महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 2161–2170
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2161–2170
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जब सभामें वस्त्रोंका ढेर लग गया, तब दुःशासन थककर लज्जित हो चुपचाप बैठ गया ॥ ५५ ॥
धिक्शब्दस्तु ततस्तत्र समभूल्लोमहर्षणः ।
सभ्यानां नरदेवानां दृष्ट्वा कुन्तीसुतांस्तथा ॥ ५६ ॥
उस समय कुन्तीपुत्रोंकी ओर देखकर सभामें उपस्थित नरेशोंकी ओरसे दुःशासनपर रोमांचकारी शब्दोंमें धिक्कारकी बौछार होने लगी ॥ ५६ ॥
न विब्रुवन्ति कौरव्याः प्रश्नमेतमिति स्म ह ।
स जनः क्रोशति स्मात्र धृतराष्ट्रं विगर्हयन् ॥ ५७ ॥
कौरव द्रौपदीके पूर्वोक्त प्रश्नपर स्पष्ट विवेचन नहीं कर रहे थे, अतः वहाँ बैठे हुए लोग राजा धृतराष्ट्रकी निन्दा करते हुए उन्हें कोसने लगे ॥ ५७ ॥
ततो बाहू समुच्छ्रित्य निवार्य च सभासदः ।
विदुरः सर्वधर्मज्ञ इदं वचनमब्रवीत् ॥ ५८ ॥
तब सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता विदुरजीने अपनी दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर सभासदोंको चुप कराया और इस प्रकार कहा ॥ विदुर उवाच
द्रौपदी प्रश्नमुक्त्वैवं रोरवीति ह्यनाथवत् ।
न च विब्रूत तं प्रश्नं सभ्या धर्मोऽत्र पीड्यते ॥ ५ ९ ॥
विदुरजी बोले- इस सभामें पधारे हुए भूपालगण! द्रुपदकुमारी कृष्णा यहाँ अपना प्रश्न उपस्थित करके इस तरह अनाथकी भाँति रो रही है; परंतु आपलोग उसका विवेचन नहीं करते, अतः यहाँ धर्मकी हानि हो रही है ॥
सभां प्रपद्यते ह्यार्तः प्रज्वलन्निव हव्यवाट् ।
तं वै सत्येन धर्मेण सभ्याः प्रशमयन्त्युत ॥ ६० ॥
संकटमें पड़ा हुआ मनुष्य अग्निकी भाँति चिन्तासे प्रज्वलित हुआ सभाकी शरण लेता है, उस समय सभासदगण धर्म और सत्यका आश्रय लेकर अपने वचनोंद्वारा उसे शान्त करते हैं ॥
धर्मप्रश्नमतो ब्रूयादार्यः सत्येन मानवः ।
विब्रूयुस्तत्र तं प्रश्नं कामक्रोधबलातिगाः ॥ ६१ ॥
अतः श्रेष्ठ मनुष्यको उचित है कि वह धर्मानुकूल प्रश्नको सचाईके साथ उपस्थित करे और सभासदोंको चाहिये कि वे काम- क्रोधके वेगसे ऊपर उठकर उस प्रश्नका ठीक- ठीक विवेचन करें ॥ ६१ ॥
विकर्णेन यथाप्रज्ञमुक्तः प्रश्नो नराधिपाः ।
भवन्तोऽपि हि तं प्रश्नं विब्रुवन्तु यथामति ॥ ६२ ॥
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-द्रौपदी चीर हरण
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राजाओ! विकर्णने अपनी बुद्धिके अनुसार इस प्रश्नका उत्तर दिया है, अब आपलोग भी अपनी - अपनी बुद्धिके अनुसार उस प्रश्नका निर्णय करें ॥ ६२ ॥
यो हि प्रश्नं न विब्रूयाद् धर्मदर्शी सभां गतः ।
