महाभारत — खण्ड १
Mahabharata - 1 · Gita Press, Gorakhpur · 2256 पृष्ठ · 226 खण्ड
विषय सूची
- । श्रीहरिः । 32 32 श्रीमन्महर्षि वेदव्यासप्रणीत महाभारत ( प्रथम खण्ड ) आदिपर्व और सभापर्व, सचित्र हिन्दी अनुवादसहित गीताप्रेसगोरखपुर GITA PRESS, GORAKHPUR… 1–10
- ७०- तपोवन और कण्वके आश्रमका वर्णन तथा राजा दुष्यन्तका उस आश्रममें प्रवेश ७१- राजा दुष्यन्तका शकुन्तलाके साथ वार्तालाप, शकुन्तलाके द्वारा अपने जन्मका कारण… 11–20
- २१- श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़- फोड़कर तीनोंका नगर एवं राज - भवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका… 21–30
- उग्रश्रवाजीने कहा- जो सबका आदि कारण, अन्तर्यामी और नियन्ता है, यज्ञोंमें जिसका आवाहन और जिसके उद्देश्यसे हवन किया जाता है, जिसकी अनेक पुरुषोंद्वारा अनेक… 31–40
- उग्रश्रवाजी कहते हैं - यह भारत एक वृक्ष है । इसके स्वादु, पवित्र, सरस एवं अविनाशी पुष्प तथा फल हैं - धर्म और मोक्ष… 41–50
- जब मैंने सुना कि धूर्त एवं मन्दबुद्धि दुःशासनने द्रौपदीका वस्त्र खींचा और वहाँ वस्त्रोंका इतना ढेर लग गया कि वह उसका पार न पा सका; संजय! तभीसे मुझे विजयकी… 51–60
- गीताप्रेस गोरखपुर - द्रौपदी स्वयंवर Umavel गीताप्रेस गोरखपुर प्रभासक्षेत्रमें श्रीकृष्ण और अर्जुनका मिलन गीताप्रेस गोरखपुर कृपासिंधु भगवान् श्रीकृष्ण… 61–70
- तदा नाशंसे विजयाय संजय । २०७ । संजय! जब मैंने सुना कि रणभूमिमें धर्मराज युधिष्ठिरने शूरशिरोमणि मद्रराज शल्यको मार डाला, जो सर्वदा युद्धमें घोड़े हाँकनेके… 71–80
- ग्रन्थ महत्त्व, गौरव अथवा गम्भीरतामें वेदोंसे भी अधिक सिद्ध हुआ है । २६ ९ -—२७३ । महत्त्वाद् भारवत्त्वाच्च महाभारतमुच्यते… 81–90
- इन्द्रलोकाभिगमनं पर्व ज्ञेयमतः परम् । नलोपाख्यानमपि च धार्मिकं करुणोदयम् । ५१ । तत्पश्चात् इन्द्रलोकाभिगमनपर्व है, फिर धार्मिक तथा करुणोत्पादक… 91–100
- राजसूय महायज्ञमें उपहार ले - लेकर राजाओंके आगमन तथा पहले किसकी पूजा हो इस विषयको लेकर छिड़े हुए विवादमें शिशुपालके वधका प्रसंग भी इसी सभापर्वमें आया है… 101–110
- दिया । २१२ । समस्ता यत्र पार्थेन निर्जिताः कुरवो युधि । प्रत्याहृतं गोधनं च विक्रमेण किरीटिना । २१३… 111–120
- निकट आकर उन्होंने देखा, राजा दुर्योधन युद्धके मुहानेपर इस दुर्दशामें पड़ा था । यह देखकर महारथी अश्वत्थामाको बड़ा क्रोध हुआ और उसने प्रतिज्ञा की कि ' मैं… 121–130
- मुमुदे पूजितः सर्वैः सेन्द्रैः सुरगणैः सह । एतदष्टादशं पर्व प्रोक्तं व्यासेन धीमता । ३७६ । इसके बाद धर्मराजने आकाशगंगामें गोता लगाकर मानवशरीरको त्याग दिया… 131–140
- स तथेत्युक्त्वा गा अरक्षत् । रक्षित्वा च पुनरुपाध्यायगृहमागम्योपाध्यायस्याग्रतः स्थित्वा नमश्चक्रे । ४३… 141–150
- कहा— । ९ ८ । भो उत्तङ्केतत् पुरीषमस्य ऋषभस्य भक्षयस्वेति स एवमुक्तो नैच्छत् । ९९ । 'उत्तंक! तुम इस बैलका गोबर खा लो… 151–160
- पूछनेपर उपाध्यायने उत्तर दिया— । १६५ । ये ते स्त्रियौ धाता विधाता च ये च ते कृष्णाः सितास्तन्तवस्ते रात्र्यहनी… 161–170
- आश्रमं तस्य रक्षोऽथ पुलोमाभ्याजगाम ह । १५ । भृगुवंशशिरोमणे! पुलोमा यशस्वी भृगुकी अनुकूल शील- स्वभाववाली धर्मपत्नी थी… 171–180
- क्रियाओंके प्रवर्तक भी तुम्हीं हो । अतः लोकेश्वर! तुम ऐसा करो जिससे अग्निहोत्र आदि क्रियाओंका लोप न हो… 181–190
- दशमोऽध्यायः रुरु मुनि और डुण्डुभका संवाद रुरुरुवाच मम प्राणसमा भार्या दष्टासीद् भुजगेन ह । तत्र मे समयो घोर आत्मनोरग वै कृतः । १… 191–200
- वे सब तीर्थोंमें स्नान करते हुए घूमते थे । उन महातेजस्वी मुनिने कठोर व्रतोंकी ऐसी दीक्षा लेकर यात्रा प्रारम्भ की थी, जो अजितेन्द्रिय पुरुषोंके लिये… 201–210
- उग्रश्रवाजीने कहा — ब्रह्मन्! तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् कद्रूने एक हजार और विनताने दो अण्डे दिये । १३३ । तयोरण्डानि निदधुः प्रहृष्टाः परिचारिकाः । १४… 211–220
- ज्ञातौ तदा ब्रह्मन् सर्वकामफलप्रदौ । ) श्रीः सुरा चैव सोमश्च तुरगश्च मनोजवः । यतो देवास्ततो जग्मुरादित्यपथमाश्रिताः । ३७… 221–230
- घोड़ेको देखेंगी । ५ । ततः पुत्रसहस्रं तु कद्रूर्जिह्मं चिकीर्षती । आज्ञापयामास तदा वाला भूत्वाञ्जनप्रभाः । ६ । आविशध्वं हयं क्षिप्रं दासी न स्यामहं यथा… 231–240
- गभस्तिभिर्भानुरिवावभाससे । समाक्षिपन् भानुमतः प्रभां मुहु- स्त्वमन्तकः सर्वमिदं ध्रुवाध्रुवम् । २० । आप उत्तम हैं… 241–250
- तदा भूरभवच्छन्ना जलोर्मिभिरनेकशः । रामणीयकमागच्छन् मात्रा सह भुजङ्गमाः । ८ । उस समय सारा भूतल जलकी असंख्य तरंगोंसे आच्छादित हो गया था… 251–260
- कश्यप उवाच इदं सरो महापुण्यं देवलोकेऽपि विश्रुतम् । १३ । कश्यपजी बोले- बेटा! यह महान् पुण्यदायक सरोवर है, जो देवलोकमें भी विख्यात है । १३… 261–270
- अनहोनी बात नहीं हुई थी । उस समय वज्रकी गड़गड़ाहटके साथ बड़े जोरकी आँधी उठने लगी । हजारों उल्काएँ गिरने लगीं । ३३–३५ । निरभ्रमेव चाकाशं प्रजगर्ज महास्वनम्… 271–280
- नखतुण्डक्षताश्चैव सुस्रुवुः शोणितं बहु । १५ । गरुडसे पीड़ित और दूर फेंके गये देवता इधर- उधर भागने लगे… 281–290
- इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें गरुडचरित्रविषयक चं अध्याय पूराहुआ । ३४… 291–300
- सप्तत्रिंशोऽध्यायः माताके शापसे बचनेके लिये वासुकि आदि नागोंका परस्पर परामर्श सौतिरुवाच मातुः सकाशात् तं शापं श्रुत्वा वै पन्नगोत्तमः… 301–310
- ‘ देवेश्वर! नागराज वासुकि हमारे हितैषी हैं और सदा हमलोगोंके प्रिय कार्यमें लगे रहते हैं; अतः आप इनपर कृपा करें और इनके मनमें जो चिन्ताकी आग जल रही है, उसे… 311–320
- क्षन्तव्यं पुत्र धर्मो हि हतो हन्ति न संशयः । यदि राजा न संरक्षेत् पीडा नः परमा भवेत् । २२ । शमीक बोले- वत्स! तुमने शाप देकर मेरा प्रिय कार्य नहीं किया है… 321–330
- सौतिरुवाच भस्मीभूतं ततो वृक्षं पन्नगेन्द्रस्य तेजसा । भस्म सर्वं समाहृत्य काश्यपो वाक्यमब्रवीत् । ७… 331–340
- वृद्धो भवान् महाभागो यो नः शोच्यान् सुदुःखितान् । १५ शोचते चैव कारुण्याच्छृणु ये वै वयं द्विज । यायावरा नाम वयमृषयः संशितव्रताः । १६… 341–350
- मन-ही- मन ऐसा निश्चय करके मीठे वचन बोलनेवाली नागकन्या जरत्कारुने वहाँ सोते हुए अग्निके समान तेजस्वी एवं तीव्र तपस्वी महर्षिसे मधुरवाणीमें यों कहा — ‘… 351–360
- नास्मिन् कुले जातु बभूव राजा यो न प्रजानां प्रियकृत् प्रियश्च । विशेषतः प्रेक्ष्य पितामहानां वृत्तं महद्वृत्तपरायणानाम् । १ ९… 361–370
- संजिजीवयिषु प्राप्तं राजानमपराजितम् । ५२ । जो कहीं भी परास्त न होते थे, ऐसे मेरे पिता राजा परीक्षित्को जीवित करनेकी इच्छासे द्विजश्रेष्ठ काश्यप आ पहुँचे… 371–380
- चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना सौतिरुवाच तत आहूय पुत्रं स्वं जरत्कारुर्भुजङ्गमा… 381–390
- इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रे आस्तीककृतराजस्तवे पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय । ५५… 391–400
- तक्षकस्य कुले जातान् प्रवक्ष्यामि निबोध तान् । पुच्छाण्डको मण्डलकः पिण्डसेक्ता रभेणकः । ८ । उच्छिखः शरभो भङ्गो बिल्वतेजा विरोहणः… 401–410
- षष्टितमोऽध्यायः जनमेजयके यज्ञमें व्यासजीका आगमन, सत्कार तथा राजाकी प्रार्थनासे व्यासजीका वैशम्पायनजीसे महाभारत- कथा सुनानेके लिये कहना सौतिरुवाच श्रुत्वा… 411–420
- तत्पश्चात् कुन्तीकुमार अर्जुनने खाण्डवप्रस्थमें भगवान् वासुदेवके साथ रहकर अग्निदेवको तृप्त किया… 421–430
- राजन्! जो वाचकको यह महाभारत दान करता है, उसके द्वारा समुद्रसे घिरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वीका दान सम्पन्न हो जाता है । ५०… 431–440
- विचरनेवाले महर्षि पराशरने उसे देखा । वह अतिशय रूप- सौन्दर्यसे सुशोभित थी । सिद्धोंके हृदयमें भी उसे पानेकी अभिलाषा जाग उठती थी । ६८–७०… 441–450
- ऋतावृतौ नरव्याघ्र न कामान्नानृतौ तथा । ६ । नररत्न! वे कठोर व्रतधारी ब्राह्मण केवल ऋतुकालमें ही उनके साथ मिलते थे; न तो कामवश और न बिना ऋतुकालके ही । ६… 451–460
- तथा गगनमूर्धा च वेगवान् केतुमांश्च सः । स्वर्भानुरश्वोऽश्वपतिर्वृषपर्वाजकस्तथा । २४ । अश्वग्रीवश्च सूक्ष्मश्च तुहुण्डश्च महाबलः… 461–470
- इस प्रकार आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य तथा प्रजापति और वषट्कार — ये तैंतीस मुख्य देवता हैं… 471–480
- नामसे प्रसिद्ध जो श्रेष्ठ असुर था, उसे पश्चिम अनूप देशका राजा समझो । गविष्ठ नामसे प्रसिद्ध जो महातेजस्वी असुर था, वही इस पृथ्वीपर द्रुमसेन नामक राजा हुआ… 481–490
- एवं ते कथितं राजंस्तव जन्म पितुः पितुः । १२५ । ' तथा बड़े - बड़े महारथी वीरोंका संहार कर डालेगा… 491–500
- प्रासादवरशृङ्गस्थाः परया नृपशोभया । ८ । ददृशुस्तं स्त्रियस्तत्र शूरमात्मयशस्करम् । शक्रोपमममित्रघ्नं परवारणवारणम् । ९… 501–510
- शब्दच्छन्दोनिरुक्तज्ञैः कालज्ञानविशारदैः । ४४ । द्रव्यकर्मगुणज्ञैश्च कार्यकारणवेदिभिः । पक्षिवानररुतज्ञैश्च व्यासग्रन्थसमाश्रितैः । ४५… 511–520
- हों । ४१ । वनाच्च वायुः सुरभिः प्रवायात् तस्मिन् काले तमृषिं लोभयन्त्याः तथेत्युक्त्वा विहिते चैव तस्मिं- ततो ययौ साऽऽश्रमं कौशिकस्य । ४२… 521–530
- पहलेतक स्वाधीन ब्रह्मचारिणी थी, वही उस समय अपना दोष देखनेके कारण घबरा गयी थी । शकुन्तलाको लज्जामें डूबी हुई देख महर्षि कण्वने उससे कहा… 531–540
- वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! कश्यपनन्दन कण्वने धर्मानुसार मेरे पुत्रका बड़ा आदर किया है, यह देखकर तथा उनकी ओरसे पतिके घर जानेकी आज्ञा पाकर शकुन्तला मन-… 541–550
- तस्मात् त्वं जीव मे पुत्र सुसुखी शरदां शतम् । ६४ । ' मेरा जीवन तथा अक्षय संतान- परम्परा भी तुम्हारे ही अधीन है, अतः पुत्र! तुम अत्यन्त सुखी होकर सौ… 551–560
- वैशम्पायनजी कहते हैं - भारत! इस प्रकार देवदूतके वचनसे उस बालककी शुद्धता प्रमाणित करके राजा दुष्यन्तने हर्ष और आनन्दमें मग्न हो उस समय अपने उस पुत्रको… 561–570
- उन्होंने अपनी दोनों पत्नियोंके साथ दीर्घकालतक विहार करके चैत्ररथ वनमें जाकर विश्वाची अप्सराके साथ रमण किया । ४८… 571–580
- ‘ तात! जान पड़ता है वे मार दिये गये या मर गये । मैं आपसे सच कहती हूँ, मैं उनके बिना जीवित नहीं रह सकती हूँ ' । ४५… 581–590
