महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 581–590
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 581–590
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‘ तात! जान पड़ता है वे मार दिये गये या मर गये । मैं आपसे सच कहती हूँ, मैं उनके बिना जीवित नहीं रह सकती हूँ ' ॥ ४५ ॥
शुक्र उवाच
बृहस्पतेः सुतः पुत्रि कचः प्रेतगतिं गतः ।
विद्यया जीवितोऽप्येवं हन्यते करवाणि किम् ॥ ४६ ॥
मैवं शुचो मा रुद देवयानि न त्वादृशी मर्त्यमनुप्रशोचते । यस्यास्तव ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च सेन्द्रा देवा वसवोऽथाश्विनौ च ॥ ४७ ॥
सुरद्विषश्चैव जगच्च सर्व- मुपस्थाने संनमन्ति प्रभावात् । अशक्योऽसौ जीवयितुं द्विजातिः संजीवितो बध्यते चैव भूयः ॥ ४८ ॥
शुक्राचार्यने कहा- बेटी! बृहस्पतिके पुत्र कच मर गये । मैंने विद्यासे उन्हें कई बार जिलाया, तो भी वे इस प्रकार मार दिये जाते हैं, अब मैं क्या करूँ । देवयानी! तुम इस प्रकार शोक न करो, रोओ मत । तुम जैसी शक्तिशालिनी स्त्री किसी मरनेवालेके लिये शोक नहीं करती । तुम्हें तो वेद, ब्राह्मण, इन्द्रसहित सब देवता, वसुगण, अश्विनीकुमार, दैत्य तथा सम्पूर्ण जगत्के प्राणी मेरे प्रभावसे तीनों संध्याओंके समय मस्तक झुकाकर प्रणाम करते हैं । अब उस ब्राह्मणको जिलाना असम्भव है । यदि जीवित हो जाय, तो फिर दैत्योंद्वारा मार डाला जायगा ( अतः उसे जिलानेसे कोई लाभ नहीं है ) ॥ ४६–४८ ॥ देवयान्युवाच यस्याङ्गिरा वृद्धतमः पितामहो बृहस्पतिश्चापि पिता तपोनिधिः । ऋषेः पुत्रं तमथो वापि पौत्रं कथं न शोचेयमहं न रुद्याम् ॥ ४ ९ ॥ देवयानी बोली – पिताजी! अत्यन्त वृद्ध महर्षि अंगिरा जिनके पितामह हैं, तपस्याके भण्डार बृहस्पति जिनके पिता हैं, जो ऋषिके पुत्र और ऋषिके ही पौत्र हैं; उन ब्रह्मचारी कचके लिये मैं कैसे शोक न करूँ और कैसे न रोऊँ ॥ ४ ९ ॥ स ब्रह्मचारी च तपोधनश्च सदोत्थितः कर्मसु चैव दक्षः । कचस्य मार्गं प्रतिपत्स्ये न भोक्ष्ये प्रियो हि मे तात कचोऽभिरूपः ॥ ५० ॥
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तात! वे ब्रह्मचर्यपालनमें रत थे, तपस्या ही उनका धन था । वे सदा ही सजग रहनेवाले और कार्य करनेमें कुशल थे । इसलिये कच मुझे बहुत प्रिय थे । वे सदा मेरे मनके अनुरूप चलते थे । अब मैं भोजनका त्याग कर दूँगी और कच जिस मार्गपर गये हैं, वहीं मैं भी चली जाऊँगी ॥ ५० ॥
वैशम्पायन उवाच स पीडितो देवयान्या महर्षिः समाह्वयत् संरम्भाच्चैव काव्यः । असंशयं मामसुरा द्विषन्ति ये मे शिष्यानागतान् सूदयन्ति ॥ ५१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! देवयानीके कहनेसे उसके दुःखसे दुःखी हुए महर्षि शुक्राचार्यने कचको पुकारा और दैत्योंके प्रति कुपित होकर बोले— ' इसमें तनिक भी संशय नहीं है कि असुरलोग मुझसे द्वेष करते हैं । तभी तो यहाँ आये हुए मेरे शिष्योंको ये लोग मार डालते हैं ॥ ५१ ॥
