कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 361–370

कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 361–370

पृष्ठ 361

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॥१०८ ॥

रेवतीनक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥ मगधे विषये देवि लुब्धको वसति प्रिये! प्रत्यहं मृगमांसेन व्ययं कुर्याद्दिने दिने ॥ १ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! मगध देश में एक लुब्धक रहता था, हे प्रिये! वह प्रतिदिन मृगों के मांस को बेच कर अपना अपना खर्च चलाता था ॥१ ॥

एवं सर्वं वयो जातं वृद्धे सति वरानने!।

मरणं तस्य वै यातं यमदूतैर्यमाज्ञया ॥ २ ॥

भा० टी ० – इसप्रकार उसकी संपूर्ण अवस्था व्यतीत हो गयी, जब वृद्ध अवस्था हुई, तब हे वरानने! उसकी मृत्यु हो गयी फिर यम के दूतों ने यम की आज्ञा से ॥२ ॥

निक्षिप्तो नरके घोरे षष्टिवर्षसहस्रकम् ।

भुक्तं विविधजं दुःखं कृमिसूचीमुखैर्युतम्॥ ३ ॥

भा० टी० - उसे साठ हजार वर्षों तक घोर नरक में डाला, वहाँ अनेक प्रकार के उसने दुःख सूचीमुख आदि कृमियों के द्वारा पीडित हो कर भोगा ॥ ३ ॥

नरकान्निःसृतो देवि मृगत्वं जायते खलु ।

शृगालस्य ततो योनिं छागयोनिस्ततोऽभवत् ॥ ४ ॥

भा० टी० - हे देवि! नरक से निकलने के पश्चात् वह मृगयोनि को प्राप्त हुआ पश्चात् गीदड़ की योनि को प्राप्त हुआ, फिर बकरे की योनि को प्राप्त हुआ ॥ ४ ॥

मानुषत्वं ततो जातं धनधान्यसमन्वितम् ।

पूर्वजन्मनि देवेशि जलदानं च कृतम्॥५ ॥

भा० टी० - उसके वह अनन्तर मनुष्य योनि में उत्पन्न हुआ है । वह धनधान्य से युक्त है । हे देवेशि! इसने पूर्वजन्म में जलदान किया था ॥५ ॥

धनाढ्यत्वं पुनर्जातो ह्यपुत्रो मृगताडनात् ।

पुत्राश्च बहवो जाता मरणं तेषु जायते ॥ ६ ॥

भा० टी० - उसने पूर्वजन्म में जलदान किया था इसलिये धनाढ्य है और इसने

पृष्ठ 362

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३५४ कर्मविपाकसंहिता पूर्वजन्म में मृगों की हत्या की थी, इससे पुत्र -रहित है । उसके बहुत से पुत्र हुए परंतु उनकी मृत्यु हो जाती है ॥ ६ ॥

रोगाणां च तथोत्पत्तिर्ज्वरश्चैव पुनः पुनः ।

शान्तिं शृणु वरारोहे पूर्वपापप्रणाशिनीम्॥ ७ ॥

भा० टी० - उसके शरीर में रोगों की उत्पत्ति तथा उसे बार - बार ज्वर होता है । है वरारोहे! पूर्वपाप को नष्ट करने वाली इसकी शान्ति को सुन ॥ ७ ॥

गृहवित्तषडंशेन पुण्यकार्यं च कारयेत् ।

गायत्र्या वा शिवायेति जातवेदेति वै पुनः ॥ ८ ॥

दशायुतजपं कुर्याद्दशांशं हवनं ततः ।

दशांशं तर्पणं देवि मार्जनं तद्दशांशतः ॥ ९ ॥

भा० टी ० – घर के धन में से छठे भाग को पुण्य के कार्य में खर्च करें, गायत्री अथवा “" ॐ नमः शिवाय " वा " जातवेदसे " इन मन्त्रों का एक लाख तक जप करायें, उसका दशांश हवन, उसका दशांश तर्पण, तद्दशांश मार्जन करायें ॥ ८ ॥ ९ ॥

