मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी
Marxvaad Aur Ram Rajya Shri Swami Karapatri Ji Maharaj - Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur · 1158 पृष्ठ · 116 खण्ड
विषय सूची
- 698 । श्रीहरिः । मार्क्सवाद और रामराज्य गीताप्रेसगोरखपुर GITA PRESS, GORAKHPUR श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज 102 सं० २०७० आठवाँ पुनर्मुद्रण ३,००० कुल… 1–10
- ( ५ ) सम्पादनविभागके श्रीजानकीनाथ शर्माने, जो जेलमें भी श्रीचरणोंके साथ ही रहे, बड़े परिश्रमसे सब सामग्री क्रमबद्ध करनेका प्रयत्न किया… 11–20
- - पाश्चात्य दर्शन १७ ' दर्शन ' कहा जाता है -' दृश्यते वस्तु याथात्म्यं अनेन इति दर्शनम् । ' दूसरे शब्दोंमें प्रमाणद्वारा आत्मानात्माका ज्ञान जिससे होता… 21–30
- - पाश्चात्य दर्शन २७ चित्रकारके क्षेत्रमें सम्पूर्ण चित्र है । यह सारा यूनानी भाषामें ' टेलिओलौजी ' सिद्धान्त कहलाता है । यान्त्रिक हेतु इससे भिन्न है… 31–40
- - पाश्चात्य दर्शन ३७ नहीं कहा जा सकता । इसी तरहसे सम्पूर्ण जगत् परमेश्वरसे अभिन्न है । पर जगत्के बिना भी वह परमेश्वर रहता है… 41–50
- - पाश्चात्य दर्शन ४७ एवं शाश्वत भी है और वही पुरुषार्थ है । प्रकृति और प्राकृत प्रपंचका जो भान है, जिसके अनुग्रहसे प्रकृति और प्राकृत प्रपंच प्रस्फुरित… 51–60
- - पाश्चात्य दर्शन ५७ विचार एवं पदार्थ तथा कर्ता एवं कर्मके सम्बन्धको ठीक रूपमें समझ सकते हैं । मैं स्वयं अपने लिये मैं हूँ, परंतु दूसरोंके लिये तुम… 61–70
- पाश्चात्य-राजनीति ६७ ज्यादा गरीब न ज्यादा अमीर । प्लेटोने ५०४० व्यक्तियोंके राज्यको आदर्श राज्य माना था; किंतु अरस्तूने माना कि आदर्श राज्यमें गुणात्मक… 71–80
- आधुनिक विचारधारा ७७ ' धर्म सर्वश्रेष्ठ है, राज्य उसके अधीन है । ' ये ही मतभेद गृहयुद्धकी पृष्ठभूमिमें थे… 81–90
- आधुनिक विचारधारा ८७ लिखित नियमोंके अनुसार निर्णय करते थे । इस प्रकार संसद्, कार्यपालिका, न्यायपालिका — राज्यके इन तीनों अंगोंकी स्थापना हुई… 91–100
- आधुनिक विचारधारा ९७ होती है; परंतु शिष्ट, सभ्य, पुरुषकी सम्पत्ति सदा ही परोपकारके काममें आती है… 101–110
- आधुनिक विचारधारा १०७ नियत होकर, निःशंक होकर धर्मका आचरण करो । स्वयं प्रिय, अप्रिय छोड़कर सब काम-क्रोध, लोभ एवं मानको दूरसे ही त्यागकर सब प्राणियोंका… 111–120
- आधुनिक विचारधारा ११७ बनाये थे । उसने प्रतियोगिताद्वारा कर्मचारियोंकी नियुक्ति, सरकारी विभागोंका संघटन, नोट-मुद्रणकला, उपनिवेशसम्बन्धी मताधिकारके… 121–130
- आधुनिक विचारधारा १२७ पड़ा मध्यम वर्ग शोचनीय दशामें है । न वह पूँजीपति ही है न तो सर्वहारा ही! वह स्वयं व्यक्तिगत स्वतन्त्रता चाहता है… 131–140
