मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 491–500
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 491–500
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- माक्सय अर्थ व्यवस्था ४८७ सहायक ही बन सकता है । बहुत सम्भव है अपने अज्ञानके कारण वह क्रान्तिका विरोध भी करने लगे, परंतु उसके हितको ध्यानमें रखकर सामाजिक क्रान्तिके मार्गपर उसे चलाना मजदूरश्रेणीका काम है । ' निम्नश्रेणीके साधनहीन, नौकरी - पेशावाले लोगोंका इस आन्दोलनमें विशेष महत्त्व है । ये लोग यद्यपि शिक्षाकी दृष्टिसे साधनहीन श्रेणीके नेता होने लायक हैं, परंतु अपने संस्कारोंके कारण यह अपने -आपको मजदूरश्रेणीसे ऊँचा तथा पृथक् समझते हैं । ये लोग अपनी शक्तिको श्रेणीके रूपमें संगठित करनेमें न लगाकर अपनी वैयक्तिक उन्नतिद्वारा अपने - आपको ऊँचा उठानेका यत्न करते हैं । ये लोग पूँजीपतियोंद्वारा साधनहीन श्रेणी किसान, मजदूरोंके शोषणमें पूँजीपतियोंका शासन कायम रखनेमें ही अपना हित समझते हैं । क्रान्ति-विरोधी और प्रतिक्रियावादी होनेका कारण इस श्रेणीका विश्वास है कि साधनहीन श्रेणीका शासन हो जानेपर इन्हें भी मजदूर बन जाना पड़ेगा । इनके जीवन - निर्वाहका दर्जा गिर जायगा । ये लोग समझते हैं कि समाजवादमें सभी लोग गरीब हो जायँगे; परंतु मार्क्सवादका विचार इससे ठीक उलटा है । उनका कहना है कि पूँजीवादमें पूँजीपतियोंके मुनाफा कमा सकने और समाजको उपयोगके पदार्थ मिल सकनेके उद्देश्योंमें अन्तर्विरोध होनेके कारण समाजमें पैदावारके साधनोंपर रुकावट न रहेगी । समाजमें इतनी पैदावार हो सकेगी कि साधारण परिश्रमसे ही सब लोगोंको अपनी आवश्यकताएँ पूर्ण करनेका अवसर रहेगा और ९९ प्रतिशत जनताकी अवस्था समाजवादमें पूँजीवादकी अपेक्षा बहुत बेहतर हो जायगी । निम्न, मध्यम श्रेणीके वे भाग जो सचेत होकर इस बातको समझ जाते हैं कि पूँजीवादी व्यवस्थामें अपने परिश्रमका फल उचितरूपसे न पा सकनेके कारण वे मजदूरश्रेणीमें मिलते जा रहे हैं और साधनहीन होनेके नाते उनके हित मजदूरों तथा दूसरे साधनहीनोंके ही समान हैं, वे साधनहीन श्रेणीके आन्दोलनमें आगे बढ़कर अगुआका काम करते हैं । साधनहीन श्रेणियोंके आन्दोलनोंकी गतिके बारेमें मार्क्सने लिखा है, ' साधनहीन मजदूरश्रेणीको मजदूरी और वेतनकी गुलामीमें फँसाकर
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४८८ मार्क्सवाद और रामराज्य उसका भयंकर शोषण हो रहा है और वह जीवनके कुछ अधिकार पा सकनेके लिये छटपटा रही है, परंतु इस श्रेणीको इन छोटे- मोटे सुधारों मोहमें नहीं फँसना चाहिये । उन्हें याद रखना चाहिये कि इस आन्दोलनद्वारा वे केवल पूँजीवादके परिणामोंको ही दूर करनेका यत्न कर रहे हैं । वे पूँजीवादको जो उनकी मुसीबतोंका कारण है, दूर करनेका यत्न नहीं कर रहे हैं । वे अपनी गिरती हुई अवस्थामें केवल रोक लगानेका यत्न कर हुईरहे हैंइमारतमें। वे समाजकीटेक देनेकाइमारतकोयत्न नयेकर सिरेसेरहे हैं बनानेकामुनासिबयत्न नकामकेकर गिरतीलिये मुनासिब मजदूरीकी