मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 371–380

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

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वर्ग संघर्ष ३६७ बताता है । भौतिक उत्पत्ति, पैदावारमें परिवर्तन होनेसे बौद्धिक उत्पत्तिमें भी परिवर्तन होता है । जब जिस वर्गका शासन होता है, तब उसके ही विचारोंकी प्रधानता होती है । जीवन निर्वाहकी प्राचीन प्रणालीका नाश होते ही, प्राचीन विचारोंका ही लोप हो जाता है । यूरोपमें ईसाई धर्म तथा भारतमें बौद्धधर्मका आविर्भाव एवं पुराने धर्मका लोप भी आर्थिक दशा बदलनेसे ही हुआ था । उत्पत्तिकी प्रणाली, सामाजिक वर्गविभाग और सम्पत्ति-सम्बन्धी नियम जब उत्पादक शक्तियोंके लिये बन्धनरूप बन जाते हैं और विभिन्न वर्गोंका स्वार्थ, विरोध वर्गकलहका रूप धारण कर लेता है, तब सामाजिक क्रान्तिका युग आता है । इससे प्राचीन समाज नष्ट होकर विस्मृतिके गर्भमें चला जाता है, परंतु वह नष्ट होनेसे पहले जीवनके नवीन मार्गका निर्माण कर देता है, जो उत्पादक- शक्तियोंके अनुरूप होता है । इस नवीन समाजकी वृद्धि चाहनेवाले लोग क्रान्तिकारी भावनाओंसे उत्पन्न होनेवाली समस्याओंको हल करनेमें संलग्न हो जाते हैं । इस तरह उत्पादक शक्तियोंकी उन्नति और पूर्णता ही मनुष्यजातिके विकासका सार है । ' ' आदिकालीन, मध्यकालीन, वर्तमानकालीन उत्पादन-प्रणालियोंको मनुष्यसमाजकी प्रगतिके विभिन्न युग कहते हैं । वर्तमान पूँजीवादी समाजको उत्पादनप्रणाली इस विरोधयुक्त श्रृंखलाकी अन्तिम कड़ी है । यह विरोध व्यक्तिगत नहीं, किंतु समाजकी परिस्थितिद्वारा उत्पन्न होता है । साथ ही पूँजीवादके भीतर जो उत्पादक शक्तियाँ उत्पन्न हो रही हैं, वे इस विरोधको मिटानेका मार्ग भी प्रशस्त कर रही हैं । इस प्रकार पूँजीवादी समाज मनुष्य-जातिके प्रागैतिहासिक युगका अन्तिम अध्याय है । ' उपर्युक्त बातोंका खण्डन पूर्वोक्त युक्तियोंसे ही हो जाता है । कम्युनिष्ट वर्गकलह, वर्गविद्वेष या वर्गसंघर्षको ही वर्गविकास एवं ज्ञान भण्डार- वृद्धिका कारण कहते हैं । साथ ही वर्गभेदको ही विकास या उन्नतिका लिंग मानते हैं । अतएव हबशी या भिल्ल आदि जंगली अविकसित जातियोंमें वर्गभेदका अभाव बतलाते हैं, परंतु यह सुविचारित

