श्रीगणेशाय नमः।
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी
Marxvaad Aur Ram Rajya Shri Swami Karapatri Ji Maharaj - Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur · 1158 पृष्ठ · 116 खण्ड
In English
Marxism and Ramrajya
This book is a collection of writings by Swami Karapatri Ji Maharaj that critiques Marxism and various Western philosophies while presenting his own views. The text was compiled from notes written during the author's periods of imprisonment and published in Hindi by Gita Press, Gorakhpur.
This book answers
- What is the critique of marxism according to swami karapatri ji maharaj?
- How does ramrajya relate to indian political philosophy?
- What are the differences between western philosophy and indian thought in this text?
- What views does the author hold on social, economic, and political systems?
विषय सूची
- 698 । श्रीहरिः । मार्क्सवाद और रामराज्य गीताप्रेसगोरखपुर GITA PRESS, GORAKHPUR श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज 102 सं० २०७० आठवाँ पुनर्मुद्रण ३,००० कुल… 1–10
- ( ५ ) सम्पादनविभागके श्रीजानकीनाथ शर्माने, जो जेलमें भी श्रीचरणोंके साथ ही रहे, बड़े परिश्रमसे सब सामग्री क्रमबद्ध करनेका प्रयत्न किया… 11–20
- - पाश्चात्य दर्शन १७ ' दर्शन ' कहा जाता है -' दृश्यते वस्तु याथात्म्यं अनेन इति दर्शनम् । ' दूसरे शब्दोंमें प्रमाणद्वारा आत्मानात्माका ज्ञान जिससे होता… 21–30
- - पाश्चात्य दर्शन २७ चित्रकारके क्षेत्रमें सम्पूर्ण चित्र है । यह सारा यूनानी भाषामें ' टेलिओलौजी ' सिद्धान्त कहलाता है । यान्त्रिक हेतु इससे भिन्न है… 31–40
- - पाश्चात्य दर्शन ३७ नहीं कहा जा सकता । इसी तरहसे सम्पूर्ण जगत् परमेश्वरसे अभिन्न है । पर जगत्के बिना भी वह परमेश्वर रहता है… 41–50
- - पाश्चात्य दर्शन ४७ एवं शाश्वत भी है और वही पुरुषार्थ है । प्रकृति और प्राकृत प्रपंचका जो भान है, जिसके अनुग्रहसे प्रकृति और प्राकृत प्रपंच प्रस्फुरित… 51–60
- - पाश्चात्य दर्शन ५७ विचार एवं पदार्थ तथा कर्ता एवं कर्मके सम्बन्धको ठीक रूपमें समझ सकते हैं । मैं स्वयं अपने लिये मैं हूँ, परंतु दूसरोंके लिये तुम… 61–70
- पाश्चात्य-राजनीति ६७ ज्यादा गरीब न ज्यादा अमीर । प्लेटोने ५०४० व्यक्तियोंके राज्यको आदर्श राज्य माना था; किंतु अरस्तूने माना कि आदर्श राज्यमें गुणात्मक… 71–80
- आधुनिक विचारधारा ७७ ' धर्म सर्वश्रेष्ठ है, राज्य उसके अधीन है । ' ये ही मतभेद गृहयुद्धकी पृष्ठभूमिमें थे… 81–90
- आधुनिक विचारधारा ८७ लिखित नियमोंके अनुसार निर्णय करते थे । इस प्रकार संसद्, कार्यपालिका, न्यायपालिका — राज्यके इन तीनों अंगोंकी स्थापना हुई… 91–100
