मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 1051–1060
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1051–1060
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मार्क्स और आत्मा १०४९ ही मानते हैं । इनके मतानुसार शिव पति, जीव पशु और मल, कर्म, माया तथा रोधशक्ति पाश हैं । प्रत्यभिज्ञावादीके अनुसार जीव तथा परमात्माका ऐक्य है । जड पूर्ववत् है, किंतु आत्मासे वह भिन्न भी है और अभिन्न भी और सब पूर्ववत् है । अहमर्थ और आत्मा देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदिसे आत्मा पृथक् है, प्रायेण यह बात अधिक दार्शनिकोंको मान्य है, परंतु अहमर्थ ( मैं ) आत्मा है या नहीं, इस विषयमें प्रायः विप्रतिपत्ति है । अधिकाधिक दार्शनिकोंका कहना है कि मैं सुखी ' अहमर्थ, मैं (शोकमैं ) -हीमोहसेआत्माव्याकुलहै, उसमें, मैं हीशान्तमैं, कर्तामैं धीर, मैं, भोक्तामूढ़, मैंइत्यादिदुखी, रूपसे जिसका अनुभव होता है, वही आत्मा है । अहमर्थ ही अनन्त उपद्रवोंसे उपद्रुत बद्ध अज्ञानी होता है । वह कर्म, धर्म, उपासना, ज्ञान आदिद्वारा ज्ञानी होकर मुक्त होता है । जागर, स्वप्न, सुषुप्ति - तीनों अवस्थाओंसे बन्ध और मोक्षकालमें एकरस अन्वयी अहमर्थ ही आत्मा है । यदि अहं - अहं इत्याकारेण अनुभूयमान अहमर्थका मोक्षमें उच्छेद हो जाय, तब तो कोई भी मोक्षके लिये प्रयत्नशील न होगा, प्रत्युत मोक्षकी कथासे ही भागेगा । ' परंतु अद्वैतवादी वेदान्तीका इसके विपरीत यह कहना है कि अहमर्थ मुख्य आत्मा नहीं है, किंतु चिज्जडकी ग्रन्थि ही ' मैं ' या अहंरूपसे भासमान होती है । दूसरे शब्दोंमें कहा जाय तो अधिष्ठान, बुद्धि और चिदाभास - ये ही तीनों मिलकर औपाधिक जीव या ' मैं ' आदि पदोंसे व्यपदिष्ट होते हैं । बुद्धि - आत्मा, जड - चेतन, अनात्मा- आत्माका अन्योन्याध्यास ही ' मैं ' पदार्थ है । जैसे किसी साधारण पुरुषको शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि आदिमें ही आत्मबुद्धि हो जाती है और वह देहादिके नाशमें ही आत्मनाश मानने लगता है, वैसे ही अनात्मरूप अहमर्थमें भी भ्रान्तिसे ही आत्मबुद्धि होती है । मैं जो कभी कर्ता, कभी भोक्ता, कभी सुखी, कभी दुखी, कभी शान्त, कभी धीर एवं कभी मूढ़ है, कभी हृष्ट - पुष्ट,
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१०५० मार्क्सवाद और रामराज्य प्रसन्न, कभी शोक- मोह - परिप्लुत होकर प्रतीत होता है, उसे एकरस शुद्ध स्वप्रकाश आत्मा कैसे कहा जाय? वस्तुतः इस अनेकरूप अहमर्थका जो एकरसभासक अखण्ड भानरूप नित्य बोध है, वही आत्मा है । जैसे स्वर्गादि सुख -प्राप्तिके लिये देहद्वारा प्रयत्नशील ही अग्निकुण्डमें देहकी