मनुस्मृति १ हरगोविन्द शास्त्री — पृष्ठ 21–30

मनुस्मृति १ हरगोविन्द शास्त्री · पृष्ठ 21–30

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भूमिका १५ धर्मविषयक लक्षण में मनु और याज्ञवल्क्य में कहीं साम्य तो कहीं वैषम्य की स्थिति स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है । वेदाध्ययन के क्रम में मनु ने चार विकल्प प्रस्तुत किया है —३६, १८, ९ वर्ष अथवा अध्ययन पर्यन्त, वहीं याज्ञवल्क्य ने तीन विकल्प दिया है— १२, ५ अथवा वेदाध्ययन पर्यन्त । उसी प्रकार संन्यास ग्रहण में मनु ब्राह्मण को ही अधिकारी मानते हैं, जबकि कुछ परवर्ती स्मृतिकार द्विजमात्र को । याज्ञवल्क्य के मिताक्षराकार दूसरे मत को ही उत्तम मानते हैं- ऐसा अनुभव उनकी व्याख्या से परिलक्षित होता है । मनु एवं मनुस्मृति मनुस्मृति की रचना कब हुई? उसके रचयिता कौन हैं? इस प्रश्न पर विद्वानों द्वारा काफी तर्क - वितर्क उपस्थित किया गया । इसमें दो पक्ष हैं— प्रथम पक्ष — आधुनिक इतिहासकार अपने अनुसन्धान के क्रम में मनु का काल ई ० पू ० २०० से ई ० उ ० १०० वर्ष का मानते हैं 1 । प्रसिद्ध इतिहासकार श्री पी ० वी ० काणे ने अपने धर्मशास्त्र के इतिहास में स्पष्ट रूप से इसका उल्लेख किया है । काणे साहब ने मनु के सम्बन्ध में ऋग्वेद से लेकर वर्तमान स्मृति के प्रमुख शास्त्रों में जो मनु की चर्चा हुई है, उसका विवरण प्रस्तुत किया है । यथा— महर्षि मनु ऋग्वेद में मनु को मानव - जाति का पिता कहा गया है ( ऋ ० १.८०.१६; १.११४.२; १.३३.१३ ) । एक वैदिक कवि ने स्तुति की है ताकि वह मनु के मार्ग से न हो जाय । एक कवि ने कहा है कि मनु ने ही सर्वप्रथम यज्ञ किया ( ऋ ० १०.६७.७ ) । तैत्तिरीय संहिता एवं ताण्ड्य महाब्राह्मण में आया है कि मनु ने जो कुछ कहा है, औषध है ( “ यद्वै किं च मनुरवदत्तद् भेषजम् ”, तै ० सं ० २.२.१०.२; “ मनुर्वै यत्किञ्चावदत्तद् भेषजं भेषजतायै ”, – ताण्ड्य ० २३.१६.१७ ) । प्रथम में “ मानव्यो हि प्रजाः ” कहा गया है । तैत्तिरीयसंहिता तथा ऐतरेयब्राह्मण में मनु के विषय में एक गाथा है, जिसमें उन्होंने अपनी सम्पत्ति को अपने पुत्रों में बाँटा है और अपने पुत्र नाभानेदिष्ठ को कुछ नहीं दिया है । शतपथब्राह्मण में मनु और प्रलय की कहानी है । निरुक्त में भी मनु स्वायंभुव के मत की चर्चा हुई है । अत: यास्क के पूर्व पद्यबद्ध स्मृतियाँ थीं और मनु एक व्यवहार - प्रणेता थे । गौतम, वसिष्ठ, आपस्तम्ब ने मनु का उल्लेख किया है । महाभारत में मनु को कभी केवल मनु, कभी स्वायंभुव मनु ( शान्ति, २१.१२ ) और कभी प्राचेतस मनु ( शान्ति, ५७.४३ ) कहा गया है । शान्तिपर्व ( ३३६.३८-४६ ) में आया है कि किस प्रकार भगवान् ब्रह्मा ने एक सौ सहस्र श्लोकों में धर्म पर लिखा, किस प्रकार मनु ने उन धर्मों को उद्घोषित किया और किस प्रकार उशना तथा बृहस्पति ने मनु

