महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 421–430
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 421–430
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तत्पश्चात् कुन्तीकुमार अर्जुनने खाण्डवप्रस्थमें भगवान् वासुदेवके साथ रहकर अग्निदेवको तृप्त किया । नृपश्रेष्ठ जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णका साथ होनेसे अर्जुनको इस कार्यमें ठीक उसी तरह अधिक परिश्रम या भारका अनुभव नहीं हुआ, जैसे दृढ़ निश्चयको सहायक बनाकर देवशत्रुओंका वध करते समय भगवान् विष्णुको भार या परिश्रमकी प्रतीति नहीं होती है ॥ ४५-४६ ॥ पार्थायाग्निर्ददौ चापि गाण्डीवं धनुरुत्तमम् ॥ ४७ ॥
इषुधी चाक्षयैर्बाणै रथं च कपिलक्षणम् ।
मोक्षयामास बीभत्सुर्मयं यत्र महासुरम् ॥ ४८ ॥
तदनन्तर अग्निदेवने संतुष्ट हो अर्जुनको उत्तम गाण्डीव धनुष, अक्षय बाणोंसे भरे हुए दो तूणीर और एक कपिध्वज रथ प्रदान किया । उसी समय अर्जुनने महान् असुर मयको खाण्डव वनमें जलनेसे बचाया था ॥ ४७-४८ ॥
स चकार सभां दिव्यां सर्वरत्नसमाचिताम् ।
तस्यां दुर्योधनो मन्दो लोभं चक्रे सुदुर्मतिः ॥ ४ ९ ॥
इससे संतुष्ट होकर उसने अर्जुनके लिये एक दिव्य सभाभवनका निर्माण किया, जो सब प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित था । खोटी बुद्धिवाले मूर्ख दुर्योधनके मनमें उस सभाको ले लेनेके लिये लोभ पैदा हुआ ॥ ४ ९ ॥
ततोऽक्षैर्वञ्चयित्वा च सौबलेन युधिष्ठिरम् ।
वनं प्रस्थापयामास सप्त वर्षाणि पञ्च च ॥ ५० ॥
अज्ञातमेकं राष्ट्रे च ततो वर्षं त्रयोदशम् ।
ततश्चतुर्दशे वर्षे याचमानाः स्वकं वसु ॥ ५१ ॥
तब उसने शकुनिकी सहायतासे कपटपूर्ण जुएके द्वारा युधिष्ठिरको ठग लिया और उन्हें बारह वर्षतक वनमें और तेरहवें वर्ष एक राष्ट्रमें अज्ञात रूपसे वास करनेके लिये भेज दिया । इसके बाद चौदहवें वर्षमें पाण्डवोंने लौटकर अपना राज्य और धन माँगा ॥ ५०-५१ ॥
नालभन्त महाराज ततो युद्धमवर्तत ।
ततस्ते क्षत्रमुत्साद्य हत्वा दुर्योधनं नृपम् ॥ ५२ ॥
राज्यं विहतभूयिष्ठं प्रत्यपद्यन्त पाण्डवाः ।
एवमेतत् पुरावृत्तं तेषामक्लिष्टकर्मणाम् ।
भेदो राज्यविनाशाय जयश्च जयतां वर ॥ ५३ ॥
महाराज! जब इस प्रकार न्यायपूर्वक माँगनेपर भी उन्हें राज्य नहीं मिला, तब दोनों दलोंमें युद्ध छिड़ गया । फिर तो पाण्डव- वीरोंने क्षत्रियकुलका संहार करके राजा दुर्योधनको भी मार डाला और अपने राज्यको, जिसका अधिकांश भाग उजाड़ हो गया था, पुनः अपने अधिकारमें कर लिया । विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ जनमेजय! अनायास महान् कर्म करनेवाले