आहुति कर सकता है, वैसे ही अहमर्थद्वारा प्रयत्नशील सोपाधिक आत्मा निरुपाधिक पदप्राप्तिके लिये सोपाधिक स्वरूपके उच्छेदमें प्रयत्नशील होता है । इसके सिवा यदि अहमर्थ ही आत्मा होता, तो उसका तीनों ही अवस्थाओंमें प्रकाश होना उचित था; क्योंकि आत्मा स्वप्रकाश है । अहंकार, अहंबुद्धिका विषय है । आत्मा अहंबुद्धिका भी भासक साक्षीरूप है । कुछ लोगोंका कहना है कि ' सुखमहमस्वाप्सम्, न किञ्चिदहमवेदिषम्'–' सुखपूर्वक मैं सो रहा था, मैं कुछ भी नहीं जानता था ' इस तरह सुषुप्तिसे ( सोकर ) जागनेपर सौषुप्त सुख अज्ञानकी स्मृति होती है, उसीके साथ अहमर्थ ' मैं ' की भी स्मृति होती है । स्मृति बिना अनुभवके नहीं हो सकती, अतः ' मैं ' का भी सुषुप्तिमें अनुभव होता ही है, परंतु उनका यह कहना उचित नहीं जान पड़ता; क्योंकि अहमर्थ सदा ही इच्छादि गुणोंसे विशिष्ट ही उपलब्ध होता है, परंतु जब कि सुषुप्तिमें इच्छादिका उपलम्भ होता ही नहीं, तब केवल अहमर्थका उपलम्भ कैसे माना जाय? गुणरहित केवल गुणीका उपलम्भ असम्भव है । जैसे रूपादिरहित घटका ज्ञान नहीं हो सकता, वैसे ही इच्छा- द्वेषादि गुणरहित अहमर्थका ज्ञान नहीं हो सकता । गुणीका ग्रहण गुण-ग्रहण बिना नहीं हो सकता । यदि कहा जाय कि एकत्व संख्यारूप गुणसे युक्त ही अहमर्थका सुषुप्तिमें अनुभव होता है तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सुषुप्तिमें विशिष्ट बुद्धि अंगीकार करनेपर उसके सुषुप्तित्वका ही भंग हो जायगा । इसके सिवा गुणि- ग्रहणमें विशेषगुणग्रहण हेतु होता है । अतः रूपादि विशेष गुणग्रहण बिना घटादिका ग्रहण नहीं होता । यदि
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मार्क्स और आत्मा १०५१ कहा जाय कि रूपादिरहित घटादि होते ही नहीं, इसलिये रूपादिके बिना घटादिका ग्रहण नहीं होता, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि जिस समय पाकद्वारा पूर्वरूपका नाश हो चुका और अग्रिम रूपकी उत्पत्ति नहीं हुई, उस क्षणमें और घटाद्युत्पत्तिके अनन्तर क्षणमें रूपादिके बिना भी घटादि रहते ही हैं । ऐसी स्थितिमें गुणग्रहण बिना गुणीका ग्रहण कहाँतक हो सकता है? अतः सुषुप्तिमें निर्गुण सर्वसाक्षिरूप आत्माका ही उपलम्भ होता है, अहमर्थका नहीं । अतएव जाग्रदवस्थामें अहमर्थकी स्मृति भी अमान्य ही है । सुषुप्तिमें अज्ञानका आश्रय और प्रकाशरूपमें अनुभूयमान आत्मासे अहंकार सर्वथा भिन्न ही है । आत्मासे अहंकारकी भिन्नता होते ही उसकी जडता सिद्ध हो जाती है । जो यह कहा जाता है कि ' अहमस्वाप्सम्' अर्थात् मैं सोया, इस रूपसे अहमर्थका सोकर जागनेपर स्मरण होता है, वह भी ठीक नहीं; क्योंकि अहमर्थांशमें स्मरण अमान्य