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१६ मनुस्मृतिः स्वायंभुव के ग्रन्थ के आधार पर शास्त्रों का प्रणयन किया । महाभारत में एक स्थान पर विवरण कुछ भिन्न है और वहाँ मनु का नाम नहीं आया है । शान्तिपर्व ( ५८.८०.८५ ) में बताया है कि किस प्रकार ब्रह्मा ने धर्म, अर्थ एवं काम पर एक लाख अध्याय लिखे और वह महाग्रन्थ कालान्तर में विशालाक्ष, इन्द्र, बाहुदन्तक, बृहस्पति एवं काव्य ( उशना ) द्वारा क्रम से १०,०००, ५,०००, ३,००० एवं १,००० अध्यायों में संक्षिप्त किया गया । नारद - स्मृति में आया है कि मनु ने १,००,००० श्लोकों, १०८० अध्यायों एवं २४ प्रकरणों में एक धर्मशास्त्र लिखा और उसे नारद को पढ़ाया, जिसने उसे १२,००० श्लोकों में संक्षिप्त किया और मार्कण्डेय को पढ़ाया । मार्कण्डेय ने भी इसे ८,००० श्लोकों में संक्षिप्त कर सुमति भार्गव को दिया, जिन्होंने स्वयं उसे ४,००० श्लोकों में संक्षिप्त किया । वर्त्तमान मनुस्मृति में आया है ( १.३२.३३ ) कि बह्मा से विराट् की उद्भूति हुई, उन्होंने मनु को उत्पन्न किया, जिनसे भृगु, नारद आदि ऋषि उत्पन्न हुए; ब्रह्मा ने मनु को शास्त्राध्ययन कराया, मनु ने दस ऋषियों ( १.५८ ) को वह ज्ञान दिया; कुछ बड़े ऋषि मनु के यहाँ गये और वर्णों एवं मध्यम जातियों के धर्मों ( कर्त्तव्यों ) को पढ़ाने के लिए उनसे प्रार्थना की और मनु ने कहा कि यह कार्य उनके शिष्य भृगु करेंगे ( १.५ ९.६० ) । मनुस्मृति में यह पढ़ाने की बात आरम्भ से अन्त तक है और स्थान - स्थान पर ऋषि लोग भृगु के व्याख्यान को रोककर उनसे कठिन बातें समझ लेते हैं ( ५.१-२; १२.१-२ ) । मनु सर्वत्र विराजमान हैं; उनका नाम ' मनुराह ' ( ९.१५८, १०.७८ आदि ) या ‘ मनुरब्रवीत् ' या ' मनोरनुशासनम् ' ( ८.१३ ९, २७ ९; ९.२३ ९ आदि ) के रूप में दर्जनों बार आया है । भविष्यपुराण के अनुसार, जैसा कि हमें हेमाद्रि, संस्कारमयूख तथा अन्य ग्रन्थों से पता चलता है, स्वायंभुव- शास्त्र के चार संस्करण थे, जो भृगु, नारद, बृहस्पति एवं अंगिरा द्वारा प्रणीत थे । अतिप्राचीन लेखक विश्वरूप ने मनुस्मृति के उद्धरण दिये हैं और वहाँ मनु स्वयंभू कहे गये हैं । आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार ऋग्वेद के मनु से वर्तमान मनुस्मृति का कोई सम्बन्ध नहीं है । वे लोग मानवधर्मसूत्र तथा मनुस्मृति में भी परस्पर सम्बन्ध का अभाव मानते हैं । इसी तरह महाभारत में धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजशास्त्र के ज्ञाता मनु का भी वर्तमान मनुस्मृति से कोई सम्बन्ध नहीं है । मनुस्मृति की अतिप्रसिद्ध प्राचीन टीका मेधातिथि की उपलब्ध होती है, जिसका समय ८२५ - ९ ०० ई ० माना गया है । श्रीकुल्लूकभट्ट ने मनुस्मृति पर मन्वर्थमुक्तावली नामक टीका का प्रणयन किया है, जिसका समय बारहवीं शताब्दी है । इसी तरह कुमारिलभट्ट, शूद्रक, शबरस्वामी आदि के ग्रन्थों में भी वर्तमान मनुस्मृति के वाक्यों का उद्धरण प्राप्त होता है, जिसके आधार पर मनुस्मृति का उपर्युक्त काल ही विद्वानों ने निश्चय किया है । अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि इसके रचयिता कौन हैं? यदि मनु इसके रचयिता नहीं हैं तो रचयिता के

