महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1801–1810

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1801–1810

पृष्ठ 1801

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1801 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि अर्जुनोत्तरदिग्विजये अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गतदिग्विजयपर्वमें अर्जुनकी उत्तर दिशापर विजयविषयक अट्ठाईसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५८ श्लोक मिलाकर कुल ७ ९ श्लोक हैं ) * तीतरके समान चितकबरे रंगवाले ।

पृष्ठ 1802

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1802 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एकोनत्रिंशोऽध्यायः भीमसेनका पूर्व दिशाको जीतनेके लिये प्रस्थान और विभिन्न देशोंपर विजय पाना वैशम्पायन उवाच

एतस्मिन्नेव काले तु भीमसेनोऽपि वीर्यवान् ।

धर्मराजमनुप्राप्य ययौ प्राचीं दिशं प्रति ॥ १ ॥

महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना ।

हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् ॥ २ ॥

वृतो भरतशार्दूलो द्विषच्छोकविवर्द्धनः । वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले ॥ १- २३ ॥ स गत्वा नरशार्दूलः पञ्चालानां पुरं महत् ॥ ३ ॥

पञ्चालान् विविधोपायैः सान्त्वयामास पाण्डवः । नरश्रेष्ठ भीमसेनने पहले पांचालोंकी महानगरी अहिच्छत्रामें जाकर भाँति- भाँतिके उपायोंसे पांचाल वीरोंको समझा -बुझाकर वशमें किया ॥ ३३ ॥

ततः स गण्डकाञ्छूरो विदेहान् भरतर्षभः ॥ ४ ॥

विजित्याल्पेन कालेन दशार्णानजयत् प्रभुः ।

तत्र दाशार्णको राजा सुधर्मा लोमहर्षणम् ।

कृतवान् भीमसेनेन महद् युद्धं निरायुधम् ॥ ५ ॥

वहाँसे आगे जाकर उन भरतवंशशिरोमणि शूर-वीर भीमने गण्डक ( गण्डकी नदीके तटवर्ती) और विदेह ( मिथिला ) देशोंको थोड़े ही समयमें जीतकर दशार्ण देशको भी अपने अधिकारमें कर लिया । वहाँ दशार्णनरेश सुधर्माने भीमसेनके साथ बिना अस्त्र- शस्त्रके ही महान् युद्ध किया । उन दोनोंका वह मल्लयुद्ध रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ॥ ४-५ ॥

भीमसेनस्तु तद् दृष्ट्वा तस्य कर्म महात्मनः ।

अधिसेनापतिं चक्रे सुधर्माणं महाबलम् ॥ ६ ॥

भीमसेनने उस महामना राजाका यह अद्भुत पराक्रम देखकर महाबली सुधर्माको अपना प्रधान सेनापति बना दिया ॥ ६ ॥

ततः प्राचीं दिशं भीमो ययौ भीमपराक्रमः ।

पृष्ठ 1803

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1803 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सैन्येन महता राजन् कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥ ७ ॥

राजन्! इसके बाद भयानक पराक्रमी भीमसेन पुनः विशाल सेनाके साथ पृथ्वीको कँपाते हुए पूर्व दिशाकी ओर बढ़े ॥ ७ ॥

सोऽश्वमेधेश्वरं राजन् रोचमानं सहानुगम् ।

जिगाय समरे वीरो बलेन बलिनां वरः ॥ ८ ॥

जनमेजय! बलवानोंमें श्रेष्ठ वीरवर भीमने अश्वमेध -देशके राजा रोचमानको उनके सेवकोंसहित बलपूर्वक जीत लिया ॥ ८ ॥

स तं निर्जित्य कौन्तेयो नातितीव्रेण कर्मणा ।

पूर्वदेशं महावीर्यो विजिग्ये कुरुनन्दनः ॥ ९ ॥

उन्हें हराकर महापराक्रमी कुरुनन्दन कुन्तीकुमार भीमने कोमल बर्तावके द्वारा ही पूर्वदेशपर विजय प्राप्त कर ली ॥ ९ ॥

ततो दक्षिणमागम्य पुलिन्दनगरं महत् ।

सुकुमारं वशे चक्रे सुमित्रं च नराधिपम् ॥ १० ॥

तदनन्तर दक्षिण आकर पुलिन्दोंके महान् नगर सुकुमार और वहाँके राजा सुमित्रको अपने अधीन कर लिया ॥ १० ॥

ततस्तु धर्मराजस्य शासनाद् भरतर्षभः ।

शिशुपालं महावीर्यमभ्यगाज्जनमेजय ॥ ११ ॥

जनमेजय! तत्पश्चात् भरतश्रेष्ठ भीम धर्मराजकी आज्ञासे महापराक्रमी शिशुपालके यहाँ गये ॥ ११ ॥