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पाण्डवोंका यही पुरातन इतिहास है । इस प्रकार राज्यके विनाशके लिये उनमें फूट पड़ी और युद्धके बाद उन्हें विजय प्राप्त हुई ॥ ५२-५३ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि भारतसूत्रं नामैकषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६१ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें भारतसूत्र नामक इकसठवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ६१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५५ श्लोक हैं )
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द्विषष्टितमोऽध्यायः महाभारतकी महत्ता जनमेजय उवाच
कथितं वै समासेन त्वया सर्वं द्विजोत्तम ।
महाभारतमाख्यानं कुरूणां चरितं महत् ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा –द्विजश्रेष्ठ! आपने कुरुवंशियोंके चरित्ररूप महान् महाभारत नामक सम्पूर्ण इतिहासका बहुत संक्षेपसे वर्णन किया है ॥ १ ॥
कथां त्वनघ चित्रार्थां कथयस्व तपोधन ।
विस्तरश्रवणे जातं कौतूहलमतीव मे ॥ २ ॥
निष्पाप तपोधन! अब उस विचित्र अर्थवाली कथाको विस्तारके साथ कहिये; क्योंकि उसे विस्तारपूर्वक सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है ॥ २ ॥
स भवान् विस्तरेणेमां पुनराख्यातुमर्हति ।
न हि तृप्यामि पूर्वेषां शृण्वानश्चरितं महत् ॥ ३ ॥
विप्रवर! आप पुनः पूरे विस्तारके साथ यह कथा सुनावें । मैं अपने पूर्वजोंके इस महान् चरित्रको सुनते - सुनते तृप्त नहीं हो रहा हूँ ॥ ३ ॥
न तत् कारणमल्पं वै धर्मज्ञा यत्र पाण्डवाः ।
अवध्यान् सर्वशो जघ्नुः प्रशस्यन्ते च मानवैः ॥ ४ ॥
सब मनुष्योंद्वारा जिनकी प्रशंसा की जाती है, उन धर्मज्ञ पाण्डवोंने जो युद्धभूमिमें समस्त अवध्य सैनिकोंका भी वध किया था, इसका कोई छोटा या साधारण कारण नहीं हो सकता ॥ ४ ॥
किमर्थं ते नरव्याघ्राः शक्ताः सन्तो ह्यनागसः ।
प्रयुज्यमानान् संक्लेशान् क्षान्तवन्तो दुरात्मनाम् ॥ ५ ॥
नरश्रेष्ठ पाण्डव शक्तिशाली और निरपराध थे तो भी उन्होंने दुरात्मा कौरवोंके दिये हुए महान् क्लेशोंको कैसे चुपचाप सहन कर लिया? ॥ ५ ॥
कथं नागायुतप्राणो बाहुशाली वृकोदरः ।
परिक्लिश्यन्नपि क्रोधं धृतवान् वै द्विजोत्तम ॥ ६ ॥
द्विजोत्तम! अपनी विशाल भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले भीमसेनमें तो दस हजार हाथियोंका बल था । फिर उन्होंने क्लेश उठाते हुए भी क्रोधको किसलिये रोक रखा था? ॥ ६ ॥
कथं सा द्रौपदी कृष्णा क्लिश्यमाना दुरात्मभिः ।
शक्ता सती धार्तराष्ट्रान् नादहत् क्रोधचक्षुषा ॥ ७ ॥
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द्रुपदकुमारी कृष्णा भी सब कुछ करनेमें समर्थ, सती-साध्वी देवी थीं । धृतराष्ट्रके दुरात्मा पुत्रोंद्वारा सतायी जानेपर भी उन्होंने अपनी क्रोधपूर्ण दृष्टिसे उन सबको जलाकर भस्म क्यों नहीं कर दिया? ॥ ७ ॥
