मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 201–210

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 201–210

पृष्ठ 201

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 201 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दूसरा अध्याय । ६१

श्राचम्य प्रयतो नित्यमुभे सन्ध्ये समाहितः ।

शुचौ देशे जपञ्जप्यमुपासीत यथाविधि ॥ २२२ ॥

यदि स्त्री यथवरजः श्रेयः किंचित्समाचरेत् । 1

तत्सर्वमाचरेद्युक्तो यत्र वास्य रमेन्मनः ॥ २२३ ॥

यदि ब्रह्मचारी, इच्छा से सोता रहे और सूर्योदय होजाय या नगर में ही विना जाने सूर्यास्त होजाय, तो एक दिन उपवास और गायत्रीजप करे । यदि सोते हुए को सूर्योदय और सूर्यास्त होजाय और उसका प्रायश्चित्त न करे तो उसको महापातक लगता है । रोज़ दोनों सन्ध्या में एकाग्रमन होकर पवित्र स्थान में गायत्रीजप करे | यदि किसी धर्म का स्त्री या शूद्र श्राचरण करता हो और उसमें मन लगे तो उसीका पालन करे । या जिस में अपना चित्त प्रसन्न हो वही करे ॥ २२०-२२३ ॥

धर्मार्थावुच्यते श्रेयः कामार्थो धर्म एव च ।

अर्थ एवेह वा श्रेयस्त्रिवर्ग इति तु स्थितिः ॥ २२४ ॥

आचार्यो ब्रह्मणो मूर्त्तिः पिता मूर्त्तिः प्रजापतेः ।

माता पृथिव्या मूर्तिस्तु भ्राता स्वो मूर्तिरात्मनः ॥२२५॥

आचार्यश्च पिता चैव माता भ्राता च पूर्वजः ।

नार्तेनाप्यनमन्तव्या ब्राह्मणेन विशेषतः ॥ २२६ ॥

यं मातापितरौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम् ।

न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि ॥ २२७ ॥

कोई अर्थ और धर्म को, कोई काम, श्रर्थ को, कोई अर्थ कोइन, कोई धर्म को ही अच्छा मानते हैं ॥'पर धर्म, अर्थ और कीकामश्रीशा तीनों का श्राचरण करने से भला होता है - यह धर्मशास्त्र, माता पृ-है । श्राचार्य ब्रह्मा की मूर्ति, पिता प्रजापति की मूर्ति। इनसे दुःखी frat की मूर्ति और बड़ा भाई अपनीऔरही ब्राह्मणमूर्ति हैको तो कभी भ होने पर भी इनका अपमान न करे

पृष्ठ 202

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 202 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६२ मनुस्मृति | करना चाहिए । मनुष्यों की उत्पत्ति और पालन यादि में, माताभी, पिता जो दुःख सहते हैं उसका बदला सैकड़ों वर्ष सेवा से नहीं हो सकता ॥ २२४–२२७ ॥ ·

तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस्य च सर्वदा ।

तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्वं समाप्यते ॥ २२८ ॥

तेषां त्रयाणां शुश्रूषा परमं तप उच्यते ।

न तैरभ्यननुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत् ॥ २२६ ॥

एवहि त्रयोलोकास्त एव त्रय श्राश्रमाः ।

तएव हि त्रयो वेदास्त एवोक्तास्त्रयोऽग्नयः ॥ २३० ॥

पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माताग्निर्दक्षिणः स्मृतः ।

गुरुराहवनीयस्तु साग्नित्रेता गरीयसी ॥ २३१ ॥

त्रिष्वप्रमाद्यन्नेषु त्रीलोकान् विजयेद्गृही । + दीप्यमानः स्ववपुषा देववद्दिवि मोदते ॥ २३२ ॥

इमं लोकं मातृभक्तया पितृभक्तया तु मध्यमम् । 1

:गुरुशुश्रूषया त्वेव ब्रह्मलोकं समश्नुते ॥ २३३ ॥

सतत धर्मा यस्यैते त्रय आहताः ।

अनादृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याफलाः क्रियाः ॥ २३४ ॥

यावत्त्रयस्ते जीवेयुस्तावन्नान्यं समाचरेत् ।

तेष्वेव नित्यं शुश्रूषां कुर्यात् प्रियहिते रतः ॥ २३५ ॥

इसलिए सदा माता, पिता और श्राचार्य का प्रियं कार्य करे । इन तीनों के सन्तुष्ट होने से सब तप पूरे हो जाते हैं । इन तीनों की सेवा परम तप कहा जाता है । इनकी श्राज्ञा लेकर दूसरे धर्मों का श्राचरण करना चाहिए । ये ही तीनों लोक, पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग हैं । तीनों श्राश्रम, 'तीनों वेद और तीनों अग्नि हैं । पिता गार्हपत्यश्रग्नि, माता दक्षिणाग्नि और गुरुं श्राहवनीयाग्नि का'

