महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 531–540
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 531–540
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पहलेतक स्वाधीन ब्रह्मचारिणी थी, वही उस समय अपना दोष देखनेके कारण घबरा गयी थी । शकुन्तलाको लज्जामें डूबी हुई देख महर्षि कण्वने उससे कहा । कण्व उवाच
सव्रीडैव च दीर्घायुः पुरेव भविता न च ।
वृत्तं कथय रम्भोरु मा त्रासं च प्रकल्पय ॥
कण्व बोले- बेटी! तू सलज्ज रहकर ही दीर्घायु होगी। अब पहले जैसी चपल न रह सकेगी । शुभे! सारी बातें स्पष्ट बता; भय न कर । वैशम्पायन उवाच
ततः कृच्छ्रादतिशुभा सव्रीडा श्रीमती तदा ।
सगद्गदमुवाचेदं काश्यपं सा शुचिस्मिता ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! पवित्र मुसकान वाली वह सुन्दरी अत्यन्त सदाचारिणी थी; तो भी अपने व्यवहारसे लज्जाका अनुभव करती हुई महर्षि कण्वसे बड़ी कठिनाईके साथ गद्गदकण्ठ होकर बोली । शकुन्तलोवाच
राजा ताताजगामेह दुष्यन्त इलिलात्मजः ।
मया पतिर्वृतो योऽसौ दैवयोगादिहागतः ॥
तस्य तात प्रसीदस्व भर्ता मे सुमहायशाः । अतः सर्वं तु यद् वृत्तं दिव्यज्ञानेन पश्यसि । अभयं क्षत्रियकुले प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ ) शकुन्तला बोली – तात! इलिलकुमार महाराज दुष्यन्त इस वनमें आये थे । दैवयोगसे इस आश्रमपर भी उनका आगमन हुआ और मैंने उन्हें अपना पति स्वीकार कर लिया । पिताजी! आप उनपर प्रसन्न हों । वे महायशस्वी नरेश अब मेरे स्वामी हैं । इसके बादका सारा वृत्तान्त आप दिव्य ज्ञानदृष्टिसे देख सकते हैं । क्षत्रियकुलको अभयदान देकर उनपर कृपादृष्टि करें ।
विज्ञायाथ च तां कण्वो दिव्यज्ञानो महातपाः ।
उवाच भगवान् प्रीतः पश्यन् दिव्येन चक्षुषा ॥ २५ ॥
महातपस्वी भगवान् कण्व दिव्यज्ञानसे सम्पन्न थे । वे दिव्य दृष्टिसे देखकर शकुन्तलाकी तात्कालिक अवस्थाको जान गये; अतः प्रसन्न होकर बोले- ॥ २५ ॥
त्वयाद्य भद्रे रहसि मामनादृत्य यः कृतः ।
पुंसा सह समायोगो न स धर्मोपघातकः ॥ २६ ॥
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' भद्रे! आज तुमने मेरी अवहेलना करके जो एकान्तमें किसी पुरुषके साथ सम्बन्ध स्थापित किया है, वह तुम्हारे धर्मका नाशक नहीं है ॥ २६ ॥
क्षत्रियस्य हि गान्धर्वो विवाहः श्रेष्ठ उच्यते ।
सकामायाः सकामेन निर्मन्त्रो रहसि स्मृतः ॥ २७ ॥
‘ क्षत्रियके लिये गान्धर्व विवाह श्रेष्ठ कहा गया है। स्त्री और पुरुष दोनों एक दूसरेको चाहते हों, उस दशामें उन दोनोंका एकान्तमें जो मन्त्रहीन सम्बन्ध स्थापित होता है, उसे गान्धर्व विवाह कहा गया है ॥ २७ ॥
धर्मात्मा च महात्मा च दुष्यन्तः पुरुषोत्तमः ।
अध्यगच्छः पतिं यत् त्वं भजमानं शकुन्तले ॥ २८ ॥
महात्मा जनिता लोके पुत्रस्तव महाबलः ।
य इमां सागरापाङ्गीं कृत्स्नां भोक्ष्यति मेदिनीम् ॥ २ ९ ॥