- आधुनिक विचारधारा १३७ कदम मानते हैं और समय- समयपर एक सत्तावादी मीमांसाने अनिश्चितता दूर की है । दैवी नियम, नैसर्गिक नियम, राज्य नियम या लौकिक नियम, इन… 141–150
- आधुनिक विचारधारा १४७ जनवादी राजसत्ता आधुनिक जनवादी नागरिक जनता निर्वाचनद्वारा ही नहीं, किंतु प्रचारद्वारा भी राज्यकी नीतिपर प्रभाव डालती है… 151–160
- आधुनिक विचारधारा १५७ उसका कार्यक्रम नहीं हो सकता । अतः प्रतिकूलोंकी संख्या बढ़ती है, उसका संघटन होता है और उस संघटनद्वारा कार्यक्रमका विरोध करते हुए एक… 161–170
- आधुनिक विचारधारा १६७ मार्क्सका जन्म एक मध्यमवर्गीय परिवारमें हुआ । पहले उसने वकालतकी शिक्षा ग्रहण की… 171–180
- आधुनिक विचारधारा १७७ जनसत्ताके स्थानपर नेतृसत्ता ही फॉसीवादकी विशेषता थी । रूसी समाजवाद एवं फॉसीवाद दोनों ही सर्वाधिकारवादी अधिनायकवादी हैं… 181–190
- विकासवाद १८७ चुनाव एवं योग्यतम रक्षाका सिद्धान्त सिद्ध होता है । ' फिर डार्विनने यह माना कि ' मेरी यह कल्पना तभी सिद्धान्तित होगी, जब चिरकाल बीतने पर भी… 191–200
- विकासवाद १९७ अनुसार वास्तविक सत्ताके अस्तित्वका ज्ञान उसके दृश्योंद्वारा होता है । यह दृश्य उसकी प्रतिलिपि नहीं, किंतु उसके संकेत हैं… 201–210
- विकासवाद २०७ विकासवाद सर्वथा ही धराशायी हो गया । पृथ्वीकी आयु अबतक जितने भी प्रकारोंसे सिद्ध की गयी, उनमेंसे कोई भी प्रकार इस जूतेके कारण विकासवादकी सब… 211–220
- विकासवाद २१७ इन्हींके साथ मिलता है । मांस भक्षकोंमें बिज्जु, नेवला, ऊदबिलाव अलग -अलग होते हुए भी एक ही प्रकारके हैं । ह्वेल मछली भी मांसभक्षक है… 221–230
- विकासवाद २२७ नर्स द्वीपके प्राणियोंकी अफ्रीकाके प्राणियोंके साथ बहुत कुछ तुल्यता है । प्रशान्त महासागर ( पैसेफिक ) -के द्वीपोंमें घोंघोंकी अनेक जातियाँ… 231–240
- विकासवाद २३७ पिण्ड पूँछदार और चपटे सिरवाले जन्तुका आकार धारण कर लेते हैं । फिर इनके गलेके पास मछलियोंकी तरह श्वास लेनेके गलफड़े बन जाते हैं… 241–250
- विकासवाद २४७ शरीरसम्बन्धी उत्पादक सम्बन्ध कुछ भी प्रतीत नहीं होता । अतः मनुष्य न तो पशुश्रेणीका है और न वनस्पतिश्रेणीका ही, अतः तीनोंका ही कार्य- कारणभाव… 251–260
- विकासवाद २५७ सबसे अधिक संख्या उन लोगोंकी है, जो ५ फुट ८ इंचसे ९ इंच लम्बे होते हैं । इनसे कम वे हैं, जिनकी लम्बाई ५ फुट ७ इंचसे ८ इंचतक और ५ फुट ९ इंचसे… 261–270
- विकासवाद २६७ दूसरे नियमका उदाहरण कलमी आम है । कलमी आम बोनेसे दो पीढ़ियोंमें वह साधारण आम हो जाता है… 271–280