जगह अब उन्हें अपना यह नारा बुलन्द करना चाहिये....... ' मजदूरी और पूँजीवादी व्यवस्थाका खात्मा हो । ' मार्क्सवाद इतिहासके जिस क्रम और विचारधारामें विश्वास करता है, उसके अनुसार पूँजीवादी प्रणालीमें सुधार और लीपापोतीकी गुंजाइश बाकी नहीं । वह अपना उद्देश्य समझता है एक नवीन समाजका निर्माण । असलमें चीनके अनुभवोंसे ही मार्क्सवादियोंको मजदूरोंसे भिन्न किसान और निम्न मध्यमश्रेणीको भी साधनहीन श्रेणीमें मिलाना पड़ा । चीनकी क्रान्तिसे पहले मार्क्सवादी कहते थे-' सर्वहाराके अधिनायकत्वमें क्रान्ति होगी । उसीसे समाजवादकी स्थापना होगी । भले ही किसानोंकी संख्या बड़ी है, तथापि वह उदीयमान नहीं है । मजदूरदल ही उदीयमान है । ' पर चीनमें कृषकोंद्वारा ही क्रान्ति हुई । सम्भवतः आगे चलकर परस्थितियोंके थपेड़ेसे मार्क्सवादियोंको अन्य आस्तिकोंके भी सिद्धान्त मानने पड़ जायँ । क्रुश्चेव तथा बुल्गानिनने भारत आकर बहुत- से भारतीय परम्पराओंका अनुगमन किया ही । यह कहा जा चुका है कि विशेषतः भारत -जैसे सांस्कृतिक देशोंमें उच्च खानदानके लोग ही परिस्थितिवश मजदूर बनकर मजदूरी करते हैं । उनमें धर्म, सभ्यता, संस्कृति तथा अपनी मर्यादाकी रक्षाका भाव रहता है । वे मजदूरी करके कुछ पैसा पाकर अपने धर्म, संस्कृति तथा माता, पिता, पुत्र, पत्नी आदि कुटुम्ब एवं कुलपरम्पराका रक्षण चाहते हैं । क्रमागत ( बपौती ) सभ्यता, संस्कृति, अपनी सम्पत्ति एवं मिल्कियतमें अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानते हैं । भारतमें मिताक्षराके
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- माक्सय अर्थ व्यवस्था ४८९ अनुसार पूर्वजोंकी सम्पत्तिमें पुत्र- पौत्रोंका स्वत्व मान्य है । गर्भस्थ बालककी ओरसे भी न्यायालयमें उठायी जानेवाली स्वत्वरक्षणकी माँग मान्य होती है । तभी लोकमान्य कह सके थे कि स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है । मजदूर भी चाहता है कि मेरी कमाई मेरे पुत्र- पौत्रोंको प्राप्त हो । मैं अपनी कमाईसे दान- पुण्य कर अपना लोक- परलोक बना सकूँ । केवल फाँकेमस्तीकी बात करना, होटलमें खाना तथा अस्पतालमें मरना उसे पसन्द नहीं है । किसान तथा मध्यम श्रेणीके लोग भी अपनी भूमि, सम्पत्ति, संस्कृति छोड़कर कम्युनिज्मका परतन्त्रतापूर्ण जीवन व्यतीत करना नहीं चाहते । यह उनकी समझदारी है, बेसमझी नहीं । वे कहते हैं कि यह घरफूँककी समझदारी कम्युनिष्टोंको ही मुबारक हो । व्यक्तिगत भूमि-सम्पत्ति आदिका राष्ट्रीकरण हो जानेसे सभीको सदाके लिये परतन्त्रताके बन्धनमें जकड़ जाना पड़ेगा । अपनी संस्कृति, सभ्यता एवं धर्मके विकास तथा रक्षणके लिये कोई कुछ भी न कर सकेगा । मुट्ठीभर तानाशाह कम्युनिष्टोंका निर्णय ही उनकी धर्म, सभ्यताका निर्णय समझा जायगा । मध्यम श्रेणीको यह समझानेकी आवश्यकता नहीं है कि मजदूर लोग गरीब नहीं रहेंगे । यह तो कोई भी समझ सकता है कि जिसका शासन रहता है, वह गरीब नहीं रहता । ' मजदूरों, गरीबोंका राज्य होगा', यह नारा तो बहुसंख्यक