‘ शकुन्तले! महामना दुष्यन्त धर्मात्मा और श्रेष्ठ पुरुष हैं । वे तुम्हें चाहते थे । तुमने योग्य पतिके साथ सम्बन्ध स्थापित किया है; इसलिये लोकमें तुम्हारे गर्भसे एक महाबली और महात्मा पुत्र उत्पन्न होगा, जो समुद्रसे घिरी हुई इस समूची पृथ्वीका उपभोग करेगा ॥ २८-२९ ॥
परं चाभिप्रयातस्य चक्रं तस्य महात्मनः ।
भविष्यत्यप्रतिहतं सततं चक्रवर्तिनः ॥ ३० ॥
' शत्रुओंपर आक्रमण करनेवाले उस महामना चक्रवर्ती नरेशकी सेना सदा अप्रतिहत होगी । उसकी गतिको कोई रोक नहीं सकेगा' ॥ ३० ॥
ततः प्रक्षाल्य पादौ सा विश्रान्तं मुनिमब्रवीत् ।
विनिधाय ततो भारं संनिधाय फलानि च ॥ ३१ ॥
तदनन्तर शकुन्तलाने उनके लाये हुए फलके भारको लेकर यथास्थान रख दिया । फिर उनके दोनों पैर धोये तथा जब वे भोजन और विश्राम कर चुके, तब वह मुनिसे इस प्रकार बोली ॥ ३१ ॥
शकुन्तलोवाच
मया पतिर्वृतो राजा दुष्यन्तः पुरुषोत्तमः ।
तस्मै ससचिवाय त्वं प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ ३२ ॥
शकुन्तलाने कहा— भगवन्! मैंने पुरुषोंमें श्रेष्ठ राजा दुष्यन्तका पतिरूपमें वरण किया है । अतः मन्त्रियोंसहित उन नरेशपर आपको कृपा करनी चाहिये ॥ ३२ ॥
कण्व उवाच प्रसन्न एव तस्याहं त्वत्कृते वरवर्णिनि । (ऋतवो बहवस्ते वै गता व्यर्थाः शुचिस्मिते ।
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सार्थकं साम्प्रतं ह्येतन्न च पापोऽस्ति तेऽनघे ॥ ) गृहाण च वरं मत्तस्त्वं शुभे यदभीप्सितम् ॥ ३३ ॥
कण्व बोले — उत्तम वर्णवाली पुत्री! मैं तुम्हारे भलेके लिये राजा दुष्यन्तपर भी प्रसन्न ही हूँ । शुचिस्मिते! अबतक तेरे बहुत - से ऋतु व्यर्थ बीत गये हैं । इस बार यह सार्थक हुआ है । अनघे! तुम्हें पाप नहीं लगेगा । शुभे! तुम्हारी जो इच्छा हो, वह वर मुझसे माँग लो ॥ ३३ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो धर्मिष्ठतां वव्रे राज्याच्चास्खलनं तथा ।
शकुन्तला पौरवाणां दुष्यन्तहितकाम्यया ॥ ३४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तब शकुन्तलाने दुष्यन्तके हितकी इच्छासे यह वर माँगा कि पुरुवंशी नरेश सदा धर्ममें स्थिर रहें और वे कभी राज्यसे भ्रष्ट न हों ॥ ३४ ॥
(एवमस्त्विति तां प्राह कण्वो धर्मभृतां वरः ।
पस्पर्श चापि पाणिभ्यां सुतां श्रीमिव रूपिणीम् ॥
उस समय धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ कण्वने उससे कहा- ' एवमस्तु' ( ऐसा ही हो ) । यह कहकर उन्होंने मूर्तिमती लक्ष्मी - सी पुत्री शकुन्तलाका दोनों हाथोंसे स्पर्श किया और कहा । कण्व उवाच अद्यप्रभृति देवी त्वं दुष्यन्तस्य महात्मनः । पतिव्रतानां या वृत्तिस्तां वृत्तिमनुपालय ॥ ) कण्व बोले — बेटी! आजसे तू महात्मा राजा दुष्यन्तकी महारानी है । अतः पतिव्रता स्त्रियोंका जो बर्ताव तथा सदाचार है, उसका निरन्तर पालन कर । इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने त्रिसप्ततितमोध्यायः ॥ ७३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शकुन्तलोपाख्यानविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७३ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ ९ ३ श्लोक मिलाकर कुल ५३३ श्लोक हैं ) * कन्याको वस्त्र और आभूषणोंसे अलंकृत करके सजातीय योग्य वरके हाथमें देना ' ब्राह्म' विवाह कहलाता है । अपने घरपर देवयज्ञ करके यज्ञान्तमें ऋत्विजको अपनी कन्याका दान करना ' दैव ' विवाह कहा गया है । वरसे एक गाय और एक बैल शुल्कके रूपमें लेकर कन्यादान करना ' आर्ष ' विवाह बताया गया है । वर और कन्या दोनों साथ रहकर धर्माचरण करें, इस बुद्धिसे कन्यादान करना ' प्राजापत्य ' विवाह माना गया है । वरसे मूल्यके रूपमें बहुत- सा धन लेकर कन्या देना ‘ आसुर’ विवाह माना गया है । वर और वधू दोनों एक- दूसरेको स्वेच्छासे स्वीकार कर लें, यह ' गान्धर्व' विवाह है । युद्ध
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करके मार- काट मचाकर रोती हुई कन्याको उसके रोते हुए भाई- बन्धुओंसे छीन लाना ' राक्षस' विवाह माना गया है। जब घरके लोग सोये हों अथवा असावधान हों, उस दशामें कन्याको चुरा लेना ‘ पैशाच’ विवाह है ।
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चतुःसप्ततितमोऽध्यायः शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त- शकुन्तला- संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक वैशम्पायन उवाच प्रतिज्ञाय तु दुष्यन्ते प्रतियाते शकुन्तलाम् ।
( गर्भश्च ववृधे तस्यां राजपुत्र्यां महात्मनः ।
शकुन्तला चिन्तयन्ती राजानं कार्यगौरवात् ॥
दिवारात्रमनिद्रैव स्नानभोजनवर्जिता ॥
राजप्रेषणिका विप्राश्चतुरङ्गबलैः सह ।
अद्य श्वो वा परश्वो वा समायान्तीति निश्चिता ॥
दिवसान् पक्षानृतून् मासानयनानि च सर्वशः । गण्यमानेषु सर्वेषु व्यतीयुस्त्रीणि भारत ॥ ) वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! जब शकुन्तलासे पूर्वोक्त प्रतिज्ञा करके राजा दुष्यन्त चले गये, तब क्षत्रियकन्या शकुन्तलाके उदरमें उन महात्मा दुष्यन्तके द्वारा स्थापित किया हुआ गर्भ धीरे- धीरे बढ़ने और पुष्ट होने लगा । शकुन्तला कार्यकी गुरुतापर दृष्टि रखकर निरन्तर राजा दुष्यन्तका ही चिन्तन करती रहती थी । उसे न तो दिनमें नींद आती थी और न रातमें ही । उसका स्नान और भोजन छूट गया था । उसे यह दृढ़ विश्वास था कि राजाके भेजे हुए ब्राह्मण चतुरंगिणी सेनाके साथ आज, कल या परसोंतक मुझे लेनेके लिये अवश्य आ जायँगे । भरतनन्दन! शकुन्तलाको दिन, पक्ष, मास, ऋतु, अयन तथा वर्ष — इन
सबकी गणना करते - करते तीन वर्ष बीत गये ।
गर्भं सुषाव वामोरूः कुमारममितौजसम् ॥ १ ॥
त्रिषु वर्षेषु पूर्णेषु दीप्तानलसमद्युतिम् ।
रूपौदार्यगुणोपेतं दौष्यन्तिं जनमेजय ॥ २ ॥
