मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 311–320

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 311–320

पृष्ठ 311

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पांचवां अध्याय । १७१

वैजिकादभिसंवन्धादनुरुन्ध्यादघं त्र्यहम् ॥ ६३ ॥

अहा चैकेन रात्र्या च त्रिरात्रैरेव च त्रिभिः ।

स्पृशो विशुध्यन्ति त्र्यहादुदकदायिनः ॥ ६४ ॥

जैसा मरने पर सपिएड को यह प्राशौच कहा है, वैसा ही पुत्र श्रादि उत्पन्न होने में भी अच्छी शुद्धता की इच्छा करनेवालों को आशीच होताहै । मरण श्राशीच सब सपिण्डों को और जन्मा-' शौ माता पिता को ही होता है । उसमें भी पिता स्नान करने से शुद्ध होता है । माता को ही सूतक रहता है । पुरुष जानकर वीर्य- पात करे तो स्नान से शुद्ध होता है । और दूसरी स्त्री में संतान पैदा करने पर उसको तीन दिन तक प्राशौच रहता है । शव ( मुर्दा ) को छूनेवाले दश दिन में शुद्ध होते हैं और समानो- अर्थात् सात पीढ़ी से ऊपर के पुरुष तीनदिन में शुद्ध होते हैं ॥ ६६-६४ ॥

गुरोः प्रेतस्य शिष्यस्तु पितृमेधं समाचरन् ।

प्रेतहारैः समं तत्र दशरात्रेण शुध्यति ॥ ६५ ॥

रात्रिभिर्मासतुल्याभिर्गर्भस्नाने विशुध्यति ।

रजस्युपरते साध्वी स्नानेन स्त्री रजस्वला ॥ ६६ ॥

नृणामकृतचूडानां विशुद्धिनैशिकी स्मृता ।

निर्वृचचूडकानां तु त्रिरात्राच्छुद्धिरिष्यते ॥ ६७ ॥

ऊनद्विवार्षिकं प्रेतं निदध्युर्वान्धवा बहिः ।

अलंकृत्य शुचौ भूमावस्थिसंचयनादृते ॥ ६८ ॥

के शिष्य, अपने गुरु की अन्त्येष्टि करता हुआ,काशवगर्भपातउठानेहोवालोंउतनी साथ दश दिन शुद्ध होता है । जितने मास स्त्री रजवंद होनेपर ही रात्रि में स्त्री शुद्ध होती है । और रजस्वला चूडाकर्म नहीं हुआ स्नान करके शुद्ध होती है । जिन बालकों का

पृष्ठ 312

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१७२ मनुस्मृति | उनके मरने से एक दिन में और चूड़ा कर्म होजाने पर तीन दिन में, सपिण्ड पुरुष की शुद्धि होती है । दो वर्ष से कम उमर का वालक मर जाय तो उसको पुष्पमाला, चंदन श्रादि से भूपित करके, नगर के बाहर पवित्र भूमि में गाड़ देवे और उसका अस्थि संचयन न करे ॥ ६५-६८ ॥

नास्य कार्योग्निसंस्कारो न च कार्योदकक्रिया ।

अरण्ये काष्ठवत्त्यक्त्वा क्षयेयुस्त्र्यहमेव च ॥ ६६ ॥

नात्रिवर्षस्य कर्तव्या बान्धवैरुदकक्रिया ।

जातदन्तस्य वा कुर्युर्नानि वापि कृते सति ॥ ७० ॥

सब्रह्मचारिण्ये काहमतीते क्षपणं स्मृतम् ।

जन्मन्येोदकानां तु त्रिरात्राच्छुद्धिरिष्यते ॥ ७१ ॥

और इस बालक का अग्नि संस्कार, जलदान आदि कुछ न करना । सिर्फ़ जंगल में, काठ की भांति गढ़े में, छोड़ कर तीन दिन सूतक मानना चाहिए । तीन वर्ष से कम अवस्था का बालक होने पर, सपिण्डों को जलदान न करना चाहिए । अथवा, दांत निकले - हों, नामकरण होगया हो तो जलदान कर भी सकते हैं । सहाध्यायी के मरने पर एक दिन श्रशौच होता है और समानोदक के यहां सन्तति होने पर तीन दिन में शुद्धि होती है ॥ ६६-७१ ॥