- आधुनिक विचारधारा ९७ होती है; परंतु शिष्ट, सभ्य, पुरुषकी सम्पत्ति सदा ही परोपकारके काममें आती है… 101–110
- आधुनिक विचारधारा १०७ नियत होकर, निःशंक होकर धर्मका आचरण करो । स्वयं प्रिय, अप्रिय छोड़कर सब काम-क्रोध, लोभ एवं मानको दूरसे ही त्यागकर सब प्राणियोंका… 111–120
- आधुनिक विचारधारा ११७ बनाये थे । उसने प्रतियोगिताद्वारा कर्मचारियोंकी नियुक्ति, सरकारी विभागोंका संघटन, नोट-मुद्रणकला, उपनिवेशसम्बन्धी मताधिकारके… 121–130
- आधुनिक विचारधारा १२७ पड़ा मध्यम वर्ग शोचनीय दशामें है । न वह पूँजीपति ही है न तो सर्वहारा ही! वह स्वयं व्यक्तिगत स्वतन्त्रता चाहता है… 131–140
- आधुनिक विचारधारा १३७ कदम मानते हैं और समय- समयपर एक सत्तावादी मीमांसाने अनिश्चितता दूर की है । दैवी नियम, नैसर्गिक नियम, राज्य नियम या लौकिक नियम, इन… 141–150
- आधुनिक विचारधारा १४७ जनवादी राजसत्ता आधुनिक जनवादी नागरिक जनता निर्वाचनद्वारा ही नहीं, किंतु प्रचारद्वारा भी राज्यकी नीतिपर प्रभाव डालती है… 151–160
- आधुनिक विचारधारा १५७ उसका कार्यक्रम नहीं हो सकता । अतः प्रतिकूलोंकी संख्या बढ़ती है, उसका संघटन होता है और उस संघटनद्वारा कार्यक्रमका विरोध करते हुए एक… 161–170
- आधुनिक विचारधारा १६७ मार्क्सका जन्म एक मध्यमवर्गीय परिवारमें हुआ । पहले उसने वकालतकी शिक्षा ग्रहण की… 171–180
- आधुनिक विचारधारा १७७ जनसत्ताके स्थानपर नेतृसत्ता ही फॉसीवादकी विशेषता थी । रूसी समाजवाद एवं फॉसीवाद दोनों ही सर्वाधिकारवादी अधिनायकवादी हैं… 181–190
- विकासवाद १८७ चुनाव एवं योग्यतम रक्षाका सिद्धान्त सिद्ध होता है । ' फिर डार्विनने यह माना कि ' मेरी यह कल्पना तभी सिद्धान्तित होगी, जब चिरकाल बीतने पर भी… 191–200
- विकासवाद १९७ अनुसार वास्तविक सत्ताके अस्तित्वका ज्ञान उसके दृश्योंद्वारा होता है । यह दृश्य उसकी प्रतिलिपि नहीं, किंतु उसके संकेत हैं… 201–210
- विकासवाद २०७ विकासवाद सर्वथा ही धराशायी हो गया । पृथ्वीकी आयु अबतक जितने भी प्रकारोंसे सिद्ध की गयी, उनमेंसे कोई भी प्रकार इस जूतेके कारण विकासवादकी सब… 211–220
- विकासवाद २१७ इन्हींके साथ मिलता है । मांस भक्षकोंमें बिज्जु, नेवला, ऊदबिलाव अलग -अलग होते हुए भी एक ही प्रकारके हैं । ह्वेल मछली भी मांसभक्षक है… 221–230
- विकासवाद २२७ नर्स द्वीपके प्राणियोंकी अफ्रीकाके प्राणियोंके साथ बहुत कुछ तुल्यता है । प्रशान्त महासागर ( पैसेफिक ) -के द्वीपोंमें घोंघोंकी अनेक जातियाँ… 231–240
- विकासवाद २३७ पिण्ड पूँछदार और चपटे सिरवाले जन्तुका आकार धारण कर लेते हैं । फिर इनके गलेके पास मछलियोंकी तरह श्वास लेनेके गलफड़े बन जाते हैं… 241–250
