महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 2251–2256

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2251–2256

पृष्ठ 2251

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 2251 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पाञ्चाली पाण्डवानेतान् दैवसृष्टोपसर्पति ॥ ३० ॥

तदनन्तर सब धर्मोंके ज्ञाता परम बुद्धिमान् विदुरने कहा – ' भरतवंशियो! यह कृष्णा जो तुम्हारी सभामें लायी गयी, यही तुम्हारे विनाशका कारण होगा। यह जो पांचालराजकी पुत्री है, वह परम उत्तम लक्ष्मी ही है । देवताओंकी आज्ञासे ही पांचाली इन पाण्डवोंकी सेवा करती है ॥ २ ९ -३० ॥

तस्याः पार्थाः परिक्लेशं न क्षंस्यन्ते ह्यमर्षणाः ।

वृष्णयो वा महेष्वासाः पाञ्चाला वा महारथाः ॥ ३१ ॥

तेन सत्याभिसंधेन वासुदेवेन रक्षिताः ।

आगमिष्यति बीभत्सुः पाञ्चालैः परिवारितः ॥ ३२ ॥

' कुन्तीके पुत्र अमर्षमें भरे हुए हैं । द्रौपदीको जो यहाँ इस प्रकार क्लेश दिया गया है, इसे वे कदापि सहन नहीं करेंगे । सत्यप्रतिज्ञ भगवान् श्रीकृष्णसे सुरक्षित महान् धनुर्धर वृष्णिवंशी अथवा महारथी पांचाल वीर भी इसे नहीं सहेंगे। अर्जुन पांचाल वीरोंसे घिरे हुए अवश्य आयेंगे ॥ ३१-३२ ॥

तेषां मध्ये महेष्वासो भीमसेनो महाबलः ।

आगमिष्यति धुन्वानो गदां दण्डमिवान्तकः ॥ ३३ ॥

‘ उनके बीचमें महाधनुर्धर महाबली भीमसेन होंगे, जो दण्डपाणि यमराजकी भाँति गदा घुमाते हुए युद्धके लिये आयेंगे ॥ ३३ ॥

ततो गाण्डीवनिर्घोषं श्रुत्वा पार्थस्य धीमतः ।

गदावेगं च भीमस्य नालं सोढुं नराधिपाः ॥ ३४ ॥

‘ उस समय परम बुद्धिमान् अर्जुनके गाण्डीव धनुषकी टंकार सुनकर और भीमसेनकी गदाका महान् वेग देखकर कोई भी राजा उनका सामना करनेमें समर्थ न हो सकेंगे ॥ ३४ ॥

तत्र मे रोचते नित्यं पार्थैः साम न विग्रहः ।

कुरुभ्यो हि सदा मन्ये पाण्डवान् बलवत्तरान् ॥ ३५ ॥

‘ अतः मुझे तो पाण्डवोंके साथ सदा शान्ति बनाये रखनेकी ही नीति अच्छी लगती है । उनके साथ युद्ध करना मुझे पसंद नहीं है । मैं पाण्डवोंको सदा ही कौरवोंसे अधिक बलवान् मानता हूँ ॥ ३५ ॥

तथा हि बलवान् राजा जरासंधो महाद्युतिः ।

बाहुप्रहरणेनैव भीमेन निहतो युधि ॥ ३६ ॥

‘ क्योंकि महान् तेजस्वी और बलवान् राजा जरासंधको भीमसेनने बाहुरूपी शस्त्रसे ही युद्धमें मार गिराया था ॥

तस्य ते शम एवास्तु पाण्डवैर्भरतर्षभ ।

उभयोः पक्षयोर्युक्तं क्रियतामविशङ्कया ॥ ३७ ॥

पृष्ठ 2252

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 2252 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

‘ भरतवंशशिरोमणे! अतः पाण्डवोंके साथ आपको शान्ति ही बनाये रखनी चाहिये ।

दोनों पक्षोंके लिये यही उचित है । आप निःशंक होकर यही उपाय करें ॥ ३७ ॥

एवं कृते महाराज परं श्रेयस्त्वमाप्स्यसि ।

एवं गावल्गणे क्षत्ता धर्मार्थसहितं वचः ॥ ३८ ॥

उक्तवान् न गृहीतं वै मया पुत्रहितैषिणा ॥ ३ ९ ॥

‘ महाराज! ऐसा करनेपर आप परम कल्याणके भागी होंगे । ' संजय! इस प्रकार विदुरने मुझसे धर्म और अर्थयुक्त बातें कही थीं, किंतु पुत्रका हित चाहनेवाला होकर भी मैंने उनकी बात नहीं मानी ॥ ३८-३९ ॥ इति श्रीमहाभारते शतसाहस्यां संहितायां वैयासिक्यां सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि धृतराष्ट्रसंजयसंवादे एकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥

इस प्रकार व्यासनिर्मित श्रीमहाभारतनामक एक लाख श्लोकोंकी संहितामें सभापर्वके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें धृतराष्ट्रसंजयसंवादविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८१ ॥

( सभापर्व सम्पूर्णम्) अनुष्टुप् छन्द ( अन्य बड़े छन्द ) बड़े छन्दोंको ३२ कुलयोग अक्षरोंके अनुष्टुप् मानकर गिननेपर उत्तरभारतीय पाठसे लिये गये श्लोक- ( २१७॥ = २८१३ = ) २५ ९५ ॥ १५७ दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये श्लोक- १। = १२४३ ।- १२४२ ( १ ) सभापर्वकी पूर्ण श्लोकसंख्या - ४०५६ ॥