- अध्यापयिष्यामि तु यं तस्य विद्या फलिष्यति । २० । तुमने जो मुझे यह कहा कि तुम्हारी विद्या सफल नहीं होगी, सो ठीक है; किंतु मैं जिसे यह विद्या पढ़ा दूँगा,… 591–600
- एकोनाशीतितमोऽध्यायः शुक्राचार्यद्वारा देवयानीको समझाना और देवयानीका असंतोष शुक्र उवाच ( मम विद्या हि निर्द्वन्द्वा ऐश्वर्यं हि फलं मम… 601–610
- एकाशीतितमोऽध्यायः सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वन - विहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीकी उनके साथ बातचीत तथा विवाह वैशम्पायन उवाच अथ दीर्घस्य कालस्य… 611–620
- पञ्चानृतान्याहुरपातकानि । १६ । शर्मिष्ठाने कहा — राजन्! परिहासयुक्त वचन असत्य हो तो भी वह हानिकारक नहीं होता… 621–630
- इत्येतानि समीक्ष्याहं कारणानि भृगूद्वह । अधर्मभयसंविग्नः शर्मिष्ठामुपजग्मिवान् । ३५ । ब्रह्मन्! मेरा यह व्रत है कि मुझसे कोई जो भी वस्तु माँगे, उसे वह… 631–640
- तथाप्यनुदिनं तृष्णा ममैतेष्वभिजायते । १५ । ‘ देखो, विषयभोगमें आसक्तचित्त हुए मेरे एक हजार वर्ष बीत गये, तो भी प्रतिदिन उन विषयोंके लिये ही तृष्णा पैदा… 641–650
- पूज्यान् सम्पूजयेद् दद्यान्न च याचेत् कदाचन । १३ । इसलिये कभी कठोर वचन न बोले । सदा सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन ही बोले… 651–660
- न सज्जते चात्र भृशं मनुष्यः । ) जो दुःखमें खिन्न नहीं होता, सुखसे मतवाला नहीं हो उठता और सबके साथ समान भावसे बर्ताव करता है, वह धीर कहा गया है… 661–670
- * ‘ बल' शब्दका अर्थ यहाँ कौआ किया गया है; जो ' स्थौल्यसामर्थ्यसैन्येषु बलं ना काकसीरिणोः ’ अमरकं वाक्यसे समर्थित होता है… 671–680
- इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायाते द्विनवतितमोऽध्यायः । ९ २ । इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातविषयक… 681–690
- अष्टक! मैं तुमसे, प्रतर्दनसे और उषदश्वके पुत्र वसुमान्से भी यहाँ जो कुछ कहता हूँ; वह सब सत्य ही है… 691–700
- पञ्चनवतितमोऽध्यायः दक्ष प्रजापतिसे लेकर पूरुवंश, भरतवंश एवं पाण्डुवंशकी परम्पराका वर्णन जनमेजय उवाच श्रुतस्त्वत्तो मया ब्रह्मन् पूर्वेषां सम्भवो महान्… 701–710
- रखा गया था अर्थात् यह शर्त थी कि जो अधिक बलवान् हो, वही उसके साथ विवाह कर सकता है । भीमसेनने उसके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न किया, जिसका नाम सर्वग था… 711–720
- प्रतीपकी पत्नीकी कुक्षिमें एक तेजस्वी गर्भका आविर्भाव हुआ, जो शरद् -ऋतुके शुक्ल पक्षमें परम कान्तिमान् चन्द्रमाकी भाँति प्रतिदिन बढ़ने लगा… 721–730
- आपीनां च सुदोग्ध्रीं च सुवालधिखुरां शुभाम् । १५ । उपपन्नां गुणैः सर्वैः शीलेनानुत्तमेन च । एवंगुणसमायुक्तां वसवे वसुनन्दिनी । १६… 731–740
- गृहाणेमं महाराज मया संवर्धितं सुतम् । आदाय पुरुषव्याघ्र नयस्वैनं गृहं विभो । ३४ । राजन! मैंने इसे पाल - पोसकर बड़ा कर दिया है… 741–750
- इत्युक्तः पुनरेवाथ तं दाशः प्रत्यभाषत । चिकीर्षुर्दुष्करं कर्म राज्यार्थे भरतर्षभ । ८८ । भरतवंशावतंस जनमेजय! देवव्रतके ऐसा कहनेपर निषाद उनसे फिर बोला… 751–760
- अपाक्रामन्त ताः सर्वा वृद्ध इत्येव चिन्तया । ७ । उस समय सब ओर राजाओंके नाम ले - लेकर उन सबका परिचय दिया जा रहा था… 761–770
- त्र्यधिकशततमोऽध्यायः सत्यवतीका भीष्मसे राज्यग्रहण और संतानोत्पादनके लिये आग्रह तथा भीष्मके द्वारा अपनी प्रतिज्ञा बतलाते हुए उसकी अस्वीकृति वैशम्पायन उवाच… 771–780
- आपकी आज्ञासे धर्मको ही दृष्टिमें रखकर ( कामके वश न होकर ही ) आपकी इच्छाके अनुरूप कार्य करूँगा । यह सनातन मार्ग शास्त्रोंमें देखा गया है… 781–790
- जनमेजय! उन चोरोंका बहुत- से सैनिक पीछा कर रहे थे । कुरुश्रेष्ठ! वे दस्यु वह चोरीका माल महर्षिके आश्रममें रखकर भयके मारे प्रजा रक्षक सेनाके आनेके पहले वहीं… 791–800
- भीष्मेण विहितं राष्ट्रे धर्मचक्रमवर्तत । १४ । वह देश दूसरे राष्ट्रोंका भी शोधन करके निरन्तर उन्नतिके पथपर अग्रसर हो रहा था… 801–810
- कर्णने कहा —ब्रह्मन्! इन्द्र यदि ब्राह्मणका रूप धारण करके सचमुच मुझसे याचना करेंगे, तो मैं आपकी चेतावनीके अनुसार कैसे उन्हें वह वस्तु नहीं दूँगा… 811–820
- बहुत - से राजा तथा राजमन्त्री एकत्र होकर इस तरहकी बातें कर रहे थे । उनके साथ नगर और जनपदके लोग भी इस चर्चा में सम्मिलित थे… 821–830
- प्राप्तः स्वगुणतो राज्यं न तस्मिन् वाच्यमस्ति नः । ३१ । ‘ आदरणीय गुरुजनो! हमारे कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले राजकुमार युधिष्ठिर सबसे ज्येष्ठ हैं… 831–840
- मृगने कहा — राजन्! जो मनुष्य काम और क्रोधसे घिरे हुए, बुद्धिशून्य तथा पापोंमें संलग्न रहनेवाले हैं, वे भी ऐसे क्रूरतापूर्ण कर्मको त्याग देते हैं… 841–850
- B. K. Mira शतशृंग पर्वतपर पाण्डुका तप वानप्रस्थजनस्यापि दर्शनं कुलवासिनाम् । नाप्रियाण्याचरिष्यामि किं पुनर्ग्रामवासिनाम् । ३६… 851–860
- १. बन्धु शब्दका अर्थ संस्कृत - शब्दार्थकौस्तुभमें आत्मबन्धु, पितृबन्धु, मातृबन्धु माना गया है, इसलिये बन्धुका अर्थ कुटुम्बी किया है… 861–870