कथं व्यसनिनं द्युते पार्थौ माद्रीसुतौ तदा ।
अन्वयुस्ते नरव्याघ्रा बाध्यमाना दुरात्मभिः ॥ ८ ॥
कुन्तीके दोनों पुत्र भीमसेन और अर्जुन तथा माद्री-नन्दन नकुल और सहदेव भी उस समय दुष्ट कौरवोंद्वारा अकारण सताये गये थे । उन चारों भाइयोंने जुएके दुर्व्यसनमें फँसे हुए राजा युधिष्ठिरका साथ क्यों दिया? ॥ ८ ॥
कथं धर्मभृतां श्रेष्ठः सुतो धर्मस्य धर्मवित् ।
अनर्हः परमं क्लेशं सोढवान् स युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ धर्मपुत्र युधिष्ठिर धर्मके ज्ञाता थे, महान् क्लेशमें पड़नेयोग्य कदापि नहीं थे, तो भी उन्होंने वह सब कैसे सहन कर लिया? ॥ ९ ॥
कथं च बहुलाः सेनाः पाण्डवः कृष्णसारथिः ।
अस्यन्नेकोऽनयत् सर्वाः पितृलोकं धनंजयः ॥ १० ॥
भगवान् श्रीकृष्ण जिनके सारथि थे, उन पाण्डुनन्दन अर्जुनने अकेले ही बाणोंकी वर्षा करके समस्त सेनाओंको, जिनकी संख्या बहुत बड़ी थी, किस प्रकार यमलोक पहुँचा दिया? ॥ १० ॥
एतदाचक्ष्व मे सर्वं यथावृत्तं तपोधन ।
यद् यच्च कृतवन्तस्ते तत्र तत्र महारथाः ॥ ११ ॥
तपोधन! यह सब वृत्तान्त आप ठीक- ठीक मुझे बताइये | उन महारथी वीरोंने विभिन्न स्थानों और अवसरोंमें जो -जो कर्म किये थे, वह सब सुनाइये ॥ ११ ॥
वैशम्पायन उवाच
क्षणं कुरु महाराज विपुलोऽयमनुक्रमः ।
पुण्याख्यानस्य वक्तव्यः कृष्णद्वैपायनेरितः ॥ १२ ॥
वैशम्पायनजी बोले – महाराज! इसके लिये कुछ समय नियत कीजिये; क्योंकि इस पवित्र आख्यानका श्रीव्यासजीके द्वारा जो क्रमानुसार वर्णन किया गया है, वह बहुत विस्तृत है और वह सब आपके समक्ष कहकर सुनाना है ॥ १२ ॥
महर्षेः सर्वलोकेषु पूजितस्य महात्मनः ।
प्रवक्ष्यामि मतं कृत्स्नं व्यासस्यामिततेजसः ॥ १३ ॥
सर्वलोकपूजित अमित तेजस्वी महामना महर्षि व्यासजीके सम्पूर्ण मतका यहाँ वर्णन करूँगा ॥ १३ ॥
इदं शतसहस्रं हि श्लोकानां पुण्यकर्मणाम् ।
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सत्यवत्यात्मजेनेह व्याख्यातममितौजसा ॥ १४ ॥
असीम प्रभावशाली सत्यवतीनन्दन व्यासजीने पुण्यात्मा पाण्डवोंकी यह कथा एक लाख श्लोकोंमें कही है ॥ १४ ॥
य इदं श्रावयेद् विद्वान् ये चेदं शृणुयुर्नराः ।
ते ब्रह्मणः स्थानमेत्य प्राप्नुयुर्देवतुल्यताम् ॥ १५ ॥
जो विद्वान् इस आख्यानको सुनाता है और जो मनुष्य सुनते हैं, वे ब्रह्मलोकमें जाकर देवताओंके समान हो जाते हैं ॥ १५ ॥
इदं हि वेदैः समितं पवित्रमपि चोत्तमम् ।
श्राव्याणामुत्तमं चेदं पुराणमृषिसंस्तुतम् ॥ १६ ॥
यह ऋषियोंद्वारा प्रशंसित पुरातन इतिहास श्रवण करनेयोग्य सब ग्रन्थोंमें श्रेष्ठ है । यह वेदोंके समान ही पवित्र तथा उत्तम है ॥ १६ ॥
अस्मिन्नर्थश्च धर्मश्च निखिलेनोपदिश्यते ।
