महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 161–170
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 161–170
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पूछनेपर उपाध्यायने उत्तर दिया— ॥ १६५ ॥
ये ते स्त्रियौ धाता विधाता च ये च ते कृष्णाः सितास्तन्तवस्ते रात्र्यहनी । यदपि तच्चक्रं द्वादशारं षड् वै कुमाराः परिवर्तयन्ति तेऽपि षड् ऋतवः द्वादशारा द्वादश मासाः संवत्सरश्चक्रम् ॥ १६६ ॥
‘ वे जो दोनों स्त्रियाँ थीं, वे धाता और विधाता हैं । जो काले और सफेद तन्तु थे, वे रात और दिन हैं । बारह अरोंसे युक्त चक्रको जो छः कुमार घुमा रहे थे, वे छ: ऋतुएँ हैं । बारह
महीने ही बारह अरे हैं । संवत्सर ही वह चक्र है ॥ १६६ ॥
यः पुरुषः स पर्जन्यो योऽश्वः सोऽग्निर्य ऋषभस्त्वया पथि गच्छता दृष्टः स ऐरावतो नागराट् ॥ १६७ ॥
'जो पुरुष था, वह पर्जन्य ( इन्द्र) है । जो अश्व था वह अग्नि है । इधरसे जाते समय मार्गमें तुमने जिस बैलको देखा था, वह नागराज ऐरावत हैं ॥ १६७ ॥
यश्चैनमधिरूढः पुरुषः स चेन्द्रो यदपि ते भक्षितं तस्य ऋषभस्य पुरीषं तदमृतं तेन खल्वसि तस्मिन् नागभवने न व्यापन्नस्त्वम् ॥ १६८ ॥
‘ और जो उसपर चढ़ा हुआ पुरुष था, वह इन्द्र है । तुमने बैलके जिस गोबरको खाया है, वह अमृत था । इसीलिये तुम नागलोकमें जाकर भी मरे नहीं ॥ १६८ ॥
स हि भगवानिन्द्रो मम सखा त्वदनुक्रोशादि- ममनुग्रहं कृतवान् । तस्मात् कुण्डले गृहीत्वा पुनरागतोऽसि ॥ १६ ९ ॥ ‘ वे भगवान् इन्द्र मेरे सखा हैं । तुमपर कृपा करके ही उन्होंने यह अनुग्रह किया है । यही कारण है कि तुम दोनों कुण्डल लेकर फिर यहाँ लौट आये हो ॥ १६ ९ ॥ तत् सौम्य गम्यतामनुजाने भवन्तं श्रेयोऽवाप्स्यसीति । स उपाध्यायेनानुज्ञातो भगवानुत्तङ्कः क्रुद्धस्तक्षकं प्रतिचिकीर्षमाणो हास्तिनपुरं प्रतस्थे ॥ १७० ॥
‘ अतः सौम्य! अब तुम जाओ, मैं तुम्हें जानेकी आज्ञा देता हूँ । तुम कल्याणके भागी होओगे । ' उपाध्यायकी आज्ञा पाकर उत्तंक तक्षकके प्रति कुपित हो उससे बदला लेनेकी इच्छासे हस्तिनापुरकी ओर चल दिये ॥ १७० ॥
स हास्तिनपुरं प्राप्य न चिराद् विप्रसत्तमः ।
समागच्छत राजानमुत्तङ्को जनमेजयम् ॥ १७१ ॥
हस्तिनापुरमें शीघ्र पहुँचकर विप्रवर उत्तंक राजा जनमेजयसे मिले ॥ १७१ ॥
पुरा तक्षशिलासंस्थं निवृत्तमपराजितम् ।
सम्यग्विजयिनं दृष्ट्वा समन्तान्मन्त्रिभिर्वृतम् ॥ १७२ ॥
तस्मै जयाशिषः पूर्वं यथान्यायं प्रयुज्य सः ।
उवाचैनं वचः काले शब्दसम्पन्नया गिरा ॥ १७३ ॥
जनमेजय पहले तक्षशिला गये थे । वे वहाँ जाकर पूर्ण विजय पा चुके थे । उत्तंकने मन्त्रियोंसे घिरे हुए उत्तम विजयसे सम्पन्न राजा जनमेजयको देखकर पहले उन्हें न्यायपूर्वक