पृष्ठ 372

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३६८ मार्क्सवाद और रामराज्य सिद्धान्त है कि सुमति, दक्षता, सदाचार, सद्धर्म, नियन्त्रण, सहिष्णुतासे वैमत्य मतभेद मिटता है और संघटन, समन्वय, सामंजस्य एवं सौमनस्य होता है । इसका महत्त्व ऋग्वेद तथा अथर्ववेदमें भी सौमनस्य सूत्रोंके द्वारा कहा है— ' सङ्गच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। ' -आदि मन्त्रोंके द्वारा संगमन, संवदन तथा सौमनस्य- संघटन आदिको अभ्युदयका कारण कहा गया है । ' मा विद्विषावहै ' आदि मन्त्रोंद्वारा ईश्वरसे भी परस्पर द्वेष मिटानेकी प्रार्थना की गयी है । जहाँ दुर्बुद्धि, दुर्भावना, असहिष्णुता, उच्छृंखलता बढ़ती है, वहीं विद्वेष, वैमनस्य, विवाद तथा विनाश आदि होता है । यदि कलह, संघर्ष, विद्वेष, विनाश आदि ही सभ्यता या प्रगतिशीलता है और संघर्ष, विनाश, वर्गविद्वेष आदि न होना पिछड़ना या असभ्यता है तो कोई भी बुद्धिमान् कहेगा कि ऐसी सभ्यतासे असभ्यता ही ठीक है, ऐसी प्रगतिसे अप्रगति ही ठीक है । तभी तो आजके बर्बरतापूर्ण नरसंहार, अशिष्टता, असभ्यता, दुर्दान्तताका नग्न अकाण्ड ताण्डव एवं मानवताको त्रस्त करनेवाली, पशुताको मात करनेवाली स्वेच्छाचारिता, विलासिताको प्रगति एवं सभ्यता माना जा रहा है । वस्तुतः यह विपरीत बुद्धि है । वैभव, सम्पत्ति, उन्नति, प्रगति, विघटन, वैमनस्य कभी भी वर्गविनाशका कारण नहीं होता । गरीबी भी विघटनकी कारण नहीं होती । प्रमाद, मूर्खता, विलासिता, स्वेच्छाचारिता, स्वार्थपरायणता ही विघटन, वैमनस्यका कारण होती है । इन दोषोंसे युक्त होनेसे गरीबों- अमीरों सबमें विघटन होता है । चाहे अमीर हों या गरीब, जंगली हों या नागरिक, प्रगतिशील हों या अप्रगतिशील, मनुष्य हों या देवता अथवा पशु ही क्यों न हों, जहाँ दुर्बुद्धि, अविवेक और स्वार्थपरायणता बढ़ती है, वहीं विद्वेष, वैमनस्य, विघटन और विनाश बढ़ता है । जहाँ सद्बुद्धि, सदाचार, नियन्त्रण, सहिष्णुता है, वहाँ प्रेम संघटन उन्नति ही होती । इसीलिये जंगली पशुओं, मनुष्यों, देवताओंमें भी इन गुणोंके आधारपर संघटन रहता है । गुणोंके अभाव एवं दोषोंके बढ़ जानेपर विघटन आदि बढ़ता है ।

पृष्ठ 373

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वर्ग संघर्ष ३६ ९ मधुमक्खियोंका संघटन प्रसिद्ध है । कपोतों एवं अन्यान्य पशु -पक्षियोंमें भी संघटन होता है । कहते हैं, कुछ कपोत जालमें फँस गये, एकमत होकर एककी रायसे वे सब जाल लेकर उड़ गये एवं अपने मित्र हिरण्यक - मूषककी सहायतासे मुक्त हो गये । जंगली गायें एकत्र होकर सिंहका भी मुकाबला करती हैं । वे निर्बल, बाल- वृद्ध पशुओंको मध्यमें रखकर प्रबल साँड़ोंको आगे करके सिंह - व्याघ्रका मुकाबला करती हैं और अपने आपको बचा लेती हैं । कम्युनिष्टोंको भी मजदूर संघटनसे अथ च दृढ़ प्रयत्नसे ही सफलता मिल सकती है । संघटनमें केवल एक स्वार्थ ही नहीं, किंतु सहिष्णु मनकी एकता ही मूल कारण है । एक उद्देश्यकी सिद्धिके लिये एक सूत्रमें सम्बन्धित व्यक्तियोंका ग्रन्थित होना ही संघटन है । महान् प्रयोजन होनेपर भी असहिष्णु, स्वेच्छाचारी संघटित नहीं हो सकते । कथंचित् किसी स्वार्थके लिये कुछ क्षणके लिये संघटित हो भी जाते हैं तो भी पद प्राप्त हो जानेपर स्वार्थके टकराते ही संघटन छिन्न-भिन्न हो जाता है । यही बात जडवादियोंके संघटनोंमें देखी जाती है । अधिकार प्राप्तिके लिये ' सफाया ' या ' कण्टक- शोधन ' के नामपर अधिकारारूढ़ लोग अपने पुराने साथियोंको ही मौतके घाट उतारने लगते हैं । अमृत-प्राप्तिके लिये देवताओं एवं दानवोंमें भी संघटन हुआ था, पर स्वार्थमें आघात आते ही भीषण देवासुर संग्राम हुआ । जालमें फँसे हुए लोमश बिल्लेने दो शत्रुओंसे घिरे हुए पलित मूषकका सन्धि-प्रस्ताव भी स्वीकार किया था । विडालसे मित्रता करके मूषक अपने शत्रु सर्प एवं श्येनसे मुक्त हुआ । आत्मरक्षाका ध्यान रखते हुए शिकारीके समीप आनेपर शीघ्रतासे जाल काटकर बिलावको भी बचा दिया, परंतु कार्य पूर्ण होते ही फिर दोनों पृथक् हो गये । फिर तो बिलावके बुलानेपर भी मूषक उसके पास नहीं गया, परंतु यदि किसी अहिंसकके प्रभावसे मूषक - मार्जारके स्वाभाविक वैर भी छूट जाते हैं तो वह सदाके लिये ही वैर छोड़ देते हैं । वे एक- दूसरेके भक्षक या शोषक न रहकर रक्षक या पोषक ही रहते हैं । यह चन्द्रमा मुनिके आश्रम एवं रामराज्यके उदाहरणसे स्पष्ट किया जा चुका है ।

