महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 2131–2140
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2131–2140
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राजाओंको पृथक् - पृथक् पाण्डवोंकी पराजय सूचित की ॥ ३१ ॥
शकुनिरुवाच
अस्ति ते वै प्रिया राजन् ग्लह एकोऽपराजितः ।
पणस्व कृष्णां पाञ्चालीं तयाऽऽत्मानं पुनर्जय ॥ ३२ ॥
तत्पश्चात् शकुनिने फिर कहा- राजन्! आपकी प्रियतमा द्रौपदी एक ऐसा दाँव है, जिसे आप अबतक नहीं हारे हैं; अतः पांचालराजकुमारी कृष्णाको आप दाँवपर रखिये और उसके द्वारा फिर अपनेको जीत लीजिये ॥ ३२ ॥
युधिष्ठिर उवाच
नैव ह्रस्वा न महती न कृष्णा नातिरोहिणी ।
नीलकुञ्चितकेशी च तया दीव्याम्यहं त्वया ॥ ३३ ॥
युधिष्ठिरने कहा — जो न नाटी है न लंबी, न कृष्णवर्णा है न अधिक रक्तवर्णा तथा जिसके केश नीले और घुंघराले हैं, उस द्रौपदीको दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ जूआ खेलता हूँ ॥ ३३ ॥
शारदोत्पलपत्राक्ष्या शारदोत्पलगन्धया ।
शारदोत्पलसेविन्या रूपेण श्रीसमानया ॥ ३४ ॥
उसके नेत्र शरद्- ऋतुके प्रफुल्ल कमलदलके समान सुन्दर एवं विशाल हैं। उसके शरीरसे शारदीय कमलके समान सुगन्ध फैलती रहती है । वह शरद् ऋतुके कमलोंका सेवन करती है तथा रूपमें साक्षात् लक्ष्मीके समान है ॥ ३४ ॥
तथैव स्यादानृशंस्यात् तथा स्याद् रूपसम्पदा ।
तथा स्याच्छीलसम्पत्त्या यामिच्छेत् पुरुषः स्त्रियम् ॥ ३५ ॥
पुरुष जैसी स्त्री प्राप्त करनेकी अभिलाषा रखता है, उसमें वैसा ही दयाभाव है, वैसी ही रूपसम्पत्ति है तथा वैसे ही शील- स्वभाव हैं ॥ ३५ ॥
सर्वैगुणैर्हि सम्पन्नामनुकूलां प्रियंवदाम् ।
यादृशीं धर्मकामार्थसिद्धिमिच्छेन्नरः स्त्रियम् ॥ ३६ ॥
वह समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न तथा मनके अनुकूल और प्रिय वचन बोलनेवाली है । मनुष्य धर्म, काम और अर्थकी सिद्धिके लिये जैसी पत्नीकी इच्छा रखता है, द्रौपदी वैसी ही है ॥ ३६ ॥
चरमं संविशति या प्रथमं प्रतिबुध्यते ।
आगोपालाविपालेभ्यः सर्वं वेद कृताकृतम् ॥ ३७ ॥
वह ग्वालों और भेड़ोंके चरवाहोंसे भी पीछे सोती और सबसे पहले जागती है । कौन-सा कार्य हुआ और कौन - सा नहीं हुआ, इन सबकी वह जानकारी रखती है ॥ ३७ ॥
आभाति पद्मवद् वक्त्रं सस्वेदं मल्लिकेव च ।
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वेदिमध्या दीर्घकेशी ताम्रास्या नातिलोमशा ॥ ३८ ॥
उसका स्वेदबिन्दुओंसे विभूषित मुख कमलके समान सुन्दर और मल्लिकाके समान सुगन्धित है । उसका मध्यभाग वेदीके समान कृश दिखायी देता है । उसके सिरके केश बड़े-बड़े हैं, मुख और ओष्ठ अरुणवर्णके हैं तथा उसके अंगोंमें अधिक रोमावलियाँ नहीं हैं ॥ ३८ ॥
तयैवंविधया राजन् पाञ्चाल्याहं सुमध्यया ।
ग्लहं दीव्यामि चार्वङ्गया द्रौपद्या हन्त सौबल ॥ ३ ९ ॥