पृष्ठ 203

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 203 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दूसरा अध्याय । ६३ स्वरूप है, ये तीनों अग्नि संसार में सेवा से तीनों लोक गृहस्थ जीतता बड़े हैं । इन तीनों की भक्ति- की भांति सुख पाता है । मातृभक्ति हैसे । और स्वर्ग में देवताओं मध्यलोक और गुरुभक्ति से ब्रह्मलोक कोयह लोक, पितृभक्ति से तीनों का आदर किया उसने सब धर्मों कापाता है । जिसने इन जिसने श्रनादर किया उसके सब धर्म-कर्म निष्फलपालन किया-श्रौर पिता, माता और गुरु जीवित रहे तब तक इनकी सेवाहैं । मेंजबविशेषतक लगा रहे || २२८ - २३५ ॥

तेषामनुपरोधेन पात्र्यं यद्यदाचरेत् ।

तत्तन्निवेदयेत्तेभ्यो मनोवचनकर्मभिः ॥ २३६ ॥

त्रिवेष्विति कृत्यं हि पुरुषस्य समाप्यते ।

एष धर्मः परः साक्षादुपधर्मोऽन्य उच्यते ॥ २३७ ॥

श्रदधानः शुभां विद्यामाददीतावरादपि ।

अन्त्यादपि परं धर्मं स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ॥ २३८ ॥

विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम् ।

अमित्रादपि सद्वृत्तममेध्यादपि काञ्चनम् ॥ २३६ ॥

स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्मः शौचं सुभाषितम् ।

विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वतः ॥ २४० ॥

इसके सिवा जो कर्म करे वह इनको निवेदन करदेवे । इन तीनों की सेवा से, पुरुष के कर्तव्य पूरे पड़जाते हैं । यह मुख्य धर्म है और गौणधर्म माना जाता । श्रद्धामय पुरुष उत्तम विद्याओं को होनजाति से भी सीखे और चाण्डाल से भी लोकमर्यादा सीखे और नकुल से भी सुशील स्त्री का विवाह करे । विष से भी मृत और बालक से भी हित वचन ग्रहण करले । शत्रु से सदाचार और पवित्र में से भी सुवर्ण निकाल लेवे । विद्या, धर्म, शौच, अच्छे वचन और भांति भांति की आदि सब से सीख लेवे ॥ २३६ - २४० ॥

पृष्ठ 204

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 204 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

I मनुस्मृति ।:

अब्रह्मणादध्ययनमापत्काले विधीयते ।

अनुव्रज्या व शुश्रूषा यावदध्ययनं गुरोः ॥ २४ ९ ॥

नाब्राह्मणे गुरौ शिष्यो वासमात्यन्तिकं वसेत् ।

ब्राह्मणे चाननूचाने काङ्क्षन् गतिमनुत्तमाम् ॥२४२ ॥

यदि त्वात्यन्तिकं वासं रोचयेत गुरोः कुते ।

युक्तः परिचरेदेनमाशरीरविमोचनात् ॥ २४३ ॥

आपत्तिकाल में क्षत्रिय, वैश्य से भी अध्ययन का विधान है । पर ऐसे गुरु की सेवा अध्ययनकाल तक ही करनी चाहिए । जो गुरु ब्राह्मण न हो या साङ्गवेद का ज्ञाता न हो तो मोक्षार्थी ब्रह्म- चारी जीवनभर गुरुकुलवास न करे । यदि नैष्टिक-ब्रह्मचारी जीवन भर गुरुकुलवास चाहे तो देहान्त तक सावधानी से गुरुसेवा में लगा रहे || २४१ -२४३ ॥

आसमाप्तेः शरीरस्य यस्तु शुश्रूषते गुरुम् ।

स गच्छत्यञ्जसा विप्रो ब्रह्मणः सद्म शाश्वतम् ॥ २४४ ॥

न पूर्व गुरवे किञ्चिदुपकुर्वीत धर्मवित् ।

स्नास्यंस्तु गुरुणाज्ञतः शक्त्रया गुर्वर्थमाहरेत् ॥ २४५ ॥

क्षेत्रं हिरण्यं गामश्वं छत्रोपानहमासनम् ।

धान्यं शाकं च वासांसि गुरवे प्रीतिमावहेत् ॥ २४६ ॥

जो ब्राह्मण देहान्त तक गुरु की शुश्रया करता है वह मोक्ष को पाता है । धर्मज्ञ ब्रह्मचारी, अध्ययन के पहले दक्षिणा आदि से गुरु का कुछ भी उपकार न करे । किन्तु समावर्तन के बाद, गुरु की. आज्ञा से शक्ति के अनुसार गुरुदक्षिणा देनी चाहिए । खेत, सोना, गौ, घोड़ा, छतरी, जूता, श्रासन, अन्न, शाक और वत्र अर्पण करके गुरुको प्रसन्न करे ॥ २४४– २४६ ॥

