महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 631–640

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 631–640

पृष्ठ 631

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इत्येतानि समीक्ष्याहं कारणानि भृगूद्वह ।

अधर्मभयसंविग्नः शर्मिष्ठामुपजग्मिवान् ॥ ३५ ॥

ब्रह्मन्! मेरा यह व्रत है कि मुझसे कोई जो भी वस्तु माँगे, उसे वह अवश्य दे दूँगा । आपके ही द्वारा मुझे सौंपी हुई शर्मिष्ठा इस जगत्‌में दूसरे किसी पुरुषको अपना पति बनाना नहीं चाहती थी । अतः उसकी इच्छा पूर्ण करना धर्म समझकर मैंने वैसा किया है । आप इसके लिये मुझे क्षमा करें । भृगुश्रेष्ठ! इन्हीं सब कारणोंका विचार करके अधर्मके भयसे उद्विग्न हो मैं शर्मिष्ठाके पास गया था ॥ ३५ ॥

शुक्र उवाच

नन्वहं प्रत्यवेक्ष्यस्ते मदधीनोऽसि पार्थिव ।

मिथ्याचारस्य धर्मेषु चौर्यं भवति नाहुष ॥ ३६ ॥

शुक्राचार्यने कहा- राजन्! तुम्हें इस विषयमें मेरे आदेशकी भी प्रतीक्षा करनी चाहिये थी; क्योंकि तुम मेरे अधीन हो। नहुषनन्दन! धर्ममें मिथ्या आचरण करनेवाले पुरुषको चोरीका पाप लगता है ॥ ३६ ॥

वैशम्पायन उवाच

क्रुद्धेनोशनसा शप्तो ययातिर्नाहुषस्तदा ।

पूर्वं वयः परित्यज्य जरां सद्योऽन्वपद्यत ॥ ३७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -क्रोधमें भरे हुए शुक्राचार्यके शाप देनेपर नहुषपुत्र राजा ययाति उसी समय पूर्वावस्था ( यौवन ) - का परित्याग करके तत्काल बूढ़े हो गये ॥ ३७ ॥

ययातिरुवाच

अतृप्तो यौवनस्याहं देवयान्यां भृगूद्वह ।

प्रसादं कुरु मे ब्रह्मञ्जरेयं न विशेच्च माम् ॥ ३८ ॥

ययाति बोले — भृगुश्रेष्ठ! मैं देवयानीके साथ युवावस्थामें रहकर तृप्त नहीं हो सका हूँ; अतः ब्रह्मन्! मुझपर ऐसी कृपा कीजिये, जिससे यह बुढ़ापा मेरे शरीरमें प्रवेश न करे ॥ ३८ ॥

शुक्रउवाच

नाहं मृषा ब्रवीम्येतज्जरां प्राप्तोऽसि भूमिप ।

जरां त्वेतां त्वमन्यस्मिन् संक्रामय यदीच्छसि ॥ ३ ९ ॥

शुक्राचार्यजीने कहा - भूमिपाल! मैं झूठ नहीं बोलता; बूढ़े तो तुम हो ही गये; किंतु तुम्हें इतनी सुविधा देता हूँ कि यदि चाहो तो किसी दूसरेसे जवानी लेकर इस बुढ़ापाको उसके शरीरमें डाल सकते हो ॥ ३ ९ ॥ ययातिरुवाच

पृष्ठ 632

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राज्यभाक् स भवेद् ब्रह्मन् पुण्यभाक् कीर्तिभाक् तथा ।

यो मे दद्यात् वयः पुत्रस्तद् भवाननुमन्यताम् ॥ ४० ॥

ययाति बोले – ब्रह्मन्! मेरा जो पुत्र अपनी युवावस्था मुझे दे, वही पुण्य और कीर्तिका