चेदिराजोऽपि तच्छ्रुत्वा पाण्डवस्य चिकीर्षितम् ।

उपनिष्क्रम्य नगरात् प्रत्यगृह्णात् परंतप ॥ १२ ॥

परंतप! चेदिराज शिशुपालने भी पाण्डुकुमार भीमका अभिप्राय जानकर नगरसे बाहर आ स्वागत - सत्कारके साथ उन्हें अपनाया ॥ १२ ॥

तौ समेत्य महाराज कुरुचेदिवृषौ तदा ।

उभयोरात्मकुलयोः कौशल्यं पर्यपृच्छताम् ॥ १३ ॥

महाराज! कुरुकुल और चेदिकुलके वे श्रेष्ठ पुरुष परस्पर मिलकर दोनोंने दोनों कुलोंके कुशल- प्रश्न पूछे ॥ १३ ॥

ततो निवेद्य तद् राष्ट्रं चेदिराजो विशाम्पते ।

उवाच भीमं प्रहसन् किमिदं कुरुषेऽनघ ॥ १४ ॥

राजन्! तदनन्तर चेदिराजने अपना राष्ट्र भीमसेनको सौंपकर हँसते हुए पूछा — ‘ अनघ! यह क्या करते हो? ' ॥ १४ ॥

तस्य भीमस्तदाऽऽचख्यौ धर्मराजचिकीर्षितम् ।

स च तं प्रतिगृह्यैव तथा चक्रे नराधिपः ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1804

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1804 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तब भीमने उससे धर्मराज जो कुछ करना चाहते थे, वह सब कह सुनाया । तदनन्तर राजा शिशुपालने उनकी बात मानकर कर देना स्वीकार कर लिया ॥ १५ ॥

ततो भीमस्तत्र राजन्नुषित्वा त्रिदश क्षपाः ।

सत्कृतः शिशुपालेन ययौ सबलवाहनः ॥ १६ ॥

राजन्! उसके बाद शिशुपालसे सम्मानित हो भीमसेन अपनी सेना और सवारियोंके

साथ तेरह दिन वहाँ रह गये । तत्पश्चात् वहाँसे विदा हुए ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि भीमदिग्विजये एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २ ९ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गतदिग्विजयपर्वमें भीमदिग्विजयविषयक उन्तीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥

पृष्ठ 1805

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1805 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

त्रिंशोऽध्यायः भीमका पूर्व दिशाके अनेक देशों तथा राजाओंको जीतकर भारी धन - सम्पत्तिके साथ इन्द्रप्रस्थमें लौटना वैशम्पायन उवाच

ततः कुमारविषये श्रेणिमन्तमथाजयत् ।

कोसलाधिपतिं चैव बृहद्बलमरिंदमः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तदनन्तर शत्रुओंका दमन करनेवाले भीमसेनने कुमारदेशके राजा श्रेणिमान् तथा कोसलराज बृहद्बलको परास्त किया ॥ १ ॥

अयोध्यायां तु धर्मज्ञं दीर्घयज्ञं महाबलम् ।

अजयत् पाण्डवश्रेष्ठो नातितीव्रेण कर्मणा ॥ २ ॥

इसके बाद अयोध्याके धर्मज्ञ नरेश महाबली दीर्घयज्ञको पाण्डवश्रेष्ठ भीमने कोमलतापूर्ण बर्तावसे वशमें कर लिया ॥ २ ॥

ततो गोपालकक्षं च सोत्तरानपि कोसलान् ।

मल्लानामधिपं चैव पार्थिवं चाजयत् प्रभुः ॥ ३ ॥

तत्पश्चात् शक्तिशाली पाण्डुकुमारने गोपालकक्ष और उत्तर कोसल देशको जीतकर मल्लराष्ट्रके अधिपति पार्थिवको अपने अधीन कर लिया ॥ ३ ॥

ततो हिमवतः पार्श्वं समभ्येत्य जलोद्भवम् ।

सर्वमल्पेन कालेन देशं चक्रे वशं बली ॥ ४ ॥

इसके बाद हिमालयके पास जाकर बलवान् भीमने सारे जलोद्भव देशपर थोड़े ही समयमें अधिकार प्राप्त कर लिया ॥ ४ ॥

एवं बहुविधान् देशान् विजिग्ये भरतर्षभः ।

भल्लाटमभितो जिग्ये शुक्तिमन्तं च पर्वतम् ॥ ५ ॥

इस प्रकार भरतवंशभूषण भीमसेनने अनेक देश जीते और भल्लाटके समीपवर्ती देशों तथा शुक्तिमान् पर्वतपर भी विजय प्राप्त की ॥ ५ ॥

