मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 401–410
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 401–410
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वर्ग संघर्ष ३ ९७ सकता है । संतुलित समता, संतुलित विषमता ही मान्य हो सकती है । शरीरमें भी हाथ, पाँव, पेट, पीठ आदिमें तथा एक हाथकी ही अँगुलियोंमें भी मोटापन, पतलापन, लम्बाई-चौड़ाई आदि समान नहीं । कोई बड़ी, कोई छोटी, कोई मोटी, कोई पतली है, तथापि उनका एक सन्तुलन भी है । पेट बहुत मोटा हो जाय, हाथ- पैर दुबले हो जायँ तो शरीर स्वस्थ नहीं समझा जा सकता । निष्कर्ष यह है कि सामाजिक, आर्थिक संतुलन रहना बहुत आवश्यक है । इसी असंतुलनको दूर करनेके लिये भारतीय धर्मशास्त्रों, नीतिशास्त्रोंमें अनेक प्रकारके नियम हैं । शास्त्रानुसार प्रत्येक व्यक्ति एक- दूसरेका मधु अर्थात् मोदहेतु माना गया है । पंच महायज्ञद्वारा विश्वका उपकारक बनता है । यज्ञसे देवताओंका, ब्रह्मयज्ञसे ऋषियोंका, भूतयज्ञसे कीट- पतंगों, पशु -पक्षियों, सभी प्राणियोंका तर्पण किया जाता है, श्वान, काक, प्रेत, पिशाचादि सभी प्राणियोंके तर्पणका प्रयत्न किया जाता है । अर्थात् मनुष्य केवल अपने लिये नहीं उत्पन्न हुआ है, किंतु सम्पूर्ण विश्वके तर्पणके लिये उसका जन्म है । भोजनकालमें जो भी भोजनार्थी आये, उसका नाम, गोत्र पूछे बिना उसे भोजन करानेका नियम है । रन्तिदेव आदि महापुरुषोंने ४८ दिनका निर्जल व्रत करनेके अनन्तर भी भोजन उपस्थित होनेपर नियमानुसार अतिथिकी प्रतीक्षा की । प्राप्त सत्तुक आदि सब कुछ ब्राह्मण, अन्त्यज आदिको प्रदान कर दिया था । जल पीके समय भी जब पुल्कसने आकर जल माँगा तो वह जल भी उसे दिया और प्राणान्त होते समय भी परमेश्वरसे यही प्रार्थना की कि ' प्रभो! मुझे राज्य, स्वर्ग, अपवर्ग कुछ भी नहीं चाहिये, केवल दुःखियोंका दुःख ही मुझे मिल जाय; जिससे वे सुखी हो जायँ'–
न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम्।
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्॥
मन्वादिने भी यह नियम रखा है कि जिसके घरमें तीन वर्षोंके लिये भृत्यादि भरणकी सामग्री हो, उसे सोमयज्ञ करके उसीमें अपना धन लगाना चाहिये ।
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३९८ मार्क्सवाद और रामराज्य
यस्य त्रैवार्षिकं भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये ।
अधिकं वापि विद्येत स सोमं पातुमर्हति ॥
(मनु० ११।७ ) विविध प्रकारके दानोंका भी उद्देश्य असंतुलन मिटाना ही है । अतिरिक्त आयका पंचधा विभाजन करके राष्ट्रहितमें लगानेकी बात पीछे कही जा चुकी है । मनुने यह भी कहा है कि जो राजा असाधु पुरुषसे धन लेकर साधु-पुरुषोंको प्रदान करता है, वह अपनेको नाव बनाकर उन दोनोंको तार देता है—
योऽसाधुभ्योऽर्थमादाय साधुभ्यः सम्प्रयच्छति ।
स कृत्वा प्लवमात्मानं सन्तारयति तावुभौ ॥