- विकासवाद २७७ ' आर्योंका आदिदेश भारत' पुस्तकमें भारतको ही आर्योंकी जन्मभूमि माना है । पाश्चात्त्य लोग गोरे, लम्बे, बड़े सिरवाले भारत, ईरान, योरोपवासियोंको… 281–290
- विकासवाद २८७ सुस्पष्ट है कि घटादि कार्य सशरीर व्यक्तियोंसे निर्मित होते हैं, परंतु अंकुरादि कार्य अशरीरसे निर्मित मान्य होते हैं… 291–300
- विकासवाद २९७ परंतु केवल प्रत्यक्षवादी दूसरोंके अज्ञान, संशय, भ्रान्ति, जिज्ञासा आदि प्रत्यक्ष प्रमाणसे कैसे जान सकेंगे? श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना,… 301–310
- विकासवाद ३०७ प्रकृतिको जब कुछ ज्ञान ही नहीं, तब वह सुव्यवस्थित विचित्र विश्वका निर्माण कैसे कर सकती है? अतः सर्वज्ञ ईश्वर मानना चाहिये… 311–320
- विकासवाद ३१७ जाने किसी भी तरह पीनेसे उसका फल होता है । किन्हीं मूषकोंकी शिवमन्दिरमें दीपककी बाती उसका देनेसे, किसी पक्षीकी बाजके भयसे अन्नपूर्णाकी… 321–330
- माक्सीय द्वन्द्ववाद ३२७ जन्मसंस्कारविद्यादेः शक्तेः स्वाध्यायकर्मणोः । ह्रासदर्शनतो ह्रासः सम्प्रदायस्य मीयताम् । (२… 331–340
- माक्सीय द्वन्द्ववाद ३३७ चाहता है । सुधारवाद वर्गसंघर्षको न मानकर वर्गसहयोगका प्रतिपादन करता है… 341–350
- वर्ग संघर्ष ३४७ राष्ट्रिय सम्पत्ति बना लिया जाय । चौथी सभा १८६ ९ में हीवाल (स्विटजरलैंड ) में हुई… 351–360
- - वर्ग संघर्ष ३५७ भी नहीं हो सकती । आर्थिक असंतुलन आर्थिक असंतुलन मिटानेके लिये ही शास्त्रोंमें दानका महत्त्व कहा गया है… 361–370
- वर्ग संघर्ष ३६७ बताता है । भौतिक उत्पत्ति, पैदावारमें परिवर्तन होनेसे बौद्धिक उत्पत्तिमें भी परिवर्तन होता है… 371–380
- वर्ग संघर्ष ३७७ किसीका अनिष्ट- चिन्तन नहीं करते थे । धनवान् बलवान्को देखकर उन्हें ईर्ष्या नहीं होती थी… 381–390
- - वर्ग संघर्ष ३८७ सामान्यरूपसे नित्य अनेक समवेत धर्म ही जातिपदसे व्यपदिष्ट होता है । अनेक गोव्यक्तियोंमें समवेत नित्य गोत्व धर्म ही जाति है… 391–400
- वर्ग संघर्ष ३ ९७ सकता है । संतुलित समता, संतुलित विषमता ही मान्य हो सकती है । शरीरमें भी हाथ, पाँव, पेट, पीठ आदिमें तथा एक हाथकी ही अँगुलियोंमें भी… 401–410
- वर्ग संघर्ष ४०७ ही नहीं, अतः दूसरी पार्टीकी वहाँ आवश्यकता नहीं । पूँजीवादी राष्ट्रोंमें विभिन्न वर्ग हैं, अतः उन वर्गोंका प्रतिनिधित्व करनेवाली पार्टियाँ… 411–420
- वर्ग संघर्ष ४१७ लाभका डर न होनेसे, पैदावार एवं शिक्षामें उन्नति होना असम्भव है । प्रायः इसके उदाहरणके रूपमें रूसका नाम लिया जाता है, परंतु वहाँकी… 421–430
- वर्ग संघर्ष ४२७ भी वहाँ मजदूरोंकी सरकार न बन पायी । इससे स्पष्ट है कि वहाँके मजदूरोंको वर्ग- विध्वंसादिमें कोई रुचि नहीं है! बेकारोंको अपने जीवन चलानेकी… 431–440