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जयसम्बन्धी आशीर्वाद दिया । तत्पश्चात् उचित समयपर उपयुक्त शब्दोंसे विभूषित वाणीद्वारा उनसे इस प्रकार कहा- ॥ १७२-१७३ ॥ उत्तङ्क उवाच
अन्यस्मिन् करणीये तु कार्ये पार्थिवसत्तम ।
बाल्यादिवान्यदेव त्वं कुरुषे नृपसत्तम ॥ १७४ ॥
उत्तंक बोले— नृपश्रेष्ठ! जहाँ तुम्हारे लिये करनेयोग्य दूसरा कार्य उपस्थित हो, वहाँ अज्ञानवश तुम कोई और ही कार्य कर रहे हो ॥ १७४ ॥
सौतिरुवाच
एवमुक्तस्तु विप्रेण स राजा जनमेजयः ।
अर्चयित्वा यथान्यायं प्रत्युवाच द्विजोत्तमम् ॥ १७५ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं - विप्रवर उत्तंकके ऐसा कहनेपर राजा जनमेजयने उन द्विजश्रेष्ठका विधिपूर्वक पूजन किया और इस प्रकार कहा ॥ १७५ ॥
जनमेजय उवाच आसां प्रजानां परिपालनेन स्वं क्षत्रधर्मं परिपालयामि । प्रब्रूहि मे किं करणीयमद्य येनासि कार्येण समागतस्त्वम् ॥ १७६ ॥
जनमेजय बोले- ब्रह्मन्! मैं इन प्रजाओंकी रक्षाद्वारा अपने क्षत्रियधर्मका पालन करता हूँ। बताइये, आज मेरे करनेयोग्य कौन- सा कार्य उपस्थित है? जिसके कारण आप यहाँ पधारे हैं ॥ १७६ ॥
सौतिरुवाच स एवमुक्तस्तु नृपोत्तमेन द्विजोत्तमः पुण्यकृतां वरिष्ठः । उवाच राजानमदीनसत्त्वं स्वमेव कार्यं नृपते कुरुष्व ॥ १७७ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— राजाओंमें श्रेष्ठ जनमेजयके इस प्रकार कहनेपर पुण्यात्माओंमें अग्रगण्य विप्रवर उत्तंकने उन उदार हृदयवाले नरेशसे कहा – ' महाराज! वह कार्य मेरा नहीं, आपका ही है, आप उसे अवश्य कीजिये ' ॥ १७७ ॥
उत्तङ्क उवाच तक्षकेण महीन्द्रेन्द्र येन ते हिंसितः पिता ।
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तस्मै प्रतिकुरुष्व त्वं पन्नगाय दुरात्मने ॥ १७८ ॥
इतना कहकर उत्तंक फिर बोले- भूपालशिरोमणे! नागराज तक्षकने आपके पिताकी हत्या की है; अतः आप उस दुरात्मा सर्पसे इसका बदला लीजिये ॥ १७८ ॥
कार्यकालं हि मन्येऽहं विधिदृष्टस्य कर्मणः ।
तद्गच्छापचितिं राजन् पितुस्तस्य महात्मनः ॥ १७ ९ ॥
मैं समझता हूँ, शत्रुनाशन कार्यकी सिद्धिके लिये जो सर्पयज्ञरूप कर्म शास्त्रमें देखा गया है, उसके अनुष्ठानका यह उचित अवसर प्राप्त हुआ है । अतः राजन्! अपने महात्मा पिताकी मृत्युका बदला आप अवश्य लें ॥ १७ ९ ॥
तेन ह्यनपराधी स दष्टो दुष्टान्तरात्मना ।
पञ्चत्वमगमद् राजा वज्राहत इव द्रुमः ॥ १८० ॥
यद्यपि आपके पिता महाराज परीक्षित्ने कोई अपराध नहीं किया था तो भी उस दुष्टात्मा सर्पने उन्हें डँस लिया और वे वज्रके मारे हुए वृक्षकी भाँति तुरंत ही गिरकर कालके गालमें चले गये ॥ १८० ॥
बलदर्पसमुत्सिक्तस्तक्षकः पन्नगाधमः ।
अकार्यं कृतवान् पापो योऽदशत् पितरं तव ॥ १८१ ॥