- विकासवाद २४७ शरीरसम्बन्धी उत्पादक सम्बन्ध कुछ भी प्रतीत नहीं होता । अतः मनुष्य न तो पशुश्रेणीका है और न वनस्पतिश्रेणीका ही, अतः तीनोंका ही कार्य- कारणभाव… 251–260
- विकासवाद २५७ सबसे अधिक संख्या उन लोगोंकी है, जो ५ फुट ८ इंचसे ९ इंच लम्बे होते हैं । इनसे कम वे हैं, जिनकी लम्बाई ५ फुट ७ इंचसे ८ इंचतक और ५ फुट ९ इंचसे… 261–270
- विकासवाद २६७ दूसरे नियमका उदाहरण कलमी आम है । कलमी आम बोनेसे दो पीढ़ियोंमें वह साधारण आम हो जाता है… 271–280
- विकासवाद २७७ ' आर्योंका आदिदेश भारत' पुस्तकमें भारतको ही आर्योंकी जन्मभूमि माना है । पाश्चात्त्य लोग गोरे, लम्बे, बड़े सिरवाले भारत, ईरान, योरोपवासियोंको… 281–290
- विकासवाद २८७ सुस्पष्ट है कि घटादि कार्य सशरीर व्यक्तियोंसे निर्मित होते हैं, परंतु अंकुरादि कार्य अशरीरसे निर्मित मान्य होते हैं… 291–300
- विकासवाद २९७ परंतु केवल प्रत्यक्षवादी दूसरोंके अज्ञान, संशय, भ्रान्ति, जिज्ञासा आदि प्रत्यक्ष प्रमाणसे कैसे जान सकेंगे? श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना,… 301–310
- विकासवाद ३०७ प्रकृतिको जब कुछ ज्ञान ही नहीं, तब वह सुव्यवस्थित विचित्र विश्वका निर्माण कैसे कर सकती है? अतः सर्वज्ञ ईश्वर मानना चाहिये… 311–320
- विकासवाद ३१७ जाने किसी भी तरह पीनेसे उसका फल होता है । किन्हीं मूषकोंकी शिवमन्दिरमें दीपककी बाती उसका देनेसे, किसी पक्षीकी बाजके भयसे अन्नपूर्णाकी… 321–330
- माक्सीय द्वन्द्ववाद ३२७ जन्मसंस्कारविद्यादेः शक्तेः स्वाध्यायकर्मणोः । ह्रासदर्शनतो ह्रासः सम्प्रदायस्य मीयताम् । (२… 331–340
- माक्सीय द्वन्द्ववाद ३३७ चाहता है । सुधारवाद वर्गसंघर्षको न मानकर वर्गसहयोगका प्रतिपादन करता है… 341–350
- वर्ग संघर्ष ३४७ राष्ट्रिय सम्पत्ति बना लिया जाय । चौथी सभा १८६ ९ में हीवाल (स्विटजरलैंड ) में हुई… 351–360
- - वर्ग संघर्ष ३५७ भी नहीं हो सकती । आर्थिक असंतुलन आर्थिक असंतुलन मिटानेके लिये ही शास्त्रोंमें दानका महत्त्व कहा गया है… 361–370
- वर्ग संघर्ष ३६७ बताता है । भौतिक उत्पत्ति, पैदावारमें परिवर्तन होनेसे बौद्धिक उत्पत्तिमें भी परिवर्तन होता है… 371–380
- वर्ग संघर्ष ३७७ किसीका अनिष्ट- चिन्तन नहीं करते थे । धनवान् बलवान्को देखकर उन्हें ईर्ष्या नहीं होती थी… 381–390
- - वर्ग संघर्ष ३८७ सामान्यरूपसे नित्य अनेक समवेत धर्म ही जातिपदसे व्यपदिष्ट होता है । अनेक गोव्यक्तियोंमें समवेत नित्य गोत्व धर्म ही जाति है… 391–400
- वर्ग संघर्ष ३ ९७ सकता है । संतुलित समता, संतुलित विषमता ही मान्य हो सकती है । शरीरमें भी हाथ, पाँव, पेट, पीठ आदिमें तथा एक हाथकी ही अँगुलियोंमें भी… 401–410