है । किंतु वहीं उसी एक चेतनमें अज्ञान और अहंकारके कल्पित होनेके कारण अहंकारमें अज्ञानाश्रयताकी प्रतीति होती है । अतएव ' अहमस्वाप्सम्' यहीं जब सुषुप्तिमें अहंकारका अनुभव बनता नहीं, तब अर्थात् अज्ञानके आश्रयरूपसे अनुभूत आत्मामें ' अहमस्वाप्सम्' इस परामर्शका पर्यवसान होता है । अतएव जब यह कहा जाता है कि यदि अहमर्थ स्वापका आश्रय न हो, तो केवल चित् ही हो, तब ' चिदस्वपत् स्वयमस्वपत्' (चित् सोया, स्वयं सोया ) इस तरह सुषुप्तिका परामर्श होना चाहिये । यद्यपि अहमर्थाधिष्ठानरूप अविद्योपहित चैतन्य ही सुषुप्तिका आधार है, तथापि परामर्शकालमें अनुभूत अन्तःकरण- संसर्गसे अहमाकार परामर्श बन सकता है । जो यह कहा जाता है कि ' सोऽहम्' इत्याकारक प्रत्यभिज्ञान नहीं बन सकेगा; क्योंकि आत्मा स्वप्रकाश चिद्रूप है, अतः उसका ज्ञान कभी नष्ट न होगा । उसके बिना संस्कार न होगा और संस्कारोंके बिना प्रत्यभिज्ञा न बनेगी । अतएव विवरणाचार्यने कहा है कि अन्तःकरणविशिष्ट
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१०५२ मार्क्सवाद और रामराज्य आत्मामें ही प्रत्यभिज्ञा होती है, निष्कलंक चैतन्यमें प्रत्यभिज्ञा नहीं होती; क्योंकि मोक्षावस्थायी निष्कलंक चैतन्य तो केवल शास्त्रगम्य है । यह सब कथन पूर्वोक्त पक्षके विरुद्ध नहीं है; क्योंकि मोक्षावस्थायी आत्मा केवल शास्त्रसे ही अवगत होता है । इसलिये वचनसे ही यह कहा गया कि उपाधिमात्रविरही निष्कलंक चेतनमें प्रत्यभिज्ञाका निषेध किया गया है । अन्तःकरण पद उपाधिमात्रमें तात्पर्य रखता है । तथा च सुषुप्तिमें अज्ञानोपहित आत्मा भी प्रत्यभिज्ञानार्ह ( पहचाननेयोग्य ) है । इसके सिवा अन्तःकरणराहित्य दशामें विवरणवाक्यद्वारा प्रत्यभिज्ञाका ही निषेध है, अभिज्ञाका नहीं । देखी हुई वस्तुके फिर देखनेपर ' यह वही है ' ऐसा पहचाननेको ' प्रत्यभिज्ञा ' कहा जाता है और केवल ज्ञानको ' अभिज्ञा ' कहा जाता है । सुषुप्ति दशामें अन्तःकरण न होनेसे प्रत्यभिज्ञाके न होनेपर भी यहीं अविद्योपहित चेतनकी ज्ञानरूप अभिज्ञामें कोई बाधा नहीं है । अतः सुषुप्तिमें अहंकाररहित आत्माके अनुभवमें कोई भी आपत्ति नहीं उठायी जा सकती । जो यह कहा जाता है कि यदि सुषुप्तिमें अहमर्थका ग्रहण न होता, तब तो इतने समयतक मैं सोता था या अन्य कोई-' एतावन्तं कालं सुप्तोऽहमन्यो वा ' ऐसा संशय होना चाहिये, ' मैं ही सोया था ' ऐसा निश्चय न होना चाहिये । पर वह भी ठीक नहीं; क्योंकि सुषुप्तिकालमें अनुभूत आत्मामें ही अहंकारका ऐक्याध्यास होनेसे ' मैं ही सोता था ' ऐसा निश्चित प्रत्यय होता है । वास्तवमें ' अहमज्ञः ' इत्यादि स्थलोंमें भी अज्ञान अहमर्थके आश्रित नहीं, किंतु