जनमेजय! तदनन्तर पूरे तीन वर्ष व्यतीत होनेके बाद सुन्दर जाँघोंवाली शकुन्तलाने अपने गर्भसे प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी, रूप और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न, अमित पराक्रमी कुमारको जन्म दिया, जो दुष्यन्तके वीर्यसे उत्पन्न हुआ था ॥ १-२ ॥
( तस्मै तदान्तरिक्षात् तु पुष्पवृष्टिः पपात ह ।
देवदुन्दुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥
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गायन्त्यो मधुरं तत्र देवैः शक्रोऽभ्युवाच ह । उस समय आकाशसे उस बालकके लिये फूलोंकी वर्षा हुई, देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और अप्सराएँ मधुर स्वरमें गाती हुई नृत्य करने लगीं। उस अवसरपर वहाँ देवताओंसहित इन्द्रने आकर कहा । शक्र उवाच शकुन्तले तव सुतश्चक्रवर्ती भविष्यति ॥
बलं तेजश्च रूपं च न समं भुवि केनचित् ।
आहर्ता वाजिमेधस्य शतसंख्यस्य पौरवः ॥
अनेकानि सहस्राणि राजसूयादिभिर्मखैः ।
स्वार्थं ब्राह्मणसात् कृत्वा दक्षिणाममितां ददात् ॥
इन्द्र बोले –शकुन्तले! तुम्हारा यह पुत्र चक्रवर्ती सम्राट् होगा । पृथ्वीपर कोई भी इसके बल, तेज तथा रूपकी समानता नहीं कर सकता । यह पूरुवंशका रत्न सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करेगा । राजसूय आदि यज्ञोंद्वारा सहस्रों बार अपना सारा धन ब्राह्मणोंके अधीन करके उन्हें अपरिमित दक्षिणा देगा । वैशम्पायन उवाच
देवतानां वचः श्रुत्वा कण्वाश्रमनिवासिनः ।
सभाजयन्त कण्वस्य सुतां सर्वे महर्षयः ॥
शकुन्तला च तच्छ्रुत्वा परं हर्षमवाप सा । द्विजानाहूय मुनिभिः सत्कृत्य च महायशाः ॥ )
जातकर्मादिसंस्कारं कण्वः पुण्यकृतां वरः ।
विधिवत् कारयामास वर्धमानस्य धीमतः ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - इन्द्रादि देवताओंका यह वचन सुनकर कण्वके आश्रममें रहनेवाले सभी महर्षि कण्वकन्या शकुन्तलाके सौभाग्यकी भूरि- भूरि प्रशंसा करने लगे । यह सब सुनकर शकुन्तलाको भी बड़ा हर्ष हुआ। पुण्यवानोंमें श्रेष्ठ महायशस्वी कण्वने मुनियोंसे ब्राह्मणोंको बुलाकर उनका पूर्ण सत्कार करके बालकका विधिपूर्वक जातकर्म आदि संस्कार कराया । वह बुद्धिमान् बालक प्रतिदिन बढ़ने लगा ॥ ३ ॥
दन्तैः शुक्लैः शिखरिभिः सिंहसंहननो महान् ।
चक्राङ्कितकरः श्रीमान् महामूर्धा महाबलः ॥ ४ ॥
वह सफेद और नुकीले दाँतोंसे शोभा पा रहा था । उसके शरीरका गठन सिंहके समान था । वह ऊँचे कदका था । उसके हाथोंमें चक्रके चिह्न थे । वह अद्भुत शोभासे सम्पन्न, विशाल मस्तकवाला और महान् बलवान् था ॥ ४ ॥
कुमारो देवगर्भाभः स तत्राशु व्यवर्धत ।
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षड्वर्ष एव बालः स कण्वाश्रमपदं प्रति ॥ ५ ॥
सिंहव्याघ्रान् वराहांश्च महिषांश्च गजांस्तथा ।
बबन्ध वृक्षे बलवानाश्रमस्य समीपतः ॥ ६ ॥
