महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 401–410
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 401–410
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तक्षकस्य कुले जातान् प्रवक्ष्यामि निबोध तान् ।
पुच्छाण्डको मण्डलकः पिण्डसेक्ता रभेणकः ॥ ८ ॥
उच्छिखः शरभो भङ्गो बिल्वतेजा विरोहणः ।
शिली शलकरो मूकः सुकुमारः प्रवेपनः ॥ ९ ॥
मुद्गरः शिशुरोमा च सुरोमा च महाहनुः ।
एते तक्षकजा नागाः प्रविष्टा हव्यवाहनम् ॥ १० ॥
अब तक्षकके कुलमें उत्पन्न नागोंका वर्णन करूँगा, उनके नाम सुनो – पुच्छाण्डक, मण्डलक, पिण्डसेक्ता, रभेणक, उच्छिख, शरभ, भंग, बिल्वतेजा, विरोहण, शिली, शलकर, मूक, सुकुमार, प्रवेपन, मुद्गर, शिशुरोमा, सुरोमा और महाहनु — ये तक्षकके वंशज नाग थे, जो सर्पसत्रकी आगमें समा गये ॥ ८–१० ॥
पारावतः पारिजातः पाण्डरो हरिणः कृशः ।
विहङ्गः शरभो मेदः प्रमोदः संहतापनः ॥ ११ ॥
ऐरावतकुलादेते प्रविष्टा हव्यवाहनम् । पारावत, पारिजात, पाण्डर, हरिण, कृश, विहंग, शरभ, मेद, प्रमोद और संहतापन — ये ऐरावतके कुलसे आकर आगमें आहुति बन गये थे ॥ ११३ ॥
कौरव्यकुलजान् नागाञ्छृणु मे त्वं द्विजोत्तम ॥ १२ ॥
द्विजश्रेष्ठ! अब तुम मुझसे कौरव्यके कुलमें उत्पन्न हुए नागोंके नाम सुनो ॥ १२ ॥
एरकः कुण्डलो वेणी वेणीस्कन्धः कुमारकः ।
बाहुकः शृंगवेरश्च धूर्तकः प्रातरातकौ ॥ १३ ॥
कौरव्यकुलजास्त्वेते प्रविष्टा हव्यवाहनम् । एरक, कुण्डल, वेणी, वेणीस्कन्ध, कुमारक, बाहुक, शृंगवेर, धूर्तक, प्रातर और आतक - ये कौरव्य - कुलके नाग यज्ञाग्निमें जल मरे थे ॥ १३३ ॥
धृतराष्ट्रकुले जाताञ्छृणु नागान् यथातथम् ॥ १४ ॥
कीर्त्यमानान् मया ब्रह्मन् वातवेगान् विषोल्बणान् ।
शङ्कुकर्णः पिठरकः कुठारमुखसेचकौ ॥ १५ ॥
पूर्णाङ्गदः पूर्णमुखः प्रहासः शकुनिर्दरिः ।
अमाहठः कामठकः सुषेणो मानसोऽव्ययः ॥ १६ ॥
भैरवो मुण्डवेदाङ्गः पिशङ्गश्चोद्रपारकः ।
ऋषभो वेगवान् नागः पिण्डारकमहाहनू ॥ १७ ॥
रक्ताङ्गः सर्वसारङ्गः समृद्धपटवासकौ ।
वराहको वीरणकः सुचित्रश्चित्रवेगिकः ॥ १८ ॥
पराशरस्तरुणको मणिः स्कन्धस्तथारुणिः ।
इति नागा मया ब्रह्मन् कीर्तिताः कीर्तिवर्धनाः ॥ १ ९ ॥
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प्राधान्येन बहुत्वात् तु न सर्वे परिकीर्तिताः ।
एतेषां प्रसवो यश्च प्रसवस्य च संततिः ॥ २० ॥
न शक्यं परिसंख्यातुं ये दीप्तं पावकं गताः ।
त्रिशीर्षाः सप्तशीर्षाश्च दशशीर्षास्तथापरे ॥ २१ ॥