इतिहासे महापुण्ये बुद्धिश्च परिनैष्ठिकी ॥ १७ ॥
अक्षुद्रान् दानशीलांश्च सत्यशीलाननास्तिकान् ।
कार्ष्णं वेदमिमं विद्वाञ्छ्रावयित्वार्थमश्नुते ॥ १८ ॥
इसमें अर्थ और धर्मका भी पूर्णरूपसे उपदेश किया जाता है । इस परम पावन इतिहाससे मोक्षबुद्धि प्राप्त होती है । जिनका स्वभाव अथवा विचार खोटा नहीं है, जो दानशील, सत्यवादी और आस्तिक हैं, ऐसे लोगोंको व्यासद्वारा विरचित वेदस्वरूप इस महाभारतका जो श्रवण कराता है, वह विद्वान् अभीष्ट अर्थको प्राप्त कर लेता है ॥ १७-१८ ॥
भ्रूणहत्याकृतं चापि पापं जह्यादसंशयम् ।
इतिहासमिमं श्रुत्वा पुरुषोऽपि सुदारुणः ॥ १ ९ ॥
मुच्यते सर्वपापेभ्यो राहुणा चन्द्रमा यथा ।
जयो नामेतिहासोऽयं श्रोतव्यो विजिगीषुणा ॥ २० ॥
साथ ही वह भ्रूणहत्या जैसे पापको भी नष्ट कर देता है, इसमें संशय नहीं है । इस इतिहासको श्रवण करके अत्यन्त क्रूर मनुष्य भी राहुसे छूटे हुए चन्द्रमाकी भाँति सब पापोंसे मुक्त हो जाता है । यह ' जय ' नामक इतिहास विजयकी इच्छावाले पुरुषको अवश्य सुनना चाहिये ॥ १ ९ -२० ॥
महीं विजयते राजा शत्रूंश्चापि पराजयेत् ।
इदं पुंसवनं श्रेष्ठमिदं स्वस्त्ययनं महत् ॥ २१ ॥
इसका श्रवण करनेवाला राजा भूमिपर विजय पाता और सब शत्रुओंको परास्त कर देता है । यह पुत्रकी प्राप्ति करानेवाला और महान् मंगलकारी श्रेष्ठ साधन है ॥ २१ ॥
महिषीयुवराजाभ्यां श्रोतव्यं बहुशस्तथा ।
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वीरं जनयते पुत्रं कन्यां वा राज्यभागिनीम् ॥ २२ ॥
युवराज तथा रानीको बारम्बार इसका श्रवण करते रहना चाहिये, इससे वह वीर पुत्र अथवा राज्यसिंहासनपर बैठनेवाली कन्याको जन्म देती है ॥ २२ ॥
धर्मशास्त्रमिदं पुण्यमर्थशास्त्रमिदं परम् ।
मोक्षशास्त्रमिदं प्रोक्तं व्यासेनामितबुद्धिना ॥ २३ ॥
अमित मेधावी व्यासजीने इसे पुण्यमय धर्मशास्त्र, उत्तम अर्थशास्त्र तथा सर्वोत्तम मोक्षशास्त्र भी कहा है ॥ २३ ॥
सम्प्रत्याचक्षते चेदं तथा श्रोष्यन्ति चापरे ।
पुत्राः शुश्रूषवः सन्ति प्रेष्याश्च प्रियकारिणः ॥ २४ ॥
जो वर्तमानकालमें इसका पाठ करते हैं तथा जो भविष्यमें इसे सुनेंगे, उनके पुत्र सेवापरायण और सेवक स्वामीका प्रिय करनेवाले होंगे ॥ २४ ॥
शरीरेण कृतं पापं वाचा च मनसैव च ।
सर्वं संत्यजति क्षिप्रं य इदं शृणुयान्नरः ॥ २५ ॥
जो मानव इस महाभारतको सुनता है, वह शरीर, वाणी और मनके द्वारा किये हुए सम्पूर्ण पापोंको त्याग देता है ॥ २५ ॥
भरतानां महज्जन्म शृण्वतामनसूयताम् ।
नास्ति व्याधिभयं तेषां परलोकभयं कुतः ॥ २६ ॥
जो दूसरोंके दोष न देखनेवाले भरतवंशियोंके महान् जन्म- वृत्तान्तरूप महाभारतका श्रवण करते हैं, उन्हें इस लोकमें भी रोग- व्याधिका भय नहीं होता, फिर परलोकमें तो हो ही कैसे सकता है? ॥ २६ ॥
धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं स्वर्ग्यं तथैव च ।
कृष्णद्वैपायनेनेदं कृतं पुण्यचिकीर्षुणा ॥ २७ ॥
कीर्तिं प्रथयता लोके पाण्डवानां महात्मनाम् ।
अन्येषां क्षत्रियाणां च भूरिद्रविणतेजसाम् ॥ २८ ॥
सर्वविद्यावदातानां लोके प्रथितकर्मणाम् ।
य इदं मानवो लोके पुण्यार्थे ब्राह्मणाञ्छुचीन् ॥ २ ९ ॥
श्रावयेत महापुण्यं तस्य धर्मः सनातनः ।
कुरूणां प्रथितं वंशं कीर्तयन् सततं शुचिः ॥ ३० ॥
लोकमें जिनके महान् कर्म विख्यात हैं, जो सम्पूर्ण विद्याओंके ज्ञानद्वारा उद्भासित होते थे और जिनके धन एवं तेज महान् थे, ऐसे महामना पाण्डवों तथा अन्य क्षत्रियोंकी उज्ज्वल कीर्तिको लोकमें फैलानेवाले और पुण्यकर्मके इच्छुक श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासने इस पुण्यमय महाभारत ग्रन्थका निर्माण किया है । यह धन, यश, आयु, पुण्य तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है । जो मानव इस लोकमें पुण्यके लिये पवित्र ब्राह्मणोंको इस परम
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पुण्यमय ग्रन्थका श्रवण कराता है, उसे शाश्वत धर्मकी प्राप्ति होती है । जो सदा कौरवोंके इस विख्यात वंशका कीर्तन करता है, वह पवित्र हो जाता है ॥ २७–३० ॥
वंशमाप्नोति विपुलं लोके पूज्यतमो भवेत् ।
योऽधीते भारतं पुण्यं ब्राह्मणो नियतव्रतः ॥ ३१ ॥
चतुरो वार्षिकान् मासान् सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
विज्ञेयः स च वेदानां पारगो भारतं पठन् ॥ ३२ ॥
इसके सिवा, उसे विपुल वंशकी प्राप्ति होती है और वह लोकमें अत्यन्त पूजनीय होता है । जो ब्राह्मण नियमपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए वर्षाके चार महीनेतक निरन्तर इस पुण्यप्रद महाभारतका पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है । जो महाभारतका पाठ करता है, उसे सम्पूर्ण वेदोंका पारंगत विद्वान् जानना चाहिये ॥ ३१-३२ ॥
देवा राजर्षयो ह्यत्र पुण्या ब्रह्मर्षयस्तथा ।
कीर्त्यते धूतपाप्मानः कीर्त्यते केशवस्तथा ॥ ३३ ॥
इसमें देवताओं, राजर्षियों तथा पुण्यात्मा ब्रह्मर्षियोंके, जिन्होंने अपने सब पाप धो दिये हैं, चरित्रका वर्णन किया गया है । इसके सिवा इस ग्रन्थमें भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका भी कीर्तन किया जाता है ॥ ३३ ॥
भगवांश्चापि देवेशो यत्र देवी च कीर्त्यते ।
अनेकजननो यत्र कार्तिकेयस्य सम्भवः ॥ ३४ ॥
देवेश्वर भगवान् शिव और देवी पार्वतीका भी इसमें वर्णन है तथा अनेक माताओंसे उत्पन्न होनेवाले कार्तिकेय जीके जन्मका प्रसंग भी इसमें कहा गया है ॥ ३४ ॥
ब्राह्मणानां गवां चैव माहात्म्यं यत्र कीर्त्यते ।
