॥ १२ ॥
भा० टी०-० - घर के वित्त में से छठे भाग को ब्राह्मण को दान कर दें और गायत्री के मूलमंत्र का पाँच लाख तक जप करायें ॥ १२ ॥
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३६४ कर्मविपाकसंहिता
दशांशं कारयेद्देवि हवनं विधिपूर्वकम् ।
तर्पणं मार्जनं तद्वद्गोदानं च विशेषतः ॥ १३ ॥
भा० टी ० — हे देवि! विधिपूर्वक दशांश हवन करायें, दशांश तर्पण तथा मार्जन करायें विशेषकर गाय का दान करें ॥ १३ ॥
ब्राह्मणस्य ततो देवि प्रतिमां कारयेद्बुधः ।
पलपञ्चसुवर्णस्य वस्त्ररत्नविभूषिताम्॥ १४ ॥
भा० टी० — हे देवि! तत्पश्चात् पाँच पल सुवर्ण की ब्राह्मण की मूर्ति बनवायें, उसे वस्त्र और रत्नों से विभूषित करें ॥ १४ ॥
ततो निर्माय प्रतिमां पूजयित्वा यथाविधि ।
मन्त्रेणानेन देवेशि पाद्यं गन्धादिकं पृथक् ॥ १५ ॥
भा० टी० - इसप्रकार की मूर्ति बनाकर पश्चात् विधि-विधानपूर्वक से इस मंत्र से पाद्यगन्ध आदि पृथक्पृथक् विधि- विधान से पूजन करें ॥ १५ ॥
वासुदेव जगन्नाथ शरणागतवत्सल! ब्रह्महत्या कृता पूर्वं तत्सर्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ १६ ॥
भा० टी० — हे वासुदेव! हे जगन्नाथ! हे शरणागतवत्सल!!! ( मैंने ) पूर्वजन्म में जो ब्रह्म - हत्या की थी, उस मेरे अपराध को क्षमा करो ॥ १६ ॥
वल्मीकमृत्तिकां गृह्य वेदीं वै कारयेत्ततः ।
तन्मध्ये सर्वतोभद्रं रचितं दिव्यमण्डले ॥ १७ ॥
भा० टी ० — तदनन्तर दीमक के ढेर की मृत्तिका को ग्रहण कर उस मिट्टी की वेदी बनाकर वहाँ दिव्य मंडल में सर्वतोभद्र बनायें ॥ १७ ॥
तन्मध्ये प्रतिमां स्थाप्य ततो पूजां तु कारयेत् ।
ॐ वासुदेवाय नमः । ॐ जगन्नाथाय नमः ।
ॐ विष्णवे नमः । ॐ शार्ङ्गिणे नमः ॥
आचार्यं च ततो नत्वा शिवविष्णस्वरूपिणम्॥ १८ ॥
भा० टी० – वहाँ उस मूर्ति को स्थापित करके पूजा करें ॥ ॐ वासुदेवाय नमः १, ॐ जगन्नाथाय नमः२, ॐ विष्णवे नमः ३, ॐ शार्ङ्गिणे नमः ४ ॥ तत्पश्चात् शिव- विष्णु रूपी आचार्य को नमस्कार करें ॥ १८ ॥
प्रभोजयेत्ततो विप्रान्दक्षिणां दापयेत्ततः ।
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कर्मविपाकसंहिता ३६५
ततो विसर्जनं कुर्याद्वाचकं प्रणिपत्य च ।
एवं कृते वरारोहे शीघ्रं पुत्रः प्रजायते ॥ २० ॥
भा० टी० - ब्राह्मणों को भोजन करवाकर शक्ति के अनुसार दक्षिणा दें । फिर वाचक अर्थात् उपदेश देने वाले गुरु को प्रणाम करके विसर्जन करें । हे वरारोहे! इसप्रकार करने से शीघ्र ही पुत्र उत्पन्न होता है ॥ २० ॥
काकवन्ध्या लभेत्पुत्रं सर्वव्याधिप्रणाशनम् ।
मृतवत्सा च या नारी जीवत्पुत्रा च जायते ॥ २१ ॥
भा० टी० – काकवंध्या स्त्री भी पुत्र को जन्म देती है और उसकी संपूर्ण व्याधियाँ नष्ट होती हैं और जिस स्त्री की संतान नहीं जीती है, उसके पुत्र जीते हैं ॥ २१ ॥
यः पठेच्छृणुयाद्वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
अतः परतरं नास्ति सत्यं सत्यं वरानने॥ २२ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादेरेवतीनक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकादशोत्तरशततमोऽध्यायः ॥ १११ ॥
इतिश्रीब्रह्माण्डपुराणेपितृकाव्योत्तरे सनत्कुमारमार्कण्डेयप्रश्ने नारदाम्बरीषप्रत्युत्तरे कर्मविपाकसंहितायां अश्विन्यादिनक्षत्रचरणगतप्रायश्चित्तंसमाप्तम् ॥ भा० टी० — जो इस कर्मविपाकसंहिता नामक ग्रन्थ को पढ़े अथवा सुने वह भी सब पापों से छूट जाता है, इससे परे अधिक कुछ भी पुण्य नहीं है । हे वरानने! यह सत्य है और यही सत्य है ॥ २२ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायांरेवतीनक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनंनाम एकादशोत्तरशततमोऽध्यायः ॥ १११ ॥
इति श्रीवेरीनिवासि - गौडवंशोद्भवद्विजशालग्रामात्मजबुधवसतिरामाऽ-नुवादितभाषाटीकायां ब्रह्माण्डपुराणे पितृकाव्योत्तरे सनत्कुमारमार्ककण्डेयप्रश्ने नारदाम्बरीषप्रत्युत्तरे कर्मविपाकसंहितायां अश्विन्यादिचरणगतप्रायश्चित्तं समाप्तम्॥
नन्दाऽब्ध्यङ्कमहीवर्षे माधवस्य सिते दले ।
विष्णुतिथ्यां च टीकेयं सूर्याह्नि पूर्णतामगात् ॥
भा० टी० - विक्रम संवत् के उन्नीस सौ तैतालीसवें वर्ष में वैशाख महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के दिन रविवार को कर्मविपाकसंहिता की भाषा टीका सम्पूर्ण श्रीरमारमणचरणकृपया शम्भवतुतराम्वाचकानाम् । समाप्तेयं भाषाटीकायुता कर्मविपाकसंहिता