मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 141–150
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 141–150
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आधुनिक विचारधारा १३७ कदम मानते हैं और समय- समयपर एक सत्तावादी मीमांसाने अनिश्चितता दूर की है । दैवी नियम, नैसर्गिक नियम, राज्य नियम या लौकिक नियम, इन नियमोंमें कौन नियम सर्वोच्चरूपसे मान्य हो, इस विप्रतिपत्तिमें हॉब्सने ' दीर्घकाय ' का, रूसोने ' सामान्येच्छा ' का, आस्टिनने ' जनश्रेष्ठ ' का अनुसरण ही ठीक बताया । एकसत्तावादी मीमांसाने राज्यको ही एकमात्र ‘ नियम-विधायिका ' संस्था माना । कितनी भी अच्छी व्यवस्था क्यों न हो, जबतक उसके योग्य संचालक नहीं मिलते, तबतक वह व्यर्थ ही सिद्ध होती है । धर्मनियन्त्रित शासनतन्त्र हो या नैसर्गिक नियमतन्त्र, निरपेक्ष दीर्घकाय सामान्येच्छातन्त्र हो या आधुनिक जनतन्त्र, योग्य संचालकके बिना सर्वत्र ही त्रुटियाँ आती हैं । आधुनिक जनतन्त्रकी दरिद्रता, भ्रष्टाचार, बेकारी किसीसे छिपी नहीं है । लोकतन्त्र -निर्वाचनमें कितना भ्रष्टाचार और कितना धन-जन-शक्तिका क्षय होता है, यह भी स्पष्ट है । वीनोग्राडोफके अनुसार भी एकसत्तावादी मीमांसा अपूर्ण ठहरती है । अपर्याप्त इसलिये कि यह ' संघात्मक राज्य ' पर लागू नहीं हो सकती । एकात्मक राज्यमें भी राजसत्ताधारीका पता लगाना कठिन हो जाता है । अपूर्ण इसलिये कि राज्यका कार्य केवल आज्ञा देना ही नहीं, किंतु समन्वय भी है; नागरिकके सामने कर्तव्य पालन ही नहीं, किंतु अधिकारोंकी सुरक्षा भी है । न्यायालयोंके निर्णयों एवं लौकिक नियमोंसे असम्बद्ध तथा अन्ताराष्ट्रिय नियमोंपर लागू न होनेसे भी यह अपर्याप्त एवं अपूर्ण है । जनतन्त्रमें वह सुप्तसत्ताधारी होनेमात्रसे सन्तुष्ट नहीं, किंतु सक्रियसत्ताकी प्राप्ति चाहती है । यहाँ निश्चित जनश्रेष्ठको ही वह सब कुछ नहीं मान सकती । अमेरिका आदिकी संघात्मक शासन प्रणालीके भी यह विरुद्ध है । एकात्मक संविधानमें केन्द्रियकरण होता है । ब्रिटेन एवं फ्रांसमें यह व्यवस्था थी और है । वहाँ सभी अधिकार एक संस्था- प्रतिनिधि संस्थामें निहित होते हैं । ऐसी संस्थाको ' दीर्घकाय ' या ' जनश्रेष्ठ ' कहा जा सकता है । परंतु अमेरिकाके ' संघात्मक ' विधानमें राज्यके वैज्ञानिक अधिकार केन्द्रिय सरकार एवं उपराज्योंमें विभक्त होते हैं; क्योंकि वहाँ शक्ति-
