महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 221–230
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 221–230
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ज्ञातौ तदा ब्रह्मन् सर्वकामफलप्रदौ ॥ )
श्रीः सुरा चैव सोमश्च तुरगश्च मनोजवः ।
यतो देवास्ततो जग्मुरादित्यपथमाश्रिताः ॥ ३७ ॥
ब्रह्मन्! महामुने! वहाँ सम्पूर्ण कामनाओंका फल देनेवाले पारिजात वृक्ष एवं सुरभि गौकी उत्पत्ति हुई । फिर लक्ष्मी, सुरा, चन्द्रमा तथा मनके समान वेगशाली उच्चैःश्रवा घोड़ा —ये सब सूर्यके मार्ग आकाशका आश्रय ले, जहाँ देवता रहते हैं, उस लोकमें चले गये ॥ ३७ ॥
धन्वन्तरिस्ततो देवो वपुष्मानुदतिष्ठत ।
श्वेतं कमण्डलुं बिभ्रदमृतं यत्र तिष्ठति ॥ ३८ ॥
इसके बाद दिव्य शरीरधारी धन्वन्तरि देव प्रकट हुए । वे अपने हाथमें श्वेत कलश लिये हुए थे, जिसमें अमृत भरा था ॥ ३८ ॥
एतदत्यद्भुतं दृष्ट्वा दानवानां समुत्थितः ।
अमृतार्थे महान् नादो ममेदमिति जल्पताम् ॥ ३ ९ ॥
यह अत्यन्त अद्भुत दृश्य देखकर दानवोंमें अमृतके लिये कोलाहल मच गया । वे सब कहने लगे ' यह मेरा है, यह मेरा है ' ॥ ३ ९ ॥
श्वेतैर्दन्तैश्चतुर्भिस्तु महाकायस्ततः परम् ।
ऐरावतो महानागोऽभवद् वज्रभृता धृतः ॥ ४० ॥
तत्पश्चात् श्वेत रंगके चार दाँतोंसे सुशोभित विशालकाय महानाग ऐरावत प्रकट हुआ, जिसे वज्रधारी इन्द्रने अपने अधिकारमें कर लिया ॥ ४० ॥
अतिनिर्मथनादेव कालकूटस्ततः परः ।
जगदावृत्य सहसा सधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ॥ ४१ ॥
तदनन्तर अत्यन्त वेगसे मथनेपर कालकूट महाविष उत्पन्न हुआ, वह धूमयुक्त अग्निकी भाँति एकाएक सम्पूर्ण जगत्को घेरकर जलाने लगा ॥ ४१ ॥
त्रैलोक्यं मोहितं यस्य गन्धमाघ्राय तद् विषम् ।
प्राग्रसल्लोकरक्षार्थं ब्रह्मणो वचनाच्छिवः ॥ ४२ ॥
उस विषकी गन्ध सूँघते ही त्रिलोकीके प्राणी मूर्च्छित हो गये । तब ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर भगवान् श्रीशंकरने त्रिलोकीकी रक्षाके लिये उस महान् विषको पी लिया ॥ ४२ ॥
दधार भगवान् कण्ठे मन्त्रमूर्तिर्महेश्वरः ।
तदाप्रभृति देवस्तु नीलकण्ठ इति श्रुतिः ॥ ४३ ॥
मन्त्रमूर्ति भगवान् महेश्वरने विषपान करके उसे अपने कण्ठमें धारण कर लिया ।
तभीसे महादेवजी नीलकण्ठके नामसे विख्यात हुए, ऐसी जनश्रुति है ॥ ४३ ॥
एतत् तदद्भुतं दृष्ट्वा निराशा दानवाः स्थिताः ।
अमृतार्थे च लक्ष्म्यर्थे महान्तं वैरमाश्रिताः ॥ ४४ ॥
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ये सब अद्भुत बातें देखकर दानव निराश हो गये और अमृत तथा लक्ष्मीके लिये उन्होंने देवताओंके साथ महान् वैर बाँध लिया ॥ ४४ ॥
ततो नारायणो मायां मोहिनीं समुपाश्रितः ।