देवताओंके बालक-सा प्रतीत होनेवाला वह तेजस्वी कुमार वहाँ शीघ्रतापूर्वक बढ़ने लगा । छः वर्षकी अवस्थामें ही वह बलवान् बालक कण्वके आश्रममें सिंहों, व्याघ्रों, वराहों, भैंसों और हाथियोंको पकड़कर खींच लाता और आश्रमके समीपवर्ती वृक्षोंमें बाँध देता था ॥ ५-६ ॥ आरोहन् दमयंश्चैव क्रीडंश्च परिधावति ।
( ततश्च राक्षसान् सर्वान् पिशाचांश्च रिपून् रणे ।
मुष्टियुद्धेन ताञ्जित्वा ऋषीनाराधयत् तदा ॥
कश्चिद् दितिसुतस्तं तु हन्तुकामो महाबलः ।
वध्यमानांस्तु दैतेयानमर्षी तं समभ्ययात् ॥
तमागतं प्रहस्यैव बाहुभ्यां परिगृह्य च ।
दृढं चाबध्य बाहुभ्यां पीडयामास तं तदा ॥
मर्दितो न शशाकास्य मोचितुं बलवत्तया ।
प्राक्रोशद् भैरवं तत्र द्वारेभ्यो निःसृतं त्वसृक् ॥
तेन शब्देन वित्रस्ता मृगाः सिंहादयो गणाः ।
सुस्रुवुश्च शकृन्मूत्रमाश्रमस्थाश्च सुस्रुवुः ॥
निरसुं जानुभिः कृत्वा विससर्ज च सोऽपतत् ।
तं दृष्ट्वा विस्मयं चक्रुः कुमारस्य विचेष्टितम् ॥
नित्यकालं वध्यमाना दैतेया राक्षसैः सह । कुमारस्य भयादेव नैव जग्मुस्तदाश्रमम् ॥ ) ततोऽस्य नाम चक्रुस्ते कण्वाश्रमनिवासिनः ॥ ७ ॥
फिर वह सबका दमन करते हुए उनकी पीठपर चढ़ जाता और क्रीड़ा करते हुए उन्हें सब ओर दौड़ाता हुआ दौड़ता था । वहाँ सब राक्षस और पिशाच आदि शत्रुओंको युद्धमें मुष्टिप्रहारके द्वारा परास्त करके वह राजकुमार ऋषि- मुनियोंकी आराधनामें लगा रहता था । एक दिन कोई महाबली दैत्य उसे मार डालनेकी इच्छासे उस वनमें आया । वह उसके द्वारा प्रतिदिन सताये जाते हुए दूसरे दैत्योंकी दशा देखकर अमर्षमें भरा हुआ था । उसके आते ही राजकुमारने हँसकर उसे दोनों हाथोंसे पकड़ लिया और अपनी बाँहोंमें दृढ़तापूर्वक कसकर दबाया । वह बहुत जोर लगानेपर भी अपनेको उस बालकके चंगुलसे छुड़ा न सका, अतः भयंकर स्वरसे चीत्कार करने लगा । उस समय दबावके कारण उसकी इन्द्रियोंसे रक्त बह चला । उसकी चीत्कारसे भयभीत हो मृग और सिंह आदि जंगली जीव मल- मूत्र करने लगे तथा आश्रमपर रहनेवाले प्राणियोंकी भी यही दशा हुई । दुष्यन्तकुमारने घुटनोंसे मार-
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मारकर उस दैत्यके प्राण ले लिये; तत्पश्चात् उसे छोड़ दिया । उसके हाथसे छूटते ही वह दैत्य गिर पड़ा । उस बालकका यह पराक्रम देखकर सब लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ । कितने ही दैत्य और राक्षस प्रतिदिन उस दुष्यन्तकुमारके हाथों मारे जाते थे । कुमारके भयसे ही उन्होंने कण्वके आश्रमपर जाना छोड़ दिया । यह देख कण्वके आश्रममें रहनेवाले ऋषियोंने उसका नया नामकरण किया - ॥ ७ ॥
अस्त्वयं सर्वदमनः सर्वं हि दमयत्यसौ ।
स सर्वदमनो नाम कुमारः समपद्यत ॥ ८ ॥
विक्रमेणौजसा चैव बलेन च समन्वितः । ‘ यह सब जीवोंका दमन करता है, इसलिये ' सर्वदमन ' नामसे प्रसिद्ध हो । ' तबसे उस
कुमारका नाम सर्वदमन हो गया । वह पराक्रम, तेज और बलसे सम्पन्न था ॥ ८३ ॥
( अप्रेषयति दुष्यन्ते महिष्यास्तनयस्य च ।
पाण्डुभावपरीताङ्गीं चिन्तया समभिप्लुताम् ॥
