मनुस्मृति १ हरगोविन्द शास्त्री — पृष्ठ 11–20

मनुस्मृति १ हरगोविन्द शास्त्री · पृष्ठ 11–20

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भूमिका अखिल हेय प्रत्यनीक कल्याणैकतान स्वेतर समस्त वस्तु - विलक्षण भगवान् श्री श्रीमन्नारायण के सङ्कल्पमात्र से जगत्पिता ब्रह्मा की उत्पत्ति के पश्चात् भगवान् वेद का अवतार हुआ । ब्रह्मा जी ने ही प्रकृत स्थावर - जङ्गमात्मक जगत् की सृष्टि प्रारम्भ की, जिसके कारण वे जगत्पिता की उपाधि से विभूषित हुए । सृष्टिक्रम में ब्रह्मा ने चौरासी लाख योनियों से युक्त एक विशाल संसार का निर्माण किया । मान्यतानुसार इन्हीं योनियों में नित्य आत्मा कर्त्तव्याकर्त्तव्यरूप फलाफल के कारण भटकती रहती है, जिससे मुक्ति हेतु जन्म - जन्मान्तर तक कठोर तपस्या करने के उपरान्त सर्वोत्तम मानव योनि में प्रवेश कर अवाप्त पञ्चभूतात्मक शरीर के माध्यम से इस प्रपञ्चात्मक संसार से उसका विमुक्त होना सम्भव हो पाता है; परन्तु मानव शरीर प्राप्त कर संसार में आते ही सांसारिक चकाचौंध के वशीभूत होकर मनुष्य- शरीरधारी आत्मा अपने कर्त्तव्य से च्युत हो जाता है । जिस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु कठोर तप के द्वारा वह अमर आत्मा मानव शरीर अवाप्त करती है, वह उद्देश्य ही विस्मृत हो जाता है । परिणामतः जन्म से मृत्युपर्यन्त जीवात्मा को करुण - क्रन्दन करते हुए चौरासी लाख योनियों में पुनः भटकना पड़ता है । कर्म चक्र के बन्धन में अनादि काल से भटकती जीवात्मा के दुःख से द्रवित होकर उसके उद्धार हेतु ऋषियों ने धर्मरूप कर्त्तव्यपथ को पारिभाषित करने के लिए वेद को अभिव्यक्त किया; किन्तु यतः उन वेदों के द्वारा सामान्य जन का लाभान्वित हो पाना सर्वथा असम्भव था; अतः मानवी सृष्टिकर्त्ता अन्तः करुणाप्रवण भगवान् मनु ने अपने वंशजों के उद्धार हेतु वैदिक ज्ञान को सरल रीति से निरूपित करते हुये जीवात्मा के योग्य कर्तव्याकर्तव्य कर्म का स्मृति ( धर्म - शास्त्र ) के रूप में वर्णन किया । वैदिक ज्ञान ( श्रुति ) का ही स्मरण किये जाने के कारण ही ऋषि - प्रणीत धर्मशास्त्र ‘ स्मृति ' अभिधान से अभिहित हुये; जैसाकि मनुस्मृति में कहा भी गया है-श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः । ते सर्वार्थेष्वमीमांस्ये ताभ्यां धर्मो हि निर्बभौ ॥ ( म ० स्मृ०-२.१० ) धर्म का स्वरूप धारणार्थक ‘ धृ ' धातु से निष्पन्न ' धर्म ' शब्द का अर्थ धारण करना, पालन करना तथा आलम्बन करना होता है । धर्म की परिभाषा समय तथा परिस्थितियों के अनुसार बराबर परिवर्तित होती रहती है । कभी धर्म का व्यापक अर्थ तथा कभी रूढ़ अर्थ, कभी