अनृते या फलावाप्तिस्तस्याः सोऽर्धं समश्नुते ॥ ६३ ॥
जो धर्मज्ञ पुरुष सभामें जाकर वहाँ उपस्थित हुए प्रश्नका उत्तर नहीं देता, वह झूठ बोलनेके आधे फलका भागी होता है ॥ ६३ ॥
यः पुनर्वितथं ब्रूयाद् धर्मदर्शी सभां गतः ।
अनृतस्य फलं कृत्स्नं सम्प्राप्नोतीति निश्चयः ॥ ६४ ॥
इसी प्रकार जो धर्मज्ञ मानव सभामें जाकर किसी प्रश्नपर झूठा निर्णय देता है, वह निश्चय ही असत्यभाषण-का पूरा फल ( दण्ड ) पाता है ॥ ६४ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
प्रह्लादस्य च संवादं मुनेराङ्गिरसस्य च ॥ ६५ ॥
इस विषयमें विज्ञपुरुष प्रह्लाद और अंगिराकुमार मुनि सुधन्वाके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ६५ ॥
प्रह्लादो नाम दैत्येन्द्रस्तस्य पुत्रो विरोचनः ।
कन्याहेतोराङ्गिरसं सुधन्वानमुपाद्रवत् ॥ ६६ ॥
दैत्यराज प्रह्लादके एक पुत्र था विरोचन । उसका केशिनी नामवाली एक कन्याकी प्राप्तिके लिये अंगिराके पुत्र सुधन्वाके साथ विवाद हो गया ॥ ६६ ॥
अहं ज्यायानहं ज्यायानिति कन्येप्सया तदा ।
तयोर्देवनमत्रासीत् प्राणयोरिति नः श्रुतम् ॥ ६७ ॥
दोनों ही उस कन्याको पानेकी इच्छासे ' मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ' ऐसा कहने लगे । मेरे सुननेमें आया है कि उन दोनोंने अपनी बात सत्य करनेके लिये प्राणोंकी बाजी लगा दी ॥
तयोः प्रश्नविवादोऽभूत् प्रह्लादं तावपृच्छताम् ।
ज्यायान् क आवयोरेकः प्रश्नं प्रब्रूहि मा मृषा ॥ ६८ ॥
श्रेष्ठताके प्रश्नको लेकर जब उनका विवाद बहुत बढ़ गया, तब उन्होंने दैत्यराज प्रह्लादसे जाकर पूछा— ' हम दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है? आप इस प्रश्नका ठीक- ठीक उत्तर दीजिये, झूठ न बोलियेगा' ॥ ६८ ॥
सवै विवदनाद् भीतः सुधन्वानं विलोकयन् ।
तं सुधन्वाब्रवीत् क्रुद्धो ब्रह्मदण्ड इव ज्वलन् ॥ ६ ९ ॥
प्रह्लाद उस विवादसे भयभीत हो सुधन्वाकी ओर देखने लगे, तब सुधन्वाने प्रज्वलित ब्रह्मदण्डके समान कुपित होकर कहा- ॥ ६ ९ ॥
यदि वै वक्ष्यसि मृषा प्रह्लादाथ न वक्ष्यसि ।
शतधा ते शिरो वज्री वज्रेण प्रहरिष्यति ॥ ७० ॥
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'प्रह्लाद! यदि तुम इस प्रश्नके उत्तरमें झूठ बोलोगे अथवा मौन रह जाओगे तो वज्रधारी इन्द्र अपने वज्रद्वारा तुम्हारे सिरके सैकड़ों टुकड़े कर देगा' ॥ ७० ॥
सुधन्वना तथोक्तः सन् व्यथितोऽश्वत्थपर्णवत् ।
जगाम कश्यपं दैत्यः परिप्रष्टुं महौजसम् ॥ ७१ ॥
सुधन्वाके ऐसा कहनेपर प्रह्लाद व्यथित हो पीपलके पत्तेकी तरह काँपने लगे और इसके विषयमें कुछ पूछनेके लिये वे महातेजस्वी कश्यपजीके पास गये ॥ ७१ ॥