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१३८ मार्क्सवाद और रामराज्य विभाजनका सिद्धान्त स्वीकृत है । कई अन्य देशोंने भी इस व्यवस्थाको अपनाया है, इस ढंगसे संविधानोंमें कोई ऐसी संस्था नहीं है, जिसमें राज्यके सब अधिकार निहित हों । एकात्मक राज्यमें भी निश्चित जनश्रेष्ठका पता लगाना कठिन होता है । आस्टिनने ही तत्काल ब्रिटेनमें राजा, लार्डों और निर्वाचकोंको सत्ताधारी बतलाया था, परंतु दूसरी बार उसने राजा, लार्ड और लोकसभामें राजसत्ताका निहित होना बताया । दोनों ही स्थितिमें राजा और लार्डगणका सामान्य ही स्थान है । लोकसभामें सदस्योंको जब निर्वाचक सप्रतिबन्ध मतदान करते हैं, तब वे स्वयं ही राजसत्ताधारीके अंग बन जाते हैं । अप्रतिबन्ध मतदान करते हैं तो छोटी लोकसभा ( कामन्स सभा) राजसत्ताधारीका अंग बन जाती है । अतः ' राज्यमें एक निश्चित जनश्रेष्ठ सत्ताधारी है ' यह न्यायसंगत नहीं । आस्टिनके मतमें ‘ कार्यपालिका एवं नौकरशाहीको कोई स्थान नहीं और न जनताकी सत्ताका ही कोई स्थान है । ' परंतु आजकी स्थितिमें राज्यके कार्य निःसीम हो गये हैं । सभी विषयोंमें उसका हस्तक्षेप होता है । फिर उसमें अनियन्त्रित ' दीर्घकाय ' या 'जनश्रेष्ठ ' को न्याय संगत कैसे कहा जा सकता है? आधुनिक जनवादमें प्रतिस्पर्द्धा एवं सहयोग चलता है । यह सब विभिन्न जाति, वर्ग, विचार और संस्थाद्वारा होता है । अतएव कभी कोई, कभी कोई संस्था प्रभुता स्थापित करती है । इस प्रभुताका प्रभाव नियम- निर्माणपर पड़ता है । राष्ट्रमें कभी किसी संस्था या वर्गका बोलबाला होता है, कभी किसीका । कभी संसद् कार्यपालिकापर प्रभुता स्थापित करती है, कभी कार्यपालिका संसद्पर । संघीय राज्योंमें कभी संघीय न्यायालय राज्यसत्ताधारी होता है, कभी एक दल पूरे राज्यपर हावी होता है । प्रेस- आन्दोलन तथा विभिन्न संघ भी राज्यको प्रभावित करते रहते हैं । कभी- कभी अन्ताराष्ट्रिय जनमत नैतिकता परम्परा तथा सन्धियाँ भी राज्यके एकाधिकारको सीमित करती हैं । इस स्थितिमें राजसत्ताको निरपेक्ष, अविभाज्य कहना असंगत ही है । आजकी स्थितिमें राज्यकी इच्छा एवं जनश्रेष्ठका निर्णय असम्भवप्राय है । ' जनश्रेष्ठका आज्ञा देना, जनताका सीधे पालन करना ' यह आस्टिनकी
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आधुनिक विचारधारा १३ ९ व्यवस्था आज मान्य नहीं हो सकती । प्राचीन कालमें कर्तव्यपरायणतापर जोर था, परंतु आज तो अधिकारोंकी ही प्रधानता है । आज अन्य संस्थाओंका भी महत्त्व कुछ कम नहीं होता । राज्य सर्वश्रेष्ठ संघ है, परंतु निरपेक्ष नहीं । यह श्रेष्ठता सप्रतिबन्ध है । श्रेष्ठ लक्ष्यद्वारा ही राज्यकी श्रेष्ठता निर्धारित होती है । राष्ट्रिय जीवनका समन्वय तथा जनसेवासे ही नागरिक राज्यको आदर देते हैं । एक प्रधानमन्त्री असफल होनेपर पदत्याग कर देता है । ठीक यही स्थिति राज्यकी होती है । मीमांसाके विश्लेषणवादी, इतिहासवादी, राष्ट्रवादी, विकासवादी, समाजशास्त्रवादी, दर्शनवादी, कई दृष्टिकोण हैं । एकसत्तावादसे सम्बन्ध मीमांसा विश्लेषणवादी है । इन प्रथाओंके अनुसार नियमोंके दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न होते हैं । विश्लेषणवादके अनुसार नियम- निर्मात्री राज्यसत्ता ही सब नियमोंका स्रोत है । राजसत्ताधारीकी आज्ञा ही नियम है, रीति-रिवाज आदिका कुछ महत्त्व नहीं, परंतु वस्तुस्थिति यह है कि राष्ट्रकी विविध विशेषताओं, ऐतिहासिक प्रवृत्तियों, सामाजिक जीवन आदिका नियम-निर्माणमें महत्त्वपूर्ण स्थान होना अनिवार्य है । अनेक संघोंका भी नियम -निर्माणपर प्रभाव होता है । सभी देशोंमें न्यायालयोंके निर्णयोंको नियमतुल्य ही माना जाता है । सर्वोच्च न्यायालयका निर्णय अन्य न्यायालयोंका मार्गदर्शक होता है । ब्रिटेनके भी संविधानमें न्यायालयके निर्णयका महत्त्वपूर्ण स्थान है । वहाँके अलिखित संविधानके ये निर्णय महत्त्वपूर्ण अंग हैं । ब्रिटिश नागरिकके मूल अधिकार किसी एक ग्रन्थमें संग्रहीत नहीं । ये अधिकार राज्य- विधियों, लौकिक नियमों तथा न्यायालयके निर्णयों — जूरी तथा व्यक्तिगत अधिकारपर ही आधारित हैं । अनेक लौकिक विधियाँ ऐसी हैं, जिनका निरपेक्ष शासन भी लंघन नहीं कर सकता । ब्रिटिश संविधानमें इनका भी प्रमुख स्थान है । १७वीं शतीके ऐतिहासिक ' नरेश संसद्' संघर्षमें इन नियमोंके अस्तित्वका महत्त्वपूर्ण स्थान था । संसदीय नेताओं एवं न्यायाधीशोंका कहना था कि ' राजा लौकिक नियमोंका लंघन नहीं कर सकता । ' ये नियम अभीतक अलिखितरूपमें ही चले आ रहे हैं । आस्टिनने अपने
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१४० मार्क्सवाद और रामराज्य देशकी इस परम्परासे भी आँख मूँद ली थी । भारत एवं अन्यत्र अनेक जातियोंका जीवन परम्पराके अनुसार ही चला है । भारतीय शासन- व्यवस्थामें सदासे ही धर्म-विधियों एवं सदाचारपरम्पराका सर्वाधिक महत्त्व था । ‘ तदेतत् क्षत्रस्य क्षत्रम्' (बृहदा० उप० १।४ । १४ ) -के अनुसार धर्मपर राजाका शासन नहीं, किंतु राजापर ही धर्मका शासन होता था । मध्यकालिक यूरोपमें धार्मिक एवं नैसर्गिक नियम सर्वोपरि माने जाते थे । वस्तुतः एकसत्तावादी मीमांसा राज्य संघटन मात्रसे सम्बन्धित है, प्राचीन समाजसे नहीं । समाजमें सदा ही लौकिक, धार्मिक एवं नैसर्गिक नियमोंकी ही प्रधानता थी । आस्टिनवादने भी इनका अस्तित्व स्वीकार कर लिया; परंतु ये नियम तभी मान्य होते हैं, जब कि ' दीर्घकाय ' इनका निषेध न करता हो । वस्तुतस्तु ' दीर्घकाय ' इनका निषेध न कर स्वीकार ही करता है और उसे स्वयं भी इनका पालन करना पड़ता है । हीयर्न शॉने कहा है कि ' आस्टिनकी मीमांसामें हवलदारीकी गन्ध मिलती है । ' आधुनिक जनवादमें प्रत्यक्ष या परोक्षरूपसे जनस्वीकृति एवं नैतिकताके आधारपर ही राज-सत्ताधारीकी आज्ञा नियमका रूप धारण कर सकती है । शासनके लिये शक्ति आवश्यक है, परंतु डण्डेके बलसे नियम नहीं लागू