मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 121–130

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 121–130

पृष्ठ 121

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आधुनिक विचारधारा ११७ बनाये थे । उसने प्रतियोगिताद्वारा कर्मचारियोंकी नियुक्ति, सरकारी विभागोंका संघटन, नोट-मुद्रणकला, उपनिवेशसम्बन्धी मताधिकारके सम्बन्धमें विचार व्यक्त किये हैं । कहा जाता है कि वेन्थमको प्रीस्टलेका एक सूत्र मिला- ' अधिकतम लोगोंका अधिकतम हित । ' प्रीस्टलेसे पूर्व फ्रांसिस एवं हचीसनने भी इसी सूत्रका अनुकरण राज्यका मुख्य ध्येय बताया था । ग्रीसके ' हिडनिज्म दर्शन ' के अनुसार मनुष्यके कार्य सुख-दुःखके मान- दण्डसे निर्धारित होते हैं । ' उसने इस सिद्धान्तको उक्त सूत्रसे मिलाया और अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ' न्याय और व्यवस्थाके सिद्धान्तोंकी प्रस्तावना ' में बताया कि ' प्रकृतिने मनुष्य जातिको दो सत्ताधारी स्वामियों — सुख और दुःखके अधीन बनाया । मनुष्यके कार्य सुख-दुःखपर आश्रित हैं । जीवनका एकमात्र ध्येय सुख-प्राप्ति, दुःखनिवारण है । यही जीवनका सार है । जिसका जीवन इस सिद्धान्तद्वारा नहीं चालित होता, वह अज्ञानी है । सुख-दुःखका अर्थ उपयोगिता है । वही वस्तु उपयोगी है, जिससे सुख हो । आनन्द या आनन्द- कारण सुख है । क्लेश या क्लेशकारण दुःख है । ' वेन्थमके अनुसार ' मनुष्यके सभी भौतिक कार्य उपयोगितासे ही निर्धारित होते हैं । धर्म -अधर्म, न्याय- अन्याय, भलाई- बुराईकी परख उपयोगिताके ही आधारपर की जाती है । जीवन-उपयोगिता ही सत्ताधारी है । ' उसके अनुसार ' नैसर्गिक, लौकिक, राजनीतिक और धार्मिक – ये चार सुख-दुःखके स्रोत हैं । जैसे किसीका मकान जल गया । यदि वह उसकी भूलसे जला तो नैसर्गिक स्रोतसे दुःख हुआ । यदि पड़ोसीकी बुरी भावनासे हुआ तो लौकिक स्रोतसे । सरकारी आदेशसे जलाया गया तो राजनीतिक स्रोतसे । यदि दैवी प्रकोपसे जला तो धार्मिक स्रोतसे दुःख हुआ । ' वेन्थमके अनुसार-' सुख -दुःखकी मात्राकी परख तीव्रता, समयप्रसार, निश्चय, समीपता, उपजाऊपन, शुद्धता और विस्तार- इन सात विशेषताओंद्वारा होती है । इन्हींके आधारपर वस्तुकी उपयोगिता निर्धारित होती है । ' उसके अनुसार सुख प्राप्ति और दुःख निवृत्तिके लिये ही राज्यके सब नियम बनने चाहिये । अधिकतम लोगोंका सुख ही राज्यका ध्येय होना चाहिये ।