स्त्रीणामसंस्कृतानां तु त्र्यहाच्क्रुध्यन्ति वान्धवाः ।

यथोक्तेनैव कल्पेन शुध्यन्ति तुःसनाभयः ॥ ७२ ॥

अक्षारलवणान्नाः स्युर्निमज्जेयुश्च ते त्र्यहम् ।

मांसाशनं च नाश्नीयुः शयीरंश्च पृथक् क्षितौ ॥ ७३ ॥

'संनिधावेष वैकल्पः शावाशौचस्य कीर्तितः ।

असन्निधावयं ज्ञेयो विधिः सम्बन्धिबान्धवैः" ॥ ७४ ॥

पृष्ठ 313

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पांचवां अध्याय । १७३

विगतं तु विदेशस्थं शृणुयाद्यो ह्यनिर्देशम् ।

यच्छेषं दशरात्रस्य तावदेवाशुचिर्भवेत् ॥ ७५ ॥ ॥

जिस कन्या का विवाह न भया हो; सगाई भई हो, उसके निधन मैं ससुराल वाले और पिटकुल के तीन रात में शुद्ध होते हैं । मृत्यु सूतक वाले को क्षार, श्रलोना भोजन करना चाहिए । तीन दिन तक नदी में स्नान करे और मांस भक्षण न करे, भूमि में लग सोवे । जो सपिण्ड और समानोदक पुरुष, मरणकाल में समीप -हों उनके लिए यह श्राशौचविधि कही गई है । और जो पास न 'हों उनके लिए श्रागे कही विधि जाननी चाहिए । विदेश में मरने का हाल दश दिन के भीतर जाने तो जितने दिन बाकी हो उतने ही दिन सूतक होता है ॥ ७२–७५ ॥.

प्रतिक्रान्ते दशाहे तु त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ।

संवत्सरे व्यतीते तु स्पृष्ट्टै वापो विशुध्यति॥ ७६ ॥

निर्दशं ज्ञातिमरणं श्रुत्वा पुत्रस्य जन्म च । सवासा जलमाप्लुत्य शुद्धो भवति मानवः ॥ ७७। ॥ - बाले देशान्तरस्थे च पृथक् पिण्डे च संस्थिते सर्वासा जलमाप्नुत्य सद्य एव विशुध्यति ॥ ७८ ॥

अन्तर्दशाहे स्यातां चेत्पुनर्भरणजन्मनी । ॥ ७६

तावत्स्यादशुचिर्विप्रो यावत्तत्स्यादनिर्दशम्सति ।

त्रिरात्रमाहुराशौचमाचायें संस्थिते स्थितिः ॥८० ॥

तस्य पुत्रे च पत्न्यां च दिवारात्रमिति दश दिन बीतने पर मृत्यु स्नानमात्रसुने तो तीनदिनसेही शुद्धिका होजातीशौच होताहै । है और एक वर्ष बीतने पर

पृष्ठ 314

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१७४ मनुस्मृति | अपने समानोदक का मरण और पुत्र का जन्म सुनकर सचैल स्नान से शुद्धि होती । सगोत्र बालक का और श्रसपिण्ड मामा, साला आदि का विदेश में मृत्यु सुनकर, सचैल स्नान से शुद्धि होती है । यदि दशाह के भीतर फिर कोई पैदा हो या मरे, तो ब्राह्मण दश दिन पूरे होने तक शुद्ध न होगा | आचार्य के मरने में, शिष्य को तीन दिन आशौच रहता है और श्राचार्य के पुत्र या स्त्री के मरण में एक दिन का होता है ॥ ७६-८० ॥