अब्राह्मणं कर्तुमिच्छन्ति रौद्रा- स्ते मां यथा व्यभिचरन्ति नित्यम् । अप्यस्य पापस्य भवेदिहान्तः कं ब्रह्महत्या न दहेदपीन्द्रम् ॥ ५२ ॥
‘ ये भयंकर स्वभाववाले दैत्य मुझे ब्राह्मणत्वसे गिराना चाहते हैं । इसीलिये प्रतिदिन मेरे विरुद्ध आचरण कर रहे हैं । इस पापका परिणाम यहाँ अवश्य प्रकट होगा । ब्रह्महत्या किसे नहीं जला देगी, चाहे वह इन्द्र ही क्यों न हो? ॥ ५२ ॥
गुरोर्हि भीतो विद्यया चोपहूतः शनैर्वाक्यं जठरे व्याजहार । जब गुरुने विद्याका प्रयोग करके बुलाया, तब उनके पेटमें बैठे हुए कच भयभीत हो धीरेसे बोले । (कच उवाच प्रसीद भगवन् मह्यं कचोऽहमभिवादये । यथा बहुमतः पुत्रस्तथा मन्यतु मां भवान् ॥ ) कचने कहा — भगवन्! आप मुझपर प्रसन्न हों, मैं कच हूँ और आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ। जैसे पुत्रपर पिताका बहुत प्यार होता है, उसी प्रकार आप मुझे भी अपना स्नेहभाजन समझें । वैशम्पायन उवाच
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तमब्रवीत् केन पथोपनीत- स्त्वं चोदरे तिष्ठसि ब्रूहि विप्र ॥ ५३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - उनकी आवाज सुनकर शुक्राचार्यने पूछा — ' विप्र! किस मार्गसे जाकर तुम मेरे उदरमें स्थित हो गये? ठीक- ठीक बताओ ' ॥ ५३ ॥
कच उवाच तव प्रसादान्न जहाति मां स्मृतिः स्मरामि सर्वं यच्च यथा च वृत्तम् । न त्वेवं स्यात् तपसः संक्षयो मे ततः क्लेशं घोरमिमं सहामि ॥ ५४ ॥
कचने कहा — गुरुदेव! आपके प्रसादसे मेरी स्मरणशक्तिने साथ नहीं छोड़ा है । जो बात जैसे हुई है, वह सब मुझे याद है। इस प्रकार पेट फाड़कर निकल आनेसे मेरी तपस्याका नाश होगा । वह न हो, इसीलिये मैं यहाँ घोर क्लेश सहन करता हूँ ॥ ५४ ॥
असुरैः सुरायां भवतोऽस्मि दत्तो हत्वा दग्ध्वा चूर्णयित्वा च काव्य । ब्राह्मीं मायां चासुरीं विप्र मायां त्वयि स्थिते कथमेवातिवर्तेत् ॥ ५५ ॥
आचार्यपाद! असुरोंने मुझे मारकर मेरे शरीरको जलाया और चूर्ण बना दिया । फिर उसे मदिरामें मिलाकर आपको पिला दिया! विप्रवर! आप ब्राह्मी, आसुरी और दैवी तीनों प्रकारकी मायाओंको जानते हैं । आपके होते हुए कोई इन मायाओंका उल्लंघन कैसे कर सकता है? ॥ ५५ ॥
शुक्र उवाच किं ते प्रियं करवाण्यद्य वत्से वधेन मे जीवितं स्यात् कचस्य । नान्यत्र कुक्षेर्मम भेदनेन दृश्येत् कचो मद्गतो देवयानि ॥ ५६ ॥