लम्बालकां कृशां दीनां तथा मलिनवाससम् ।
शकुन्तलां च सम्प्रेक्ष्य प्रदध्यौ स मुनिस्तदा ॥
शास्त्राणि सर्ववेदाश्च द्वादशाब्दस्य चाभवन् ॥ ) राजा दुष्यन्तने अपनी रानी और पुत्रको बुलानेके लिये जब किसी भी मनुष्यको नहीं भेजा, तब शकुन्तला चिन्तामग्न हो गयी । उसके सारे अंग सफेद पड़ने लगे । उसके खुले हुए लंबे केश लटक रहे थे, वस्त्र मैले हो गये थे, वह अत्यन्त दुर्बल और दीन दिखायी देती थी । शकुन्तलाको इस दयनीय दशामें देखकर कण्व मुनिने कुमार सर्वदमनके लिये विद्याका चिन्तन किया । इससे उस बारह वर्षके ही बालकके हृदयमें समस्त शास्त्रों और सम्पूर्ण
वेदोंका ज्ञान प्रकाशित हो गया ।
तं कुमारमृषिर्दृष्ट्वा कर्म चास्यातिमानुषम् ॥ ९ ॥
समयो यौवराज्यायेत्यब्रवीच्च शकुन्तलाम् । महर्षि कण्वने उस कुमार और उसके लोकोत्तर कर्मको देखकर शकुन्तलासे कहा –'अब इसके युवराज- पदपर अभिषिक्त होनेका समय आया है ॥ ९ ३ ॥
( शृणु भद्रे मम सुते मम वाक्यं शुचिस्मिते ।
पतिव्रतानां नारीणां विशिष्टमिति चोच्यते ॥
‘ मेरी कल्याणमयी पुत्री! मेरा यह वचन सुनो । पवित्र मुसकानवाली शकुन्तले! पतिव्रता स्त्रियोंके लिये यह विशेष ध्यान देनेयोग्य बात है; इसलिये बता रहा हूँ ।
पतिशुश्रूषणं पूर्वं मनोवाक्कायचेष्टितैः ।
अनुज्ञाता मया पूर्वं पूजयैतद् व्रतं तव ॥
एतेनैव च वृत्तेन विशिष्टां लप्स्यसे श्रियम् ।
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‘ सती स्त्रियोंके लिये सर्वप्रथम कर्तव्य यह है कि वे मन, वाणी, शरीर और चेष्टाओंद्वारा निरन्तर पतिकी सेवा करती रहें। मैंने पहले भी तुम्हें इसके लिये आदेश दिया है । तुम अपने इस व्रतका पालन करो । इस पतिव्रतोचित आचार- व्यवहारसे ही विशिष्ट शोभा प्राप्त कर
सकोगी ।
तस्माद् भद्रे प्रयातव्यं समीपं पौरवस्य ह ॥
स्वयं नायाति मत्वा ते गतं कालं शुचिस्मिते ।
गत्वाऽऽराधय राजानं दुष्यन्तं हितकाम्यया ॥
' भद्रे! तुम्हें पूरुनन्दन दुष्यन्तके पास जाना चाहिये । वे स्वयं नहीं आ रहे हैं, ऐसा सोचकर तुमने बहुत- सा समय उनकी सेवासे दूर रहकर बिता दिया । शुचिस्मिते! अब तुम अपने हितकी इच्छासे स्वयं जाकर राजा दुष्यन्तकी आराधना करो । दौष्यन्तिं यौवराज्यस्थं दृष्ट्वा प्रीतिमवाप्स्यसि ।
देवतानां गुरूणां च क्षत्रियाणां च भामिनि ।
भर्तॄणां च विशेषेण हितं संगमनं सताम् ॥
तस्मात् पुत्रि कुमारेण गन्तव्यं मत्प्रियेप्सया ।
प्रतिवाक्यं न दद्यास्त्वं शापिता मम पादयोः ॥
‘ वहाँ दुष्यन्तकुमार सर्वदमनको युवराज-पदपर प्रतिष्ठित देख तुम्हें बड़ी प्रसन्नता होगी । देवता, गुरु, क्षत्रिय, स्वामी तथा साधु पुरुष- इनका संग विशेष हितकर है । अतः बेटी! तुम्हें मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे कुमारके साथ अवश्य अपने पतिके यहाँ जाना चाहिये । मैं अपने चरणोंकी शपथ दिलाकर कहता हूँ कि तुम मुझे मेरी इस आज्ञाके विपरीत कोई उत्तर न देना ' । वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा सुतां तत्र पौत्रं कण्वोऽभ्यभाषत ।
