मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 581–590

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 581–590

पृष्ठ 581

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ऐतिहासिक भौतिकवाद ५७९ जंगल नष्ट होनेसे जमीका कटाव बढ़ गया । प्रकृतिकी उथल- पुथलसे कितने ही साम्राज्य भूगर्भमें विलीन हो गये । कभी-कभी साधारण- साधारण घटनाओंसे ही इतिहासका कायापलट हो जाता है । फ्रांसकी क्रान्तिके दिनों वहाँका राजा लुई भाग निकला । रास्तेमें एक गाड़ी पड़ी होनेके कारण उसका मार्ग रुक गया । गाड़ी हटानेमें देर होते ही भीड़ एकत्रित हो गयी । राजा पहचाना गया और पकड़ लिया गया । यदि वह भागकर राजभक्त सेनामें पहुँच गया होता तो क्या फ्रांसकी क्रान्ति सफल हो सकती थी? हीगेलके अनुसार ‘ इतिहास ईश्वरकी आत्मकथा है । वह मनुष्योंको अपनी रुचिके अनुसार कार्य करने देता है । उनका फल वही होता है, जो ईश्वर चाहता है । ' इंग्लैण्डके डिल्टन मेरका मत है कि ‘ संसार अज्ञातरूपसे, पर बड़े कष्टपूर्वक ईश्वरकी ओर बढ़ रहा है- मेरे लिये इतिहासका यही अर्थ है । ' यह भी एक पक्ष है कि इतिहासमें निष्पक्षता हो ही नहीं सकती है । लेखक जिस देशकालमें रहता है, उसका प्रभाव उसपर अवश्य होता है । अतः वह अतीतको भी वर्तमानके चश्मे से देखता है । जर्मन इतिहासज्ञोंका कहना है कि ' जर्मनीके जंगलों, पहाड़ों, नदियों तथा जर्मन वीरगाथाओंका गौरवपूर्ण वर्णन ही इतिहास है । ' एक इटालियनका कहना है –' यदि प्राचीन इतिहासके अध्ययनसे हममें उत्साह नहीं बढ़ता तो फिर गड़े मुर्दे खोदनेकी क्या आवश्यकता? ' कुछ लोगोंका मत है कि ‘ इतिहास अपनेको दोहराता रहता है । ' दूसरे कहते हैं — ' प्राचीन घटनाओंकी पुनरावृत्ति असम्भव है । ' कुछ लोग ' विशिष्ट ऐतिहासिक व्यक्तियोंका विस्तृत वर्णन ही इतिहास ' समझते हैं । कुछ लोग छोटी-से-छोटी घटनाओंका भी इतिहासपर प्रभाव मानते हैं । मेर अनुसार सार्वजनिक घटनाओंका क्रम बद्ध वर्णन ही इतिहास है । प्रो० हॉर्नशॉकी रायमें विश्व- घटनाओंकी गति या उसके कुछ अंशका वर्णन इतिहास है । लार्ड ऐक्टनका कहना है कि विश्वका इतिहास राष्ट्रोंके इतिहासका संग्रह नहीं, किंतु वह लगातार विकास है । वह स्मरण-शक्तिके लिये भार न होकर आत्माके लिये प्रकाश है । ' स्टडी ऑफ हिस्ट्री' के 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_19_2_Front