पृष्ठ 2253

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 2253 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ निवेदन ‘ महाभारत मासिक पत्र' के इस पञ्चम अङ्कमें सभापर्व समाप्त होकर वनपर्वका आरम्भ हो रहा है । आदिपर्वकी भाँति सभापर्वमें भी दाक्षिणात्य पाठके उपयोगी श्लोक लिये गये हैं । विशेषतः अड़तीसवें अध्यायमें भगवान्‌के अवतारोंका जो संक्षिप्त और श्रीकृष्णावतारका विशेष वर्णन दाक्षिणात्य प्रतियोंमें उपलब्ध होता है, उस प्रसङ्गमे एक ही स्थलपर ७६१ श्लोक लिये गये हैं । भगवान्‌के चरित्र- वर्णनके ये श्लोक अत्यन्त उपयोगी, आवश्यक तथा महत्त्वपूर्ण हैं । राजसूय यज्ञमें भगवान् श्रीकृष्णकी अग्रपूजाके प्रसङ्गमें जब भीष्मजीने बहुतसे संत- महात्माओंके मुखसे सुनी हुई श्रीकृष्णकी महिमा बतायी, उस समय युधिष्ठिरके मनमें उनके लीला- चरित्रको सुननेकी अभिलाषा जाग्रत् हो उठी और उन्हींके पूछनेपर भीष्मजीने विस्तारपूर्वक भगवान्‌की लीलाओंका वर्णन किया । इकतालीसवें अध्यायके शिशुपालके कथनपर ध्यान देनेसे भी उक्त प्रसङ्गकी अनिवार्य आवश्यकता सिद्ध होती है । यदि भीष्मजीने भगवान्की पूतनावध, शकट- भंजन, तृणावर्त- उद्धार, यमलार्जुनभङ्ग, बकासुरवध, कालियदमन, केशी- अरिष्टासुर-वध और कंस- संहार आदि बाल- लीलाओंका वर्णन न किया होता तो शिशुपाल उनका नामोल्लेख कैसे कर सकता था; इससे सिद्ध है कि भीष्मजीने उस समय अवश्य ही विस्तारपूर्वक श्रीकृष्णचरित सुनाये थे । वनपर्वके प्रसङ्ग भी बड़े ही मार्मिक और उपादेय हैं। पाण्डवोंकी कष्टसहिष्णुता, साहस, उत्साह, धैर्य और संकटकालमें भी धर्म - पालनकी दृढ़ता आदि बातें सदा ही पढ़ने, मनन करने और जीवनमें उतारने योग्य हैं । इस पर्वमें अनेकानेक राजर्षियों- महर्षियोंके त्याग एवं तपस्यामय जीवनकी झाँकी देखनेको मिलती है । इसमें तीर्थसेवन, दान, यज्ञ, परोपकार, धर्माचरण, सत्यपरायणता, त्याग, वैराग्य, पातिव्रत्य, तपस्या तथा सत्सङ्ग आदिके महत्त्वका बहुत सुन्दर निरूपण है। शान्तिपर्वकी भाँति यह पर्व भी समादरणीय सदुपदेशोंसे ही भरा है । नल- दमयन्ती सत्यवान्- सावित्री तथा रामायणकी कथा भी इसीमें आयी है । सभी दृष्टियोंमें यह पर्व पठनीय और माननीय है । सम्पादक- महाभारत

पृष्ठ 2254

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 2254 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ |महाभारत- सार

मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च ।

संसारेष्वनुभूतानि यान्ति यास्यन्ति चापरे ॥

' मनुष्य इस जगत्में हजारों माता - पिताओं तथा सैकड़ों स्त्री- पुत्रोंके संयोग - वियोगका अनुभव कर चुके हैं, करते हैं और करते रहेंगे । '

हर्षस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च ।

दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥

‘ अज्ञानी पुरुषको प्रतिदिन हर्षके हजारों और भयके सैकड़ों अवसर प्राप्त होते रहते हैं; किन्तु विद्वान् पुरुषके मनपर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है । '

ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति मे ।

धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ॥

‘ मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर पुकार- पुकारकर कह रहा हूँ, पर मेरी बात कोई नहीं सुनता । धर्मसे मोक्ष तो सिद्ध होता ही है; अर्थ और काम भी सिद्ध होते हैं तो भी लोग उसका सेवन क्यों नहीं करते! ' न जातु कामान्न भयान्न लोभाद् धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः । नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः ॥ ‘ कामनासे, भयसे, लोभसे अथवा प्राण बचानेके लिये भी धर्मका त्याग न करे । धर्म नित्य है और सुख- दुःख अनित्य । इसी प्रकार जीवात्मा नित्य है और उसके बन्धनका हेतु अनित्य । ’

इमां भारतसावित्रीं प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।

स भारतफलं प्राप्य परं ब्रह्माधिगच्छति ॥

‘ यह महाभारतका सारभूत उपदेश ' भारत - सावित्री' के नामसे प्रसिद्ध है । जो प्रतिदिन सबेरे उठकर इसका पाठ करता है, वह सम्पूर्ण महाभारतके अध्ययनका फल पाकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है । ' -महाभारत, स्वर्गारोहण० ५/६० - ६४

पृष्ठ 2255

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 2255 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

गीताप्रेसगोरखपुर | GITA PRESS, GORAKHPUR [SINCE 1923] , गीताप्रेस गोरखपुर २७३००५ फोन: ( ०५५१ ) २३३४७२१, २३३१२५०, २३३१२५१

पृष्ठ 2256

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 2256 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं मिला — ऊपर मूल चित्र देखें।