पृष्ठ 374

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३७० मार्क्सवाद और रामराज्य वैभव, सम्पत्ति, अधिकार या राज्य प्राप्त होनेपर प्रमादको अधिक अवसर होता है । तपस्यासे राज्य एवं राज्यसे मद उत्पन्न होता है । दुःखी, दरिद्र, उत्पीड़ित प्राणीको न्याय, धर्म, ईश्वर प्रिय लगते हैं । वह चाहता है कि ' सबके साथ न्याय हो, सभी धर्मात्मा हों । ' परंतु जब इस शुभ भावना एवं तपस्यासे उसे राज्य प्राप्त होता है, तब वह न्याय, धर्म, ईश्वरादिको भूल जाता है । फिर वही घमण्ड, प्रमाद, शोषणकी प्रवृत्ति चलती है । अन्तमें उसके सामने पतन एवं नरकादि ही आते हैं । इसी ऐश्वर्य-मदके उन्मादसे हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, वृत्र, रावण -कंसादिका तथा इन्द्र, दक्ष, नहुष आदिका पतन हुआ था । इन्द्रके प्रमादसे त्रैलोक्यलक्ष्मी नष्ट हो गयी थी । पुनः महती तपस्या एवं प्रयत्नसे उसका प्रादुर्भाव हुआ था । पर इसका यह अभिप्राय नहीं कि सबका ही पतन होता है, जो राज्य, ऐश्वर्य या सम्पत्ति प्राप्त करके भी सावधान रहते हैं, शास्त्र एवं धर्मके नियन्त्रणमें बने रहते हैं, समाज, राष्ट्र एवं विश्वके हितार्थ आत्मोत्सर्गके लिये तत्पर रहते हैं, उनका पतन न होकर उत्थान ही होता है । ' धर्ममूलां श्रियं प्राप्य न जहाति न हीयते ॥ ' ( महा० उद्योग० ३४ । ३१ ) मनु, इक्ष्वाकु, दुष्यन्त, भरत, हरिश्चन्द्र, रामचन्द्र, शिबि, रन्तिदेव आदि ऐश्वर्यपूर्ण होनेपर भी प्रमत्त न होकर निरन्तर धर्मनिष्ठ ईश्वरपरायण रहकर विश्वहितमें लीन रहे; अतः उनकी उत्तरोत्तर उन्नति हुई है । यह बात-

विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय ।

खलस्य साधोः विपरीतमेतद् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ॥

(गुणरत्नम् ७) -से स्पष्ट कर दी गयी है । विद्या, बुद्धि, शिक्षा आदिके सम्बन्धमें अपनेसे अधिक वृद्ध, बुद्धिमान् एवं विद्वान्से लोग तत्तद् वस्तुओंको प्राप्त करते हैं । यहाँ गुरु-शिष्यभाव रहता है - द्वेष नहीं । पूर्वजोंमें पूज्य-बुद्धि होती है, विरोध -बुद्धि