पाण्डवः सुमहावीर्यो बलेन बलिनां वरः ।

स काशिराजं समरे सुबाहुमनिवर्तिनम् ॥ ६ ॥

वशे चक्रे महाबाहुर्भीमो भीमपराक्रमः । बलवानोंमें श्रेष्ठ महापराक्रमी तथा भयंकर पुरुषार्थ प्रकट करनेवाले पाण्डुकुमार महाबाहु भीमसेनने समरमें पीठ न दिखानेवाले काशिराज सुबाहुको बलपूर्वक हराया ॥ ३ ॥

पृष्ठ 1806

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1806 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ततः सुपार्श्वमभितस्तथा राजपतिं क्रथम् ॥ ७ ॥

युध्यमानं बलात् संख्ये विजिग्ये पाण्डवर्षभः । इसके बाद पाण्डुपुत्र भीमने सुपार्श्वके निकट राजराजेश्वर क्रथको, जो युद्धमें बलपूर्वक उनका सामना कर रहे थे, हरा दिया ॥ ७३ ॥

ततो मत्स्यान् महातेजा मलदांश्च महाबलान् ॥ ८ ॥

अनघानभयांश्चैव पशुभूमिं च सर्वशः ।

निवृत्य च महाबाहुर्मदधारं महीधरम् ॥ ९ ॥

सोमधेयांश्च निर्जित्य प्रययावुत्तरामुखः ।

वत्सभूमिं च कौन्तेयो विजिग्ये बलवान् बलात् ॥ १० ॥

तत्पश्चात् महातेजस्वी कुन्तीकुमारने मत्स्य, महाबली मलद, अनघ और अभय नामक देशोंको जीतकर पशुभूमि ( पशुपतिनाथके निकटवर्ती स्थान - नेपाल) -को भी सब ओरसे जीत लिया । वहाँसे लौटकर महाबाहु भीमने मदधार पर्वत और सोमधेयनिवासियों - को परास्त किया । इसके बाद बलवान् भीमने उत्तराभिमुख यात्रा की और वत्सभूमिपर बलपूर्वक अधिकार जमा लिया ॥ ८–१० ॥

भर्गाणामधिपं चैव निषादाधिपतिं तथा ।

विजिग्ये भूमिपालांश्च मणिमत्प्रमुखान् बहून् ॥ ११ ॥

ततो दक्षिणमल्लांश्च भोगवन्तं च पर्वतम् ।

तरसैवाजयद् भीमो नातितीव्रेण कर्मणा ॥ १२ ॥

फिर क्रमशः भर्गोंके स्वामी, निषादोंके अधिपति तथा मणिमान् आदि बहुत - से भूपालोंको अपने अधिकारमें कर लिया । तदनन्तर दक्षिण मल्लदेश तथा भोगवान् पर्वतको भीमसेनने अधिक प्रयास किये बिना ही वेगपूर्वक जीत लिया ॥ ११-१२ ॥

शर्मकान् वर्मकांश्चैव व्यजयत् सान्त्वपूर्वकम् ।

वैदेहकं च राजानं जनकं जगतीपतिम् ॥ १३ ॥

विजिग्ये पुरुषव्याघ्रो नातितीव्रेण कर्मणा ।

शकांश्च बर्बरांश्चैव अजयच्छद्मपूर्वकम् ॥ १४ ॥

शर्मक और वर्मकोंको उन्होंने समझा- बुझाकर ही जीत लिया । विदेह देशके राजा जनकको भी पुरुषसिंह भीमने अधिक उग्र प्रयास किये बिना ही परास्त किया । फिर शकों और बर्बरोंपर छलसे विजय प्राप्त कर ली ॥ १३-१४ ॥

वैदेहस्थस्तु कौन्तेय इन्द्रपर्वतमन्तिकात् ।

किरातानामधिपतीनजयत् सप्त पाण्डवः ॥ १५ ॥

ततः सुह्मान् प्रसुह्मांश्च सपक्षानतिवीर्यवान् ।

विजित्य युधि कौन्तेयो मागधानभ्यधाद् बली ॥ १६ ॥

पृष्ठ 1807

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1807 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विदेह देशमें ही ठहरकर कुन्तीकुमार भीमने इन्द्रपर्वतके निकटवर्ती सात किरातराजोंको जीत लिया । इसके बाद सु और प्रसु देशके राजाओंको, जिनके पक्षमें बहुत लोग थे, अत्यन्त पराक्रमी और बलवान् कुन्तीकुमार भीम युद्धमें परास्त करके मगधदेशको चल दिये ॥ १५-१६ ॥