पृष्ठ 122

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११८ मार्क्सवाद और रामराज्य व्यवस्थापक उक्त सात विशेषताओंद्वारा ही इसकी जानकारी प्राप्त कर सकता है । उपयोगिता एवं व्यक्तिवाद - उपयोगिताकी दृष्टिसे राज्यके नियम स्वतन्त्रताके बाधक होते हैं, अतः नियम विकारतुल्य है । किंतु उनके बिना सभ्य जीवन -निर्वाह सम्भव नहीं । अतः वह आवश्यक विकार है । राज्यको कम -से - कम नियम बनाना चाहिये । जैसे ' आरोग्यता सर्वोत्तम है, परंतु अस्वस्थ होनेपर औषध आवश्यक है । स्वतन्त्रतापूर्ण जीवन उपयोगिताकी दृष्टिसे आदर्श जीवन है, परंतु चोरी, दुराचार आदि बाधाओंके द्वारा स्वतन्त्रता - भंग होनेकी सम्भावना होती है । तब नियम ही औषधका काम करते हैं । राज्यका नियम बाधा तो अवश्य है, परंतु आवश्यक है; क्योंकि उससे अन्य असामाजिक बाधाएँ दूर होती हैं । औषधका प्रयोग जैसे कम-से -कम करना आवश्यक है, वैसे ही राजकीय नियमरूप बाधा कम-से - कम होनी चाहिये । जैसे व्यक्ति स्वास्थ्यकी दृष्टिसे आरोग्य स्थितिको ही चाहता है, वैसे ही उपयोगिताकी दृष्टिसे स्वच्छता, स्वतन्त्रता चाहता है । अतः सत्ताधारी उपयोगिताकी दृष्टिसे व्यवस्थापकको कम-से - कम नियम बनाने चाहिये । ' ' वेन्थम ' के अनुसार व्यवस्थापकोंको नियम-निर्माणके पूर्व इसपर विचार करना चाहिये कि नियमद्वारा जो कार्य रोके जाते हैं, वे समाजके लिये विकार हैं कि नहीं? उदाहरणार्थ - चोरी । साथ ही प्रस्तावित नियम विकारात्मक कार्यसे कम विकार है या अधिक? जैसे १००० रुपयेकी चोरीके समक्ष तीन मासका कारागार कम विकार है या ज्यादा? अतः केवल चोरी आदि रोकनेके लिये ही नियम ठीक है । यह नागरिककी स्वतन्त्रतामें सहायक है । समाजके कुछ लोग स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करते हैं । वे ही आदर्शभूत स्वतन्त्र- परिस्थितिमें बाधक होते हैं । इसलिये राज्यको नियमद्वारा उसका नियन्त्रण आवश्यक होता है । अतः राज्य आवश्यक है, परंतु राज्यका संचालन अपरिवर्तनशील तथा नैसर्गिक नियमोंद्वारा होना ठीक है । व्यक्तिके आर्थिक एवं सामाजिक विषयोंमें हस्तक्षेप करनेसे उपयोगिताकी वृद्धि सम्भव नहीं होती । प्राकृतिक बहुमूल्य उपयोगिता- वृद्धिके लिये

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आधुनिक विचारधारा ११ ९ शान्तिस्थापनाके क्षेत्रमें ही राज्यको नियम निर्माण करना चाहिये । इस विषयमें भी नियम निर्माण उपयोगिताके मानदण्डसे ही होना चाहिये । वस्तुतः भारतीय दर्शनके अनुसार केवल लौकिक सुखप्राप्ति एवं दुःख-निवृत्तिकी दृष्टिसे ही कार्य नहीं किया जाता है । नैयायिकोंने दुःख-निवृत्तिको ही अन्तिम ध्येय बताया है । सुख प्राप्ति एवं उसके रागको दुःख ही बतलाया है और कहा है कि कुपित फणी ( नाग ) –के फणातपत्रकी छायामें विश्रामके तुल्य ही सुखमें विश्राम है । वेदान्त अनुसार भी लौकिक प्रिय ( सुख ) अप्रिय (दुःख ) -से अतीत होनेसे परम पुरुषार्थस्वरूप अपवर्ग मिलता है । 'नैनं प्रियाप्रिये स्पृशतः । ' तत्त्व-साक्षात्कारकी स्थितिमें प्राणीको प्रिय -अप्रिय दोनों स्पर्श नहीं करते । उसी अभिप्रायसे बुद्धिमान् संसार छोड़कर निरन्तर तपस्या करते हैं । परोपकारार्थ सब सुख छोड़कर विविध यातनाओं-दुःखोंको सहते हैं । अन्तमें प्राणतक दे देते हैं । बहुत - से लोग परार्थको ही स्वार्थ मानते हैं । अतः उन्हें परोपकारमें ही सुख होता है । इसीलिये भारतीय शास्त्रोंने वास्तविक आत्महित एवं लोकहितको ही राज्यका ध्येय माना है । हित और सुखमें पर्याप्त अन्तर होता है । परोपकारार्थ कष्ट सहन एवं तपस्या सुख नहीं है, परंतु हित है । परदारपरवित्तापहरण सुखकर प्रतीत होते हुए भी अहित है । कटु औषध सेवन, कठोर पथ्य-पालन, कुपथ्य - परिवर्जन दुःखकर प्रतीत होनेपर भी हित है । ज्वराक्रान्त प्राणीको उष्ण आतप सुखकर प्रतीत होता है, तक्रादि कुपथ्य रुचिकर प्रतीत होता है, फिर भी वह अहित है । स्वतन्त्रता यद्यपि प्राणीमात्रको अभीष्ट है । मनुष्य ही नहीं, किंतु प्रत्येक प्राणी अपनी सत्ता या जीवनका प्रेमी होता है । ज्ञान एवं आनन्दका भी प्रत्येक प्राणी भक्त होता है । ठीक उसी तरह स्वतन्त्रताकी भी प्राणीमात्र इच्छा करते हैं । एक चींटीको पकड़ते हैं तो वह छुटकाराके लिये प्रयत्नशील होती है । एक पक्षी स्वतन्त्र होकर खट्टा फल खाकर, खारा पानी पीकर रहना मंजूर करता है, परंतु परतन्त्र रहकर पिंजड़ामें बन्द होकर मधुर फल एवं मधुर पक्वान्न खाकर रहना नहीं चाहता । इसी प्रकार शासन भी निम्न श्रेणीके लोगोंसे आज्ञा-पालन कराना, उच्च श्रेणीके