ततो वै भोजयेद्भक्त्या द्विजान् देवि दशांशतः ।

दशवर्णां ततो दद्याद्वृषभं भूषितं शुभम् ॥ १० ॥

भा० टी० - हे देवि! तत्पश्चात् मार्जन का दशांश संख्याप्रमाण से ब्राह्मणों को भोजन करवायें तदनन्तर दश प्रकार के वर्णों वाली गायों का दान करें और विभूषित किये हुए उत्तम एक बैल का दान करें ॥ १० ॥

पलपञ्चसुवर्णस्य माल्यं मेरुयुतं तु वै ।

ब्राह्मणाय ततो दद्याच्छय्यादानमनन्तरम्॥ ११ ॥

भा० टी० – पाँच पल सुवर्ण की माला सुमेरु से युक्त कर के बनवायें । फिर उसे ब्राह्मण को दान कर दें तदनन्तर शय्या का दान करें ॥ ११ ॥

एवं कृते वरारोहे पुत्रः खलु प्रजायते ।

व्याधयः संक्षयं यान्ति काकवन्ध्या लभेत्सुतम्॥ १२ ॥

इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे रेवतीनक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नामाऽष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥

भा० टी० — हे वरारोहे! इसप्रकार से शान्तिकर्म करने से निश्चय ही पुत्र की प्राप्ति होती है और संपूर्ण व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं तथा काकवन्ध्या स्त्री भी पुत्र को प्राप्त करती है ॥ १२ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे रेवतीन० प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नामष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥

पृष्ठ 363

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॥१० ९ ॥ रेवतीनक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

श्रीपुरे नगरे देवि द्विज एकोऽवसत्पुरा ।

पुत्रपौत्रयुतो देवि धनधान्यसमन्वितः ॥ १ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! प्राचीन समय में श्रीपुर नगर में एक ब्राह्मण रहता था, वह पुत्र पौत्र तथा धन- धान्य से युक्त था ॥ १ ॥

वैश्यकर्मरतो नित्यं क्रयविक्रयतत्परः ।

महिषीं वृषभं वस्त्रं चामरं गजवाजिनौ ॥ २ ॥

भा० टी० - वह प्रतिदिन वैश्य के कर्म में रत रहता था और खरीदने - बेचने का व्यवहार करता था । भैंस, बैल, वस्त्र, चमर, हाथी, अश्व- इनको बेचा करता था ॥२ ॥

प्रत्यहं विक्रयं कृत्वा कृतश्च धनसंग्रहः ।

एकदा तस्य वै गेहे गुरुपुत्रः समागतः ॥ ३ ॥

भा० टी० - उसने प्रत्येक दिन इनको बेच -बेच कर धन-संग्रह किया । एक समय उसके घर में गुरु का पुत्र आया ॥ ३ ॥

आदरं बहुधा कृत्वा मासे याते ततः शिवे! गमनं च हरिद्वारे स्नानार्थं कृतवांस्तथा ॥ ४ ॥

भा० टी० - तब उसने गुरुपुत्र का बहुत आदर किया । हे शिवे! एक महीना व्यतीत होने पर तब स्नान के लिए वह गुरुपुत्र हरिद्वार को चला गया ॥ ४ ॥

गुरुपुत्रेण भो देवि स्वर्णमूर्तिद्वयं तथा ।

ब्राह्मणाय तु दत्तं वै ततो वै गमनं कृतम् ॥ ५ ॥

भा० टी० — हे देवि! तब उस गुरुपुत्र ने जाते हुए दो सुवर्ण की मूर्तियाँ ब्राह्मण को सौंप दी, पश्चात् हरिद्वार को गमन किया ॥ ५ ॥

पृष्ठ 364

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३५६ कर्मविपाकसंहिता

हरिद्वारं ततो गत्वा तत्र प्राणमथोऽत्यजत् ।

मूर्तिद्वयं गुरोश्चैव विक्रीतं तद्व्ययः कृतः ॥ ६ ॥

भा० टी० – वहाँ हरिद्वार पर जाकर गुरुपुत्र ने प्राणों को त्याग दिया और उस ब्राह्मण ने गुरुपुत्र की वे दोनों मूर्तियाँ बेच कर खर्च कर दीं ॥ ६ ॥