पृष्ठ 375

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वर्ग संघर्ष ३७१ नहीं । इसी तरह जिन प्राचीन नियमोंसे प्राणीकी उन्नति होती है, उनके प्रति भी विरोध -बुद्धि नहीं होती । पूर्व-पूर्व अवस्थासे उत्तरोत्तर उन्नति होती है तो पूर्व- पूर्व अवस्थासे उत्तरोत्तर अवस्थाके संघर्षका अवकाश नहीं रहता । पूर्व - पूर्वकी पूँजी एवं साधनोंके सहयोगसे उत्तरोत्तर पूँजी एवं साधनोंकी वृद्धि अवश्य होती है । कोई व्यापारी सहस्रसे लक्ष लक्षसे कोटि कमाता है, अतः परस्पर साध्य -साधन भाव या उपकारी उपकारक भाव होना ही अधिक न्यायसंगत है । इसीलिये पूर्वकालमें ईश्वर, धर्म, धार्मिक राजा, धनवान्, पूँजीपति एवं सुखी किसान, सेवक, शूरवीर सभी साथ रह सकते थे । बैलगाड़ी, पुष्पकयान, पादचारी भी साथ रह सकते थे । लाठीसे लेकर ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्रतक शस्त्रास्त्र थे । हाथके करघेसे लेकर महायन्त्रतक थे । विश्वकर्मा, मयके आविष्कारके साथ हाथसे पर्णशाला बनाकर रहनेवाले भी थे । सब एक- दूसरेके पोषक थे, शोषक नहीं । सारांश यह है कि शास्त्र, धर्म एवं ईश्वरभावके नियन्त्रणके अभावमें ही वर्ग संघर्ष, वर्ग- विद्वेष, वर्ग -विध्वंस एवं क्रान्ति आदिकी बात चलती है । जो दोष है, गुण नहीं हो सकता । इतिहासमें भली, बुरी सभी बातें होती हैं । सब न तो सिद्धान्त ही होती हैं, न ग्राह्य ही । भारतीय सभ्यतामें जो ' मात्स्य न्याय ' कहा गया है, वही कम्युनिष्टोंका परम पुरुषार्थ एवं अभीष्ट वर्ग संघर्ष है । यह पहले बतलाया जा चुका है कि कृतयुगमें जब कि सत्त्वगुणका पूर्णरूपसे विकास था, सभी धार्मिक, सात्त्विक थे । साथ ही विद्या, बल, शक्ति, वैभवका भी अभाव न था । ईश्वर, ब्रह्मा आदिमें सत्त्वकी प्रधानतासे ही विद्या, वैभव, विविध ऐश्वर्य होते हैं । इन्द्रादि देवताओंका ही नहीं, पर हिरण्यकशिपु, मय आदि दानवोंका ऐश्वर्य भी जो वेदों-पुराणोंमें वर्णित है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि उसके मुकाबले आजका वैभव कुछ नहीं है । पूर्ण उत्कर्ष कालमें भी सत्त्व एवं धर्मकी जब प्रधानता हुई, तब धर्मनियन्त्रित जनता किसी राजा, राज्य, दण्डविधानके बिना भी आपसमें ही सब काम चला लेती थी-

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३७२ मार्क्सवाद और रामराज्य

न वै राज्यं न राजासीन्न च दण्डो न दाण्डिकः ।

धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम्॥

(महा० शा० प० ५ ९ । १४) यह भी एक महान् आश्चर्य है कि जो सर्वत्र समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृताका आदर्श रखते हैं, वे ही वर्ग- विद्वेषका मार्ग भी प्रशस्त करते हैं । यह वैसी ही विरुद्ध बात है - जैसे कोई जाना चाहता है पूर्व, पर चल रहा है पश्चिमकी ओर । जहाँ समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृताके लिये विद्वेष, वैमनस्य मिटाकर सदाचार, परस्पर पोषण, उपकार, सहिष्णुता एवं सहानुभूतिका भाव बढ़ाना अपेक्षित है, वहाँ मार्क्सवादी संघर्ष, विद्वेष बढ़ानेका मार्ग ग्रहण करते हैं । मार्क्सवादी समझते हैं कि शोषक- शोषितोंका विरोध मूषक- मार्जारके वैरके समान अमिट है; इनमें विरोध मिटाकर समानता, भ्रातृता आदि स्थापित नहीं हो सकती, अतः विद्वेष उत्तेजित कर वर्ग - विध्वंसके द्वारा ही समानता सम्भव है । शोषितोंका राज्य होने एवं शोषकोंकी समाप्ति होनेसे ही वर्गहीन समाजमें समानता ठीक सम्पन्न होगी, परंतु यह धारणा नितान्त भ्रान्तिमूलक है । कारण, पहले तो वर्गभेद ही कोई वास्तविक स्थिर भेद नहीं; क्योंकि शोषकों एवं शोषितोंकी कोई निश्चित जाति नहीं है । जो किसीकी अपेक्षा शोषित है, वही किसीका शोषक होता है । जलकी कोई भी मछली अपनेसे बड़ी मछलीद्वारा शोषित है, वही अपनेसे छोटी मछलीकी शोषक है । जंगलके पशुओंकी भी बात ऐसी ही है । मेढक साँपके मुखमें है; परंतु उस हालतमें भी वह मच्छरोंको खाता है । इस तरह शक्ति एवं सम्पत्तिमें तारतम्य रहता ही है । फिर उनमें भी प्रबल शोषक और दुर्बल शोषित होगा ही । वराटिकापति, रूप्यक़पति, शतपति, सहस्रपति, लक्षपति आदिमें आपसमें शोषक- शोषित भावकी कल्पना हो सकती है । अन्तिम शोषितको ही रखकर सभी शोषकोंकी समाप्ति भी सम्भव नहीं है; क्योंकि अन्तिम शोषित कौन है? इसका निर्णय कठिन है । यदि यह मान भी लिया जाय तो भी इसका यह अर्थ हुआ कि समुद्रके प्रबल जल-जन्तुओंको समाप्त करके सिर्फ अति क्षुद्र जन्तुओंका