पृष्ठ 582

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५८० मार्क्सवाद और रामराज्य अनुसार ' इतिहासका आधार राष्ट्र नहीं हो सकता । अपने राष्ट्रको ही विश्व मान लेना भूल है । वह तो विश्वका अंगमात्र है, इसी दृष्टिसे उसका इतिहास लिखा जाना चाहिये । ' मिस्टर वेल्सके अनुसार मानव जाति ही राष्ट्र है । इस तरह इतिहासके सम्बन्धमें अनेक प्रकारकी धारणा होनेपर भी इतिहासका उद्देश्य सत्यकी खोज अवश्य होना चाहिये । इससे भिन्न उद्देश्य होनेपर घटनाओंकी खींचा-तानी तोड़-मरोड़ अवश्य करनी पड़ेगी । ' आई फाउण्ड नो पीस ' के लेखक मिस्टर वेन मिलरका कहना है कि आँखों देखी घटना भी ठीक नहीं बतायी जा सकती । दो आदमी उसे भिन्नरूपसे देखते हैं । प्रत्येक व्यक्तिकी कल्पना अलग ही चलती है । पत्रों, सरकारी लेखोंमें भी भाव बदले जाते हैं । फिर हजारों वर्ष पुराने इतिहासका वर्णन सत्य कैसे हो सकता है? वस्तुतः इसीलिये रामायण, महाभारत आदि आर्ष इतिहासके लेखक वाल्मीकि, व्यास आदि ऋषि प्रत्यक्षानुमान या संवाददाताओंके तारों, पत्रोंके आधारपर नहीं, किंतु समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञाके अनुसार घटनाओंको पूर्णतया जानकर ही इतिहास लिखनेमें संलग्न हुए थे । वैदिकोंके यहाँ वेदार्थ जाननेमें इतिहास -पुराणका अत्यन्त उपयोग है— ' इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् ', ' पुराणमितिवृत्तमाख्यायिकोदाहरणं धर्मशास्त्रमर्थशास्त्रञ्चेतीतिहासः । ' ( कौ० अर्थ० १।५।१४ ) ब्रह्मादिपुराण, रामायण -महाभारतादि इतिहास, बृहत्कथादि आख्यायिका, मीमांसादि उदाहरण, मनु -याज्ञवल्क्यादि धर्मशास्त्र, औशनस- बार्हस्पत्यादि अर्थशास्त्र- ये सभी कौटल्यके अनुसार इतिहास हैं । शुक्रके मतानुसार किसी राजचरित्र - वर्णनके व्याजसे प्राचीन घटनाओंका वर्णन ही इतिहास है- प्राग्वृत्तकथनं चैकराजकृत्यमिषादितः । यस्मिन् स इतिहासः स्यात् पुरावृत्तः स एव हि ॥ ( शुक्रनीति ४। २ ९३ ) इतिहासके साथ पुराणोंका भी सम्बन्ध अनिवार्य है; क्योंकि पुराणमें सर्ग ( सृष्टि ), प्रतिसर्ग ( प्रजापतियोंके बादकी सृष्टि ), वंश ( कुल ), 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_19_2_Back

पृष्ठ 583

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ऐतिहासिक भौतिकवाद ५८१ मन्वन्तर ( प्रत्येक मनुके अधिकारका समय ), वंशानुचरित ( कुलवृत्त ) -का वर्णन विशेषरूपसे होता है । इतिहास केवल घटनाओंका वर्णनमात्र हो, तब तो केवल गड़े मुर्दोंके उखाड़नेके अतिरिक्त कुछ भी नहीं रह जाता, अतः उसके द्वारा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षोपदेश आवश्यक है । इस तरहका कथायुक्त वृत्त ही इतिहास है— धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेशसमन्वितम् पूर्ववृत्तं कथायुक्तमितिहासं( का० मीमांप्रचक्षते० म० टी०॥ १।२) धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षके उपदेशोंसे समन्वित कथायुक्त पूर्ववृत्तका वर्णन ही इतिहास है । मानवजातिकी प्रगति ऐतिहासिक क्रमसे इसी ओर होती रही है । इतिहासकी माक्सय व्याख्या मार्क्सके अनुसार ' इतिहास छः युगोंमें विभक्त है । प्रथम युगमें अति प्राचीन मनुष्य साम्यवादी संघोंमें रहता था । उस समय उत्पादन, वितरण आदि समाजवादी ढंगसे होता था । दूसरा युग दासताका है । कृषि -प्रथा गोपालनके फलस्वरूप व्यक्तिगत सम्पत्तिका जन्म हुआ । सम्पत्तिके स्वामियोंने अन्य सम्पत्तिरहित लोगोंको अपना दास बनाया । राज्य एवं तत्सम्बन्धी अन्य संस्थाओंका जन्म हुआ । तीसरा सामन्तशाही युग हुआ, इसमें सामन्त भूमिके स्वामी होते थे । गरीब किसान इन सामन्तोंके अधीन रहते थे, पर दास नहीं । चौथा युग आधुनिक पूँजीवादी युग है । इस युगका प्रादुर्भाव व्यवसायों एवं कारखानोंके फलस्वरूप हुआ है । इसमें अर्थ, समाज एवं राज्यके स्वामी पूँजीपति होते हैं । श्रमिक अपना जीवन-निर्वाह श्रमके द्वारा करते हैं । पाँचवाँ युग सर्वहाराके अधिनायकत्वका होगा । इसमें अर्थ, समाज एवं राज्यकी बागडोर श्रमिकोंके हाथमें होगी । यह समाजवादी एवं शोषणरहित युग होगा । इसके बाद मानव-जाति छठे युगमें प्रवेश करेगी । उसमें राज्यविहीन समाज होगा । वास्तविक स्वतन्त्रता तभी होगी, यह सुवर्णयुग होगा ।' मार्क्सका अति प्राचीन युग रूसोकी प्राकृतिक स्थितिके समान