एवं बहुगते काले मरणं ब्राह्मणस्य च ।

यमाज्ञया महादूतैर्नरके नाम कर्द्दमे ॥ ७ ॥

भा० टी० – इसप्रकार बहुत सा-काल बीत जाने पर तब ब्राह्मण की मृत्यु हो गई, तत्पश्चात् यम के दूतों ने धर्मराज की आज्ञा पाकर उसे कर्दम संज्ञक नरक में डाला ॥ ७ ॥

निक्षिप्तो वै ततो देवि षष्टिवर्षसहस्त्रकम् ।

नरकान्निःसृतो देवि व्याघ्रयोनिस्ततोऽभवत्॥ ८ ॥

भा० टी० - हे देवि! यमदूतों ने साठ हजार वर्षों तक उसे घोर नरक में पटका और तत्पश्चात् नरक की पीड़ा को भोग कर नरक से निकलकर उसे भेड़िया की योनि प्राप्त हुई ॥ ८ ॥

तीर्थे पुण्यतमे देवि कौसलायां सुरेश्वरि! बिडालस्य ततो योनिं मानुषत्वं ततोऽभवत् ॥ ९ ॥

भा० टी० — हे सुरेश्वरि! पवित्र तीर्थ पर कौशलापुरी में बिलाव की योनि को प्राप्त हो कर वर्तमान में मनुष्य- योनि को प्राप्त हो गया है ॥ ९ ॥

ब्राह्मणस्य कुले जन्म ज्ञानवान् प्रियदर्शनः ।

देवताराधने प्रीतिः परस्त्रीलम्पटस्तथा ॥ १० ॥

भा० टी००- ब्राह्मण के कुल में उसका जन्म हुआ है । वह ज्ञानवान् तथा प्रियदर्शन अथात् सुन्दर है । देवता के आराधन करने में प्रीति रखने वाला साथ ही पराई स्त्रियों के साथ रमण करने वाला है ॥ १० ॥

तस्यापत्यत्रयं देवि कन्यका पुत्रकौ तथा ।

तेषां वै मरणं जातं पुनः पुत्रो न जायते ॥ ११ ॥

भा० टी० — हे देवि! उसकी तीन संतान हुई, एक कन्या, दो पुत्र । उन की मृत्यु हो गई है । फिर उसकी स्त्री के गर्भ से पुत्र का जन्म नहीं हुआ ॥ ११ ॥

पृष्ठ 365

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कर्मविपाकसंहिता ३५७

काकवन्ध्या भवेद्भार्या गौराङ्गी सुन्दरी तु सा ।

तन्वङ्गी दीर्घकेशी च स्वपतौ प्रियभाषिणी ॥ १२ ॥

भा० टी० - गौर वर्ण वाली सुन्दर रूपवती उसकी स्त्री काकवंन्ध्या हो गयी है । जबकि वह सूक्ष्म अंगवाली अर्थात् दुबली - पतली, बड़े केशों वाली तथा अपने पति से प्रिय बोलने वाली है ॥ १२ ॥

तस्य पापक्षयं वक्ष्ये पुनः पुत्रो यतो भवेत् ।

हरिवंशश्रुतिं कुर्याद्गोपालस्य तु कीर्तनम् ॥ १३ ॥

भा० टी० – अब उसके पूर्व जन्म के पापों को नष्ट होनें की विधि कहता हूँ, जिससे कि पुत्र उत्पन्न हो, हरिवंश पुराण को सुनें और गोपाल ( कृष्ण भगवान्) का कीर्त्तन करें ॥ १३ ॥

वंशगोपालमन्त्रस्य गायत्रीमन्त्रकस्य च ।

लक्षद्वयं वरारोहे जपं वै कारयेत्सुधीः ॥ १४ ॥

भा० टी० — हे वरारोहे! बुद्धिमान् जन संतान गोपाल मंत्र और गायत्री मंत्र -इनका दो लाख तक जप करायें ॥ १४ ॥