गरीबोंके आकर्षणके लिये ही है और इसीके द्वारा मनुष्यकी स्वाभाविक दुर्बलताओंका लाभ उठाकर ईर्ष्या-द्वेषकी वृत्ति उभाड़कर विध्वंस तथा अपहरणमें गरीबोंको प्रवृत्त करनेके लिये चेष्टा की जाती है । फिर भी समझदार गरीब मजदूर सब समझते हैं कि छीना- झपटी तथा अपहरणादिके द्वारा किसीका स्थायी उपकार एवं कल्याण नहीं हो सकता । दूसरोंको बिना सताये, धर्मका बिना उल्लंघन किये थोड़ा भी धन बरक्कत और शान्तिका कारण होता है । बेईमान, विधर्मी लोगोंके बड़े ऊँचे - ऊँचे मनसूबे सुख - स्वप्नके मनोराज्य होते हैं । उनकी पूर्ति कभी नहीं होती । यदि धर्मनियन्त्रित रामराज्यकी नीतिके अनुसार ईमानदारीसे धार्मिक सामाजिक संगठन हो तो सभी उत्पादनकी असुविधाएँ दूर हो सकती हैं । बेकारी, बेरोजगारी, भुखमरीकी चर्चा स्वप्नमें
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४९ ० मार्क्सवाद और रामराज्य
भी न दीखेगी । रामराज्यमें ऐसा ही था ।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना । नहिं कोउ अबुध न लच्छनहीना ॥
समुचित प्रयत्न बिना कम्यूनिज्मरूपी जादूकी छड़ीसे समस्त समस्याओंका समाधान नहीं हो सकता । जीवनमें रोटी ही सब कुछ नहीं है, धर्म तथा ईमानका भी मानव जीवनमें महत्त्वपूर्ण स्थान है । ईमानदार व्यक्तिको मुनासिब कामके लिये मुनासिब मजदूरीकी बात तो समझमें आ सकती है, लेकिन मजदूरी भी खत्म हो, मजदूरी देनेवाला भी खत्म हो, मजदूरी ही नहीं, मजदूरी देनेवालेकी सारी सम्पत्तिके ही हम मालिक बन जायँ, यह भावना दगाबाज डाकूकी दानवी मनोवृत्ति है, सद्विचार नहीं । एक खूँखार भेड़िया या कुत्ता भी यह नहीं सोचता कि मुझे टुकड़ा देनेवाला खत्म हो जाय, उसकी सारी रोटी मुझे मिल जाय । सब जगह इमारत तोड़कर नयी इमारत ही नहीं बनायी जाती, किंतु बिना तोड़े हुए सुधारका प्रयत्न भी कर्तव्य है । कम्युनिष्टको अपने शरीर, दिल-दिमागमें फितूर है तो इसीलिये सबको खत्म नहीं किया जा सकता, किंतु विविध चिकित्साप्रणालियोंके सहारे उनके सुधारका प्रयत्न ही उचित है । इसी तरह जो व्यवस्था अच्छी है, किंतु उसमें कुछ आगन्तुक दोषोंका संसर्ग लग गया हो, वहाँ उस दोषको ही मिटानेका प्रयत्न किया जाता है । उस व्यवस्थाको ही मिटानेका प्रयत्न तो उस ढंगका है, जैसे सिरमें दर्द होनेपर दर्द दूर करनेका प्रयत्न न कर सिर काट डालनेका प्रयत्न करना । ऐसे तो सभी श्रेणियाँ राज्याधिकार पानेको छटपटा सकती हैं, छटपटाती रहेंगी; पर इसमें सिवा संघर्ष तथा अशान्तिके कुछ लाभ नहीं हो सकता । वस्तुतस्तु अधिकार तथा मोहमें न फँसकर कर्तव्यमार्गपर प्रवृत्त होनेसे अधिकार बिना बुलाये ही पीछे- पीछे दौड़ता है । यहाँ यह स्पष्ट समझना चाहिये कि धर्महीन वस्तुतः शोषक अन्यायी चाहे पूँजीवाद हो, चाहे सर्वहाराके नामसे कुछ कम्युनिष्टोंका अधिनायकत्व हो, रामराज्यवादी दोनोंके ही विरोधी हैं, परंतु इसीलिये किसी व्यक्ति या समूहको मिटा देना कथमपि उचित नहीं है और कोयलेमें कालिमाके तुल्य बुराई या शोषण व्यक्ति या समूहका अनिवार्य