सर्वश्रुतिसमूहोऽयं श्रोतव्यो धर्मबुद्धिभिः ॥ ३५ ॥
ब्राह्मणों तथा गौओंके माहात्म्यका निरूपण भी इस ग्रन्थमें किया गया है । इस प्रकार यह महाभारत सम्पूर्ण श्रुतियोंका समूह है । धर्मात्मा पुरुषोंको सदा इसका श्रवण करना चाहिये ॥ ३५ ॥
य इदं श्रावयेद् विद्वान् ब्राह्मणानिह पर्वसु ।
धूतपाप्मा जितस्वर्गो ब्रह्म गच्छति शाश्वतम् ॥ ३६ ॥
जो विद्वान् पर्वके दिन ब्राह्मणोंको इसका श्रवण कराता है, उसके सब पाप धुल जाते हैं और वह स्वर्ग -लोकको जीतकर सनातन ब्रह्मको प्राप्त कर लेता है ॥ ३६ ॥
( यस्तु राजा शृणोतीदमखिलामनुते महीम् ।
प्रसूते गर्भिणी पुत्रं कन्या चाशु प्रदीयते ॥
वणिजः सिद्धयात्राः स्युर्वीरा विजयमाप्नुयुः ।
आस्तिकाञ्छ्रावयेन्नित्यं ब्राह्मणाननसूयकान् ॥
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वेदविद्याव्रतस्नातान् क्षत्रियाञ्जयमास्थितान् । स्वधर्मनित्यान् वैश्यांश्च श्रावयेत् क्षत्रसंश्रितान् ॥ ) जो राजा इस महाभारतको सुनता है, वह सारी पृथ्वीके राज्यका उपभोग करता है । गर्भवती स्त्री इसका श्रवण करे तो वह पुत्रको जन्म देती है । कुमारी कन्या इसे सुने तो उसका शीघ्र विवाह हो जाता है । व्यापारी वैश्य यदि महाभारत श्रवण करें तो उनकी व्यापारके लिये की हुई यात्रा सफल होती है । शूरवीर सैनिक इसे सुननेसे युद्धमें विजय पाते हैं । जो आस्तिक और दोषदृष्टिसे रहित हों, उन ब्राह्मणोंको नित्य इसका श्रवण कराना चाहिये । वेद-विद्याका अध्ययन एवं ब्रह्मचर्यव्रत पूर्ण करके जो स्नातक हो चुके हैं, उन विजयी क्षत्रियोंको और क्षत्रियोंके अधीन रहनेवाले स्वधर्म- परायण वैश्योंको भी महाभारत श्रवण कराना चाहिये ।
(एष धर्मः पुरा दृष्टः सर्वधर्मेषु भारत ।
ब्राह्मणाच्छ्रवणं राजन् विशेषेण विधीयते ॥
भूयो वा यः पठेन्नित्यं स गच्छेत् परमां गतिम् ।
श्लोकं वाप्यनु गृह्णीत तथार्धश्लोकमेव वा ॥
अपि पादं पठेन्नित्यं न च निर्भारतो भवेत् । )
भारत! सब धर्मोंमें यह महाभारत- श्रवणरूप श्रेष्ठ धर्म पूर्वकालसे ही देखा गया है । राजन्! विशेषतः ब्राह्मणके मुखसे इसे सुननेका विधान है। जो बारम्बार अथवा प्रतिदिन इसका पाठ करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है । प्रतिदिन चाहे एक श्लोक या आधे
श्लोक अथवा श्लोकके एक चरणका ही पाठ कर ले, किंतु महाभारतके अध्ययनसे शून्य
कभी नहीं रहना चाहिये ।
( इह नैकाश्रयं जन्म राजर्षीणां महात्मनाम् ॥
इह मन्त्रपदं युक्तं धर्मं चानेकदर्शनम् ।
इह युद्धानि चित्राणि राज्ञां वृद्धिरिहैव च ॥
ऋषीणां च कथास्तात इह गन्धर्वरक्षसाम् ।
इह तत् तत् समासाद्य विहितो वाक्यविस्तरः ॥
