महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1–10

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1–10

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॥ श्रीहरिः ॥ 32 32 श्रीमन्महर्षि वेदव्यासप्रणीत महाभारत ( प्रथम खण्ड ) आदिपर्व और सभापर्व, सचित्र हिन्दी अनुवादसहित गीताप्रेसगोरखपुर GITA PRESS, GORAKHPUR SINCE 1923]] गीताप्रेस, गोरखपुर

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32 ॥ श्रीहरिः ॥ श्रीमन्महर्षि वेदव्यासप्रणीत महाभारत ( प्रथम खण्ड ) [आदिपर्व और सभापर्व] ( सचित्र, सरल हिंदी - अनुवाद ) त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥ अनुवादक-साहित्याचार्य पण्डित रामनारायणदत्त शास्त्री पाण्डेय ' राम ')

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सं० २०७२ सत्रहवाँ पुनर्मुद्रण ३,५०० कुल मुद्रण ८६,७०० प्रकाशक- गीताप्रेस, गोरखपुर – २७३००५ ( गोबिन्दभवन - कार्यालय, कोलकाता का संस्थान ) फोन: ( ०५५१ ) २३३४७२१, २३३१२५०; फैक्स: ( ०५५१ ) २३३६ ९९७

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ नम्र निवेदन महाभारत आर्य - संस्कृति तथा भारतीय सनातनधर्मका एक महान् ग्रन्थ तथा अमूल्य रत्नोंका अपार भण्डार है । भगवान् वेदव्यास स्वयं कहते हैं कि ' इस महाभारतमें मैंने वेदोंके रहस्य और विस्तार, उपनिषदोंके सम्पूर्ण सार, इतिहास-पुराणोंके उन्मेष और निमेष, चातुर्वर्ण्यके विधान, पुराणोंके आशय, ग्रह - नक्षत्र- तारा आदिके परिमाण, न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, दान, पाशुपत ( अन्तर्यामीकी महिमा ), तीर्थों, पुण्य देशों, नदियों, पर्वतों, वनों तथा समुद्रोंका भी वर्णन किया गया है । अतएव महाभारत महाकाव्य है, गूढ़ार्थमय ज्ञान- विज्ञान - शास्त्र है, धर्मग्रन्थ है, राजनीतिक दर्शन है, कर्मयोग- दर्शन है, भक्ति-शास्त्र है, अध्यात्म- शास्त्र है, आर्यजातिका इतिहास है और सर्वार्थसाधक तथा सर्वशास्त्रसंग्रह है । सबसे अधिक महत्त्वकी बात तो यह है कि इसमें एक, अद्वितीय, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वलोकमहेश्वर गुणगणसम्पन्न स्थिति-,, परमयोगेश्वर, अचिन्त्यानन्त, -,, सृष्टि--,प्रलयकारी विचित्र लीलाविहारी भक्त भक्तिमान् भक्त सर्वस्वनिखिलरसामृतसिन्धु, अनन्त प्रेमाधार, प्रेमघनविग्रह, सच्चिदानन्दघन, वासुदेव भगवान् श्रीकृष्णके गुण - गौरवका मधुर गान है । इसकी महिमा अपार है । औपनिषद ऋषिने भी इतिहास - पुराणको पंचम वेद बताकर महाभारतकी सर्वोपरि महत्ता स्वीकार की है । इस महाभारतके हिन्दीमें कई अनुवाद इससे पहले प्रकाशित हो चुके हैं, परन्तु इस समय मूल संस्कृत तथा हिन्दी - अनुवादसहित सम्पूर्ण ग्रन्थ शायद उपलब्ध नहीं है । इसे गीताप्रेसने संवत् १ ९९९ में प्रकाशित किया था, किन्तु परिस्थिति एवं साधनोंके अभावमें पाठकोंकी सेवामें नहीं दिया जा सका । भगवत्कृपासे इसे पुनर्मुद्रित करनेका सुअवसर अब प्राप्त हुआ है । इस महाभारतमें मुख्यतः नीलकण्ठीके अनुसार पाठ लिया गया है । साथ ही दाक्षिणात्य पाठके उपयोगी अंशोंको सम्मिलित किया गया है और इसीके अनुसार बीच - बीचमें उसके श्लोक अर्थसहित दे दिये गये हैं पर उन श्लोकोंकी श्लोक संख्या तो मूलमें दी गयी है, न अर्थमें ही । अध्यायके अन्तमें दाक्षिणात्य पाठके श्लोकोंकी संख्या अलग बताकर उक्त अध्यायकी पूर्ण श्लोक संख्या बता दी गयी है और इसी प्रकार पर्वके अन्तमें लिये हुए दाक्षिणात्य अधिक पाठके श्लोकोंकी संख्या अलग-अलग बताकर उस पर्वकी पूर्ण श्लोक संख्या भी दे दी गयी है । इसके अतिरिक्त महाभारतके पूर्वप्रकाशित अन्यान्य संस्करणों तथा पूनाके संस्करणसे भी पाठ-