किये जा सकते । संवैधानिक नियमोंका स्रोत क्रान्ति, सक्रिय या असहयोग आन्दोलन एवं जनमत है । निश्चित जनश्रेष्ठकी आज्ञा उसका आधार नहीं । ' नमनीय ' और ' अनमनीय' – ये दो प्रकारके संविधान होते हैं । संवैधानिक परिवर्तनोंके लिये परोक्ष या अपरोक्ष रूपसे जनस्वीकृति आवश्यक होती है । नमनीय संविधानमें संवैधानिक तथा साधारण नियम - निर्माणकी पद्धति एक-सी होती है । नमनीय संविधानके सम्बन्धमें ही डी लोमका ऐतिहासिक कथन है कि ' ब्रिटिश संसद् सभी विषयोंपर नियम-निर्माण कर सकती है । केवल पुरुषको स्त्री और स्त्रीको पुरुष नहीं बना सकती । ' यद्यपि अब यह भी नहीं रह गया । फिर भी वह संसद् मनमानी नियम नहीं बनाती । लास्कीके अनुसार ' यदि वह ऐसा करे तो संसद् ही नहीं, क्योंकि संसदीय सरकारका सार है जनमतद्वारा शासन । ' ब्रिटेनमें संवैधानिक नियमोंके निर्माणमें जनताकी स्वीकृति प्राप्त
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आधुनिक विचारधारा १४१ की जाती है । अन्ताराष्ट्रिय नियमोंका स्रोत भी किसी जनश्रेष्ठकी आज्ञा नहीं हो सकती । किंतु विश्व शान्तिकी भावना मानवता एवं सामाजिकता है । यातायातकी वृद्धिसे आजकल अन्ताराष्ट्रिय जनमत सम्भव हो गया । कोई भी निरपेक्ष शासक जनमतका उल्लंघन नहीं कर सकता । कोई भी निश्चित जनश्रेष्ठ अन्ताराष्ट्रिय नियमों, संधियों एवं नैतिकताको कुचल नहीं सकता । विश्वजनमतका विरोध करके किसी राज्यकी स्थिरता नहीं हो सकती । एकतावादके अनुसार ' निरपेक्षता राज्यकी सर्वश्रेष्ठ विशेषता है । यह निरपेक्षता आन्तरिक तथा बाह्य - इन दो दृष्टियोंसे होती है । आन्तरिक दृष्टिकोणसे राज्यका विरोध कोई व्यक्ति या समूह नहीं कर सकता, सभी उसके अधीन होते हैं । ' वर्जेसके मतानुसार राज्य नागरिकोंको उनकी इच्छाके विरुद्ध बाध्य कर सकता है अन्यथा अराजकता ही समझी जायगी । बाह्य नीतिकी दृष्टिसे राजसत्ताधारीका राज्यपर कोई नियन्त्रण सम्भव नहीं । अन्य राज्य भी उसे आज्ञा नहीं दे सकता । अन्ताराष्ट्रिय नैतिकता, सन्धियाँ और नियम राजसत्ताधारी राज्यको बाध्य नहीं कर सकते । उनका अनुकरण करना राज्यकी इच्छापर निर्भर है । एक सत्तावादियोंके दृष्टिकोणसे अन्ताराष्ट्रिय नियमोंको नियम नहीं माना जा सकता; क्योंकि उसकी पृष्ठभूमिमें राज्यकी तलवार नहीं होती । एकसत्तावादी दार्शनिक राज्योंके पारस्परिक सम्बन्ध हॉब्सके प्राकृतिक मनुष्योंके सम्बन्धसे होता है । अर्थात् एक राज्य दूसरे राज्योंके शत्रु होते हैं । भारतीय नीति- शास्त्रोंके अनुसार स्वभावसे ही पड़ोसी राष्ट्रके साथ संघर्षकी सम्भावना होती है और पड़ोसीके पड़ोसीके साथ मैत्रीकी सम्भावना होती है । अरिर्मित्रमरेर्मित्रं मित्रमित्रमतः परम्॥ तथारिमित्रमित्रं च विजिगीषोः पुरः स्मृताः । पाष्णिग्राहः स्मृतः पश्चादाक्रन्दस्तदनन्तरम्॥