पृष्ठ 124

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१२० मार्क्सवाद और रामराज्य माता -पिता, गुरुजनोंसे अनुरोध- प्रार्थना स्वीकार कराना चाहता है । इतना ही नहीं, सीमित सत्ता, ज्ञान, आनन्द, स्वतन्त्रता तथा शासनके बदले निस्सीम निरतिशय सत्ता, ज्ञान, आनन्द तथा निस्सीम निरतिशय स्वतन्त्रता, शासन-शक्ति चाहता है तथापि महती स्वतन्त्रता प्राप्त करनेके लिये पर्याप्त स्वतन्त्रताका बलिदान करना पड़ता है । किसी भी राष्ट्रको स्वतन्त्रताके लिये दूसरे राष्ट्रद्वारा हमला होनेपर सैनिक संघटन करना पड़ता है और सैनिकोंको सेनापतिके नियन्त्रणमें रहना ही पड़ता है । शिशुको माता- पिता तथा गुरुजनोंके परतन्त्र रहकर ही अध्ययनादिमें संलग्न होनेसे ही स्वतन्त्रताकी प्राप्ति होती है । किसी भी नागरिकको राजकीय, सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक आदि विविध नियमोंके पालन करनेसे ही स्वतन्त्रता मिलती है । यहाँतक कि जो जितना ही धार्मिक एवं आध्यात्मिक नियमोंके पालनमें परतन्त्र बनता है, वह उतना ही स्वतन्त्र एवं सभ्य समझा जाता है । धारणा, ध्यान, समाधिके अभ्यासमें दृढ़ नियम पालन करनेवाला व्यक्ति तो अन्तमें देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि एवं कर्म-बन्धनोंसे छुटकारा पाकर पूर्ण स्वातन्त्र्य-सुखका उपभोग कर सकता है अन्यथा स्वतन्त्रता परम अभीष्ट होनेपर भी उचित नियमोंके अंगीकार बिना प्राणी भीषण परतन्त्रताके बन्धनमें जकड़ जाता है । आधि - व्याधि, रोग - शोक, जरा- मृत्युके परतन्त्र रहनेवाला प्राणी वास्तविक स्वतन्त्रतासे अति दूर रहता है । सुख-दुःखकी परिभाषा भी केवल तात्कालिक अनुकूल वेदनीय, प्रतिकूल वेदनीयतक ही सीमित नहीं है । वास्तविक सुख निरुपप्लव ( निर्विघ्न ) स्वप्रकाश सत्ता या अबाधित निर्विघ्न ज्ञान ही है । इसीलिये शास्त्रोंने कहा है कि स्वतन्त्रता ही सुख' सर्वंएवं परतन्त्रतापरवशं ही दुःखंदुःख है—सर्वमात्मवशं सुखम्। ' (मनु० ४। १६० ) इन विचारोंसे वेन्थमकी विचार- धारा बहुत ही निम्नश्रेणीकी प्रतीत होती है । अवश्य ही सामान्य प्राणीकी स्वसुखार्थ, स्वदुःखनिवृत्त्यर्थ ही प्रवृत्ति होती है तथापि यह कहा जा चुका है कि व्याघ्रादि क्रूर, हिंस्र प्राणी