ब्रह्मन्! अब धृतराष्ट्रके कुलमें उत्पन्न नागोंके नामोंका मुझसे यथावत् वर्णन सुनो । वे वायुके समान वेगशाली और अत्यन्त विषैले थे । ( उनके नाम इस प्रकार हैं— ) शंकुकर्ण, पिठरक, कुठार, मुखसेचक, पूर्णांगद, पूर्णमुख, प्रहास, शकुनि, दरि, अमाहठ, कामठक, सुषेण, मानस, अव्यय, भैरव, मुण्डवेदांग, पिशंग, उद्रपारक, ऋषभ, वेगवान् नाग, पिण्डारक, महाहनु, रक्तांग, सर्वसारंग, समृद्ध, पटवासक, वराहक, वीरणक, सुचित्र, चित्रवेगिक, पराशर, तरुणक, मणि, स्कन्ध और आरुणि – ( ये सभी धृतराष्ट्रवंशी नाग सर्पसत्रकी आगमें जलकर भस्म हो गये थे । ) ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने अपने कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले मुख्य- मुख्य नागोंका वर्णन किया है । उनकी संख्या बहुत है, इसलिये सबका नामोल्लेख नहीं किया गया है । इन सबकी संतानोंकी और संतानोंकी संततिकी, जो प्रज्वलित अग्निमें जल मरी थीं, गणना नहीं की जा सकती । किसीके तीन सिर थे तो किसीके सात तथा कितने ही दस - दस सिरवाले नाग थे ॥ १४–२१ ॥
कालानलविषा घोरा हुताः शतसहस्रशः ।
महाकाया महावेगाः शैलशृङ्गसमुच्छ्रयाः ॥ २२ ॥
उनके विष प्रलयाग्निके समान दाहक थे । वे नाग बड़े ही भयंकर थे । उनके शरीर विशाल और वेग महान् थे । वे ऊँचे तो ऐसे थे, मानो पर्वतके शिखर हों । ऐसे नाग लाखोंकी संख्यामें यज्ञाग्निकी आहुति बन गये ॥ २२ ॥
योजनायामविस्तारा द्वियोजनसमायताः ।
कामरूपाः कामबला दीप्तानलविषोल्बणाः ॥ २३ ॥
दग्धास्तत्र महासत्रे ब्रह्मदण्डनिपीडिताः ॥ २४ ॥
उनकी लम्बाई- चौड़ाई एक- एक, दो -दो योजनतककी थी । वे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले तथा इच्छानुरूप बल- पराक्रमसे सम्पन्न थे । वे सब- के - सब धधकती हुई आगके समान भयंकर विषसे भरे थे । माताके शापरूपी ब्रह्मदण्डसे पीड़ित होनेके कारण वे उस महासत्रमें जलकर भस्म हो गये ॥ २३-२४ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पनामकथने सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥
इस प्रकारश्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पनामकथनविषयक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५७ ॥
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अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः यज्ञकी समाप्ति एवं आस्तीकका सर्पोंसे वर प्राप्त करना सौतिरुवाच
इदमत्यद्भुतं चान्यदास्तीकस्यानुशुश्रुम ।
तथा वरैश्छन्द्यामाने राज्ञा पारिक्षितेन हि ॥ १ ॥
इन्द्रहस्ताच्च्युतो नागः ख एव यदतिष्ठत ।
ततश्चिन्तापरो राजा बभूव जनमेजयः ॥ २ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— शौनक! आस्तीकके सम्बन्धमें यह एक और अद्भुत बात मैंने सुन रखी है कि जब राजा जनमेजयने उनसे पूर्वोक्त रूपसे वर माँगनेका अनुरोध किया और उनके वर माँगनेपर इन्द्रके हाथसे छूटकर गिरा हुआ तक्षक नाग आकाशमें ही ठहर गया, तब महाराज जनमेजयको बड़ी चिन्ता हुई ॥ १-२ ॥