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भूमिका रूप में मनु का नाम क्यों लिया गया है? आदि । १७ दूसरा पक्ष – परम्परावादी भारतीय विद्वानों के अनुसार मनुस्मृति की प्रामाणिकता वेद के सदृश है | परम्परानुसार १४ मनु माने गये हैं— स्वायंभुव, २. स्वारोचिष, ३. औत्तमि, ४. तापसि, ५. रैवत, ६. चाक्षुष, ७. वैवस्वत, ८. सावर्णि, ९. दक्षसावर्णि, १०. ब्रह्मसावर्णि, ११. धर्मसावर्णि, १२. रुद्रसावर्णि, १३. रौच्यदेवसावर्णि तथा १४ इन्द्रसावर्णि । वर्तमान मन्वन्तर में प्रजापति वैवस्वत मनु हैं, जो क्रमसंख्या में सातवें हैं; जिनका हम नित्यकर्म के अनुष्ठानक्रम में सङ्कल्परूप में आज भी प्रयोग करते हैं— ' वैवस्वतमन्वन्तरे कलियुगे प्रथमचरणे ० ’ । आलोच्य मनु मानवी सृष्टि के मूल पुरुष के रूप में विख्यात हैं । मनु से मनुष्य की उत्पत्ति हुई है । ये दिव्य पुरुष माने जाते हैं । प्रथम मनु को स्वायंभुव अर्थात् स्वतः उत्पन्न होना बतलाया गया है । वेद में वैवस्वत, स्वायंभुव और सावर्णि नाम बतलाये गये हैं । वेदोक्त यही बात इन्हें दिव्य पुरुष सिद्ध करती है । विवस्वत् की पत्नी सवर्णा थी, जिसके कारण इनका नाम सावर्णि पड़ा । सृष्टि के मूल पुरुष होने के कारण इन्हें प्रजापति की संज्ञा प्राप्त हुई है । विवस्वत् सूर्य का नाम है । अतः मनु वैवस्वत कहलाये । श्राद्ध एवं अन्य कर्म मनु ने आरम्भ किया । दस ऋषियों की उत्पत्ति मनु से हुई, जिसका उल्लेख मनुस्मृति में निम्नवत् प्राप्त होता है— अहं प्रजाः सिसृक्षुस्तु तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् । पतीन्प्रजानामसृजं महर्षीनादितो दश ॥ ( मनु०-१.३४ ) मनु को अमरत्व प्राप्त है, प्रलयकाल में भी उनकी मृत्यु नहीं होती । वे प्रलय-कालीन एकमात्र द्रष्टा के रूप में विराजमान रहते हैं । जलप्रलय के समय मत्स्यावतार के रूप में विष्णु भगवान् ने इनकी रक्षा की थी, जिसकी चर्चा शतपथब्राह्मण में हुई है । इसी कथा को आधार बनाकर हिन्दी के स्वनामधन्य कवि जयशङ्कर प्रसाद ने ' कामायनी ' नामक महाकाव्य की रचना की है । अयोध्या पर शासन करने वाले सूर्यवंशी राजाओं के कुल के प्रवर्त्तकरूप में भी मनु को ही स्वीकार किया जाता है । आधुनिक अन्वेषकों और परम्परावादी विद्वानों में मौलिक अन्तर स्पष्ट दिखाई देता है । एक तरफ आधुनिक इतिहासकार लिखित साक्ष्यों को ही प्रमाण मानकर अपना निश्चय प्रकट करते हैं, वहीं भारतीय परम्परा के पोषक विद्वद्गण श्रुति स्मृति में लिखित साक्ष्य को महत्त्व नहीं देते; क्योंकि अतिप्राचीन काल में लिख कर या मुद्रित पुस्तकों द्वारा पठन-पाठन का प्रचलन था ही नहीं; यह परम्परा तो बहुत बाद में प्रारम्भ हुई है; पूर्वसमय में तो पठन - पाठन में श्रौत प्रणाली ही प्रचलित थी । वर्तमान मनुस्मृति के लेखक के रूप कतिपय विद्वान् भृगु जी को ही स्वीकार करते मनु.I. 2