पृष्ठ 125

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आधुनिक विचारधारा १२१ भी अपने बच्चोंके लिये जानतक दे देते हैं । अतः स्वसुखार्थीके समान ही परसुखार्थ भी प्राणियोंकी स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है । ' बृहदारण्यक उपनिषद्' में भी यद्यपि यही कहा गया है कि ' पति, पुत्र, धर्म, लोक, परलोक, माता, पिता, गुरु, देवता सबमें जो प्रेम और कामना होती है, वह आत्माके ही लिये होती है । वे सब अपने उपकारक हैं । ' अतः उनमें प्रेम होता है, परंतु यहाँ आत्मा शब्दका अर्थ देहादि संघातमात्र नहीं, किंतु देहादिभिन्न विशुद्ध आत्मा है । जो ' स्व ' शब्दसे केवल देहादि संघात ही समझते हैं, उनके मतानुसार देहादि संघातको भोजन, पान, वस्त्र, भूषण, वाहन, सम्पत्ति आदि मिलना ही स्वार्थ या आत्मार्थ है; परंतु जो देहादि संघातसे भिन्न निर्विकार प्रत्यक्चैतन्याभिन्न आत्माको समझते हैं, उनका स्वार्थ या आत्मार्थ बहुत ऊँचा होता है । वहाँ तो परोपकार, धर्म, तपस्या, उपासना, तत्त्वसाक्षात्कार तथा सकलानर्थनिवृत्तिमय परमानन्दावाप्ति ही स्वार्थ या आत्मार्थ होता है; ' स्व ' एवं समाज व्यष्टि एवं समष्टिका भेद समाप्त हो जाता है । इस दृष्टिसे उच्च कोटिकी उपयोगिता एव स्वार्थमें परार्थ अन्तर्भूत हो जाता है । भले ही राजकीय नियम स्वल्प-से- स्वल्प हों; क्योंकि यह तो भारतीय शास्त्रोंको भी सम्मत है, परंतु सामाजिक, धार्मिक आध्यात्मिक, विविध नियन्त्रण तो तबतक परम अपेक्षित होते हैं, जबतक प्राणी प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परम तत्त्वका साक्षात्कार करके पूर्ण कृतार्थ नहीं हो जाता । इतना ही क्यों, उस कालमें भी जीवन्मुक्तोंको भी लोकसंग्रहार्थ बहुत-से कर्तव्य नियम पालन करने पड़ते हैं । विदेह-मुक्तिमें ही पूर्ण स्वतन्त्रता, नियमरहितता सम्भव होती है । स्टुअर्ट मिल भी ‘ उपयोगितावादी ' था । उसने वेन्थमके उपयोगितावादमें संशोधन किया था । वह सुखके मात्रात्मक परिमाणके साथ-साथ गुणात्मक भेद भी मानता है । पहलेका उदाहरण है—' जितना सुख वीणावादनमें होता है, उतना संगीतमें । ' परंतु दूसरेको स्टुअर्ट मिलने बताया कि ' एक असन्तुष्ट विद्वान् होना सन्तुष्ट मूर्खसे अच्छा है । उससे उपयोगिताकी परख केवल सुखकी मात्रापर नहीं, किंतु गुणके आधारपर होती है । ' किंतु गुणात्मक भेदसे उपयोगिताका मानदण्ड व्यक्ति भी होता