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- माक्सय अर्थ व्यवस्था ४ ९१ स्वाभाविक धर्म नहीं है, तो कोई कारण नहीं कि बुराई या शोषण व्यक्ति या समूहके बिना मिटाये न मिट सकती हो । कोयलेसे तो मनों साबुन खर्च करनेपर भी कालिमा नहीं मिटती, परंतु जिस स्वच्छ वस्त्रमें कोयलेकी कालिमा लगी होती है, वह तो साबुन आदिसे धो लिया जा सकता है । प्राचीन वस्तु सब बुरी, नवीन अच्छी; पुराना समाज निकम्मा, नया अच्छा होगा; यह कोई नियम नहीं । कई बार नयी वस्तु पुरानीसे भी बुरी होती है । रामराज्यके विपरीत नयी व्यवस्था वैसे ही भीषण होगी, जैसे स्वस्थताके विपरीत प्लेग और कालरा । यदि रामराज्यकी कल्पना अन्धविश्वास है, तो सम्पूर्ण संसारमें सर्वहाराके नामपर कम्युनिष्टोंका अधिनायकत्व भी उनका दिमागी फितूर ही है । विश्वभरमें वर्गराज्य या शासनहीन समाजकी कल्पना तथा इच्छानुसार काम करना, इच्छानुसार वस्तु लेना इत्यादि कल्पना तो अन्धविश्वाससे भी अधिक अन्धतम विश्वास है । जैसे रूसोकी सामान्येच्छा, फिक्टेकी आदर्श विश्व सरकार, हीगेलका आदर्श राज्य केवल दिमागी चीज ठहरती है, वैसे ही मार्क्सकी वर्गहीन स्वच्छन्द राज्यकी कल्पना भी दिमागी फितूर ही है । रामराज्यकी दृष्टिमें तो कर्मानुसार फलके सिद्धान्तमें राजमार्ग निर्विवाद है । जब व्यष्टि, समष्टि जगत्, दीनदार, ईमानदार विद्वान् सत्प्रयत्नशील होगा, तब कभी भी सुखसमृद्धिका रामराज्य हो ही सकेगा । पूँजीवाद और कृषि कृषिके सम्बन्धमें मार्क्सवादियोंका कहना है कि उद्योग- धन्धोंमें पूँजीवादी ढंगपर संगठित हो जानेसे पहले भी खेती और खेतीसे सम्बन्ध रखनेवाले कारोबार पशुपालन, फलोंको उत्पन्न करना आदि जारी थे और आजतक वे सब काम कहीं उसी रूपमें और कहीं परिवर्तित रूपमें चले जा रहे हैं । ‘ पूँजीवादका पहला प्रभाव खेतीपर यह पड़ा कि उद्योग- धन्धोंके कारखानेके रूपमें जारी होनेके कारण उनका खेतीसे कोई सम्बन्ध न रह गया । पूँजीवादी व्यवस्थाका आरम्भ होनेसे पहले प्रायः उद्योग- धन्धों और खेतीका काम एक साथ ही होता था । किसान या तो खेतीके काममें बचे
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४९२ मार्क्सवाद और रामराज्य हुए समयसे कपड़ा, जूता और उपयोगके दूसरे सामान तैयार कर लेता था या किसानके परिवारका कोई एक आदमी परिवारभरके लिये इन पदार्थोंको तैयार कर लेता था, परंतु कारखानोंमें यह पदार्थ अधिक सस्ते और अच्छे तैयार हो सकनेके कारण किसानोंका इन पदार्थोंका स्वयं तैयार करना लाभदायक न रहा । उद्योग- धन्धे सिमटकर शहरोंमें चले गये और गाँवोंमें केवल खेतीका ही काम रह गया । ' ' समाजमें पूँजीवादी व्यवस्था आरम्भ हो जानेका प्रभाव खेतीपर भी काफी पड़ा । पूँजीवादने कला- कौशलकी उन्नति कर और मजदूरोंकी माँग पैदा कर खेतीकी पुरानी जागीरदारी व्यवस्थामें काफी परिवर्तन किया । पहले तो इसका प्रभाव यह हुआ कि जागीरोंसे किसान लोग दौड़कर औद्योगिक नगरोंकी ओर आने लगे और जागीरें टूटने लगीं, परंतु जब पूँजीपतियोंके पास पूँजीकी बड़ी मात्रा इकट्ठी हो गयी, तो