हूयमाने भृशं दीप्ते विधिवद् वसुरेतसि ।
न स्म स प्रापतद् वह्नौ तक्षको भयपीडितः ॥ ३ ॥
क्योंकि अग्नि पूर्णरूपसे प्रज्वलित थी और उसमें विधिपूर्वक आहुतियाँ दी जा रही थीं तो भी भयसे पीड़ित तक्षक नाग उस अग्निमें नहीं गिरा ॥ ३ ॥
शौनक उवाच
किं सूत तेषां विप्राणां मन्त्रग्रामो मनीषिणाम् ।
न प्रत्यभात् तदाग्नौ यत् स पपात न तक्षकः ॥ ४ ॥
शौनकजीने पूछा – सूत! उस यज्ञमें बड़े - बड़े मनीषी ब्राह्मण उपस्थित थे । क्या उन्हें ऐसे मन्त्र नहीं सूझे, जिनसे तक्षक शीघ्र अग्निमें आ गिरे? क्या कारण था जो तक्षक अग्निकुण्डमें न गिरा? ॥ ४ ॥
सौतिरुवाच
तमिन्द्रहस्ताद् वित्रस्तं विसंज्ञं पन्नगोत्तमम् ।
आस्तीकस्तिष्ठ तिष्ठेति वाचस्तिस्रोऽभ्युदैरयत् ॥ ५ ॥
उग्रश्रवाजीने कहा — शौनक! इन्द्रके हाथसे छूटनेपर नागप्रवर तक्षक भयसे थर्रा उठा । उसकी चेतना लुप्त हो गयी । उस समय आस्तीकने उसे लक्ष्य करके तीन बार इस प्रकार कहा — ' ठहर जा, ठहर जा, ठहर जा' ॥ ५ ॥
वितस्थे सोऽन्तरिक्षे च हृदयेन विदूयता ।
यथा तिष्ठति वै कश्चित् खं च गां चान्तरा नरः ॥ ६ ॥
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तब तक्षक पीड़ित हृदयसे आकाशमें उसी प्रकार ठहर गया, जैसे कोई मनुष्य आकाश और पृथ्वीके बीचमें लटक रहा हो ॥ ६ ॥
ततो राजाब्रवीद् वाक्यं सदस्यैश्चोदितो भृशम् ।
काममेतद् भवत्वेवं यथाss स्तीकस्य भाषितम् ॥ ७ ॥
तदनन्तर सभासदोंके बार- बार प्रेरित करनेपर राजा जनमेजयने यह बात कही ——अच्छा, आस्तीकने जैसा कहा है, वही हो ॥ ७ ॥
समाप्यतामिदं कर्म पन्नगाः सन्त्वनामयाः ।
प्रीयतामयमास्तीकः सत्यं सूतवचोऽस्तु तत् ॥ ८ ॥
‘ यह यज्ञकर्म समाप्त किया जाय । नागगण कुशलपूर्वक रहें और ये आस्तीक प्रसन्न हों । साथ ही सूतजीकी कही हुई बात भी सत्य हो ' ॥ ८ ॥
ततो हलहलाशब्दः प्रीतिदः समजायत ।
आस्तीकस्य वरे दत्ते तथैवोपरराम च ॥ ९ ॥
स यज्ञः पाण्डवेयस्य राज्ञः पारिक्षितस्य ह ।
प्रीतिमांश्चाभवद् राजा भारतो जनमेजयः ॥ १० ॥
जनमेजयके द्वारा आस्तीकको यह वरदान प्राप्त होते ही सब ओर प्रसन्नता बढ़ानेवाली हर्षध्वनि छा गयी और पाण्डववंशी महाराज जनमेजयका वह यज्ञ बंद हो गया । ब्राह्मणको वर देकर भरतवंशी राजा जनमेजयको भी प्रसन्नता हुई ॥ ९ -१० ॥
ऋत्विग्भ्यः ससदस्येभ्यो ये तत्रासन् समागताः ।
तेभ्यश्च प्रददौ वित्तं शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ११ ॥
उस यज्ञमें जो ऋत्विज् और सदस्य पधारे थे, उन सबको राजा जनमेजयने सैकड़ों और सहस्रोंकी संख्या में धन -दान किया ॥ ११ ॥
लोहिताक्षाय सूताय तथा स्थपतये विभुः ।
येनोक्तं तस्य तत्राग्रे सर्पसत्रनिवर्तने ॥ १२ ॥