पृष्ठ 126

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१२२ मार्क्सवाद और रामराज्य है, केवल पदार्थ ही नहीं । वेन्थमने केवल पदार्थको ही मानदण्ड माना है । इसीलिये उसके आलोचक उसे ' सन्तुष्ट मूर्खका दर्शन ' मानते हैं । इस तरह जब व्यक्तिगत दृष्टिकोणसे एक वस्तुकी उपयोगिता निर्धारित होती है, तब व्यक्तिकी रुचिका भी ध्यान रखना आवश्यक है एवं शंकराचार्य -जैसे नि: स्पृह त्यागी विद्वान्‌के हर्ष एवं सुखकी उपयोगिताका मानदण्ड एवं भौतिकवादी दार्शनिक हॉब्स -जैसे राजनीतिज्ञकी उपयोगिताका मानदण्ड भिन्न ही होता है । मनुष्य केवल सुख और स्वार्थका ही कठपुतला नहीं - मनुष्य केवल सुख-दुःखसे ही नहीं संचालित होता है । अन्य भावनाओंका भी जीवनमें महत्त्वपूर्ण स्थान है । देशभक्ति, नैतिक, आध्यात्मिक, सन्तुष्टि आदिकी भावनाओंसे ही मनुष्यके कार्य निर्धारित होते हैं । यदि मनुष्य जाति उपयोगितावादके अनुसार ही चलती तो वसिष्ठ, विश्वामित्र, शंकर, रामानुज, ईसा आदि-जैसे लोगोंका सम्भव ही न होता । उपयोगितावादके अनुसार वेन्थमको ही एक धनी वकील होना था, गरीब दार्शनिक नहीं । आज भी नैतिकताके नामपर कितने ही सज्जन सत्य बोलकर अपनेको संकटमें डालते हैं । एक देशभक्त सारा जीवन दुःखमय बिताता है । अतः यदि व्यवस्थापक उपयोगिताके आधारपर ही नियम बनायेगा तो वह अवश्य त्रुटिपूर्ण होगा । भारतीय वेदान्तके अनुसार पूर्ण स्वतन्त्रतापूर्ण सुख और आत्मा एक ही वस्तु है; परंतु वेन्थमका तो भौतिक सुख ही ध्येय है । वेन्थमके ' अधिक लोगोंके अधिकतम सुख ' के सम्बन्धमें भी समालोचकोंने कहा है कि ' यह अव्यावहारिक है । ' उदाहरणार्थ एक ' अ' नियमसे १२ मनुष्योंको दस मात्रा प्रतिमनुष्यके परिमाणसे सुख मिलनेकी सम्भावना है । पूर्ण सुख १२० मात्राका होगा । ' ब ' नियमसे २० मनुष्योंको पाँच मात्रासे प्रतिमनुष्य सुख मिलनेकी आशा है । पूर्ण सुख १०० मात्राका होगा । ऐसी परिस्थितिमें व्यवस्थापक क्या करेगा? ' अ' नियम अधिकतम सुख १२० मात्रासे सम्भव होगा, परंतु मनुष्योंकी संख्या कम ( १२ ) होगी । ' ब ' नियमद्वारा अधिकतम मनुष्योंको ( २० को) सुख मिलता है, परंतु सुखकी मात्रा अल्प ( ५ मात्रा ) होगी । अब यहाँ अधिकतम लोगोंके