इसका प्रभाव यह हुआ कि पूँजीपतियोंने जागीरें बनाना शुरू किया । खासकर बड़े - बड़े फार्मोंके रूपमें जागीरें, जिनमें खेती किसानोंकी बड़ी संख्याद्वारा न होकर मशीनोंद्वारा होने लगी । ' ‘ उद्योग - धन्धोंकी पैदावारमें पूँजीवादी व्यवस्थाके आरम्भ हो जानेसे उद्योग - धन्धोंके केन्द्र और खेतीकी जगह गाँवोंकी अवस्थामें बहुत बड़ा अन्तर आ गया । विज्ञानके विकाससे औद्योगिक क्षेत्रमें आये दिन परिवर्तन होता रहता है । मनुष्योंका स्थान मशीनें ले लेती हैं, रफ्तार और चालोंमें उन्नति हो जाती है, परंतु खेतीकी अवस्थापर इन सब बातोंका प्रभाव बहुत कम पड़ता है । समाजकी आवश्यकताको उद्योग- धन्धे और खेती मिलाकर पूरा करते हैं । उनमेंसे एक के बहुत आगे बढ़ जाने और दूसरेके बहुत पीछे रह जानेसे विषमता आ जाना स्वाभाविक हो जाता है । पूँजीवादद्वारा धनके केवल एक छोटी ही श्रेणीके हाथोंमें एकत्र हो जानेका प्रभाव खेती करनेवालोंपर भी बहुत गहरा पड़ता है । कृषिके क्षेत्रमें होनेवाला शोषण न केवल अधिक पुराना है, बल्कि मजदूरकी अपेक्षा
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- माक्सय अर्थ व्यवस्था ४९३ किसानके अधिक असहाय होनेके कारण वह अधिक गहरा भी है । ' ' खेतीद्वारा आवश्यक पदार्थोंकी पैदावार करनेके लिये सबसे पहले जरूरत पड़ती है भूमिकी । पूँजीवादी देशोंमें भूमि कुछ बड़े - बड़े जमीदारोंकी सम्पत्ति होती है । ये जमींदार स्वयं भूमिसे कुछ पैदावार नहीं करते । किसानोंको खेती करनेके लिये भूमि देकर ये उनसे लगान वसूल लेते हैं । खेतीके लिये कुछ परिश्रम न करके ये खेतीके उपजका भाग इसलिये ले सकते हैं; क्योंकि ये लोग भूमिके मालिक समझे जाते हैं । भूमि जागीरदारोंके अधिकारमें प्रायः तीन तरह जाती है । मध्यकालमें जब सामन्तशाही और सरदारशाहीका जोर था, भूमिको राजा लोग दूसरे राजाओंसे जीत करके अपने सरदारोंमें उसे बाँट देते थे । जिस सरदारकी जितनी शक्ति होती थी या जितनी सहायताकी आशा राजा किसी सरदारसे कर सकता था, उतनी ही भूमि उस सरदारको दी जाती थी I। भारतवर्षमें जागीर, जमींदारी और ताल्लुकदारी कुछ तो मुगलों, मराठों और सिखोंके समयसे चली आ रही है । ये वही जमींदार और जागीदार हैं, जिन्होंने अंग्रेजी राज्य आनेपर मौजूदा सरकारकी राजभक्ति स्वीकार कर ली । कुछ जागीरदारियाँ अंग्रेजी सरकारने भूमिका कर किसानोंसे सुविधापूर्वक वसूल करनेके लिये कायम कर दीं । सरकारने कुछ लोगोंको भूमिके बड़े - बड़े भाग मालगुजारीकी एक निश्चित रकमपर सौंप दिये और उन्हें किसानोंसे लगान वसूल करनेका अधिकार दे दिया । सरकारकी शक्तिके बलपर ये लोग किसानोंसे लगान वसूल करते हैं और मालगुजारी बीचका अन्तर इन लोगोंकी आमदनी बन जाती है । ' वस्तुतः भूमि या कृषिवाणिज्य आदि ही कौटल्यकी दृष्टिसे मुख्य अर्थ है । मनुष्याणां वृत्तिरर्थः । मनुष्यवती भूमिरित्यर्थः । ( कौटली० अर्थ० १५ । १ । १-२ ) मनुष्योंकी जीविका कृषिवाणिज्य आदि अर्थ है । मनुष्योंसे युक्त
