मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 541–550

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 541–550

पृष्ठ 541

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- माक्सय अर्थ व्यवस्था ५३९ कह सकते हैं कि परवित्तापहरणको अपराध मानना पुराने जमानेकी बात थी, आज यह अपराध नहीं है । फिर भी न्याय एवं धर्मयुक्त मार्गसे बेकारी एवं आर्थिक असन्तुलन दूर करनेका प्रश्न सबके सामने अनिवार्यरूपसे है ही । रामराज्यवादी उसे सहर्ष स्वीकार करता है । सहायता प्राप्त करके कर्तव्यपालन, बहिर्मुखोंका वित्तापहरण करके अतिरिक्त आयका पंचधा विभाजन, दानका प्रोत्साहन, ज्योतिष्टोम, सर्वस्वदक्षिणा आदि यागों तथा आतिथ्य सत्कारका प्रचार एवं नियम बनाकर तथा वेतनकी उचित दर एवं कामके घण्टोंका उचित निर्धारण एवं मुनाफेकी भी उचित सीमा निर्धारण करना आदि कार्य उचित कहे जा सकते हैं । साम्यवादी सरकारोंको भी सरकारी काम तथा शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा, गुप्तचर, पुलिस, पलटन आदिका काम चलानेके लिये कर या मुनाफाका आश्रय लेना ही पड़ेगा । सब लोग जितना कमायें उतना खा-उड़ा जायँ तो उपर्युक्त काम कैसे चलेगा? एक व्यक्तिकी स्वतन्त्रताकी सीमा वहींतक है, जहाँतक कि दूसरोंकी स्वतन्त्रतामें बाधा न पड़े । यह सभी सभ्य शासन मानते हैं, यह मार्क्सकी कोई नयी बात नहीं है, परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि परस्परका सेव्य - सेवकभाव या उपकार्य-उपकारकभाव समाप्त हो जाय । सभी सैनिक यदि निजी स्वतन्त्रताकी बराबरीका दावा करें तो सेनापतिकी आज्ञा ठुकरा सकते हैं, फिर तो सैनिक संगठनका उद्देश्य ही समाप्त हो जाय । समाजवादी किसी अन्यके चक्रवर्तित्वकी तो समालोचना करते हैं, पंरतु मजदूर तानाशाही सम्पूर्ण विश्वपर कायम करनेके लिये आकाश-पातालका कुलाबा भिड़ा रहे हैं । आखिर सोवियतसंघके सभी राष्ट्र मास्कोके कुछ तानाशाहोंके इच्छानुसार ही चल रहे हैं, विश्व कम्युनिष्ट संघ आखिर सम्पूर्ण संसारमें कम्युनिष्ट शासन-स्थापनका प्रयत्न करता ही है । फिर राम-जैसे जितेन्द्रिय, सदाचारी, धर्म-नियन्त्रित, चक्रवर्तीके निष्पक्ष शासनमें सम्पूर्ण विश्वमें शान्ति हो, छीना-झपटी बन्द हो, सब सुखी हों तो क्या आश्चर्य है? अपने विश्वासके