पृष्ठ 127

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आधुनिक विचारधारा १२३ सुखकी दृष्टिसे ' ब ' नियम बनाना चाहिये, परंतु अधिकतम सुखकी दृष्टिसे ' अ ' नियम आवश्यक जान पड़ता है । ऐसी स्थितिमें न्यायपूर्ण नियम सम्भव नहीं कहा जाता । वेन्थमका उपयोगितावाद उस समयके पूँजीपतियोंके लिये उपयोगी था । पूँजीपति निजी सुख और लाभके हेतु मानवताको भूल जाता है । वह अपने अधिकतम सुखको ही अधिकतम मनुष्योंका सुख समझता है । एक मानवतावादी तो यही चाहेगा कि ' अधिकतम लोगोंको सम्भव हो तो अधिकतम सुख हो नहीं तो जितना भी सुख हो, उतना अधिकतम लोगोंको सुख मिलना चाहिये । ' यह नहीं कि अल्प-से- अल्प लोगोंको अधिकाधिक सुख मिले । वैयक्तिक स्वतन्त्रता स्टुअर्टकी पुस्तक ' स्वतन्त्रता ' ( लिबर्टी, १८५९ ) व्यक्तिगत स्वतन्त्रताका सर्वोत्कृष्ट समर्थन करनेवाली है । व्यक्तिकी स्वतन्त्रता एवं व्यक्तित्वके लिये ' मिल ' ने व्यक्तिवादको आवश्यक बतलाया । उसका कहना था कि ' मानव -प्रगतिके लिये विचार एवं भाषणकी स्वतन्त्रता अत्यावश्यक है । ' कहते हैं, वह सनकी लोगोंकी भी स्वतन्त्रताका समर्थक था । उसका कहना था कि ' इनमेंसे न जाने किसके विचारसे किसी नयी विचारधाराका जन्म हो जाय । ' अतः प्रगतिके लिये प्रत्येक व्यक्तिको विचार एवं भाषणका स्वातन्त्र्य प्राप्त होना चाहिये । मिलके विचारसे स्वतन्त्रता बिना प्रगतिमें बाधा पड़ती है । उसका कहना था कि ' जो विचारधारा एक समयमें प्रचलित है, वही सत्य है, ऐसा नहीं कहा जा सकता । उसके विपरीत किसी व्यक्तिकी विचारधाराका दमन नहीं करना चाहिये । हो सकता है कि वही विचारधारा सत्य हो । अतः विचार एवं भाषणकी स्वतन्त्रताद्वारा किसीको भी अपनी विचारधाराका प्रचार करने देना चाहिये । ईसा एवं सुकरातकी विचारधाराएँ प्रचलित विचारधाराओंसे विपरीत थीं । सत्ताधारियोंने उनके दमनका भरसक प्रयत्न किया । दोनोंको प्राणदण्ड दिया गया, परंतु संसारको मानना पड़ा कि वे सनकी नहीं, किंतु महापुरुष थे । ' इसीलिये मिलका कहना था कि ' आज हम जिन्हें सनकी कहते हैं, उनके अनोखे विचारोंकी उपेक्षा करते हैं, वे ही भविष्यमें

पृष्ठ 128

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१२४ मार्क्सवाद और रामराज्य विशिष्ट बुद्धिवाले सिद्ध हो सकते हैं । ' डॉक्टर जानसनका कहना था कि ' दमनसे सचाई छिप नहीं सकती, सत्यकी दृढ़ताके लिये दमन एक कठोर कसौटी है । ' परंतु मिल इस दमनको प्रगतिमें बाधक कहता था । मार्टिन लूथर ( १४८३ - १५४६ ) -के पूर्व धर्मसुधार आन्दोलन बीस बार आरम्भ हुआ, परंतु वह दमनद्वारा रोका गया । यदि ऐसा न होता तो सम्भव है कि यूरोपमें १६ वीं शतीसे पूर्व ही धर्मसुधार आरम्भ हुआ होता । लूथरके धर्मसुधार ( १६वीं शती ) -के फलस्वरूप कई महत्त्वपूर्ण विचारधाराओंका बीजारोपण हुआ । यदि उसको पूर्व- दमनसे रोका न गया होता तो उससे और अधिक प्रगति हुई होती । अवश्य सत्य अमर है । उसका दमनसे अन्त नहीं होता; परंतु दमनसे प्रचारमें विलम्ब किया ही जा सकता है । यह विलम्ब समाजके लिये हानिकारक होता है । अतः विचार एवं भाषणकी पूर्ण स्वाधीनता होनी चाहिये । मिलके अनुसार ' सत्यके कई पहलू होते हैं । वे एक- दूसरेके बाधक नहीं, किंतु परस्पर सहायक होते हैं । अतः एक पक्षके अनुयायीका दूसरोंको सत्यविरोधी समझना ज्ञानवृद्धिमें बाधक है । सत्य किसी एक पक्षकी बपौती नहीं है, अन्य विचारधाराओंमें भी सत्य हो सकता है । अतः विचार-प्रचारकी स्वाधीनता आवश्यक है । ऐसे वातावरणमें निश्चित सत्यका बोध सम्भव होता है । तर्कद्वारा संघर्षसे सत्य बलिष्ठ एवं विजयी होता है । इससे अन्धविश्वासकी जड़ नहीं जमती । ' इस तरह मिलने विचारों, तर्कोंकी पूर्णस्वतन्त्रताके पक्षमें मत प्रकट किया था । ब्राउनके मतानुसार मिलने जीवशास्त्रके-जो योग्य है ' जीवित रहेगा ' इस नियमको विचारोंकी दुनियामें लागू किया; क्योंकि मिलका कहना था कि ' जो विचार तर्क, संघर्षमें बलिष्ठ होता है, वह विचार सत्य सिद्ध होता है । अतः राज्यको भाषण, लेख, विचार, तर्ककी पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिये । ' मिलके मतानुसार ' समाजपर असर डालनेवाले चोरी - कलह आदि कार्योंपर तो राज्यको हस्तक्षेप करना चाहिये; परंतु व्यक्तिगत कार्योंमें राज्यको हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये । जैसे कोई अपने घरमें रहकर चाहे रातभर पढ़े, चाहे मद्यपान करे, उसे स्वतन्त्रता होनी