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४ ९४ मार्क्सवाद और रामराज्य भूमिका भी नाम अर्थ है । इसीमें विविध उद्योग- धन्धा भी आ जाता है । यह सही है कि उद्योग- धन्धों, कल -कारखानोंका अधिक विकास होनेसे खेतीका काम पिछड़ गया, परंतु यह सभी समझते हैं कि पेट भरनेके लिये अन्न परमावश्यक है, जो खेतोंके बिना नहीं मिल सकता । जूट और कपासके लिये भी खेती आवश्यक है, कितने कल-कारखाने खेती बिना नहीं चल सकते । चावल निकालने, तेल बनाने, कपड़ा, बोरे तथा चीनी बनानेवाले बड़े - बड़े कारखाने भी खेती बिना चौपट हो सकते हैं । अब गन्ना, तेलहन, जूट, कपास आदिके लिये भी खेत आवश्यक है । सिंचाईके लिये बहुत प्राचीन कालसे तालाब, कुँआ बनवाने, नहर बनवानेकी प्रथा चालू है । अन्यान्य यन्त्रोंके विकासके साथ खेत जोतनेके लिये तथा कुँओंसे पानी निकालने और नये ढंगके नलकूपोंकी व्यवस्था सर्वत्र चल रही है । अमेरिका, जापान, इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी आदि देशोंमें खेतीको उपजाऊ बनानेके लिये नयी-नयी खाद और नये-नये दूसरे आविष्कार भी हो रहे हैं । वैज्ञानिक ढंगसे खेतोंको गरमी या ठण्ड पहुँचाने, अच्छे ढंगका पौधा तथा विभिन्न फलोंको बढ़ानेमें मीठा या स्वादिष्ट बनानेकी भारतीय प्राचीन शास्त्रोंमें भी बहुत चर्चा है । यह अवश्य है कि अभीतक यह व्यवस्था ग्राम-ग्राममें व्यापक नहीं हो सकी है, परंतु कल-कारखाने भी तो गाँव-गाँव नहीं पहुँच पाये हैं । मकान बनाने, खेती करने, बोझ ढोने आदिका लाखों काम मजदूर भी अभीतक पुराने ढंगसे ही करते हैं । किसी भी देशमें अभीतक सर्वत्र समानता नहीं है । यह दूसरी बात है कि नमूनेके तौरपर कुछ फर्म, कुछ ग्राम सब देशोंने बना रखे हैं । बाहरसे आनेवालोंको वही दिखाया जाता है, जैसे श्रीबुल्गानिन आदि सभी नेताओंको भारतमें नमूनेके ग्राम, नमूनेके फर्म तथा उद्योग- धन्धे दिखलाये गये, नमूनेकी खुशहाली दिखायी गयी । ठीक वैसे ही रूस आदिमें भी नमूनेके ग्राम, नमूनेकी सुव्यवस्थाएँ ही अधिक दिखायी जाती हैं । पूँजीवादी ढंगसे कल- कारखानोंकी कम्युनिष्ट भरपेट
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- माक्सय अर्थ व्यवस्था ४९५ निन्दा करते हैं, परंतु उनका बहिष्कार नहीं करना चाहते । वे ही चीजें गैर कम्युनिष्टोंके हाथोंमें रहती हैं तो दूषण समझी जाती हैं, कम्युनिष्टोंके हाथ पहुँचते ही वे निर्दोष हो जाती हैं । रामराज्यवादी तो महायन्त्रोंके निर्माणपर प्रतिबन्ध ही उचित समझता है, अन्यथा उसकी सीमा तो होनी ही चाहिये । आखिर पूँजीवादी कल- कारखानोंमें कम्युनिष्ट जो-जो दोष दिखाते हैं, वह सब कम्युनिष्टोंके हाथ आनेसे कैसे दूर हो जायँगे? कल-कारखानोंका बढ़ना, मशीनोंके रफ्तारका बढ़ना, मजदूरोंकी माँग- वृद्धि, ग्रामीणोंका शहरोंकी ओर दौड़ना आदि तो कम्युनिष्टोंके कल-कारखानोंसे भी होगा ही । इसी तरह बड़े- बड़े फर्मोंका विस्तार कम्युनिष्ट राज्योंमें भी हो ही रहा है । वस्तुतः यह तो मार्क्सवादी भी मानता है कि कल-कारखानोंका विकास पूँजीवादकी सर्वोत्तम देन है और कम्युनिष्ट उसे और भी बढ़ाना चाहता है । क्या जिससे इतना बड़ा लाभ हुआ, इतनी बड़ी प्रगति हुई, उसे समाप्त कर देना मानवता है? क्या इस विषयमें—