पृष्ठ 542

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५४० मार्क्सवाद और रामराज्य अनुसार सब अपना धर्म पालन करें, अपनी शक्ति एवं बुद्धिके अनुसार अर्थोपार्जन करें, अपनी कमाई अपने इच्छानुसार अपनी संतानोंको दे सकें, दान- पुण्य कर सकें, लोक-परलोक बना सकें, कोई किसीके धर्म एवं सम्पत्तिपर हमला न करे, सभी उन्नत सभी सुखी हों - यही तो रामराज्य है । मार्क्सवादी कहते हैं कि ' दिखायी पड़नेवाले व्यक्तियोंमें सम्पत्ति एवं योग्यताकी असमानता मौजूद है । अध्यात्मवादी इस असमानताका दूर होना असम्भव मानते हैं, परंतु मार्क्सवादी इस असमानताको दूर कर सकनेका दावा करते हैं । असमानता दूर होनेकी ही अवस्थाका नाम कम्युनिज्म या समष्टिवाद है । इसमें यथासम्भव असमानता दूर कर देनेके बाद संघटनका सिद्धान्त होगा, प्रत्येक मनुष्य अपनी सामर्थ्यभर परिश्रम करेंगे और प्रत्येक मनुष्यको अपनी आवश्यकताके अनुसार पदार्थ मिलेगा । एतदर्थ योग्यता एवं शिक्षाकी असमानता दूर होनी आवश्यक है । ' मार्क्सवादी जन्मान्तरीय कर्मोंकी विचित्रतासे असमानता नहीं मानते । वे परिस्थितियोंको ही इसका मुख्य कारण मानते हैं । सबको शिक्षा, मस्तिष्क एवं स्वास्थ्यकी उन्नतिका समान अवसर देकर दिखायी देनेवाली असमानता दूर की जा सकती है । जन्मसे ही अल्पबुद्धि एवं दुर्बल, गरीबोंकी ही संतान होती है । अमीरोंकी संतानें अधिक स्वस्थ एवं बुद्धिमान् होती हैं । मार्क्सवादके अनुसार सबको समान अवसर मिलनेसे नयी पीढ़ीके लोगोंमें असमानता बहुत कुछ कम हो जायगी । कुछ पीढ़ीतक समान परिस्थितियोंमें मनुष्यका जन्म होनेसे प्रायः सब एक- से ही बलवान्, बुद्धिमान् होंगे । यदि पशुकी नस्लमें उन्नति की जा सकती है तो मनुष्यका सुधार क्यों नहीं होगा? भले ही कुछ लूले- लँगड़े, अन्धे भी हों, फिर भी नियम तो जन-साधारणकी दृष्टिसे ही बनते हैं । वस्तुतः यह तर्क बहुत ही निःसार है । ' अमीरोंके लड़के बुद्धिमान्, बलवान् होते हैं ', यह नहीं कहा जा सकता; क्योंकि प्रायः देखा जाता

पृष्ठ 543

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- माक्सय अर्थ व्यवस्था ५४१ है कि अमीरोंके लड़के अधिक निर्बुद्धि एवं निर्बल होते हैं । व्यवहारमें धनवानोंको ही लक्ष्मीका वाहन अर्थात् उलूक कहा जाता है । अधिकांश धनवान् विलासी होते हैं । निर्वीर्य होनेसे पहले तो उन्हें संतान ही कम होती है, जिससे इनमें दत्तकोंकी भरमार चलती है । संतानें उत्पन्न भी होती हैं तो निर्बल एवं निर्बुद्धि । हम पहले कह चुके हैं कि व्यापारकी दक्षता, शोषणके हथकण्डे, जाल फरेबकी सब बातें राजाओं, जमींदारोंके दीवान या कारिन्दे तथा सेठोंके मैनेजर- गुमास्ता लोग ही करते थे या करते हैं । आज भी ऐसे - ऐसे धनवान् हैं कि केवल धनके कारण ही उनका सम्मान किया जाता है । यदि उनको धन न होता तो कौड़ी कीमतका भी उन्हें कोई न पूछता । हाँ, जहाँ सावधानीसे प्रयत्न किया जाता है, वहाँ धनवान्, बलवान्, बुद्धिमान् एवं धर्मनिष्ठ भी होते हैं । शास्त्रोंमें इसे पूर्वजन्मकी तपस्याओं एवं योगाभ्यासका फल बताया है -'शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते । ' ( गीता ६ । ४१ ) योगभ्रष्ट अर्थात् योगकी पूर्ण सिद्धि–मुक्ति पानेके पहले मरनेवाले लोगोंका पवित्र श्रीमानोंके घरमें जन्म होता है । हरिश्चन्द्र, दिलीप, मान्धाता, अज, दशरथ, युधिष्ठिर, अर्जुन आदि इसके उदाहरण हैं । प्रायः लक्ष्मी-सरस्वतीका विरोध ही समझा जाता है । किसी ही पुण्यशालीके यहाँ लक्ष्मी- सरस्वतीका सहवास होता है, परंतु इससे भी उच्च पक्ष महातपस्या, महासौभाग्यसे अरण्यवासी विरक्तों, निष्किंचनों, उंछशिलवृत्तिवालोंके यहाँ जन्म होना माना गया है; क्योंकि वहाँ बुद्धि- विवेककी बहुत ही प्रधानता रहती है— अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।.... तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । (गीता ६ । ४२, ४३) भारतके जितने भी विशिष्ट विद्या, ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, शिल्प, साहित्य तथा नीति आदि सम्बन्धी ग्रन्थ हैं, सबके रचयिता अरण्यवासी