हवनं तद्दशांशेन तर्पणं मार्जनं तथा ।

तुलसीवाटिकां कृत्वा तन्मूले विष्णुपूजनम् ॥ १५ ॥

भा० टी० - जप का दशांश हवन, और उसके दशांश का तर्पण तथा मार्जन करवायें, तुलसी की वाटिका बनाकर उसके मूल में विष्णु भगवान् का यथाविधि पूजन करें ॥ १५ ॥

दशवर्णगवां दानं शय्यादानं विशेषतः ।

ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाच्छतसंख्याद्विजोत्तमान्॥ १६ ॥

भा० टी० - दश प्रकार के वर्णों वाली गायों का दान करें । विशेष करके शय्या-दान करें । तत्पश्चात् सौ उत्तम वेदपाठी ब्राह्मणों को भोजन करवायें ॥ १६ ॥

विष्णोश्च प्रतिमां कृत्वा सौवर्णी दशभिः पलैः ।

पूजयित्वा विधानेन ब्राह्मणाय प्रदापयेत् ॥ १७ ॥

भा० टी० - ब्राह्मणों को भोजन करवाने के पश्चात् दश पल प्रमाण वाली सुवर्ण की विष्णु भगवान् की मूर्ति बनवा कर विधि-विधान से पूजन कर उस मूर्ति को श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मण को दान कर दें ॥ १७ ॥

पृष्ठ 366

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३५८ कर्मविपाकसंहिता एवं कृते न संदेहो वंशो भवति नान्यथा ॥ १८ ॥

इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे रेवतीनक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम नवाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १० ९ ॥ भा० टी० - इसप्रकार से विधि-विधानपूर्वक शान्तिकर्म करने से वंश बढ़ता है, इसमें किसीप्रकार का सन्देह नहीं है ॥ १८ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे रेवतीनक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम नवाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १० ९ ॥

पृष्ठ 367

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॥११० ॥

रेवतीनक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

माणिक्ये च पुरे देवि वसन्ति बहवो जनाः ।

लवणकृद्वसत्येको प्रत्यहं लवणं कृतम्॥ १ ॥

भा० टी० -शिवजी कहते हैं - दे देवि! माणिक्यपुर में बहुत से जन निवास करते हैं । वहाँ कोई लवणकार रहता था । वह प्रतिदिन लवण ( नमक ) बनाया करता था ॥ १ ॥

लवणं विक्रयेन्नित्यं व्ययं कृत्वा दिने दिने ।

तस्य मित्रं द्विजः कश्चिदागतस्तस्य वै गृहे ॥ २ ॥

भा० टी० - प्रतिदिन वह नमक को ही बेचा करता था, उसी से अपना खर्च चलाता था, उसके घर में कोई ब्राह्मण उसका मित्र रहने आया ॥ २ ॥

धनाढ्यो रत्नसंयुक्तो तत्र वासमकारयत् ।

आदरं बहुसम्मानं कृत्वा मित्रेण वै शिवे! ॥३ ॥

भा० टी० – वह धनाढ्य और रत्नों से युक्त था, वह वहाँ वास करने लगा हे शिवे! उसके मित्र ने उसका बहुत -सा आदर सम्मान किया ॥ ३ ॥

पत्नी शूद्रस्य वै हृष्टा पुंश्चली चपला सा ।

मासमेकं वरारोहे तस्य मित्रस्य वै स्थितिः ॥ ४ ॥

भा० टी००.- उस शूद्र की स्त्री हृष्ट- पुष्ट थी और व्यभिचारिणी भी थी तथा चपला थी । हे वरारोहे! उस शूद्र के मित्र ने एक महीने तक उसके यहाँ निवास किया ॥४ ॥

मित्रपल्या विषं दत्तं ब्राह्मणाय तदा शिवे! ब्राह्मणेन च न ज्ञातं भोजनाऽभ्यन्तरे तथा ॥ ५ ॥