- ' उस ब्राह्मणकी बात सत्य ही होगी । उसके उपयोगका यह अवसर आ गया है । महाराज! आपकी आज्ञा होनेपर मैं उस मन्त्रद्वारा किसी देवताका आवाहन कर सकती हूँ… 871–880
- (उत्तराभ्यां तु पूर्वाभ्यां फल्गुनीभ्यां ततो दिवा । जातस्तु फाल्गुने मासि तेनासौ फाल्गुनः स्मृतः… 881–890
- दो देवताओंके आवाहनसे दो पुत्ररूप फलकी प्राप्ति होती है । अतः राजन्! अब मुझे इसके लिये आप इस कार्यमें नियुक्त न कीजिये । मैं आपसे यही वर माँगती हूँ… 891–900
- तस्मान्मे सुतयोः कुन्ति वर्तितव्यं स्वपुत्रवत् । मां च कामयमानोऽयं राजा प्रेतवशं गतः । २८ । अतः आप ही जीवित रहकर मेरे पुत्रोंका भी अपने पुत्रोंके समान ही… 901–910
- पश्यन्तः सततं पाण्डोः परां प्रीतिमवाप्स्यथ । २८ । 'पाण्डुपुत्रोंके जन्म, उनकी वृद्धि तथा वेदाध्ययन आदि देखकर आपलोग सदा अत्यन्त प्रसन्न होंगे । २८… 911–920
- जब कौरव वृक्षपर चढ़कर फल तोड़ने लगते, तब भीमसेन पैरसे ठोकर मारकर उन पेड़ोंको हिला देते थे । २१ । प्रहारवेगाभिहता द्रुमा व्याघूर्णितास्ततः… 921–930
- ' वह सदा दुर्योधनकी आँखोंमें खटकता रहता है । दुर्योधन क्रूर, दुर्बुद्धि, क्षुद्र, राज्यका लोभी तथा निर्लज्ज है । १५… 931–940
- पुत्र उत्पन्न करनेकी प्रेरणा दी; अतः द्रोणाचार्यने पुत्रके लोभसे शरद्वान्की पुत्री कृपीको धर्मपत्नीके रूपमें ग्रहण किया… 941–950
- बुद्धिमत्ताके साथ द्रोणाचार्यसे उनके आगमनका कारण पूछा और द्रोणने वह सब कारण इस प्रकार निवेदन किया । ३८-३९ । द्रोणउवाच महर्षेरग्निवेशस्य सकाशमहमच्युत… 951–960
- उन्होंने कौरवोंको गदायुद्ध, खड्ग चलाने तथा तोमर, प्रास और शक्तियोंके प्रयोगकी कला एवं एक ही साथ अनेक शस्त्रोंके प्रयोग अथवा अकेले ही अनेक शत्रुओंसे युद्ध… 961–970
- द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः अर्जुनके द्वारा लक्ष्यवेध, द्रोणका ग्राहसे छुटकारा और अर्जुनको ब्रह्मशिर नामक अस्त्रकी प्राप्ति वैशम्पायन उवाच ततो धनंजयं… 971–980
- लाघवं सौष्ठवं शोभां स्थिरत्वं दृढमुष्टिताम् । ददृशुस्तत्र सर्वेषां प्रयोगं खड्गचर्मणोः । ३१ । दर्शकोंने उन सबके ढाल-तलवारके प्रयोगोंको देखा… 981–990
- कर्णने कहा — अर्जुन! यह रंगमण्डप तो सबके लिये साधारण है, इसमें तुम्हारा क्या लगा है? जो बल और पराक्रममें श्रेष्ठ होते हैं, वे ही राजा कहलानेयोग्य हैं… 991–1000
- तदनन्तर दुर्योधन, कर्ण, महाबली युयुत्सु, दुःशासन, विकर्ण, जलसंध तथा सुलोचन-ये और दूसरे भी बहुत - से महापराक्रमी नरश्रेष्ठ क्षत्रियशिरोमणि राजकुमार ' पहले… 1001–1010
- इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें द्रुपदपर द्रोणके शासनका वर्णन करनेवाला एक सौ सैंतीसवाँअध्याय पूरा हुआ । १३७… 1011–1020
- धृतराष्ट्रने पूछा- कणिक! साम, दान, भेद अथवा दण्डके द्वारा शत्रुका नाश कैसे किया जा सकता है, यह मुझे यथार्थरूपसे बताइये । २४… 1021–1030
- प्रतिच्छन्नो लोमहारी द्विषतां परिकर्तनः । ८९ । लोहेका बना हुआ छूरा शानपर चढ़ाकर तेज किया जाता है और चमड़ेके सम्पुटमें छिपाकर रखा जाता है तो वह समय आनेपर (… 1031–1040
- वे इतने भोले - भाले थे कि अपने स्नान- भोजन आदि अभीष्ट कर्तव्योंके सम्बन्धमें भी कुछ नहीं जानते थे… 1041–1050
- चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवोंकी वारणावत- यात्रा तथा उनको विदुरका गुप्त- उपदेश वैशम्पायन उवाच पाण्डवास्तु रथान् युक्तान् सदश्वैरनिलोपमैः… 1051–1060
- अथवापीह दग्धेषु भीष्मोऽस्माकं पितामहः । धर्म इत्येव कुप्येरन् ये चान्ये कुरुपुङ्गवाः । २५ । अथवा सम्भव है कि यहाँ हमलोगोंके जल जानेपर हमारे पितामह भीष्म… 1061–1070
- तेजस्वी भीम वायुके समान वेगशाली थे । वे अपनी छातीके धक्केसे वृक्षोंको तोड़ते और पैरोंकी ठोकरसे पृथ्वीको विदीर्ण करते हुए तीव्र गतिसे आगे बढ़े जा रहे थे… 1071–1080
- हो गये? जिन्होंने युवराजपदपर अभिषिक्त होते ही पिताके समान ही अपने सत्य एवं धर्मपूर्ण बर्तावके द्वारा अपना ही नहीं, राजा पाण्डुके भी यशका विस्तार किया था,… 1081–1090
- इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि भीमजलाहरणे पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः । १५० । इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें भीमसेनके जल ले आ… 1091–1100
- ( तत्पश्चात्) उसने अपनी बहिनके मनुष्योचित रूपकी ओर दृष्टिपात किया । उसने अपनी चोटीमें फूलोंके गजरे लगा रखे थे… 1101–1110
- पुरा विकुरुते मायां भुजयोः सारमर्पय । २३ । अतः भीमसेन! जल्दी करो । इसके साथ खिलवाड़ न करो । इस भयानक राक्षसको मार डालो… 1111–1120
- आत्मनश्च तथा कुन्त्या एकोद्देशे चकार सा । पाण्डवास्तु ततः स्नात्वा शुद्धाः संध्यामुपास्य च । तृषिताः क्षुत्पिपासार्ता जलमात्रेण वर्तयन्… 1121–1130
- व्यासजी बोले – जीवित पुत्रोंवाली बहू! तुम्हारे ये पुत्र नरश्रेष्ठ महात्मा धर्मराज युधिष्ठिर सदा धर्मपरायण हैं; अतः ये धर्मसे ही सारी पृथ्वीको जीतकर… 1131–1140
- कन्या चैका कुमारश्च कृताहमनृणा त्वया । ७ । जिस उद्देश्यसे पत्नीकी अभिलाषा की जाती है, आपने वह उद्देश्य मुझसे सिद्ध कर लिया है… 1141–1150