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१४२ मार्क्सवाद और रामराज्य
आशारावनयोश्चैवं विजिगीषोश्च मण्डलम्। अरेश्च विजिगीषोश्च मध्यमो भूम्यनन्तरः ॥
अनुग्रहे संहतयोर्निग्रहे व्यस्तयोः प्रभुः । मण्डलाद् बहिरेतेषामुदासीनो बलाधिकः ॥ अनुग्रहे संहतानां व्यस्तानां च वधे प्रभुः ॥ (अग्निपुराण २४० । १–५ ) शत्रु, मित्र, शत्रुका मित्र, मित्रका मित्र और शत्रुके मित्रका मित्र- ये पाँच विजिगीषुके आगे तथा पाष्णिग्राह, आक्रन्द, पाष्णिग्राहासार और आक्रन्दासार— ये चार विजिगीषुके पीछे रहते हैं । अरि तथा विजिगीषुमें यदि संधि हो जाय तो उन दोनोंपर निग्रह-अनुग्रह करनेकी क्षमता रखनेवाला तथा परस्पर समझौता न होनेपर दोनोंको दण्ड देनेकी क्षमता रखनेवाला ' मध्यम ' होता है । इन सबसे उदासीन और इनके मण्डलसे बाहर सबके मिलनेपर अनुग्रह और सबमें फूट पड़नेपर निग्रह करनेवाला सबसे अधिक शक्तिशाली नाभि नामक राजा होता है । आदर्शवाद ईसा पूर्व यूनानी कालमें ' आदर्शवाद ' का उदय हुआ । आदर्शवादी राज्यको एक आदर्श संस्था मानते हैं और कर्तव्यपरायणता उसकी आधार- शिला कहते हैं । इस दृष्टिसे ' राज्य और व्यक्ति- दोनोंही कर्तव्यके बन्धनमें आबद्ध होकर आगे बढ़ते हैं । इसमें नागरिककी राजभक्ति और राज्यका मनुष्योंके जीवन- यापनकी सुव्यवस्था करना परम कर्तव्य है । दोनों अन्योन्य- पोषक होते हैं । कहा जाता है कि यह सभ्यता दास-प्रथा- कालकी है । जिसमें बहुसंख्यक दासोंके स्वामी ही राज्य करते थे । वे ही स्वतन्त्र नागरिक होते थे । यूनानी दार्शनिक मनुष्योंको प्रकृतिसे ही सामाजिक प्राणी मानते थे । ' मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है ' अरस्तूका यह ऐतिहासिक वाक्य प्रसिद्ध है । समाज एक प्राकृतिक संस्था है । इसका मनुष्यके साथ अंग और अंगी ( शरीर ) जैसा सम्बन्ध है । जैसे अंगीके बिना अंग जीवित नहीं रह सकता, वैसे ही समाजके बिना मनुष्य नहीं रह सकता । ' इस मतके अनुसार ' मनुष्य आन्तरिक मनोवृत्तिसे ही
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आधुनिक विचारधारा १४३ राजनीतिक संस्थाका सदस्य है । आदर्श राज्यके द्वारा ही नागरिककी नैतिकताका जन्म होता है । नागरिकोंके जीवनयापनकी सुव्यवस्थाके लिये राज्यको उसके आर्थिक एवं सामाजिक जीवनमें हस्तक्षेप करना आवश्यक है । ग्रीकराज्य एवं समाजमें प्रत्येक वर्ग - उपवर्गके कार्य पृथक्- पृथक् थे । व्यक्तिको स्व- वर्गके अनुसार ही चलना पड़ता था । अफलातून इसीको ' राज्यकी सच्ची सेवा ' कहता था । स्वधर्म - पूर्तिके लिये ही समाजसेवाका उद्देश्य था । यह व्यक्तिका श्रेष्ठ कर्तव्य था, यही सच्चरित्रता भी थी । ग्रीक ( यूनानी ) ' नगर राज्य' एक