भागी होनेके साथ ही मेरे राज्यका भी भागी हो । आप इसका अनुमोदन करें ॥ ४० ॥

शुक्र उवाच

संक्रामयिष्यसि जरां यथेष्टं नहुषात्मज ।

मामनुध्याय भावेन न च पापमवाप्स्यसि ॥ ४१ ॥

वयो दास्यति ते पुत्रो यः स राजा भविष्यति ।

आयुष्मान् कीर्तिमांश्चैव बह्वपत्यस्तथैव च ॥ ४२ ॥

शुक्राचार्यने कहा - नहुषनन्दन! तुम भक्तिभावसे मेरा चिन्तन करके अपनी वृद्धावस्थाका इच्छानुसार दूसरेके शरीरमें संचार कर सकोगे । उस दशामें तुम्हें पाप भी नहीं लगेगा। जो पुत्र तुम्हें ( प्रसन्नतापूर्वक ) अपनी युवावस्था देगा, वही राजा होगा, साथ ही दीर्घायु, यशस्वी तथा अनेक संतानोंसे युक्त होगा ॥ ४१-४२ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्याने त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ययात्युपाख्यानविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८३ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४३ श्लोक मिलाकर कुल ४६३ श्लोक हैं )

पृष्ठ 633

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चतुरशीतितमोऽध्यायः ययातिका अपने पुत्र यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु और अनुसे अपनी युवावस्था देकर वृद्धावस्था लेनेके लिये आग्रह और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देना, फिर अपने पुत्र पूरुको जरावस्था देकर उनकी युवावस्था लेना तथा उन्हें वर प्रदान करना वैशम्पायन उवाच

जरां प्राप्य ययातिस्तु स्वपुरं प्राप्य चैव हि ।

पुत्रं ज्येष्ठं वरिष्ठं च यदुमित्यब्रवीद् वचः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजा ययाति बुढ़ापा लेकर वहाँसे अपने नगरमें आये और अपने ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ पुत्र यदुसे इस प्रकार बोले ॥ १ ॥

ययातिरुवाच

जरा वली च मां तात पलितानि च पर्यगुः ।

काव्यस्योशनसः शापान्न च तृप्तोऽस्मि यौवने ॥ २ ॥

ययातिने कहा – तात! कविपुत्र शुक्राचार्यके शापसे मुझे बुढ़ापेने घेर लिया; मेरे शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयीं और बाल सफेद हो गये; किंतु मैं अभी जवानीके भोगोंसे तृप्त नहीं हुआ हूँ ॥ २ ॥

त्वं यदो प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह ।

यौवनेन त्वदीयेन चरेयं विषयानहम् ॥ ३ ॥

पूर्णे वर्षसहस्रे तु पुनस्ते यौवनं त्वहम् ।

दत्त्वा स्वं प्रतिपत्स्यामि पाप्मानं जरया सह ॥ ४ ॥

यदो! तुम बुढ़ापेके साथ मेरे दोषको ले लो और मैं तुम्हारी जवानीके द्वारा विषयोंका उपभोग करूँ। एक हजार वर्ष पूरे होनेपर मैं पुनः तुम्हारी जवानी देकर बुढ़ापेके साथ अपना दोष वापस ले लूँगा ॥ ३-४ ॥ यदुरुवाच

जयां बहवो दोषाः पानभोजनकारिताः ।

तस्माज्जरां न ते राजन् ग्रहीष्य इति मे मतिः ॥ ५ ॥

यदु बोले- राजन्! बुढ़ापेमें खाने - पीनेसे अनेक दोष प्रकट होते हैं; अतः मैं आपकी वृद्धावस्था नहीं लूँगा, यही मेरा निश्चित विचार है ॥ ५ ॥

पृष्ठ 634

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सितश्मश्रुर्निरानन्दो जरया शिथिलीकृतः ।

वलीसंगतगात्रस्तु दुर्दर्शो दुर्बलः कृशः ॥ ६ ॥

महाराज! मैं उस बुढ़ापेको लेनेकी इच्छा नहीं करता, जिसके आनेपर दाढ़ी - मूँछके बाल सफेद हो जाते हैं; जीवनका आनन्द चला जाता है । वृद्धावस्था एकदम शिथिल कर देती है । सारे शरीरमें झुर्रियाँ पड़ जाती हैं और मनुष्य इतना दुर्बल तथा कृशकाय हो जाता है कि उसकी ओर देखते नहीं बनता ॥ ६ ॥