पृष्ठ 544

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५४२ मार्क्सवाद और रामराज्य कन्द- मूल- फलाशी वल्कलवसनधारी निष्किंचन लोग ही हुए हैं । वेदान्त, सांख्य, न्याय, मीमांसा, वैशेषिक, योग, भारत, रामायण, योगवासिष्ठ तथा शुक्र, बृहस्पति, कणिक, कौटिल्य, कामन्दक आदि नीतिग्रन्थ हैं, सबके निर्माता अकिंचन लोग ही हैं, धनवान् या पूँजीपति नहीं । शंकराचार्य, उदयनाचार्य, भट्टपाद, श्रीहर्ष, वाचस्पति मिश्र, रामानुजाचार्य, तुलसीदास, सूरदास आदि कोई भी धनवान् आदमी नहीं थे । आजके भी विभिन्न देशोंके विभिन्न नेता उन्हीं वर्गोंमें हैं तथा यहाँतक कि मार्क्स भी अमीर नहीं था । सभी अकिंचन सरस्वतीके उपासक विद्वान् ही मान्य हैं । लक्ष्मीके उपासक सदा ही उनका अनुगमन करते थे । मान्धाता, हरिश्चन्द्र, रामचन्द्र आदि भी वसिष्ठ आदि ऋषियोंके ही नियन्त्रणमें रहते थे । अतएव यहाँ उच्च शास्त्र - ज्ञानवाला निर्धन ब्राह्मण ही सर्वोत्कृष्ट माना गया है । फिर यह भी तो देखते हैं कि एक ही अमीरके चार पुत्रोंको समान अवसर मिलनेपर भी कोई बहुत चतुर निकलता है, कोई भोंदू निकलता है । जगत्की विचित्रताका आधार कर्मको मानना ही पड़ेगा । जहाँ इस जन्मके कर्म- वैचित्र्यसे उपपत्ति न हो, वहाँ जन्मान्तर- कर्मका वैचित्र्य मानना अनिवार्य है । उष्ट्र, गर्दभ, मनुष्यादिके वैचित्र्यका भी क्या कारण है? इस प्रश्नका जन्मान्तरीय कर्मके सिवा अन्य कोई समाधान नहीं है । जो इन विचित्रताओंका कारण स्वभावको कहते हैं, उनसे प्रश्न होगा, स्वभाव क्या है? —सत् या असत्? असत् कहें तो उसमें कार्य- क्षमता नहीं हो सकती, सत् है तो भी वह चेतन है या अचेतन? अचेतनमें भी विवेकाभावात् विचित्र कार्यकरत्व नहीं हो सकता । चेतन कहें तो भी अल्पज्ञ या सर्वज्ञ? अल्पज्ञमें भी विविध वैचित्र्योपेत विश्वका व्यवस्थापकत्व नहीं बन सकता । सर्वज्ञ कहें तो प्रश्न होगा कि वह सापेक्ष विचित्र सृष्टि करता है या निरपेक्ष? निरपेक्ष कहें तो उसमें वैषम्य, नैर्घृण्य दोष आयेगा । सापेक्ष कहें तो वही कर्म सापेक्षता माननी पड़ेगी । सदा ही अध्यापकों, इंजीनियरों, डॉक्टरों, जजों, प्रधानमन्त्रियोंके स्थान थोड़े ही रहेंगे । मजदूरों,