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ४३७ साथ, उपयोग एवं माँगका सम्बन्ध रहता है । एक ज्ञानशून्य मनुष्य और बकरेके लिये रोटी या नीमकी पत्तीका जो महत्त्व है, वह हीरेका नहीं… 441–450
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ४४७ स्थिति लाभ और कामकी स्थितिको देखकर समाज या सरकार भी औचित्यके आधारपर मजदूरीका दर निर्णय कर सकते हैं… 451–460
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ४५७ शोषणकी शक्ति और अधिकार है । समाजमें जहाँ कहीं शोषण होगा, इसी शक्ति एवं अधिकारके बलपर होगा… 461–470
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ४६७ फासिस्टवाद, रूसी समाजवादियोंका डिक्टेटरवाद सब एक ही -जैसा है । भारतमें भी समाजवादी ढंगकी समाज -रचनाका प्रयत्न चल रहा है, जिसका… 471–480
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ४७७ पूँजीपति उसे सौदेके मूल्यसे वसूल कर लेता है, परंतु उसपर मुनाफा वसूल नहीं किया जा सकता, वह घटता- बढ़ता नहीं… 481–490
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ४८७ सहायक ही बन सकता है । बहुत सम्भव है अपने अज्ञानके कारण वह क्रान्तिका विरोध भी करने लगे, परंतु उसके हितको ध्यानमें रखकर सामाजिक… 491–500
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ४९७ फल नहीं; क्योंकि यह एक नयी तपस्या है— स्वामित्वं चैव दातृत्वं धनिकत्वं तपःफलम् । एनसः फलमर्थित्वं दास्यत्वं च दरिद्रता… 501–510
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ५० ९ निराधार हैं, वैसे ही किसानोंकी भी दो प्रकार श्रमकल्पना निरर्थक एवं निराधार है… 511–520
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ५१ ९ रह जाती है और पैदावारका क्रम टूट जाता है । ' ' मुनाफेके रूपमें पैदावारके लिये परिश्रम करनेवालोंका जो श्रम निकालकर एक तरफ रख… 521–530
- माक्सय अर्थ- व्यवस्था ५२ ९ पुनर्व्याख्या मानते हुए साम्यवादको पुराने मार्क्सवादसे भिन्न मानते हैं… 531–540
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ५३९ कह सकते हैं कि परवित्तापहरणको अपराध मानना पुराने जमानेकी बात थी, आज यह अपराध नहीं है… 541–550
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ५४९ इसीलिये वे समुद्रवसना पर्वतस्तनमण्डला धरित्रीको विष्णुपत्नी मानते हैं— समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले… 551–560
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ५५ ९ मजदूरोंद्वारा की गयी पैदावारका उपभोग किसान भी करता है । किसानद्वारा की गयी पैदावारका मिल मजदूर भी उपभोग करता है… 561–570