- देशकी रक्षा करता है । उसके कारण हमें शत्रुराज्यों तथा हिंसक प्राणियोंसे कभी भय नहीं होता । ३–५ । वेतनं तस्य विहितं शालिवाहस्य भोजनम्… 1151–1160
- अर्थौ द्वावपि निष्पन्नौ युधिष्ठिर भविष्यतः । प्रतीकारश्च वासस्य धर्मश्च चरितो महान् । २१ । युधिष्ठिर! मेरे इस निश्चयसे दोनों प्रयोजन सिद्ध हो जायँगे… 1161–1170
- राज्ञश्च विविधाश्चर्यान् देशांश्चैव पुराणि च । ६ । उसने अनेक देशों, तीर्थों, नदियों, राजाओं, नाना प्रकारके आश्चर्यजनक स्थानों तथा नगरोंका वर्णन किया । ६… 1171–1180
- अयुतानि ददान्यष्टौ गवां याजय मां विभो । द्रोणवैराभिसंतप्तं प्रह्लादयितुमर्हसि । २२ । ‘ भगवन्! मैं आपको अस्सी हजार गौएँ भेंट करता हूँ… 1181–1190
- इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि द्रौपदीसम्भवे षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः । १६६ । इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें… 1191–1200
- नष्ट हो जाते हैं । ये गंगा बड़ी पवित्र नदी हैं । एकमात्र आकाश ही इनका तट है । गन्धर्व! ये आकाशमार्गसे विचरती हुई गंगा देवलोकमें अलकनन्दा नाम धारण करती हैं… 1201–1210
- जयेदब्राह्मणः कश्चिद् भूमिं भूमिपतिः क्वचित् । ७ ९ । तपतीनन्दन! कोई भी राजा कहीं भी पुरोहितकी सहायताके बिना केवल अपने बल अथवा कुलीनताके भरोसे भूमिपर विजय… 1211–1220
- मन्मथाग्निसमुद्भूतं दाहं कमललोचने । १६ । प्रीतिसंयोगयुक्ताभिरद्भिः प्रह्लादयस्व मे । पुष्पायुधं दुराधर्षं प्रचण्डशरकार्मुकम् । १७… 1221–1230
- परस्परममर्यादाः क्षुधार्ता जघ्निरे जनाः । ४२ । तत् क्षुधार्तैर्निरासहारैः शवभूतैस्तथा नरैः । अभवत् प्रेतराजस्य पुरं प्रेतैरिवावृतम् । ४३… 1231–1240
- न चुक्षुभे तदा धैर्यान्न चचाल धृतव्रतः । २८ । गन्धर्व कहता है — अर्जुन! नन्दिनी इस प्रकार अपमानित होकर करुण क्रन्दन कर रही थी, तो भी दृढ़तापूर्वक व्रतका… 1241–1250
- स तु शप्तस्तदा तेन शक्तिना वै नृपोत्तमः । जगाम शरणं शक्तिं प्रसादयितुमर्हयन् । १ ९ । जब शक्तिने शाप दे दिया, तब नृपतिशिरोमणि कल्माषपाद उनकी स्तुति करते… 1251–1260
- रक्षसा विप्रमुक्तोऽथ स नृपस्तद् वनं महत् । तेजसा रञ्जयामास संध्याभ्रमिव भास्करः । २८ । उस ( मन्त्रपूत जलके प्रभावसे ) राक्षसने भी राजाको छोड़ दिया… 1261–1270
- प्रसादं कुरु लोकानां नियच्छ क्रोधमात्मनः । १४ । पितर बोले — बेटा और्व! तुम्हारी उग्र तपस्याका प्रभाव हमने देख लिया… 1271–1280
- एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः राजा कल्माषपादको ब्राह्मणी आंगिरसीका शाप अर्जुन उवाच राज्ञा कल्माषपादेन गुरौ ब्रह्मविदां वरे… 1281–1290
- इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि पाण्डवागमने त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः । १८३ । इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें… 1291–1300
- समुद्रसेनपुत्रश्च चन्द्रसेनः प्रतापवान् । ११ । जलसंधः पितापुत्रौ विदण्डो दण्ड एव च । पौण्ड्रको वासुदेवश्च भगदत्तश्च वीर्यवान् । १२… 1301–1310
- नहीं' । ७ । ब्राह्मणाऊचुः नावहास्या भविष्यामो न च लाघवमास्थिताः । न च विद्विष्टतां लोके गमिष्यामो महीक्षिताम् । ८… 1311–1320
- हमारी सहायता लेना चाहेंगे तो हम इसके लिये प्रयत्न करेंगे । वीरवर! मेरा विश्वास है कि पाण्डुपुत्र अर्जुनकी पराजय नहीं हो सकती… 1321–1330
- धनंजयं वाक्यमिदं बभाषे । ६ । वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! कुरुश्रेष्ठ नरवीर राजा युधिष्ठिर बड़े बुद्धिमान् थे… 1331–1340
- ( वैवाहिकपर्व) द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः धृष्टद्युम्नके द्वारा द्रौपदी तथा पाण्डवोंका हाल सुनकर राजा द्रुपदका उनके पास पुरोहितको भेजना तथा पुरोहित और… 1341–1350
- कुन्तीदेवी सती - साध्वी कृष्णाको साथ ले द्रुपदके रनिवासमें गयीं । वहाँकी उदारहृदया स्त्रियोंने कौरवराज पाण्डुकी धर्मपत्नीका ( बड़ा ) आदर- सत्कार किया । ९… 1351–1360
- ततो मुहूर्तान्मधुरां वाणीमुच्चार्य पार्षतः । पप्रच्छ तं महात्मानं द्रौपद्यर्थं विशाम्पते । ४ । कथमेका बहूनां स्याद् धर्मपत्नी न संकरः… 1361–1370
- गमिष्यामो मानुषं देवलोकाद् दुराधरो विहितो यत्र मोक्षः । पाण्डव, द्रुपद और व्यासजीमें बातचीत GOOG व्यासजीद्वारा पाण्डवोंके पूर्वजन्मके वृत्तान्तका वर्णन… 1371–1380
- दूसरी ओर रत्नोंका ढेर लगा था । इससे वह राजभवन निर्मल तारकाओंसे संयुक्त आकाशकी भाँति विचित्र शोभा धारण कर रहा था । ८… 1381–1390
- एक साथ आक्रमण करके इस नगरको नष्ट कर दें । नरश्रेष्ठ वीरो! मैं इस अवसरपर यही सर्वोत्तम कर्तव्य मानता हूँ! वैशम्पायन उवाच शकुनेर्वचनं श्रुत्वा भाषमाणस्य… 1391–1400
- ते जानानास्तु दौर्बल्यं भीमसेनमृते महत् । अस्मान् बलवतो ज्ञात्वा न यतिष्यन्ति दुर्बलाः । १४ । भीमसेनके बिना अपनी बहुत बड़ी दुर्बलताका अनुभव करके वे दुर्बल… 1401–1410
- हिरण्मयानि शुभ्राणि बहुन्याभरणानि च । वचनात् तव राजेन्द्र द्रौपद्याः सम्प्रयच्छतु । ७ । राजेन्द्र! वह आपकी आज्ञासे द्रौपदीके लिये बहुत - से सुन्दर… 1411–1420