पृष्ठ 377

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वर्ग संघर्ष ३७३ ही राज्य बनाया जाय । जंगलोंके सिंह- व्याघ्रादिको मिटाकर शृगालों या मच्छरोंका ही राज्य बनाया जाय, परंतु यह न तो कभी किसी शासनका आदर्श रहा ही, न आदर्श हो ही सकता है । आदर्श तो यह था कि समाजमें सब रहें, पर कोई किसीका शोषक न रहे, सब एक- दूसरेके पोषक रहें । बाघ, बकरे सब एक घाट पानी पीयें । बाघ बकरे दोनोंको ही जीवित रहनेका अधिकार है; परंतु दोनोंके पोषक होकर ही रहें, शोषक होकर नहीं । जैसे बुद्धिमान् रोगीको न मिटाकर रोग मिटानेका ही प्रयत्न करते हैं, वैसे ही शोषकोंको न मिटाकर शोषण-वृत्ति मिटाना शासनका उद्देश्य है । दण्ड -विधानका भी उद्देश्य बदला चुकाना आदि न होकर अपराधीकी अन्तरात्मशुद्धि ही मुख्य उद्देश्य रखा गया था । शोषणवृत्ति बिना मिटाये शोषितोंमें ही शोषक उत्पन्न होते रहेंगे । अत्यन्त गरीब, मजदूर या कँगले भी अधिकार पाकर शोषक हुए हैं एवं हो सकते हैं । धार्मिक भावनावाले दिलीप-जैसे महासम्राट् भी एक गायकी रक्षाके लिये अपने प्राण दे सकते हैं, शिबि- जैसे सम्राट् भी एक कबूतरके प्राण बचानेके लिये अपने देहका सम्पूर्ण मांस दे सकते हैं । साथ ही यह भी विचारणीय है कि क्या कोई मनुष्य स्वभावसे ही शोषक होता है या उसमें स्वाभाविक बुराई आगन्तुक है? यदि बुराई या शोषण कोयलेमें कालापनके समान स्वाभाविक है, तब तो अवश्य जैसे कितना ही साबुनसे धोनेपर बिना कोयलाके मिटे उसका कालापन नहीं मिट सकता, वैसे ही शोषक मनुष्यके मिटे बिना उससे शोषण या बुराई नहीं मिट सकती, परंतु वस्तुस्थिति ऐसी नहीं । स्वभावसे प्राणी बुरा या शोषक नहीं होता । यह कह चुके हैं कि कभीका शोषक ही पोषक बन जाता है तथा कभीका पोषक ही शोषक बन जाता है । शास्त्रीय संस्कार, सत्समागम एवं धर्मनिष्ठाके विस्तारसे प्राणी पोषक बनता है । अधर्म, प्रमाद, स्वार्थपरता बढ़नेपर पोषक भी शोषक बन जाता है । वाल्मीकि पहले शोषक थे, पर वे ही सत्समागमसे महर्षि एवं विश्वपोषक बन गये । अजामिल जो पहले साधु पुरुष थे, दुस्संगसे शोषक हो गये; फिर