पृष्ठ 129

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आधुनिक विचारधारा १२५ चाहिये, परंतु जोरसे गायन करनेसे दूसरोंके आराममें बाधा पड़ सकती है, अतः समाजके प्रतिकूल व्यक्तिगत कार्यपर प्रतिबन्ध ठीक है, परंतु जिसका बुरा असर समाजपर नहीं पड़ता, ऐसे व्यक्तिगत कार्योंकी स्वतन्त्रता ठीक है । यदि मद्यपायी अपने अनुभवसे मद्यपानको हानिकारक समझेगा तो उसे छोड़ देगा । राज्यके प्रतिबन्धसे भी मद्यपान छूट सकता है, परंतु इसमें चारित्रिक संघटन नहीं आता । जो निर्णय अपने अनुभवसे होता है, वही दृढ़ होता है! राज्य-प्रतिबन्धसे छिपकर भी मनुष्य मद्य पीता रह सकता है । शिक्षा- प्रोत्साहन, चित्रप्रदर्शन आदि परोक्ष रीतियोंद्वारा बुरे कामोंके रोकनेका प्रयत्न अनुचित नहीं ।' इसी तरह द्यूत खेलनेको भी वह प्रतिबन्धद्वारा रोकना ठीक नहीं समझता था । ये सब काम बुरे हैं सही, परंतु आत्मसंघर्षसे ही उनका छूटना चरित्रबलका वर्धक होता है । वह सामाजिक परम्परागत रीति-रिवाजोंके बन्धनको भी प्रगतिका बाधक समझता था । सामाजिक नियन्त्रणसे व्यक्तित्वका विकास नहीं हो पाता । मिल आविष्कार एवं नवमार्गदर्शक शक्तिको महत्त्वपूर्ण मानता था । उसके मतानुसार ‘ जनसाधारणकी मनोवृत्ति सामान्यकी दर्शिका होती है । ' परंतु वह इस मनोवृत्तिका विरोधी था । वह तो ' अपूर्व नवीन बुद्धिवालोंको प्रोत्साहनसे नवीन विचारधाराकी सम्भावना होती है ' ऐसा मानता था । वह अधिक कवियोंका होना समाजकी उन्नतिका लक्षण मानता था । ' इससे रुचियोंकी विभिन्नता विदित होती है और यह स्वतन्त्र वातावरणमें ही सम्भव है । यदि एक कक्षाके विद्यार्थियोंके प्रश्नोत्तरमें विभिन्नता होती है तो वह कक्षा प्रगति समझता था । जो जिसे हितकर प्रतीत हो, उसे वैसा करनेकी छूट होनी चाहिये! एक ढंगसे जीवन-निर्वाहार्थ किसीको बाध्य करना उचित नहीं; इसीलिये शिक्षाके राज्यनियन्त्रित होनेका भी वह विरोधी था । हाँ, नागरिकोंको अपने बच्चोंको स्कूल भेजनेके लिये बाध्य करना राज्यका कर्तव्य है । इसके अतिरिक्त शिक्षापर राज्यका हस्तक्षेप न होना चाहिये । शिक्षा प्राप्त करनेकी स्वतन्त्रता नागरिकोंको ही होनी चाहिये । विद्यालयमें बालक कैसी शिक्षा प्राप्त करे, यह नागरिकोंकी रुचिपर ही छोड़ना चाहिये । '