अशक्तः कार्यकरणे परिभूतः स यौवतैः ।

सहोपजीविभिश्चैव तां जरां नाभिकामये ॥ ७ ॥

बुढ़ापेमें काम- काज करनेकी शक्ति नहीं रहती, युवतियाँ तथा जीविका पानेवाले सेवक भी तिरस्कार करते हैं; अतः मैं वृद्धावस्था नहीं लेना चाहता ॥ ७ ॥

सन्ति ते बहवः पुत्रा मत्तः प्रियतरा नृप ।

जरां ग्रहीतुं धर्मज्ञ तस्मादन्यं वृणीष्व वै ॥ ८ ॥

धर्मज्ञ नरेश्वर! आपके बहुत - से पुत्र हैं, जो आपको मुझसे भी अधिक प्रिय हैं; अतः बुढ़ापा लेनेके लिये किसी दूसरे पुत्रको चुन लीजिये ॥ ८ ॥

ययातिरुवाच

यत् त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि ।

तस्मादराज्यभाक् तात प्रजा तव भविष्यति ॥ ९ ॥

ययातिने कहा — तात! तुम मेरे हृदयसे उत्पन्न ( औरस पुत्र) होकर भी मुझे अपनी युवावस्था नहीं देते; इसलिये तुम्हारी संतान राज्यकी अधिकारिणी नहीं होगी ॥ ९ ॥

तुर्वसो प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह ।

यौवनेन चरेयं वै विषयांस्तव पुत्रक ॥ १० ॥

( अब उन्होंने तुर्वसुको बुलाकर कहा- ) तुर्वसो! बुढ़ापेके साथ मेरा दोष ले लो । बेटा! मैं तुम्हारी जवानीसे विषयोंका उपभोग करूँगा ॥ १० ॥

पूर्णे वर्षसहस्रे तु पुनर्दास्यामि यौवनम् ।

स्वं चैव प्रतिपत्स्यामि पाप्मानं जरया सह ॥ ११ ॥

एक हजार वर्ष पूर्ण होनेपर मैं तुम्हें जवानी लौटा दूँगा और बुढ़ापेसहित अपने दोषको वापस ले लूँगा ॥ ११ ॥

तुर्वसुरुवाच

न कामये जरां तात कामभोगप्रणाशिनीम् ।

बलरूपान्तकरणीं बुद्धिप्राणप्रणाशिनीम् ॥ १२ ॥

तुर्वसु बोले- तात! काम- भोगका नाश करनेवाली वृद्धावस्था मुझे नहीं चाहिये । वह बल तथा रूपका अन्त कर देती है और बुद्धि एवं प्राणशक्तिका भी नाश करनेवाली

पृष्ठ 635

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है ॥ १२ ॥

ययातिरुवाच

यत् त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि ।

तस्मात् प्रजा समुच्छेदं तुर्वसो तव यास्यति ॥ १३ ॥

ययातिने कहा — तुर्वसो! तू मेरे हृदयसे उत्पन्न होकर भी मुझे अपनी युवावस्था नहीं देता है, इसलिये तेरी संतति नष्ट हो जायगी ॥ १३ ॥

संकीर्णाचारधर्मेषु प्रतिलोमचरेषु च ।

पिशिताशिषु चान्त्येषु मूढ राजा भविष्यसि ॥ १४ ॥

मूढ़! जिनके आचार और धर्म वर्णसंकरोंके समान हैं, जो प्रतिलोमसंकर जातियोंमें गिने जाते हैं तथा जो कच्चा मांस खानेवाले एवं चाण्डाल आदिकी श्रेणीमें हैं, ऐसे लोगोंका तू राजा होगा ॥ १४ ॥

गुरुदारप्रसक्तेषु तिर्यग्योनिगतेषु च ।

पशुधर्मेषु पापेषु म्लेच्छेषु त्वं भविष्यसि ॥ १५ ॥

जो गुरु - पत्नियोंमें आसक्त हैं, जो पशु - पक्षी आदिका -सा आचरण करनेवाले हैं तथा जिनके सारे आचार- विचार भी पशुओंके समान हैं, तू उन पापात्मा म्लेच्छोंका राजा होगा ॥ १५ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं स तुर्वसुं शप्त्वा ययातिः सुतमात्मनः ।