पृष्ठ 584

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५८२ मार्क्सवाद और रामराज्य है । रूसोकी भाँति ही मार्क्सके मतमें भी व्यक्तिगत सम्पत्ति सभ्यताकी धात्री है । मार्क्सका आधुनिक पूँजीवादी युगका चित्रण रूसो-जैसा ही है । रूसोका ' आदर्श प्रत्यक्ष जनतन्त्र ' और ' सामान्येच्छाके सिद्धान्त ' की तुलना मार्क्सके ' साम्यवाद ' से की जा सकती है । जैसे रूसोकी सामान्येच्छाद्वारा एक नयी स्वतन्त्रता सम्भव होती है, वैसे ही मार्क्स क्रान्ति और सर्वहाराके अधिनायकत्वमें एक नयी साम्यवादी व्यवस्थाका जन्म होगा । रूसोकी यह स्वतन्त्रता प्राचीन प्राकृतिक स्थितिकी स्वतन्त्रतासे भिन्न थी । वैसे ही मार्क्सका साम्यवाद भी अति प्राचीन साम्यवादसे भिन्न है । भेद इतना ही है कि रूसो आदर्शवादी था और मार्क्स भौतिकवादी । मार्क्सके अनुसार ' मानव - इतिहास वर्ग संघर्षका इतिहास है । यह संघर्ष युगानुरूप होता है । कभी प्रत्यक्ष, कभी अप्रत्यक्ष भी रहा है । कभी विजेताद्वारा नये समाजका निर्माण हुआ, तो कभी दोनों वर्गोंका विध्वंस हुआ है । सर्वहाराकी क्रान्तिद्वारा ही इस वर्ग संघर्षका अन्त होगा; क्योंकि इसके द्वारा वर्गका अन्त होकर एक वर्गविहीन समाज बनेगा । ' आधुनिक लोगोंकी दुनिया ही छः हजार वर्षकी है । इसके ही भीतर इन्हें अनेकों युगोंकी कल्पना करनी पड़ती है, परंतु भारतीय महर्षियोंकी दृष्टिसे वर्तमान सृष्टि ही दो अरब वर्षकी मानी जाती है । आधुनिक वैज्ञानिक भी अब सृष्टिकी प्राचीनताकी ओर बढ़ रहे हैं । इस दृष्टिसे धर्मराज्य, रामराज्य और सोपद्रव, क्षुद्रराज्य- तीन ही प्रकारका युग प्रतीत होता है । मार्क्सके छः युग सोपद्रव क्षुद्रराज्यके भीतर ही हैं । अनेक दार्शनिक हॉब्सके प्राकृतिक खूँखार मानव एवं उसके द्वारा अनुबन्धपूर्वक ' दीर्घकाय ' को सर्वाधिकार समर्पण आदि जैसे ही मार्क्सके ऐतिहासिक वर्णनको भी अप्रामाणिक समझते हैं । अतीत घटनाओंके सम्बन्धमें प्रत्यक्षकी प्रवृत्ति हो ही नहीं सकती, अतः अनुमान या आगमोंद्वारा ही उस सम्बन्धमें कुछ जानकारी हो सकती है । आगमोंपर मार्क्सका विश्वास नहीं था । अपुष्ट कारणोंके आधारपर इतिहासके सम्बन्धमें अटकल लगाकर किसीने तीन, किसीने पाँच तो