दण्डं च दण्डधारं च विजित्य पृथिवीपतीन् ।

तैरेव सहितैः सर्वैर्गिरिव्रजमुपाद्रवत् ॥ १७ ॥

मार्गमें दण्ड- दण्डधार तथा अन्य राजाओंको जीतकर उन सबके साथ वे गिरिव्रज नगरमें आये ॥ १७ ॥

जारासंधिं सान्त्वयित्वा करे च विनिवेश्य ह ।

तैरेव सहितैः सर्वैः कर्णमभ्यद्रवद् बली ॥ १८ ॥

स कम्पयन्निव महीं बलेन चतुरङ्गिणा ।

युयुधे पाण्डवश्रेष्ठः कर्णेनामित्रघातिना ॥ १ ९ ॥

स कर्णं युधि निर्जित्य वशे कृत्वा च भारत ।

ततो विजिग्ये बलवान् राज्ञः पर्वतवासिनः ॥ २० ॥

अथ मोदागिरौ चैव राजानं बलवत्तरम् ।

पाण्डवो बाहुवीर्येण निजघान महामृधे ॥ २१ ॥

वहाँ जरासंधकुमार सहदेवको सान्त्वना देकर उसे कर देनेकी शर्तपर उसी राज्यपर प्रतिष्ठित कर दिया और उन सबके साथ बलवान् भीमने कर्णपर चढ़ाई की । पाण्डवश्रेष्ठ भीमने पृथ्वीको कम्पित - सी करते हुए चतुरंगिणी सेना साथ ले शत्रुघाती कर्णके साथ युद्ध छेड़ दिया । भारत! उस युद्धमें कर्णको परास्त करके अपने वशमें कर लेनेके पश्चात् बलवान् भीमने पर्वतीय राजाओंपर विजय प्राप्त की । तदनन्तर पाण्डुनन्दन भीमसेनने मोदागिरिके अत्यन्त बलिष्ठ राजाको अपनी भुजाओंके बलसे महासमरमें मार गिराया ॥ १८–२१ ॥

ततः पुण्ड्राधिपं वीरं वासुदेवं महाबलम् ।

कौशिकीकच्छनिलयं राजानं च महौजसम् ॥ २२ ॥

उभौ बलभृतौ वीरावुभौ तीव्रपराक्रमौ ।

निर्जित्याजौ महाराज वङ्गराजमुपाद्रवत् ॥ २३ ॥

महाराज! तत्पश्चात् भीमसेन पुण्ड्रकदेशके अधिपति महाबली वीर राजा वासुदेवके साथ, जो कोसी नदीके कछारमें रहनेवाले तथा महान् तेजस्वी थे, जा भिड़े । वे दोनों ही बलवान् एवं दुःसह पराक्रमवाले वीर थे । भीमने विपक्षी वासुदेव ( पौण्ड्रक) -को युद्धमें हराकर वंगदेशके राजापर आक्रमण किया ॥ २२-२३ ॥

समुद्रसेनं निर्जित्य चन्द्रसेनं च पार्थिवम् ।

ताम्रलिप्तं च राजानं कर्वटाधिपतिं तथा ॥ २४ ॥

सुह्मानामधिपं चैव ये च सागरवासिनः ।

पृष्ठ 1808

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1808 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सर्वान् म्लेच्छगणांश्चैव विजिग्ये भरतर्षभः ॥ २५ ॥

तदनन्तर भरतश्रेष्ठ भीमसेनने समुद्रसेन, भूपाल चन्द्रसेन, राजा ताम्रलिप्त, कर्वटाधिपति तथा सुझनरेशको जीतकर समुद्रके तटपर निवास करनेवाले समस्त म्लेच्छोंको भी अपने अधीन कर लिया ॥ २४-२५ ॥

एवं बहुविधान् देशान् विजित्य पवनात्मजः ।

वसु तेभ्य उपादाय लौहित्यमगमद् बली ॥ २६ ॥

इस प्रकार पवनपुत्र बलवान् भीमने बहुत - से देशोंपर अधिकार प्राप्त करके उन सबसे धन लेकर लौहित्य देशकी यात्रा की ॥ २६ ॥

स सर्वान् म्लेच्छनृपतीन् सागरानूपवासिनः ।

करमाहारयामास रत्नानि विविधानि च ॥ २७ ॥

वहाँ उन्होंने समुद्रके टापुओंमें रहनेवाले बहुत- से म्लेच्छ राजाओंको जीतकर उनसे करके रूपमें भाँति- भाँतिके रत्न वसूल किये ॥ २७ ॥