स्वतन्त्र राशि माना जाता था । घेरलू विषयोंमें वह सर्वसम्पन्न एवं निरपेक्ष था । इसे कोई अन्ताराष्ट्रिय प्रतिबन्ध भी नहीं था । यह छोटा जनवादी राज्य नागरिकोंकी नैतिकताका प्रतिनिधित्व करता था। वह अन्ताराष्ट्रिय नैतिकतासे परे था । नैतिक जीवन एवं नागरिक स्वतन्त्रता केवल राज्यद्वारा ही सम्भव हो सकती है । यह विचारधारा ' ग्रीस ( यूनान ) -की महान् देन ' समझी जाती है । यूरोपमें कई शतियों बाद १८ वीं शतीमें रूसोने इसका पुनरुत्थान किया । रूसोके इस प्रयत्नका प्रभाव सभी दर्शनोंपर पड़ा । ' यद्यपि व्यक्तिगतरूपसे ही प्राणियोंको शुभाशुभ काम करने पड़ते हैं । व्यक्तिगतरूपसे ही प्राणियोंको कर्मफल भोगने पड़ते हैं । संसारमें भी राज्य-नियमका उल्लंघन करनेसे व्यक्तिको ही दण्ड मिलता है—
एकः पापानि कुरुते फलं भुङ्क्ते महाजनः ।
भोक्तारो विप्रमुच्यन्ते कर्ता दोषेण लिप्यते ॥
( महा० उद्यो० प्रजा० ३३ | ४२ ) कभी - कभी एक व्यक्तिके पापका फल समुदायको भी भोगना पड़ता है । जैसे एक व्यक्तिने मधुमक्खीके छत्तेको छेड़ दिया । उसका दुष्परिणाम आस- पासके सभी लोगोंको भोगना पड़ता है । भोक्ता लोग तात्कालिक फल भोगकर मुक्त हो जाते हैं, परंतु कर्ता ही दोषसे लिप्त होता है । परलोकमें अपना शुभाशुभ कर्म ही व्यक्तिके साथ जाता है । व्यक्तिका समुदाय ही समाज होता है । अतः व्यक्तिकी उत्पत्ति पहले हुई, फिर आवश्यकतानुसार समाजका निर्माण संगत है ।
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१४४ मार्क्सवाद और रामराज्य रूसो कहता था -' प्राणी स्वतन्त्र जन्मा है; परंतु सभ्यताके जन्मसे वह विविध बन्धनोंसे जकड़ गया ।' वह इस परतन्त्रताकी बेड़ीसे मनुष्यको मुक्त करना चाहता था । उसका कहना था कि ' अति प्राचीन नैसर्गिक स्वतन्त्रताका पुनर्जन्म तो नहीं हो सकता; परंतु एक नागरिक उच्च नैतिक वास्तविक स्वतन्त्रताकी स्थापना हो सकती है ।' प्रत्यक्ष जनवादी राज्य रूसोका आदर्श राज्य था । ' प्रत्येक नागरिक व्यवस्थापिकाका सदस्य होता था । राज्य -नियम स्वीकृतिसे ही बनते थे । वे नियम जनताकी सामाजिक इच्छाका प्रतिनिधित्व करते थे । प्रत्यक्ष जनवादी राज्यकी इच्छा ही रूसोकी ' सामान्येच्छा ' थी । वही सत्ताधारी था । सबकी इच्छामें एकताकी भावना नहीं होती । वह सुधारद्वारा ही सामान्येच्छा बन सकती है । सामान्येच्छामें सावयव या अवयवीकी -सी एकता होती है । सबकी इच्छामें इसका अभाव होता है । व्यक्तिकी शान्तिकी इच्छा सावयवकी एकतासे विदित होती है । जिस नियममें क्षेत्र, ध्येय, उद्गम, सामान्य होते हैं, वही सामान्येच्छाका प्रतीक होता है । अर्थात् जो नियम सभीके लिये हितकर हों, जो व्यक्ति या समुदायविशेषसे सम्बन्धित न होकर सम्पूर्ण राज्यसे सम्बन्धित हों तथा जो