पृष्ठ 378

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३७४ मार्क्सवाद और रामराज्य कालान्तरमें वे ठीक हो गये । रामराज्यके सिद्धान्तानुसार प्राणिमात्र ईश्वरके अंश, अविनाशी, चेतन, अमल, सहज सुखराशि है - 'ईस्वर अंस जीव अबिनासी । चेतन अमल सहज सुखरासी ।' वेद भी कहते हैं-' अमृतस्य पुत्राः ' प्राणिमात्र अमृत - परमेश्वरके पुत्र हैं । जैसे गंगाका तरंग गंगाजलके तुल्य ही शीतल, मधुर और पवित्र होता है, वैसे ही चेतन, अमल, सहज सुखराशि परमेश्वरकी संतान भी चेतन, अमल, सहज सुखराशि ही हैं 1। उनमें बुराई अविद्या, काम - कर्मके सम्पर्कसे आयी- भूमि परत भा ढाबर पानी । जिमि जीवहि माया लपटानी ॥ जैसे निर्मल जलमें भूमिके सम्पर्कसे मलिनता आ जाती है, वैसे ही माया आदिके सम्पर्कसे जीवमें मलिनता आ जाती है । जैसे मलिन जलमें निर्मल बूटी या फिटकिरी डालनेमें जलमें निर्मलता आ जाती है, वैसे ही स्वधर्मानुष्ठान एवं ईश्वर भक्तिसे जीवकी मलिनता, बुराइयाँ दूर हो जाती हैं, फिर वह शोषक नहीं रह जाता, शुद्ध पोषक हो जाता है । असलमें मात्स्यन्याय दूर होनेके लिये ही शासनकी स्थापना हुई है । धर्म, सदाचारका विस्तार, सत्य, अहिंसाकी प्रतिष्ठा तथा दण्डके द्वारा शोषण मिटाकर समन्वय, सामंजस्य स्थापित करना ही शासनका मुख्य लक्ष्य है । वस्तुतः मार्क्सवादी स्वतन्त्रता, समानता, भ्रातृताकी बात तो करते हैं; परंतु उन्हें समानता, स्वतन्त्रता और भ्रातृताकी वास्तविक आधार - भित्ति विदित नहीं है । जड देह, मन, बुद्धि, इन्द्रिय आदि समानता आदिके आधार नहीं हो सकते । कारण, उनकी विषमता स्पष्ट है । देह किसी दोके भी एक समान नहीं । किसीका देह मोटा, किसीका पतला, किसीका लम्बा, किसीका नाटा होता है । सगे भाइयोंके भी प्रत्येक अवयवमें भेद रहता है । शक्तिमें भी भेद है । कोई दो -दो मोटरोंको रोक सकते हैं, कोई बकरीको भी नहीं रोक सकता । इसी तरह बुद्धिमें भी समता नहीं कही जा सकती । कोई कई शास्त्रोंके विद्वान् एवं दार्शनिक होते हैं और कोई अत्यन्त निर्बुद्धि भी होते हैं । कोई पर्याप्त अन्न, दुग्धादि पचा सकते हैं, कोई किंचिन्मात्र भी घृतदुग्धादि नहीं पचा सकते, वे थालीमें रखे हुए

पृष्ठ 379

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वर्ग संघर्ष ३७५ मोदकको छूनेसे परमाणुबम -जैसा डरते हैं । कार्यकरणक्षमता भी सबकी एक - सी नहीं । अतः भौतिकवादमें समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृताकी कोई वास्तविक आधारभित्ति ही नहीं है । इसीलिये वहाँ समानता, भ्रातृता, स्वतन्त्रतादिकी केवल बात ही होती है, कार्य - वर्ग- विद्वेष वर्गविध्वंसका होता है । उनकी समानता उनके दलके साथियोंतक ही सीमित है । उनमें भी विरोध उत्पन्न होते रहते हैं और ' सफाया ' कण्टकशोधनके नामपर कलके साथीको भी मौतके घाट उतारा ही जाता है, परंतु रामराज्यके सिद्धान्तमें समानता, भ्रातृता आदिका वास्तविक आधार अध्यात्मवाद है । जहाँ किसी सीमित दायरेके भीतर ही नहीं, किंतु किसी देश, जाति, सम्प्रदाय या पार्टीका अमीर, गरीब, पुण्यात्मा, पापात्मा, कोई स्त्री- पुरुष, बालक - वृद्ध हो अथवा देवता, दानव, मानव, पशु -पक्षी, कीट- पतंग हों, सभी ईश्वरके पुत्र हैं । उनके देहोंमें भेद हो सकता है, किंतु देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धिका द्रष्टा, क्षेत्रज्ञ आत्मामें कोई भेद नहीं होता । सोने, लोहे, मिट्टीके घड़ेमें भेद है, पर उनमें स्थित आकाशमें कोई भेद नहीं । वैसे ही विभिन्न देह, इन्द्रिय, मन-बुद्धिमें भेद हो सकते हैं, उनके कार्योंमें भी विषमता होती है; परंतु सबमें रहनेवाले द्रष्टा, चेतन, अमल, सहज सुखराशिमें कोई भी भेद नहीं है । उसी बोधरूप आत्मामें वास्तविक समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृता हो सकती है । जडमें न स्वतन्त्रता ही सम्भव है, न समानता । आधि, व्याधि, मृत्युके परतन्त्र, किसी भी जड वस्तुमें स्वतन्त्रताका राग अलापना केवल विडम्बना ही है । सर्वोपाधिकृत भेदविवर्जित आत्माको ही लेकर समानता सम्भव है । जो सब प्राणियोंमें एक आत्मा या भगवान्‌को देखता है, वह किसका विरोध करेगा, किसका शोषक होगा?

उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध ।

निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध ॥

जो प्राणिमात्रमें भगवत्सत्ताका अनुभव करता है अथवा सभी प्राणियोंको भगवान्‌की पवित्र संतान समझता है, वह कैसे किसीका शोषक होगा? शास्त्रोंमें भगवान्ने कहा है- नाना प्रकारके भूषणों,

पृष्ठ 380

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३७६ मार्क्सवाद और रामराज्य अलंकारों, नैवेद्योंद्वारा मेरा सम्मान करना और मेरे अंशभूत प्राणियोंको सताकर शोषण करना वैसी ही मूर्खता है, जैसे किसीको संतुष्ट करनेके लिये किसीके गलेमें माला पहनाना और उसीकी आँखमें काँटा चुभाना । प्राणियोंका अपमान करनेवाले पुरुषकी ईश्वरार्चा भस्ममें डाली हुई आहुतिके तुल्य व्यर्थ है । इसीलिये शास्त्र कहते हैं कि ईश्वर ही जीवरूपसे श्वान, चाण्डाल, उष्ट्र, गर्दभादि सभी प्राणियोंमें प्रविष्ट है, अतः दान-मानादिद्वारा सबका ही सम्मान करना चाहिये, किसीका भी अपमान' ईश्वरोनहीं करनाजीवकलयाचाहिये- प्रविष्टो भगवानिति ॥ ' ( भाग० ३ । २ ९ । ३४ ) ' ' प्रणमेद्दण्डवद् भूमावाश्वचाण्डालगोखरम्( भाग० ११ । ॥२९ । १६ )

यो मां सर्वेषु भूतेषु सन्तमात्मानमीश्वरम् ।

हित्वार्चां भजते मौढ्याद् भस्मन्येव जुहोति सः ॥

(भाग० ३ । २९ । २२ ) भक्तराज प्रह्लादने यही प्रार्थना की थी- स्वस्त्यस्तु विश्वस्य खलः प्रसीदतां ध्यायन्तु भूतानि शिवं मिथो धिया । मनश्च भद्रं भजतादधोक्षजे आवेश्यतां नो मतिरप्यहैतुकी ॥ (भाग० ५ । १८ । ९ ) अर्थात् विश्वका कल्याण हो, खल प्राणी सज्जन बनें । खलको मिटाना अभीष्ट नहीं; किंतु उसकी खलताको ही मिटाना अभीष्ट है । दुर्जन सज्जन बनें, सज्जन शान्ति प्राप्त करें एवं शान्त प्राणी संसारबन्धनोंसे मुक्त हों तथा वे मुक्त होकर औरोंको भी बन्धनसे छुड़ानेका प्रयत्न करें—

दुर्जनः सज्जनो भूयात् सज्जनः शान्तिमाप्नुयात्।

शान्तो मुच्येत बन्धेभ्यो मुक्तश्चान्यान् विमोचयेत्॥

सब प्राणी एक -दूसरेका परस्पर शुभानुसंधान करें, शुभचिन्तक बनें, सबका मन भद्रदर्शी हो, सबकी बुद्धि परमेश्वरनिष्ठ हो । इसीलिये महर्षिगण अपनी नाक कटाकर भी दूसरोंके शकुन बिगाड़ने -जैसा