शर्मिष्ठायाः सुतं द्रुह्युमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! राजा ययातिने इस प्रकार अपने पुत्र तुर्वसुको शाप देकर शर्मिष्ठाके पुत्र द्रुह्युसे यह बात कही ॥ १६ ॥

ययातिरुवाच

द्रुह्यो त्वं प्रतिपद्यस्व वर्णरूपविनाशिनीम् ।

जरां वर्षसहस्रं मे यौवनं स्वं ददस्व च ॥ १७ ॥

ययातिने कहा – द्रुह्यो! कान्ति तथा रूपका नाश करनेवाली यह वृद्धावस्था तुम ले लो और एक हजार वर्षोंके लिये अपनी जवानी मुझे दे दो ॥ १७ ॥

पूर्णे वर्षसहस्रे तु पुनर्दास्यामि यौवनम् ।

स्वं चादास्यामि भूयोऽहं पाप्मानं जरया सह ॥ १८ ॥

हजार वर्ष पूर्ण हो जानेपर मैं पुनः तुम्हारी जवानी तुम्हें दे दूँगा और बुढ़ापेके साथ अपना दोष फिर ले लूँगा ॥ १८ ॥

द्रुह्युरुवाच

पृष्ठ 636

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न गजं न रथं नाश्वं जीर्णो भुङ्क्ते न च स्त्रियम् ।

वाक्सङ्गश्चास्य भवति तां जरां नाभिकामये ॥ १ ९ ॥

द्रुह्यु बोले – पिताजी! बूढ़ा मनुष्य हाथी, घोड़े और रथपर नहीं चढ़ सकता; स्त्रीका भी उपभोग नहीं कर सकता । उसकी वाणी भी लड़खड़ाने लगती है; अतः मैं वृद्धावस्था नहीं लेना चाहता ॥ १ ९ ॥ ययातिरुवाच

यत् त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि ।

तस्माद् द्रुह्यो प्रियः कामो न ते सम्पत्स्यते क्वचित् ॥ २० ॥

ययाति बोले — द्रुह्यो! तू मेरे हृदयसे उत्पन्न होकर भी अपनी जवानी मुझे नहीं दे रहा है; इसलिये तेरा प्रिय मनोरथ कभी सिद्ध नहीं होगा ॥ २० ॥

यत्राश्वरथमुख्यानामश्वानां स्याद् गतं न च ।

हस्तिनां पीठकानां च गर्दभानां तथैव च ॥ २१ ॥

बस्तानां च गवां चैव शिबिकायास्तथैव च ।

उडुपप्लवसंतारो यत्र नित्यं भविष्यति ।

अराजा भोजशब्दं त्वं तत्र प्राप्स्यसि सान्वयः ॥ २२ ॥

जहाँ घोड़े जुते हुए उत्तम रथों, घोड़ों, हाथियों, पीठकों ( पालकियों ), गदहों, बकरों, बैलों और शिबिका आदिकी भी गति नहीं है, जहाँ प्रतिदिन नावपर बैठकर ही घूमना फिरना होगा, ऐसे प्रदेशमें तू अपनी संतानोंके साथ चला जायगा और वहाँ तेरे वंशके लोग राजा नहीं, भोज कहलायेंगे ॥ २१-२२ ॥ ययातिरुवाच

अनो त्वं प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह ।

एकं वर्षसहस्रं तु चरेयं यौवनेन ते ॥ २३ ॥

तदनन्तर ययातिने [ अनुसे ] कहा- अनो! तुम बुढ़ापेके साथ मेरा दोष ले लो और मैं तुम्हारी जवानीके द्वारा एक हजार वर्षतक सुख भोगूँगा ॥ २३ ॥