- - माक्सय अर्थ व्यवस्था ५६ ९ स्वतन्त्रतापूर्वक वस्तु तैयार करता है । स्वतन्त्रतापूर्वक विनियोग करता है… 571–580
- ऐतिहासिक भौतिकवाद ५७९ जंगल नष्ट होनेसे जमीका कटाव बढ़ गया । प्रकृतिकी उथल- पुथलसे कितने ही साम्राज्य भूगर्भमें विलीन हो गये… 581–590
- ऐतिहासिक भौतिकवाद ५८९ जमा करता है और उसका सूद भी प्राप्त करता है । माली हालत या भौतिक अवस्था भले ही तत्सम्बन्धित नियमोंकी आधारभित्ति हो, परंतु ' दार्शनिक… 591–600
- ऐतिहासिक भौतिकवाद ५ ९९ बालि, अर्जुन, भीमकी शक्तिकी बराबरी आज कौन कर सकता है? तथापि उन लोगोंने अपौरुषेय शास्त्रों एवं तदाश्रित धर्म, दर्शन एवं आर्ष… 601–610
- ऐतिहासिक भौतिकवाद ६०९ है–' बुद्धेः फलमनाग्रहः । ' और तत्त्वका पक्षपात बुद्धिका स्वभाव होता है-' तत्त्वपक्षपातो हि धियां स्वभावः… 611–620
- ऐतिहासिक भौतिकवाद ६१ ९ फिर उसका कितने दिनोंमें अध्ययन हो सकेगा और कौन, कब तथा क्या निष्कर्ष निकाल सकेगा और कब उसे कार्यान्वित किया जायगा? इतिहासका… 621–630
- - मार्क्स दर्शन ६२९ चलनेसे गुणों और विशेषणोंमें वृद्धि होती है । कारणकी ओर जानेसे निर्गुणता, निर्विशेषताकी वृद्धि होती जाती है; फिर भी कारणसे भिन्न कार्य… 631–640
- - मार्क्स दर्शन ६३ ९ तो अभाव सभीको सर्वत्र सुलभ ही है । फिर कार्योत्पत्तिमें बाधा न होनेसे सदा ही कार्योत्पत्ति होती रहनी चाहिये… 641–650
- - मार्क्स दर्शन ६४९ होता, तब तो उन -उन निमित्तोंको लेकर यथेष्ट क्षीर बनाया जा सकता था । परंतु यह भी कथन ठीक नहीं है, तृणादिका क्षीर आदि परिणाम निष्कारण… 651–660
- - मार्क्स दर्शन ६५ ९ प्रतिषेधके प्रतिषेधका कोई अर्थ नहीं है । आकाशसे वायुकी उत्पत्ति होती है, फिर भी आकाश नहीं निवृत्त होता… 661–670
- - मार्क्स दर्शन ६६ ९ होता है, यह श्रुतियों एवं युक्तियोंसे सिद्ध है । यहाँ वाद - प्रतिवाद, समन्वय आदिका सिद्धान्त व्यभिचरित एवं अत्यल्पदेशीय ही सिद्ध होता… 671–680
- - मार्क्स दर्शन ६७९ है कि ' हाँ ' नहीं है और ' नहीं ' हाँ है । ऊपरी दृष्टिसे द्वन्द्वमानकी भाषा बहुत ही विरोधपूर्ण है… 681–690
- - मार्क्स दर्शन ६८ ९ अभावकी कल्पना की और उनके समन्वयसे अंकुरकी उत्पत्ति मान ली, परंतु वस्तुतः यहाँ भाव- अभाव-जैसा विभाजन और उसके समन्वयका कोई प्रश्न ही… 691–700
- - मार्क्स दर्शन ६ ९९ लेकर बड़ी- से- बड़ी चीज, एक बालूके कणसे सूर्यतक, प्रोटिस्टा (प्राथमिक जीवित कोष) -से मनुष्यतक, लगातार आविर्भाव और तिरोधानकी अवस्थामें… 701–710
- - मार्क्स दर्शन ७०९ अवस्थाएँ होती हैं, इनमें पूर्व - पूर्व अवस्था उत्तरोत्तर अवस्थाओंकी जननी है - सहायक है, विरोधकल्पना दूरभिसंधिपूर्ण है… 711–720