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१६ मनुस्मृतिः स्वायंभुव के ग्रन्थ के आधार पर शास्त्रों का प्रणयन किया । महाभारत में एक स्थान पर विवरण कुछ भिन्न है और वहाँ मनु का नाम नहीं आया है । शान्तिपर्व ( ५८.८०.८५ ) में बताया है कि किस प्रकार ब्रह्मा ने धर्म, अर्थ एवं काम पर एक लाख अध्याय लिखे और वह महाग्रन्थ कालान्तर में विशालाक्ष, इन्द्र, बाहुदन्तक, बृहस्पति एवं काव्य ( उशना ) द्वारा क्रम से १०,०००, ५,०००, ३,००० एवं १,००० अध्यायों में संक्षिप्त किया गया । नारद - स्मृति में आया है कि मनु ने १,००,००० श्लोकों, १०८० अध्यायों एवं २४ प्रकरणों में एक धर्मशास्त्र लिखा और उसे नारद को पढ़ाया, जिसने उसे १२,००० श्लोकों में संक्षिप्त किया और मार्कण्डेय को पढ़ाया । मार्कण्डेय ने भी इसे ८,००० श्लोकों में संक्षिप्त कर सुमति भार्गव को दिया, जिन्होंने स्वयं उसे ४,००० श्लोकों में संक्षिप्त किया । वर्त्तमान मनुस्मृति में आया है ( १.३२.३३ ) कि बह्मा से विराट् की उद्भूति हुई, उन्होंने मनु को उत्पन्न किया, जिनसे भृगु, नारद आदि ऋषि उत्पन्न हुए; ब्रह्मा ने मनु को शास्त्राध्ययन कराया, मनु ने दस ऋषियों ( १.५८ ) को वह ज्ञान दिया; कुछ बड़े ऋषि मनु के यहाँ गये और वर्णों एवं मध्यम जातियों के धर्मों ( कर्त्तव्यों ) को पढ़ाने के लिए उनसे प्रार्थना की और मनु ने कहा कि यह कार्य उनके शिष्य भृगु करेंगे ( १.५ ९.६० ) । मनुस्मृति में यह पढ़ाने की बात आरम्भ से अन्त तक है और स्थान - स्थान पर ऋषि लोग भृगु के व्याख्यान को रोककर उनसे कठिन बातें समझ लेते हैं ( ५.१-२; १२.१-२ ) । मनु सर्वत्र विराजमान हैं; उनका नाम ' मनुराह ' ( ९.१५८, १०.७८ आदि ) या ‘ मनुरब्रवीत् ' या ' मनोरनुशासनम् ' ( ८.१३ ९, २७ ९; ९.२३ ९ आदि ) के रूप में दर्जनों बार आया है । भविष्यपुराण के अनुसार, जैसा कि हमें हेमाद्रि, संस्कारमयूख तथा अन्य ग्रन्थों से पता चलता है, स्वायंभुव- शास्त्र के चार संस्करण थे, जो भृगु, नारद, बृहस्पति एवं अंगिरा द्वारा प्रणीत थे । अतिप्राचीन लेखक विश्वरूप ने मनुस्मृति के उद्धरण दिये हैं और वहाँ मनु स्वयंभू कहे गये हैं । आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार ऋग्वेद के मनु से वर्तमान मनुस्मृति का कोई सम्बन्ध नहीं है । वे लोग मानवधर्मसूत्र तथा मनुस्मृति में भी परस्पर सम्बन्ध का अभाव मानते हैं । इसी तरह महाभारत में धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजशास्त्र के ज्ञाता मनु का भी वर्तमान मनुस्मृति से कोई सम्बन्ध नहीं है । मनुस्मृति की अतिप्रसिद्ध प्राचीन टीका मेधातिथि की उपलब्ध होती है, जिसका समय ८२५ - ९ ०० ई ० माना गया है । श्रीकुल्लूकभट्ट ने मनुस्मृति पर मन्वर्थमुक्तावली नामक टीका का प्रणयन किया है, जिसका समय बारहवीं शताब्दी है । इसी तरह कुमारिलभट्ट, शूद्रक, शबरस्वामी आदि के ग्रन्थों में भी वर्तमान मनुस्मृति के वाक्यों का उद्धरण प्राप्त होता है, जिसके आधार पर मनुस्मृति का उपर्युक्त काल ही विद्वानों ने निश्चय किया है । अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि इसके रचयिता कौन हैं? यदि मनु इसके रचयिता नहीं हैं तो रचयिता के

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भूमिका रूप में मनु का नाम क्यों लिया गया है? आदि । १७ दूसरा पक्ष – परम्परावादी भारतीय विद्वानों के अनुसार मनुस्मृति की प्रामाणिकता वेद के सदृश है । परम्परानुसार १४ मनु माने गये हैं— स्वायंभुव, २. स्वारोचिष, ३. औत्तमि, ४. तापसि, ५. रैवत, ६. चाक्षुष, ७. वैवस्वत, ८. सावर्णि, ९. दक्षसावर्णि, १०. ब्रह्मसावर्णि, ११. धर्मसावर्णि, १२. रुद्रसावर्णि, १३. रौच्यदेवसावर्णि तथा १४ इन्द्रसावर्णि । वर्तमान मन्वन्तर में प्रजापति वैवस्वत मनु हैं, जो क्रमसंख्या में सातवें हैं; जिनका हम नित्यकर्म के अनुष्ठानक्रम में सङ्कल्परूप में आज भी प्रयोग करते हैं - ' वैवस्वतमन्वन्तरे कलियुगे प्रथमचरणे ० ' । आलोच्य मनु मानवी सृष्टि के मूल पुरुष के रूप में विख्यात हैं । मनु से मनुष्य की उत्पत्ति हुई है । ये दिव्य पुरुष माने जाते हैं । प्रथम मनु को स्वायंभुव अर्थात् स्वतः उत्पन्न होना बतलाया गया है । वेद में वैवस्वत, स्वायंभुव और सावर्णि नाम बतलाये गये हैं । वेदोक्त यही बात इन्हें दिव्य पुरुष सिद्ध करती है । विवस्वत् की पत्नी सवर्णा थी, जिसके कारण इनका नाम सावर्णि पड़ा । सृष्टि के मूल पुरुष होने के कारण इन्हें प्रजापति की संज्ञा प्राप्त हुई है । विवस्वत् सूर्य का नाम है । अतः मनु वैवस्वत कहलाये । श्राद्ध एवं अन्य कर्म मनु ने आरम्भ किया । दस ऋषियों की उत्पत्ति मनु से हुई, जिसका उल्लेख मनुस्मृति में निम्नवत् प्राप्त होता है— अहं प्रजाः सिसृक्षुस्तु तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् । पतीन्प्रजानामसृजं महर्षीनादितो दश ॥ ( मनु०- १.३४ ) मनु को अमरत्व प्राप्त है, प्रलयकाल में भी उनकी मृत्यु नहीं होती । वे प्रलय-कालीन एकमात्र द्रष्टा के रूप में विराजमान रहते हैं 1 । जलप्रलय के समय मत्स्यावतार के रूप में विष्णु भगवान् ने इनकी रक्षा की थी, जिसकी चर्चा शतपथब्राह्मण में हुई है । इसी कथा को आधार बनाकर हिन्दी के स्वनामधन्य कवि जयशङ्कर प्रसाद ने ‘ कामायनी ' नामक महाकाव्य की रचना की है । अयोध्या पर शासन करने वाले सूर्यवंशी राजाओं के कुल के प्रवर्त्तकरूप में भी मनु को ही स्वीकार किया जाता है । आधुनिक अन्वेषकों और परम्परावादी विद्वानों में मौलिक अन्तर स्पष्ट दिखाई देता है । एक तरफ आधुनिक इतिहासकार लिखित साक्ष्यों को ही प्रमाण मानकर अपना निश्चय प्रकट करते हैं, वहीं भारतीय परम्परा के पोषक विद्वद्गण श्रुति स्मृति में लिखित साक्ष्य को महत्त्व नहीं देते; क्योंकि अतिप्राचीन काल में लिख कर या मुद्रित पुस्तकों द्वारा पठन-पाठन का प्रचलन था ही नहीं; यह परम्परा तो बहुत बाद में प्रारम्भ हुई है; पूर्वसमय में तो पठन - पाठन में श्रौत प्रणाली ही प्रचलित थी । वर्तमान मनुस्मृति के लेखक के रूप कतिपय विद्वान् भृगु जी को ही स्वीकार करते मनु.I. 2