शुक्राचार्य बोले — बेटी देवयानी! अब तुम्हारे लिये कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? मेरे वधसे ही कचका जीवित होना सम्भव है । मेरे उदरको विदीर्ण करनेके सिवा और कोई ऐसा उपाय नहीं है, जिससे मेरे शरीरमें बैठा हुआ कच बाहर दिखायी दे ॥ ५६ ॥
देवयान्युवाच द्वौ मां शोकावग्निकल्पौ दहेतां कचस्य नाशस्तव चैवोपघातः ।
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कचस्य नाशे मम नास्ति शर्म तवोपघाते जीवितुं नास्मि शक्ता ॥ ५७ ॥
देवयानीने कहा - पिताजी! कचका नाश और आपका वध - ये दोनों ही शोक अग्निके समान मुझे जला देंगे । कचके नष्ट होनेपर मुझे शान्ति नहीं मिलेगी और आपका वध हो जानेपर मैं जीवित नहीं रह सकूँगी ॥ ५७ ॥
शुक्रउवाच संसिद्धरूपोऽसि बृहस्पतेः सुत यत् त्वां भक्तं भजते देवयानी । विद्यामिमां प्राप्नुहि जीविनीं त्वं न चेदिन्द्रः कचरूपी त्वमद्य ॥ ५८ ॥
शुक्राचार्य बोले- बृहस्पतिके पुत्र कच! अब तुम सिद्ध हो गये, क्योंकि तुम देवयानीके भक्त हो और वह तुम्हें चाहती है । यदि कचके रूपमें तुम इन्द्र नहीं हो, तो मुझसे मृतसंजीवनी विद्या ग्रहण करो ॥ ५८ ॥
न निवर्तेत् पुनर्जीवन् कश्चिदन्यो ममोदरात् ।
ब्राह्मणं वर्जयित्वैकं तस्माद् विद्यामवाप्नुहि ॥ ५ ९ ॥
केवल एक ब्राह्मणको छोड़कर दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो मेरे पेटसे पुनः जीवित निकल सके । इसलिये तुम विद्या ग्रहण करो ॥ ५ ९ ॥ पुत्रो भूत्वा भावय भावितो मा- मस्मद्देहादुपनिष्क्रम्य तात । समीक्षेथा धर्मवतीमवेक्षां गुरोः सकाशात् प्राप्य विद्यां सविद्यः ॥ ६० ॥
तात! मेरे इस शरीरसे जीवित निकलकर मेरे लिये पुत्रके तुल्य हो मुझे पुनः जिला देना । मुझ गुरुसे विद्या प्राप्त करके विद्वान् हो जानेपर भी मेरे प्रति धर्मयुक्त दृष्टिसे ही देखना ॥ ६० ॥
वैशम्पायन उवाच गुरोः सकाशात् समवाप्य विद्यां भित्त्वा कुक्षिं निर्विचक्राम विप्रः । कचोऽभिरूपस्तत्क्षणाद् ब्राह्मणस्य शुक्लात्यये पौर्णमास्यामिवेन्दुः ॥ ६१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! गुरुसे संजीवनी विद्या प्राप्त करके सुन्दर रूपवाले विप्रवर कच तत्काल ही महर्षि शुक्राचार्यका पेट फाड़कर ठीक उसी तरह बाहर निकल आये, जैसे दिन बीतनेपर पूर्णिमाकी संध्याको चन्द्रमा प्रकट हो जाते हैं ॥ ६१ ॥
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दृष्ट्वा च तं पतितं ब्रह्मराशि- मुत्थापयामास मृतं कचोऽपि । विद्यां सिद्धां तामवाप्याभिवाद्य ततः कचस्तं गुरुमित्युवाच ॥ ६२ ॥
मूर्तिमान् वेदराशिके तुल्य शुक्राचार्यको भूमिपर पड़ा देख कचने भी अपने मरे हुए गुरुको विद्याके बलसे जिलाकर उठा दिया और उस सिद्ध विद्याको प्राप्त कर लेनेपर गुरुको प्रणाम करके वे इस प्रकार बोले- ॥ ६२ ॥