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८ मनुस्मृतिः संज्ञा के स्वरूप में तो कभी विशेषण के रूप में हमारे सामने उपस्थित होता है । महात्मा बुद्ध द्वारा प्रचलित बौद्ध धर्म रूढ़ होकर धर्मचक्र के रूप में आज भी अपनी पहचान बनाए हुए है । ऋग्वेद में १.२२.१८, ५.२६.६, ७.४३.२४ आदि स्थानों पर धर्म शब्द धार्मिक क्रिया - कलापों ( संस्कारों ) में प्रयुक्त हुआ है; किन्तु छान्दोग्य उपनिषदादि में धर्म शब्द का प्रयोग व्यापक सन्दर्भ में किया गया है । वहाँ पर इसका प्रयोग गृहस्थ, तापस तथा ब्रह्मचारी के धर्म - निर्देश करने हेतु किया गया है । तैत्तिरीयोपनिषद् में विशेषतया विद्यार्थियों के लिए आचार धर्म के पालन का सङ्केत मिलता है — ‘ सत्यं वद धर्मं चर ' ( तै ० १.११ ) । इसी प्रकार भगवती गीता भी कहती है — ' स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ' ( ३.३५ ) । साथ ही गीता में ही आगे अट्ठारहवें अध्याय में ‘ सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ' आदि के द्वारा कथित धर्म शब्द का ही आनुपूर्वी रूप धर्मशास्त्रों में वर्णित दिखाई देता है । मनुस्मृति का तो प्रारम्भ ही ' धर्म ' शब्द से किया गया है । अब यहाँ प्रश्न यह उपस्थित होता है कि मानव अपने जीवन में कौन - सा कार्य धर्म समझकर करे तथा किस कार्य का अधर्म समझकर परित्याग कर दे? इसके उत्तर में मीमांसकों का कहना है कि ' वेदप्रतिपाद्यः प्रयोजनवदर्थो धर्मः ' अर्थात् वेद - विहित प्रयोजन सापेक्ष अर्थकारी कार्य धर्म है । भगवान् मनु ने श्रुति स्मृति द्वारा प्रतिपादित वचनों, सज्जनों द्वारा चरित आचार तथा मत्सररहित मन की प्रसन्नता को धर्म कहा है-वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् । आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥ ( मनु०-२.६ ) धर्म - विवेचन के प्रसङ्ग में मनु द्वारा धर्म के चार लक्षण निर्देशित किये गये हैं-वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥ ( मनु०-२.१२ ) स्मृतियों का आवश्यकत्व वेद समस्त ज्ञान - राशिस्वरूप हैं । तपःपूत महर्षियों ने मनुष्य को कर्त्तव्य का परिज्ञान कराने के लिए ही उन वेदों को अभिव्यक्त किया था, किन्तु वे सर्वसाधारण के लिए उपयोगी नहीं हो सके; क्योंकि वेदमन्त्रों के अभिप्राय गहन होते हैं, जिसे सामान्य ज्ञान द्वारा आत्मसात् नहीं किया जा सकता; साथ ही वेदवाक्यों की भाषा भी लौकिक वाक्यों से सर्वथा भिन्न होती है । दूसरा यह कि वेद में अधिसंख्य स्थानों पर सूत्ररूप में वर्णन प्राप्त होता है । ऐसी स्थिति में सामान्य लोगों के लिए वेदवाक्य अपेक्षा-नुरूप उपयोगी सिद्ध नहीं हो सके । इस स्थिति को त्रिकालद्रष्टा तपःपूत महर्षियों ने अपने तपोजन्य ज्ञान द्वारा अनुभव किया और वेद के अभिप्राय को सामान्य जनों के