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१८ मनुस्मृतिः हैं और तर्क देते हैं कि वर्तमान स्वरूप में उपलब्ध स्मृति में ' मनुराह, मनुरवदीत्, मनोरनुशासनम् ' आदि वाक्यों से स्पष्ट है कि इसके रचयिता मनु नहीं हैं । यदि मनु होते तो फिर मनुराह, मनुरवदीत् आदि शब्द का प्रयोग कैसे होता? श्रुति - परम्परानुसार यह भी सम्भव है कि कल्पभेद से उन शब्दों का प्रयोग किया गया हो । जब मानवी सृष्टि के स्रष्टा स्वयं पितामह मनु हैं तब उनके द्वारा अपनी सन्तति केकल्याण- - हेतु कर्तव्यपथ के प्रदर्शक शास्त्र का निर्माण करना असम्भव कैसे कहा जा सकता है? उपर्यङ्कित वर्णन - क्रम में स्मृति की प्रामाणिकता श्रुति के समान मानी गयी है और वेद अपौरुषेय है । उसकी रचना किसी देवता अथवा पुरुष ने नहीं की । ऐसी स्थिति में वेदोक्त तथ्यों को समयसीमा में पारिभाषित करना उचित नहीं है । व्यवस्था - जन्य कारणों से कुछ शताब्दियों में साक्ष्य का नष्ट - भ्रष्ट होना देखा जाता है । फिर सैकड़ों वर्षीय संस्कृति - विरोधी शासकों के राज्य में शास्त्रीय साक्ष्यों का क्या हाल हुआ होगा, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है । अतः श्रुति- स्मृति के सम्बन्ध में गहन विचार-विमर्श की आवश्यकता है, जो विशेषज्ञों के चिन्तन का विषय है । मनुस्मृति की टीका: मेधातिथि द्वादश अध्यायों में निबद्ध मनुस्मृति का प्रभाव सर्वातिशायी होने के कारण अन्यान्य स्मृतियाँ भी उससे प्रभावित रही हैं । इस महनीय धर्मशास्त्र ग्रन्थ पर अनेकों विद्वानों ने टीकायें लिखी हैं, जिनमें से आज बहुत सी टीकायें अनुपलब्ध हैं; किन्तु उनका नाम अन्यान्य स्मृतिग्रन्थों में उद्धृत होने से यह परिज्ञात होता है कि कभी उनकी उपलब्धता रही होगी । सम्प्रति उपलब्ध यशस्वी टीकाकारों में मेधातिथि, गोविन्दराज तथा कुल्लूक भट्ट माने जाते हैं । इनके अतिरिक्त नारायण, राघवानन्द, नन्दन एवं रामचन्द्र का भी नाम आता है । कुछ अन्य व्याख्याकार भी हुए हैं, जिनकी कृतियाँ आज पूर्ण रूप से उपलब्ध नही हैं । मनुस्मृति पर विस्तृत एवं विद्वत्तापूर्ण भाष्यकार के रूप में मेधातिथि को सुयश प्राप्त है । बहर के अनुसार मेधातिथि काश्मीर या उत्तर भारत के रहने वाले थे । यह अनुमान उनकी रचनाओं में काश्मीर - विषयक वर्णन से लगाया जाता है । मेधातिथि ने अपने भाष्य में गौतम, बौधायन, आपस्तम्ब, वसिष्ठ, विष्णु, शंख, याज्ञवल्क्य, नारद, पराशर, वृहस्पति, कात्यायन आदि स्मृतिकारों की चर्चा की है । उन्होंने वृहस्पति को वार्ता -राजनीति के लेखकों में स्वीकार किया है । उनके अनुसार उशना एवं चाणक्य दण्डनीति, राजनीति एवं राजशासन के विद्वान् थे । उन्होंने कौटिल्य