निःस्वार्थ सामाजिक इच्छाका प्रतिनिधित्व करें और उनके मतदानसे निर्धारित हों, वे ही नियम सामान्येच्छाके प्रतिनिधि हैं । ' ' इच्छा दो प्रकारकी होती है । एक सामाजिक, दूसरी व्यक्तिगत । नागरिकोंकी सामाजिक इच्छाका ही प्रतिनिधित्व सामान्येच्छा करती है । प्रगति एवं शान्तिकी इच्छा सामान्येच्छा है । राष्ट्रोंके वैमनस्यमूलक युद्ध आदिकी स्वार्थमूलक इच्छा सबकी इच्छा हो सकती है, सामान्येच्छा नहीं । ' रूसोके अनुसार सबकी इच्छा नागरिकोंकी स्वार्थसम्बन्धी इच्छाका योग है, परंतु सामान्येच्छा तो नागरिकोंकी सामान्येच्छाका प्रतिबिम्ब होती है । सबकी इच्छा अस्थायी हित और स्वार्थी ध्येयोंसे सम्बद्ध होती है । सामान्येच्छामें स्थायी हित एवं सार्वजनिक भलाई निहित है । सावयवकी इच्छाकी भाँति राज्यकी सामान्येच्छा स्थायी है और सदा सत्य एवं सामान्य हितका प्रदर्शन करती है । ऐसे इच्छाकी अनुपस्थितिमें न राज्य सम्भव
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आधुनिक विचारधारा १४५ है, न नागरिकता । जोन्सके अनुसार ' जैसे एक खेलके खिलाड़ी विभिन्न इच्छा रखते हुए भी खेलके साधारण एवं नैतिक नियमोंका पालन करना चाहते हैं, वैसे ही नागरिकोंको विभिन्न मतभेदोंके होते हुए भी एक सामान्य हित एवं सामाजिक हितकी इच्छा होती है । यह भावना ही सामन्येच्छा तथा सुव्यवस्थाकी धात्री है । ऐसी भावनाको ग्रीन ' सामान्य स्वार्थ ' कहता है । रूसोके मतसे ' सामान्येच्छानुसार जीवनयापनमें ही व्यक्तिकी नैतिक, नागरिक तथा वास्तविक स्वतन्त्रता सम्भव है । इसके विपरीत व्यक्तिकी वास्तविक स्वतन्त्रता नहीं होती । ऐसे व्यक्तिके हितके लिये उसे सामान्येच्छाके अनुसार जीवनयापन करनेके लिये बाध्य किया जा सकता है । एक नटखट विद्यार्थीको कक्षामें चुप रहनेके लिये बाध्य करनेकी क्रियाका अर्थ है, उसे स्व-तन्त्रमें होनेके लिये बाध्य करना । ' रूसोके अनुसार ' स्वतन्त्र राज्यमें स्वतन्त्र नागरिक ' यह आदर्श व्यवस्था है । इसमें स्वतन्त्रता और नियम एक- दूसरेके विरोधी नहीं होते । ' लॉकके अनुसार भी राज्यकी अनुपस्थितिमें ' मनुष्य स्वतन्त्र और नैतिक जीवन व्यतीत करता था । ' रूसोने इसका खण्डन कर बताया कि ' नैतिकता और अधिकार केवल राज्यमें ही सम्भव हो सकते हैं । ' एक-सत्ताधारियोंने राजसत्ताधारीका क्षेत्र कुछ सीमित अवश्य कर दिया । बोदाँने राजसत्ताधारीको नैसर्गिक मौलिक नियमोंके अधीन माना था । हॉब्सने कहा था कि ' राजसत्ताधारी कोई अन्याय नहीं कर सकता, न किसी नागरिकको प्राणत्यागके लिये बाध्य कर सकता है । ' रूसो सामान्येच्छाके क्षेत्रको सामान्य विषयोंतक ही सीमित मानता है । वेन्थम इसे उपयोगितावादसे सीमित मानता है । वेन्थमवादी उपयोगिताके विपरीत नियम -निर्माण नहीं कर सकता, फिर