अनुरुवाच

जीर्णः शिशुवदादत्तेऽकालेऽन्नमशुचिर्यथा ।

न जुहोति च कालेऽग्निं तां जरां नाभिकामये ॥ २४ ॥

अनु बोले — पिताजी! बूढ़ा मनुष्य बच्चोंकी तरह असमयमें भोजन करता है, अपवित्र रहता है तथा समयपर अग्निहोत्र नहीं करता, अतः ऐसी वृद्धावस्थाको मैं नहीं लेना चाहता ॥ २४ ॥

ययातिरुवाच

पृष्ठ 637

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यत् त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि ।

जरादोषस्त्वया प्रोक्तस्तस्मात् त्वं प्रतिपत्स्यसे ॥ २५ ॥

प्रजाश्च यौवनप्राप्ता विनशिष्यन्त्यनो तव ।

अग्निप्रस्कन्दनपरस्त्वं चाप्येवं भविष्यसि ॥ २६ ॥

ययातिने कहा — अनो! तू मेरे हृदयसे उत्पन्न होकर भी अपनी युवावस्था मुझे नहीं दे रहा है और बुढ़ापेके दोष बतला रहा है, अतः तू वृद्धावस्थाके समस्त दोषोंको प्राप्त करेगा और तेरी संतान जवान होते ही मर जायगी तथा तू भी बूढ़े- जैसा होकर अग्निहोत्रका त्याग कर देगा ॥ २५-२६ ॥ ययातिरुवाच

पूरो त्वं मे प्रियः पुत्रस्त्वं वरीयान् भविष्यसि ।

जरा वली च मां तात पलितानि च पर्यगुः ॥ २७ ॥

ययातिने [ पूरुसे ] कहा - पूरो! तुम मेरे प्रिय पुत्र हो । गुणोंमें तुम श्रेष्ठ होओगे । तात! मुझे बुढ़ापेने घेर लिया; सब अंगोंमें झुर्रियाँ पड़ गयीं और सिरके बाल सफेद हो गये । बुढ़ापाके ये सारे चिह्न मुझे एक ही साथ प्राप्त हुए हैं ॥ २७ ॥

काव्यस्योशनसः शापान्न च तृप्तोऽस्मि यौवने ।

पूरो त्वं प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह ।

कंचित् कालं चरेयं वै विषयान् वयसा तव ॥ २८ ॥

पूर्णे वर्षसहस्रे तु पुनर्दास्यामि यौवनम् ।

स्वं चैव प्रतिपत्स्यामि पाप्मानं जरया सह ॥ २ ९ ॥

कविपुत्र शुक्राचार्यके शापसे मेरी यह दशा हुई है; किंतु मैं जवानीके भोगोंसे अभी तृप्त नहीं हुआ हूँ । पूरो! तुम बुढ़ापेके साथ मेरे दोषको ले लो और मैं तुम्हारी युवावस्था लेकर उसके द्वारा कुछ कालतक विषयभोग करूँगा । एक हजार वर्ष पूरे होनेपर मैं तुम्हें पुनः तुम्हारी जवानी दे दूँगा और बुढ़ापेके साथ अपना दोष ले लूँगा ॥ २८-२९ ॥ वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तः प्रत्युवाच पूरुः पितरमञ्जसा ।

यथाऽऽत्थ मां महाराज तत् करिष्यामि ते वचः ॥ ३० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं- ययातिके ऐसा कहनेपर पूरुने अपने पितासे विनयपूर्वक कहा— ‘ महाराज! आप मुझे जैसा आदेश दे रहे हैं, आपके उस वचनका मैं पालन करूँगा ॥ ३० ॥

( गुरोर्वे वचनं पुण्यं स्वर्ग्यमायुष्करं नृणाम् ।

गुरुप्रसादात् त्रैलोक्यमन्वशासच्छतक्रतुः ॥

गुरोरनुमतिं प्राप्य सर्वान् कामानवाप्नुयात् । )

पृष्ठ 638

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 638 का मूल पृष्ठ
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‘ गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन मनुष्योंके लिये पुण्य, स्वर्ग तथा आयु प्रदान करनेवाला है । गुरुके ही प्रसादसे इन्द्रने तीनों लोकोंका शासन किया है । गुरुस्वरूप पिताकी अनुमति प्राप्त करके मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको पा लेता है ।