तीर्थानां नाम पुण्यानां देशानां चेह कीर्तनम् । वनानां पर्वतानां च नदीनां सागरस्य च ॥ ) इस महाभारतमें महात्मा राजर्षियोंके विभिन्न प्रकारके जन्म- वृत्तान्तोंका वर्णन है । इसमें मन्त्र- पदोंका प्रयोग है । अनेक दृष्टियों ( मतों ) के अनुसार धर्मके स्वरूपका विवेचन किया गया है । इस ग्रन्थमें विचित्र युद्धोंका वर्णन तथा राजाओंके अभ्युदयकी कथा है । तात! इस महाभारतमें ऋषियों तथा गन्धर्वों एवं राक्षसोंकी भी कथाएँ हैं । इसमें विभिन्न प्रसंगोंको लेकर विस्तारपूर्वक वाक्यरचना की गयी है । इसमें पुण्यतीर्थों, पवित्र देशों, वनों, पर्वतों, नदियों और समुद्रके भी माहात्म्यका प्रतिपादन किया गया है ।
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(देशानां चैव पुण्यानां पुराणां चैव कीर्तनम् ।
उपचारस्तथैवाग्रयो वीर्यमप्यतिमानुषम् ॥
इह सत्कारयोगश्च भारते परमर्षिणा ।
रथाश्ववारणेन्द्राणां कल्पना युद्धकौशलम् ॥
वाक्यजातिरनेका च सर्वमस्मिन् समर्पितम् । ) पुण्यप्रदेशों तथा नगरोंका भी वर्णन किया गया है । श्रेष्ठ उपचार और अलौकिक पराक्रमका भी वर्णन है । इस महाभारतमें महर्षि व्यासने सत्कार- योग ( स्वागत - सत्कारके विविध प्रकार) -का निरूपण किया है तथा रथसेना, अश्वसेना और गजसेनाकी व्यूहरचना तथा युद्धकौशलका वर्णन किया है । इसमें अनेक शैलीकी वाक्ययोजना – कथोपकथनका समावेश हुआ है । सारांश यह कि इस ग्रन्थमें सभी विषयोंका वर्णन है ।
श्रावयेद्ब्राह्मणाञ्छ्राद्धे यश्चेमं पादमन्ततः ।
अक्षय्यं तस्य तच्छ्राद्धमुपावर्तेत् पितॄनिह ॥ ३७ ॥
जो श्राद्ध करते समय अन्तमें ब्राह्मणोंको महाभारतके श्लोकका एक चतुर्थांश भी सुना देता है, उसका किया हुआ वह श्राद्ध अक्षय होकर पितरोंको अवश्य प्राप्त हो जाता है ॥ ३७ ॥
अह्ना यदेनः क्रियते इन्द्रियैर्मनसापि वा ।
ज्ञानादज्ञानतो वापि प्रकरोति नरश्च यत् ॥ ३८ ॥
तन्महाभारताख्यानं श्रुत्वैव प्रविलीयते ।
भरतानां महज्जन्म महाभारतमुच्यते ॥ ३ ९ ॥
दिनमें इन्द्रियों अथवा मनके द्वारा जो पाप बन जाता है अथवा मनुष्य जानकर या अनजानमें जो पाप कर बैठता है, वह सब महाभारतकी कथा सुनते ही नष्ट हो जाता है । इसमें भरतवंशियोंके महान् जन्म- वृत्तान्तका वर्णन है, इसलिये इसको ' महाभारत ' कहते हैं ॥ ३८-३९ ॥
निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
भरतानां यतश्चायमितिहासो महाद्भुतः ॥ ४० ॥
महतो ह्येनसो मर्त्यान् मोचयेदनुकीर्तितः ।
त्रिभिर्वर्षैर्लब्धकामः कृष्णद्वैपायनो मुनिः ॥ ४१ ॥
नित्योत्थितः शुचिः शक्तो महाभारतमादितः ।
तपो नियममास्थाय कृतमेतन्महर्षिणा ॥ ४२ ॥
तस्मान्नियमसंयुक्तैः श्रोतव्यं ब्राह्मणैरिदम् ।
कृष्णप्रोक्तामिमां पुण्यां भारतीमुत्तमां कथाम् ॥ ४३ ॥
श्रावयिष्यन्ति ये विप्रा ये च श्रोष्यन्ति मानवाः ।
सर्वथा वर्तमाना वै न ते शोच्याः कृताकृतैः ॥ ४४ ॥