यः श्रोत्रयोरमृतं संनिषिञ्चेद् विद्यामविद्यस्य यथा ममायम् । तं मन्येऽहं पितरं मातरं च तस्मै न द्रुह्येत् कृतमस्य जानन् ॥ ६३ ॥
' मैं विद्यासे शून्य था, उस दशामें मेरे इन पूजनीय आचार्य जैसे मेरे दोनों कानोंमें मृतसंजीवनी विद्यारूप अमृतकी धारा डाली है, इसी प्रकार जो कोई दूसरे ज्ञानी महात्मा मेरे कानोंमें ज्ञानरूप अमृतका अभिषेक करेंगे, उन्हें भी मैं अपना माता - पिता मानूँगा ( जैसे गुरुदेव शुक्राचार्यको मानता हूँ) । गुरुदेवके द्वारा किये हुए उपकारको स्मरण रखते हुए शिष्यको उचित है कि वह उनसे कभी द्रोह न करे ॥ ६३ ॥
ऋतस्य दातारमनुत्तमस्य निधिं निधीनामपि लब्धविद्याः । ये नाद्रियन्ते गुरुमर्चनीयं पापाँल्लोकांस्ते व्रजन्त्यप्रतिष्ठाः ॥ ६४ ॥
‘ जो लोग सम्पूर्ण वेदके सर्वोत्तम ज्ञानको देने वाले तथा समस्त विद्याओंके आश्रयभूत पूजनीय गुरुदेवका उनसे विद्या प्राप्त करके भी आदर नहीं करते, वे प्रतिष्ठारहित होकर पापपूर्ण लोकों — नरकोंमें जाते हैं ' ॥ ६४ ॥
वैशम्पायन उवाच सुरापानाद् वञ्चनां प्राप्य विद्वान् संज्ञानाशं चैव महातिघोरम् । दृष्ट्वा कचं चापि तथाभिरूपं पीतं तदा सुरया मोहितेन ॥ ६५ ॥
समन्युरुत्थाय महानुभाव- स्तदोशना विप्रहितं चिकीर्षुः । सुरापानं प्रति संजातमन्युः काव्यः स्वयं वाक्यमिदं जगाद ॥ ६६ ॥
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वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! विद्वान् शुक्राचार्य मदिरापानसे ठगे गये थे और उस अत्यन्त भयानक परिस्थितिको पहुँच गये थे, जिसमें तनिक भी चेत नहीं रह जाता । मदिरासे मोहित होनेके कारण ही वे उस समय अपने मनके अनुकूल चलनेवाले प्रिय शिष्य ब्राह्मणकुमार कचको भी पी गये थे । यह सब देख और सोचकर वे महानुभाव कविपुत्र शुक्र कुपित हो उठे । मदिरापानके प्रति उनके मनमें क्रोध और घृणाका भाव जाग उठा और उन्होंने ब्राह्मणोंका हित करनेकी इच्छासे स्वयं इस प्रकार घोषणा की- ॥ ६५-६६ ॥
यो ब्राह्मणोऽद्यप्रभृतीह कश्चि- मोहात् सुरां पास्यति मन्दबुद्धिः ।
अपेतधर्मा ब्रह्महा चैव स स्या- दस्मिंल्लोके गर्हितः स्यात् परे च ॥ ६७ ॥
‘ आजसे इस जगत्का जो कोई भी मन्दबुद्धि ब्राह्मण अज्ञानसे भी मदिरापान करेगा, वह धर्मसे भ्रष्ट हो ब्रह्महत्याके पापका भागी होगा तथा इस लोक और परलोक दोनोंमें वह निन्दित होगा' ॥ ६७ || मया चैतां विप्रधर्मोक्तिसीमां मर्यादां वै स्थापितां सर्वलोके । सन्तो विप्राः शुश्रुवांसो गुरूणां देवा लोकाश्चोपशृण्वन्तु सर्वे ॥ ६८ ॥