श्रोत्रिये तूपसंपन्ने त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ।

मातुले पक्षिणीं रात्रिं शिष्यग्बिान्धवेषु च ॥ ८१ ॥

प्रेते राजनि सज्योतिर्यस्य स्याद्विषये स्थितः । अश्रोत्रिये त्वहः कृत्स्नमनूचाने तथा गुरौ ॥ ८२ ॥ - शुध्येद्विप्रो दशाहेन द्वादशाहेन भूमिपः ।

वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुध्यति॥ ८३ ॥

श्रोत्रिय की मृत्यु में तीन दिन, मामा, शिष्य, ऋत्विक और चान्धवों की मृत्यु मैं दिन -रात श्राशौच रहता है । जिस राजा के देश में निवास हो उसकी मृत्यु, दिन में होने पर सूर्यास्त तक और रात में रातभर, सूतक रहता है । अश्रोत्रिय ब्राह्मण, वेदपाठी और गुरु के मरण में, एक दिन का आशीच होता है । ब्राह्मण दश दिन में, क्षत्रिय वारह दिन में, वैश्य पंद्रह दिन में और शूद्र एक मास" " " शुद्ध होता है ॥ ८१-८३ ॥

न वर्धयेदघाहानि प्रत्यूहेन्नाग्निषु क्रियाः ।

नच तत्कर्म कुर्वाणः सनाभ्योऽप्यशुचिर्भवेत् ॥ ८४ ॥

दिवाकीर्तिमुदक्यां च पतितं सूतिकां तथा ।

शवं तत्स्पृष्टिनं चैव स्पृष्ट्वा स्नानेन शुध्यति ॥ ८५ ॥

पृष्ठ 315

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पांचवां अध्याय | १७५

श्राचम्य प्रयतो नित्यं जपेदशुचिदर्शने ।

सौरान्मन्त्रान्यथोत्साहं पावमानीश्च शक्तितः ॥

नारं स्पृष्ट्वास्थि सस्नेहं स्नात्वा विप्रो विशुध्यति८६। ॥

श्राचम्यैव तु निःस्नेहं गामालभ्यार्कमीक्ष्य वा॥ ८७॥

प्रादिष्टी नोदकं कुर्यादाव्रतस्य समापनात् ।

समाते तदकं कृत्वा त्रिरात्रेणैव शुध्यति ॥ ८८ ॥

श्रग्निहोत्री को सूतक के दिन चढ़ाकर, अग्निहोत्र में विघ्न न करना चाहिए । श्रग्निहोत्री सपिण्ड होने पर भी सुतकी नहीं होता । चाण्डाल, रजस्वला, पतित, प्रसूता, मुरदा और मुरदे को छूने पर स्नान से शुद्धि होती है । अपवित्र वस्तु का दर्शन होने पर, पवित्र होकर श्राचमनपूर्वक सौर मन्त्र ' उदुत्यं जात- वेदसम्-' और पवमान मन्त्रों का जप करना चाहिए । मनुष्य की गीली हड्डी छूने पर स्नान करके और सूखी हो तो आचमन से विशुद्ध होता है । श्रथवा गौ का स्पर्श या सूर्यदर्शन से पवि- त्रता होती है । ब्रह्मचारी व्रत की समाप्ति तक जलदान न करे । उसके बाद जलदान करें और तीन रात में हो शुद्ध भी हो जाता है ॥ ८४ ॥

वृथा संकरजातानां प्रव्रज्यासु च तिष्ठताम् । -आत्मनस्त्यागिनां चैव निवर्तेतोदकक्रिया ॥ ८६ ॥

पाखण्डमाश्रितानां च चरन्तीनां च कामतः ।

गर्भभर्तृगृह चैव सुरापीनां च योषिताम् ॥ ६०॥

प्राचार्य स्वमुपाध्यायं पितरं मातरं गुरुम् ।

निर्हृत्य तु ती प्रेतान्नव्रतेन वियुज्यते ॥॥ ६१ ॥

वर्णसंकर, संन्यासी और श्रात्मघाती को जलदान की ज़रूरत

पृष्ठ 316

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१७६ मनुस्मृति | नहीं है । पाखण्डी, दुराचारी स्त्री, गर्भ और पति का घात करने-वाली और मद्य पीनेवाली स्त्री को जलदान न करना । अपने श्रा चार्य, उपाध्याय, पिता, माता और गुरु के शव को उठाने और दाह करने से, ब्रह्मचारी अपने व्रत से पतित नहीं होता है । ८६-६१॥