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भूमिका १ ९ के ग्रन्थों से बहुत से उद्धरण प्रस्तुत किये हैं । ' कर्मणामारम्भोपायः पुरुषद्रव्यसम्पद्देश-कालविभागो विनिपातप्रतीकारः कार्यसिद्धि: ' नामक पाँच मन्त्रांगों के नाम जिस प्रकार कौटिल्य ग्रन्थ में आयें हैं, उसी प्रकार मेधातिथि में भी उल्लिखित हैं । इसी प्रकार मेधातिथि ने असहाय एवं अन्य स्मृतिकारों के नामोल्लेख के साथ - साथ सांख्यकारिका, वाक्यपदीय तथा पुराणों का भी उल्लेख किया है । मेधातिथि भाष्य में विधि- अर्थवाद आदि वाक्यों का बहुधा प्रयोग परिलक्षित होने से उनके मीमांसक होने का अनुमान सहजता से लगाया जाता है । उन्होंने जैमिनिसूत्रों, शावरभाष्य तथा कुमारिल भट्ट का भी उल्लेख किया है । इसी प्रकार अपने से पूर्व के अन्य आचार्यों का भी उल्लेख अपने भाष्य में किया है । जिस प्रकार मनुस्मृति की कालविषयक अनिश्चितता विद्वानों में विद्यमान है, उसी प्रकार मनुस्मृति के सर्वप्राचीन व्याख्याकार मेधातिथि का भी समय बहुत स्पष्ट नही है । विद्वानों ने मेधातिथि द्वारा कुमारिल भट्ट एवं शंकराचार्य का उल्लेख करने के कारण तथा मिताक्षराकार द्वारा इस टीका को प्रामाणिक रूप से स्वीकार करने के कारण इनका समय ८२० इसवीं के उपरान्त तथा १०५० ई ० के पूर्व स्वीकार किया है । पुरुषार्थचतुष्टय की प्राप्ति मानव शरीर धारण करने का परम लक्ष्य मोक्ष है । अन्यान्य स्मृतियों द्वारा प्रतिपादित व्यवस्था में कहीं अर्थ की, कहीं धर्म की तो कहीं काम की प्रधानता पायी जाती है; परन्तु प्रकृत स्मृति द्वारा प्रतिपादित व्यवस्था का अनुसरण कर मनुष्य पुरुषार्थचतुष्टय की प्राप्ति कर सकता है । मनु द्वारा प्रतिपादित व्यवस्था धर्म, अर्थ एवं काम परम तत्त्व मोक्ष के ही उपादान हैं । सम्भवत: इसी दृष्टि से उन्होंने मनुष्य के आयु को चार भागों अर्थात् आश्रमों ( ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ तथा संन्यास ) में विभक्त किया है । यथा— चतुर्थमायुषो भागमुषित्वाऽऽद्यं गुरौ द्विजः । द्वितीयमायुषो भागं कृतचारो गृहे वसेत् ॥ ( मनु०-४.१ ) अर्थात् जीवन के प्रथम भाग में गुरु के समीप ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हु वेदाध्ययन करना, उसके उपरान्त द्वितीय चतुर्थांश भाग में गृहस्थाश्रमी बनना । स्वाध्यायेन व्रतैर्होमैस्त्रैविद्येनेज्यया सुतैः । महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ॥ ( मनु०-२.२८ ) आशय यह है कि वेदाध्ययन काल में मधु, मांसादि तामस पदार्थों का त्याग करना चाहिये, ताकि विधिपूर्वक समयबद्ध प्रातः - सायंकालीन हवन से, त्रैविद्य नामक व्रत से ब्रह्मचर्यावस्था में देवर्षि - पितृतर्पण आदि क्रियाओं से, गृहस्थावस्था में पुत्रो-