निमित्तं ब्राह्मण इति तस्मै वित्तं ददौ बहु ।
दत्त्वा द्रव्यं यथान्यायं भोजनाच्छादनान्वितम् ॥ १३ ॥
प्रीतस्तस्मै नरपतिरप्रमेयपराक्रमः ।
ततश्चकारावभृथं विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ १४ ॥
लोहिताक्ष, सूत तथा शिल्पीको, जिसने यज्ञके पहले ही बता दिया था कि इस सर्पसत्रको बंद करनेमें एक ब्राह्मण निमित्त बनेगा, प्रभावशाली राजा जनमेजयने बहुत धन दिया । जिनके पराक्रमकी कहीं तुलना नहीं है, उन नरेश्वर जनमेजयने प्रसन्न होकर यथायोग्य द्रव्य और भोजन- वस्त्र आदिका दान करनेके पश्चात् शास्त्रीय विधिके अनुसार अवभृथ- स्नान किया ॥ १२–१४ ॥ आस्तीकं प्रेषयामास गृहानेव सुसंस्कृतम् ।
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राजा प्रीतमनाः प्रीतं कृतकृत्यं मनीषिणम् ॥ १५ ॥
पुनरागमनं कार्यमिति चैनं वचोऽब्रवीत् ।
भविष्यसि सदस्यो मे वाजिमेधे महाक्रतौ ॥ १६ ॥
आस्तीक शुभ- संस्कारोंसे सम्पन्न और मनीषी विद्वान् थे । अपना कर्तव्य पूर्ण कर लेनेके कारण वे कृतकृत्य एवं प्रसन्न थे । राजा जनमेजयने उन्हें प्रसन्नचित्त होकर घरके लिये विदा दी और कहा — ' ब्रह्मन्! मेरे भावी अश्वमेध नामक महायज्ञमें आप सदस्य हों और उस समय पुनः पधारनेकी कृपा करें' ॥ १५-१६ ॥
तथेत्युक्त्वा प्रदुद्राव तदाss स्तीको मुदा युतः ।
कृत्वा स्वकार्यमतुलं तोषयित्वा च पार्थिवम् ॥ १७ ॥
आस्तीकने प्रसन्नतापूर्वक ' बहुत अच्छा ' कहकर राजाकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और अपने अनुपम कार्यका साधन करके राजाको संतुष्ट करनेके पश्चात् वहाँसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान किया ॥ १७ ॥
स गत्वा परमप्रीतो मातुलं मातरं च ताम् ।
अभिगम्योपसंगृह्य तथावृत्तं न्यवेदयत् ॥ १८ ॥
वे अत्यन्त प्रसन्न हो घर जाकर मामा और मातासे मिले और उनके चरणोंमें प्रणाम करके वहाँका सब समाचार सुनाया ॥ १८ ॥
सौतिरुवाच एतच्छ्रुत्वा प्रीयमाणाः समेता
ये तत्रासन् पन्नगा वीतमोहाः ।
आस्तीके वै प्रीतिमन्तो बभूवु- रूचुश्चैनं वरमिष्टं वृणीष्व ॥ १ ९ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— शौनक! सर्पसत्रसे बचे हुए जो- जो नाग मोहरहित हो उस समय वासुकि नागके यहाँ उपस्थित थे, वे सब आस्तीकके मुखसे उस यज्ञके बंद होनेका समाचार सुनकर बड़े प्रसन्न हुए । आस्तीकपर उनका प्रेम बहुत बढ़ गया और वे उनसे बोले -'वत्स! तुम कोई अभीष्ट वर माँग लो' ॥ १ ९ ॥ भूयो भूयः सर्वशस्तेऽब्रुवंस्तं किं ते प्रियं करवामाद्य विद्वन् । प्रीता वयं मोक्षिताश्चैव सर्वे कामं किं ते करवामाद्य वत्स ॥ २० ॥