स्त्रीरूपमद्भुतं कृत्वा दानवानभिसंश्रितः ॥ ४५ ॥
उसी समय भगवान् विष्णुने मोहिनी मायाका आश्रय ले मनोहारिणी स्त्रीका अद्भुत रूप बनाकर, दानवोंके पास पदार्पण किया ॥ ४५ ॥
ततस्तदमृतं तस्यै ददुस्ते मूढचेतसः ।
स्त्रियै दानवदैतेयाः सर्वे तद्गतमानसाः ॥ ४६ ॥
समस्त दैत्यों और दानवोंने उस मोहिनीपर अपना हृदय निछावर कर दिया । उनके चित्तमें मूढ़ता छा गयी । अतः उन सबने स्त्रीरूपधारी भगवान्को वह अमृत सौंप दिया ॥ ४६ ॥
( सा तु नारायणी माया धारयन्ती कमण्डलुम् । आस्यमानेषु दैत्येषु पङ्क्त्या च प्रति दानवैः । देवानपाययद् देवी न दैत्यांस्ते च चुक्रुशुः ॥ ) भगवान् नारायणकी वह मूर्तिमती माया हाथमें कलश लिये अमृत परोसने लगी । उस समय दानवोंसहित दैत्य पंगत लगाकर बैठे ही रह गये, परंतु उस देवीने देवताओंको ही
अमृत पिलाया; दैत्योंको नहीं दिया, इससे उन्होंने बड़ा कोलाहल मचाया ।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि अमृतमन्थनेऽष्टादशोऽध्यायः ॥ १८
|| इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें अमृतमन्थनविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २३ श्लोक मिलाकर कुल ४८३ श्लोक हैं )
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एकोनविंशोऽध्यायः देवताओंका अमृतपान, देवासुरसंग्राम तथा देवताओंकी विजय सौतिरुवाच
अथावरणमुख्यानि नानाप्रहरणानि च ।
प्रगृह्याभ्यद्रवन् देवान् सहिता दैत्यदानवाः ॥ १ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— अमृत हाथसे निकल जानेपर दैत्य और दानव संगठित हो गये और उत्तम - उत्तम कवच तथा नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्र लेकर देवताओंपर टूट पड़े ॥ १ ॥
ततस्तदमृतं देवो विष्णुरादाय वीर्यवान् ।
जहार दानवेन्द्रेभ्यो नरेण सहितः प्रभुः ॥ २ ॥
ततो देवगणाः सर्वे पपुस्तदमृतं तदा ।
विष्णोः सकाशात् सम्प्राप्य सम्भ्रमे तुमुले सति ॥ ३ ॥
उधर अनन्त शक्तिशाली नरसहित भगवान् नारायणने जब मोहिनीरूप धारण करके दानवेन्द्रोंके हाथसे अमृत लेकर हड़प लिया, तब सब देवता भगवान् विष्णुसे अमृत ले-लेकर पीने लगे; क्योंकि उस समय घमासान युद्धकी सम्भावना हो गयी थी ॥ २-३ ॥
ततः पिबत्सु तत्कालं देवेष्वमृतमीप्सितम् ।
राहुर्विबुधरूपेण दानवः प्रापिबत् तदा ॥ ४ ॥
जिस समय देवता उस अभीष्ट अमृतका पान कर रहे थे, ठीक उसी समय राहु नामक दानवने देवतारूपसे आकर अमृत पीना आरम्भ किया ॥ ४ ॥
तस्य कण्ठमनुप्राप्ते दानवस्यामृते तदा ।
आख्यातं चन्द्रसूर्याभ्यां सुराणां हितकाम्यया ॥ ५ ॥
वह अमृत अभी उस दानवके कण्ठतक ही पहुँचा था कि चन्द्रमा और सूर्यने देवताओंके हितकी इच्छासे उसका भेद बतला दिया ॥ ५ ॥
ततो भगवता तस्य शिरश्छिन्नमलंकृतम् ।