परिष्वज्य च बाहुभ्यां मूर्क्युपाघ्राय पौरवम् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - पुत्रीसे ऐसा कहकर महर्षि कण्वने उसके पुत्र भरतको दोनों बाँहोंसे पकड़कर अंकमें भर लिया और उसका मस्तक सूँघकर कहा । कण्व उवाच
सोमवंशोद्भवो राजा दुष्यन्तो नाम विश्रुतः ।
तस्याग्रमहिषी चैषा तव माता शुचिव्रता ॥
गन्तुकामा भर्तृवशं त्वया सह सुमध्यमा ।
गत्वाभिवाद्य राजानं यौवराज्यमवाप्स्यसि ॥
स पिता तव राजेन्द्रस्तस्य त्वं वशगो भव ।
पितृपैतामहं राज्यमनुतिष्ठस्व भावतः ॥
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कण्व बोले- वत्स! चन्द्रवंशमें दुष्यन्त नामसे प्रसिद्ध एक राजा हैं । पवित्र व्रतका पालन करनेवाली यह तुम्हारी माता उन्हींकी महारानी है । यह सुन्दरी तुम्हें साथ लेकर अब पतिकी सेवामें जाना चाहती है । तुम वहाँ जाकर राजाको प्रणाम करके युवराज- पद प्राप्त करोगे । वे महाराज दुष्यन्त ही तुम्हारे पिता हैं । तुम सदा उनकी आज्ञाके अधीन रहना और बाप-प- दादेके राज्यका प्रेमपूर्वक पालन करना ।
शकुन्तले शृणुष्वेदं हितं पथ्यं च भामिनि ।
पतिव्रताभावगुणान् हित्वा साध्यं न किञ्चन ॥
तुष्टाः सर्ववरप्रदाः ' पतिव्रतानां देवा वै ।
प्रसादं च करिष्यन्ति ह्यापदर्थे च भामिनि ॥
पतिप्रसादात् पुण्यगतिं प्राप्नुवन्ति न चाशुभम् । तस्माद् गत्वा तु राजानमाराधय शुचिस्मिते ॥ ) ( फिर कण्व शकुन्तलासे बोले— ) ‘ भामिनि! शकुन्तले! यह मेरी हितकर एवं लाभप्रद बात सुनो । पतिव्रताभाव- सम्बन्धी गुणोंको छोड़कर तुम्हारे लिये और कोई वस्तु साध्य नहीं है । पतिव्रताओंपर सम्पूर्ण वरोंको देनेवाले देवतालोग भी संतुष्ट रहते हैं । भामिनि! वे आपत्तिके निवारणके लिये अपने कृपा प्रसादका भी परिचय देंगे । शुचिस्मिते! पतिव्रता देवियाँ पतिके प्रसादसे पुण्यगतिको ही प्राप्त होती हैं; अशुभ गतिको नहीं । अतः तुम
जाकर राजाकी आराधना करो ' ।
तस्य तद् बलमाज्ञाय कण्वः शिष्यानुवाच ह ॥ १० ॥
शकुन्तलामिमां शीघ्रं सहपुत्रामितो गृहात् ।
भर्तुः प्रापयतागारं सर्वलक्षणपूजिताम् ॥ ११ ॥
फिर उस बालकके बलको समझकर कण्वने अपने शिष्योंसे कहा- ' तुमलोग समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्मानित मेरी पुत्री शकुन्तला और इसके पुत्रको शीघ्र ही इस घरसे ले जाकर पतिके घरमें पहुँचा दो ॥ १०-११ ॥
नारीणां चिरवासो हि बान्धवेषु न रोचते ।
कीर्तिचारित्रधर्मघ्नस्तस्मान्नयत मा चिरम् ॥ १२ ॥
‘स्त्रियोंका अपने भाई- बन्धुओंके यहाँ अधिक दिनोंतक रहना अच्छा नहीं होता । वह उनकी कीर्ति, शील तथा पातिव्रत्य धर्मका नाश करनेवाला होता है । अतः इसे अविलम्ब पतिके घरमें पहुँचा दो ' ॥ १२ ॥
(वैशम्पायन उवाच
धर्माभिपूजितं पुत्रं काश्यपेन निशाम्य तु ।
काश्यपात् प्राप्य चानुज्ञां मुमुदे च शकुन्तला ॥