- वर्ग संघर्ष ४०७ ही नहीं, अतः दूसरी पार्टीकी वहाँ आवश्यकता नहीं । पूँजीवादी राष्ट्रोंमें विभिन्न वर्ग हैं, अतः उन वर्गोंका प्रतिनिधित्व करनेवाली पार्टियाँ… 411–420
- वर्ग संघर्ष ४१७ लाभका डर न होनेसे, पैदावार एवं शिक्षामें उन्नति होना असम्भव है । प्रायः इसके उदाहरणके रूपमें रूसका नाम लिया जाता है, परंतु वहाँकी… 421–430
- वर्ग संघर्ष ४२७ भी वहाँ मजदूरोंकी सरकार न बन पायी । इससे स्पष्ट है कि वहाँके मजदूरोंको वर्ग- विध्वंसादिमें कोई रुचि नहीं है! बेकारोंको अपने जीवन चलानेकी… 431–440
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ४३७ साथ, उपयोग एवं माँगका सम्बन्ध रहता है । एक ज्ञानशून्य मनुष्य और बकरेके लिये रोटी या नीमकी पत्तीका जो महत्त्व है, वह हीरेका नहीं… 441–450
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ४४७ स्थिति लाभ और कामकी स्थितिको देखकर समाज या सरकार भी औचित्यके आधारपर मजदूरीका दर निर्णय कर सकते हैं… 451–460
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ४५७ शोषणकी शक्ति और अधिकार है । समाजमें जहाँ कहीं शोषण होगा, इसी शक्ति एवं अधिकारके बलपर होगा… 461–470
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ४६७ फासिस्टवाद, रूसी समाजवादियोंका डिक्टेटरवाद सब एक ही -जैसा है । भारतमें भी समाजवादी ढंगकी समाज -रचनाका प्रयत्न चल रहा है, जिसका… 471–480
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ४७७ पूँजीपति उसे सौदेके मूल्यसे वसूल कर लेता है, परंतु उसपर मुनाफा वसूल नहीं किया जा सकता, वह घटता- बढ़ता नहीं… 481–490
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ४८७ सहायक ही बन सकता है । बहुत सम्भव है अपने अज्ञानके कारण वह क्रान्तिका विरोध भी करने लगे, परंतु उसके हितको ध्यानमें रखकर सामाजिक… 491–500
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ४९७ फल नहीं; क्योंकि यह एक नयी तपस्या है— स्वामित्वं चैव दातृत्वं धनिकत्वं तपःफलम् । एनसः फलमर्थित्वं दास्यत्वं च दरिद्रता… 501–510
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ५० ९ निराधार हैं, वैसे ही किसानोंकी भी दो प्रकार श्रमकल्पना निरर्थक एवं निराधार है… 511–520
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ५१ ९ रह जाती है और पैदावारका क्रम टूट जाता है । ' ' मुनाफेके रूपमें पैदावारके लिये परिश्रम करनेवालोंका जो श्रम निकालकर एक तरफ रख… 521–530
- माक्सय अर्थ- व्यवस्था ५२ ९ पुनर्व्याख्या मानते हुए साम्यवादको पुराने मार्क्सवादसे भिन्न मानते हैं… 531–540
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ५३९ कह सकते हैं कि परवित्तापहरणको अपराध मानना पुराने जमानेकी बात थी, आज यह अपराध नहीं है… 541–550