- - मार्क्स दर्शन ७१९ व्यर्थकी परीक्षाएँ होती हैं, वे अमान्य होती हैं । कहा जाता है कि ' प्रत्येक वस्तु विराट् विश्वप्रक्रियाका एक अंग है… 721–730
- - मार्क्स दर्शन ७२९ न आयी हो; अतः शताब्दियोंकी परिवर्तनपरम्परा कोई अभूतपूर्व घटना नहीं है । गुण-परिवर्तन ‘ पूँजीवादमें समाज और प्रकृतिका विरोध तो विद्यमान… 731–740
- - मार्क्स दर्शन ७३९ इस प्रकार उद्घाटन हो जाता है । करोड़ों बार दुहरानेसे मनुष्यके अभ्यास और अनुभव चेतनामें तर्क संकेतका रूप धारण कर लेते हैं… 741–750
- - मार्क्स दर्शन ७४९ परंतु एतावता क्या कोई कह सकता है कि ' उनमें कोई व्यक्ति या घटना भी महत्त्वपूर्ण नहीं?' इसीलिये भारतीय महर्षियोंने योगज ऋतम्भरा… 751–760
- - मार्क्स दर्शन ७५९ वस्तुतः ईमानदारीकी बात यही है कि मार्क्सवादी, ईश्वरवादी दोनोंका समन्वय हो नहीं सकता… 761–770
- - मार्क्स दर्शन ७६ ९ ता येनैवानुभूयन्ते सोऽध्यक्षः पुरुषः परः । ' ( श्रीमद्भा० ७ । ७ । २५ ) । इस शरीरकी विभिन्न अवस्थाओंमें उसके भीतर अन्तरसे भी… 771–780
- - माक्सय समाज व्यवस्था ७७९ जैसे स्वास्थ्यकर, तृप्तिकर स्वच्छ जलसे ही प्यास बुझाना उचित है, वैसे ही तृप्तिकर, स्वास्थ्यवर्द्धक स्त्री- पुरुष सम्बन्धमें कोई… 781–790
- - माक्सय समाज व्यवस्था ७८९ रामराज्यके अनुसार सन्नारीके बलपर कुल, गोत्र एवं वंशकी रक्षा होगी । समाजवादी - व्यवस्थामें इच्छानुसार किन्हीं नये - नये… 791–800
- माक्सय समाज व्यवस्था ७९९ नहीं हैं, उनकी इच्छापूर्तिमें बड़ी कठिनाई पड़ती है । जबतक पूँजीपतियोंके पास साधन हैं, उनकी इच्छापूर्तिमें सरलता रहेगी… 801–810
- माक्सय समाज-व्यवस्था ८० ९ कहनेके सिवा कि ' परमात्मा, ईश्वर, धर्मके अतिरिक्त मार्क्सवादी स्थिर आत्माका भी अस्तित्व नहीं मानता ', कोई दूसरा चारा नहीं… 811–820
- - मार्क्सय समाज व्यवस्था ८१ ९ लाखों बार दुहरानेपर संज्ञाके अन्दर तर्कज्ञानके रूपमें प्रतिष्ठित हो जाता है… 821–830
- मार्क्स और ज्ञान ८२९ आदर्शवाद ' काल्पनिक धारणाओंका प्रयोग किसी -न-किसी प्रकारकी वस्तुओं अथवा विचारपद्धतियोंकी सुव्यस्थित दृष्टियोंके निरूपणमें ही किया… 831–840
- मार्क्स और ज्ञान ८३९ है, उसके बाद सविकल्प ज्ञान होता है । इन्द्रियोंके द्वारा मनोव्यापारके पहले प्रतिपत्ताको प्रथम अविकल्पित वस्तुमात्रका ही ग्रहण होता है… 841–850
- मार्क्स और ज्ञान ८४९ कुछ लोग कहते हैं कि ' भावरूप अज्ञान ज्ञानके विरुद्ध नहीं है; क्योंकि जागरणकालमें ज्ञान और अज्ञान दोनों ही एक साथ रहते हैं… 851–860