सर्पोंमें अधम तक्षक अपने बलके घमण्डसे उन्मत्त रहता है । उस पापीने यह बड़ा भारी अनुचित कर्म किया जो आपके पिताको डँस लिया ॥ १८१ ॥
राजर्षिवंशगोप्तारममरप्रतिमं नृपम् ।
यियासुं काश्यपं चैव न्यवर्तयत पापकृत् ॥ १८२ ॥
वे महाराज परीक्षित् राजर्षियोंके वंशकी रक्षा करनेवाले और देवताओंके समान तेजस्वी थे, काश्यप नामक एक ब्राह्मण आपके पिताकी रक्षा करनेके लिये उनके पास आना चाहते थे, किंतु उस पापाचारीने उन्हें लौटा दिया ॥ १८२ ॥
होतुमर्हसि तं पापं ज्वलिते हव्यवाहने ।
सर्पसत्रे महाराज त्वरितं तद् विधीयताम् ॥ १८३ ॥
अतः महाराज! आप सर्पयज्ञका अनुष्ठान करके उसकी प्रज्वलित अग्निमें उस पापीको होम दीजिये; और जल्दी - से -जल्दी यह कार्य कर डालिये ॥ १८३ ॥
एवं पितुश्चापचितिं कृतवांस्त्वं भविष्यसि ।
मम प्रियं च सुमहत् कृतं राजन् भविष्यति ॥ १८४ ॥
कर्मणः पृथिवीपाल मम येन दुरात्मना ।
विघ्नः कृतो महाराज गुर्वर्थं चरतोऽनघ ॥ १८५ ॥
ऐसा करके आप अपने पिताकी मृत्युका बदला चुका सकेंगे एवं मेरा भी अत्यन्त प्रिय कार्य सम्पन्न हो जायगा । समूची पृथ्वीका पालन करनेवाले नरेश! तक्षक बड़ा दुरात्मा है ।
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पापरहित महाराज! मैं गुरुजीके लिये एक कार्य करने जा रहा था, जिसमें उस दुष्टने बहुत बड़ा विघ्न डाल दिया था ॥ १८४-१८५ ॥ सौतिरुवाच
एतच्छ्रुत्वा तु नृपतिस्तक्षकाय चुकोप ह ।
उत्तङ्कवाक्यहविषा दीप्तोऽग्निर्हविषा यथा ॥ १८६ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं -महर्षियो! यह समाचार सुनकर राजा जनमेजय तक्षकपर कुपित हो उठे । उत्तंकके वाक्यने उनकी क्रोधाग्निमें घीका काम किया । जैसे घीकी आहुति पड़नेसे अग्नि प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार वे क्रोधसे अत्यन्त कुपित हो गये ॥ १८६ ॥
अपृच्छत् स तदा राजा मन्त्रिणस्तान् सुदुःखितः ।
उत्तङ्कस्यैव सांनिध्ये पितुः स्वर्गगतिं प्रति ॥ १८७ ॥
उस समय राजा जनमेजयने अत्यन्त दुःखी होकर उत्तंकके निकट ही मन्त्रियोंसे पिताके स्वर्गगमनका समाचार पूछा ॥ १८७ ॥
तदैव हि स राजेन्द्रो दुःखशोकाप्लुतोऽभवत् ।
यदैव वृत्तं पितरमुत्तङ्कादशृणोत् तदा ॥ १८८ ॥
उत्तंकके मुखसे जिस समय उन्होंने पिताके मरनेकी बात सुनी, उसी समय वे महाराज दुःख और शोकमें डूब गये ॥ १८८ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि पौष्यपर्वणि तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत पौष्यपर्वमें (पौष्याख्यानविषयक) तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