पृष्ठ 205

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 205 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दूसरा अध्याय । ६ '

आचार्ये'तु खलु प्रेते.गुरुपुत्रे गुणान्विते ।

गुरुदारे सपिण्डे वा गुरुवद्वृत्तिमाचरेत् ॥ २४७ ॥

एतेष्वविद्यमानेषु स्नानासनविहारवान् ।

प्रयुञ्जानोऽग्निशुश्रूषां साधयेद्देहमात्मनः ॥ २४८ ॥

एवं चरति यो विप्रो ब्रह्मचर्यमविश्रुतः ।

स गच्छत्युत्तमं स्थानं न चेहाजायते पुनः ॥ २४६ ॥

इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्रायां संहितायां द्वितीयोऽध्यायः ॥ गुरु के मरजाने पर, विद्वान गुरुपुत्र, गुरुस्त्री और गुरु के सहो-दर भाई आदि हों तो उनको गुरुसमान मानना चाहिये | और ये मौजूद न हो तो, गुरुस्थान में उनके अग्नि की सेवा करें और उप-सना से निज देह को ब्रह्मलय के लायक़ किया करे । इस प्रकार जो ब्राह्मण, अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करता है वह परमात्मा में लय को पाकर फिर इस लोक में जन्म नहीं पाता ॥ २४७-२४६ ॥ ; दूसरा अध्याय पूरा हुआ ।

पृष्ठ 206

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 206 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अथ तृतीयोऽध्यायः ।

षट्त्रिंशदाब्दिकं चर्यं गुरौ चैवेदिकं व्रतम् ।

तदधिकं पादिकं वा ग्रहणान्तिकमेव वा ॥ १ ॥

वेदानधीत्य वेद वा वेदं वापि यथाक्रमम् ।

तिब्रह्मचर्यो गृहस्थाश्रममावसेत् ॥ २ ॥

तं प्रतीतं स्वधर्मेण ब्रह्मदायहरं पितुः ।

स्त्रग्विणं तल्प श्रासीनमर्हयेत्प्रथमं गवा ॥ ३ ॥

गुरुणानुमतः स्नात्वा समावृत्तो यथाविधि । उत द्विजो भार्यां सवर्णालक्षणान्विताम् ॥ ४॥.

असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः ।

सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने ॥ ५ ॥

महान्त्यपि समृद्धानि गोजाविधनधान्यतः ।

स्त्रीसम्बन्धे दशैतानि कुलानि परिवर्जयेत् ॥ ६ ॥

हीनक्रियं निष्पुरुषं निश्छन्दो रोमशाशनम् ।

क्षय्यामयाव्यपस्मारिश्वित्रिकुष्ठिकुलानि च ॥ ७ ॥

तीसरा अध्याय | गुरुकुल में तीनों वेद छत्तीस वर्ष या, अठारह वर्ष या, नव वर्ष तक ब्रह्मचारी पढ़े या, जितने काल में होसके, उतने काल तक ही पढ़े और ब्रह्मचर्य का पालन करे । क्रम से तीन, दो, वा एकही वेद पढ़कर, ब्रह्मचर्य की रक्षा करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे । उस वेदन्न ब्रह्मचारी को आसन पर बैठाकर पिता वा श्राचार्य पुष्पमाला पहनाकर मधुपर्कविधि से पूजा करे । फिर गुरु की

पृष्ठ 207

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 207 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तीसरा अध्याय । ६७ श्राता से, स्नान, समावर्तन करने के बाद, अपने वर्ण की शुभ-लक्षणवाली कन्या से विवाह करे । जो माता की सपिण्ड -सात पीढ़ी में न हो और पिता के गोत्र में न हो, ऐसी कन्या द्विजों के लिये विवाह योग्य होती है । यदि गौ, बकरी, भेंड़, धन और धान्य से खूब धनी भीहो तौभी विवाहसम्बन्ध जातकर्म संस्कार - रहित, कन्यामात्र पैदा करनेवाला, वेदपाठरहित, शरीर में बहुत बाल-वाला, बवासीरवाला, क्षयरोगी, मन्दाग्नि, मृगी, श्वेतकुष्ठ, और गलितकुष्ठ इन दश कुलों में न करना चाहिये ॥ १–७ ॥