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ५४९ इसीलिये वे समुद्रवसना पर्वतस्तनमण्डला धरित्रीको विष्णुपत्नी मानते हैं— समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले… 551–560
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ५५ ९ मजदूरोंद्वारा की गयी पैदावारका उपभोग किसान भी करता है । किसानद्वारा की गयी पैदावारका मिल मजदूर भी उपभोग करता है… 561–570
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ५६ ९ स्वतन्त्रतापूर्वक वस्तु तैयार करता है । स्वतन्त्रतापूर्वक विनियोग करता है… 571–580
- ऐतिहासिक भौतिकवाद ५७९ जंगल नष्ट होनेसे जमीका कटाव बढ़ गया । प्रकृतिकी उथल- पुथलसे कितने ही साम्राज्य भूगर्भमें विलीन हो गये… 581–590
- ऐतिहासिक भौतिकवाद ५८९ जमा करता है और उसका सूद भी प्राप्त करता है । माली हालत या भौतिक अवस्था भले ही तत्सम्बन्धित नियमोंकी आधारभित्ति हो, परंतु ' दार्शनिक… 591–600
- ऐतिहासिक भौतिकवाद ५ ९९ बालि, अर्जुन, भीमकी शक्तिकी बराबरी आज कौन कर सकता है? तथापि उन लोगोंने अपौरुषेय शास्त्रों एवं तदाश्रित धर्म, दर्शन एवं आर्ष… 601–610
- ऐतिहासिक भौतिकवाद ६०९ है–' बुद्धेः फलमनाग्रहः । ' और तत्त्वका पक्षपात बुद्धिका स्वभाव होता है-' तत्त्वपक्षपातो हि धियां स्वभावः… 611–620
- ऐतिहासिक भौतिकवाद ६१ ९ फिर उसका कितने दिनोंमें अध्ययन हो सकेगा और कौन, कब तथा क्या निष्कर्ष निकाल सकेगा और कब उसे कार्यान्वित किया जायगा? इतिहासका… 621–630
- - मार्क्स दर्शन ६२९ चलनेसे गुणों और विशेषणोंमें वृद्धि होती है । कारणकी ओर जानेसे निर्गुणता, निर्विशेषताकी वृद्धि होती जाती है; फिर भी कारणसे भिन्न कार्य… 631–640
- - मार्क्स दर्शन ६३ ९ तो अभाव सभीको सर्वत्र सुलभ ही है । फिर कार्योत्पत्तिमें बाधा न होनेसे सदा ही कार्योत्पत्ति होती रहनी चाहिये… 641–650
- - मार्क्स दर्शन ६४९ होता, तब तो उन -उन निमित्तोंको लेकर यथेष्ट क्षीर बनाया जा सकता था । परंतु यह भी कथन ठीक नहीं है, तृणादिका क्षीर आदि परिणाम निष्कारण… 651–660
- - मार्क्स दर्शन ६५ ९ प्रतिषेधके प्रतिषेधका कोई अर्थ नहीं है । आकाशसे वायुकी उत्पत्ति होती है, फिर भी आकाश नहीं निवृत्त होता… 661–670
- - मार्क्स दर्शन ६६ ९ होता है, यह श्रुतियों एवं युक्तियोंसे सिद्ध है । यहाँ वाद - प्रतिवाद, समन्वय आदिका सिद्धान्त व्यभिचरित एवं अत्यल्पदेशीय ही सिद्ध होता… 671–680
- - मार्क्स दर्शन ६७९ है कि ' हाँ ' नहीं है और ' नहीं ' हाँ है । ऊपरी दृष्टिसे द्वन्द्वमानकी भाषा बहुत ही विरोधपूर्ण है… 681–690
- - मार्क्स दर्शन ६८ ९ अभावकी कल्पना की और उनके समन्वयसे अंकुरकी उत्पत्ति मान ली, परंतु वस्तुतः यहाँ भाव- अभाव-जैसा विभाजन और उसके समन्वयका कोई प्रश्न ही… 691–700