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(पौलोमपर्व) चतुर्थोऽध्यायः कथा - प्रवेश लोमहर्षणपुत्र उग्रश्रवाः सौतिः पौराणिको नैमिषारण्ये शौनकस्य कुलपतेर्द्वादशवार्षिके सत्रे ऋषीनभ्यागतानुपतस्थे ॥ १ ॥
नैमिषारण्यमें कुलपति शौनकके बारह वर्षोंतक चालू रहनेवाले सत्रमें उपस्थित महर्षियोंके समीप एक दिन लोमहर्षणपुत्र सूतनन्दन उग्रश्रवा आये । वे पुराणोंकी कथा कहनेमें कुशल थे ॥ १ ॥
पौराणिकः पुराणे कृतश्रमः स कृताञ्जलिस्तानुवाच । किं भवन्तः श्रोतुमिच्छन्ति किमहं ब्रवाणीति ॥ २ ॥
वे पुराणोंके ज्ञाता थे । उन्होंने पुराणविद्यामें बहुत परिश्रम किया था । वे नैमिषारण्यवासी महर्षियोंसे हाथ जोड़कर बोले— ' पूज्यपाद महर्षिगण! आपलोग क्या सुनना चाहते हैं? मैं किस प्रसंगपर बोलूँ? ' ॥ २ ॥
तमृषय ऊचुः परमं लौमहर्षणे वक्ष्यामस्त्वां नः प्रतिवक्ष्यसि वचः शुश्रूषतां कथायोगं नः कथायोगे ॥ ३ ॥
तब ऋषियोंने उनसे कहा - लोमहर्षणकुमार! हम आपको उत्तम प्रसंग बतलायेंगे और कथा-प्रसंग प्रारम्भ होनेपर सुननेकी इच्छा रखनेवाले हमलोगोंके समक्ष आप बहुत- सी कथाएँ कहेंगे ॥ ३ ॥
तत्र भगवान् कुलपतिस्तु शौनकोऽग्निशरणमध्यास्ते ॥ ४ ॥
किंतु पूज्यपाद कुलपति भगवान् शौनक अभी अग्निकी उपासनामें संलग्न हैं ॥ ४ ॥
योऽसौ दिव्याः कथा वेद देवतासुरसंश्रिताः ।
मनुष्योरगगन्धर्वकथा वेद च सर्वशः ॥ ५ ॥
वे देवताओं और असुरोंसे सम्बन्ध रखनेवाली बहुत- सी दिव्य कथाएँ जानते हैं ।
मनुष्यों, नागों तथा गन्धर्वोंकी कथाओंसे भी वे सर्वथा परिचित हैं ॥ ५ ॥
स चाप्यस्मिन् मखे सौते विद्वान् कुलपतिर्द्विजः ।
दक्षो धृतव्रतो धीमाञ्छास्त्रे चारण्यके गुरुः ॥ ६ ॥
सूतनन्दन! वे विद्वान् कुलपति विप्रवर शौनकजी भी इस यज्ञमें उपस्थित हैं । वे चतुर, उत्तम व्रतधारी तथा बुद्धिमान् हैं । शास्त्र ( श्रुति, स्मृति, इतिहास, पुराण ) तथा आरण्यक
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(बृहदारण्यक आदि ) के तो वे आचार्य ही हैं ॥ ६ ॥
सत्यवादी शमपरस्तपस्वी नियतव्रतः ।
सर्वेषामेव नो मान्यः स तावत् प्रतिपाल्यताम् ॥ ७ ॥
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उग्रश्रवाजीके द्वारा महाभारतकी कथा वे सदा सत्य बोलनेवाले, मन और इन्द्रियोंके संयममें तत्पर, तपस्वी और नियमपूर्वक व्रतको निबाहनेवाले हैं । वे हम सभी लोगोंके लिये सम्माननीय हैं; अतः जबतक उनका आना न हो, तबतक प्रतीक्षा कीजिये ॥ ७ ॥
तस्मिन्नध्यासति गुरावासनं परमार्चितम् ।
ततो वक्ष्यसि यत्त्वां स प्रक्ष्यति द्विजसत्तमः ॥ ८ ॥
गुरुदेव शौनक जब यहाँ उत्तम आसनपर विराजमान हो जायँ, उस समय वे द्विजश्रेष्ठ आपसे जो कुछ पूछें, उसी प्रसंगको लेकर आप बोलियेगा ॥ ८ ॥
सौतिरुवाच
एवमस्तु गुरौ तस्मिन्नुपविष्टे महात्मनि ।
तेन पृष्टः कथाः पुण्या वक्ष्यामि विविधाश्रयाः ॥ ९ ॥