' धर्मशास्त्रोंमें ब्राह्मण--धर्मकी जो सीमा निर्धारित की गयी है, उसीमें मेरे द्वारा स्थापित की हुई यह मर्यादा भी रहे और यह सम्पूर्ण लोकमें मान्य हो । साधु पुरुष, ब्राह्मण, गुरुओंके समीप अध्ययन करनेवाले शिष्य, देवता और समस्त जगत्के मनुष्य, मेरी बाँधी हुई इस मर्यादाको अच्छी तरह सुन लें ' ॥ ६८ ॥
इतीदमुक्त्वा स महानुभाव- स्तपोनिधीनां निधिरप्रमेयः ।
तान् दानवान् दैवविमूढबुद्धी- निदं समाहूय वचोऽभ्युवाच ॥ ६ ९ ॥
ऐसा कहकर तपस्याकी निधियोंकी निधि, अप्रमेय शक्तिशाली महानुभाव शुक्राचार्यने दैवने जिनकी बुद्धिको मोहित कर दिया था उन दानवोंको बुलाया और इस प्रकार कहा ॥ ६९ ॥
आचक्षे वो दानवा बालिशाः स्थ सिद्धः कचो वत्स्यति मत्सकाशे । संजीविनीं प्राप्य विद्यां महात्मा तुल्यप्रभावो ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः ॥ ७० ॥
( योऽकार्षीद् दुष्करं कर्म देवानां कारणात् कचः ।
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न तत्कीर्तिर्जरां गच्छेद् यज्ञियश्च भविष्यति ॥ )
एतावदुक्त्वा वचनं विरराम स भार्गवः ।
दानवा विस्मयाविष्टाः प्रययुः स्वं निवेशनम् ॥ ७१ ॥
‘ जिन महात्मा कचने देवताओंके लिये वह दुष्कर कार्य किया है, उनकी कीर्ति कभी नष्ट नहीं हो सकती और वे यज्ञभागके अधिकारी होंगे। ' ऐसा कहकर शुक्राचार्यजी चुप हो गये और दानव आश्चर्यचकित होकर अपने - अपने घर चले गये ॥ ७१ ॥
गुरोरुष्य सकाशे तु दशवर्षशतानि सः ।
अनुज्ञातः कचो गन्तुमियेष त्रिदशालयम् ॥ ७२ ॥
कचने एक हजार वर्षोंतक गुरुके समीप रहकर अपना व्रत पूरा कर लिया । तब घर जानेकी अनुमति मिल जानेपर कचने देवलोकमें जानेका विचार किया ॥ ७२ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्याने षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ययात्युपाख्यानविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ७६ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ७४ श्लोक हैं ) Fard Pata
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सप्तसप्ततितमोऽध्यायः देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक- दूसरेको शाप देना वैशम्पायन उवाच
समावृतव्रतं तं तु विसृष्टं गुरुणा तदा ।
प्रस्थितं त्रिदशावासं देवयान्यब्रवीदिदम् ॥ १ ॥
ऋषेरङ्गिरसः पौत्र वृत्तेनाभिजनेन च ।
भ्राजसे विद्यया चैव तपसा च दमेन च ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं- जब कचका व्रत समाप्त हो गया और गुरुने उन्हें जानेकी आज्ञा दे दी, तब वे देवलोकको प्रस्थित हुए । उस समय देवयानीने उनसे इस प्रकार कहा —'महर्षि अंगिराके पौत्र! आप सदाचार, उत्तम कुल, विद्या, तपस्या तथा इन्द्रियसंयम आदिसे बड़ी शोभा पा रहे हैं ॥ १-२ ॥
ऋषिर्यथाङ्गिरा मान्यः पितुर्मम महायशाः ।
तथा मान्यश्च पूज्यश्च मम भूयो बृहस्पतिः ॥ ३ ॥