पृष्ठ 130

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१२६ मार्क्सवाद और रामराज्य उसके मतानुसार ' व्यक्तिवादियोंकी भाँति ही व्यक्तिगत लाभके लिये भी मनुष्य भलीभाँति अपना कार्य संचालन करता है । उसमें राज्यके हस्तक्षेप हितकर न होंगे । सरकारी कर्मचारियोंद्वारा होनेवाले कार्योंमें उनकी इतनी तत्परता नहीं होती, जितनी किसीको व्यक्तिगत कार्योंमें तत्परता होती है । जब व्यक्ति कोई काम स्वयं करता है तो उसकी ज्ञानवृद्धि होती है 1। इसीलिये मनुष्यको स्वयं ही अधिकाधिक कार्य करना चाहिये । हाँ, समाचार- पत्रोंद्वारा अतीत कार्योंके अनुभवोंकी सूचना सरकारको देते रहना चाहिये । उससे लोग स्वयं सबक सीखेंगे । चेतावनीद्वारा भी राज्य परोक्षरूपसे मार्गदर्शक हो सकता है । सरकारी कार्योंकी व्यापकतासे नागरिक सदा ही राज्यकी ओर निहारते रहते हैं । इससे आलस्य, प्रमाद एवं प्रगतिका अवरोध होता है । इससे व्यक्तित्वके विकासमें बाधा पड़ती है और नौकरशाही बढ़ती है । इससे कोई कार्य भलीभाँति सम्पादित नहीं होता । राज्य-हस्तक्षेप एक आवश्यक विचाररूपमें ही स्वतन्त्रताके लिये मानना चाहिये । नागरिक जीवनमें राज्यका न्यूनतम हस्तक्षेप ही व्यक्तिगत स्वतन्त्रताके लिये अपेक्षित है । ' समालोचक कहते हैं कि मिल ' ईस्ट इण्डिया कम्पनी ' के दफ्तरमें नौकर और राजनीतिक पत्रोंका लेखक था । १८५८ में उसने कम्पनीके शासनके पक्षमें एक प्रार्थनापत्र लिखा था, जिसमें कम्पनीके शासनको न्यायसंगत कहा था और १८५ ९ में उसकी ' स्वतन्त्रता ' पुस्तक प्रकाशित हुई, जिसमें उसने व्यक्तिगत स्वतन्त्रताका पूर्ण समर्थन किया था । इस तरह उसके कार्य और विचार बेमेल थे । यह भी कहा जाता है कि १८३२ के पूर्व मध्यमवर्गके लोगोंने सामन्तोंकी सत्ताका विरोध किया था । १ ९वीं शतीमें सामन्तोंका ह्रास हुआ; परंतु बुद्धिजीवी वर्गकी एक बढ़ती हुई जनशक्तिका विरोध इस आधारपर सम्भव नहीं था । पूँजीपतियों एवं मध्यमवर्गीय उपयोगितासे जनताकी उपयोगिता भिन्न थी । अतः जनमतसे भयभीत बुद्धिजीवीके लिये अपेक्षित था कि वह व्यक्तिगत स्वतन्त्रताके नामपर जनमतके हस्तक्षेपसे बचे । उसी कार्यकी सिद्धि ' स्वतन्त्रता ' पुस्तकद्वारा मिलने की । अब तो पूँजीपति एवं सर्वहारा श्रमिकोंके बीच