अहंकारके अधिष्ठानभूत चैतन्यमें ही रहता है । इस तरह अज्ञान और अहंकार एक अधिकरणमें रहते हैं, अतः सामानाधिकरण्य या एकाश्रयाश्रितत्व होनेके कारण अज्ञानमें अहमर्थाश्रयत्वकी प्रतीति होती है, जैसे सामान्य, समवाय आदि और सत्ता— दोनोंका ही समान द्रव्यादि आश्रय होनेके कारण ही ' सामान्यं सत्, समवायः सन्' इत्यादि व्यवहार होता है, वैसे ही ' अहमज्ञः ' इत्यादि व्यवहार होते हैं । ऐसी स्थितिमें जैसे कोई पहले दिन चैत्रभिन्न
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मार्क्स और आत्मा १०५३ देवदत्तको भ्रान्तिसे चैत्र मानकर, दूसरे दिन ' सोऽयं चैत्र: ' ऐसा प्रत्यभिज्ञान ( पहचान ) करता है, वैसे ही भ्रान्तिसे अज्ञानाश्रय चित्को भ्रान्तिसे अहमर्थ मानकर दूसरे दिन अज्ञानाश्रयत्वेन अहमर्थका प्रत्यभिज्ञान करता है । इसके सिवा निश्चय होनेपर संशय न होनेका नियम तो है, किंतु निश्चय न होनेपर संशय होनेका नियम नहीं है । अतएव कहा गया है कि ' सत्यारोपे निमित्तानुसरणं न तु निमित्तमस्तीत्यारोपः ' अर्थात् आरोप होनेपर उसके निमित्तका अन्वेषण होता है, यह नहीं कि निमित्तवशात् आरोप हो । जैसे कहीं जल- दर्पणादि प्रतिबिम्ब - निमित्तके रहनेपर भी प्रतिबिम्ब नहीं होता, वैसे ही निश्चयाभाव रहनेपर भी संशय नहीं होता । इसीलिये ' अहमन्यो वा' ऐसा सन्देह नहीं होता । फिर भी यह सन्देह होता है कि ' जब इतने समयतक मैं स्वप्न देखता था, इतने समयतक मैं जागता था — ' एतावन्तं कालमहं स्वप्नं पश्यन्नासमहं जाग्रदासम्' इत्यादि प्रतीतियोंके समान ही ' अहमस्वाप्सम्' मैं सोता था, ऐसी प्रतीति भी होती है, तब फिर क्या कारण है कि पहली दो प्रतीतियोंमें अहमर्थकी स्मृति मानी जाय और ' अहमस्वाप्सम्' इस प्रतीतिमें उसकी स्मृति न मानी जाय? ' पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सर्वत्र स्मर्यमाण आत्माके साथ अभेदारोप होनेके कारण ही अहमर्थांशमें स्मृतित्वका अभिज्ञान होता है । अतः सुषुप्तिमें अहमर्थका अनुभव माननेका कोई भी स्थिर आधार नहीं । यदि कहा जाय कि अपरामर्श- परामर्शभिन्नमें परामर्शत्वका आरोप कहीं नहीं देखा जाता अर्थात् स्मृतिसे भिन्नमें स्मृतित्वका आरोप नहीं देखा जाता तो वह भी ठीक नहीं; क्योंकि स्मर्यमाणरूपसे अनुभूयमान स्मर्यमाणभिन्नमें परामर्शत्वका आरोप होता ही है । अतएव इस कथनका भी कोई महत्त्व नहीं रह जाता कि यदि अहमर्थ आत्मासे भिन्न हो, तब तो ' जो पहले दुखी था, वही अब सुखी हुआ ' इस प्रतीतिके समान ' जो