प्रह्लादउवाच
त्वं वै धर्मस्य विज्ञाता दैवस्येहासुरस्य च ।
ब्राह्मणस्य महाभाग धर्मकृच्छ्रमिदं शृणु ॥ ७२ ॥
प्रह्लाद बोले – महाभाग! आप देवताओं, असुरों तथा ब्राह्मणके भी धर्मको जानते हैं ।
मुझपर एक धर्मसंकट उपस्थित हुआ है, उसे सुनिये ॥ ७२ ॥
यो वै प्रश्नं न विब्रूयाद् वितथं चैव निर्दिशेत् ।
के वै तस्य परे लोकास्तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥ ७३ ॥
मैं पूछता हूँ कि जो प्रश्नका उत्तर ही न दे अथवा असत्य उत्तर दे दे, उसे परलोकमें कौन - से लोक प्राप्त होते हैं? यह मुझे बताइये ॥ ७३ ॥
कश्यप उवाच
जानन्नविब्रुवन् प्रश्नान् कामात् क्रोधाद् भयात् तथा ।
सहस्रं वारुणान् पाशानात्मनि प्रतिमुञ्चति ॥ ७४ ॥
कश्यपजीने कहा- जो जानते हुए भी काम, क्रोध तथा भयसे प्रश्नोंका उत्तर नहीं देता, वह अपने ऊपर वरुणदेवताके सहस्रों पाश डाल लेता है ॥ ७४ ॥
साक्षी वा विब्रुवन् साक्ष्यं गोकर्णशिथिलश्चरन् ।
सहस्रं वारुणान् पाशानात्मनि प्रतिमुञ्चति ॥ ७५ ॥
जो गवाह गाय - बैलके ढीले - ढाले कानोंकी तरह शिथिल हो दोनों पक्षोंसे सम्बन्ध बनाये रखकर गवाही नहीं देता, वह भी अपनेको वरुणदेवताके सहस्रों पाशोंसे बाँध लेता है ॥ ७५ ॥
तस्य संवत्सरे पूर्णे पाश एकः प्रमुच्यते ।
तस्मात् सत्यं तु वक्तव्यं जानता सत्यमञ्जसा ॥ ७६ ॥
एक वर्ष पूरा होनेपर उसका एक पाश खुलता है, अतः सच्ची बात जाननेवाले पुरुषको यथार्थरूपसे सत्य ही बोलना चाहिये ॥ ७६ ॥
विद्धो धर्मो ह्यधर्मेण सभां यत्रोपपद्यते ।
न चास्य शल्यं कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासदः ॥ ७७ ॥
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जहाँ धर्म अधर्मसे विद्ध होकर सभामें उपस्थित होता है, उसके काँटेको उससे बिंधे हुए सभासदलोग नहीं काट पाते ( अर्थात् उनको पापका फल भोगना ही पड़ता है ) ॥
अर्धं हरति वै श्रेष्ठः पादो भवति कर्तृषु ।
पादश्चैव सभासत्सु ये न निन्दन्ति निन्दितम् ॥ ७८ ॥
सभामें जो अधर्म होता है, उसका आधा भाग स्वयं सभापति ले लेता है, एक चौथाई भाग करनेवालोंको मिलता है और एक चतुर्थांश उन सभासदोंको प्राप्त होता है जो निन्दनीय पुरुषकी निन्दा नहीं करते ॥ ७८ ॥
अनेना भवति श्रेष्ठो मुच्यन्ते च सभासदः ।
एनो गच्छति कर्तारं निन्दार्हो यत्र निन्द्यते ॥ ७९ ॥
जिस सभामें निन्दाके योग्य मनुष्यकी निन्दा की जाती है, वहाँ सभापति निष्पाप हो जाता है, सभासद भी पापसे मुक्त हो जाते हैं और सारा पाप करनेवालेको ही लगता है ॥
वितथं तु वदेयुर्ये धर्मं प्रह्लाद पृच्छते ।
इष्टापूर्तं च ते घ्नन्ति सप्त सप्त परावरान् ॥ ८० ॥