- मार्क्स और ज्ञान ८५९ प्रदेशमें ज्ञानसे एकदेशेन नाश उसी तरह होता है, जिस तरह महान्धकारमें खद्योत-प्रकाशसे एकदेशेन अन्धकारका नाश होता है… 861–870
- मार्क्स और ज्ञान ८६९ नहीं होता । सदृशभागमात्रका सम्प्रयोग होनेसे विशेष दर्शन-सामग्री न होनेके कारण अध्यास होता है… 871–880
- मार्क्स और ज्ञान ८७९ है । फिर भी कहा जाता है कि ' यदि बोध स्वप्रकाश ही है, तो वेदान्तोंका क्या प्रयोजन रहेगा? ' परंतु इसका समाधान यही है कि उसी बोधका… 881–890
- मार्क्स और ज्ञान ८८९ ( कठोप० १ । २ । १८ ) इत्यादि श्रुतियोंसे जीवात्माकी नित्यताका प्रतिपादन होता है… 891–900
- मार्क्स और ज्ञान ८९९ होती । छेदनक्रिया छेत्ताका स्वरूप नहीं होती । ' परंतु यह पक्ष ठीक नहीं है; क्योंकि कहा जा चुका है कि प्रकाशस्वरूप सूर्यका प्रकाश… 901–910
- मार्क्स और ज्ञान ९० ९ स्फुरणरूप ज्ञान नित्य है, वैसे ही अन्तःकरणवृत्तिरूप सुख भी अनित्य है; परंतु ब्रह्मात्मस्वरूप सुख नित्य ही है… 911–920
- मार्क्स और ज्ञान ९१ ९ उसी अखण्ड बोधका विवर्त्त है । अन्वयव्यतिरेकसे जैसे मृत्तिका होनेपर ही मृद्विकार घटादि उपलब्ध होते हैं, मृत्तिकाके बिना वे उपलब्ध… 921–930
- मार्क्स और आत्मा ९ २९ अन्य बोधका प्रागभाव अन्य बोधसे सिद्ध होगा, यह भी नहीं कहा जा सकता । इस तरह अत्यन्ताबाध्य होनेके कारण वही बोधस्वरूप भी है… 931–940
- मार्क्स और आत्मा ९३९ है । यद्यपि वृत्तिव्याप्त विषयस्थ चित्प्रतिबिम्ब ही फल है, तथापि ' मयेदं विदितम्' मैंने यह जाना, इस तरह प्रमाण- प्रमेयसम्बन्ध… 941–950
- मार्क्स और आत्मा ९४९ चिदाभासव्याप्त सक्रिय बुद्धिके साथ आत्माका ऐक्याध्यास होनेसे ही ' आत्मा जानाति' यह व्यवहार होता… 951–960
- मार्क्स और आत्मा ९ ५९ नहीं । ऐसा माननेपर उस प्रमाताकी अवगतिके लिये किसी अन्य प्रमाताकी तथा उसकी अवगतिके लिये किसी दूसरे प्रमाताकी अपेक्षा होगी और इस तरह… 961–970
- मार्क्स और आत्मा ९६ ९ अतिक्रमण किये बिना काल विशेषमें स्थिति होती है । स्थिति शब्दसे स्वार्थमें ही तल प्रत्यय होनेसे स्थिति अर्थमें स्थितिताका प्रयोग है… 971–980
- मार्क्स और आत्मा ९७९ क्षणिक है । यह तीनों अवस्तु स्वभाव ( निरुपाख्य) है । बुद्धिपूर्वक भावोंका विनाश प्रतिसंख्या निरोध तद्विपरीत अप्रतिसंख्यानिरोध होता है… 981–990
- मार्क्स और आत्मा ९८९ स्वाकारको ग्रहण करके पश्चात् आरोप करता है अथवा जिस समय स्वाकार ग्रहण करता है, उसी समय आरोपण भी करता है? बौद्धमतमें ज्ञान क्षणिक है,… 991–1000
- मार्क्स और आत्मा ९९९ बाह्यालम्बन नहीं होते हैं । विज्ञानवादीका यह भी कहना है कि यह नहीं कहा जा सकता कि विज्ञान इन्द्रियकी तरह स्वयं विलीन ( अज्ञात ) रहकर… 1001–1010