- ततो जगाम विदुरो धृतराष्ट्रस्य शासनात् । सकाशं यज्ञसेनस्य पाण्डवानां च भारत । ७ । समुपादाय रत्नानि वसूनि विविधानि च… 1421–1430
- उस समय दुर्योधनकी रानीने, जो काशिराजकी पुत्री थी, धृतराष्ट्रपुत्रोंकी अन्य वधुओंके साथ आकर द्वितीय लक्ष्मीके समान सुन्दरी पंचालराजकुमारी द्रौपदीकी अगवानी… 1431–1440
- वहाँ वनसे घिरी हुई भाँति- भाँतिकी रमणीय पुष्करिणियाँ और सुरम्य एवं विशाल बहुसंख्यक तड़ाग बड़े सुन्दर जान पड़ते थे । ४८… 1441–1450
- S रक्ष्यतां सौहृदं तस्मादन्योन्यप्रीतिभावकम् । यथा वो नात्र भेदः स्यात् तत् कुरुष्व युधिष्ठिर । २१… 1451–1460
- कुछ तपस्याके धनी महात्माओंने क्रोधमें भरकर उन्हें जो शाप दिये, उनके शाप भी उन दैत्योंके मिले हुए वरदानसे प्रतिहत होकर उनका कुछ बिगाड़ नहीं सके । १५… 1461–1470
- सुन्दने सुन्दर भौंहोंवाली तिलोत्तमाका दाहिना हाथ पकड़ा और उपसुन्दने उसका बायाँ हाथ पकड़ लिया । १३ । वरप्रदानमत्तौ तावौरसेन बलेन च… 1471–1480
- त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः अर्जुनका गंगाद्वारमें ठहरना और वहाँ उनका उलूपीके साथ मिलन वैशम्पायन उवाच तं प्रयान्तं महाबाहुं कौरवाणां यशस्करम्… 1481–1490
- उसके गर्भसे पुत्र उत्पन्न हो जानेपर उस सुन्दरीको हृदयसे लगाकर अर्जुनने विदा ली तथा राजा चित्रवाहनसे पूछकर वे पुनः तीर्थोंमें भ्रमण करनेके लिये चल दिये… 1491–1500
- सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः अर्जुनका प्रभासतीर्थमें श्रीकृष्णसे मिलना और उन्हींके साथ उनका रैवतक पर्वत एवं द्वारकापुरीमें आना वैशम्पायन उवाच सोऽपरान्तेषु… 1501–1510
- सुभद्रां चारुसर्वाङ्गीं कामबाणप्रपीडितः । ७ । उधर सुभद्रा गिरिराज रैवतक तथा सब देवताओंकी पूजा करके ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर पर्वतकी परिक्रमा पूरी… 1511–1520
- जनमेजय! तत्पश्चात् महारथी पाण्डव मन-ही- मन हर्षविभोर हो उठे और कुन्तीदेवी भी बहुत प्रसन्न हुईं… 1521–1530
- प्रजाने महाराज युधिष्ठिरके रूपमें ऐसा राजा पाया था, जो परम ब्रह्म परमात्माका चिन्तन करनेवाला, बड़े - बड़े यज्ञोंमें वेदोंका उपयोग करनेवाला और शुभ लोकोंके… 1531–1540
- हमारा त्याग कर सकते हैं । निष्पाप नरेश! आप तो भगवान् रुद्रके ही समीप जाइये । अब वे ही आपका यज्ञ करायेंगे ' । ३४-३५… 1541–1550
- एकं शतसहस्रेण सम्मितं राष्ट्रवर्धनम् । चित्रमुच्चावचैर्वर्णैः शोभितं श्लक्ष्णमव्रणम् । ८ । देवदानवगन्धर्वैः पूजितं शाश्वतीः समाः… 1551–1560
- उसने पहले उसका मस्तक निगल लिया । फिर धीरे- धीरे पूँछतकका भाग निगल गयी । निगलते - निगलते ही उस नागिनने पुत्रको बचानेके लिये आकाशमें उड़कर निकल भागनेकी… 1561–1570
- शतक्रतुं समाभाष्य महागम्भीरनिःस्वना । देवताओंके लौट जानेपर इन्द्रको सम्बोधित करके बड़े गम्भीर स्वरसे आकाशवाणी हुई - । १५३… 1571–1580
- इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमेंशार्ङ्गकोपाख्यानविषयक त अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ । २२८… 1581–1590
- जातवेदा! एकमात्र आप ही सर्वत्र तपते हैं । देव! सूर्यकी किरणोंमें तपनेवाला पुरुष भी आपसे भिन्न नहीं है । हव्यवाहन! हम बालक ऋषि हैं; हमारी रक्षा कीजिये… 1591–1600
- ( वे बोले— ) ‘ पाण्डुनन्दन! जब तुमपर भगवान् महादेव प्रसन्न होंगे, तब मैं तुम्हें सब प्रकारके अस्त्र - शस्त्र प्रदान करूँगा । १०… 1601–1610
- उपारुह्य रथं शीघ्रं चामरव्यजने सिते । नकुलः सहदेवश्च धूयमानौ जनार्दनम् । ) स तथा भ्रातृभिः सर्वैः केशवः परवीरहा । १ ९… 1611–1620
- चतुर्थोऽध्यायः मयद्वारा निर्मित सभाभवनमें धर्मराज युधिष्ठिरका प्रवेश तथा सभामें स्थित महर्षियों और राजाओं आदिका वर्णन (वैशम्पायन उवाच तां तु कृत्वा सभां… 1621–1630
- कच्चिदाचरितं पूर्वैर्नरदेव पितामहैः । वर्तसे वृत्तिमक्षुद्रां धर्मार्थसहितां त्रिषु । १८ । नरदेव! क्या तुम ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र –इन तीनों वर्णोंकी… 1631–1640
- कच्चिद् बलेनानुगताः समानि विषमाणि च । पुराणि चौरान् निघ्नन्तश्चरन्ति विषये तव । ८३ । क्या तुम्हारे राज्यमें कुछ रक्षक पुरुष सेना साथ लेकर चोर डाकुओंका… 1641–1650
- षष्ठोऽध्यायः युधिष्ठिरकी दिव्य सभाओंके विषयमें जिज्ञासा वैशम्पायन उवाच सम्पूज्याथाभ्यनुज्ञातो महर्षेर्वचनात् परम्… 1651–1660
- रसवन्ति च तोयानि शीतान्युष्णानि चैव हि । तस्यां राजर्षयः पुण्यास्तथा ब्रह्मर्षयोऽमलाः । ७ । यमं वैवस्वतं तात प्रहृष्टाः पर्युपासते… 1661–1670
- एवं आभूषण धारण करनेवाले श्रीमान् राजा वैश्रवण ( कुबेर ) सहस्रों स्त्रियोंसे घिरे हुए बैठते हैं । ५-६ । मन्दाराणामुदाराणां वनानि परिलोडयन्… 1671–1680
- राजेन्द्र! स्वामी कार्तिकेय भी वहाँ उपस्थित होकर सदा ब्रह्माजीकी सेवा करते हैं । भगवान् नारायण, देवर्षिगण, बालखिल्य ऋषि तथा दूसरे योनिज और अयोनिज ऋषि उस… 1681–1690
- उन दिनों राजाके सुप्रबन्धसे ब्याजकी आजीविका, यज्ञकी सामग्री, गोरक्षा, खेती और व्यापार— इन सबकी विशेष उन्नति होने लगी… 1691–1700