(मनु० ११ । १२ ) इसी प्रकार अनुचित ढंगसे चोरबाजारी, चोरी, डाका, घूससे धनवान् बननेवाले असाधुओंसे धन छीनकर साधुओंको देना उचित है । ईमानदार धनवानोंसे भी सहायता लेकर बिना रोजी -रोजगारवालोंकी रोजीका प्रबन्ध करना राजाका कर्तव्य है । भूमिवालोंसे भी भूमि लेकर बेरोजगारी दूर की जा सकती है । हाँ, यह अवश्य है कि जिस कुँएसे पानी लिया जाय, उसको इस योग्य बनाये रखें कि वह आगे भी सहायता देने लायक रहे । किसी अंगसे अस्थि या मांसकी सहायता लेकर दूसरे अंगकी आवश्यकता पूरी की सकती है, परंतु सहायक अंगको मिटा देना- नष्ट कर देना अनुचित है । उसे पुष्ट बनाकर उसकी कमी पूरी करनी ही ठीक है । यही जड़वाद, अध्यात्मवादमें भेद है । अध्यात्मवादी अपनी शक्ति, सम्पत्तिको विश्व - सेवामें समर्पित करनेको लालायित रहता है, भारतीय नीतिके अनुसार दूसरे व्यक्तिकी वस्तु लेनेसे हर प्रकार बचना चाहता है । पर देनेवाला हर प्रकार अपनी वस्तु दूसरेको देना चाहता है । शास्त्र प्रतिग्रहसे बचनेका आदेश भी करते हैं और देनेवालेको हर प्रकारसे देनेका उपदेश भी । प्रतिग्रहसमर्थ पुरुषको भी प्रतिग्रहसे बचना चाहिये- ' प्रतिग्रहसमर्थोऽपि प्रसङ्गं तत्र वर्जयेत्। ' ( मनु० ४। १८६ ) पर देनेवालेको कहते हैं कि—
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वर्ग संघर्ष ३ ९९ ' श्रद्धया देयम्, अश्रद्धया देयम्, श्रिया देयम्, ह्रिया देयम्, भिया देयम्। ' (तैत्तिरीय उप० १ । ११ । ३ ) स्वतः श्रद्धासे दे, दूसरोंकी प्रेरणासे दे, लज्जासे दे, भयसे दे । टोला- पड़ोसके लोग भूखे रहेंगे तो कोई भी धनी अपनी कोठीमें सुखकी नींद सो न सकेगा । चोरी, डाका, लूट, खसोट आदि अवश्य ही मचेगी । इस दृष्टिसे देनेवाला हर तरह देना चाहता है । लेनेवाला बचना चाहता है । अतः लीजिये, लीजिये, नहीं, नहींका घोष सुनायी पड़ता है । आधुनिक साम्यवादियोंमें ठीक इसका उल्टा है । गरीबों-मजदूरोंके नामपर लेनेवाले कहते हैं, ' लड़कर लेंगे, झगड़कर लेंगे, मरकर- मारकर लेंगे, लेंगे । ' देनेवाले कहते हैं — ' नहीं देंगे, मर जायँगे, मिट जायँगे पर नहीं देंगे । ' इस तरह यहाँ ' दो -दो, नहीं -नहीं ' का घोष चलता है । अध्यात्मवादमें एक मुख्य उपासना है, जिसमें निर्गुण ब्रह्म जाननेके लिये विराट् हिरण्यगर्भ तथा अव्याकृत ब्रह्मकी उपासना करनी पड़ती है । यह उपासना अहंग्रहरूपसे होती है । उपासकको अपने व्यष्टि स्वरूपको हटाकर समष्टिरूपकी भावना करनी पड़ती है, अर्थात् अपनेको साधारण देह न मानकर महाविराट् मानना पड़ता है । फिर तो द्युलोकको अपना मूर्द्धा, सूर्यको चक्षु, वायुको प्राण, अन्तरिक्षको उदर, समुद्रको बस्ती, पृथ्वीको पैर मानता है । जिसमें अहंता लानी हो, उसमें पहले घनिष्ठ ममता लानी पड़ती है । जिनमें साधारण ममता होती है, उनमें अहंता नहीं होती । देहमें घनिष्ठ ममता होती है, अतः उसमें ही अहंता होती है । इतनी ममता दृढ़ होनेसे ही अहंता उत्पन्न होती है । जब कभी पुत्र- कलत्रमें ममता घनिष्ठ हो जाती है, तब उनमें भी अहंता उत्पन्न होती है । इसीलिये उनके दुःख- सुखमें दुःखी -सुखी होनेकी बात चलती है । अतएव जैसे प्राणी देहके भोजन - वस्त्र विविध सुखसाधनोंके लिये तथा दुःख दूर करनेके लिये प्रयत्नशील होता है, वैसे ही जब पुत्र - कलत्रादि भी ममता एवं अहंताके आस्पद होते हैं, तब उनके भी दुःख-निवृत्ति एवं सुख प्राप्तिके लिये प्राणी सदा ही तत्पर होता है । यह ममता क्रमेण विकसित होती है ।