भा० टी० - तब उस मित्र की स्त्री ने उस ब्राह्मण को विष दे दिया, भोजन के अंदर दिया हुए विष का ब्राह्मण को ज्ञान नहीं हुआ ॥ ५ ॥

ब्राह्मणस्याभवन्मृत्युरर्द्धरात्रे गते सति ।

नद्यां शवं ततस्त्यक्त्वा समगृह्णाच्च तद्धनम्॥ ६ ॥

पृष्ठ 368

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३६० कर्मविपाकसंहिता भा० टी० — तदनन्तर आधी रात्रि व्यतीत हो गई, तब उस ब्राह्मण की मृत्यु हो गई, फिर उन्होंने उस शव को नदी में पटक कर उसका सब धन ग्रहण किया ॥ ६ ॥

ब्राह्मणार्थं च संगृह्य कृतं व्ययमहर्निशम् ।

भार्यया सह पुत्राभ्यां भुक्त्वा द्रव्यं वरानने! ॥ ७ ॥

भा० टी० — हे वरानने! ब्राह्मण के धन को ग्रहण के बाद स्त्री पुत्र - सहित उसने खर्च किया और संपूर्ण धन को भोगा ॥ ७ ॥

ततो वृद्धे च वयसि मरणं समजायत ।

पश्चान्मृता तु सा भार्या कुलटा व्यभिचारिणी ॥८ ॥

भा० टी० – वृद्ध अवस्था होने पर तब उसकी मृत्यु हो गई, पश्चात् वह कुलटा व्यभिचारिणी उसकी स्त्री भी मर गई ॥ ८ ॥

यमदूतैर्महाघोरे नरके पङ्कसंज्ञके ।

कुम्भीपाके तदा देवि निक्षिप्तश्च यमाज्ञया ॥ ९ ॥

भा० टी० — हे देवी! पंक-संज्ञक महाघोर नरक में और कुंभीपाक में नरक धर्मराज की आज्ञा पाकर यम के दूतों ने उसे पटका॥९॥

युगमेकं विशालाक्षि भुक्त्वा नरकयातनाम् ।

नरकान्निःसृतो देवि सूकरत्वं प्रजायते ॥ १० ॥

भा० टी० — हे विशालाक्षि! एक युग पर्यंत वह नरक की पीड़ा को भोग कर, नरक से निकलकर शूकर की योनि को प्राप्त हुआ ॥ १० ॥

पुनः काकस्य वै योनिं बिडालत्वं ततोऽभवत् ।

मानुषत्वं ततो देवि देशे शुभ्रे तदाऽभवत् ॥ ११ ॥

भा० टी० - पश्चात् काग की योनि को प्राप्त हुआ, तदनन्तर बिलाव की योनि उसे प्राप्त हुई, हे देवि! बाद में शुद्ध देश में मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ है ॥ ११ ॥

पूर्वजन्मनि देवेशि कुरुक्षेत्रे यतो मृतः ।

अतो धनं भवेत्तस्य नाऽपत्यं द्विजहत्यया ॥ १२ ॥

भा० टी० - हे देवेशि! वह पूर्वजन्म में कुरुक्षेत्र में मृत्यु को प्राप्त हुआ था, इसलिये उसके पास धन तो है, परंतु ब्राह्मण की हत्या करने से उसकी संतान नहीं है ॥१२ ॥

शरीरे जायते व्याधिर्भार्या तस्य मृतप्रजा ।

अस्य पापस्य शमनीं शान्तिं शृणु वरानने! ॥ १३ ॥

पृष्ठ 369

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कर्मविपाकसंहिता ३६१ भा० टी० - इसके शरीर में व्याधि रहती है, स्त्री के संतान नहीं जीती है, हे वरानने! अब इसके पूर्वजन्म के पापों को शमन करने वाली शांति को सुनो ॥ १३ ॥

