मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 161–170
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 161–170
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पहला अध्याय | - २१
एवमाचारतो दृष्ट्वा धर्मस्य मुनयो गतिम् ।
सर्वस्य तपसो मूलमाचारं जगृहुः परम् ॥ ११० ॥
अपने चार से हीन ब्राह्मण वेदफल को नहीं पाता । और जो श्राचारयुक्त है वह फलभागी होता है । इस प्रकार मुनियों ने, आचार से धर्म प्राप्ति देखकर, धर्ममूल आचार को ग्रहण किया है ॥ १०६-११० ॥
जगतश्च समुत्पत्तिं संस्कारविधिमेव च ।
व्रतचर्योपचारं च स्नानस्य च परं विधिम् ॥ १११ ॥
दाराधिगमनं चैव विवाहानां च लक्षणम् ।
महायज्ञविधानं च श्राद्धकल्पश्च शाश्वतः ॥ ११२ ॥
वृत्तीनां लक्षणं चैव स्नातकस्य व्रतानि च ।
भक्ष्याभक्ष्यञ्च शौचं च द्रव्याणां शुद्धिमेव च ॥११३ ॥
स्त्रीधर्म योगतापस्य मोक्षं संन्यासमेव च ।
राज्ञश्च धर्ममखिलङ्कार्याणां च विनिर्णयम् ॥ ११४ ॥
साक्षिप्रश्नविधानं व धर्मं स्त्रीपुंसयोरपि ।
विभागधर्मं द्यूतं च कण्टकानां च शोधनम्॥ ११५ ॥
इस धर्मशास्त्र की संख्या बतलाते हैं--मेंजगत्मनु कीने, किनउत्पत्तिकिन, संस्कारोंविषयों कोकी स्नानविधिकहेविधिहैं,, ब्रह्म-उस, चारियों के व्रताचरण, गुरुवन्दन, उपासना आदि,, श्राद्धविधि, स्त्रीगमन, विवाहों का लक्षण, महाथश-वैश्वदेवादिका विचार, श्रा-,, - जीवनोपाय गृहस्थ के व्रतनियम भक्ष्य अभक्ष्य आदि तप शौचनिर्णय, द्रव्यशुद्धि, स्त्रियों के धर्मोपाय, वानप्रस्थसंपूर्ण धर्म, कार्यों के धर्म, मोक्ष और संन्यासधर्म, राजानों,के स्त्री पुरुषों के धर्म, का निर्णय -साखी-गवाहियों से प्रश्नविधि कहागयाहै ॥ १११-११५॥ हिस्साबाँट- और जुआरी, चोरोंका शोधन
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II मनुस्मृति |
वैश्यशूद्रोपचारं च सङ्कीर्णानां च सम्भवम् ।
आपद्धर्मं च वर्णानां प्रायश्चित्तविधिं तथा ॥ ११६ ॥
संसारगमनं चैव त्रिविधं कर्मसम्भवम् ।
निःश्रेयसं कर्मणां च गुणदोषपरीक्षणम् ॥ ११७ ॥
देशधर्मान् जातिधर्मान् कुलधर्मांश्च शाश्वतान् ।
पाखण्डगणधर्मांश्च शास्त्रेऽस्मिन्नुक्तवान् मनुः॥ ११८ ॥
वैश्य और शूद्रों के धर्मानुष्ठान का प्रकार, वर्णसङ्करों की उत्पत्ति, वर्णों का श्रापद्धर्म और प्रायश्चित्तविधि, उत्तम, मध्यम, अम इन तीन प्रकार के कर्मों से देहगति का निर्णय, मोक्ष का स्वरूप, और कर्मों के गुण दोष की परीक्षा, देश धर्म, जाति का धर्म, कुल का धर्म जो परंपरा से चला थाता है । पाखण्डियों के कर्म, गण - वैश्य आदि के धर्म इस शास्त्र में भगवान् मनु कहा है ॥ ११६-११८ ॥
यथेदमुक्तवान् शास्त्रं पुरा पृष्टो मनुर्भया ।
तथेदं यूयमप्यद्य मत्सकाशान्निबोधत ॥ ११६ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्कायां संहितायां प्रथमोऽध्यायः ॥ जिस प्रकार, मनु से पूर्वकाल में मैंने पूछा, तब यह शास्त्र उन्हों ने उपदेश किया । उसी प्रकार अब आप मेरे से सुनिये ॥ ११६ ॥