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भूमिका ९ लिए उपयोगी बनाने का निश्चय किया । उसी निश्चय का प्रतिफल स्मृति ( धर्मशास्त्र ) है । वस्तुतः वेद के भावों को स्पष्ट रूप से पारिभाषित करने वाले शास्त्र को ही धर्मशास्त्र या स्मृति नाम से अभिहित किया गया है । स्पष्ट है कि वेदज्ञान - विरहित प्राणी स्मृति-प्रतिपादित तथ्यों का अनुगमन कर नि: श्रेयस की प्राप्ति कर सकता है— श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन्ति मानवः । इह कीर्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ॥ ( मनु०-२.९ ) श्रुति स्मृति का ऐक्य . ' उदिते जुहोति, अनुदिते जुहोति, एक एव रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे, सहस्राणि सहस्रशो ये रुद्रा अधिभूम्याम् ' आदि स्थानों पर श्रुतिद्वय - प्रतिपादित परस्पर विरुद्ध वाक्य उपलब्ध होने की स्थिति में किसे प्रमाण माना जाय? इसका निराकरण करते हुए मनु ने विकल्पस्वरूप दोनों वाक्यों को धर्म में प्रमाण माना है— श्रुतिद्वैधं तु यत्र स्यात्तत्र धर्मावुभौ स्मृतौ । उभावपि हि तौ धर्मौ सम्यगुक्तौ मनीषिभिः ॥ ( मनु०-२.१४ ) यद्यपि किन्हीं कारणों से स्मृतिग्रन्थों में उपलब्ध कतिपय तत्त्व वर्त्तमान वेद में अनुपलब्ध हैं, तथापि उन तत्त्वों के वैदिक ज्ञान पर ही आधारित होने का अनुमान किया जाता है । श्री कुल्लूकभट्ट ने अपनी व्याख्या में प्रमाणस्वरूप जाबालस्मृति तथा भविष्यपुराण का उद्धरण दिया है— श्रुतिस्मृतिविरोधे तु श्रुतिरेव गरीयसी । अविरोधे सदा कार्यं स्मार्तं वैदिकवत्सता । ( जाबालस्मृति ) श्रुत्या सह विरोधे तु बाध्यते विषयं विना । ( भ ० पु ० ) वेद में अद्यतन अनुपलब्ध तत्त्वों के स्मृति प्रतिपादित होने के कारण उन स्मार्त्त-तत्त्वों के मूलभूत वैदिक विधि का जिस प्रकार अनुमान किया जाता है, उसी प्रकार वर्तमान स्मार्तसिद्धान्तों के दृष्टिगोचर होने पर ऐसा अनुमान करना चाहिये कि इनका मूल भी वेद में अवश्य रहा होगा । यद्यपि धर्मशासक ऋषियों द्वारा प्रणीत समस्त धर्मशास्त्रों में प्रतिपाद्य विषय के रूप “ धर्म का ही व्याख्यान उपलब्ध होता है, तथापि मतान्तर का अभाव उपलब्ध नहीं होता । मानवी पिता मनु ने भी प्रकृत ग्रन्थ में धर्म के सभी उपादानों का विशद निर्देश किया है । प्रकृत ग्रन्थ के प्रारम्भ में महर्षि मनु से उपस्थित अन्यान्य मुनिगण सभी वर्गों तथा सभी जातियों के लिए कर्त्तव्यपथ का प्रदर्शक धर्म का व्याख्यान करने का