सुबलपुत्र! ऐसी सर्वांगसुन्दरी सुमध्यमा पांचाल- राजकुमारी द्रौपदीको दाँवपर रखकर मैं तुम्हारे साथ जूआ खेलता हूँ; यद्यपि ऐसा करते हुए मुझे महान् कष्ट हो रहा है ॥ ३ ९ ॥ वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ते तु वचने धर्मराजेन धीमता ।
धिग्धिगित्येव वृद्धानां सभ्यानां निःसृता गिरः ॥ ४० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! बुद्धिमान् धर्मराजके ऐसा कहते ही उस सभामें बैठे हुए बड़े - बूढ़े लोगोंके मुखसे ' धिक्कार है, धिक्कार है ' की आवाज आने लगी ॥ ४० ॥
चुक्षुभे सा सभा राजन् राज्ञां संजज्ञिरे शुचः ।
भीष्मद्रोणकृपादीनां स्वेदश्च समजायत ॥ ४१ ॥
राजन्! उस समय सारी सभामें हलचल मच गयी । राजाओंको बड़ा शोक हुआ । भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य आदिके शरीरसे पसीना छूटने लगा ॥ ४१ ॥
शिरो गृहीत्वा विदुरो गतसत्त्व इवाभवत् ।
आस्ते ध्यायन्नधोवक्त्रो निःश्वसन्निव पन्नगः ॥ ४२ ॥
विदुरजी तो दोनों हाथोंसे अपना सिर थामकर बेहोश से हो गये । वे फुंफकारते हुए सर्पकी भाँति उच्छ्वास लेकर मुँह नीचे किये हुए गम्भीर चिन्तामें निमग्न हो बैठे रह गये ॥ ४२ ॥
(बाह्लीक: सोमदत्तश्च प्रातीपेयः ससंजयः ।
द्रौणिभूरिश्रवाश्चैव युयुत्सुर्धृतराष्ट्रजः ॥
हस्तौ पिंषन्नधोवक्त्रा निःश्वसन्त इवोरगाः ॥ ) बाह्लीक, प्रतीपके पौत्र सोमदत्त, भीष्म, संजय, अश्वत्थामा, भूरिश्रवा तथा धृतराष्ट्रपुत्र युयुत्सु — ये सब मुँह नीचे किये सर्पोंके समान लंबी साँसें खींचते हुए अपने दोनों हाथ मलने लगे ।
धृतराष्ट्रस्तु तं हृष्टः पर्यपृच्छत् पुनः पुनः ।
किं जितं किं जितमिति ह्याकारं नाभ्यरक्षत ॥ ४३ ॥
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धृतराष्ट्र मन- ही- मन प्रसन्न हो उनसे बार- बार पूछ रहे थे, ' क्या हमारे पक्षकी जीत हो रही है? ' वे अपनी प्रसन्नताकी आकृतिको न छिपा सके ॥ ४३ ॥
कर्णोऽतिभृशं सह दुःशासनादिभिः ।
इतरेषां तु सभ्यानां नेत्रेभ्यः प्रापतज्जलम् ॥ ४४ ॥
दुःशासन आदिके साथ कर्णको तो बड़ा हर्ष हुआ; परंतु अन्य सभासदोंकी आँखोंसे आँसू गिरने लगे ॥ ४४ ॥
सौबलस्त्वभिधायैवं जितकाशी मदोत्कटः ।
जितमित्येव तानक्षान् पुनरेवान्वपद्यत ॥ ४५ ॥
सुबलपुत्र शकुनिने मैंने यह भी जीत लिया, ऐसा कहकर पासोंको पुनः उठा लिया ।
उस समय वह विजयोल्लाससे सुशोभित और मदोन्मत्त हो रहा था ॥ ४५ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि द्रौपदीपराजये पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥
६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें द्रौपदीपराजयविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल ४६३ श्लोक हैं )
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षट्षष्टितमोऽध्यायः विदुरका दुर्योधनको फटकारना दुर्योधन उवाच एहि क्षत्तर्द्रौपदीमानयस्व प्रियां भार्यां सम्मतां पाण्डवानाम् । सम्मार्जतां वेश्म परैतु शीघ्रं तत्रास्तु दासीभिरपुण्यशीला ॥ १ ॥