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निर्णयमें सहायता ली गयी है और अच्छा प्रतीत होनेपर उनके मूलपाठ या पाठान्तरको भी ग्रहण किया गया है । इस संस्करणमें कुल श्लोक- संख्या १००२१७ है । इसमें उत्तर भारतीय पाठकी ८६६००, दाक्षिणात्य पाठकी ६५८४ तथा 'उवाच ’ की संख्या ७०३२ है । इस विशाल ग्रन्थके हिन्दी - अनुवादका प्रायः सारा कार्य गीताप्रेसके प्रसिद्ध तथा सिद्धहस्त भाषान्तरकार संस्कृत - हिन्दी दोनों भाषाओंके सफल लेखक तथा कवि, परम विद्वान् पण्डितप्रवर श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्री महोदयने किया है । इसीसे अनुवादकी भाषा सरल होनेके साथ ही इतनी सुमधुर हो सकी है । दार्शनिक वयोवृद्ध विद्वान् डॉ० श्रीभगवानदासजीने इस अनुवादकी भूरि- भूरि प्रशंसा की थी । आदिपर्व तथा कुछ अन्य पर्वोंके कुछ अनुवादको हमारे परम आदरणीय विद्वान् स्वामीजी श्रीअखण्डानन्दजी महाराजने भी कृपापूर्वक देखा है; इसके लिये हम उनके कृतज्ञ हैं । इसके अतिरिक्त, पाठनिर्णय तथा अनुवाद देखनेका सारा कार्य हमारे -परमश्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दकाने समय समयपर स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी, श्रीहरिकृष्णदासजी गोयन्दका, श्रीघनश्यामदासजी जालान, श्रीवासुदेवजी काबरा आदिको साथ रखकर किया है । श्रीगोयन्दकाजी तथा इन महानुभावोंने इतनी लगनके साथ बहुत लम्बा समय नियमितरूपसे देकर काम न किया होता तो इस विशाल ग्रन्थका प्रकाशन होना सम्भव नहीं था । इस प्रकार भगवत्कृपासे यह महान् कार्य ६ खण्डोंमें पूरा हुआ है । आशा है, भारतीय जनता इससे लाभ उठाकर धार्मिक जीवनयापन एवं अपने जीवनको सफल बनानेमें सक्षम होगी । विनीत- प्रकाशक

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॥ श्रीहरिः ॥ विषय -सूची (आदिपर्व ) अध्याय विषय (अनुक्रमणिकापर्व ). 3- ग्रन्थका उपक्रम, ग्रन्थमें कहे हुए अधिकांश विषयोंकी संक्षिप्त सूची तथा इसके पाठकी महिमा ( पर्वसंग्रहपर्व ) २- समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल (पौष्यपर्व ) ३- जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण, आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना (पौलोमपर्व ). ४- कथा प्रवेश ५- भृगुके आश्रमपर पुलोमा दानवका आगमन और उसकी अग्निदेवके साथ बातचीत ६- म॒हर्षि च्यवनका जन्म, उनके तेजसे पुलोमा राक्षसका भस्म होना तथा भृगुका अग्निदेवको शाप देना ७- शापसे कुपित हुए अग्निदेवका अदृश्य होना और ब्रह्माजीका उनके शापको संकुचित करके उन्हें प्रसन्न करना ८- प्रमद्वराका जन्म, रुरुके साथ उसका वाग्दान तथा विवाहके पहले ही साँपके काटनेसे प्रमद्वराकी मृत्यु ९- रुरुकी आधी आयुसे प्रमद्वराका जीवित होना, रुरुके साथ उसका विवाह, रुरुका सर्पोंको मारनेका निश्चय तथा रुरु-डुण्डुभ- संवाद १०- रुरु मुनि और डुण्डुभका संवाद ११- डुण्डुभकी आत्मकथा तथा उसके द्वारा रुरुको अहिंसाका उपदेश १२- जनमेजयके सर्पसत्रके विषयमें रुरुकी जिज्ञासा और पिताद्वारा उसकी पूर्ति