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२० मनुस्मृतिः त्पादन द्वारा महायज्ञों से तथा ज्योतिष्टोमादि यज्ञों से इस शरीर को ब्रह्मप्राप्ति के योग्य बनाना चाहिये । यात्रामात्रप्रसिद्ध्यर्थं स्वैः कर्मभिरगर्हितैः । अक्लेशेन शरीरस्य कुर्वीत धनसञ्चयम् ॥ ( मनु०-४.३ ) उपर्युक्त श्लोक का आशय धर्म - नीतिपूर्वक धनसञ्चयन से है । अपने परिवार के सहित अनिन्दित कर्मों से अर्थात् वर्णधर्म ( ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य ) में वर्णित रीति ( उससे भिन्न नहीं ) से शारीरिक क्षमता अर्थात् सञ्चयी प्रवृत्ति का त्याग कर भरण - पोषण के निमित्त धन का सञ्चय करना चाहिए । तात्पर्य यह है कि भरण - पोषण से ज्यादा, शारीरिक कष्ट उठाकर अथवा वर्णविहित धर्म के विपरीत कार्य द्वारा धनसञ्चय से अनर्थ उत्पन्न होगा, जो मोक्षदायक परिव्राजक धर्म में बाधक होगा । ऋतुकालाभिगामी स्यात्स्वदारनिरतः सदा । पर्वव्रर्जं व्रजेच्चैनां तद्वतो रतिकाम्यया । ( मनु०-३.४५ ) अर्थात् अपनी पत्नी के साथ प्रेम करने वाला पुरुष स्त्री के ऋतुमती होने के बाद शुद्ध होने पर ( रज: स्राव के पाँचवें दिन ही स्त्रियाँ शुद्ध होती हैं ) सम्भोग करे तथा रति की इच्छा से पर्वदिनों ( पूर्णिमा, अमावस्या आदि ) को छोड़कर अन्य दिनों में स्त्री के साथ सहवास करे । काम का दो अर्थ है— एक वासनाजन्य काम तथा परमतत्त्व - प्रापक काम । सन्तानोत्पत्तिजन्य काम को धर्म का साधक मानना चाहिए । ' अपुत्रस्य गतिर्नास्ति ' कहा गया है । यदि सन्तान की उत्पत्ति नहीं होगी, तब गृहाश्रमियों के लिए वक्ष्यमाण ब्रह्मयज्ञ आदि महायज्ञों की पूर्ति कैसे होगी? पितृतर्पणादि क्रिया अवरुद्ध हो जायेगी । अतः धार्मिक कृत्यों के सम्पादन हेतु सन्तानोत्पत्तिरूप कार्य धर्माचरण का ही अङ्ग है और वह मनुष्य को परम तत्त्व की प्राप्ति में सहायक है । धर्म, अर्थ, काम के उपरान्त पुरुषार्थचतुष्टय में चरम तत्त्व मोक्ष का क्रम आता है । इन तीनों उपादानों का धर्म - नीतिपूर्वक निवर्हण करने के उपरान्त मानव को देव-दुर्लभ मानव तन प्राप्त करने के उपरान्त उसका औचित्य सिद्ध करने का अब सुअवसर प्राप्त होता है अर्थात् मोक्षप्राप्ति के साधनभूत परिव्राजक धर्म में प्रविष्ट होने का अवसर प्राप्त होता है । इसीलिये स्मृतिकार मनु ब्रह्मप्राप्ति हेतु समुचित मार्ग का निर्देश करते हुए कहते हैं कि ब्राह्मण को चाहिए कि चित्त को सावधान कर समस्त सत् तथा असत् को विचारपूर्वक देखे । जब सभी सत् तथा असत् को आत्मा में ब्राह्मण वर्त्तमान देखने लगता है, तब वह ( ब्राह्मण ) अधर्म से अपने मन को दूर करने में समर्थ हो जाता

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भूमिका २१ है अर्थात् उसका चित्त निर्मल हो जाता है और उसकी प्रवृत्ति अधर्म से सर्वथा विमुख रहती है— सर्वमात्मनि सम्पश्येत्सच्चासच्च समाहितः । सर्वं ह्यात्मनि सम्पश्यन्नाधर्मे कुरुते मनः ॥ ( मनु०-१२.११८ ) पुनः निर्मल मन के उपरान्त ब्रह्मध्यान में उपयोगी तत्त्वों का निर्देश करते हुए सभी देवताओं को आत्मा अर्थात् परमात्मा समझे, समस्त संसार को उस परमात्मा में अवस्थित माने और आत्मा ही अर्थात् परमात्मा ही इन देहियों के कर्मसम्बन्ध को उत्पन्न करता है - ऐसा परिज्ञान करे । यथा-आत्मैव देवताः सर्वं सर्वमात्मन्यवस्थितम् । आत्मा हि जयनत्येषां कर्मयोगं शरीरिणाम् ॥ ( मनु०-१२.११९ ) पुनः आत्मा एवं परमात्मा के एकाकार का निर्देश करते हुये शास्त्रकार कहते हैं-खं सन्निवेशयेत्वेषु