- वङ्गपुण्ड्रकिरातेषु राजा बलसमन्वितः । पौण्ड्रको वासुदेवेति योऽसौ लोकेऽभिविश्रुतः । २० । जिसे मैंने पहले मारा नहीं, उपेक्षावश छोड़ रखा है, जिसकी बुद्धि… 1701–1710
- मागधं साधयिष्याम इष्टिं त्रय इवाग्नयः । १३ । श्रीकृष्ण नीति है, मुझमें बल है और अर्जुनमें विजयकी शक्ति है… 1711–1720
- 'इस बुढ़ापेमें पुत्रहीन रहकर मुझे राज्यसे क्या प्रयोजन है? इसलिये अब मैं दोनों पत्नियोंके साथ तपोवनमें रहकर तपस्या करूँगा… 1721–1730
- पततो वैनतेयस्य गतिमन्ये यथा खगाः । विनाशमुपयास्यन्ति ये चास्य परिपन्थिनः । ८ । 'यह पराक्रमयुक्त होकर सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लेगा… 1731–1740
- भजते मागधं वंशं स नृपाणामनुग्रहात् । ६ । इसी कारण वह गौतम मुनि राजाओंके प्रेमसे वहाँ आश्रममें रहता तथा मगधदेशीय राजवंशकी सेवा करता है । ६… 1741–1750
- बता रहे हैं । ६ । श्रीकृष्ण उवाच कुलकार्यं महाबाहो कश्चिदेकः कुलोद्वहः । वहते यस्तन्नियोगाद् वयमभ्युद्यतास्त्वयि । ७… 1751–1760
- त्रयोविंशोऽध्यायः जरासंधका भीमसेनके साथ युद्ध करनेका निश्चय, भीम और जरासंधका भयानक युद्ध तथा जरासंधकी थकावट वैशम्पायन उवाच ततस्तं निश्चितात्मानं युद्धाय… 1761–1770
- ततः कृष्णं महाबाहुं भ्रातृभ्यां सहितं तदा । रथस्थं मागधा दृष्ट्वा समपद्यन्त विस्मिताः । २० । तदनन्तर दोनों फुफेरे भाइयोंके साथ रथपर बैठे हुए महाबाहु… 1771–1780
- यह सुनकर भाइयोंसहित कुरुश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरको बड़ी प्रसन्नता हुई । साथ ही मन्त्रियों तथा व्यास, धौम्य आदि महर्षियोंको बड़ा हर्ष हुआ… 1781–1790
- अष्टाविंशोऽध्यायः किम्पुरुष, हाटक तथा उत्तरकुरुपर विजय प्राप्त करके अर्जुनका इन्द्रप्रस्थ लौटना वैशम्पायन उवाच स श्वेतपर्वतं वीरः समतिक्रम्य वीर्यवान्… 1791–1800
- इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि अर्जुनोत्तरदिग्विजये अष्टाविंशोऽध्यायः । २८ । इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गतदिग्विजयपर्वमें अर्जुनकी… 1801–1810
- स तमाजौ विनिर्जित्य दक्षिणाभिमुखो ययौ । ८ । भारत! उस जम्भकपुत्रने सहदेवके साथ घोर संग्राम किया; परंतु सहदेव उसे युद्धमें जीतकर दक्षिण दिशाकी ओर बढ़ गये… 1811–1820
- सहदेवने कहा — वत्स! तुम मेरी आज्ञासे कर लेनेके लिये लंकापुरीमें जाओ और वहाँ राक्षसराज महात्मा विभीषणसे मिलकर राजसूययज्ञके लिये भाँति - भाँतिके बहुत - से… 1821–1830
- यज्ञके फाटकपर लगानेयोग्य चौदह ताड़ प्रदान किये । सुवर्णमय कमलपुष्प और मणिजटित शिबिकाएँ भी दीं… 1831–1840
- पाण्डवोंका धन - भण्डार तो यों ही भरा - पूरा था, भगवान्ने ( उन्हें अक्षय धनकी भेंट देकर ) उसे और भी पूर्ण कर दिया… 1841–1850
- पञ्चत्रिंशोऽध्यायः राजसूययज्ञका वर्णन वैशम्पायन उवाच पितामहं गुरुं चैव प्रत्युद्गम्य युधिष्ठिरः । अभिवाद्य ततो राजन्निदं वचनमब्रवीत् । १… 1851–1860
- सप्तत्रिंशोऽध्यायः शिशुपालके आक्षेपपूर्ण वचन शिशुपाल उवाच नायमर्हति वार्ष्णेयस्तिष्ठत्स्विह महात्मसु । महीपतिषु कौरव्य राजवत् पार्थिवार्हणम् । १… 1861–1870
- करें । २१ । ऋत्विग् गुरुस्तथाऽऽचार्यः स्नातको नृपतिः प्रियः । सर्वमेतद्धृषीकेशस्तस्मादभ्यर्चितोऽच्युतः । २२… 1871–1880
- प्रायश्चित्तनखो धीरः पशुजानुर्महावृषः । धर्म और सत्य उनका स्वरूप था, वे अलौकिक तेजसे सम्पन्न थे… 1881–1890
- दैत्यं सोऽतिबलं दृष्ट्वा क्रुद्धशार्दूलविक्रमम् । दीप्तैर्दैत्यगणैर्गुप्तं खरैर्नखमुखैरुत । ततः कृत्वा तु युद्धं वै तेन दैत्येन वै हरिः… 1891–1900
- तदनन्तर सुन्दर रथपर बैठकर सौभ विमानके साथ युद्ध करनेवाले शक्तिशाली वीर भृगुश्रेष्ठ परशुरामने गीत गाती हुई नग्निका- कुमारियोंके मुखसे यह सुना- राम राम… 1901–1910
- भीष्मजी बोले – कुरुरत्न युधिष्ठिर! अब मैं वृष्णिवंशमें भगवान् नारायणके अवतार- ग्रहणका यथावत् वृत्तान्त कहूँगा । अजातशत्रो जातस्तु यथैष भुवि भूमिपः… 1911–1920
- हत्वा कंसममित्रघ्नः सर्वेषां पश्यतां तदा । अभिषिच्योग्रसेनं तं पित्रोः पादमवन्दत । फिर शत्रुनाशन श्रीकृष्णने सब लोगोंके सामने ही कंसको मारकर उग्रसेनको… 1921–1930
- गदं सारणमक्रूरं कृतवर्माणमेव च । चारुदेष्णं सुदेष्णं च अन्यानपि यथोचितम् । परिष्वज्य च दृष्ट्वा च भगवान् भूतभावनः… 1931–1940
- इत्येवं हृदि संकल्पं कृत्वा पुरुषसत्तम । तपश्चराम सततं रक्ष्यमाणा हि दानवैः । पुरुषोत्तम! यही संकल्प लेकर दानवोंद्वारा सुरक्षित हो हम सदा तपस्या करती आ… 1941–1950
- प्रासादवरसम्पन्नं युक्तं जगति पर्वतैः । भारत! देवाधिदेव भगवान् श्रीकृष्णका भवन, जिसे साक्षात् विश्वकर्माने अपने हाथों बनाया है, चार योजन लम्बा और उतना ही… 1951–1960
- एवमुक्त्वा ततः सर्वानामन्त्र्य कुकुरान्धकान् । सस्वजे रामकृष्णौ च वसुदेवं च वासवः । भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! समस्त कुकुर और अन्धकवंशके लोगोंसे ऐसा… 1961–1970
- देवताओंके साथ रहते हैं । सूदिता मौरवाः पाशा निशुम्भनरकौ हतौ । कृतक्षेमः पुनः पन्थाः पुरं प्राग्ज्योतिषं प्रति । शौरिणा पृथिवीपालास्त्रासिता भरतर्षभ… 1971–1980