दुर्योधन बोला - विदुर! यहाँ आओ । तुम जाकर पाण्डवोंकी प्यारी और मनोनुकूल पत्नी द्रौपदीको यहाँ ले आओ । वह पापाचारिणी शीघ्र यहाँ आये और मेरे महलमें झाड़ू लगाये । उसे वहीं दासियोंके साथ रहना होगा ॥ १ ॥
विदुर उवाच दुर्विभाषं भाषितं त्वादृशेन न मन्द सम्बुध्यसि पाशबद्धः । प्रपाते त्वं लम्बमानो न वेत्सि व्याघ्रान् मृगः कोपयसेऽतिवेलम् ॥ २ ॥
विदुर बोले — ओ मूर्ख! तेरे - जैसे नीचके मुखसे ही ऐसा दुर्वचन निकल सकता है । अरे! तू कालपाशसे बँधा हुआ है, इसीलिये कुछ समझ नहीं पाता । तू ऐसे ऊँचे स्थानमें लटक रहा है जहाँसे गिरकर प्राण जानेमें अधिक विलम्ब नहीं; किंतु तुझे इस बातका पता नहीं है । तू एक साधारण मृग होकर व्याघ्रोंको अत्यन्त क्रुद्ध कर रहा है ॥
आशीविषास्ते शिरसि पूर्णकोपा महाविषाः ।
मा कोपिष्ठाः सुमन्दात्मन् मा गमस्त्वं यमक्षयम् ॥ ३ ॥
मन्दात्मन्! तेरे सिरपर कोपमें भरे हुए महान् विषधर सर्प चढ़ आये हैं। तू उनका क्रोध न बढ़ा, यमलोक जानेको उद्यत न हो ॥ ३ ॥
न हि दासीत्वमापन्ना कृष्णा भवितुमर्हति ।
अनीशेन हि राज्ञैषा पणे न्यस्तेति मे मतिः ॥ ४ ॥
द्रौपदी कभी दासी नहीं हो सकती, क्योंकि राजा युधिष्ठिर जब पहले अपनेको हारकर द्रौपदीको दाँवपर लगानेका अधिकार खो चुके थे, उस दशामें उन्होंने इसे दाँवपर रखा है ( अतः मेरा विश्वास है कि द्रौपदी हारी नहीं गयी) ॥ अयं धत्ते वेणुरिवात्मघाती फलं राजा धृतराष्ट्रस्य पुत्रः ।
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द्यूतं हि वैराय महाभयाय मत्तो न बुध्यत्ययमन्तकालम् ॥ ५ ॥
जैसे बाँस अपने नाशके लिये ही फल धारण करता है, उसी प्रकार धृतराष्ट्रके पुत्र इस राजा दुर्योधनने महान् भयदायक वैरकी सृष्टिके लिये इस जूएके खेलको अपनाया है । यह ऐसा मतवाला हो गया है कि मौत सिरपर नाच रही है; किंतु इसे उसका पता ही नहीं है ॥ नारुन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी न हीनतः परमभ्याददीत । ययास्य वाचा पर उद्विजेत न तां वदेदुषतीं पापलोक्याम् ॥ ६ ॥
किसीको मर्मभेदी बात न कहे, किसीसे कठोर वचन न बोले । नीच कर्मके द्वारा शत्रुको वशमें करनेकी चेष्टा न करे । जिस बातसे दूसरेको उद्वेग हो, जो जलन पैदा करनेवाली और नरककी प्राप्ति करानेवाली हो, वैसी बात मुँहसे कभी न निकाले ॥ ६ ॥
समुच्चरन्त्यतिवादाश्च वक्त्राद् यैराहतः शोचति रात्र्यहानि । परस्य नामर्मसु ते पतन्ति तान् पण्डितो नावसृजेत् परेषु ॥ ७ ॥
मुँहसे जो कटु वचनरूपी बाण निकलते हैं, उनसे आहत हुआ मनुष्य रात - दिन शोक और चिन्तामें डूबा रहता है । वे दूसरेके मर्मपर ही आघात करते हैं; अतः विद्वान् पुरुषको दूसरोंके प्रति निष्ठुर वचनोंका प्रयोग नहीं करना चाहिये ॥ ७ ॥