चन्दनागुरुवस्त्राणि मणिमौक्तिककम्बलम् ।

काञ्चनं रजतं चैव विद्रुमं च महाधनम् ॥ २८ ॥

ते कोटिशतसंख्येन कौन्तेयं महता तदा ।

अभ्यवर्षन् महात्मानं धनवर्षेण पाण्डवम् ॥ २ ९ ॥

इतना ही नहीं, उन राजाओंने भीमसेनको चन्दन, अगुरु, वस्त्र, मणि, मोती, कम्बल, सोना, चाँदी और बहुमूल्य मूँगे भेंट किये । कुन्ती और पाण्डुके पुत्र महात्मा भीमसेनके पास उन्होंने करोड़की संख्यामें धन- रत्नोंकी वर्षा की ( करके रूपमें धन-रत्न प्रदान किये ) ॥ २८-२९ ॥

पृष्ठ 1809

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1809 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

इन्द्रप्रस्थमुपागम्य भीमो भीमपराक्रमः ।

निवेदयामास तदा धर्मराजाय तद् धनम् ॥ ३० ॥

तदनन्तर भयानक पराक्रमी भीमने इन्द्रप्रस्थमें आकर वह सारा धन धर्मराजको सौंप दिया ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि भीमप्राचीदिग्विजये त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत दिग्विजयपर्वमें भीमके द्वारा पूर्व दिशाकी विजयसे सम्बन्ध रखनेवाला तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३० ॥

पृष्ठ 1810

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1810 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एकत्रिंशोऽध्यायः सहदेवके द्वारा दक्षिण दिशाकी विजय वैशम्पायन उवाच

तथैव सहदेवोऽपि धर्मराजेन पूजितः ।

महत्या सेनया राजन् प्रययौ दक्षिणां दिशम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! सहदेव भी धर्मराज युधिष्ठिरसे सम्मानित हो दक्षिण दिशापर विजय पानेके लिये विशाल सेनाके साथ प्रस्थित हुए ॥ १ ॥

स शूरसेनान् कार्त्स्न्येन पूर्वमेवाजयत् प्रभुः ।

मत्स्यराजं च कौरव्यो वशे चक्रे बलाद् बली ॥ २ ॥

शक्तिशाली सहदेवने सबसे पहले समस्त शूरसेननिवासियोंको पूर्णरूपसे जीत लिया; फिर मत्स्यराज विराटको अपने अधीन बनाया ॥ २ ॥

अधिराजाधिपं चैव दन्तवक्रं महाबलम् ।

जिगाय करदं चैव कृत्वा राज्ये न्यवेशयत् ॥ ३ ॥

राजाओंके अधिपति महाबली दन्तवक्रको भी परास्त किया और उसे कर देनेवाला बनाकर फिर उसी राज्यपर प्रतिष्ठित कर दिया ॥ ३ ॥

सुकुमारं वशे चक्रे सुमित्रं च नराधिपम् ।

तथैवापरमत्स्यांश्च व्यजयत् स पटच्चरान् ॥ ४ ॥

निषादभूमिं गोशृङ्गं पर्वतप्रवरं तथा ।

तरसैवाजयद् धीमान् श्रेणिमन्तं च पार्थिवम् ॥ ५ ॥

इसके बाद राजा सुकुमार तथा सुमित्रको वशमें किया । इसी प्रकार अपर मत्स्यों और लुटेरोंपर भी विजय प्राप्त की । तदनन्तर निषाददेश तथा पर्वतप्रवर गोशृंगको जीतकर बुद्धिमान् सहदेवने राजा श्रेणिमान्‌को वेगपूर्वक परास्त किया ॥ ४-५ ॥

नरराष्ट्रं च निर्जित्य कुन्तिभोजमुपाद्रवत् ।

प्रीतिपूर्वं च तस्यासौ प्रतिजग्राह शासनम् ॥ ६ ॥

फिर नरराष्ट्रको जीतकर राजा कुन्तिभोजपर धावा किया । परंतु कुन्तिभोजने प्रसन्नताके साथ ही उसका शासन स्वीकार कर लिया ॥ ६ ॥

ततश्चर्मण्वतीकूले जम्भकस्यात्मजं नृपम् ।

ददर्श वासुदेवेन शेषितं पूर्ववैरिणा ॥ ७ ॥

इसके बाद चर्मण्वतीके तटपर सहदेवने जम्भकके पुत्रको देखा, जिसे पूर्ववैरी वासुदेवने जीवित छोड़ दिया था ॥ ७ ॥

चक्रे तेन स संग्रामं सहदेवेन भारत ।