गृहवित्ताष्टमं भागं ब्राह्मणाय समर्पयेत् ।

हवनं कारयेद्देवि कुण्डे योनिसुशोभिते ॥ १४ ॥

भा० टी० - घर के वित्त में से आठवें भाग को ब्राह्मण को समर्पित करें । हे देवि! योनि से शोभित हुये सुंदर कुंड में हवन करें ॥ १४ ॥

चतुरस्त्रे वरारोहे दशांशविधिपूर्वकम् ।

तर्पणं तद्दशांशेन तद्दशांशेन मार्जनम् ॥ १५ ॥

भा० टी० — हे वरारोहे! चौकोर कुण्ड में विधिपूर्वक दशांश हवन करें, उसका दशांश तर्पण, तद्दशांश मार्जन करें ॥ १५ ॥

गां सवत्सां ततो दद्यात्स्वर्णरत्नविभूषिताम् ।

ब्राह्मणान् भोजयेत्पश्चात्कूष्माण्डं प्रददेत्सुधीः ॥ १६ ॥

भा० टी० - पश्चात् बच्चे से युक्त और सोने तथा रत्नों से विभूषित की हुई गाय का दान करें और तदनन्तर ब्राह्मणों को भोजन करायें बुद्धिमान् पुरुष विधिपूर्वक पेठे का दान करें ॥ १६ ॥

एवं कृते वरारोहे पुत्रो भवति नान्यथा ॥ १७ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे रेवतीनक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥

भा० टी० – इसप्रकार से करने पर पुत्र होता है, हे वरारोहे! यह अन्यथा नहीं है ॥ १७ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे रेवतीनक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥

पृष्ठ 370

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॥ १११ ॥

रेवतीनक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥ अलर्कस्य पुरे देवि क्षत्रियो वसति प्रिये! चन्द्रवर्मेति विख्यातः पत्नी देवी ततोऽभवत् ॥ १ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! हे प्रिये! अलर्कपुरी में एक क्षत्रिय निवास करता था, वह चन्द्रवर्मा नाम से विख्यात था और उसकी स्त्री देवी नाम से विख्यात थी ॥१ ॥

क्षत्रधर्मरतो नित्यं धनाढ्यः शूरसंमतः ।

कृष्णदास इति ख्यातो विप्रस्तस्य पुरोहितः ॥ २ ॥

भा० टी ० — वह प्रतिदिन क्षत्रिय के धर्म में तत्पर रहता था, धनाढ्य और शूर वीर था । कृष्णदास नाम से प्रसिद्ध एक ब्राह्मण उसका पुरोहित था ॥ २ ॥

विप्राय प्रददौ भूमिं गिरिजे विग्रहे सति ।

ततो बहुदिने जाते दण्डस्तस्माच्च याचितः ॥ ३ ॥

भा० टी० - हे गिरिजे! एक समय विग्रह ( गदर ) होने के कारण उस ब्राह्मण को उसने भूमिदान दिया, फिर बहुत से दिन बीत जाने पर तब उस ब्राह्मण से उस क्षत्रिय ने दण्ड ( शुल्क ) माँगा ॥३ ॥

ब्राह्मणोऽथावदद्देवि नाहं दण्ड्यः कदाचन ।

ततो रोषपरीतात्मा क्षत्रियो ब्राह्मणं प्रति ॥ ४ ॥

भा० टी ० — हे देवि! तब ब्राह्मण बोला कि, मैं कभी दंड देने योग्य नहीं हूँ।

उसके अनन्तर क्रोध से भरे हुए क्षत्रिय ने ब्राह्मण के प्रति कहा ॥ ४ ॥

दुर्वचश्चावदद्देवि ब्राह्मणं साधुसंमतम् ।

मरणं ब्राह्मणस्यैव भूम्युद्देशेन वै शिवे! ॥ ५ ॥

भा० टी ० — उसने अपशब्द और दुर्वचन बोले । हे देवि! साधुओं से सम्मानित और प्रतिष्ठित ब्राह्मण को दुर्वचन बोले जाने से आत्मग्लानि से उस ब्राह्मण की मृत्यु हो गई ॥ ५ ॥