चक्रायुधेन चक्रेण पिबतोऽमृतमोजसा ॥ ६ ॥
तब चक्रधारी भगवान् श्रीहरिने अमृत पीनेवाले उस दानवका मुकुटमण्डित मस्तक चक्रद्वारा बलपूर्वक काट दिया ॥ ६ ॥
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भगवान् विष्णुने चक्रसे राहुका सिर काट दिया
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तच्छैलशृङ्गप्रतिमं दानवस्य शिरो महत् ।
चक्रच्छिन्नं खमुत्पत्य ननादातिभयंकरम् ॥ ७ ॥
चक्रसे कटा हुआ दानवका महान् मस्तक पर्वतके शिखर-सा जान पड़ता था। वह आकाशमें उछल - उछलकर अत्यन्त भयंकर गर्जना करने लगा ॥ ७ ॥
तत् कबन्धं पपातास्य विस्फुरद् धरणीतले ।
सपर्वतवनद्वीपां दैत्यस्याकम्पयन् महीम् ॥ ८ ॥
किंतु उस दैत्यका वह धड़ धरतीपर गिर पड़ा और पर्वत, वन तथा द्वीपोंसहित समूची पृथ्वीको कँपाता हुआ तड़फड़ाने लगा ॥ ८ ॥
ततो वैरविनिर्बन्धः कृतो राहुमुखेनवैवै ।
शाश्वतश्चन्द्रसूर्याभ्यां ग्रसत्यद्यापि चैव तौ ॥ ९ ॥
तभीसे राहुके मुखने चन्द्रमा और सूर्यके साथ भारी एवं स्थायी वैर बाँध लिया; इसीलिये वह आज भी दोनोंपर ग्रहण लगाता है ॥ ९ ॥
विहाय भगवांश्चापि स्त्रीरूपमतुलं हरिः ।
नानाप्रहरणैर्भीमैर्दानवान् समकम्पयत् ॥ १० ॥
( देवताओंको अमृत पिलानेके बाद ) भगवान् श्रीहरिने भी अपना अनुपम मोहिनीरूप त्यागकर नाना प्रकारके भयंकर अस्त्र- शस्त्रोंद्वारा दानवोंको अत्यन्त कम्पित कर दिया ॥ १० ॥
ततः प्रवृत्तः संग्रामः समीपे लवणाम्भसः ।
सुराणामसुराणां च सर्वघोरतरो महान् ॥ ११ ॥
फिर तो क्षारसागरके समीप देवताओं और असुरोंका सबसे भयंकर महासंग्राम छिड़ गया ॥ ११ ॥
प्रासाश्च विपुलास्तीक्ष्णा न्यपतन्त सहस्रशः ।
तोमराश्च सुतीक्ष्णाग्राः शस्त्राणि विविधानि च ॥ १२ ॥
दोनों दलोंपर सहस्रों तीखी धारवाले बड़े -बड़े भालोंकी मार पड़ने लगी । तेज नोकवाले तोमर तथा भाँति- भाँतिके शस्त्र बरसने लगे ॥ १२ ॥
ततोऽसुराश्चक्रभिन्ना वमन्तो रुधिरं बहु ।
असिशक्तिगदारुग्णा निपेतुर्धरणीतले ॥ १३ ॥
छिन्नानि पट्टिशैश्चैव शिरांसि युधि दारुणैः ।
तप्तकाञ्चनमालीनि निपेतुरनिशं तदा ॥ १४ ॥
भगवान्के चक्रसे छिन्न- भिन्न तथा देवताओंके खड्ग, शक्ति और गदासे घायल हुए असुर मुखसे अधिकाधिक रक्त वमन करते हुए पृथ्वीपर लोटने लगे । उस समय तपाये हुए सुवर्णकी मालाओंसे विभूषित दानवोंके सिर भयंकर पट्टिशोंसे कटकर निरन्तर युद्धभूमिमें गिर रहे थे ॥ १३-१४ ॥
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रुधिरेणानुलिप्ताङ्गा निहताश्च महासुराः ।
अद्रीणामिव कूटानि धातुरक्तानि शेरते ॥ १५ ॥
वहाँ खूनसे लथपथ अंगवाले मरे हुए महान् असुर, जो समरभूमिमें सो रहे थे, गेरू आदि धातुओंसे रँगे हुए पर्वत- शिखरोंके समान जान पड़ते थे ॥ १५ ॥
हाहाकारः समभवत् तत्र तत्र सहस्रशः ।