- - मार्क्स दर्शन ६ ९९ लेकर बड़ी- से- बड़ी चीज, एक बालूके कणसे सूर्यतक, प्रोटिस्टा (प्राथमिक जीवित कोष) -से मनुष्यतक, लगातार आविर्भाव और तिरोधानकी अवस्थामें… 701–710
- - मार्क्स दर्शन ७०९ अवस्थाएँ होती हैं, इनमें पूर्व - पूर्व अवस्था उत्तरोत्तर अवस्थाओंकी जननी है - सहायक है, विरोधकल्पना दूरभिसंधिपूर्ण है… 711–720
- - मार्क्स दर्शन ७१९ व्यर्थकी परीक्षाएँ होती हैं, वे अमान्य होती हैं । कहा जाता है कि ' प्रत्येक वस्तु विराट् विश्वप्रक्रियाका एक अंग है… 721–730
- - मार्क्स दर्शन ७२९ न आयी हो; अतः शताब्दियोंकी परिवर्तनपरम्परा कोई अभूतपूर्व घटना नहीं है । गुण-परिवर्तन ‘ पूँजीवादमें समाज और प्रकृतिका विरोध तो विद्यमान… 731–740
- - मार्क्स दर्शन ७३९ इस प्रकार उद्घाटन हो जाता है । करोड़ों बार दुहरानेसे मनुष्यके अभ्यास और अनुभव चेतनामें तर्क संकेतका रूप धारण कर लेते हैं… 741–750
- - मार्क्स दर्शन ७४९ परंतु एतावता क्या कोई कह सकता है कि ' उनमें कोई व्यक्ति या घटना भी महत्त्वपूर्ण नहीं?' इसीलिये भारतीय महर्षियोंने योगज ऋतम्भरा… 751–760
- - मार्क्स दर्शन ७५९ वस्तुतः ईमानदारीकी बात यही है कि मार्क्सवादी, ईश्वरवादी दोनोंका समन्वय हो नहीं सकता… 761–770
- - मार्क्स दर्शन ७६ ९ ता येनैवानुभूयन्ते सोऽध्यक्षः पुरुषः परः । ' ( श्रीमद्भा० ७ । ७ । २५ ) । इस शरीरकी विभिन्न अवस्थाओंमें उसके भीतर अन्तरसे भी… 771–780
- - माक्सय समाज व्यवस्था ७७९ जैसे स्वास्थ्यकर, तृप्तिकर स्वच्छ जलसे ही प्यास बुझाना उचित है, वैसे ही तृप्तिकर, स्वास्थ्यवर्द्धक स्त्री- पुरुष सम्बन्धमें कोई… 781–790
- - माक्सय समाज व्यवस्था ७८९ रामराज्यके अनुसार सन्नारीके बलपर कुल, गोत्र एवं वंशकी रक्षा होगी । समाजवादी - व्यवस्थामें इच्छानुसार किन्हीं नये - नये… 791–800
- माक्सय समाज व्यवस्था ७९९ नहीं हैं, उनकी इच्छापूर्तिमें बड़ी कठिनाई पड़ती है । जबतक पूँजीपतियोंके पास साधन हैं, उनकी इच्छापूर्तिमें सरलता रहेगी… 801–810
- माक्सय समाज-व्यवस्था ८० ९ कहनेके सिवा कि ' परमात्मा, ईश्वर, धर्मके अतिरिक्त मार्क्सवादी स्थिर आत्माका भी अस्तित्व नहीं मानता ', कोई दूसरा चारा नहीं… 811–820
- - मार्क्सय समाज व्यवस्था ८१ ९ लाखों बार दुहरानेपर संज्ञाके अन्दर तर्कज्ञानके रूपमें प्रतिष्ठित हो जाता है… 821–830
- मार्क्स और ज्ञान ८२९ आदर्शवाद ' काल्पनिक धारणाओंका प्रयोग किसी -न-किसी प्रकारकी वस्तुओं अथवा विचारपद्धतियोंकी सुव्यस्थित दृष्टियोंके निरूपणमें ही किया… 831–840
- मार्क्स और ज्ञान ८३९ है, उसके बाद सविकल्प ज्ञान होता है । इन्द्रियोंके द्वारा मनोव्यापारके पहले प्रतिपत्ताको प्रथम अविकल्पित वस्तुमात्रका ही ग्रहण होता है… 841–850