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४०० मार्क्सवाद और रामराज्य साधारण प्राणी देहमें ही ममता रखता है, पर साधक धीरे- धीरे संकुचित व्यष्टि अभिमानको मिटाकर, उसे कुटुम्ब, ग्राम, मण्डल, राज्य, राष्ट्र एवं विश्वमें विकसित करता है । इसीलिये साधारण प्राणी अपने ही दुःखमें दुःखी और सुखमें सुखी होते हैं । पर उच्च भावनावाले लोग कुटुम्ब, ग्रामके दुःख- सुखमें दुःखी -सुखी होते हैं और अधिक उच्च लोग सारी पृथ्वीको ही कुटुम्ब मानकर सारे विश्वको अपनी आत्मा मानकर संसारके ही सुख -दुःखमें सुखी -दुःखी होते हैं । इसीलिये अधिकांश अपने दुःख - सुखमें रोते - हँसते हैं, पर दूसरोंके दुःखमें रोनेवाले और दूसरोंके सुखमें हँसनेवाले महापुरुष होते हैं । इसका निष्कर्ष यह निकलता है कि जैसे सामान्य प्राणी अपने सुख -प्राप्ति, दुःख- निवृत्तिमें निरन्तर प्रयत्नशील होता है, वैसे ही महापुरुष समष्टि जगत्की दुःख-निवृत्ति और सुख- साधनमें लगे रहते हैं । इस दृष्टिसे राजा -प्रजा सभी समष्टि हित -साधनमें संलग्न रहकर एक इस प्रकारका जीवन निर्धारित करते और कम-से- कम उस स्थितिमें राष्ट्रके प्रत्येक नागरिकको पहुँचानेका प्रयत्न करते हैं । विविध प्रकारकी सहायता तथा बिना सूद-ऋणादिद्वारा रोजी -रोजगार देरकर मजदूरी या नौकरी देकर सभीके लिये उचित रोटी, कपड़ा, औषध, शिक्षा, निवासकी व्यवस्था की जाती है । उसी दृष्टिसे वेतनका भी निर्धारण होता है । योग्यता एवं परिस्थितिके अनुसार किसीको नौकरी, किसीको कोई व्यापार, किसीको कोई उद्योग, किसीको खेती करने आदिकी व्यवस्था करके सबकी ही रोजीकी व्यवस्था की जाती है । इतनेपर भी हानिका डर एवं लाभका प्रलोभन हुए बिना आलस्य- प्रमादका त्यागकर उत्साहके साथ तत्परतापूर्वक परिश्रममें जबतक प्रवृत्ति न होगी, तबतक सफलता सम्भव नहीं । संघटनकी कुंजी यह तो हुई विघटनकी बात । अब जहाँ ' सङ्घे शक्तिः कलौ युगे ' की बात आजकल बहुत होती है, वहाँ भी संघटनकी योजनाएँ कैसे सफल हों, इस विषयमें सभी परेशान हैं । वास्तवमें जो संघटनपर रातों -दिन व्याख्यान दे और लेख लिख रहे हैं, जो स्वयं प्रान्त, समाज,
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वर्ग संघर्ष ४०१ राष्ट्रके संघटनपर जमीन - आसमानके कुलाबे एक किया करते हैं, उनके स्वाभाविक स्वार्थसे सम्बन्ध रखनेवाले सभी काम प्रायः विघटनके मूल होते हैं । सौहार्द, सामंजस्य, सौमनस्य, मनुष्यत्वकी बातें वहींतक होती हैं, जहाँतक उनके निजी स्वार्थमें बाधा नहीं आती । फिर बाहरकी तो बात ही दूसरी है, पहले उनके घरोंमें ही कितना संघटन है? कुटुम्बियों, बन्धु - वर्गों, स्त्री, पुत्र, माता-पितामें क्या सौहार्द है? यदि नहीं तो बाहर कैसे होगा? वस्तुतः यह धारणा भ्रान्तिपूर्ण है कि व्यक्तियोंके सुधार बिना सामूहिक सुधार हो जायगा । यह सच