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द्यूत - क्रीडामें युधिष्ठिरकी पराजय Gome दुःशासनका द्रौपदीके केश पकड़कर खींचना
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अजो हि शस्त्रमगिलत् किलैकः शस्त्रे विपन्ने शिरसास्य भूमौ । निकृन्तनं स्वस्य कण्ठस्य घोरं तद्वद् वैरं मा कृथाः पाण्डुपुत्रैः ॥ ८ ॥
कहते हैं, एक बकरा कोई शस्त्र निगलने लगा; किंतु जब वह निगला न जा सका, तब उसने पृथ्वीपर अपना सिर पटक- पटककर उस शस्त्रको निगल जानेका प्रयत्न किया । जिसका परिणाम यह हुआ कि वह भयानक शस्त्र उस बकरेका ही गला काटनेवाला हो गया । इसी प्रकार तुम पाण्डवोंसे वैर न ठानो ॥ ८ ॥
न किंचिदित्थं प्रवदन्ति पार्था वनेचरं वा गृहमेधिनं वा । तपस्विनं वा परिपूर्णविद्यं भषन्ति हैवं श्वनराः सदैव ॥ ९ ॥
कुन्तीके पुत्र किसी वनवासी, गृहस्थ, तपस्वी अथवा विद्वान्से ऐसी कड़ी बात कभी नहीं बोलते । तुम्हारे जैसे कुत्तेके से स्वभाववाले मनुष्य ही सदा इस तरह दूसरोंको भूँका करते हैं ॥ ९ ॥
द्वारं सुघोरं नरकस्य जिह्मं न बुध्यते धृतराष्ट्रस्य पुत्रः । तमन्वेतारो बहवः कुरूणां द्यूतोदये सह दुःशासनेन ॥ १० ॥
धृतराष्ट्रका पुत्र नरकके अत्यन्त भयंकर एवं कुटिल द्वारको नहीं देख रहा है । दुःशासनके साथ कौरवोंमेंसे बहुत- से लोग दुर्योधनकी इस द्यूतक्रीड़ामें उसके साथी बन गये ॥ मज्जन्त्यलाबूनि शिलाः प्लवन्ते मुह्यन्ति नावोऽम्भसि शश्वदेव । मूढो राजा धृतराष्ट्रस्य पुत्रो न मे वाचः पथ्यरूपाः शृणोति ॥ ११ ॥
चाहे तूंबी जलमें डूब जाय, पत्थर तैरने लग जाय तथा नौकाएँ भी सदा ही जलमें डूब जाया करें; परंतु धृतराष्ट्रका यह मूर्ख पुत्र राजा दुर्योधन मेरी हितकर बातें नहीं सुन सकता ॥ ११ ॥
अन्तो नूनं भवितायं कुरूणां सुदारुणः सर्वहरो विनाशः । वाचः काव्याः सुहृदां पथ्यरूपा न श्रूयन्ते वर्धते लोभ एव ॥ १२ ॥
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यह दुर्योधन निश्चय ही कुरुकुलका नाश करनेवाला होगा । इसके द्वारा अत्यन्त भयंकर सर्वनाशका अवसर उपस्थित होगा । यह अपने सुहृदोंका पाण्डित्यपूर्ण हितकर वचन भी नहीं सुनता; इसका लोभ बढ़ता ही जा रहा है ॥ इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि विदुरवाक्ये षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें विदुरवाक्यविषयक छाछठवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ६६ ॥
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सप्तषष्टितमोऽध्यायः प्रातिकामीके बुलानेसे न आनेपर दुःशासनका सभामें द्रौपदीको केश पकड़कर घसीटकर लाना एवं सभासदोंसे द्रौपदीका प्रश्न वैशम्पायन उवाच धिगस्तु क्षत्तारमिति ब्रुवाणो
दर्पेण मत्तो धृतराष्ट्रस्य पुत्रः ।