जेहि ते नीच बड़ाई पावा । सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा ॥
—की उक्ति नहीं चरितार्थ होती? किसीके द्वारा सम्पादित अभ्युदयको हड़प लेना और उसे समाप्त कर देना एक खूँखार डाकूका ही काम है । रहा यह कि धन थोड़ेसे लोगोंके हाथमें आ जाता है, तो इसका समाधान रामराज्यप्रणालीमें सर्वोत्तम है । आयका पंचधा विभाजन करने, उद्योगधन्धोंका विकेन्द्रीकरण करने तथा बहुत बड़े - बड़े उद्योगधन्धोंके स्थानमें छोटे - छोटे उद्योगोंके प्रचलित करनेसे आर्थिक असन्तुलन दूर हो सकता है, यह पीछे कहा जा चुका है । वस्तुतः अधिनायकत्ववादी, कम्युनिष्टोंकी किसानोंके प्रति कोई सहानुभूति नहीं है । जिनके हाथमें उत्पादनके साधन हों, उन्हें यह पूँजीवादी ही कहते हैं । बहुसंख्यक किसानोंको भी अनुदीयमान कहकर उदीयमान अल्पसंख्यक मजदूरोंका ही ये अधिनायकत्व चाहते हैं । अर्थात् मजदूरोंके नामपर अपना आधिपत्य
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४ ९ ६ मार्क्सवाद और रामराज्य चाहते हैं, परंतु किसानोंकी तथा मध्य श्रेणीकी बृहत् संख्या और जनमत-विरोध देखकर ये मार्क्सय मतको छोड़कर किसान और मध्यश्रेणीके नामपर भी आँसू गिराने लगे हैं, किंतु सर्वहाराका अधिनायकत्व सिद्धान्त छोड़नेको अब भी प्रस्तुत नहीं हैं । फिर भी किसान तथा मध्यश्रेणीके लोग अपनी सभ्यता, संस्कृति तथा धार्मिक भावनाओं एवं व्यक्तिगत स्वाधीनताके विरुद्ध समझकर कम्युनिज्मसे घृणा ही करते हैं । वे भूमिपति या राजाको षष्ठांश या दशांश देना अनुचित नहीं समझते । भारत ऋषि, महर्षि कन्द- मूल-फलादिका भी कुछ अंश राजाको देना उचित समझते थे । व्यक्तिगत वैध भूमि किसीकी भूमिपर यज्ञ या पितृश्राद्ध करनेपर भी भूमिपतिको कुछ देना आवश्यक समझा जाता है, अन्यथा भूमिपति उनके फलमें हिस्सेदार होगा । जिन्हें जड़ भौतिक प्रपंचोंसे पृथक् धर्म, परलोक अदृष्टपर भी विश्वास है, वे तो धर्मबुद्धिसे ही कर देना उचित समझते हैं । उसे वे शोषण नहीं समझते । जमींदारी, जागीरदारीके सम्बन्धमें कम्युनिष्ट आदिकी धारणाएँ सर्वथा मिथ्या हैं । राजतन्त्रके अनुसार राजाका ज्येष्ठ पुत्र राजा होता था, शेष पुत्रोंको गुजारेके रूपमें जागीरें मिलती थीं । इस क्रममें बहुत - सी जमींदारियाँ बनीं, संग्राम जीतनेसे पुरस्कारके रूपमें, कुछ मन्दिरों, आचार्यों, विद्वानोंको दानके रूपमें जागीरें मिलीं । बहुतोंने गाढ़े पसीनेकी कमाईसे खरीदकर जमींदारियाँ बनायी हैं । यह सब भूमि भारतीय शास्त्रोंके अनुसार वैध हैं । बहुत-से कर देनेवाले राजा भी जमींदार, ताल्लुकेदार हो गये । शुक्रनीतिका मत है कि ' वैध ' स्वामित्व, दातृत्व और धनिकत्व तपस्याका ही फल है । पर--पीड़न एवं शोषणसे होनेवाली धनिकता आदि तो नवीन पाप है, वह तपका फल नहीं । अर्थिता, दासता, दरिद्रता आदि पापका फल है । गुरुजनोंके प्रति दासता और त्यागमूलक दरिद्रता पापका