दक्षिणेन मृतं शूद्रं पुरद्वारेण निर्हरेत् ।

पश्चिमोत्तरपूर्वैस्तु यथायोगं द्विजन्मनः ॥ ६२ ॥

न राज्ञामघदोषोऽस्ति व्रतिनां न च सत्रिणाम् ।

ऐन्द्रं स्थानमुपासीना ब्रह्मभूता हिते सदा ॥ ६३

राज्ञो माहात्मिके स्थाने सद्यः शौचं विधीयते ।

प्रजानां परिरक्षार्थमासनञ्चात्र कारणम् ॥ ६४ ॥

डिम्बाहवहतानां च विद्युता पार्थिवेन च ।

गोब्राह्मणस्य चैवार्थे यस्य चेच्छति · पार्थिवः ॥ ६५ ॥

शूद्र के मृत शरीर को नगर के दक्षिण द्वार से और ब्राह्मण- क्षत्रिय -वैश्य के शव को क्रम से पश्चिम, उत्तर और पूर्व द्वार से श्मशान में लेजाना चाहिए । राजा, ब्रह्मचर्य व्रत करनेवाला और यज्ञ करनेवाला सूतकी नहीं होता । क्योंकि-राजा इन्द्र के पद पर है । ब्रह्मचारी और याज्ञिक सदा ब्रह्मरूप ही है । जो पुरुष राजा के यहां श्रेष्ठ स्थान पर नियुक्त होता है । वह कार्य करने के निमित्त तुरंत ही श्राशौच से मुक्त होता है । क्योंकि प्रजारक्षा के लिए न्यायासन पर बैठना ही इसमें कारण है । विना राजा की लड़ाई में, विजली से, राजाज्ञा फांसीसे और गौ-ब्राह्मण के रक्षा'के लिए मरे हुए का और जिसको राजा अपने कार्य के लिए चाहे, उसकी तत्काल शुद्धि होती है ॥ ६२-६५ ॥

सोमाग्न्यर्कानिलेन्द्राणां वित्ताप्पत्योर्यमस्य च ।

. अष्टानां लोकपालानां वपुर्धारयते नृपः ॥ ६६ ॥

पृष्ठ 317

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पांचवां अध्याय । १७७

लोकेशाधिष्ठितो राजा नास्याशौचं विधीयते ।

शौचाशोचं हि मर्त्यानां लोकेशप्रभवाप्ययम्॥ ६७ ॥

उद्यतैराहवे शस्त्रैः क्षत्रधर्महतस्य च ।

सद्यः सन्तिष्ठते यज्ञस्तथाशौचमिति स्थितिः ॥ ६८ ॥

विप्रः शुध्यत्यपः स्पृष्ट्वा क्षत्रियो वाहनायुधम् ।

वैश्यः प्रतोई रश्मीन्वा यष्टिं शूद्रः कृतक्रियः ॥६६॥

चन्द्र अग्नि, सूर्य, वायु, इन्द्र, कुबेर, वरुण और यस इन आठ -शो के शरीर को राजा धारण करता है । लोकपालों का राजा के शरीर में निवास होने से उसको सुतक नहीं लगता । श्रा शौच के लिए है । राजा तो लोकपालों के अंश सेपैसाहै । जो राजा शस्त्रों से धर्मयुद्ध करके मरता है उसकोहै । काफल मिलता है और श्राशीच तुरंत दूर हो जाता,,, त्रि मैं व्राह्मण जल का क्षत्रिय शत्र वाहनका स्पर्शकावैश्यों का दण्डा या बागडोर का और शूद्रशाशौचान्तलकड़ी में जरूर कृनाकर चाहिएहोता॥ ६६-६६है । प्रर्थात्॥ पदार्थों को एतद्वोऽभिहितं शौचं सपिण्डेषु द्विजोत्तमाः॥ १००। ॥