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१० आग्रह करते हुये कहते हैं— मनुस्मृतिः भगवन् सर्वधर्माणां यथावदनुपूर्वशः । अन्तरप्रभवाणां च धर्मान्नो वक्तुमर्हसि । ( मनु०- १.२ ) अर्थात् हे भगवन्! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के साथ - साथ अम्बष्ठादि अनुलोमज, सूत आदि प्रतिलोमज तथा भूर्जकण्टक आदि संकीर्ण जातियों के लिए यथोचित धर्मों का निर्देश दें । एषा धर्मस्य वो योनिः समासेन प्रकीर्तिता । सम्भवश्चास्य सर्वस्य वर्णधर्मान्निबोधत ॥ ( मनु०- २.२५ ) उपर्युक्त मनुप्रोक्त श्लोक की व्याख्या करते हुये मनुस्मृति के प्रसिद्ध व्याख्याकार आचार्य मेधातिथि ने धर्म के पाँच प्रकार स्वीकार किये हैं - वर्णधर्म, आश्रमधर्म, वर्णाश्रमधर्म, नैमित्तिकधर्म ( प्रायश्चित्त ) तथा गुणधर्म । जैसा कि मेधातिथिभाष्य में कहा गया है-इह पञ्चप्रकारो धर्म इति स्मृतिविवरणकाराः प्रपञ्चयन्ति –वर्णधर्म आश्रमधर्मो वर्णाश्रमधर्मो नैमित्तिको धर्मो गुणधर्मश्चेति । तत्र यो जातिमात्रमपेक्ष्य प्रवृत्तो न वयो-विभागाश्रमादिकमाश्रयति स ' वर्णधर्मः ' । यथा ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ', ' ब्राह्मणेन सुरा न पेयेति ’ जातिमात्रस्याऽऽन्त्यादुच्छ्वासादेष धर्मः । ' आश्रमधर्मो ’ यत्र जातिर्नापेक्ष्यते केवला यदाश्रमप्रतिपत्तिराश्रीयते । यथा ब्रह्मचारिणोऽग्नीन्धनभिक्षाचरणे । ' वर्णाश्रमधर्म ' उभयापेक्षः । यथा मौर्वी ज्या क्षत्रियस्येत्यादिः । नाश्रमान्तरे न च जात्यन्तरस्य धारणमस्या उदाहरणम् । प्रथमोपादानन्तूपनयनधर्मो नाश्रमधर्मः । उपनयनं चाऽऽश्रमार्थं नाश्रमधर्मः 1 । ‘ नैमित्तिको ’ द्रव्यशुद्ध्यादिः । गुणमाश्रितो ' गुणधर्म: ' । ' षड्भिः परिहार्यश्चेत् ' त्यादिः । बाहुश्रुत्येन गुणेनैते धर्माः । एवमभिषिक्तस्य क्षत्रियस्य ये धर्माः । इसी प्रकार आचार्य मनु के परवर्ती याज्ञवल्क्यस्मृति के व्याख्याकार विज्ञानेश्वर ने अपनी मिताक्षरा व्याख्या में वर्णधर्म, आश्रमधर्म, वर्णाश्रमधर्म, गुणधर्म, निमित्तधर्म तथा साधारणधर्मरूप षड्विध धर्मों का उल्लेख करते हुए कहा है— ‘ यत्र च धर्मशब्दः षड्विधस्मार्तधर्मविषयः । तद्यथा – वर्णधर्मः, आश्रमधर्मः, वर्णाश्रमधर्मः, गुणधर्मः, निमित्तधर्मः, साधारणधर्मश्चेति ' । तत्र वर्णधर्मों ब्राह्मणो नित्यं मद्यं वर्जयेदित्यादिः । आश्रमधर्मोऽग्नीन्धनभैक्षचर्यादिः । वर्णाश्रमधर्मः पालाशो दण्डो ब्राह्मण-स्येत्येवमादिः । गुणधर्मः शास्त्रीयाभिषेकादिगुणयुक्तस्य राज्ञः प्रजापालनादिः 1 । निमित्तधर्मो विहिताकरणप्रतिषिद्धसेवननिमित्तं प्रायश्चित्तम् । साधारणधर्मोऽहिंसादिः । इसी प्रकार मन्वर्थमुक्तावली में श्रीकुल्लूकभट्ट ने वर्णधर्म की व्याख्या करते हुए भविष्यपुराण का उदाहरण दिया है—

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भूमिका ११ ‘ इदानीं वर्णधर्माञ्छृणुत । वर्णधर्मशब्दश्च वर्णधर्माश्रमधर्मवर्णाश्रमधर्मगुणधर्म-नैमित्तिकस्तथाधर्माणामुपलक्षकः । ते च भविष्यपुराणोक्ताः - ·

वर्णधर्मः स्मृतस्त्वेक आश्रमाणामतः परम् ।

वर्णाश्रमस्तृतीयस्तु गौणौ नैमित्तकस्तथा ॥

वर्णत्वमेकमाश्रित्य यो धर्मः सम्प्रवर्तते । वर्णधर्मः स उक्तस्तु यथोपनयनं नृप ।

यस्त्वाश्रमं समाश्रित्य अधिकार: प्रवर्त्तते ।

स खल्वाश्रमधर्मस्तु भिक्षादण्डादिको यथा ॥

वर्णत्वमाश्रमत्वं च योऽधिकृत्य प्रवर्तते ।

स वर्णाश्रमधर्मस्तु मौञ्जीया मेखला यथा ॥

यो गुणेन प्रवर्तेत गुणधर्मः स उच्यते ।

यथा मूर्धाभिषिक्तस्य प्रजानां परिपालनम् ॥

निमित्तमेकमाश्रित्य यो धर्मः संप्रवर्त्तते ।

नैमित्तकः स विज्ञेयः प्रायश्चित्तविधिर्यथा ॥

विज्ञानेश्वर ने मेधातिथि के पाँच उपादानों के अतिरिक्त छठे उपादान के रूप में साधारण धर्म को भी स्वीकार किया है । मेधातिथि की व्याख्या तथा विज्ञानेश्वर की व्याख्या में एक मौलिक अन्तर यह है कि जहाँ मेधातिथि व्यास शैली का अवलम्बन करते हैं, वहीं विज्ञानेश्वर संक्षिप्त किन्तु स्पष्ट रूप से अपनी बात व्यक्त कर देते हैं । भगवान् मनु ने चारों वर्णों के लिए धर्म का निर्धारण मनुस्मृति के प्रथम अध्याय में किया है । सर्वप्रथम मनु द्वारा कल्पित ब्राह्मणादि वर्णों का स्वरूप क्रमश: इस