- ' कुरुवंशके वीर! तुम डरो मत, क्या कुत्ता कभी सिंहको मार सकता है? हमने कल्याणमय मार्ग पहले ही चुन लिया है (श्रीकृष्णका आश्रय ही वह मार्ग है जिसका मैंने वरण… 1981–1990
- तस्य भीमस्य भीष्मेण वार्यमाणस्य भारत । गुरुणा विविधैर्वाक्यैः क्रोधः प्रशममागतः । १४ । भारत! पितामह भीष्मके द्वारा अनेक प्रकारकी बातें कहकर रोके जानेपर… 1991–2000
- कारण अत्यन्त निन्दनीय जान पड़ती है । २८ । मा साहसमितीदं सा सततं वाशते किल । साहसं चात्मनातीव चरन्ती नावबुध्यते । २९… 2001–2010
- प्रहृष्टाः केशवं जग्मुः संस्तुवन्तो महर्षयः । ब्राह्मणाश्च महात्मानः पार्थिवाश्च महाबलाः । ३३ । शशंसुर्निर्वृताः सर्वे दृष्ट्वा कृष्णस्य विक्रमम्… 2011–2020
- (द्यूतपर्व) षट्चत्वारिंशोऽध्यायः व्यासजीकी भविष्यवाणीसे युधिष्ठिरकी चिन्ता और समत्वपूर्ण बर्ताव करनेकी प्रतिज्ञा वैशम्पायन उवाच समाप्ते राजसूये तु… 2021–2030
- पाण्डवजनित आगसे दग्ध होनेवाले राजाओंने वह अपराध क्षमा कर दिया । अन्यथा इतने बड़े अन्यायको कौन सह सकता है? । २६ । वासुदेवेन तत् कर्म यथायुक्तं महत् कृतम्… 2031–2040
- अदृश्यामपि कौन्तेयश्रियं पश्यन्निवोद्यताम् । १६ । तस्मादहं विवर्णश्च दीनश्च हरिणः कृशः । शत्रुओंको बढ़ते और अपनेको हीन दशामें जाते देख तथा युधिष्ठिरकी उस… 2041–2050
- गया था । २१ । ज्येष्ठोऽयमिति मां मत्वा श्रेष्ठश्चेति विशाम्पते । युधिष्ठिरेण सत्कृत्य युक्तो रत्नपरिग्रहे । २२… 2051–2060
- नीपानूपानधिगतान् विविधान् द्वारवारितान् । २४ । बल्यर्थं ददतस्तस्य नानारूपाननेकशः । कृष्णग्रीवान् महाकायान् रासभाञ्छतपातिनः अहार्षुर्दशसाहस्रान् विनीतान्… 2061–2070
- महाबली सुनीथने बड़ी प्रसन्नताके साथ उसमें अनुकर्ष (रथके नीचे लगनेयोग्य काष्ठ ) लगा दिया । चेदिराजने स्वयं उस रथमें ध्वजा फहरा दी… 2071–2080
- षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः धृतराष्ट्र और दुर्योधनकी बातचीत, द्यूतक्रीड़ाके लिये सभानिर्माण और धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरको बुलानेके लिये विदुरको आज्ञा देना… 2081–2090
- E330 M विदुरउवाच गान्धारराजः शकुनिर्विशाम्पते राजातिदेवी कृतहस्तो मताक्षः । विविंशतिश्चित्रसेनश्च राजा सत्यव्रतः पुरुमित्रो जयश्च । १३… 2091–2100
- श्रेष्ठ पुरुष वाणीद्वारा किसीके प्रति अनुचित शब्द नहीं निकालते तथा कपटपूर्ण बर्ताव नहीं करते । कुटिलता और शठतासे रहित युद्ध ही सत्पुरुषोंका व्रत है । ११… 2101–2110
- ताम्रलोहैः परिवृता निधयो ये चतुःशताः । पञ्चद्रौणिक एकैकः सुवर्णस्याहतस्य वै । २ ९ । जातरूपस्य मुख्यस्य अनर्घेयस्य भारत… 2111–2120
- देखो, इस जगत्का शासन करनेवाला एक ही है, दूसरा नहीं । वही शासक माताके गर्भमें सोये हुए शिशुपर भी शासन करता है; उसीके द्वारा मैं भी अनुशासित हूँ… 2121–2130
- राजाओंको पृथक् - पृथक् पाण्डवोंकी पराजय सूचित की । ३१ । शकुनिरुवाच अस्ति ते वै प्रिया राजन् ग्लह एकोऽपराजितः… 2131–2140
- ज्ञात्वा चिकीर्षितमहं राज्ञो यास्यामि दुःखिता । ८ । सूतनन्दन! यह जानकर आओ । तब मुझे ले चलो । राजा क्या करना चाहते हैं? यह जानकर ही मैं दुःखिनी अबला उस… 2141–2150
- वृकोदरः प्रेक्ष्य युधिष्ठिरं च चकार कोपं परमार्तरूपः । ५४ । कृष्णा रजस्वलावस्थामें घसीटी जा रही थी, उसके सिरका कपड़ा सरक गया था, वह इस तिरस्कारके योग्य… 2151–2160
- जब सभामें वस्त्रोंका ढेर लग गया, तब दुःशासन थककर लज्जित हो चुपचाप बैठ गया । ५५ । धिक्शब्दस्तु ततस्तत्र समभूल्लोमहर्षणः… 2161–2170
- युधिष्ठिर ही सबसे प्रामाणिक व्यक्ति हैं । तुम जीती गयी हो या नहीं? यह बात स्वयं इन्हें बतलानी चाहिये । २०-२१… 2171–2180
- तं वै शब्दं विदुरस्तत्त्ववेदी शुश्राव घोरं सुबलात्मजा च । भीष्मो द्रोणो गौतमश्चापि विद्वान् स्वस्ति स्वस्तीत्यपि चैवाहुरुच्चैः । २३… 2181–2190
- (अनुद्यूतपर्व) चतुःसप्ततितमोऽध्यायः दुर्योधनका धृतराष्ट्रसे अर्जुनकी वीरता बतलाकर पुनः द्यूतक्रीड़ाके लिये पाण्डवको बुलानेका अनुरोध और उनकी स्वीकृति… 2191–2200
- सर्वोपायैर्निहन्तव्याः शत्रवः शत्रुसूदन । पुरा युद्धाद् बलाद् वापि प्रकुर्वन्ति तवाहितम् । ८ । शत्रुसूदन! जो आपका अहित करते हैं, उन शत्रुओंको बिना युद्धके… 2201–2210
- बुद्धया बुध्येन वा बुध्येदयं वै भरतर्षभः । १७ । सभासद् बोले — अहो धिक्कार है! ये भाई-बन्धु भी युधिष्ठिरको उनके ऊपर आनेवाले महान् भयकी बात नहीं समझाते… 2211–2220
- इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें पाण्डवोंकी प्रतिज्ञासे सम्बन्ध रखनेवाला सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ । ७७… 2221–2230
- ( ततः सम्प्रस्थिते तत्र धर्मराजे तदा नृपे । जनाः समस्तास्तं द्रष्टुं समारुरुहुरातुराः । ततः प्रासादवर्याणि विमानशिखराणि च… 2231–2240
- हस्तिनापुरसे उन नरश्रेष्ठ पाण्डवोंके निकलते ही बिना बादलके बिजली गिरने लगी, पृथ्वी काँप उठी । राजन्! बिना पर्व ( अमावस्या) - के ही राहुने सूर्यको ग्रस… 2241–2250
- पाञ्चाली पाण्डवानेतान् दैवसृष्टोपसर्पति । ३० । तदनन्तर सब धर्मोंके ज्ञाता परम बुद्धिमान् विदुरने कहा – ' भरतवंशियो! यह कृष्णा जो तुम्हारी सभामें लायी गयी,… 2251–2256