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१०५४ मार्क्सवाद और रामराज्य पहले मेरेसे भिन्न सोता था, वही अब मैं उत्पन्न हुआ हूँ' ऐसा अनुभव होना चाहिये; क्योंकि जैसे दुखीरूपसे आत्माका पहले ज्ञान होता है, वैसे ' मुझसे अन्य पहले सोया था ', ऐसा प्रथम विज्ञान ही नहीं होता । सुषुप्तिमें जैसे अहमर्थका प्रकाश नहीं होता, वैसे ही मदन्यता ( मेरेसे भिन्नता) -का भी प्रकाश नहीं होता । सुषुप्तिमें अहमर्थके असत्त्वका ज्ञान नहीं होता । जागनेपर अनुभूयमान अहंकारमें सोनेके पहले कालमें गृहीत अहंकारसे अभिन्नता ही गृह्यमाण होती है । अतः अहंकारकी उत्पत्तिका बोध नहीं होता । यदि विवेकियोंको ऐसी बुद्धि होती हो, तो इष्ट ही है । उन्हें तो यह ज्ञान होना ही चाहिये कि सुषुप्तिमें अहमर्थ नहीं था । प्रबोध होनेपर सुषुप्तिके अधिष्ठान चैतन्यमें ही अहमर्थका अध्यास होता है । उसीमें सोनेसे पहलेके अहमर्थका अभेद प्रतीत होता है । इसपर कुछ लोगोंका कहना है कि ' जब अहमर्थ आत्मासे भिन्न सिद्ध हो जाय, तभी स्मर्यमाण आत्मामें अहमर्थके ऐक्यका आरोप होगा और जब वैसा आरोप सिद्ध हो जायगा, तब सुषुप्ति अहमर्थके अप्रकाश होनेसे उसकी आत्मासे भिन्नता सिद्ध होगी । इस तरह अन्योन्याश्रय-दोष अनिवार्य होगा ।' पर यह ठीक नहीं; क्योंकि आत्मासे भिन्नता-सिद्धिके पहले ही सुषुप्तिमें अहमर्थका अप्रकाश सिद्ध हो जाता है । ' अहमस्वाप्सम्' इसीको आत्मपरामर्श मान लेनेसे दृष्टहान और अदृष्टकी कल्पना भी नहीं करनी पड़ेगी । अहं शब्दका गौणार्थ देहादि है । मुख्यार्थ अन्तःकरण और आत्माका अन्योन्याध्यासरूप चिज्जडग्रन्थि है और लक्ष्यार्थ आत्मा है । यदि सुषुप्तिमें अहमर्थका ग्रहण होता, तब तो उसका भी उसी तरह स्मरण होता, जैसे गतदिनके अहमर्थका स्मरण होता है । इसे इष्टापत्ति नहीं कहा जा सकता; क्योंकि पूर्व दिनमें जैसे इच्छादिविशिष्ट आत्मा गृहीत हुआ है, वैसे ही सौषुप्त आत्माका भी परामर्श होना चाहिये था । यदि सुषुप्तिमें अहमर्थका प्रकाश होता तो ' इतने समयतक मैं अभिमन्यमान था ' इस तरह परामर्श अवश्य होता ।
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मार्क्स और आत्मा १०५५ कहा जाता है कि अहमर्थके प्रकाशमें अभिमानका आपादन तो कर्णस्पर्शमें कटि- चालनके समान है; परंतु वह ठीक नहीं; क्योंकि अहमर्थकी अपेक्षासे ही प्रकाश और अभिमान - दोनों ही होते हैं, अतः एक के प्रकाशसे दूसरेका आपादन युक्त ही है । यदि कहा जाय कि सुषुप्तिमें आत्माके प्रकाशमान होनेपर भी ' आत्मेत्यभिमन्यमान आसम्’ इतने कालतक आत्मा ऐसा अभिमन्यमान था - ऐसा अभिमान होना चाहिये, वह भी अनुचित है; क्योंकि अभिमानमें अहमर्थ ही कारण है, आत्मा नहीं । मनकी स्थूलावस्थासे उपहित चिद्रूप अहमर्थकी अपेक्षासे ही अहमाकारवृत्तिरूप अभिमान व्यक्त हो जाता है । वृत्तिरूप होनेपर भी उसके लिये प्रमाण - व्यापारकी आवश्यकता नहीं होती । अहमर्थका प्रकाश भी अहमर्थावच्छिन्न साक्षीरूप ही है, अतः उसे भी अहमर्थसे भिन्न किसीकी अपेक्षा नहीं है । यदि अभिमान साक्षिमात्रसे ही प्रकाशित होता है । यदि सुषुप्ति अहमर्थ हो, तब तो अवश्य ही उसका प्रकाश और अभिमान होना चाहिये । कुछ लोग कहते हैं कि ' सुषुप्तिमें अहमर्थका प्रकाश होता ही है । ' न किञ्चिदहमवेदिषम्'-' मैंने कुछ भी नहीं जाना ' इस अज्ञानपरामर्शका विषय अहमर्थके अज्ञानसे भिन्न ही विषय है । जैसे वेदान्तीके मतमें चिद्रूपांशमें अज्ञान अमान्य है; क्योंकि वह भासमान है, अतः पूर्णानन्दांशमें ही अज्ञान मान्य है, वैसे ही अहमर्थांशमें भी अज्ञान अमान्य है, अन्यथा अहमर्थके भानका विरोध स्पष्ट ही होगा । ' परंतु यह कथन असंगत ही है; क्योंकि साक्षिरूप ज्ञान-अज्ञानका विरोधी नहीं हुआ करता । अतएव अज्ञानका भी साक्षीसे प्रकाश होता है । जैसे मेघसे आच्छादित सूर्यद्वारा ही मेघका प्रकाश होता है, वैसे ही अज्ञानोपहित चैतन्यरूप साक्षीसे ही अज्ञानका प्रकाश होता है । विरोध होनेपर प्रकाश्यप्रकाशकभाव कथमपि उपपन्न नहीं हो सकता था । इसके सिवा यह कहा ही जा चुका कि सुषुप्तिमें अहमर्थ (मैं ) -का प्रकाश नहीं होता । अतएव सुषुप्तिका वर्णन करनेवाली श्रुति भी सुषुप्तिमें अहमर्थके
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१०५६ मार्क्सवाद और रामराज्य अज्ञानको सिद्ध करती है । ' न विजानात्ययमहमस्मि ' अर्थात् सुषुप्ति ' मैं यह हूँ' इस तरह जीवको ज्ञान नहीं होता । कुछ लोग कहते हैं कि ' नात्मानं न परांश्चैव न सत्यं नापि चानृतम् । प्राज्ञः किञ्चन संवेत्ति तुरीयं सर्वदृक् सदा ॥ ' सुषुप्ति-अवस्थाभिमानी प्राज्ञ न अपनेको, न दूसरेको, न सत्यको, न अनृतको - किसी भी तत्त्वको नहीं जानता; इत्यादि श्रुतिवचनके समान आत्मादिके विशेषज्ञान -प्रतिपादनमें ही उक्त श्रुति भी तात्पर्य रखती है, परंतु यह कथन ठीक नहीं है । ' अहरहर्ब्रह्म गच्छन्ति सम्पद्य न विदुरमृतेन प्रत्यूढाः ', इस आत्मबोधक श्रुतिविरोधके कारण उपर्युक्त श्रुतिका विशेषाज्ञान-प्रतिपादनमें तात्पर्य माना जाता है, परंतु ' न विजानात्ययमहमस्मि ' इस श्रुतिके साथ किसी श्रुतिका विरोध नहीं है, अतः यह श्रुति तो अहमर्थके अज्ञानमें भी पर्यवसित होती है । जो कहा जाता है कि ' अहमर्थ स्मर्ता ( स्मरण करनेवाला ) है, यह तो अवश्य ही मान्य है ', इसपर अब विचारना यह है कि वह अविद्यावच्छिन्न चैतन्य है अथवा अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य । यदि प्रथम पक्ष मान्य हो, तब तो ' योऽहमकार्षं सोऽहं सौषुप्तिकाज्ञानादि स्मरामि ' अर्थात् जो मैं कर्मोंका कर्ता था, वही