प्रकार है-अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा ।

दानम्प्रतिग्रहञ्चैव ब्राह्मणानामकल्पयत् ॥

प्रजानां रक्षणन्दानमिज्याध्ययनमेव च ।

विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियाणां समासतः ॥

पशूनां रक्षणन्दानमिज्याध्ययनमेव च ।

वणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च ॥

एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् । एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया ॥ ( मनु ० -१.८८ - ९ १ ) वर्णानुसारी धर्म का निर्देश भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत दोनों ही प्रन्थों में उपलब्ध

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१० आग्रह करते हुये कहते हैं— मनुस्मृतिः भगवन् सर्वधर्माणां यथावदनुपूर्वशः । अन्तरप्रभवाणां च धर्मान्नो वक्तुमर्हसि । ( मनु०- १.२ ) अर्थात् हे भगवन्! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के साथ - साथ अम्बष्ठादि अनुलोमज, सूत आदि प्रतिलोमज तथा भूर्जकण्टक आदि संकीर्ण जातियों के लिए यथोचित धर्मों का निर्देश दें । एषा धर्मस्य वो योनिः समासेन प्रकीर्तिता । सम्भवश्चास्य सर्वस्य वर्णधर्मान्निबोधत ॥ ( मनु०-२.२५ ) उपर्युक्त मनुप्रोक्त श्लोक की व्याख्या करते हुये मनुस्मृति के प्रसिद्ध व्याख्याकार आचार्य मेधातिथि ने धर्म के पाँच प्रकार स्वीकार किये हैं - वर्णधर्म, आश्रमधर्म, वर्णाश्रमधर्म, नैमित्तिकधर्म ( प्रायश्चित्त ) तथा गुणधर्म । जैसा कि मेधातिथिभाष्य में कहा गया है— इह पञ्चप्रकारो धर्म इति स्मृतिविवरणकाराः प्रपञ्चयन्ति - वर्णधर्म आश्रमधर्मो वर्णाश्रमधर्मो नैमित्तिको धर्मो गुणधर्मश्चेति । तत्र यो जातिमात्रमपेक्ष्य प्रवृत्तो न वयो-विभागाश्रमादिकमाश्रयति स ' वर्णधर्मः ' । यथा ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ', ' ब्राह्मणेन सुरा न पेयेति ' जातिमात्रस्याऽऽन्त्यादुच्छ्वासादेष धर्मः । ‘ आश्रमधर्मो ' यत्र जातिर्नापेक्ष्यते केवला यदाश्रमप्रतिपत्तिराश्रीयते । यथा ब्रह्मचारिणोऽग्नीन्धनभिक्षाचरणे । ' वर्णाश्रमधर्म ' उभयापेक्षः । यथा मौर्वी ज्या क्षत्रियस्येत्यादिः । नाश्रमान्तरे न च जात्यन्तरस्य धारणमस्या उदाहरणम् । प्रथमोपादानन्तूपनयनधर्मो नाश्रमधर्मः । उपनयनं चाऽऽश्रमार्थं नाश्रमधर्मः । ‘ नैमित्तिको ’ द्रव्यशुद्ध्यादिः । गुणमाश्रितो ' गुणधर्म: ' । ' षड्भिः परिहार्यश्चेत्यादिः । बाहुश्रुत्येन गुणेनैते धर्माः । एवमभिषिक्तस्य क्षत्रियस्य ये धर्माः । इसी प्रकार आचार्य मनु के परवर्ती याज्ञवल्क्यस्मृति के व्याख्याकार विज्ञानेश्वर ने अपनी मिताक्षरा व्याख्या में वर्णधर्म, आश्रमधर्म, वर्णाश्रमधर्म, गुणधर्म, निमित्तधर्म तथा साधारणधर्मरूप षड्विध धर्मों का उल्लेख करते हुए कहा है-‘ यत्र च धर्मशब्दः षड्विधस्मार्तधर्मविषयः । तद्यथा - वर्णधर्मः, आश्रमधर्मः, वर्णाश्रमधर्मः, गुणधर्मः, निमित्तधर्मः, साधारणधर्मश्चेति ' । तत्र वर्णधर्मों ब्राह्मणो नित्यं मद्यं वर्जयेदित्यादिः । आश्रमधर्मोऽग्नीन्धनभैक्षचर्यादिः । वर्णाश्रमधर्मः पालाशो दण्डो ब्राह्मण-स्येत्येवमादिः । गुणधर्मः शास्त्रीयाभिषेकादिगुणयुक्तस्य राज्ञः प्रजापालनादिः । निमित्तधर्मो विहिताकरणप्रतिषिद्धसेवननिमित्तं प्रायश्चित्तम् । साधारणधर्मोऽहिंसादिः । इसी प्रकार मन्वर्थमुक्तावली में श्रीकुल्लूकभट्ट ने वर्णधर्म की व्याख्या करते हुए भविष्यपुराण का उदाहरण दिया है—