सपिण्डेषु सर्वेषु प्रेतशुद्धिं निबोधत ।

सपिण्डं द्विजं प्रेतं विप्रो निर्हृत्य बन्धुवत्॥ १०१ ॥

विशुध्यति त्रिरात्रेण मातुरासांश्च बान्धवान्। यद्यन्नमत्ति तेषां तु दशाहेनैव शुध्यति अनदन्नन्नमहैव न चेत्तस्मिन् गृहे वसेत्च॥ । १०२ ॥ अनुगम्येच्या प्रेतं ज्ञातिमज्ञातिमेव २३

पृष्ठ 318

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१७८ मनुस्मृति ।

स्नात्वा सचैलः स्पृष्ट्वाग्नि घृतंप्राश्य विशुध्यति॥ १०३ ॥

न विप्रं स्वेषु तिष्ठत्सु मृते शूद्रेण नाययेत् ।

अस्वर्ग्य ह्याहुतिः सा स्याच्छूद्रसंस्पर्शदूषिता॥ १०४ ॥

हे द्विजो! यह सपिण्डों की मरणाशौच विधि कही गई हैं । अब श्रसपिण्डों की विधि सुनो । असपिण्ड द्विज की मृत्यु होने पर, उसको बन्धु के तरह उठाना, दाह देना और माता के समीप के 'भाई बहन श्रादि का भी उसी तरह कर्म करना । इसमें तीन दिन का आशौच होता है । जो दाहादि करनेवाला मृतक के सपिण्डों का न खाता हो तो दश दिन में, और न खाता हो न उसके माही में रहता हो तो एक दिन में, शुद्ध हो जाता है । अपनी जाति, या दूसरी जाति के शव का अनुगमन करने से, सचैल स्नान, अग्निस्पर्श और घृत खाने से शुद्धि होती है । सजातियों के रहते शूद्रों से, ब्राह्मण शव का वाहन कभी न कराना । क्योंकि शूद्र स्पर्श से दूषित शव की आहुति, उसको स्वर्गदायक नहीं होती ॥ १००-१०४ ॥

ज्ञानं तपोऽग्निराहारो मृन्मनोवार्युपाञ्जनम् ।

वायुः कर्मार्ककालौ च शुद्धेः कर्तृणि देहिनाम् ॥ १०५॥

सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम् ।

योऽर्थे शुचिर्हि सशुचिर्नमृद्वारिशुचिः शुचिः ॥१०६॥

क्षान्त्या शुध्यन्ति विद्वांतो दानेनाकार्यकारिणः ।

प्रच्छन्नपापा जप्येन तपसा वेदवित्तमाः ॥ १०७ ॥

ज्ञान, तप, अग्नि, भोजन, मिट्टी, मन, जल, लीपना, वायु, कर्म, सूर्य और काल ये सब प्राणियों की शुद्धि करनेवाले हैं । सब शुद्धियों में न्याय से मिले धन की शुद्धि श्रेष्ठ कही है ।

पृष्ठ 319

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पांचवां अध्याय । १७६ पुरुष, न्याय से मिले धन से शुद्ध हैं वे ही शुद्ध हैं । केवल मिट्टी जल से शुद्ध होनेवाले पवित्र नहीं माने जाते । विद्वान् क्षमा से, यस श्रादि न करनेवाले दान से, पापी जप से और वेदविशारद तप से पवित्र होते हैं ॥ १०५-१०७ ॥