वे सब- के - सब बार- बार यह कहने लगे - ' विद्वान्! आज हम तुम्हारा कौन- सा प्रिय कार्य करें? वत्स! तुमने हमें मृत्युके मुखसे बचाया है; अतः हम सब लोग तुमसे बहुत प्रसन्न हैं । बोलो, तुम्हारा कौन- सा मनोरथ पूर्ण करें? ' ॥ २० ॥
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आस्तीक उवाच सायं प्रातर्ये प्रसन्नात्मरूपा लोके विप्रा मानवा ये परे s पि । धर्माख्यानं ये पठेयुर्ममेदं तेषां युष्मन्नैव किंचिद् भयं स्यात् ॥ २१ ॥
आस्तीकने कहा — नागगण! लोकमें जो ब्राह्मण अथवा कोई दूसरा मनुष्य प्रसन्नचित्त होकर मेरे इस धर्ममय उपाख्यानका पाठ करे, उसे आपलोगोंसे कोई भय न हो ॥ २१ ॥
तैश्चाप्युक्तो भागिनेयः प्रसन्नै- रेतत् सत्यं काममेवं वरं ते । प्रीत्या युक्ताः कामितं सर्वशस्ते कर्तारः स्म प्रवणा भागिनेय ॥ २२ ॥
यह सुनकर सभी सर्प बहुत प्रसन्न हुए और अपने भानजेसे बोले — ' प्रिय वत्स! तुम्हारी यह कामना पूर्ण हो । भगिनीपुत्र! हम बड़े प्रेम और नम्रतासे युक्त होकर सर्वथा तुम्हारे इस मनोरथको पूर्ण करते रहेंगे ॥ २२ ॥
असितं चार्तिमन्तं च सुनीथं चापि यः स्मरेत् ।
दिवा वा यदि वा रात्रौ नास्य सर्पभयं भवेत् ॥ २३ ॥
‘ जो कोई असित, आर्तिमान् और सुनीथ मन्त्रका दिन अथवा रातके समय स्मरण करेगा, उसे सर्पोंसे कोई भय नहीं होगा ॥ २३ ॥
यो जरत्कारुणा जातो जरत्कारौ महायशाः ।
आस्तीकः सर्पसत्रे वः पन्नगान् योऽभ्यरक्षत ।
तं स्मरन्तं महाभागा न मां हिंसितुमर्हथ ॥ २४ ॥
' ( मन्त्र और उनके भाव इस प्रकार हैं - ) जरत्कारु ऋषिसे जरत्कारु नामक नागकन्यासे जो आस्तीक नामक यशस्वी ऋषि उत्पन्न हुए तथा जिन्होंने सर्पसत्रमें तुम सर्पोंकी रक्षा की थी, उनका मैं स्मरण कर रहा हूँ । महाभाग्यवान् सर्पो! तुमलोग मुझे मत डँसो ॥ २४ ॥
सर्पापसर्प भद्रं ते गच्छ सर्प महाविष ।
जनमेजयस्य यज्ञान्ते आस्तीकवचनं स्मर ॥ २५ ॥
‘ महाविषधर सर्प! तुम भाग जाओ! तुम्हारा कल्याण हो! अब तुम जाओ । जनमेजयके यज्ञकी समाप्तिमें आस्तीकको तुमने जो वचन दिया था, उसका स्मरण करो ॥ २५ ॥
आस्तीकस्य वचः श्रुत्वा यः सर्पो न निवर्तते ।
शतधा भिद्यते मूर्ध्नि शिंशवृक्षफलं यथा ॥ २६ ॥
‘ जो सर्प आस्तीकके वचनकी शपथ सुनकर भी नहीं लौटेगा, उसके फनके शीशमके फलके समान सैकड़ों टुकड़े हो जायँगे ' ॥ २६ ॥
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सौतिरुवाच स एवमुक्तस्तु तदा द्विजेन्द्रः समागतैस्तैर्भुजगेन्द्रमुख्यैः । सम्प्राप्य प्रीतिं विपुलां महात्मा ततो मनो गमनायाथ दध्रे ॥ २७ ॥
मोक्षयित्वा तु भुजगान् सर्पसत्राद् द्विजोत्तमः ।