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भूमिका ११ ' इदानीं वर्णधर्माञ्छृणुत । वर्णधर्मशब्दश्च वर्णधर्माश्रमधर्मवर्णाश्रमधर्मगुणधर्म-नैमित्तिकस्तथाधर्माणामुपलक्षकः । ते च भविष्यपुराणोक्ता: -वर्णधर्मः स्मृतस्त्वेक आश्रमाणामतः परम् । वर्णाश्रमस्तृतीयस्तु गौणौ नैमित्तकस्तथा ॥ वर्णत्वमेकमाश्रित्य यो धर्मः सम्प्रवर्तते । वर्णधर्मः स उक्तस्तु यथोपनयनं नृप ।

यस्त्वाश्रमं समाश्रित्य अधिकार: प्रवर्त्तते ।

स खल्वाश्रमधर्मस्तु भिक्षादण्डादिको यथा ॥

वर्णत्वमाश्रमत्वं च योऽधिकृत्य प्रवर्तते ।

स वर्णाश्रमधर्मस्तु मौञ्जीया मेखला यथा ॥

यो गुणेन प्रवर्तेत गुणधर्मः स उच्यते ।

यथा मूर्धाभिषिक्तस्य प्रजानां परिपालनम् ॥

निमित्तमेकमाश्रित्य यो धर्मः संप्रवर्त्तते ।

नैमित्तकः स विज्ञेयः प्रायश्चित्तविधिर्यथा ॥

क विज्ञानेश्वर ने मेधातिथि के पाँच उपादानों के अतिरिक्त छठे उपादान के रूप में साधारण धर्म को भी स्वीकार किया है । मेधातिथि की व्याख्या तथा विज्ञानेश्वर की व्याख्या में एक मौलिक अन्तर यह है कि जहाँ मेधातिथि व्यास शैली का अवलम्बन करते हैं, वहीं विज्ञानेश्वर संक्षिप्त किन्तु स्पष्ट रूप से अपनी बात व्यक्त कर देते हैं । भगवान् मनु ने चारों वर्णों के लिए धर्म का निर्धारण मनुस्मृति के प्रथम अध्याय में किया है । सर्वप्रथम मनु द्वारा कल्पित ब्राह्मणादि वर्णों का स्वरूप क्रमश: इस प्रकार है—

अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा ।

दानम्प्रतिग्रहञ्चैव ब्राह्मणानामकल्पयत् ॥

प्रजानां रक्षणन्दानमिज्याध्ययनमेव च ।

विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियाणां समासतः ॥

पशूनां रक्षणन्दानमिज्याध्ययनमेव च ।

वणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च ॥

एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् । एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया । ( मनु०-१.८८ - ९ १ ) वर्णानुसारी धर्म का निर्देश भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत दोनों ही प्रन्थों में उपलब्ध