चेष्टनस्पर्शनेऽनिलम् ।

पंक्ति दृष्ट्योः पटं तेजः स्नेहेऽपो गां च मूर्तिषु ॥

मनसीन्दुं दिशः श्रोत्रे कान्ते विष्णुबलं हरम् । वाच्याग्निं मित्रमुत्सर्गे प्रजने च प्रजापतिम् ॥ ( मनु०-१२.१२०-२१ ) अर्थात् नासिका और उदर आदि शारीरिक आकाश में बाह्य आकाश को, चेष्टा तथा स्पर्शरूप शारीरिक वायु में बाह्य वायु को, उदरसम्बन्धी तथा नेत्रसम्बन्धी शारीरिक तेज में उत्कृष्ट सूर्य - चन्द्रसम्बन्धी बाह्य तेज को, शारीरिक स्नेह अर्थात् जल में बाह्य जल को, शारीरिक पार्थिव ( पृथ्वी सम्बन्धी ) भागों में बाह्य पृथिवी को, मन में चन्द्रमा को, कानों में दिशाओं को, चरणों में विष्णु को, बल में शिव को, वचन में अग्नि को, गुदा में मित्र को, शिश्न में प्रजापति को लीन हुआ समझकर अर्थात् उन सबमें एकत्व की भावना करे । तदनन्तर ब्रह्मध्यान का निर्देश करते हैं— सर्वेषामणीयांसमणोरपि । प्रशासितारं रुक्माभं स्वप्नधीगम्यं विधानं पुरुषं परम् ॥

एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् ।

इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ॥

एष सर्वाणि भूतानि पञ्चभिर्व्याप्य मूर्त्तिभिः ।

जन्मवृद्धिक्षयैर्नित्यं संसारयति चक्रवत् ॥

एवं यः सर्वभूतेषु पश्यत्यात्मानमात्मना । स सर्वं समतामेत्य ब्रह्माभ्येति परं पदम् । ( मनु०-१२.१२२-२४ )

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मनुस्मृति १ हरगोविन्द शास्त्री, पृष्ठ 30 का मूल पृष्ठ
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२२ मनुस्मृतिः आत्मा में लीन बाह्य भूतों अर्थात् आकाशादि को भी भावना करके सम्पूर्ण चराचर जगत् का शासक, सूक्ष्म से भी अधिक सूक्ष्मतर सुवर्ण के समान देदीप्यमान स्वप्न बुद्धि के ग्रहण करने योग्य उस श्रेष्ठ पुरुष का चिन्तन करे । उस परम पुरुष परमात्मा को कुछ लोग अग्नि अर्थात् याज्ञिक अध्वर्यु, कुछ लोग प्रजापति मनु, कुछ लोग ऐश्वर्यवान् होने से इन्द्र, कुछ लोग प्राण तथा कुछ लोग शाश्वत ब्रह्म कहते हैं । वही परमात्मा सम्पूर्ण प्राणियों में शरीरों को उत्पन्न करने वाली पञ्चमूर्तियों ( पञ्च तत्त्व अर्थात् पृथिवी, जल, तेज, वायु तथा आकाश ) से व्याप्त होकर उत्पत्ति, स्थिति और विनाश अर्थात् जन्म, स्थिति और मरण के द्वारा रथ के चक्र के समान उपर्युक्त जन्म-मरणादि कर्मचक्र में बनाये रखता है । इस प्रकार गीतोक्त- ' शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ’ सिद्धान्त को पुष्ट करता हुआ मनु द्वारा निर्देशित जो व्यक्ति सम्पूर्ण जीवों में स्थित परमात्मा को आत्मा के द्वारा देखता है, वह सबमें समानता प्राप्त कर ब्रह्मरूप परमपद ( मोक्ष ) को प्राप्त कर लेता है । वर्ण्य विषय व्यक्ति, समाज एवं राज्य चेतन सत्ता की अभिव्यक्तियाँ हैं । मनुस्मृति में चेतन से जड़ के विकास, सृष्टि, विद्या; उसके साथ कर्म, धर्म एवं व्यवस्था के उदय, कालचक्र आदि का विश्लेषण है । इसके व्यावहारिक पक्ष में समाज के विभिन्न घटकों का विश्लेषण है । मनुस्मृति के प्रथम अध्याय में संसारोत्पत्ति से प्रारम्भ कर देश - धर्म, जाति - धर्म एवं कुल - धर्म के अतिरिक्त पाषण्डी एवं गुण - धर्म अर्थात् अवैदिक राजनीतिक सङ्घटनों की विश्लेषणात्मक व्याख्या प्रस्तुत की गयी है । मनु चारों वर्णों अम्बष्ठादि, अनुलोमज, सूत आदि प्रतिलोमज तथा भुर्जकण्टक आदि सङ्कीर्ण जातियों के संस्कार एवं कर्तव्यों का विश्लेषण करते हैं । ये अविज्ञेय तथा सर्वज्ञ ईश्वर के विषय में बताकर सृष्टि की उत्पत्ति का विवरण देते हैं । सृष्टिरचना के क्रम में विराट् पुरुष ने मनु को उत्पन्न किया । वे संसार के निर्माता हैं । मनु से दस प्रजातियों की उत्पत्ति हुई है; जैसा कि बताया गया है— आसीदिदं

तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् ।

अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥

ततः स्वयंभूर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम् । महाभूतादि वृत्तौजाः प्रादुरासीत्तमोनुदः ॥ ( मनु०-१.५-६ ) तपस्तप्त्वाऽसृजद्यं तु स स्वयं पुरुषो विराट् । तं मां वित्तास्य सर्वस्य स्रष्टारं द्विजसत्तमाः ॥ ( मनु०-१.३३ )