भी वैधानिक दृष्टिसे एक- सत्तावादियोंका राज्य ‘ सर्वे सर्वा है ', वह कोई भूल नहीं कर सकता । अपनी प्रादेशिक सीमामें राज्य सर्वाधिकारी प्रभु है । कोई भी संघ, भले वह ईसाई धर्मकी तरह अन्ताराष्ट्रिय ही हो, राज्यके नियमोंसे परे नहीं हो सकता । हाँ, राजदूतावास एवं उसके निवासी राज्यविधियोंके अधीन नहीं होते । इस तरह परदेशी नागरिकों एवं दूतावासोंसे ही राज्यकी व्यापकता सीमित है ।
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१४६ मार्क्सवाद और रामराज्य उन- उन राजदूतावासोंमें उन -उन राज्योंके ही नियम चलते हैं, अन्य सभी विषयोंमें राज्यका एकाधिकार ही होता है । इस अर्थमें राजसत्ताकी व्यापकता मान्य होती है । इसी तरह राजसत्ता अदेय मानी जाती है । राजसत्ताको राज्यसे हटानेका अर्थ है ' राज्यका अन्त करना ।' राजसत्ताके बिना राज्य प्राणहीन होता है । अतएव अस्थायीरूपसे राज्य अपने राजसत्ताधारी अधिकार किसी संस्थाको दे सकता है । इस कार्यसे उसके राजसत्ताधारी रूपका अन्त नहीं होता । वह उन अधिकारोंको वापस ले सकता है । यदि एक राजसत्ताधारी राजा या संस्था पदत्याग करे तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि राजसत्ताका अन्त हो गया । इससे केवल राजसत्ताका स्थान परिवर्तित होता है । राज्यके समान ही राजसत्ता स्थायी है । सरकारमें परिवर्तन होनेसे राज्य या राजसत्तामें परिवर्तन नहीं होता । राजसत्ता अविभाज्य होती है । राज्योंके शक्ति- विभाजनके कारण राज्यके कार्य विभक्त होते हैं; परंतु इससे राजसत्ताका विभाजन नहीं होता । रूसोके अनुसार ' शक्तिका विभाजन हो सकता है, राज्यकी इच्छाका नहीं । ' १ ९वीं शतीमें भी औद्योगिक क्रान्तिके फलस्वरूप सामाजिक जीवनमें स्पर्धा एवं संघर्षका महत्त्वपूर्ण स्थान है । उस स्थितिमें राजसत्ता एक राशि न होकर अनेक प्रकारकी हो गयी । कई राष्ट्रोंमें वैधानिक राजसत्ता मान्य होती है, जैसे ब्रिटेनका सम्राट्, भारतका राष्ट्रपति 1। उसकी स्वीकृतिके बिना कोई कार्य नहीं चल सकता, परंतु उत्तरदायी मन्त्रिमण्डलकी स्वीकृतिके बिना ऐसे सत्ताधारी श्रेष्ठ जन कुछ भी नहीं कर सकते । ब्रिटेनमें सम्राट् और संसद् राजसत्ताधारी हैं । वे सभी प्रकारका नियम बना सकते हैं । कुछ परिस्थितियोंके कारण संसद् राजसत्ताधारी नहीं होती । आधुनिक समाजसेवक राज्यमें संसद् नियम निर्माणमें स्वतन्त्र नहीं होती । वस्तुतः कार्यपालिका ही सत्ताधारी होती है । संयुक्त राष्ट्र अमेरिकामें कांग्रेस ही नियम निर्माण करती है, परंतु कुछ नयी परिस्थितियोंके कारण राष्ट्राध्यक्षका भी परोक्षरूपसे नियम - निर्माणमें महत्त्वपूर्ण स्थान होता है । इसीलिये विश्वके वैधानिक अध्यक्षोंमें अमेरिकाका राष्ट्रपति सबसे अधिक अधिकारसम्पन्न होता है ।