अन्योन्यं छिन्दतां शस्त्रैरादित्ये लोहितायति ॥ १६ ॥
संध्याके समय जब सूर्यमण्डल लाल हो रहा था, एक- दूसरेके शस्त्रोंसे कटनेवाले सहस्रों योद्धाओंका हाहाकार इधर- उधर सब ओर गूँज उठा ॥ १६ ॥
परिघैरायसैस्तीक्ष्णैः संनिकर्षे च मुष्टिभिः ।
निघ्नतां समरेऽन्योन्यं शब्दो दिवमिवास्पृशत् ॥ १७ ॥
उस समरांगणमें दूरवर्ती देवता और दानव लोहेके तीखे परिघोंसे एक- दूसरेपर चोट करते थे और निकट आ जानेपर आपसमें मुक्का - मुक्की करने लगते थे । इस प्रकार उनके पारस्परिक आघात- प्रत्याघातका शब्द मानो सारे आकाशमें गूँज उठा ॥ १७ ॥
छिन्धि भिन्धि प्रधाव त्वं पातयाभिसरेति च ।
व्यश्रूयन्त महाघोराः शब्दास्तत्र समन्ततः ॥ १८ ॥
उस रणभूमिमें चारों ओर ये ही अत्यन्त भयंकर शब्द सुनायी पड़ते थे कि ' टुकड़े-टुकड़े कर दो, चीर डालो, दौड़ो, गिरा दो और पीछा करो ' ॥ १८ ॥
एवं सुतुमुले युद्धे वर्तमाने महाभये ।
नरनारायणौ देवौ समाजग्मतुराहवम् ॥ १ ९ ॥
इस प्रकार अत्यन्त भयंकर तुमुल युद्ध हो ही रहा था कि भगवान् विष्णुके दो रूप नर और नारायणदेव भी युद्धभूमिमें आ गये ॥ १ ९ ॥
तत्र दिव्यं धनुर्दृष्ट्वा नरस्य भगवानपि ।
चिन्तयामास तच्चक्रं विष्णुर्दानवसूदनम् ॥ २० ॥
भगवान् नारायणने वहाँ नरके हाथमें दिव्य धनुष देखकर स्वयं भी दानवसंहारक दिव्य चक्रका चिन्तन किया ॥ २० ॥
ततोऽम्बराच्चिन्तितमात्रमागतं महाप्रभं चक्रममित्रतापनम् । विभावसोस्तुल्यमकुण्ठमण्डलं सुदर्शनं संयति भीमदर्शनम् ॥ २१ ॥
चिन्तन करते ही शत्रुओंको संताप देनेवाला अत्यन्त तेजस्वी चक्र आकाशमार्गसे उनके हाथमें आ गया । वह सूर्य एवं अग्निके समान जाज्वल्यमान हो रहा था । उस मण्डलाकार चक्रकी गति कहीं भी कुण्ठित नहीं होती थी । उसका नाम तो सुदर्शन था, किंतु वह युद्धमें शत्रुओंके लिये अत्यन्त भयंकर दिखायी देता था ॥ २१ ॥
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तदागतं ज्वलितहुताशनप्रभं भयंकरं करिकरबाहुरच्युतः । मुमोच वै प्रबलवदुग्रवेगवान् महाप्रभं परनगरावदारणम् ॥ २२ ॥
वहाँ आया हुआ वह भयंकर चक्र प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहा था । उसमें शत्रुओंके बड़े - बड़े नगरोंको विध्वंस कर डालनेकी शक्ति थी । हाथीकी सूँड़के समान विशाल भुजदण्डवाले उग्रवेगशाली भगवान् नारायणने उस महातेजस्वी एवं महाबलशाली चक्रको दानवोंके दलपर चलाया ॥ २२ ॥
तदन्तकज्वलनसमानवर्चसं पुनः पुनर्न्यपतत वेगवत्तदा । विदारयद् दितिदनुजान् सहस्रशः करेरितं पुरुषवरेण संयुगे ॥ २३ ॥
उस महासमरमें पुरुषोत्तम श्रीहरिके हाथोंसे संचालित हो वह चक्र प्रलयकालीन अग्निके समान जाज्वल्यमान हो उठा और सहस्रों दैत्यों तथा दानवोंको विदीर्ण करता हुआ बड़े वेगसे बारम्बार उनकी सेनापर पड़ने लगा ॥ २३ ॥