प्रतिपत्स्यामि ते राजन् पाप्मानं जरया सह ।

गृहाण यौवनं मत्तश्चर कामान् यथेप्सितान् ॥ ३१ ॥

‘ राजन्! मैं बुढ़ापेके साथ आपका दोष ग्रहण कर लूँगा। आप मुझसे जवानी ले लें और इच्छानुसार विषयोंका उपभोग करें ॥ ३१ ॥

जरयाहं प्रतिच्छन्नो वयोरूपधरस्तव ।

यौवनं भवते दत्त्वा चरिष्यामि यथाऽऽत्थ माम् ॥ ३२ ॥

' मैं वृद्धावस्थासे आच्छादित हो आपकी आयु एवं रूप धारण करके रहूँगा और आपको जवानी देकर आप मेरे लिये जो आज्ञा देंगे, उसका पालन करूँगा ' ॥ ३२ ॥

ययातिरुवाच

पूरो प्रीतोऽस्मि ते वत्स प्रीतश्चेदं ददामि ते ।

सर्वकामसमृद्धा ते प्रजा राज्ये भविष्यति ॥ ३३ ॥

ययाति बोले — वत्स! पूरो! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ और प्रसन्न होकर तुम्हें यह वर देता हूँ ——तुम्हारे राज्यमें सारी प्रजा समस्त कामनाओंसे सम्पन्न होगी' ॥ ३३ ॥

एवमुक्त्वा ययातिस्तु स्मृत्वा काव्यं महातपाः ।

संक्रामयामास जरां तदा पूरौ महात्मनि ॥ ३४ ॥

ऐसा कहकर महातपस्वी ययातिने शुक्राचार्यका स्मरण किया और अपनी वृद्धावस्था महात्मा पूरुको देकर उनकी युवावस्था ले ली ॥ ३४ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्याने चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ययात्युपाख्यानविषयक चौरासीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ८४ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल ३५३ श्लोक हैं )

पृष्ठ 639

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पञ्चाशीतितमोऽध्यायः राजा ययातिका विषय सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना वैशम्पायन उवाच

पौरवेणाथ वयसा ययातिर्नहुषात्मजः ।

प्रीतियुक्तो नृपश्रेष्ठश्चचार विषयान् प्रियान् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! नहुषके पुत्र नृपश्रेष्ठ ययातिने पूरुकी युवावस्थासे अत्यन्त प्रसन्न होकर अभीष्ट विषयभोगोंका सेवन आरम्भ किया ॥ १ ॥

यथाकामं यथोत्साहं यथाकालं यथासुखम् ।

धर्माविरुद्धं राजेन्द्र यथार्हति स एव हि ॥ २ ॥

राजेन्द्र! उनकी जैसी कामना होती, जैसा उत्साह होता और जैसा समय होता, उसके अनुसार वे सुखपूर्वक धर्मानुकूल भोगोंका उपभोग करते थे । वास्तवमें उसके योग्य वे ही थे ॥ २ ॥

देवानतर्पयद् यज्ञैः श्राद्धैस्तद्वत् पितॄनपि ।

दीनाननुग्रहैरिष्टैः कामैश्च द्विजसत्तमान् ॥ ३ ॥

उन्होंने यज्ञोंद्वारा देवताओंको, श्राद्धोंसे पितरोंको, इच्छाके अनुसार अनुग्रह करके दीन - दुःखियोंको और मुँहमाँगी भोग्य वस्तुएँ देकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको तृप्त किया ॥ ३ ॥

अतिथीनन्नपानैश्च विशश्च परिपालनैः ।

आनृशंस्येन शूद्रांश्च दस्यून् संनिग्रहेण च ॥ ४ ॥

धर्मेण च प्रजाः सर्वा यथावदनुरञ्जयन् ।

ययातिः पालयामास साक्षादिन्द्र इवापरः ॥ ५ ॥

वे अतिथियोंको अन्न और जल देकर, वैश्योंको उनके धन- वैभवकी रक्षा करके, शूद्रोंको दयाभावसे, लुटेरोंको कैद करके तथा सम्पूर्ण प्रजाको धर्मपूर्वक संरक्षणद्वारा प्रसन्न रखते थे । इस प्रकार साक्षात् दूसरे इन्द्रके समान राजा ययातिने समस्त प्रजाका पालन किया ॥ ४-५ ॥