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१२ मनुस्मृतिः होता है । गीता में तो स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ब्राह्मणादि के धर्मों का विवेचन करते हुये कहते हैं कि— शमो दमः तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥ —गीता- १८.४२ गीतोक्त क्षात्रधर्म— शौर्यं तेजो धृतिः दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वर - भावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ —गीता- १८.४३ गीतोक्त वैश्यधर्म— कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् । – गीता- ८.४४ पू. गीतोक्त शूद्रधर्म— परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ – गीता -८.४४ उ. एवमेव श्रीमद्भागवत में भी वर्णधर्म का स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होता है—

श्रीमद्भागवत में वर्णित ब्राह्मणधर्म-शमो दमः तपः शौचं सन्तोषः क्षान्तिरार्जवम् ।

ज्ञानं दयाऽच्युतात्मत्वं सत्यञ्च ब्रह्मलक्षणम् ॥

( श्रीमद्भा ० ७/११/२१ ) श्रीमद्भागवत में वर्णित क्षत्रियधर्म—

शौर्यं वीर्यं धृतिस्तेजः त्यागश्चात्मजयः क्षमा ।

ब्रह्मण्यता प्रसादश्च सत्यञ्च क्षत्रलक्षणम् ॥

( श्रीमद्भा ० ७/११/२२ ) श्रीमद्भागवत में वर्णित वैश्यधर्म-देवगुर्वच्युते

भक्तिस्त्रिवर्गपरिपोषणम् ।

आस्तिक्यमुद्यमो नित्यं नैपुण्यं वैश्यलक्षणम् ॥

( श्रीमद्भा ० ७/११/२३ )

शूद्रधर्म - शूद्रस्य सन्नतिः शौचं सेवा स्वामिन्यमायया ।

अमन्त्रयज्ञो ह्यस्तेयं सत्यं गोविप्ररक्षणम् ॥

( श्रीमद्भा ० ७/११/२४ ) इन चारों वर्णों के धर्मों के विवेचन के पूर्व कृष्णद्वैपायन व्यास ने वर्णसङ्कर धर्म का भी संक्षिप्त रूप में सङ्केत दिया है—

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भूमिका

वृत्तिः सङ्करजातीनां तत्तत्कुलकृता भवेत् ।

अचौराणामपापानामन्त्यजान्त्यावसाथिनाम् ॥

( श्रीमद्भा ० ७/११/१७ ) याज्ञवल्क्यस्मृति में भी वर्णाश्रमधर्म का निर्देश प्राप्त होता है—

इज्याऽध्ययनदानानि वैश्यस्य क्षत्रियस्य च ।

प्रतिग्रहोऽधिको विप्रे याजनाध्यापने तथा ॥

प्रधानं क्षत्रिये कर्मं प्रजानाम्परिपालनम् ।

कुसीद - कृषि - बाणिज्य - पाशुपाल्यं विशः स्मृतम् ॥

शूद्रस्य द्विजशुश्रूषा तयाऽजीवन् वणिग्भवेत् । १३ शिल्पैर्वा विविधैर्जीवेद् द्विजातिहितमाचरन् ॥ ( १.११८-२० ) आश्रमधर्म — आश्रम धर्म के अन्तर्गत चारों आश्रमों ( ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ तथा संन्यास ) से सम्बन्धित है । इसमें द्विजमात्र ( ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्य ) के जीवन - अवधि को चार भागों में विभक्त किया गया है और प्रथम भाग को ब्रह्मचर्यावस्था अर्थात् वेदाध्ययन कार्य के निमित्त रखा गया है । मनु ने तीसरे अध्याय के प्रथम श्लोक में कहा है— षट्त्रिंशदाब्दिकं चर्यं गुरौ त्रैवेदिकं व्रतम् । तदर्धिकं पादिकं वा ग्रहणान्तिकमेव वा ॥ ( मनु०-३.१ ) अर्थात् प्रत्येक वेद के लिए १२ वर्ष १२ × ३ = ३६ वर्ष । अथवा प्रत्येक वेद के लिए ६ वर्ष ३ ३ = १८ वर्ष अथवा प्रत्येक के लिए ३ वर्ष ३ × ३ = ९ वर्ष की अवधि वेदाध्ययन के लिए अपेक्षित है । एतदर्थ वेदाध्यायी को उपर्युक्त काल तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहिए । पुनः विकल्प प्रदान करते हुए उक्त काल - सीमा समाप्त कर वेदाध्ययनपर्यन्त ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करने का निर्देश देते हैं । उपर्युक्त विकल्प से ऐसा प्रतीत होता है कि किसी प्राणी की जीवन - अवधि का निश्चयात्मक ज्ञान असम्भव होने के कारण विकल्प का आश्रयण किया गया है । गार्हस्थ्य आश्रम — जीवन के द्वितीय सोपान का नाम गार्हस्थ्य आश्रम कहा गया है; इसका मुख्य धर्म पञ्चमहायज्ञ है— वैवाहिकेऽग्नौ कुर्वीत गृह्यं कर्म यथाविधि । पञ्चयज्ञविधानं च पक्तिं चान्वाहिकीं गृही ॥ ( मनु०-३.५७ ) मनु ने सभी आश्रमों में श्रेष्ठ गृहस्थाश्रम को कहा है । उनका कथन है कि जिस प्रकार वायु का आश्रयण कर सभी जीव जीवन धारण करते हैं, उसी प्रकार गार्हस्थ्य