जगाम काले धर्मात्मा दिष्टान्तं पुत्रपौत्रवान् ॥ २८ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं - विप्रवर शौनक! उस समय वहाँ आये हुए प्रधान-प्रधान नागराजोंके इस प्रकार कहनेपर महात्मा आस्तीकको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई । तदनन्तर उन्होंने वहाँसे चले जानेका विचार किया । इस प्रकार सर्पसत्रसे नागोंका उद्धार करके द्विजश्रेष्ठ धर्मात्मा आस्तीकने विवाह करके पुत्र- पौत्रादि उत्पन्न किये और समय आनेपर (प्रारब्ध शेष होनेसे ) मोक्ष प्राप्त कर लिया ॥ २७-२८ ॥
इत्याख्यानं मयाऽऽस्तीकं यथावत् तव कीर्तितम् ।
यत् कीर्तयित्वा सर्पेभ्यो न भयं विद्यते क्वचित् ॥ २ ९ ॥
इस प्रकार मैंने आपसे आस्तीकके उपाख्यानका यथावत् वर्णन किया है; जिसका पाठ कर लेनेपर कहीं भी सर्पोंसे भय नहीं होता ॥ २ ९ ॥
यथा कथितवान् ब्रह्मन् प्रमतिः पूर्वजस्तव ।
पुत्राय रुरवे प्रीतः पृच्छते भार्गवोत्तम ॥ ३० ॥
यद् वाक्यं श्रुतवांश्चाहं तथा च कथितं मया ।
आस्तीकस्य कवेर्विप्र श्रीमच्चरितमादितः ॥ ३१ ॥
ब्रह्मन्! भृगुवंशशिरोमणे! आपके पूर्वज प्रमतिने अपने पुत्र रुरुके पूछनेपर जिस प्रकार आस्तीकोपाख्यान कहा था और जिसे मैंने भी सुना था, उसी प्रकार विद्वान् महात्मा आस्तीकके मंगलमय चरित्रका मैंने प्रारम्भसे ही वर्णन किया है ॥ ३०-३१ ॥ श्रुत्वा धर्मिष्ठमाख्यानमास्तीकं पुण्यवर्धनम् ।
यन्मां त्वं पृष्टवान् ब्रह्मञ्छ्रुत्वा डुण्डुभभाषितम् ।
व्येतु ते सुमहद् ब्रह्मन् कौतूहलमरिन्दम ॥ ३२ ॥
आस्तीकका यह धर्ममय उपाख्यान पुण्यकी वृद्धि करनेवाला है । काम -क्रोधादि शत्रुओंका दमन करनेवाले ब्राह्मण! कथाप्रसंगमें डुण्डुभकी बात सुनकर आपने मुझसे जिसके विषयमें पूछा था, वह सब उपाख्यान मैंने कह सुनाया । इसे सुनकर आपके मनका महान् कौतूहल अब निवृत्त हो जाना चाहिये ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रे अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥
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इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पसत्रविषयक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५८ ॥
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(अंशावतरणपर्व) एकोनषष्टितमोऽध्यायः महाभारतका उपक्रम शौनक उवाच
भृगुवंशात् प्रभृत्येव त्वया मे कीर्तितं महत् ।
आख्यानमखिलं तात सौते प्रीतोऽस्मि तेन ते ॥ १ ॥
शौनकजी बोले- तात सूतनन्दन! आपने भृगुवंशसे ही प्रारम्भ करके जो मुझे यह सब महान् उपाख्यान सुनाया है, इससे मैं आपपर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ १ ॥
वक्ष्यामि चैव भूयस्त्वां यथावत् सूतनन्दन ।
याः कथा व्याससम्पन्नास्ताश्च भूयो विचक्ष्व मे ॥ २ ॥
सूतपुत्र! अब मैं पुनः आपसे यह कहना चाहता हूँ कि भगवान् व्यासने जो कथाएँ कही हैं, उनका मुझसे यथावत् वर्णन कीजिये ॥ २ ॥