पहला श्रध्याय समाप्त ॥
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अथ द्वितीयोऽध्यायः ।
विद्वद्भिः सेवितः सद्भिर्नित्यमद्वेषरागिभिः ।
हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तन्निबोधत ॥ १ ॥
. -कामात्मता न प्रशस्ता न चैवेहास्त्यकामता ।
काम्यो हि वेदाधिगमः कर्मयोगश्च वैदिकः ॥ २ ॥
दूसरा अध्याय । धर्म का लक्षण | धर्म का सामान्य लक्षण कहते हैं- वेदविशारद, धार्मिक, राग द्वेप से रहित, महात्मानों ने जिस धर्म का पालन किया और हृदय से स्वीकार किया उस को सुनो । पुरुप को कामफल का अभिलाषी होना अच्छा नहीं है और न बिल्कुल इच्छा का त्याग ही श्रेष्ठ है । क्योंकि विना इच्छा, वेदाध्ययन और वैदिक कर्मों का श्रनुष्ठान नहीं होलकता ॥ १-२ ॥
सङ्कल्पमूलः कामो वै यज्ञाः संकल्पसम्भवाः ।
व्रता नियमधर्माश्च सर्वे सङ्कल्पजाः स्मृताः ॥ ३ ॥
कामस्य क्रिया काचिद्दृश्यते नेह कर्हिचित् ।' यद्यद्धि कुरुते किंचित् तत्तत्कामस्य चेष्टितम् ॥ ४ ॥
तेषु सम्यग् वर्तमानो गच्छत्यमरलोकताम् ।
यथा सङ्कल्पितचेह सर्वान् कामान् समश्नुते ॥ ५ ॥
इस कर्म से यह इष्टफल होगा-यही संकल्प है । इसलिए सब कामों का मूल संकल्प है । यज्ञादि सब संकल्प से ही होतेसंकल्पहैं । व्रत, नियम, धर्म सब संकल्प से किये जाते हैं अर्थात् विना
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२४ मनुस्मृति | कुछ नहीं होसकता । संसार में कोई कर्म विना इच्छा के होते नहीं देखा गया । शास्त्रोक्त कर्मों का भलीभांति अनुष्ठान करने से स्वर्ग- लोक की प्राप्तिऔर इष्टकाम पूरे होते हैं । ३-५ ॥
'वेदोऽखिलो धर्मसूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् ।
आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥ ६ ॥
संपूर्ण वेद, धर्ममूल हैं- वेदवेचात्रों की स्मृति और शील- ब्रह्मण्यता, साधु पुरुषों का श्राचार, और श्रात्म -सन्तोष ये धर्म मैं प्रमाण माने जाते हैं ॥ ६ ॥
यः कश्चित्कस्यचिद्धमों मनुना परिकीर्तितः ।
स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥ ७ ॥
सर्वं तु लमवेक्ष्येवं निखिलं ज्ञानचक्षुषा ।
श्रुतिप्रामाण्यतो विद्वान् स्वधर्मे निविशेत वै ॥ = ॥
श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन् हि मानवः ।
इह कीर्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ॥ ६ ॥
जिस वर्ग का जो धर्म मनु ने कहा है, वह सब वेदोक्त है । वेद संपूर्ण ज्ञान का भरडार | विद्वान्, ज्ञानदृष्टिले, वेदप्रमाण द्वारा धर्मशास्त्र को जांचकर, अपने धर्म में श्रद्धा करें । जो पुरुष, वेद और स्मृतियों में कहे धर्मों का पालन करताहै, वह संसार में कीर्ति ' पाकर, परलोक में अक्षय सुख पाता है ॥ ७-2 ॥ श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः । " ते सर्वार्थेष्वमीमांस्येताभ्यां धर्मो हि निर्वभौ ॥ १० ॥
योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयार्द्विजः ।
स साधुभिर्वहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः ॥ ११ ॥
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्थ च प्रियमात्मनः ।
एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षान्धर्मस्य लक्षणम् ॥ १२ ॥
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दूसरा अध्याय । २५ श्रुति वेद को और स्मृति धर्मशास्त्र को कहते हैं । ये दोनों सब विषयों में निर्विवाद, तर्क-कुतर्क रहित हैं । क्योंकि, इन्हीं से धर्म का प्रकाश हुआ है । जो द्विज, कुतकों से इनकी निन्दा करते हैं, a नास्तिक हैं, वेदनिन्दक हैं । वे शिष्टसमाज से निकाल देने योग्य हैं । वेद, स्मृति, सदाचार, और अपना सन्तोष, ये चार प्रकार के+ धर्मलक्षण, मुनियों ने कहे हैं ॥ १०-१२ ॥
अर्थकामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते ।
धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ॥ १३ ॥
श्रुतिद्वैधं तु यत्र स्यात्तत्र धर्मावुभौ स्मृतौ ।
उभावपि हि तो धर्मों सम्यगुक्तौ मनीषिभिः ॥ १४ ॥
उदितेऽनुदिते चैव समयाध्युषिते तथा सर्वथा वर्तते यज्ञ इतीयं वैदिकीश्रुतिः ॥ १५ ॥
निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः ।
तस्यशास्त्रधिकारोऽस्मिन् ज्ञेयोनान्यस्यकस्यचित्॥१६ ॥
हैं उनको जो पुरुष, अर्थ -प्रयोजन, काम अभिलाप मैं नहींसब सेफँसेश्रेष्ठ प्रमाण, धर्म ज्ञान होता है । धर्म जाननेवालों के लिए विषय को दो श्रुति है । जहां श्रुति दो प्रकार की हो अर्थात्प्रमाण एकहैं *हीयह ऋषियों ने, - - तरह से कहें वहां दोनों वचन धर्म में हैं-उदितकाल सूर्यो कहा है । धृतिभेद की मान्यता दिखलातेमें, समयाध्युषित- सूर्य, नक्षत्र- दयकाल में, अनुदित - सूर्योदय से पूर्वहोता है, यह वैदिकी श्रुति है ॥ वर्जितकाल में, सर्वथा यज्ञ-होम कहती है और उन में ज्ञात होता है एकही श्रुति कालभेद गरीयसी । श्रविरोधे सदा कार्य * जावालिवचन है-'श्रुतिस्मृतिविरोधे तु मेंश्रुतिरेव' श्रदुम्बरीं स्पृष्ट्वोद्गायेत् ’ "“ औदुम्बरी स्मार्तं वैदिकवत्सदा ॥ ' जैमिनि ने मीमांसा के विरोध में ज्योतिष्टोम के प्रसङ्ग में सर्वावेष्टयितव्या' इन दो श्रुति -स्मृति वाक्यों श्रुतिप्रामाण्यही माना है । जुहोति । + उदिते जुहोति । श्रनुदिते जुहोति । समयाभ्युषिते ४
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२६ मनुस्मृति । अलग अलग यज्ञकर्म किया जाता है । गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टि तक जिस वर्ण ( द्विजाति ) के लिए वेदमन्त्रों से कर्म लिखे हैं। उसी का इस शास्त्र को पढ़ने सुनने का अधिकार है दूसरों का नहींहै ॥ १३-१६ ॥
सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् ।
तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्त प्रचक्षते ॥ १७ ॥
तस्मिन् देशे य श्राचारः पारम्पर्यक्रमागतः ।