‘ महायशस्वी महर्षि अंगिरा जिस प्रकार मेरे पिताजीके लिये माननीय हैं, उसी प्रकार आपके पिता बृहस्पतिजी मेरे लिये आदरणीय तथा पूज्य हैं ॥ ३ ॥
एवं ज्ञात्वा विजानीहि यद् ब्रवीमि तपोधन ।
व्रतस्थे नियमोपेते यथा वर्ताम्यहं त्वयि ॥ ४ ॥
' तपोधन! ऐसा जानकर मैं जो कहती हूँ उसपर विचार करें। आप जब व्रत और नियमोंके पालनमें लगे थे, उन दिनों मैंने आपके साथ जो बर्ताव किया है, उसे आप भूले नहीं होंगे ॥ ४ ॥
स समावृतविद्यो मां भक्तां भजितुमर्हसि ।
गृहाण पाणिं विधिवन्मम मन्त्रपुरस्कृतम् ॥ ५ ॥
‘ अब आप व्रत समाप्त करके अपनी अभीष्ट विद्या प्राप्त कर चुके हैं । मैं आपसे प्रेम करती हूँ, आप मुझे स्वीकार करें; वैदिक मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक विधिवत् मेरा पाणिग्रहण कीजिये ' ॥ ५ ॥
कचउवाच
पूज्यो मान्यश्च भगवान् यथा तव पिता मम ।
तथा त्वमनवद्याङ्गि पूजनीयतरा मम ॥ ६ ॥
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कचने कहा- निर्दोष अंगोंवाली देवयानी! जैसे तुम्हारे पिता भगवान् शुक्राचार्य मेरे लिये पूजनीय और माननीय हैं, वैसे ही तुम हो; बल्कि उनसे भी बढ़कर मेरी पूजनीया हो ॥ ६ ॥
प्राणेभ्योऽपि प्रियतरा भार्गवस्य महात्मनः ।
त्वं भद्रे धर्मतः पूज्या गुरुपुत्री सदा मम ॥ ७ ॥
भद्रे! महात्मा भार्गवको तुम प्राणोंसे भी अधिक प्यारी हो, गुरुपुत्री होनेके कारण धर्मकी दृष्टिसे सदा मेरी पूजनीया हो ॥ ७ ॥
यथा मम गुरुर्नित्यं मान्यः शुक्रः पिता तव ।
देवयानि तथैव त्वं नैवं मां वक्तुमर्हसि ॥ ८ ॥
देवयानी! जैसे मेरे गुरुदेव तुम्हारे पिता शुक्राचार्य सदा मेरे माननीय हैं, उसी प्रकार तुम हो; अतः तुम्हें मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ॥ ८ ॥
देवयान्युवाच
गुरुपुत्रस्य पुत्रो वै न त्वं पुत्रश्च मे पितुः ।
तस्मात् पूज्यश्च मान्यश्च ममापि त्वं द्विजोत्तम ॥ ९ ॥
असुरैर्हन्यमाने च कच त्वयि पुनः पुनः ।
तदा प्रभृति या प्रीतिस्तां त्वमद्य स्मरस्व मे ॥ १० ॥
देवयानी बोली – द्विजोत्तम! आप मेरे पिताके गुरुपुत्रके पुत्र हैं, मेरे पिताके नहीं; अतः मेरे लिये भी आप पूजनीय और माननीय हैं। कच! जब असुर आपको बार- बार मार डालते थे, तबसे लेकर आजतक आपके प्रति मेरा जो प्रेम रहा है, उसे आज याद कीजिये ॥ ९ -१० ॥
सौहार्दे चानुरागे च वेत्थ मे भक्तिमुत्तमाम् ।
न मामर्हसि धर्मज्ञ त्यक्तुं भक्तामनागसम् ॥ ११ ॥
सौहार्द और अनुरागके अवसरपर मेरी उत्तम भक्तिका परिचय आपको मिल चुका है । आप धर्मके ज्ञाता हैं । मैं आपके प्रति भक्ति रखनेवाली निरपराध अबला हूँ । आपको मेरा त्याग करना उचित नहीं है ॥ ११ ॥
कचउवाच
अनियोज्ये नियोगे मां नियुनङ्क्षि शुभव्रते ।