- मार्क्स और ज्ञान ८४९ कुछ लोग कहते हैं कि ' भावरूप अज्ञान ज्ञानके विरुद्ध नहीं है; क्योंकि जागरणकालमें ज्ञान और अज्ञान दोनों ही एक साथ रहते हैं… 851–860
- मार्क्स और ज्ञान ८५९ प्रदेशमें ज्ञानसे एकदेशेन नाश उसी तरह होता है, जिस तरह महान्धकारमें खद्योत-प्रकाशसे एकदेशेन अन्धकारका नाश होता है… 861–870
- मार्क्स और ज्ञान ८६९ नहीं होता । सदृशभागमात्रका सम्प्रयोग होनेसे विशेष दर्शन-सामग्री न होनेके कारण अध्यास होता है… 871–880
- मार्क्स और ज्ञान ८७९ है । फिर भी कहा जाता है कि ' यदि बोध स्वप्रकाश ही है, तो वेदान्तोंका क्या प्रयोजन रहेगा? ' परंतु इसका समाधान यही है कि उसी बोधका… 881–890
- मार्क्स और ज्ञान ८८९ ( कठोप० १ । २ । १८ ) इत्यादि श्रुतियोंसे जीवात्माकी नित्यताका प्रतिपादन होता है… 891–900
- मार्क्स और ज्ञान ८९९ होती । छेदनक्रिया छेत्ताका स्वरूप नहीं होती । ' परंतु यह पक्ष ठीक नहीं है; क्योंकि कहा जा चुका है कि प्रकाशस्वरूप सूर्यका प्रकाश… 901–910
- मार्क्स और ज्ञान ९० ९ स्फुरणरूप ज्ञान नित्य है, वैसे ही अन्तःकरणवृत्तिरूप सुख भी अनित्य है; परंतु ब्रह्मात्मस्वरूप सुख नित्य ही है… 911–920
- मार्क्स और ज्ञान ९१ ९ उसी अखण्ड बोधका विवर्त्त है । अन्वयव्यतिरेकसे जैसे मृत्तिका होनेपर ही मृद्विकार घटादि उपलब्ध होते हैं, मृत्तिकाके बिना वे उपलब्ध… 921–930
- मार्क्स और आत्मा ९ २९ अन्य बोधका प्रागभाव अन्य बोधसे सिद्ध होगा, यह भी नहीं कहा जा सकता । इस तरह अत्यन्ताबाध्य होनेके कारण वही बोधस्वरूप भी है… 931–940
- मार्क्स और आत्मा ९३९ है । यद्यपि वृत्तिव्याप्त विषयस्थ चित्प्रतिबिम्ब ही फल है, तथापि ' मयेदं विदितम्' मैंने यह जाना, इस तरह प्रमाण- प्रमेयसम्बन्ध… 941–950
- मार्क्स और आत्मा ९४९ चिदाभासव्याप्त सक्रिय बुद्धिके साथ आत्माका ऐक्याध्यास होनेसे ही ' आत्मा जानाति' यह व्यवहार होता… 951–960
- मार्क्स और आत्मा ९ ५९ नहीं । ऐसा माननेपर उस प्रमाताकी अवगतिके लिये किसी अन्य प्रमाताकी तथा उसकी अवगतिके लिये किसी दूसरे प्रमाताकी अपेक्षा होगी और इस तरह… 961–970
- मार्क्स और आत्मा ९६ ९ अतिक्रमण किये बिना काल विशेषमें स्थिति होती है । स्थिति शब्दसे स्वार्थमें ही तल प्रत्यय होनेसे स्थिति अर्थमें स्थितिताका प्रयोग है… 971–980
- मार्क्स और आत्मा ९७९ क्षणिक है । यह तीनों अवस्तु स्वभाव ( निरुपाख्य) है । बुद्धिपूर्वक भावोंका विनाश प्रतिसंख्या निरोध तद्विपरीत अप्रतिसंख्यानिरोध होता है… 981–990
- मार्क्स और आत्मा ९८९ स्वाकारको ग्रहण करके पश्चात् आरोप करता है अथवा जिस समय स्वाकार ग्रहण करता है, उसी समय आरोपण भी करता है? बौद्धमतमें ज्ञान क्षणिक है,… 991–1000
- मार्क्स और आत्मा ९९९ बाह्यालम्बन नहीं होते हैं । विज्ञानवादीका यह भी कहना है कि यह नहीं कहा जा सकता कि विज्ञान इन्द्रियकी तरह स्वयं विलीन ( अज्ञात ) रहकर… 1001–1010