वर्णानां सान्तरालानां स सदाचार उच्यते ॥ १८ ॥
देशविभाग । सरस्वती और पद्वती इन देवनदियों के बीच जो देश है उस को 'ब्रह्मावर्त' कहते हैं । जिस देशमें, परंपरा से, जो श्राचार चला आता है, वही वर्णों का और सङ्कीर्ण जातियों का 'सदाचार' कहा जाता है ॥ १७-१८ ॥
कुरुक्षेत्रं च मत्स्याश्च पञ्चालाः शूरसेनकाः ।
एष ब्रह्मर्षिदेशो वै ब्रह्मावर्तादनन्तरः ॥ १६ ॥
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्सनः ।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥ २० ॥
हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्यं यत्प्राग्विनशनादपि ।
प्रत्यगेव प्रयागाच्च मध्यदेशः प्रकीर्तितः ॥ २१ ॥
समुद्रान् वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात् ।
तयोरेवान्तरं गियर्यावर्त्तं विदुर्बुधाः ॥ २२ ॥
+ महाभारत में लिखाहै-शुतुद्रि और यमुना के मध्यगत ' सप्रस्रवण' नामक पर्वत मे ' सरस्वती ' नदी की उत्पत्ति है । कुरुक्षेत्र की उत्तर सीमा में, इसका प्रवाह प्रायः वर्षा में. देखा जाता है । ऋग्वेद में भी 'इमं मे गङ्गे यमुने सरस्वति शुतुद्रि..." इत्यादि वर्णनहै ।. और दृषद्वती नदी • हास्तिनपुर के पश्चिम- उत्तर दिशा में, अम्बाला के पास कहीं, नदियों में मिली है । इन दोनों के बीच में. प्राचीन आर्य ब्राह्मणों के निवास और उत्पत्ति से ' ब्रह्मा ' नाम प्रसिद्ध हुथां ।
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दूसरा अध्याय । २७ कुरुक्षेत्र और मत्स्यदेश पञ्चाल और शूरसेनक * ये ब्रह्मर्षि देश, ब्रह्मावर्त के समीप हैं । कुरुक्षेत्रादि देशों में उत्पन्न ब्राह्मणों से सब मनुष्य अपने अपने उचित सदाचारों की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये हिमवान् पर्वत और विन्ध्याचल के बीच में, सरस्वती के पूर्व और प्रयाग के पश्चिम में, जो देश हैं, उनको ' मध्यदेश ' कहते हैं । पूर्वसमुद्रसे पश्चिंमसमुद्र तक, और हिमाचलसे विन्ध्या-चल के बीच में जो देश हैं, उनको 'आर्यावर्त' कहते हैं | ॥१६-२२॥
कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावतः ।
सज्ञेयो यज्ञियो देशो म्लेच्छदेशस्त्वतःपरः ॥ २३ ॥
'एतान् शूद्रस्तु द्विजातयोयस्मिन् कस्मिन्देशान्वासंश्रयेरन्निवसेद्वृत्तिकर्षितःप्रयत्नतः ।॥ २४ ॥.
: जिस देश में कृष्णसार मृग स्वभाव से विचरता है, वह यज्ञ क- रने योग्य देश है । इसके सिवा जो देश हैं, वे म्लेच्छकोदेशयत्नपूर्वकहैं -श्र-,, र्थात्निवासयज्ञकरनालायकचाहियेनहीं हैं ॥ इनऔरदेशोंशूद्रमें, अपनीद्विजातियोंजीविकावश चाहे जिस देश में निवास कर सकता है । २३-२४ ॥
एष धर्मस्य वो योनिः समासेन प्रकीर्तिता ।
संभवश्चास्य सर्वस्य वर्णधर्मान्निबोधत ॥ २५ ॥
वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिर्द्विजन्मनाम् । ॥
कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च ॥ २६