प्रह्लाद! जो लोग धर्मविषयक प्रश्न पूछनेवालेको झूठा उत्तर देते हैं, वे अपने इष्टापूर्त धर्मका नाश तो करते ही हैं आगे - पीछेकी सात-सात पीढ़ियोंके भी पुण्योंका वे हनन करते हैं ॥ ८० ॥
हृतस्वस्य हि यद् दुःखं हतपुत्रस्य चैव यत् ।
ऋणिनः प्रति यच्चैव स्वार्थाद् भ्रष्टस्य चैव यत् ॥ ८१ ॥
स्त्रियाः पत्या विहीनाया राज्ञा ग्रस्तस्य चैव यत् ।
अपुत्रायाश्च यद् दुःखं व्याघ्राघ्रातस्य चैव यत् ॥ ८२ ॥
अध्यूढायाश्च यद् दुःखं साक्षिभिर्विहतस्य च ।
एतानि वै समान्याहुर्दुःखानि त्रिदिवेश्वराः ॥ ८३ ॥
जिसका सर्वस्व छीन लिया गया हो, उसे जो दुःख होता है, जिसका पुत्र मर गया हो, उसे जो शोक होता है, ऋणग्रस्त और स्वार्थसे वंचित मनुष्यको जो क्लेश होता है, पतिसे विहीन होनेपर स्त्रीको तथा राजाके कोपभाजन मनुष्यको जो कष्ट उठाना पड़ता है, पुत्रहीना नारीको जो संताप होता है, शेरके चंगुलमें फँसे हुए प्राणीको जो व्याकुलता होती है, सौतवाली स्त्रीको जो दुःख होता है, साक्षियोंने जिसे धोखा दिया हो, उस मनुष्यको जो महान् क्लेश होता है— इन सभी प्रकारके दुःखोंको देवताओंने समान बतलाया है ॥ ८१— ८३ ॥
तानि सर्वाणि दुःखानि प्राप्नोति वितथं ब्रुवन् ।
समक्षदर्शनात् साक्षी श्रवणाच्चेति धारणात् ॥ ८४ ॥
तस्मात् सत्यं ब्रुवन् साक्षी धर्मार्थाभ्यां न हीयते ।
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झूठ बोलनेवाला मनुष्य उन सभी दुःखोंका भागी होता है । समक्ष दर्शन, श्रवण और धारणसे साक्षी संज्ञा होती है, अतः सत्य बोलनेवाला साक्षी कभी धर्म और अर्थसे वंचित नहीं होता ॥ ८४ ॥
कश्यपस्य वचः श्रुत्वा प्रह्लादः पुत्रमब्रवीत् ॥ ८५ ॥
कश्यपजीकी यह बात सुनकर प्रह्लादने अपने पुत्रसे कहा- ॥ ८५ ॥
श्रेयान् सुधन्वा त्वत्तो वै मत्तः श्रेयांस्तथाङ्गिराः ।
माता सुधन्वनश्चापि मातृतः श्रेयसी तव ।
विरोचन सुधन्वायं प्राणानामीश्वरस्तव ॥ ८६ ॥
‘ विरोचन! सुधन्वा तुमसे श्रेष्ठ है, उसके पिता अंगिरा मुझसे श्रेष्ठ हैं और सुधन्वाकी माता तुम्हारी मातासे श्रेष्ठ है । अब यह सुधन्वा ही तुम्हारे प्राणोंका स्वामी है ' ॥ ८६ ॥
सुधन्वोवाच
पुत्रस्नेहं परित्यज्य यस्त्वं धर्मे व्यवस्थितः ।
अनुजानामि ते पुत्रं जीवत्वेष शतं समाः ॥ ८७ ॥
सुधन्वाने कहा — दैत्यराज! तुम पुत्रस्नेहकी परवा न करके जो धर्मपर डटे रह गये, इससे प्रसन्न होकर मैं तुम्हारे पुत्रको यह आज्ञा देता हूँ कि यह सौ वर्षोंतक जीवित रहे ॥ विदुर उवाच
एवं वै परमं धर्मं श्रुत्वा सर्वे सभासदः ।
यथाप्रश्नं तु कृष्णाया मन्यध्वं तत्र किं परम् ॥ ८८ ॥