दहत् क्वचिज्ज्वलन इवावलेलिहत् प्रसह्य तानसुरगणान् न्यकृन्तत । प्रवेरितं वियति मुहुः क्षितौ तथा पपौ रणे रुधिरमथो पिशाचवत् ॥ २४ ॥
श्रीहरिके हाथोंसे चलाया हुआ सुदर्शन चक्र कभी प्रज्वलित अग्निकी भाँति अपनी लपलपाती लपटोंसे असुरोंको चाटता हुआ भस्म कर देता और कभी हठपूर्वक उनके टुकड़े -टुकड़े कर डालता था । इस प्रकार रणभूमिके भीतर पृथ्वी और आकाशमें घूम-घूमकर वह पिशाचकी भाँति बार- बार रक्त पीने लगा ॥ २४ ॥
तथासुरा गिरिभिरदीनचेतसो मुहुर्मुहुः सुरगणमार्दयंस्तदा । महाबला विगलितमेघवर्चसः सहस्रशो गगनमभिप्रपद्य ह ॥ २५ ॥
इसी प्रकार उदार एवं उत्साह भरे हृदयवाले महाबली असुर भी, जो जलरहित बादलोंके समान श्वेत रंगके दिखायी देते थे, उस समय सहस्रोंकी संख्यामें आकाशमें उड़- उड़कर शिलाखण्डोंकी वर्षासे बार - बार देवताओंको पीड़ित करने लगे ॥ २५ ॥
अथाम्बराद् भयजननाः प्रपेदिरे सपादपा बहुविधमेघरूपिणः । महाद्रयः परिगलिताग्रसानवः
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परस्परं द्रुतमभिहत्य सस्वनाः ॥ २६ ॥
तत्पश्चात् आकाशसे नाना प्रकारके लाल, पीले, नीले आदि रंगवाले बादलों - जैसे बड़े-बड़े पर्वत भय उत्पन्न करते हुए वृक्षोंसहित पृथ्वीपर गिरने लगे । उनके ऊँचे - ऊँचे शिखर गलते जा रहे थे और वे एक- दूसरेसे टकराकर बड़े जोरका शब्द करते थे ॥ २६ ॥
ततो मही प्रविचलिता सकानना महाद्रिपाताभिहता समन्ततः । परस्परं भृशमभिगर्जतां मुहू रणाजिरे भृशमभिसम्प्रवर्तिते ॥ २७ ॥
उस समय एक- दूसरेको लक्ष्य करके बार- बार जोर- जोरसे गरजनेवाले देवताओं और असुरोंके उस समरांगणमें सब ओर भयंकर मार-काट मच रही थी; बड़े -बड़े पर्वतोंके गिरनेसे आहत हुई वनसहित सारी भूमि काँपने लगी ॥ २७ ॥
नरस्ततो वरकनकाग्रभूषणै- महेषुभिर्गगनपथं समावृणोत् । विदारयन् गिरिशिखराणि पत्रिभिः महाभयेऽसुरगणविग्रहे तदा ॥ २८ ॥
तब उस महाभयंकर देवासुर संग्राममें भगवान् नरने उत्तम सुवर्ण- भूषित अग्रभागवाले पंखयुक्त बड़े - बड़े बाणोंद्वारा पर्वत-शिखरोंको विदीर्ण करते हुए समस्त आकाशमार्गको आच्छादित कर दिया ॥ २८ ॥
ततो महीं लवणजलं च सागरं महासुराः प्रविविशुरर्दिताः सुरैः । वियद्गतं ज्वलितहुताशनप्रभं सुदर्शनं परिकुपितं निशम्य ते ॥ २ ९ ॥ इस प्रकार देवताओंके द्वारा पीड़ित हुए महादैत्य आकाशमें जलती हुई आगके समान उद्भासित होनेवाले सुदर्शन चक्रको अपने ऊपर कुपित देख पृथ्वीके भीतर और खारे पानीके समुद्रमें घुस गये ॥ २ ९ ॥ ततः सुरैर्विजयमवाप्य मन्दरः स्वमेव देशं गमितः सुपूजितः । विनाद्य खं दिवमपि चैव सर्वशः ततो गताः सलिलधरा यथागतम् ॥ ३० ॥