है कि राष्ट्र, प्रान्त, समाजके वातावरणका प्रभाव व्यक्तियोंपर पड़ता है, पर व्यक्तियोंके ही समूहको तो समाज, राष्ट्र आदि कहा जाता है । यदि सभी व्यक्ति आत्मसुधारकी ओर ध्यान न देकर केवल समूह- सुधार लिये प्रयत्नशील होंगे तो क्या स्वप्नमें भी वैयक्तिक या सामूहिक सुधार हो सकता है? कुछ व्यक्तियोंके समूहको कुटुम्ब, कुछ कुटुम्बके समूहको ग्राम या नगर कहा जाता है और उनके समूहको ही प्रान्त एवं राष्ट्र कहा जाता है । अतः जबतक वैयक्तिक, सामूहिक दोनों ही सुधारकी ओर ध्यान न दिया जाय, तबतक सफलताका स्वप्न देखना बेकार है । इसीलिये भगवान् मनु इस राष्ट्रिय, सामाजिक व्यवस्थाको ही लक्ष्यमें रखकर कौटुम्बिक, सामाजिक व्यवस्थापर जोर देते हैं और कुटुम्बपतिको वैयक्तिक नियन्त्रणके लिये यह बतलाते हैं कि धर्मबुद्धिसे ऐसा नियन्त्रण करे कि जिससे कुटुम्ब और समाजके विघटनका मूल विवाद ही न उठने पाये । असहिष्णुता, अक्षमता, स्वार्थपरायणता आदि दोष ही विवाद और कटुता फैलाकर विघटन करते हैं । मनुका कहना है कि प्रति व्यक्तिको चाहिये कि वह ऋत्विक्, पुरोहित, आचार्य, मातुल, अतिथि, आश्रित, बालक, बूढ़े, रोगी, वैद्य, जातिवालों, सम्बन्धी, बान्धव, माता, पिता, बहन, भाई, पुत्र, स्त्री, बेटी तथा नौकर - चाकरोंके साथ विवाद न करे- ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः । बालवृद्धातुरैर्वैद्यैर्ज्ञातिसम्बन्धिबान्धवैः ॥
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४०२ मार्क्सवाद और रामराज्य
मातापितृभ्यां जामीभिर्भ्रात्रा पुत्रेण भार्यया ।
दासवर्गेण विवादं न समाचरेत् ॥
(४।१७९ -८० ) अगर उपर्युक्त व्यक्तियोंमें एक व्यक्तिके चलते विवाद और विघटन न हुआ तो कौन कह सकता है कि ' उसीके दृष्टान्तसे दूसरे भी वैसा कर एक महासंघटनका सूत्रपात न करेंगे? पर सहवाससे खटपट होना स्वाभाविक है । राग, रोष, ईर्ष्या, मद, मोह आदि बड़े - बड़े योग्योंके मनमें भी विकार, अपराग पैदा कर देते हैं । संघर्षसे बचना तो बड़ा कठिन है, स्वार्थोंके सम्बन्धसे पिता- पुत्रादिमें भी विवाद खड़ा होता है, फिर दूसरोंमें तो कहना ही क्या? अतएव मनु इसे धर्म बतलाकर इसके पालनसे परलोक- सिद्धि बतलाते हैं । धार्मिक पुरुष कठिन से कठिन कष्ट सहकर भी धर्मको बचाते हैं । धर्म- बुद्धिसे एक सम्राट् भी अपने गुरुका सेवक बनता है । उनके किये हुए अपमानोंको श्रद्धासे सहन करता है और उसके मनमें विकारका लेश भी नहीं आता । इसलिये मनुका कहना है किएतैर्विवादान्इनके साथ झगड़ासन्त्यज्यबचाकर गृहस्थसर्वपापैःसब पापोंसेप्रमुच्यतेछूट जाता। है— एभिर्जितैश्च जयति सर्वांल्लोकानिमान् गृही ॥ (मनु० ४। १८१ ) कुटुम्बमें विघटन, वैमनस्यसे नैतिक, सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक सभी प्रकारका पतन और पातक हो सकता है । पर उपर्युक्त लोगोंसे झगड़ा टालनेमें ये विषय उपस्थित ही नहीं होते । अतः समाजके संघटन, धारण - पोषणमें कोई बाधा नहीं पड़ती । धर्मके ही सम्बन्धसे बालक, बूढ़े, दुर्बल, रोगियोंके आग्रहों, बातों और चिड़चिड़ापनको सहना पड़ता है, जो भौतिक और स्वार्थ- दृष्टिके संघटनमें असम्भव है । ज्येष्ठ भ्राताको पिताके समान और भार्या तथा पुत्रको अपना शरीर समझकर उनसे विवाद बचाना चाहिये । दासवर्गको अपनी छायामें और कन्याको परम दयाका