अवैक्षत प्रातिकामीं सभाया- मुवाच चैनं परमार्यमध्ये ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन गर्वसे उन्मत्त हो रहा था । उसने ' विदुरको धिक्कार है' ऐसा कहकर प्रातिकामीकी ओर देखा और सभामें बैठे हुए श्रेष्ठ पुरुषोंके बीच उससे कहा ॥ १ ॥
दुर्योधन उवाच प्रातिकामिन् द्रौपदीमानयस्व न ते भयं विद्यते पाण्डवेभ्यः । क्षत्ता ह्ययं विवदत्येव भीतो न चास्माकं वृद्धिकामः सदैव ॥ २ ॥
दुर्योधन बोला - प्रातिकामिन्! तुम द्रौपदीको यहाँ ले आओ । तुम्हें पाण्डवोंसे कोई भय नहीं है । ये विदुर तो डरपोक हैं, अतः सदा ऐसी ही बातें कहा करते हैं । ये कभी हमलोगोंकी वृद्धि नहीं चाहते ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच एवमुक्तः प्रातिकामी स सूतः प्रायाच्छीघ्रं राजवचो निशम्य । प्रविश्य च श्वेव हि सिंहगोष्ठं समासदन्महिषीं पाण्डवानाम् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! दुर्योधनके ऐसा कहनेपर राजाकी आज्ञा शिरोधार्य करके वह सूत प्रातिकामी शीघ्र चला गया एवं जैसे कुत्ता सिंहकी माँदमें घुसे, उसी प्रकार उस राजभवनमें प्रवेश करके वह पाण्डवोंकी महारानीके पास गया ॥ ३ ॥
प्रातिकाम्युवाच
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युधिष्ठिरो द्यूतमदेन मत्तो दुर्योधनो द्रौपदि त्वामजैषीत् । सा त्वं प्रपद्यस्व धृतराष्ट्रस्य वेश्म नयामि त्वां कर्मणे याज्ञसेनि ॥ ४ ॥
प्रातिकामी बोला- द्रुपदकुमारी! धर्मराज युधिष्ठिर जूएके मदसे उन्मत्त हो गये थे । उन्होंने सर्वस्व हारकर आपको दाँवपर लगा दिया । तब दुर्योधनने आपको जीत लिया । याज्ञसेनी! अब आप धृतराष्ट्रके महलमें पधारें। मैं आपको वहाँ दासीका काम करवानेके लिये ले चलता हूँ ॥ ४ ॥
द्रौपद्युवाच कथं त्वेवं वदसि प्रातिकामिन् को हि दीव्येद् भार्यया राजपुत्रः । मूढो राजा द्यूतमदेन मत्तो ह्यभून्नान्यत् कैतवमस्य किंचित् ॥ ५ ॥
द्रौपदीने कहा –प्रातिकामिन्! तू ऐसी बात कैसे कहता है? कौन राजकुमार अपनी पत्नीको दाँवपर रखकर जुआ खेलेगा? क्या राजा युधिष्ठिर जूएके नशेमें इतने पागल हो गये कि उनके पास जुआरियोंको देनेके लिये दूसरा कोई धन नहीं रह गया? ॥ ५ ॥
प्रातिकाम्युवाच यदा नाभूत् कैतवमन्यदस्य तदादेवीत् पाण्डवोऽजातशत्रुः । न्यस्ताः पूर्वं भ्रातरस्तेन राज्ञा स्वयं चात्मा त्वमथो राजपुत्रि ॥ ६ ॥
प्रातिकामी बोला - राजकुमारी! जब जुआरियोंको देनेके लिये दूसरा कोई धन नहीं रह गया, तब अजातशत्रु पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर इस प्रकार जूआ खेलने लगे । पहले तो उन्होंने अपने भाइयोंको दाँवपर लगाया, उसके बाद अपनेको और अन्तमें आपको भी दाँवपर रख दिया ॥ ६ ॥
द्रौपद्युवाच
गच्छ त्वं कितवं गत्वा सभायां पृच्छ सूतज ।
किं नु पूर्वं पराजैषीरात्मानमथवा नु माम् ॥ ७ ॥
द्रौपदीने कहा – सूतपुत्र! तुम सभामें उन जुआरी महाराजके पास जाओ और जाकर यह पूछो कि ‘ आप पहले अपनेको हारे थे या मुझे? ' ॥ ७ ॥
एतज्ज्ञात्वा समागच्छ ततो मां नय सूतज ।