मैं सुषुप्तिके अज्ञानका स्मरण करता हूँ, इस अनुभवसे विरोध होगा; क्योंकि कर्तृत्व अविद्यावच्छिन्न चैतन्यमें कथमपि नहीं बन सकता । यदि अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यको ही स्मर्ता माना जाय, तब तो अहमर्थको ही अनुभव करनेवाला भी मानना होगा; क्योंकि एकाश्रयमें रहनेसे ही स्मृति, संस्कार एवं अनुभवमें कार्यकारणभाव बनता है ॥ इसीसे जो मैं अनुभव करनेवाला था, वही मैं स्मरण कर रहा हूँ, इस तरह प्रत्यभिज्ञा ( पहचान ) होती है । परंतु यह सब कथन निरर्थक हैं; क्योंकि यह कहा जा चुका कि अविद्यावच्छिन्न चैतन्य अज्ञानका अनुभव करनेवाला है और वही जाग्रत्- कालमें अन्तःकरणावच्छिन्न होकर स्मर्ता होता है । इसलिये चैतन्यके अभेदसे अनुभव और स्मरणकी एकाश्रयतामें कोई भी अनुपपत्ति नहीं है । कहा जाता है कि अन्तःकरणरूप उपाधिके
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मार्क्स और आत्मा १०५७ भेदसे अविद्यावच्छिन्न चैतन्यके साथ ऐक्य नहीं हो सकता, यह भी ठीक नहीं है । अविद्यावच्छिन्न चैतन्य ही अन्तःकरणावच्छिन्न होता है, अतः भेदकल्पना असंगत है । फिर भी कहा जाता है कि अविद्या और अन्तःकरणरूप उपाधिका भेद होनेसे मठाकाश और मठाकाशान्तर्गत घटाकाशके समान दोनों उपहितोंका अर्थात् अविद्योपहित और अन्तःकरणोपहितका भेद अवश्य होना चाहिये, परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि यहाँ दृष्टान्त ही असम्प्रतिपन्न है । वही उपाधियाँ परस्पर उपहितकी भेदक होती हैं, जो एक दूसरीसे अनुपहितकी उपधायक होती हैं, अन्यथा कम्बु - अवच्छिन्न आकाश, ग्रीवावच्छिन्न आकाशसे पृथक् ही समझा जाना चाहिये । इस दृष्टिसे यद्यपि मठबहिर्भूत घटसे अवच्छिन्न आकाश मठावच्छिन्न आकाशसे भिन्न कहा जा सकता है; क्योंकि वे दोनों उपाधियाँ एक- दूसरेसे अनुपहित आकाशको ही उपहित बनाती हैं, तथापि मठान्तर्गत घट तो मठोपहित मठाकाशको ही घटोपहित घटाकाश बनाता है, अतः इन दोनोंका परस्पर भेद नहीं कहा जा सकता । इस तरह अविद्यान्तर्गत अन्तःकरण, अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य अविद्यावच्छिन्न चैतन्यसे भिन्न नहीं बन सकता । कहा जाता है कि यदि सुषुप्तिमें अहमर्थ न होता तो ' मैं निर्दुःख होऊँ' इस इच्छासे प्राणियोंकी सुषुप्तिके लिये प्रवृत्ति न होनी चाहिये, परंतु यह भी ठीक नहीं । जैसे ' मैं दुबला हूँ, मोटा हो जाऊँ' इस बुद्धिसे इच्छासे स्थौल्यसम्पादनमें प्रवृत्ति होती है, यहाँ स्थौल्य दशामें कार्श्यके न रहनेपर भी कृशकी स्थौल्य - सम्पादनार्थ प्रवृत्ति होती है । वैसे ही निर्दुःख सुषुप्ति- दशामें अहमर्थके न होनेपर भी अहमर्थकी निर्दुःख होनेको इच्छासे सुषुप्ति