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(आस्तीकपर्व ) १३- जरत्कारुका अपने पितरोंके अनुरोधसे विवाहके लिये उद्यत होना १४- जरत्कारुद्वारा वासुकिकी बहिनका पाणिग्रहण १५- आस्तीकका जन्म तथा मातृशापसे सर्पसत्रमें नष्ट होनेवाले नागवंशकी उनके द्वारा रक्षा १६- कद्रू और विनताको कश्यपजीके वरदानसे अभीष्ट पुत्रोंकी प्राप्ति १७- मेरुपर्वतपर अमृतके लिये विचार करनेवाले देवताओंको भगवान् नारायणका समुद्र मन्थनके लिये आदेश १८- दे॒वताओं और दैत्योंद्वारा अमृतके लिये समुद्रका मन्थन, अनेक रत्नोंके साथ अमृतकी उत्पत्ति और भगवान्‌का मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंके हाथसे अमृत ले लेना १९- देवताओंका अमृतपान, देवासुरसंग्राम तथा देवताओंकी विजय २०- कद्रू और विनताकी होड़, कद्रूद्वारा अपने पुत्रोंको शाप एवं ब्रह्माजीद्वारा उसका अनुमोदन २१- समुद्रका विस्तारसे वर्णन २२- नागोंद्वारा उच्चैःश्रवाकी पूँछको काली बनाना; कद्रू और विनताका समुद्रको देखते हुए आगे बढ़ना २३- पराजित विनताका कद्रूकी दासी होना, गरुडकी उत्पत्ति तथा देवताओंद्वारा उनकी स्तुति २४- गरुडके द्वारा अपने तेज और शरीरका संकोच तथा सूर्यके क्रोधजनित तीव्र तेजकी शान्तिके लिये अरुणका उनके रथपर स्थित होना २५- सूर्यके तापसे मूर्च्छित हुए सर्पोंकी रक्षाके लिये कद्रद्वारा इन्द्रदेवकी स्तुति २६- इन्द्रद्वारा की हुई वर्षासे सर्पोंकी प्रसन्नता २७- रामणीयक द्वीपके मनोरम वनका वर्णन तथा गरुडका दास्यभावसे छूटनेके लिये सर्पोंसे उपाय पूछना २८- गरुडका अमृतके लिये जाना और अपनी माताकी आज्ञाके अनुसार निषादोंका भक्षण करना २९- कश्यपजीका गरुडको हाथी और कछुएके पूर्वजन्मकी कथा सुनाना, गरुडका उन दोनोंको पकड़कर एक दिव्य वटवृक्षकी शाखापर ले जाना और उस शाखाका टूटना ३०- गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना

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३१- इन्द्रके द्वारा वालखिल्योंका अपमान और उनकी तपस्याके प्रभावसे अरुण एवं गरुडकी उत्पत्ति ३२- गरुडका देवताओंके साथ युद्ध और देवताओंकी पराजय ३३- गरुडका अमृत लेकर लौटना, मार्गमें भगवान् विष्णुसे वर पाना एवं उनपर इन्द्रके द्वारा वज्र प्रहार ३४- इन्द्र और गरुडकी मित्रता, गरुडका अमृत लेकर नागोंके पास आना और विनताको दासीभावसे छुड़ाना तथा इन्द्रद्वारा अमृतका अपहरण ३५- मुख्य- मुख्य नागोंके नाम ३६- शेषनागकी तपस्या, ब्रह्माजीसे वर-प्राप्ति तथा पृथ्वीको सिरपर धारण करना ३७- माताके शापसे बचनेके लिये वासुकि आदि नागोंका परस्पर परामर्श ३८- वासुकिकी बहिन जरत्कारुका जरत्कारु मुनिके साथ विवाह करनेका निश्चय ३ ९- ब्रह्माजीकी आज्ञासे वासुकिका जरत्कारु मुनिके साथ अपनी बहिनको ब्याहनेके लिये प्रयत्नशील होना ४०- जरत्कारुकी तपस्या, राजा परीक्षितका उपाख्यान तथा राजाद्वारा मुनिके कंधेपर मृतक साँप रखनेके कारण दुःखी हुए कृशका शृंगीको उत्तेजित करना ४१- शृंगी ऋषिका राजा परीक्षित‌को शाप देना और शमीकका अपने पुत्रको शान्त करते हुए शापको अनुचित बताना ४२- शमीकका अपने पुत्रको समझाना और गौरमुखको राजा परीक्षित्के पास भेजना, राजाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था तथा तक्षक नाग और काश्यपकी बातचीत ४३- तक्षकका धन देकर काश्यपको लौटा देना और छलसे राजा परीक्षित्के समीप पहुँचकर उन्हें डँसना ४४- जनमेजयका राज्याभिषेक और विवाह ४५: जरत्कारुको अपने पितरोंका दर्शन और उनसे वार्तालाप ४६- जरत्कारुका शर्तके साथ विवाहके लिये उद्यत होना और नागराज वासुकिका जरत्कारु नामकी कन्याको लेकर आना ४७- जरत्कारु मुनिका नागकन्याके साथ विवाह, नागकन्या जरत्कारुद्वारा पतिसेवा तथा पतिका उसे त्यागकर तपस्याके लिये गमन ४८- वासुकि नागकी चिन्ता, बहिनद्वारा उसका निवारण तथा आस्तीकका जन्म एवं विद्याध्ययन ४ ९- राजा परीक्षित्के धर्ममय आचार तथा उत्तम गुणोंका वर्णन, राजाका शिकारके लिये जाना और उनके द्वारा शमीक मुनिका तिरस्कार ५०- शृंगी ऋषिका परीक्षितको शाप, तक्षकका काश्यपको लौटाकर छलसे परीक्षित्को हँसना और पिताकी मृत्युका वृत्तान्त सुनकर जनमेजयकी तक्षकसे बदला लेनेकी

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प्रतिज्ञा ५१- जनमेजयके सर्पयज्ञका उपक्रम ५२- सर्पसत्रका आरम्भ और उसमें सर्पोंका विनाश ५३- सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना ५४- माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना ५५- आस्तीकके द्वारा यजमान, यज्ञ, ऋत्विज्, सदस्यगण और अग्निदेवकी स्तुति- प्रशंसा ५६- राजाका आस्तीकको वर देनेके लिये तैयार होना, तक्षक नागकी व्याकुलता तथा आस्तीकका वर माँगना ५७ - सर्पयज्ञमें दग्ध हुए प्रधान-प्रधान सर्पोंके नाम ५८- यज्ञकी समाप्ति एवं आस्तीकका सर्पोंसे वर प्राप्त करना ( अंशावतरणपर्व) ५९- महाभारतका उपक्रम ६०- जनमेजयके यज्ञमें व्यासजीका आगमन, सत्कार तथा राजाकी प्रार्थनासे व्यासजीका वैशम्पायनजीसे महाभारत - कथा सुनानेके लिये कहना ६१- कौरव- पाण्डवोंमें फूट और युद्ध होनेके वृत्तान्तका सूत्ररूपमें निर्देश ६२- महाभारतकी महत्ता ६३- राजा उपरिचरका चरित्र तथा सत्यवती, व्यासादि प्रमुख पात्रोंकी संक्षिप्त जन्मकथा ६४- ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्रियवंशकी उत्पत्ति और वृद्धि तथा उस समयके धार्मिक राज्यका वर्णन; असुरोंका जन्म और उनके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना तथा ब्रह्माजीका देवताओंको अपने अंशसे पृथ्वीपर जन्म लेनेका आदेश (सम्भवपर्व) ६५- मरीचि आदि महर्षियों तथा अदिति आदि दक्षकन्याओंके वंशका विवरण ६६- म॒हर्षियों तथा कश्यप - पत्नियोंकी संतान - परम्पराका वर्णन ६७- दे॒वता और दैत्य आदिके अंशावतारोंका दिग्दर्शन ६८- राजा दुष्यन्तकी अद्भुत शक्ति तथा राज्यशासनकी क्षमताका वर्णन ६९- दुष्यन्तका शिकारके लिये वनमें जाना और विविध हिंसक वन- जन्तुओंका वध करना