- मार्क्स और आत्मा १०० ९ उपलब्धि हो सकती है । सर्वावयव सन्निकर्ष न होनेसे जब सब अवयवोंका उपलम्भ नहीं होता तो अवयवीकी उपलब्धि कैसे होगी… 1011–1020
- मार्क्स और आत्मा १०१ ९ निष्कर्ष यह है कि साक्षिस्वरूप अनुभव यद्यपि सर्वव्यापी है तो भी अविद्यासे आवृत होनेके कारण वह प्रकट नहीं होता… 1021–1030
- मार्क्स और आत्मा १०२ ९ भी न सूक्ष्म हो सकता है, न स्थूल, तब तो क्या अर्थ, क्या ज्ञान सभी वस्तु विचारासह ठहरते हैं… 1031–1040
- मार्क्स और आत्मा १०३ ९ प्रतिपादित अर्थका अवबोधक हो, तभी प्रमाण होता है, अन्यथा नहीं । अन्य लोग प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द- ये तीन प्रमाण मानते हैं… 1041–1050
- मार्क्स और आत्मा १०४९ ही मानते हैं । इनके मतानुसार शिव पति, जीव पशु और मल, कर्म, माया तथा रोधशक्ति पाश हैं… 1051–1060
- मार्क्स और आत्मा १०५ ९ भी अन्तर्भाव होता है । यद्यपि अहमर्थ -चित्, चैतन्यसे अघटित - अयुक्त ही है… 1061–1070
- मार्क्स और आत्मा १०६ ९ हुई । मोक्षधर्मके इन वाक्योंमें सांख्यमतानुसार महत्तत्त्व और अहंकारमें ही ' महान् ' और ' अहंकार ' शब्दका प्रयोग हुआ है… 1071–1080
- मार्क्स और आत्मा १०७९ ही ' महत्तत्त्व ' कहा जाता है । जैसे घोर नींदसे अकस्मात् जगाये जानेपर पहले अहंकार - ममकारसे शून्य केवल कुछ ज्ञान होता है, वैसे ही… 1081–1090
- मार्क्स और ईश्वर १०८९ सार्थक बनाता है । संसारकी सभी वस्तुओं एवं घटनाओंसे किसी विशेष प्रयोजनकी सूचना मिलती है… 1091–1100
- मार्क्स और ईश्वर १० ९९ ' मयूरोंको कौन चित्रित करता है? कोकिलोंको कौन मधुरालाप सिखाता है? जैसे अग्निमें उष्णता, जलमें शीतलता, वायुमें वहनशीलता स्वभावसे ही… 1101–1110
- मार्क्स और ईश्वर ११० ९ इस प्रकार केवल शून्य ही रह जाता है । ' बौद्धदर्शनमें सर्वास्तित्ववादी तथा शून्यवादी – दोनों ही भौतिकवादी मतकी पुष्टि करते हैं… 1111–1120
- उपसंहार १११ ९ मात्स्यन्यायको रोककर सर्वसामंजस्य सर्वहित सम्पादनार्थ राज्य- व्यवस्था होती है । अहिंसा, सत्यादि धर्मका प्रतिष्ठापन, ब्रह्मविज्ञान -विस्तार… 1121–1130
- उपसंहार ११२ ९ सत्यवादिताका भी पता लग जाता है । अवैरकारिता, भद्रता, क्षुद्रताका ज्ञान भी प्रसंगवशात् प्रत्यक्षसे ही जाना जा सकता है… 1131–1140
- उपसंहार ११३९ ' नराणां च नराधिपम्' ( गी० १० । २७ ) ' नाविष्णुः पृथिवीपतिः । ' (दे० भा० ) ' महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति । ' (मनु० ७… 1141–1150
- रामराज्यका स्वरूप ११४९ भी उस समय माता, पिता एवं गुरुजनोंका अनादर नहीं करता था । नन च वाक्यंभूमिहरणंहि वृद्धानामुल्लङ्घयतितत्र परनारीपराङ्मुखाःपुण्यकृत्… 1151–1158