- मार्क्स और आत्मा १०० ९ उपलब्धि हो सकती है । सर्वावयव सन्निकर्ष न होनेसे जब सब अवयवोंका उपलम्भ नहीं होता तो अवयवीकी उपलब्धि कैसे होगी… 1011–1020
- मार्क्स और आत्मा १०१ ९ निष्कर्ष यह है कि साक्षिस्वरूप अनुभव यद्यपि सर्वव्यापी है तो भी अविद्यासे आवृत होनेके कारण वह प्रकट नहीं होता… 1021–1030
- मार्क्स और आत्मा १०२ ९ भी न सूक्ष्म हो सकता है, न स्थूल, तब तो क्या अर्थ, क्या ज्ञान सभी वस्तु विचारासह ठहरते हैं… 1031–1040
- मार्क्स और आत्मा १०३ ९ प्रतिपादित अर्थका अवबोधक हो, तभी प्रमाण होता है, अन्यथा नहीं । अन्य लोग प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द- ये तीन प्रमाण मानते हैं… 1041–1050
- मार्क्स और आत्मा १०४९ ही मानते हैं । इनके मतानुसार शिव पति, जीव पशु और मल, कर्म, माया तथा रोधशक्ति पाश हैं… 1051–1060
- मार्क्स और आत्मा १०५ ९ भी अन्तर्भाव होता है । यद्यपि अहमर्थ -चित्, चैतन्यसे अघटित - अयुक्त ही है… 1061–1070
- मार्क्स और आत्मा १०६ ९ हुई । मोक्षधर्मके इन वाक्योंमें सांख्यमतानुसार महत्तत्त्व और अहंकारमें ही ' महान् ' और ' अहंकार ' शब्दका प्रयोग हुआ है… 1071–1080
- मार्क्स और आत्मा १०७९ ही ' महत्तत्त्व ' कहा जाता है । जैसे घोर नींदसे अकस्मात् जगाये जानेपर पहले अहंकार - ममकारसे शून्य केवल कुछ ज्ञान होता है, वैसे ही… 1081–1090
- मार्क्स और ईश्वर १०८९ सार्थक बनाता है । संसारकी सभी वस्तुओं एवं घटनाओंसे किसी विशेष प्रयोजनकी सूचना मिलती है… 1091–1100
- मार्क्स और ईश्वर १० ९९ ' मयूरोंको कौन चित्रित करता है? कोकिलोंको कौन मधुरालाप सिखाता है? जैसे अग्निमें उष्णता, जलमें शीतलता, वायुमें वहनशीलता स्वभावसे ही… 1101–1110
- मार्क्स और ईश्वर ११० ९ इस प्रकार केवल शून्य ही रह जाता है । ' बौद्धदर्शनमें सर्वास्तित्ववादी तथा शून्यवादी – दोनों ही भौतिकवादी मतकी पुष्टि करते हैं… 1111–1120
- उपसंहार १११ ९ मात्स्यन्यायको रोककर सर्वसामंजस्य सर्वहित सम्पादनार्थ राज्य- व्यवस्था होती है । अहिंसा, सत्यादि धर्मका प्रतिष्ठापन, ब्रह्मविज्ञान -विस्तार… 1121–1130
- उपसंहार ११२ ९ सत्यवादिताका भी पता लग जाता है । अवैरकारिता, भद्रता, क्षुद्रताका ज्ञान भी प्रसंगवशात् प्रत्यक्षसे ही जाना जा सकता है… 1131–1140
- उपसंहार ११३९ ' नराणां च नराधिपम्' ( गी० १० । २७ ) ' नाविष्णुः पृथिवीपतिः । ' (दे० भा० ) ' महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति । ' (मनु० ७… 1141–1150
- रामराज्यका स्वरूप ११४९ भी उस समय माता, पिता एवं गुरुजनोंका अनादर नहीं करता था । नन च वाक्यंभूमिहरणंहि वृद्धानामुल्लङ्घयतितत्र परनारीपराङ्मुखाःपुण्यकृत्… 1151–1158