उग्रश्रवाजीने कहा— एवमस्तु ( ऐसा ही होगा), गुरुदेव महात्मा शौनकजीके बैठ जानेपर उन्हींके पूछनेके अनुसार मैं नाना प्रकारकी पुण्यदायिनी कथाएँ कहूँगा ॥ ९ ॥
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सोऽथ विप्रर्षभः सर्वं कृत्वा कार्यं यथाविधि ।
देवान् वाग्भिः पितॄनद्भिस्तर्पयित्वाऽऽजगाम ह ॥ १० ॥
यत्र ब्रह्मर्षयः सिद्धाः सुखासीना धृतव्रताः ।
यज्ञायतनमाश्रित्य सूतपुत्रपुरःसराः ॥ ११ ॥
तदनन्तर विप्रशिरोमणि शौनकजी क्रमशः सब कार्योंका विधिपूर्वक सम्पादन करके वैदिक स्तुतियोंद्वारा देवताओंको और जलकी अंजलिद्वारा पितरोंको तृप्त करनेके पश्चात् उस स्थानपर आये, जहाँ उत्तम व्रतधारी सिद्ध-ब्रह्मर्षिगण यज्ञमण्डपमें सूतजीको आगे विराजमान करके सुखपूर्वक बैठे थे ॥ १०-११ ॥
ऋत्विक्ष्वथ सदस्येषु स वै गृहपतिस्तदा ।
उपविष्टेषूपविष्टः शौनकोऽथाब्रवीदिदम् ॥ १२ ॥
ऋत्विजों और सदस्योंके बैठ जानेपर कुलपति शौनकजी भी वहाँ बैठे और इस प्रकार बोले ॥ १२ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि पौलोमपर्वणि कथाप्रवेशो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत पौलोमपर्वमें कथा-प्रवेश नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥
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पञ्चमोऽध्यायः भृगुके आश्रमपर पुलोमा दानवका आगमन और उसकी अग्निदेवके साथ बातचीत शौनक उवाच
पुराणमखिलं तात पिता तेऽधीतवान् पुरा ।
कच्चित् त्वमपि तत् सर्वमधीषे लौमहर्षणे ॥ १ ॥
शौनकजीने कहा - तात लोमहर्षणकुमार! पूर्वकालमें आपके पिताने सब पुराणोंका अध्ययन किया था । क्या आपने भी उन सबका अध्ययन किया है? ॥ १ ॥
पुराणे हि कथा दिव्या आदिवंशाश्च धीमताम् ।
कथ्यन्ते ये पुरास्माभिः श्रुतपूर्वाः पितुस्तव ॥ २ ॥
पुराणमें दिव्य कथाएँ वर्णित हैं । परम बुद्धिमान् राजर्षियों और ब्रह्मर्षियोंके आदिवंश भी बताये गये हैं । जिनको पहले हमने आपके पिताके मुखसे सुना है ॥ २ ॥
तत्र वंशमहं पूर्वं श्रोतुमिच्छामि भार्गवम् ।
कथयस्व कथामेतां कल्याः स्म श्रवणे तव ॥ ३ ॥
उनमेंसे प्रथम तो मैं भृगुवंशका ही वर्णन सुनना चाहता हूँ । अतः आप इसीसे सम्बन्ध रखनेवाली कथा कहिये । हम सब लोग आपकी कथा सुननेके लिये सर्वथा उद्यत हैं ॥ ३ ॥
सौतिरुवाच
यदधीतं पुरा सम्यग् द्विजश्रेष्ठैर्महात्मभिः ।
वैशम्पायनविप्राग्र्यैस्तैश्चापि कथितं यथा ॥ ४ ॥
सूतपुत्र उग्रश्रवाने कहा – भृगुनन्दन! वैशम्पायन आदि श्रेष्ठ ब्राह्मणों और महात्मा द्विजवरोंने पूर्वकालमें जो पुराण भलीभाँति पढ़ा था और उन विद्वानोंने जिस प्रकार पुराणका वर्णन किया है, वह सब मुझे ज्ञात है ॥ ४ ॥
यदधीतं च पित्रा मे सम्यक् चैव ततो मया ।