मृत्तोयैः शुध्यते शोध्यं नदी वेगेन शुध्यति ।

रजसा स्त्री मनोदुष्टा संन्यासेन द्विजोत्तमः ॥ १०८ ॥

अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति ।

विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति॥ १०६॥

एप शौचस्यवः प्रोक्तः शारीरस्य विनिर्णयः ।

नानाविधानां द्रव्याणां शुद्धेः शृणुत निर्णयम्॥ ११० ॥

अपवित्र पदार्थ मिट्टी और जल से शुद्ध होते हैं । नदी वेग से शुद्ध होती है । मन से दूषित स्त्री रजस्वला होने से शुद्ध होती है।. श्री ब्राह्मण त्याग से शुद्ध होता है । जल से शरीर शुद्ध होते हैं । मन सत्यभाषण से शुद्ध होता है । इस प्रकार शरीरशुद्धि का निर्णय कहा है य द्रव्य शुद्धि का निर्णय कहेंगे ॥ १०८-११० ॥

तैजसानां मणीनां च सर्वस्याश्ममयस्य च ।

भस्मनाद्भिर्मृदाचैव शुद्धिरुक्ता मनीषिभिः ॥ १११ ॥

निर्लेपं काञ्चनं भाण्डमद्भिरेव विशुध्यति ।

अब्जमश्ममयं चैव राजतं चानुपस्कृतम् ॥ ११२ ॥

अपामग्नेश्च संयोगाद्वैमं रौप्यं च निर्बभौ ।

तस्मात्तयोः स्वयोन्यैव निर्णेको गुणवत्तरः ॥ ११३ ॥

ताम्रायःकांस्यरेत्यानां त्रपुणः सीसकस्य च ।: ॥

शौचे यथार्ह कर्तव्यं क्षाराम्लोदकवारिभिः ॥ ११४

पृष्ठ 320

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 320 का मूल पृष्ठ
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१८० मनुस्मृति |

द्रव्याणां चैव सर्वेषां शुद्धिराप्लवनं स्मृतम् ।

प्रोक्षणं संहतानां च दारवाणां च तक्षणम् ॥ ११५ ॥

पदार्थ-शुद्धि | सुवर्ण श्रादि तेजस पदार्थ, मणि और सब पत्थर के पदार्थों की शुद्धि राख, जल और मिट्टी से होती है । जिस में किसी भांति का लेप न हो ऐसा सोना का पात्र,शंख, पत्थर औरचांदी का पात्र जल से ही शुद्ध होता है । सोना और चांदी अग्नि और जल के संयोग से उत्पन्नहुए हैं इसलिये उनको पवित्रता अपनी योनि से ही उत्तम होती है । तांबा, लोहा, कांल, पीतल, जस्ता और सीसा का पात्र, खार-खटाई और जल इनमें जिससे होलके उसी से शुद्ध कर लेना, चाहिए । घी, मधु आदि को पिघलाकर छान लेने ले, जमे हुए का प्रोक्षण से और लकड़ी के पात्रको छीलने से,गुद्धिहोती है१११-११५श

मार्जनं यज्ञपात्राणां पाणिना यज्ञकर्मणि ।

चमसानां ग्रहाणां च शुद्धिःप्रक्षालनेन तु ॥ ११६ ॥

चरूणां स्रुक्खुवाणां च शुद्धिरुष्णेन वारिणा ।

स्फ्यशूर्पशकटानां च मुसलोलूखलस्य च ॥ ११७

अद्भिस्तु प्रोक्षणं शौचं बहूनां धान्यवाससाम् । ॥

प्रक्षालनेन त्वल्पांनामद्भिः शौचं विधीयते ॥ ११८ ॥

चैलचर्मणां शुद्धिर्वेदलानां तथैव च । " शाकमूलफलानां च धान्यवच्छुद्धिरिष्यते ॥ ११६ ॥ "" कौशेयाविकयोंरूपैः कुतपानांमरिष्टकैः । श्रीफलैरंशुपहानां क्षौमाणां गौरसर्षपैः ॥ १२० ॥

क्षौमवच्छ्वशृङ्गाणामस्थिदन्तमयस्य च ।

शुद्धिर्विज्ञानता कार्या गोमूत्रेणोदकेन वा ॥ १२१ ॥