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१४ मनुस्मृतिः आश्रम का आश्रयण सभी आश्रमियों को करना पड़ता है । अतएव सभी आश्रमों में यह श्रेष्ठ है; जैसा कि कहा भी है-यथा वायुं समाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्वजन्तवः । तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्व आश्रमाः ॥ ( मनु०-३.७७ ) यस्मात्त्रयोऽप्याश्रमिणो ज्ञानेनान्नेन चान्वहम् । गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमीगृही ॥ ( मनु०-३.७८ ) वानप्रस्थ तथा संन्यास - ब्रह्मचर्यावस्था में वेदाध्ययन के अनन्तर गार्हस्थ्य आश्रम में ऐश्वर्यादि भोगरूप उत्पन्न रागादि को तपश्चर्या द्वारा क्षय करना ही अभिप्रेत है, जिससे संन्यास ग्रहण का मार्ग प्रशस्त हो सके । कामना के शेष रहते मनुष्य संन्यास ग्रहण नहीं कर सकता । अतः वानप्रस्थ में तपश्चर्यादि के द्वारा उसे शमित कर संन्यास ग्रहण का निर्देश मनु ने किया है— वनेषु च विहृत्यैवं तृतीयं भागमायुषः । चतुर्थमायुषो भागं त्यक्त्वा सङ्गं परिव्रजेत् ॥ ( मनु०- ६.३३ ) वर्णाश्रमधर्म — वर्णाश्रमधर्म के अन्तर्गत ब्राह्मण ब्रह्मचारी को पलाश या बेल का, क्षत्रिय ब्रह्मचारी को वट या खैर का तथा वैश्यकुल में उत्पन्न ब्रह्मचारी को पीलु अथवा गूलर का दण्ड धारण करना चाहिए । यथा— ब्राह्मणो बैल्वपालाशौ क्षत्रियो वाटखादिरौ । पैलवौदुम्बरौ वैश्यो दण्डानर्हन्ति धर्मतः ॥ ( मनु०-२ / ४५ ) गुणधर्म - मनुस्मृति के प्रसिद्ध व्याख्याकार मेधातिथि, एवं कुल्लूकभट्ट याज्ञवल्क्य - स्मृति के विज्ञानेश्वर ने शास्त्रविधि से अभिषिक्त राजा के प्रजापालनादि कर्त्तव्य को गुणधर्म माना है । निमित्तधर्म — इसका अभिप्राय प्रायश्चित्त से है । प्रायश्चित्त का विधान कार्य-( अपराध ) -विशेष पर निर्भर करता है । साधारण धर्म - साधारण धर्म को यद्यपि मेधातिथि ने अपने भाष्य में परि-गणित नहीं किया है फिर भी व्यावहारिक तौर पर मनु ने धर्म के निम्न दश लक्षण बताये हैं— धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ ( मनु०- ६.९ २ ) अर्थात् धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियों को वश में करना, ज्ञान, विद्या, सत्य, अक्रोध यह जो दस प्रकार के धर्म के लक्षण हैं, वे ही सामान्य धर्म के अन्तर्गत आते हैं ।