aircareful नाधिकाङ्क्षी न रोगिणीम् ।

नामिकां नातिलोम न वाचाटां न पिङ्गलाम् ॥ ८॥

नर्क्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्त्यपर्वतनामिकाम् ।

पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम् ॥ ६ ॥

श्रव्यङ्गाङ्गी सौम्यनाम्नीं हंसवारणगामिनीम् ।

तनुलोमकेशदशनां मृङ्गीमुद्वहेत्त्रियम् ॥ १० । ॥

यस्यास्तु न भवेद् भ्राता न विज्ञायेत वा पिता नोपयच्छेत तां प्राज्ञः पुत्रिकाधर्मशङ्कया ॥ ११ ॥

विवाह-नियम | जिसके देह में लाल बाल हो, अधिक श्रङ्गवाली, रोगीऔर, पीलीविना वालवाली, अधिक वालवाली, ज्यादा बोलनेवाली वाली कन्या से विवाह न करे । नक्षत्र, वृक्ष, नदी, म्लेच्छ, भयदायक नामवाली पर्वत, पक्षी, साँप और शुद्ध नामवालीश्रङ्गवालीऔर, सुन्दर नामवाली, के साथ विवाह न करे । सुन्दर पतले रोम, बाल और दांत. हंस और हाथीके समान चालवालीके साथ, विवाह करना चाहिये । वाली, कोमल शरीरवाली कन्या का पता मालुम न हो, ऐसीजिसका भाई न हो, जिसके पिता डरकर विवाह न करना कन्या के साथ ' पुत्रिकाधर्म ' से चाहिये ॥ ८-११ ॥

पृष्ठ 208

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 208 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६८ मनुस्मृति ।

सवर्णाग्रे द्विजातीनां प्रशस्ता दारकर्मणि ।

कामतस्तु प्रवृत्तानामिमाः स्युः क्रमशो वराः ॥ १२ ॥

शूद्रैव भार्या शूद्रस्य सा च स्वा च विशः स्मृते ।

तेच स्वा चैव राज्ञश्व ताश्च स्वा चाग्रजन्मनः ॥ १३ ॥

न ब्राह्मणक्षत्रिययोरापद्यपि हि तिष्ठतोः ।

कस्मिंश्चिदपि वृत्तान्ते शूद्रा भार्योपदिश्यते ॥ १४ ॥

हीनजातिस्त्रियं मोहादुद्वहन्तो द्विजातयः ।

कुलान्येव नयन्त्याशु ससन्तानानि शूद्रताम् ॥ १५ ॥

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को अपने वर्ग की कन्या से विवाह श्रेष्ठ है । पर कामवश होकर जो विवाह होता है वह अधम विवाह है । शूद्र पुरुष शूद्र कन्या के साथ, वैश्य -वैश्य और शूद्र कन्या के साथ, क्षत्रिय-क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कन्या के साथ, ब्राह्मण- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कन्या के साथ विवाह कर सकता है-यह अधम विवाह है । ब्राह्मण और क्षत्रिय को, आपत्तिकाल में भी शुद्र कन्या से विवाह न करना चाहिये । जो द्विजाति मोह- वश हीनजाति की कन्या से विवाह करता है वह अपने कुल और परिवार कोही शूद्र करदेता है ॥ १२-१५ ॥

शूद्रावेदी पतत्यत्रेरुतथ्यतनयस्य च ।

शौनकस्य सुतोत्पत्या तदपत्यतया भृगोः ॥ १६ ॥

शूद्रां शयनमारोप्य ब्राह्मणो यात्यधोगतिम् ।

जनयित्वा सुतं तस्यां ब्राह्मण्यादेव हीयते ॥ १७ ॥

दैवपित्र्यातिथेयानि तत्प्रधानानि यस्य तु ।

नाश्नन्ति पितृदेवास्तन्न च स्वर्गं स गच्छति॥ १८ ॥

शूद्र कन्या के साथ विवाह करनेवाला ब्राह्मण पतित होजाता है । यह अत्रि और उतथ्य के पुत्र गौतमऋषि का मत है । शौनक C