तस्मिन् परमदुष्पारे सर्पसत्रे महात्मनाम् ।
कर्मान्तरेषु यज्ञस्य सदस्यानां तथाध्वरे ॥ ३ ॥
या बभूवुः कथाश्चित्रा येष्वर्थेषु यथातथम् ।
त्वत्त इच्छामहे श्रोतुं सौते त्वं वै प्रचक्ष्व नः ॥ ४ ॥
जिसका पार होना कठिन था, ऐसे सर्पयज्ञमें आये हुए महात्माओं एवं सभासदोंको जब यज्ञकर्मसे अवकाश मिलता था, उस समय उनमें जिन -जिन विषयोंको लेकर जो -जो
विचित्र कथाएँ होती थीं उन सबका आपके मुखसे हम यथार्थ वर्णन सुनना चाहते हैं ।
सूतनन्दन! आप हमसे अवश्य कहें ॥ ३-४ ॥
सौतिरुवाच
कर्मान्तरेष्वकथयन् द्विजा वेदाश्रयाः कथाः ।
व्यासस्त्वकथयच्चित्रमाख्यानं भारतं महत् ॥ ५ ॥
उग्रश्रवाजीने कहा — शौनक! यज्ञकर्मसे अवकाश मिलनेपर अन्य ब्राह्मण तो वेदोंकी कथाएँ कहते थे, परंतु व्यासदेवजी अति विचित्र महाभारतकी कथा सुनाया करते थे ॥ ५ ॥
शौनक उवाच
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महाभारतमाख्यानं पाण्डवानां यशस्करम् ।
जनमेजयेन पृष्टः सन् कृष्णद्वैपायनस्तदा ॥ ६ ॥
श्रावयामास विधिवत् तदा कर्मान्तरे तु सः ।
तामहं विधिवत् पुण्यां श्रोतुमिच्छामि वै कथाम् ॥ ७ ॥
शौनकजी बोले – सूतनन्दन! महाभारत नामक इतिहास तो पाण्डवोंके यशका विस्तार करनेवाला है । सर्पयज्ञके विभिन्न कर्मोंके बीचमें अवकाश मिलने पर जब राजा जनमेजय प्रश्न करते, तब श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यासजी उन्हें विधिपूर्वक महाभारतकी कथा सुनाते थे । मैं उसी पुण्यमयी कथाको विधिपूर्वक सुनना चाहता हूँ ॥ ६-७ ॥
मनःसागरसम्भूतां महर्षेर्भावितात्मनः ।
कथयस्व सतां श्रेष्ठ सर्वरत्नमयीमिमाम् ॥ ८ ॥
यह कथा पवित्र अन्तःकरणवाले महर्षि वेद व्यासके हृदयरूपी समुद्रसे प्रकट हुए सब प्रकारके शुभ विचाररूपी रत्नोंसे परिपूर्ण है । साधुशिरोमणे! आप इस कथाको मुझे सुनाइये ॥ ८ ॥
सौतिरुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि महदाख्यानमुत्तमम् ।
कृष्णद्वैपायनमतं महाभारतमादितः ॥ ९ ॥
उग्रश्रवाजीने कहा - शौनक! मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ महाभारत नामक उत्तम उपाख्यानका आरम्भसे ही वर्णन करूँगा, जो श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासको अभिमत है ॥ ९ ॥
शृणु सर्वमशेषेण कथ्यमानं मया द्विज ।
शंसितुं तन्महान् हर्षो ममापीह प्रवर्तते ॥ १० ॥
विप्रवर! मेरे द्वारा कही जानेवाली इस सम्पूर्ण महाभारत- कथाको आप पूर्णरूपसे सुनिये । यह कथा सुनाते समय मुझे भी महान् हर्ष प्राप्त होता है ॥ १० ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि कथानुबन्धे एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें कथानुबन्धविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ९ ॥