पृष्ठ 545

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- माक्सय अर्थ व्यवस्था ५४३ छात्रों, न्यायार्थियों तथा गरीबलोगोंकी संख्या ही अधिक रहेगी । अतः चीटींको कनभर और हाथीको मनभरका सिद्धान्त बिना माने काम चलना सर्वथा ही असम्भव होगा । फिर भी समता या विषमता असन्तुलित न रहना आवश्यक है । अति विषमता, अति समता दोनों ही अव्यवहार्य हैं । जैसे अंगमें भी सब बराबर नहीं होते, हाथकी अंगुलियाँ भी सब एक-सी नहीं होती हैं । फिर भी उनकी समता- विषमता सन्तुलित रहती है । यही स्थिति समाजकी भी उचित है । यदि कम्युनिष्ट काल्पनिक समताके आधारपर सिद्धान्त बनाना चाहते हैं तो अध्यात्मवादीके यहाँ आत्मा ही वास्तविक समानता स्वतन्त्रता भ्रातृताकी आधारभित्ति है । इतना ही नहीं, अध्यात्मवादी ही ऐसी भी अवस्थाका आना अनिवार्य मानते हैं, जब सभी परमानन्द ब्रह्मस्वरूप ही होंगे, विषमताकी गन्ध भी कहीं उपलब्ध नहीं होगी, परंतु व्यवस्था तो करनी है वर्तमान स्थितिकी, अतः हम कल्पनाओंको छोड़कर उपस्थित अवस्थामें क्या हो सकता है, यही विचार करना उचित समझते हैं । वैधानिक साधनों एवं धार्मिक, आध्यात्मिक साधनोंसे समष्टि जगत्‌को उच्च-से-उच्च स्तरपर पहुँचाना रामराज्यका आदर्श है । ' राम भगति रत नर अरु नारी । सकल परम गति के अधिकारी ॥ ' ‘ हृष्टः पुष्टः प्रमुदितः ' ' नाकुण्डली नास्स्रग्वी । ' इत्यादि

श्लोकोंमें कहा गया है कि ' रामराज्यमें सभी हृष्ट - पुष्ट, प्रमुदित रहते

थे । सभीके गृहोंमें हीरकादिजटित स्वर्णमय कपाट लगे रहते थे । ' फिर

भी वास्तविकता यह है कि पदार्थोंकी उत्पत्तिकी कुछ सीमाएँ हैं । यदि सभी स्वतन्त्र हवाईजहाज, सभी हम्बर, रॉल्स, ब्यूक मोटर चाहें, सब-के - सब उच्चस्तरीय साधन चाहेंगे तो उसकी पूर्ति तो हजारों नहीं लाखों वर्षतक हो सकना सम्भव नहीं । गली- गलीमें बिजलीका फैल जाना या मिलोंके द्वारा कपड़ा जितना सरल है, उतना भारतके करोड़ों- करोड़ आदमियोंको एक-एक वायुयान, एक-एक ब्यूक मिलना सरल नहीं । इसी तरह केसर, कस्तूरी, हीरा आदिका मिलना भी सम्भव नहीं है । जब

पृष्ठ 546

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५४४ मार्क्सवाद और रामराज्य सभी लोग सब चीज बना नहीं सकते तो विनिमयद्वारा वस्त्वन्तर प्राप्त करनेकी आवश्यकता रहेगी ही । फिर वस्तुओंकी विनिमय सुविधाके लिये रुपया या मुद्राका व्यवहार आवश्यक होगा । स्थानान्तरसे वस्तु स्थानान्तरमें पहुँचाना आवश्यक होगा । इसपर कुछ व्यय एवं श्रम भी होगा । व्यक्ति या सरकार जो भी यह कार्य करेगा, कुछ -न-कुछ लाभ अवश्य चाहेगा । हाँ, यह ठीक है कि मुनाफा सीमित हो, अव्यवस्था फैलानेवाला न हो । आजके विस्तृत यातायात सम्बन्धोंका यह भी एक महान् लाभ है कि संसारके किसी कोनेमें कोई वस्तु क्यों न उत्पन्न हो और कहीं भी किसी वस्तुकी कमी क्यों न हो, फिर भी देशान्तरकी वस्तु देशान्तरमें पहुँचनेमें कोई कठिनता नहीं । अतिवृष्टि, अनावृष्टिसे कहीं भी भुखमरी नहीं हो सकती । परंतु यदि क्रय -विक्रयका व्यवहार मिट जायगा तो यह सब सम्भव न होगा । अनेक रोजगारोंके समान ही क्रय- विक्रय भी एक धन्धा है । लाभ बिना उसे कौन अपनायेगा? हाँ, लाभ सीमित हो, उसपर नियन्त्रण हो, यह तो आवश्यक ही है । भुखमरी मिटाना अमीर, गरीब सबके ही अभ्युदयका प्रयत्न करना अपेक्षित वस्तुओंका उत्पादन बढ़ाना अत्यावश्यक है ही । समाजवादी कहते हैं कि ' रूसमें रोटीकी कमी नहीं है । सम्भव है कुछ ही दिनोंमें वहाँ रोटी सबको मुफ्त मिलने लगे, जैसे होटलोंमें पानी मुफ्त मिलता है । ' परंतु रामराज्यका तो आदर्श यह था कि किसी भी जगह पानी माँगनेपर दूध ही पिलाया जाता था । देनेवाले सदा ही देनेकी कोशिश करते थे, परंतु लेनेवाले अपनी गाढ़ी कमाईका ही खाना पसन्द करते थे । प्रतिग्रहसे हर तरहसे बचनेका प्रयत्न करते थे । रूसी तो फिर भी यह कहते रहेंगे कि जो काम न करे, उसको खाना मिलना ही न चाहिये । फिर जहाँ लोगोंकी व्यक्तिगत सम्पत्ति ही न रहेगी, वहाँ काम लेकर रोटी देनेका प्रसंग ही क्या है? रामराज्यमें वृद्ध, बालक, काम न कर सकनेवालोंको भी भोजनादिकी सुविधा रहेगी । जिस व्यक्तिगत