विदुरजी कहते हैं— सभासदो! इस प्रकार इस उत्तम धर्ममय प्रसंगको सुनकर आप सब लोग द्रौपदीके प्रश्नके अनुसार यह बतावें कि उसके सम्बन्धमें आपकी क्या मान्यता है? ॥ ८८ ॥
वैशम्पायन उवाच
विदुरस्य वचः श्रुत्वा नोचुः किंचन पार्थिवाः ।
कर्णो दुःशासनं त्वाह कृष्णां दासीं गृहान् नय ॥ ८९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! विदुरकी यह बात सुनकर भी सब राजालोग कुछ न बोले । उस समय कर्णने दुःशासनसे कहा- ' इस दासी द्रौपदीको अपने घर ले जाओ ' ॥ ८ ९ ॥
तां वेपमानां सव्रीडां प्रलपन्तीं स्म पाण्डवान् ।
दुःशासनः सभामध्ये विचकर्ष तपस्विनीम् ॥ ९० ॥
द्रौपदी लज्जामें डूबी हुई थर- थर काँपती और पाण्डवोंको पुकारती थी । उस दशामें दुःशासनने उस भरी सभाके बीच उस बेचारी दुःखिया तपस्विनीको घसीटना आरम्भ
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किया ॥ इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि द्रौपद्याकर्षणेऽष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥ ' ’इसप्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें द्रौपदीको भरी सभामें खींचना इस विषयसे सम्बन्ध रखनेवाला अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६८ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४३ श्लोक मिलाकर कुल ९ ४३ श्लोक हैं )
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एकोनसप्ततितमोऽध्यायः द्रौपदीका चेतावनीयुक्त विलाप एवं भीष्मका वचन द्रौपद्युवाच
पुरस्तात् करणीयं मे न कृतं कार्यमुत्तरम् ।
विह्वलास्मि कृतानेन कर्षता बलिना बलात् ॥ १ ॥
द्रौपदी बोली - हाय! मेरा जो कार्य सबसे पहले करनेका था, वह अभीतक नहीं हुआ । मुझे अब वह कार्य कर लेना चाहिये । इस बलवान् दुरात्मा दुःशासनने मुझे बलपूर्वक घसीटकर व्याकुल कर दिया है ॥ १ ॥
अभिवादं करोम्येषां कुरूणां कुरुसंसदि ।
न मे स्यादपराधोऽयं यदिदं न कृतं मया ॥ २ ॥
कौरवोंकी सभामें मैं समस्त कुरुवंशी महात्माओंको प्रणाम करती हूँ । मैंने घबराहटके कारण पहले प्रणाम नहीं किया; अतः यह मेरा अपराध न माना जाय ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
सा तेन च समाधूता दुःखेन च तपस्विनी ।
पतिता विललापेदं सभायामतथोचिता ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! दुशासनके बार- बार खींचनेसे तपस्विनी द्रौपदी पृथ्वीपर गिर पड़ी और उस सभामें अत्यन्त दुःखित हो विलाप करने लगी । वह जिस दुरवस्थामें पड़ी थी, उसके योग्य कदापि न थी ॥ ३ ॥
द्रौपद्युवाच
स्वयंवरे यास्मि नृपैर्दृष्टा रङ्गे समागतैः ।
न दृष्टपूर्वा चान्यत्र साहमद्य सभां गता ॥ ४ ॥