तावच्छृणुष्व यो देवैः सेन्द्रैः सर्षिमरुद्गणैः ॥ ५ ॥
पूजितः प्रवरो वंशो भार्गवो भृगुनन्दन ।
इमं वंशमहं पूर्वं भार्गवं ते महामुने ॥ ६ ॥
निगदामि यथा युक्तं पुराणाश्रयसंयुतम् ।
भृगुर्महर्षिर्भगवान् ब्रह्मणा वै स्वयम्भुवा ॥ ७ ॥
वरुणस्य क्रतौ जातः पावकादिति नः श्रुतम् ।
भृगोः सुदयितः पुत्रश्च्यवनो नाम भार्गवः ॥ ८ ॥
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मेरे पिताने जिस पुराणविद्याका भलीभाँति अध्ययन किया था, वह सब मैंने उन्हींके मुखसे पढ़ी और सुनी है । भृगुनन्दन! आप पहले उस सर्वश्रेष्ठ भृगुवंशका वर्णन सुनिये, जो देवता, इन्द्र, ऋषि और मरुद्गणोंसे पूजित है । महामुने! आपके इस अत्यन्त दिव्य भार्गववंशका परिचय देता हूँ। यह परिचय अद्भुत एवं युक्तियुक्त तो होगा ही, पुराणोंके आश्रयसे भी संयुक्त होगा। हमने सुना है कि स्वयम्भू ब्रह्माजीने वरुणके यज्ञमें महर्षि भगवान् भृगुको अग्निसे उत्पन्न किया था । भृगुके अत्यन्त प्रिय पुत्र च्यवन हुए, जिन्हें भार्गव भी कहते हैं ॥ ५–८ ॥
च्यवनस्य च दायादः प्रमतिर्नाम धार्मिकः ।
प्रमतेरप्यभूत् पुत्रो घृताच्यां रुरुरित्युत ॥ ९ ॥
च्यवनके पुत्रका नाम प्रमति था, जो बड़े धर्मात्मा हुए । प्रमतिके घृताची नामक अप्सराके गर्भसे रुरु नामक पुत्रका जन्म हुआ ॥ ९ ॥
रुरोरपि सुतो जज्ञे शुनको वेदपारगः ।
प्रमद्वरायां धर्मात्मा तव पूर्वपितामहः ॥ १० ॥
रुरुके पुत्र शुनक थे, जिनका जन्म प्रमद्वराके गर्भसे हुआ था । शुनक वेदोंके पारंगत
विद्वान् और धर्मात्मा थे । वे आपके पूर्व पितामह थे ॥ १० ॥
तपस्वी च यशस्वी च श्रुतवान् ब्रह्मवित्तमः ।
धार्मिकः सत्यवादी च नियतो नियताशनः ॥ ११ ॥
वे तपस्वी, यशस्वी, शास्त्रज्ञ तथा ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे । धर्मात्मा, सत्यवादी और मन-इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले थे । उनका आहार-विहार नियमित एवं परिमित था ॥ ११ ॥
शौनक उवाच
सूतपुत्र यथा तस्य भार्गवस्य महात्मनः ।
च्यवनत्वं परिख्यातं तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥ १२ ॥
शौनकजी बोले – सूतपुत्र! मैं पूछता हूँ कि महात्मा भार्गवका नाम च्यवन कैसे प्रसिद्ध हुआ? यह मुझे बताइये ॥ १२ ॥
सौतिरुवाच
भृगोः सुदयिता भार्या पुलोमेत्यभिविश्रुता ।
तस्यां समभवद् गर्भो भृगुवीर्यसमुद्भवः ॥ १३ ॥
उग्रश्रवाजीने कहा – महामुने! भृगुकी पत्नीका नाम पुलोमा था । वह अपने पतिको बहुत ही प्यारी थी । उसके उदरमें भृगुजीके वीर्यसे उत्पन्न गर्भ पल रहा था ॥ १३ ॥
तस्मिन् गर्भेऽथ सम्भूते पुलोमायां भृगूद्वह ।
समये समशीलिन्यां धर्मपत्न्यां यशस्विनः ॥ १४ ॥
अभिषेकाय निष्क्रान्ते भृगौ धर्मभृतां वरे ।