तदनन्तर देवताओंने विजय पाकर मन्दराचलको सम्मानपूर्वक उसके पूर्वस्थानपर ही पहुँचा दिया । इसके बाद वे अमृत धारण करनेवाले देवता अपने सिंहनादसे अन्तरिक्ष और स्वर्गलोकको भी सब ओरसे गुँजाते हुए अपने - अपने स्थानको चले गये ॥ ३० ॥
ततोऽमृतं सुनिहितमेव चक्रिरे
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सुराः परां मुदमभिगम्य पुष्कलाम् । ददौ च तं निधिममृतस्य रक्षितुं किरीटिने बलभिदथामरैः सह ॥ ३१ ॥
देवताओंको इस विजयसे बड़ी भारी प्रसन्नता प्राप्त हुई। उन्होंने उस अमृतको बड़ी सुव्यवस्थासे रखा । अमरोंसहित इन्द्रने अमृतकी वह निधि किरीटधारी भगवान् नरको रक्षाके लिये सौंप दी ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि अमृतमन्थनसमाप्तिर्नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें अमृतमन्थन-समाप्तिनामक उन्नीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९ ॥
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विंशोऽध्यायः कद्रू और विनताकी होड़, कद्रूद्वारा अपने पुत्रोंको शाप एवं ब्रह्माजीद्वारा उसका अनुमोदन सौतिरुवाच
एतत् ते कथितं सर्वममृतं मथितं यथा ।
यत्र सोऽश्वः समुत्पन्नः श्रीमानतुलविक्रमः ॥ १ ॥
यं निशम्य तदा कद्रूर्विनतामिदमब्रवीत् ।
उच्चैःश्रवा हि किं वर्णो भद्रे प्रब्रूहि माचिरम् ॥ २ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— शौनकादि महर्षियो! जिस प्रकार अमृत मथकर निकाला गया, वह सब प्रसंग मैंने आपलोगोंसे कह सुनाया । उस अमृत- मन्थनके समय ही वह अनुपम वेगशाली सुन्दर अश्व उत्पन्न हुआ था, जिसे देखकर कद्रूने विनतासे कहा — ‘ भद्रे! शीघ्र बताओ तो यह उच्चैःश्रवा घोड़ा किस रंगका है? ' ॥ १-२ ॥ विनतोवाच
श्वेत एवाश्वराजोऽयं किं वा त्वं मन्यसे शुभे ।
ब्रूहि वर्णं त्वमप्यस्य ततोऽत्र विपणावहे ॥ ३ ॥
विनता बोली - शुभे! यह अश्वराज श्वेत वर्णका ही है । तुम इसे कैसा समझती हो? तुम भी इसका रंग बताओ, तब हम दोनों इसके लिये बाजी लगायेंगी ॥ ३ ॥
कद्रूरुवाच
कृष्णवालमहं मन्ये हयमेनं शुचिस्मिते ।
एहि सार्धं मया दीव्य दासीभावाय भामिनि ॥ ४ ॥
कद्रूने कहा — पवित्र मुसकानवाली बहन! इस घोड़े ( का रंग तो अवश्य सफेद है, किंतु इस ) -की पूँछको मैं काले रंगकी ही मानती हूँ । भामिनि! आओ, दासी होनेकी शर्त रखकर मेरे साथ बाजी लगाओ ( यदि तुम्हारी बात ठीक हुई तो मैं दासी बनकर रहूँगी; अन्यथा तुम्हें मेरी दासी बनना होगा) ॥ ४ ॥
सौतिरुवाच
एवं ते समयं कृत्वा दासीभावाय वै मिथः ।
जग्मतुः स्वगृहानेव श्वो द्रक्ष्याव इति स्म ह ॥ ५ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं - इस प्रकार वे दोनों बहनें आपसमें एक -दूसरेकी दासी होनेकी शर्त रखकर अपने - अपने घर चली गयीं और उन्होंने यह निश्चय किया कि कल आकर