ने एक वर्ष अज्ञात- * मत्स्यदेश, राजां विराटकी राजधानी थीहै, दक्षिण। जहां पाञ्चालपाण्डवों और उत्तर पाचाल ।, बास किया था । पश्चाल दो भागों में बटाके भीतर, कान्यकुब्ज देश भी है । इस -,"यह आज कल का रोहिल खण्ड है । इसी, की जन्मभूमि है । इसके --साथ देश का राजा द्रुपद था । शूरसेन देशमिले हैंश्रीकृष्ण। आज कल मथुरा, वृन्दावन, आगरा आने जाने से, श्रयवर्त नाम पड़ाहै । श + श्रायों के वर्तन - गमागम से बातें इतिहास में, प्रसिद्ध हैं ।
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१८ मनुस्मृति |
गाहोंमैर्जातकर्मचौडमौञ्जीनिबन्धनैः ।
वैजिकं गार्भिकं चैनो द्विजानामपमृज्यते ॥ २७ ॥
स्वाध्यायेन व्रतैर्होमैत्रैविद्येनेज्यया सुतैः ।
महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ॥ २८ ॥
वर्णधर्म । इस प्रकार, धर्म जानने का कारणऔर जगत् की उत्पत्ति संक्षेप से कही गई है । श्रव वर्णधर्म कहे जाते हैं ॥ जो वैदिक पुण्यकर्म हैं, उनसे द्विजातियों का गर्भाधानादि शरीरसंस्कार करना चाहिये । जो कि, दोनों लोक में, पवित्र करनेवाला है । गर्भाधान संस्कार, जातकर्म, चूडाकर्म, मौञ्जीवन्धन, इन संस्कारों से, शुक्र और गर्भसम्वन्धि दोप, द्विजातियों के निवृत्त होते हैं । वेदाध्ययन, व्रत, होम, हज्या-ब्रह्मचारिदशा में देव-पितृतर्पण, पुत्रोत्पादन, महा- यज्ञ -पञ्चमहायज्ञ, यज्ञ -ज्योतिष्टोमादि, इन सब कर्मों के करने से, यह शरीर ब्रह्मभाव पानेयोग्य होता है ॥ २५-२८ ॥ प्राङ्नाभिवर्धनात्पुंसो जातकर्म विधीयते ।: मन्त्रवत्प्राशनं चास्य हिरण्यमधुसर्पिषाम् ॥ २६ ॥
नामधेयं दशम्यान्तु द्वादश्यां वास्य कारयेत् ।
पुण्ये तिथौ मुहूर्ते वा नक्षत्रे वा गुणान्विते ॥ ३० ॥
वालक का, नाभिछेद के पूर्व, जातकर्म संस्कार करे, और अपने गृह्यसूत्रोक्त विधि के अनुसार, सुवर्ण, मधु और घृत का प्राशन ( चटाना ) करावे । फिर श्राशौच निवृत्त होजाने पर, दशवें या वारहवें दिन, शुभतिथि-मुहूर्त-नक्षत्र में, बालक का नाम- करण करे ॥ २६-३० ॥
मङ्गल्यं ब्राह्मणस्य स्यात् क्षत्रियस्य बलान्वितम् ।
वैश्यस्य धनसंयुक्तं शूद्रस्य तु जुगुप्सितम्॥ ३१ ॥
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दूसरा अध्याय । २६
शर्मवद्राह्मणस्य स्याद्राज्ञो रक्षासमन्वितम् ।
वैश्यस्य पुष्टिसंयुक्तं शूद्रस्य त्रैष्यसंयुतम् ॥ ३२ ॥
स्त्रीणां सुखोद्यमक्रूरं विस्पष्टार्थं मनोहरम् ।
मङ्गल्यं दीर्घवर्णान्तमाशीर्वादाभिधानवत् ॥ ३३ ॥
ब्राह्मण का नाम मङ्गलवाचक शब्द, क्षत्रिय का बलवाचक, वैश्य का धनयुक्त और शूद्र का दासयुक्त नाम होना चाहिये । ब्राह्मणों के नाम में शर्मा, क्षत्रियों के वर्मा, वैश्यों के भूति और शूद्रों के दास लगाना चाहिए । जैसे शिवशर्मा, रामवर्मा आदि । स्त्रियों के नाम सुखे से उच्चारण योग्य, कूर न हो, वह साफ़, सुन्दर tarai, ra में दीर्घाक्षरवाला और आशीर्वाद-शब्द से मिला हो, जैसा सरला, चिमला, यशोदा इत्यादि ॥ ३१-३३ ॥