द्रौपदीने कहा- हा! मैं स्वयंवरके समय सभामें आयी थी और उस समय रंगभूमिमें पधारे हुए राजाओंने मुझे देखा था । उसके सिवा, अन्य अवसरोंपर कहीं भी आजसे पहले
किसीने मुझे नहीं देखा । वही मैं आज सभामें बलपूर्वक लायी गयी हूँ ॥ ४ ॥
यां न वायुर्न चादित्यो दृष्टवन्तौ पुरा गृहे ।
साहमद्य सभामध्ये दृश्यास्मि जनसंसदि ॥ ५ ॥
पहले राजभवनमें रहते हुए जिसे वायु तथा सूर्य भी नहीं देख पाते थे, वही मैं आज इस सभाके भीतर महान् जनसमुदायमें आकर सबके नेत्रोंकी लक्ष्य बन गयी हूँ ॥
यां न मृष्यन्ति वातेन स्पृश्यमानां गृहे पुरा ।
स्पृश्यमानां सहन्तेऽद्य पाण्डवास्तां दुरात्मना ॥ ६ ॥
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पहले अपने महलमें रहते समय जिसका वायुद्वारा स्पर्श भी पाण्डवोंको सहन नहीं होता था, उसी मुझ द्रौपदीका यह दुरात्मा दुःशासन भरी सभामें स्पर्श कर रहा है, तो भी आज ये पाण्डुकुमार सह रहे हैं ॥ ६ ॥
मृष्यन्ति कुरवश्चेमे मन्ये कालस्य पर्ययम् ।
स्नुषां दुहितरं चैव क्लिश्यमानामनर्हतीम् ॥ ७ ॥
मैं कुरुकुलकी पुत्रवधू एवं पुत्रीतुल्य हूँ । सताये जानेके योग्य नहीं हूँ, फिर भी मुझे यह दारुण क्लेश दिया जा रहा है और ये समस्त कुरुवंशी इसे सहन करते हैं । मैं समझती हूँ, बड़ा विपरीत समय आ गया है ॥ ७ ॥
किं न्वतः कृपणं भूयो यदहं स्त्री सती शुभा ।
सभामध्यं विगाहेऽद्य क्व नु धर्मो महीक्षिताम् ॥ ८ ॥
इससे बढ़कर दयनीय दशा और क्या हो सकती है कि मुझ जैसी शुभकर्मपरायणा सती- साध्वी स्त्री भरी सभामें विवश करके लायी गयी है । आज राजाओंका धर्म कहाँ चला गया? ॥ ८ ॥
धर्म्यं स्त्रियं सभां पूर्वे न नयन्तीति नः श्रुतम् ।
स नष्टः कौरवेयेषु पूर्वो धर्मः सनातनः ॥ ९ ॥
मैंने सुना है, पहले लोग धर्मपरायणा स्त्रीको कभी सभामें नहीं लाते थे, किंतु इन कौरवोंके समाजमें वह प्राचीन सनातनधर्म नष्ट हो गया है ॥ ९ ॥
कथं हि भार्या पाण्डूनां पार्षतस्य स्वसा सती ।
वासुदेवस्य च सखी पार्थिवानां सभामियाम् ॥ १० ॥
अन्यथा मैं पाण्डवोंकी पत्नी, धृष्टद्युम्नकी सुशीला बहन और भगवान् श्रीकृष्णकी सखी होकर राजाओंकी इस सभामें कैसे लायी जा सकती थी? ॥ १० ॥
तामिमां धर्मराजस्य भार्यां सदृशवर्णजाम् ब्रूत दासीमदासीं वा तत् करिष्यामि कौरवाः ॥ ११ ॥
कौरवो! मैं धर्मराज युधिष्ठिरकी धर्मपत्नी तथा उनके समान वर्णकी कन्या हूँ।
आपलोग बतावें, मैं दासी हूँ या अदासी? आप जैसा कहेंगे मैं वैसा ही करूंगी ॥ ११ ॥
अयं मां सुदृढं क्षुद्रः कौरवाणां यशोहरः ।
क्लिश्नाति नाहं तत् सोढुं चिरं शक्ष्यामि कौरवाः ॥ १२ ॥
कुरुवंशी क्षत्रियो! यह कुरुकुलकी कीर्तिमें कलंक लगानेवाला नीच दुःशासन मुझे