पात्र जानकर उन सबका सहन करना चाहिये ।
भ्राता ज्येष्ठः समः पित्रा भार्या पुत्रः स्वका तनुः ॥
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वर्ग संघर्ष ४०३ छायातस्मादेतैरधिक्षिप्तःस्वो दासवर्गश्चसहेतासञ्ज्वरःदुहिता कृपणं सदापरम्॥। ( मनु० ४ । १८४) वास्तवमें इस तरह जो अपने सहवासियोंद्वारा अपनी निन्दा सह लेगा, वही व्यापक संघटनका अधिकारी होगा । किसी भी समाज या राष्ट्रको वशमें लानेके लिये बड़ी सहिष्णुता तथा स्वार्थ- त्यागकी अपेक्षा है । अपने कुटुम्बको कुटम्ब बनानेके बाद ही प्राणी वसुधाको कुटम्ब बना सकता है । जिसका अपने कुटुम्बमें ही सहयोग नहीं, जो अपने कुटुम्बके ही अधिक्षेपोंको नहीं सह सकता, वह दूसरोंके अधिक्षेपोंको कैसे सहेगा और कैसे उनके लिये स्वार्थ त्याग करेगा? अधिक क्या? दैहिक संघटन भी कम चमत्कारपूर्ण नहीं है । हस्त, पाद, मुख, नेत्रादि एक- दूसरेकी विपत्तियोंमें कैसे भाग लेते हैं? पलकें, हाथ आदि नेत्रकी सारी विपत्तिको स्वयं लेना चाहती हैं । पैरमें काँटा लगनेपर नेत्र देखनेको उतावले हो उठते हैं; हाथ निकालनेको और मुँह फूँकनेको प्रस्तुत हो उठता है । देहीकी तो बात ही निराली है । यदि कहीं अपने दाँतोंसे जीभ कट जाय तो क्या दाँत पत्थरसे तोड़ डाले जायँ? एक अंगसे दूसरे अंगपर आघात हो तो क्या देही उसे काट दे? वह तो यही समझता है कि सब मेरे ही हैं । इस दृष्टिसे सर्वत्र व्यापक अनन्त एक आत्माको देखनेवाला पुरुष तो सब देहोंको अपना ही अंग समझता है, फिर अपनी देहपर प्रहार करनेवालेको क्या करे; क्योंकि वह भी तो अपना ही है- ' जिह्वां क्वचित् सन्दशति स्वदद्भिस्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत् । ' (श्रीमद्भा० ११ । २३ । ५१ ) ' सब अपना ही कुटुम्ब है या अपना ही अंग या स्वरूप है ', इस दृष्टिसे समाज और राष्ट्र एवं विश्वका हित चाहना बड़ी ऊँची बात है । बिना ऐसे भावोंके क्या संघटन सम्भव है? राष्ट्रका वशीकरण यद्यपि समाजका आधार व्यक्ति है, तथापि बिना संघटनके समाज
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४०४ मार्क्सवाद और रामराज्य नहीं बनता । संगठित व्यक्तियोंका प्रथम समाज कुटुम्ब ही है । उसके संचालनमें जिन गुणोंकी आवश्यकता होती है, वास्तवमें राष्ट्रके संचालनमें भी उन्हीं गुणोंकी आवश्यकता है । कुटुम्बमें भिन्न स्वार्थीका संघर्ष है । किसी -न-किसी तरह उसमें सामंजस्य स्थापित करना छोटे, बड़े, बूढ़े, स्त्री, पुत्र, कलत्र सबको सन्तुष्ट रखना, नीतिद्वारा काम निकालना, किसीके साथ अन्याय न होने देना, अनुशासन और स्वतन्त्रताका उचित अनुपातमें मेल मिलाये रखना, सबको स्नेहके सूत्रमें बाँध रखना और घरके भीतर- बाहर शान्ति बनाये रखना जटिल समस्या है । राष्ट्रके संचालनमें भी ऐसी ही समस्याओंका पग- पगपर सामना करना