चतुर्थे मासि कर्तव्यं शिशोर्निष्क्रमणं गृहात् ।
पष्ठेऽन्नप्राशनं मासि यद्वेष्टं मङ्गलं कुले ॥ ३४ ॥
चूडाकर्म द्विजातीनां सर्वेषामेव धर्मतः ।
प्रथमेऽदे तृतीये वा कर्तव्यं श्रुतिवोदनात् ॥ ३५ ॥
गर्भादे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनायनम् ।
गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु द्वादशे विशः ॥ ३६ ॥
चालक को चौथे महीने घर से बाहर निकाले । छठे महीने में उसको न खिलावे, या जैसी रीति अपने कुल में हो वैसा करे । चूडाकर्म पहले या तीसरे वर्ष करे यह वेद कीकरे आशा, क्षत्रिय काप्राण ॥ | यारह वालकवर्ष, औरका वैश्यगर्भवर्ष का सेबारहवेंआठवें वर्ष वर्षकरना, यज्ञोपवीत चाहिये ॥३४-३६ * श्राश्वलायनसून में लिखा है--' तृतीये वर्षे चूडाकरणं यथाअपनेकुलधर्मेगृह्यसूत्रों या ।' प्रत्येक संस्कारों का विवरण, गृह्यसूत्रों में किया गया है । अपने के अनुसार, संस्कार करना चाहिए ॥ ' 1 ‘ श्रष्टमे वर्षे ब्राहाणमुपनयेद् गर्भाष्टमे वैकादशे क्षत्रियं द्वादशे वैश्यम् आश्वलायनगृल्यसूत्र १ । २० ।
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३० मनुस्मृति ।
ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यं विप्रस्य पञ्चमे ।
राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे ॥ ३७ ॥
षोडशाद्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते । प्याद्वाविंशात्क्षत्रबन्धोराचतुर्विंशतेर्विशः ॥ ३८ ॥:.
अत ऊर्ध्वं त्रयोप्येते यथाकालमसंस्कृताः ।
सावित्रीपतिता व्रांत्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः ॥ ३६ ॥
नैतैरपूतैर्विधिवदापद्यपि हि कर्हिचित् ।
ब्रह्मान्यौनांश्च सम्बन्धानाचरेद्राह्मणः सह ॥ ४० ॥
वेदाध्ययन और उसके अर्थज्ञान से बढ़ा तेज ब्रह्मवर्चस है । उसकी इच्छावाले ब्राह्मण का पांचवें वर्ष, वलार्थी क्षत्रिय का छठें वर्ष, धनी होनाचाहनेवाले वैश्य का आठवें वर्ष यज्ञोपवीत संस्कार करे । सोलह वर्ष तक ब्राह्मण की सावित्री नहीं जाती । क्षत्रिय की बाइस वर्ष तक और वैश्य की चौबीस वर्ष तक नहीं जाती*! है । इस काल ' येअर्थात्तीनोंयह, समय उपनयनमें संस्कारसमय कीन होनेपरमावधि. सावित्रीपतित केवात्यबाद, नामक होजाते हैं और शिष्टों से निन्दित होते हैं । इन श्रशुद्ध व्रात्यों के साथ आपत्तिकाल में भी ब्राह्मण को, विद्या वा विवाह का सम्बन्ध न करना चाहिए ॥ ३७-४० ॥ •
कारववास्तानि चर्माणि ब्रह्मचारिणः ।
वसीरन्नानुपूर्वेण शाक्षौमाविकानि च ॥ ४१ ॥
म त्रिवृत्सम श्लक्ष्णा कार्या विप्रस्य मेखला ।
क्षत्रियस्य तु मौर्वीन्या वैश्यस्य शणतान्तवी ॥ ४२ ॥
लाभे तु कर्तव्यः कुशाश्मान्तक वल्वजैः ।
'त्रिवृता ग्रन्थिनैकेन त्रिभिः पञ्चभिरेव वा ॥ ४३ ॥
' षोडशाद्राह्मणस्यानतीतः काल श्राद्वाविंशात् क्षत्रियस्य याचतुर्विंशा- वैश्यस्य । थन ऊर्ध्वं पतितसावित्रीका भवन्ति । ' आश्वलायनगृहासून १ | २० |