प्रवृत्ति हो सकती है । यदि कहा जाय कि कार्श्यादिसे विविक्त ( पृथक् ) शरीरमें ही स्थूलताकी इच्छा होती है, तब प्रकृतमें भी यही कहा जा सकता है कि अन्तःकरणसे निष्कृष्ट केवल साक्षीमात्रकी निर्दुःखताके लिये ही सुषुप्तिमें प्रवृत्ति होती है । ' मैं निर्दुःख होऊँ' इस अनुभवमें 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_34_1_Front
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१०५८ मार्क्सवाद और रामराज्य अहमंश तो अवर्जनीयतया उपस्थित होता है, जैसे ' दूसरेका ग्राम मेरा हो जाय ' यहाँपर सम्बन्धांशको इच्छाविषयता होती है । यदि कहा जाय कि चिन्मात्र निर्दुःख हो ऐसी इच्छा होनी चाहिये, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि चिन्मात्ररूपसे विज्ञान न होनेसे ही ऐसा अनुभव नहीं होता । निर्दुःखका अनुभव है, ऐसी इच्छा होती ही है । कहा जाता है कि जो ' मैं ' सोया था, वही ' मैं ' जागता हूँ, जो ' मैं ' पूर्व दिवसमें करता था, वही ' मैं ' आज कर रहा हूँ, इस तरहके प्रत्यभिज्ञान अहमर्थके भेदमें नहीं हो सकते । इसके सिवा कृतहानि ( किये हुए कर्मोंका बिना फल दिये ही नाश ) और अकृताभ्यागम ( बिना कर्म किये ही फलका आगम ) मानना पड़ेगा । जब प्रतिदिन सुषुप्तिमें अहमर्थका नाश और जागरमें फिर उसकी उत्पत्ति मानी जायगी, तब पूर्वोक्त दूषण अनिवार्य हो जायँगे । कर्ता अहमर्थ और भोक्ता अहमर्थमें भेद होनेसे कर्म और फलभोगमें भी वैयधिकरण्यापत्ति होगी । चैतन्य यद्यपि एक है तथापि उसमें कर्तृत्व- भोक्तृत्व नहीं है । जिस अहमर्थमें कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि होते हैं, वह एक नहीं है । ' अहं करोमि' ऐसी प्रतीति अनुसार अहंकारमें ही कर्तृत्वका आरोप मान्य है । अतएव चैतन्यमें कर्तृत्वादिका आरोप भी निरवकाश है । यदि आरोपसे ही कर्तृत्व मान्य हो, तब तो देहादिमें ही कर्तृत्व, भोक्तृत्व मान लिया जाय, परंतु विचार करनेसे विदित होता है कि उपर्युक्त शंकाएँ निराधार हैं; क्योंकि सुषुप्तिमें नष्ट होकर भी अहंकार कारणरूपसे स्थित ही रहता है । उसीकी जाग्रदवस्थामें फिर उत्पत्ति होती है । इस तरह अहमर्थ एक ही रहता है । अतः अकृताभ्यागम, कृतविप्रणाश आदि कोई दोष न होंगे । यहाँ कुछ लोग यह शंका करते हैं कि ' अथैतत्पुरुषः स्वपिति ' यहाँसे लेकर ' गृहीतं चक्षुर्गृहीतं श्रोत्रं गृहीतं मनः ' इत्यादि श्रुतिमें मन आदिका ही उपराम- लय कहा गया है, अहंकारका लय नहीं बतलाया गया । परंतु इसका समाधान यह है कि मनके उपरममें ही अहंकारका भी उपरम समझ लेना चाहिये; क्योंकि मनमें ही बुद्धि, चित्त, अहंकारका 698 Markasvad Aur Ramrajya_ Section_34_1_Back