बहुत कष्ट दे रहा है । मैं इस क्लेशको देरतक नहीं सह सकूँगी ॥ १२ ॥
जितां वाप्यजितां वापि मन्यध्वं मां यथा नृपाः ।
तथा प्रत्युक्तमिच्छामि तत् करिष्यामि कौरवाः ॥ १३ ॥
कुरुवंशियो! आप क्या मानते हैं? मैं जीती गयी हूँ या नहीं । मैं आपके मुँहसे इसका
ठीक- ठीक उत्तर सुनना चाहती हूँ । फिर उसीके अनुसार कार्य करूँगी ॥ १३ ॥
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भीष्म उवाच
उक्तवानस्मि कल्याणि धर्मस्य परमा गतिः ।
लोके न शक्यते ज्ञातुमपि विज्ञैर्महात्मभिः ॥ १४ ॥
भीष्मजीने कहा — कल्याणि! मैं पहले ही कह चुका हूँ कि धर्मकी गति बड़ी सूक्ष्म है ।
लोकमें विज्ञ महात्मा भी उसे ठीक- ठीक नहीं जान सकते ॥ १४ ॥
बलवांश्च यथा धर्मं लोके पश्यति पूरुषः ।
स धर्मो धर्मवेलायां भवत्यभिहतः परः ॥ १५ ॥
संसारमें बलवान् मनुष्य जिसको धर्म समझता है, धर्मविचारके समय लोग उसीको धर्म मान लेते हैं और बलहीन पुरुष जो धर्म बतलाता है, वह बलवान् पुरुषके बताये धर्मसे दब जाता है ( अतः इस समय कर्ण और दुर्योधनका बताया हुआ धर्म ही सर्वोपरि हो रहा है। ) ॥
न विवेक्तुं च ते प्रश्नमिमं शक्नोमि निश्चयात् ।
सूक्ष्मत्वाद् गहनत्वाच्च कार्यस्यास्य च गौरवात् ॥ १६ ॥
मैं तो धर्मका स्वरूप सूक्ष्म और गहन होनेके कारण तथा इस धर्मनिर्णयके कार्यके अत्यन्त गुरुतर होनेसे तुम्हारे इस प्रश्नका निश्चितरूपसे यथार्थ विवेचन नहीं कर सकता ॥
नूनमन्तः कुलस्यायं भविता नचिरादिव ।
तथा हि कुरवः सर्वे लोभमोहपरायणाः ॥ १७ ॥
अवश्य ही बहुत शीघ्र इस कुलका नाश होनेवाला है; क्योंकि समस्त कौरव लोभ और मोहके वशीभूत हो गये हैं ॥ १७ ॥
कुलेषु जाताः कल्याणि व्यसनैराहता भृशम् ।
धर्म्यान्मार्गान्न च्यवन्ते येषां नस्त्वं वधूः स्थिता ॥ १८ ॥
कल्याणि! तुम जिनकी पत्नी हो, वे पाण्डव हमारे उत्तम कुलमें उत्पन्न हैं और भारी- से - भारी संकटमें पड़कर भी धर्मके मार्गसे विचलित नहीं होते हैं ॥ १८ ॥
उपपन्नं च पाञ्चालि तवेदं वृत्तमीदृशम् ।
यत् कृच्छ्रमपि सम्प्राप्ता धर्ममेवान्ववेक्षसे ॥ १ ९ ॥
पांचालराजकुमारी! तुम्हारा यह आचार- व्यवहार तुम्हारे योग्य ही है; क्योंकि भारी संकटमें पड़कर भी तुम धर्मकी ओर ही देख रही हो ॥ १ ९ ॥
एते द्रोणादयश्चैव वृद्धा धर्मविदो जनाः ।
शून्यैः शरीरैस्तिष्ठन्ति गतासव इवानताः ॥ २० ॥
युधिष्ठिरस्तु प्रश्नेऽस्मिन् प्रमाणमिति मे मतिः ।
अजितां वा जितां वेति स्वयं व्याहर्तुमर्हति ॥ २१ ॥
ये द्रोणाचार्य आदि वृद्ध एवं धर्मज्ञ पुरुष भी सिर लटकाये शून्य शरीरसे इस प्रकार बैठे हैं; मानो निष्प्राण हो गये हों । मेरी राय यह है कि इस प्रश्नका निर्णय करनेके लिये धर्मराज