पृष्ठ 209

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 209 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तीसरा अध्याय । ६६. ऋषि के मत से क्षत्रिय, शुद्रकन्या में सन्तान पैदा करने होता है । और भृगुऋषि के मत से, शूद्रकन्या से विवाह से पतित वैश्यसंयोगके सेपौत्रपतितहोजानेहोतापर हैवहऔरपतितउससेहोता हैसन्तान। ब्राह्मणपैदा, शूद्रकरनेवालेकरनेस्त्री के ब्राह्मणत्व से हीन होजाता है । शूद्रास्त्री की प्रधानता में देवसे, पितर श्राद्ध में अन्न का ग्रहण नहीं करते । और वह पुरुष स्वर्गगामी नहीं होता ॥ १६-१८ ॥ वृषलीफेनपीतस्य निःश्वासोपहतस्य च । तस्यां चैव प्रसूतस्य निष्कृतिर्न विधीयते ॥ १६ ॥:

चतुर्णामपि वर्णानां प्रेत्य चेह हिताहितान् ।

अष्टाविमान् समासेन स्त्रीविवाहान्निबोधत ॥ २० ॥

ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः ।

गान्धर्वो राक्षसचैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥ २१ ॥

यो यस्य धम्य वर्णस्य गुणदोषौ च यस्य यौ ।

तहः सर्वं प्रवक्ष्यामि प्रसवे च गुणागुणान् ॥ २२ ॥

शूद्रा का अधर चुम्बन से और उसकी सांस लगने से, उस पुरुष कीऔर उसके सन्तान की पापशुद्धि का कोई उपाय नहीं । चारों वर्णों का लोक और परलोक में हित श्रहित करनेवाला, या प्रकार का विवाह होता है -ब्राह्म, दैव, श्रार्प, प्राजापत्य, , है पैदाजोसन्तानोंaareिश्रसुरधर्मानुकूल,, गान्धर्व जोराक्षसगुण,औरदोष पैशाचजिसमें है। जिसऔर उनसेवर्णका1 जोहैं उनको कहता हूं ॥ १६-२२ ॥

षडानुपूर्व्या विप्रस्य क्षत्रस्य चतुरोऽवरान् ।

विट्शूद्रयोस्तु तानेव. विद्याद्धर्म्यान राक्षसान् ॥ २३ ॥

चतुरो ब्राह्मणस्याद्यान् प्रशस्तान् कवयो विदुः ।

राक्षसं क्षत्रियस्यैकमासुरं वैश्यशूद्रयोः ॥ २४ ॥

पृष्ठ 210

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 210 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७० मनुस्मृति ।

पञ्चानां तु यो धर्म्या द्वावधस्यौं स्मृताविह ।

पैशाचश्चासुरश्चैव न कर्तव्यौ कदाचन ॥ २५ ॥

पृथक् पृथग्वा मिनौ वा विवाहौ पूर्वचोदितौ ।

गान्धर्वो राक्षसचैव धर्यौ क्षत्रस्य तौ स्मृतौ ॥ २६ ॥

ब्राह्मण को क्रम से पहले के छः विवाह धर्म हैं अन्त के चार क्षत्रिय वैश्य और शूद्र को धर्म हैं पर राक्षस विवाह किसी के लिए अच्छा नहीं है । ब्राह्मण के लिए पहले चार विवाह श्रेष्ठ हैं । क्षत्रिय के लिए एक राक्षस, वैश्य और शूद्र के लिए श्रासुर विवाह श्रेष्ठ माना गया है । पांच विवाहों में तीन-प्रजापत्य, गान्धर्व और, राक्ष, धर्म कहा है । और दो-पैशाच और नासुर अधर्म हैं । इस लिए इन दोनों को न करना चाहिए । पहले कहे विवाह अलग अलग या मिले हुए गान्धर्व और राक्षस क्षत्रियों के धर्म- सम्बन्धी हैं ॥ २३-२६ ॥

आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयम् ।

आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तितः ॥ २७ ॥

यज्ञे तु वितते सम्यगृत्विजे कर्म कुर्वते ।

अलङ्कृत्य सुतादानं दैवं धर्मं प्रचक्षते ॥ २८ ॥

एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मतः ।

कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्मः स उच्यते ॥ २६ ॥

वेदज्ञ और सुशील वर को बुलाकर उसका पूजन सत्कार करके कन्यादान को ब्राह्म विवाह कहते हैं । बड़े यज्ञ में ऋत्विक ब्राह्मण को, वस्त्र आभूषण से सुशोभित कन्या का दान ' दैव विवाह ' कहाजाता है । एक एक वा दो दो गौ, वैल यज्ञ के लिए, घर से लेकर, जो कन्यादान होताहै उसको श्रापविवाह कहते हैं ॥२७-२६॥

सहेमौ चरतां धर्ममिति वाचाऽनुमान्य च ।

कन्याप्रदानमभ्यर्च्य प्राजापत्यो विधिः स्मृतः ॥३० ॥