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जो महाभारत नामका यह निरुक्त ( व्युत्पत्तियुक्त अर्थ) जानता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है । यह भरतवंशी क्षत्रियोंका महान् और अद्भुत इतिहास है । अतः निरन्तर पाठ करनेपर मनुष्योंको बड़े - से- बड़े पापसे छुड़ा देता है । शक्तिशाली आप्तकाम मुनिवर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजी प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर स्नान- संध्या आदिसे शुद्ध हो आदिसे ही महाभारतकी रचना करते थे । महर्षिने तपस्या और नियमका आश्रय लेकर तीन वर्षोंमें इस ग्रन्थको पूरा किया है । इसलिये ब्राह्मणोंको भी नियममें स्थित होकर ही इस कथाका श्रवण करना चाहिये । जो ब्राह्मण श्रीव्यासजीकी कही हुई इस पुण्यदायिनी उत्तम भारती कथाका श्रवण करायेंगे और जो मनुष्य इसे सुनेंगे, वे सब प्रकारकी चेष्टा करते हुए भी इस बातके लिये शोक करने योग्य नहीं हैं कि उन्होंने अमुक कर्म क्यों किया और अमुक कर्म क्यों नहीं किया ॥ ४०–४४ ॥
नरेण धर्मकामेन सर्वः श्रोतव्य इत्यपि ।
निखिलेनेतिहासोऽयं ततः सिद्धिमवाप्नुयात् ॥ ४५ ॥
धर्मकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यके द्वारा यह सारा महाभारत इतिहास पूर्णरूपसे श्रवण करनेयोग्य है । ऐसा करनेसे मनुष्य सिद्धिको प्राप्त कर लेता है ॥ ४५ ॥
न तां स्वर्गगतिं प्राप्य तुष्टिं प्राप्नोति मानवः ।
यां श्रुत्वैव महापुण्यमितिहासमुपाश्नुते ॥ ४६ ॥
इस महान् पुण्यदायक इतिहासको सुननेमात्रसे ही मनुष्यको जो संतोष प्राप्त होता है, वह स्वर्गलोक प्राप्त कर लेनेसे भी नहीं मिलता ॥ ४६ ॥
शृण्वञ्छ्राद्धः पुण्यशीलः श्रावयंश्चेदमद्भुतम् ।
नरः फलमवाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः ॥ ४७ ॥
जो पुण्यात्मा मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस अद्भुत इतिहासको सुनता और सुनाता है, वह राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञका फल पाता है ॥ ४७ ॥
यथा समुद्रो भगवान् यथा मेरुर्महागिरिः ।
उभौ ख्यातौ रत्ननिधी तथा भारतमुच्यते ॥ ४८ ॥
जैसे ऐश्वर्यपूर्ण समुद्र और महान् पर्वत मेरु दोनों रत्नोंकी खान कहे गये हैं, वैसे ही महाभारत रत्नस्वरूप कथाओं और उपदेशोंका भण्डार कहा जाता है ॥ ४८ ॥
इदं हि वेदैः समितं पवित्रमपि चोत्तमम् ।
श्रव्यं श्रुतिसुखं चैव पावनं शीलवर्धनम् ॥ ४ ९ ॥
यह महाभारत वेदोंके समान पवित्र और उत्तम है । यह सुननेयोग्य तो है ही, सुनते समय कानोंको सुख देनेवाला भी है । इसके श्रवणसे अन्तःकरण पवित्र होता और उत्तम शील - स्वभावकी वृद्धि होती है ॥ ४ ९ ॥
य इदं भारतं राजन् वाचकाय प्रयच्छति ।
तेन सर्वा मही दत्ता भवेत् सागरमेखला ॥ ५० ॥