पृष्ठ 547

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- माक्सय अर्थ व्यवस्था ५४५ सम्पत्तिमें सबकी कमाई नहीं सम्मिलित है, उसके द्वारा लोगोंको मुफ्त रोटी देनेकी विशेषता ही मुख्य विशेषता है । साम्यवादी व्यवस्थामें तो सबकी कमाई सम्मिलित ही रहती है । रामराज्यकी सभ्यता ही थी कि रोटी एवं दूध आदिका कोई गृहस्थ विक्रय करना पाप समझता था । क्षीर- विक्रय, रस - विक्रय तो स्पष्ट निषिद्ध है । रामराज्यमें आवश्यक उपयोगी पदार्थ सबको सरलतासे सुलभ करना ध्येय ही है । समाजवादी कहते हैं कि गैरसमाजवादी देश व्यापारमें होड़ करते हैं । दूसरे देशोंके बाजारोंपर कब्जा करना चाहते हैं, जिससे सबको युद्धके लिये तैयार रहना पड़ता है । पूँजीवादी शासन- प्रणाली रहते - रहते यदि कोई देश नि: शस्त्र हो जाय तो खूँखार पूँजीवाद देश उसे झपट लेते हैं । युद्धकी तैयारीमें लगे रहनेसे पैदावारमें बाधा पड़ती ही है । प्रायः सभी देशोंकी आमदनीका बहुत बड़ा भाग शस्त्रास्त्र एवं फौजोंपर खर्च हो जाता है । धनके इस भागका फल मिलता है भय, कष्ट एवं अकालमृत्यु । यह सब धन मनुष्योंकी हालत सुधारनेमें लगानेसे बहुत लाभ हो सकता है । लाखों बलवान् जवान युद्धकी तैयारीमें फँसे रहते हैं, पैदावारका काम नहीं कर सकते । इनका सम्पूर्ण समय मरना, मारना, सीखने -सिखानेमें ही खर्च होता है । यदि मुनाफा कमानेकी भावना छोड़कर उपयोगके लिये ही माल तैयार किया जाय तो अन्ताराष्ट्रिय पूँजीवादी होड़ समाप्त हो जायगी । फिर न दूसरे देशोंके बाजारोंकी जरूरत रहेगी और न युद्ध आवश्यक होगा । आधुनिक पूँजीवादी या समाजवादी सभी शासन धर्महीन होनेका ही महत्त्व समझते हैं । इसीलिये व्यक्तिगत स्वार्थकी इतनी प्रधानता हो गयी है कि एक- दूसरेकी हत्या उनकी दृष्टिमें साधारण-सी बात होती है । धर्मनियन्त्रित रामराज्यमें युद्धकी अपेक्षा शान्तिका ही सर्वातिशायी महत्त्व होता है । साम, दाम, भेद तीनों नीतियोंसे ही सब काम चलाना श्रेष्ठ है, परंतु सर्वथा तीनों नीतिके विफल होने एवं अनिवार्य होनेपर ही चतुर्थ दण्ड- नीतिका प्रयोग करना उचित बतलाया गया है । अहिंसा 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_18_1_Front