स राजा सिंहविक्रान्तो युवा विषयगोचरः ।

अविरोधेन धर्मस्य चचार सुखमुत्तमम् ॥ ६ ॥

वे राजा सिंहके समान पराक्रमी और नवयुवक थे । सम्पूर्ण विषय उनके अधीन थे और वे धर्मका विरोध न करते हुए उत्तम सुखका उपभोग करते थे ॥ ६ ॥

स सम्प्राप्य शुभान् कामांस्तृप्तः खिन्नश्च पार्थिवः ।

पृष्ठ 640

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कालं वर्षसहस्रान्तं सस्मार मनुजाधिपः ॥ ७ ॥

परिसंख्याय कालज्ञः कलाः काष्ठाश्च वीर्यवान् ।

यौवनं प्राप्य राजर्षिः सहस्रपरिवत्सरान् ॥ ८ ॥

विश्वाच्या सहितो रेमे व्यभ्राजन्नन्दने वने ।

अलकायां स कालं तु मेरुशृङ्गे तथोत्तरे ॥ ९ ॥

यदा स पश्यते कालं धर्मात्मा तं महीपतिः ।

पूर्ण मत्वा ततः कालं पूरुं पुत्रमुवाच ह ॥ १० ॥

वे नरेश शुभ भोगोंको प्राप्त करके पहले तो तृप्त एवं आनन्दित होते थे; परंतु जब यह बात ध्यानमें आती कि ये हजार वर्ष भी पूरे हो जायँगे, तब उन्हें बड़ा खेद होता था । कालतत्त्वको जाननेवाले पराक्रमी राजा ययाति एक-एक कला और काष्ठाकी गिनती करके एक हजार वर्षके समयकी अवधिका स्मरण रखते थे । राजर्षि ययाति हजार वर्षोंकी जवानी पाकर नन्दनवनमें विश्वाची अप्सराके साथ रमण करते और प्रकाशित होते थे । वे अलकापुरीमें तथा उत्तर दिशावर्ती मेरुशिखरपर भी इच्छानुसार विहार करते थे । धर्मात्मा नरेशने जब देखा कि समय अब पूरा हो गया, तब वे अपने पुत्र पुरुके पास आकर बोले

॥ ७–१० ॥ यथाकामं यथोत्साहं यथाकालमरिंदम ।

सेविता विषयाः पुत्र यौवनेन मया तव ॥ ११ ॥

‘ शत्रुदमन पुत्र! मैंने तुम्हारी जवानीके द्वारा अपनी रुचि, उत्साह और समयके अनुसार विषयोंका सेवन किया है ॥ ११ ॥

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।

हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ १२ ॥

‘ परंतु विषयोंकी कामना उन विषयोंके उपभोगसे कभी शान्त नहीं होती; अपितु घीकी आहुति पड़नेसे अग्निकी भाँति वह अधिकाधिक बढ़ती ही जाती है ॥ १२ ॥

यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।

एकस्यापि न पर्याप्तं तस्मात् तृष्णां परित्यजेत् ॥ १३ ॥

' इस पृथ्वीपर जितने भी धान, जौ, स्वर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब एक मनुष्यके

लिये भी पर्याप्त नहीं हैं । अतः तृष्णाका त्याग कर देना चाहिये ॥ १३ ॥

या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः ।

योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ॥ १४ ॥

‘ खोटी बुद्धिवाले लोगोंके लिये जिसका त्याग करना अत्यन्त कठिन है, जो मनुष्यके बूढ़े होनेपर भी स्वयं बूढ़ी नहीं होती तथा जो एक प्राणान्तक रोग है, उस तृष्णाको त्याग देनेवाले पुरुषको ही सुख मिलता है ॥ १४ ॥

पूर्णं वर्षसहस्रं मे विषयासक्तचेतसः ।