पड़ता है । अतः जिसने कुटुम्ब - संचालनमें सफलता पा ली, वही राष्ट्र- संघटनमें भी सफल हो सकता है । इसीलिये शास्त्रोंमें कुटुम्बकी रक्षापर बड़ा जोर दिया गया है और सहिष्णुता, उदारता, क्षमता, आज्ञापालन, सौहार्द, सौमनस्य आदि गुणोंकी बड़ी आवश्यकता बतलायी गयी है । कुटुम्बमें जो वास्तवमें एक छोटा- मोटा राष्ट्र ही है, जबतक समान-मन, समान-उद्देश्य नहीं बनता एवं जबतक स्नेहसूत्रमें सब बँध नहीं जाते, तबतक किसी प्रकारका अभ्युदय असम्भव है । इन सबको सम्पादन करनेके लिये अथर्ववेदके सांमनस्य सूक्तमें ( ३।६।३० ) एक अनुष्ठान बतलाया गया है । उसके मन्त्रोंका विधिवत् जप, हवन, अभिषेकद्वारा इस लक्ष्यकी सिद्धि होती है । इन मन्त्रोंके कुछ अंश एवं आशय इस प्रकार हैं-' सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः । ' ( ३ । ६ । ३० । १ ) अर्थात्- हे विवाद करनेवाले मनुष्यो! मैं तुमलोगोंका वैमनस्य मिटाकर सौमनस्य करता हूँ । ( यह उक्ति जापक, होता या अभिषेक करनेवालेकी है । ) मैं तुम्हें समान हृदय, समान चित्तवृत्ति एवं सम्यक् प्रीतिसे सख्य भावसे युक्त बनाना चाहता हूँ । जैसे गौ अपने वत्सको चाहती है, वैसे तुमलोग भी एक-दूसरेसे प्रेम करो -' अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु सम्मनाः । जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शंतिवाम् । ' ( २ ) पुत्र पिताका अनुगामी हो, माता पुत्रादिकोंके समान मनवाली और भार्या पतिसे सुखयुक्त मधुर वचन
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वर्ग संघर्ष ४०५ बोलनेवाली हो–' मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन् मा स्वसारमुत स्वसा । सम्यञ्चः सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया । ' ( ३ ) एक भाई दूसरेसे द्वेष न करे, एक बहन दूसरेसे द्वेष न करे । सब लोग समान रहन -सहन, ज्ञान, कर्मसम्पन्न होकर कल्याणमयी वाणी बोलें-' येन देवा न वियन्ति नो च विद्विषते मिथः तत्कृण्मो ब्रह्म वो गृहे । संज्ञातं पुरुषेभ्यः ' ( ४ ) जिस मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रादि देवताओंका परस्पर विवाद, विद्वेष नहीं होता, उसी एक मत्यापादक सांमनस्य मन्त्रको तुम्हारे गृहमें प्रयुक्त करता हूँ—' ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो मा वियौष्ट संराधयन्तः सधुराश्चरन्तः । अन्यो अन्यस्मै वल्गु वदन्त एत सध्रीचीनान्वः संमनसस्कृणोमि । ' ( ५ ) तुमलोग ज्येष्ठ, कनिष्ठभावसे परस्पर अनुरक्त हो । समान चित्त होकर समान कार्यके लिये समान प्रयत्नशील हो । परस्पर वियुक्त न हो; एक- दूसरेसे प्रियवाक् बोलते हुए परस्पर मिलो । मैं तुमलोगोंको समान कर्ममें समान मन होकर प्रवृत्त करता हूँ-' समानी प्रपा सह वोऽन्नभागः समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि । ' ( ६ ) तुमलोगोंकी एक पानीयशाला हो, साथ ही अन्नभाग हो, ( एक जगह ही बैठकर अन्नपानादिका भोग करो ), मैं तुमलोगोंको एक स्नेहपाशमें बाँधता हूँ । जैसे चारों ओरसे घेरकर अरा नाभी ( चक्र ) -का आश्रयण करते हैं, वैसे ही समान फलकी आकांक्षासे तुम एक ही अग्निदेवकी उपासना करो- ' सध्रीचीनान् वः संमनसस्कृणोम्येकश्नुष्टीन्त्संवननेन सर्वान् । देवा इवामृतं रक्षमाणाः सायंप्रातः सौमनसो वोऽस्तु । ' ( ३ । ६ । ३० । ७ ) मैं तुम्हें एक कार्यके लिये एक चित्तसे सहोद्युक्त बनाता हूँ और एक प्रकार ही तुम्हारी व्याप्ति या मुक्ति हो । इस सांमनस्य वशीकरणसे मैं तुम सबको वशमें करता हूँ । जैसे देवता एक मत होकर अजरामरत्वप्रापक अमृतकी रक्षा करते हुए शोभनमनस्क होते हैं, वैसे ही आपलोग भी सदा शोभनमनस्क हों । कितनी उच्च और उदार कामनाएँ हैं । जो लोग अथर्ववेदको जादूगरी, टोनाटामरका पिटारा समझते हैं, उनका ध्यान क्या कभी इस ओर भी जाता है? कुटुम्बियों एवं कुटुम्बोंके सौमनस्य, सामनस्यमें सारा राष्ट्र ही नहीं — सारा विश्व स्नेहपाशमें बँधकर एकमत होकर अपने
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४०६ मार्क्सवाद और रामराज्य अभीष्टको प्राप्त कर सकता है । सभा, सोसाइटियोंमें केवल प्रस्ताव पास करनेकी वीरता दिखलानेसे कुछ नहीं होता । मनुष्य कितनी ही दृष्टादृष्ट शक्तियोंसे घिरा रहता है, सब बातें उसके वशकी नहीं । इसीलिये लौकिक प्रयत्नोंके साथ पारलौकिक प्रयत्नोंकी भी आवश्यकता रहती है । संकल्पकी शक्ति बड़ी प्रबल होती है । उनका प्रभाव लौकिक स्थितियोंपर भी पड़ता है । आज कुटुम्ब, राष्ट्र तथा विश्वमें विघटन -ही विघटन है । ' अपनी-अपनी डफली, अपना- अपना राग' सर्वत्र आज यही दिखलायी दे रहा है । जहाँ देखो, वहीं ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ, कलह, संघर्षका साम्राज्य है । इनके प्रशमनके आधुनिक सभी उपाय विफल हो रहे हैं । आज वैज्ञानिक अनुसंधानोंके पीछे लाखों रुपये उड़ते हैं । असफलता होनेपर भी कुछ नवीन बातोंके अनुभव होनेका सन्तोष कर लिया जाता है । फिर क्यों न कभी कुछ दैवी प्रयत्न करके भी देख लिया जाय? यदि हमसे कठिन अनुष्ठान नहीं होते तो क्या इतना भी नहीं बन पड़ता कि प्रतिदिन अपनी श्रद्धानुसार कुछ जप, भजन, प्रार्थना विश्वकल्याणार्थ करके देख लें कि उसका फल क्या होता है? समाजवादमें लोकतन्त्र ' सोवियट कम्युनिज्म ' ( रूसी साम्यवाद ) नामक पुस्तकमें फेबियन वेव दम्पतिने लिखा है कि ' जहाँ अमेरिका, ब्रिटेनमें ६० प्रतिशत जनता चुनावमें भाग लेती है, वहाँ सोवियत रूसमें ८० प्रतिशत जनता भाग लेती है । इस आधारपर मार्क्सवादी सर्वहाराका अधिनायकत्व ही वास्तविक जनतन्त्र है । ब्रिटेन, अमेरिकाका जनतन्त्र तो ढोंगमात्र है । ' परंतु दूसरी पार्टीको प्रेस, पत्र, प्रचार आदिका जहाँ अवकाश ही न हो, दूसरे दलको स्वतन्त्ररूपसे निर्वाचनमें भाग लेनेका अधिकार ही न हो, जहाँ अधिनायकके आदेशानुसार जनताको वोट देना ही पड़े, वहाँ अस्सी प्रतिशत ही क्या शत-प्रतिशत वोट पड़ें तो भी क्या आश्चर्य है? परंतु क्या इसे स्वतन्त्र जनमत कहा जा सकता है? यह तो केवल दूसरेकी आँखोंमें धूल झोंकनेके लिये शुद्ध नाटकमात्र है । कहा जाता है कि ' रूसमें मजदूर वर्गको छोड़कर दूसरा कोई वर्ग