पृष्ठ 548

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५४६ मार्क्सवाद और रामराज्य एवं सत्यसे सम्पूर्ण व्यवहार चलाया जाय, विरोधियोंका भी भाव ही बदलनेका प्रयत्न उचित है, परंतु फिर भी तो आखिर समाजवादी रूसको भी तो द्वितीय महायुद्धमें कूदना पड़ा ही और लालसेनाके करोड़ों सैनिकोंको भरती करना ही पड़ा । परमाणु बम, हाइड्रोजन बम आदि घातक अस्त्र- शस्त्रोंपर अरबों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं । आखिर जो युद्ध अनुचित समझता है, उसकी इस प्रकारकी चेष्टा क्यों? जैसे समाजवादी कहते हैं कि ' जब विश्वभरमें कम्युनिष्ट राज्य कायम हो जायगा, तब कोई खतरा न रहेगा, तब युद्ध - तैयारी बन्द की जा सकेगी । उसके पहले तैयारी न रखनेसे तो पूँजीवादी राष्ट्र रूसको हड़प लेंगे । ' किंतु यह तो कोई भी कह सकता कि ' जब विश्वभरमें एक चक्रवर्ती सरकार बन जायगी, तब युद्ध आवश्यक न रहेगा ' परंतु प्रश्न तो यह है कि जबतक दोनोंके मनोरथ नहीं पूरे होते, तबतक क्या होना चाहिये? वस्तुतः इस समय क्या पूँजीवादी, क्या समाजवादी अपना- अपना गुट बलवान् बनानेमें लगे हैं । इस समय उपनिवेशवाद समाप्त हो रहा है; परंतु अपने-अपने प्रभाव- क्षेत्रके विस्तारमें सब लगे हैं । अमेरिका अपना प्रभाव- क्षेत्र बढ़ा रहा है, रूस अपना । इसके लिये ही शस्त्रास्त्रकी तैयारी एवं कूटनीतिक दाँव- पेंच दोनों ओरसे चले जा रहे हैं; परंतु रामराज्यवादी इस सम्बन्धमें व्यापक दृष्टिकोणसे विचार करते हैं । अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदिके नियम विश्वव्यापी एवं विश्वके हितार्थ हैं । प्रत्येक व्यक्तिको समाज, राष्ट्र एवं विश्वके हानिकारक किसी काममें नहीं प्रवृत्त होना चाहिये । समष्टिके अविरोधेन ही व्यष्टिकी चेष्टा आदरणीय है । अहिंसा आदि समष्टि सामाजिक समझौतेका आदर सबको करना चाहिये । मार्क्सवाद एवं राष्ट्र परंतु जबतक सभी राष्ट्र एवं समाज इस उच्चकोटिके सिद्धान्तको मान नहीं लेते, तबतक क्या किसी सज्जन व्यक्ति या राष्ट्रको किसी 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_18_1_Back

पृष्ठ 549

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- माक्सय अर्थ व्यवस्था ५४७ कूटनीतिक व्यक्ति या राष्ट्रकी कूटनीतिका शिकार बन जाना चाहिये? रामराज्यवादी ऐसे अवसरके लिये अनिवार्यरूपसे आनेवाले युद्धका स्वागत करता है । मायावीके साथ निरी साधुतासे काम नहीं चलता- यस्मिन् यथा वर्तते यो मनुष्यस्तस्मिंस्तथा वर्तितव्यं स धर्मः । मायाचारो मायया बाधितव्यः साध्वाचारः साधुना प्रत्युपेयः ॥ (महा० शां० प० १० ९ । ३० ) संसारमें जब कृतयुगके प्रारम्भमें सत्त्वगुणका पूर्ण प्रभाव था, सभी धर्म - नियन्त्रित थे, तब युद्धकी आवश्यकता नहीं थी, परंतु संसार त्रिगुणात्मक है, इसमें रज और तम भी हैं ही । फिर कभी उनका भी उद्भव सम्भव है । जब अत्यन्त तामस, राजस आदमीपर उपदेशका असर नहीं पड़ता, तब वहाँ दण्डविधान अनिवार्य ही होता है । तभी तो प्रत्येक राष्ट्रमें कानून, दण्डविधान, पुलिस, थाना, जेल आदिकी व्यवस्था है । ये ही व्यष्टिके उपद्रव समष्टिमें भी फैलते हैं । तब बड़े युद्धोंका रूप बन जाता है । समाजवादियोंको ही अपने विरोधियोंके दमनार्थ क्या- क्या नहीं करना पड़ता है । कितने गुप्तचर, कितनी पुलिस, पर्ज ( सफाया ) -में संलग्न है । रामराज्यमें अन्यायी रावणको भी पहले अन्यायसे विरक्त होनेके लिये समझाया-बुझाया गया था । जब अनेक प्रकारसे समझाने- बुझानेपर भी रावण रास्तेपर नहीं आया, तब उसे दण्ड देना अनिवार्य हो गया । यही रामराज्यका युद्ध है । ऐसा युद्ध साक्षात् स्वर्गका निरावरणद्वार है, इससे पराङ्मुखकी अकीर्ति तथा पुण्यलोकोंका नाश ध्रुव है- अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ (गीता २।३३ ) समष्टि -हितके लिये महायन्त्रका प्रवर्तन बन्द होना चाहिये । रामराज्यशासनमें उत्पादनमें मुनाफाको प्राथमिकता न देकर राष्ट्रकी आवश्यकताको प्राथमिकता दी जायगी । सरकारद्वारा निर्धारित राष्ट्रहितानुकूल 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_18_2_Front