प्रसीद सुभ्रु त्वं मह्यं गुरोर्गुरुतरा शुभे ॥ १२ ॥
यत्रोषितं विशालाक्षि त्वया चन्द्रनिभानने ।
तत्राहमुषितो भद्रे कुक्षौ काव्यस्य भामिनि ॥। १३ ॥
भगिनी धर्मतो मे त्वं मैवं वोचः सुमध्यमे ।
सुखमस्म्युषितो भद्रे न मन्युर्विद्यते मम ॥ १४ ॥
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कचने कहा — उत्तम व्रतका आचरण करनेवाली सुन्दरी! तुम मुझे ऐसे कार्यमें लगा रही हो, जिसमें लगाना कदापि उचित नहीं है । शुभे! तुम मेरे ऊपर प्रसन्न होओ । तुम मेरे लिये गुरुसे भी बढ़कर गुरुतर हो । विशाल नेत्र तथा चन्द्रमाके समान मुखवाली भामिनि! शुक्राचार्यके जिस उदरमें तुम रह चुकी हो, उसीमें मैं भी रहा हूँ। इसलिये भद्रे! धर्मकी दृष्टिसे तुम मेरी बहिन हो । अतः सुमध्यमे! मुझसे ऐसी बात न कहो । कल्याणी! मैं तुम्हारे यहाँ बड़े सुखसे रहा हूँ । तुम्हारे प्रति मेरे मनमें तनिक भी रोष नहीं है ॥ १२–१४ ॥ आपृच्छे त्वां गमिष्यामि शिवमाशंस मे पथि ।
अविरोधेन धर्मस्य स्मर्तव्योऽस्मि कथान्तरे ।
अप्रमत्तोत्थिता नित्यमाराधय गुरुं मम ॥ १५ ॥
अब मैं जाऊँगा, इसलिये तुमसे पूछता हूँ—तुम्हारी आज्ञा चाहता हूँ, आशीर्वाद दो कि मार्गमें मेरा मंगल हो । धर्मकी अनुकूलता रखते हुए बातचीतके प्रसंगमें कभी मेरा भी स्मरण कर लेना और सदा सावधान एवं सजग रहकर मेरे गुरुदेवकी सेवामें लगी रहना ॥ १५ ॥
देवयान्युवाच
यदि मां धर्मकामार्थे प्रत्याख्यास्यसि याचितः ।
ततः कच न ते विद्या सिद्धिमेषा गमिष्यति ॥ १६ ॥
देवयानी बोली- कच! मैंने धर्मानुकूल कामके लिये आपसे प्रार्थना की है । यदि आप मुझे ठुकरा देंगे, तो आपकी यह संजीवनी विद्या सिद्ध नहीं हो सकेगी ॥ १६ ॥
कच उवाच
गुरुपुत्रीति कृत्वाहं प्रत्याचक्षे न दोषतः ।
गुरुणा चाननुज्ञातः काममेवं शपस्व माम् ॥ १७ ॥
कचने कहा- देवयानी! गुरुपुत्री समझकर ही मैंने तुम्हारे अनुरोधको टाल दिया है;
तुममें कोई दोष देखकर नहीं । गुरुजीने भी इसके विषयमें मुझे कोई आज्ञा नहीं दी है ।
तुम्हारी जैसी इच्छा हो, मुझे शाप दे दो ॥ १७ ॥
आर्षं धर्मं ब्रुवाणोऽहं देवयानि यथा त्वया ।
शप्तो नार्होऽस्मि शापस्य कामतोऽद्य न धर्मतः ॥ १८ ॥
तस्माद् भवत्या यः कामो न तथा स भविष्यति ।
ऋषिपुत्रो न ते कश्चिज्जातु पाणिं ग्रहीष्यति ॥ १ ९ ॥
बहिन! मैं आर्ष धर्मकी बात बता रहा था । इस दशामें तुम्हारे द्वारा शाप पानेके योग्य नहीं था । तुमने मुझे धर्मके अनुसार नहीं, कामके वशीभूत होकर आज शाप दिया है, इसलिये तुम्हारे मनमें जो कामना है, वह पूरी नहीं होगी । कोई भी ऋषिपुत्र (ब्राह्मणकुमार ) कभी तुम्हारा पाणिग्रहण नहीं करेगा ॥ १८-१९ ॥ फलिष्यति न ते विद्या यत् त्वं मामात्थ तत् तथा ।