पृष्ठ 550

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५४८ मार्क्सवाद और रामराज्य योजनाका अनुसरण करना सभी उद्योगपतियोंका कर्तव्य होगा । अतः आधुनिक जडवादियोंके समान बाजारों, यन्त्रों, पेट्रोल आदिके लिये रामराज्यमें युद्ध नहीं होंगे । धर्म, संस्कृति तथा गरीबोंके हित-स्वत्वोंकी रक्षाके लिये अनिवार्य होनेसे युद्धका स्वागत किया जायगा । संसारमें आर्तनाद न हो, अन्याय - अत्याचार न हो, किसीकी बहू- बेटियोंके सम्मानपर आँच न आये, इसीलिये बलवानोंका बल एवं अस्त्र- शस्त्र आदि अपेक्षित होते हैं और अपेक्षित होते रहेंगे । मार्क्सवादी कहते हैं, ' आज मजदूरोंके लिये देशभक्तिकी बात व्यर्थ है । जब कोई पूँजी देशमें लगती थी, तब कुछ मजदूरोंको लाभक सम्भावना भी थी, परंतु जब पूँजीपति अपनी पूँजीको उन विदेशोंमें लगाना पसन्द करते हैं, जहाँ मजदूरी कम देनी पड़े और कच्चे माल सस्ते पड़ें, तब ऐसे पूँजीपतियोंके देशके मजदूर देशभक्तिके नामपर अपनी जान क्यों दें? ' मार्क्सवादीकी दृष्टिमें ' जिसकी कोई सम्पत्ति नहीं, उसका कोई खास देश नहीं होता । केवल दो हाथ ही उसकी अपनी सम्पत्ति है । जहाँ मजदूरी मिल जाय, वही उसका देश है । पूँजीपति भी अपने लाभके लिये लाखों किसानों- मजदूरोंको तोपकी आगमें झुलसा डालते हैं । इनकी जीतोंमें मजदूरोंका कोई लाभ नहीं होता । ' उपर्युक्त बातें किसी देश- कालके लिये सही हो सकती हैं; परंतु यह व्यापक सत्य नहीं है । आस्तिक लोग जननी, जन्मभूमिको स्वर्गसे भी श्रेष्ठ मानते हैं -' जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी । ' उंछशिल वृत्तिवाले अकिंचन महर्षि -जिनकी भौतिक सम्पत्ति कुछ नहीं - उन्हें भी मातृभूमिकी भक्ति मान्य होती है । देशधर्मकी रक्षा और कल्याणके लिये वे भी अपने सर्वस्वका त्याग करते ही रहते हैं । भारतीयोंमें तो प्रातः काल ही धरित्रीपर पाद - विन्यास करनेके पहले धरित्रीकी वन्दना की जाती है; परंतु वे मातृभूमिको भक्तिके साथ मातृपति परमेश्वरको नहीं भूलते । उनकी मातृभक्ति संकीर्ण एवं किसीको हानि पहुँचानेवाली नहीं होती । 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_18_2_Back