पृष्ठ 585

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ऐतिहासिक भौतिकवाद ५८३ किसीने छः युगकी कल्पना कर डाली । ये कल्पनाएँ निराधार हैं । रूसोकी प्राकृतिक स्थितिमें स्वर्णयुग ही था, उसी प्रकार मार्क्सकी भी अति प्राचीन मनुष्योंकी साम्यवादी संघकी स्थिति थी । फिर उसका अन्त क्यों हुआ? जिस तरह उसका अन्त हुआ, उसी तरह मार्क्ससम्मत सर्वहाराके डिक्टेटरशिप् में होनेवाली क्रान्तिद्वारा वर्गहीन राज्यका भी अन्त क्यों न होगा? हीगेलके अनुसार कोई भी संवाद अन्तमें वाद बन जाता है; क्योंकि कुछ-न-कुछ लोग उस संवादके भी विरोधी रहते ही हैं । उन्हींका समुदाय उस संवादका प्रतिवादी बन जाता है । जब अति प्राचीन साम्यवादी संघवादी बन सका तो अन्तिम वर्गविहीन समाज क्या स्थायीरूपसे हो सकेगा? और उसका विरोधी कोई न होगा? फिर हीगेलका आदर्श राज्य भी द्वन्द्वमानके अनुसार अन्तिम ही है । इसमें भी सिवा अन्धविश्वासके और क्या प्रमाण है? फिर यह भी तो कहा जा सकता है कि जैसे रूसोकी सामान्येच्छाद्वारा प्राप्त स्वतन्त्रताका स्वप्न पूरा नहीं हुआ, उसी तरह मार्क्सके भी वर्गविहीन राज्यका स्वप्न पूरा होनेवाला नहीं । धर्मनियन्त्रित शासन - तन्त्रवादीके यहाँ ह्रास - विकासका चक्र चलता रहता है । अतः कृतयुगमें धर्म - राज्य एवं दण्ड आदिसे विहीन धर्मनियन्त्रित राज्य था और वह स्वर्णयुग था— यह आर्ष इतिहासोंसे विदित है । पुनश्च रजोगुण– तमोगुणके विस्तारसे उसमें गड़बड़ी हुई । फिर धर्मनियन्त्रित राज- तन्त्र हुआ, तमोगुण बढ़नेसे फिर और विविध विवादमय राज्य हुए । पुनश्च ' चक्रनेमिक्रमेण ' धर्मनियन्त्रित लोकतन्त्र, धर्मनियन्त्रित राजतन्त्र एवं पुनः शुद्ध राजादि-विहीन धर्मनियन्त्रित राज्य हो सकता है । जैसे प्रतिवर्ष वसन्त, ग्रीष्म आदि ऋतुओंका प्रादुर्भाव होता है, वैसे ही यह भी सम्भव है । मार्क्सका ' वर्ग -संघर्ष ' कोई वास्तविक तथ्य नहीं है । यह तो एक विकार है । मात्स्यन्यायका फैलना धर्मनियन्त्रण घटनेपर ही बढ़ता है । धर्मनियन्त्रण बढ़नेपर घट जाता है । यों तो प्रत्येक व्यक्तिके भीतर देवासुर संग्राम चलता ही रहता है । रजोगुण, तमोगुणके अनुकूल वृत्तियाँ, चेष्टाएँ, भावनाएँ तथा उनसे युक्त व्यक्ति, समुदाय आसुर

पृष्ठ 586

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५८४ मार्क्सवाद और रामराज्य समुदाय है । सत्त्वगुणके अनुकूल वृत्तियाँ, भावनाएँ, चेष्टाएँ तथा उनसे युक्त व्यक्ति, समुदाय दैवी समुदाय है । इनका संघर्ष सदा ही चलता है, परंतु कभी व्यक्त, कभी अव्यक्त । भीतरका ही संघर्ष कभी - कभी बाह्यरूप धारण कर लेता है । कभी कोई पक्ष जीत जाता है तो कभी कोई पक्ष । तमोगुणपर सत्त्वगुणकी विजय ही अनृतपर सत्यकी, दानवतापर मानवताकी, आसुर- शक्तिपर दैवीशक्तिकी विजय है । यही जडवादीपर अध्यात्मवादीकी विजय है । यही व्यष्टिवादपर समष्टिवादकी, संकीर्णतापर उदारताकी जीत है । आदर्शवादी दार्शनिक हॉब्स आदिके प्राकृतिक मनुष्य और अनुबन्धद्वारा राज्य- कल्पनाको अप्रामाणिक एवं अनैतिहासिक कहते हैं । ठीक इसी तरह अति प्राचीन साम्यवादी समाज और वर्ग - भेद आदिकी माक्सय कल्पना भी अप्रामाणिक एवं अनैतिहासिक ही है । भौतिकवादी व्याख्या कहा जाता है कि हीगेलके ऐतिहासिक आदर्शवादके मुकाबलेमें ही मार्क्सने अपनी प्रणालीका नाम ' ऐतिहासिक भौतिकवाद ' रखा था । इस प्रणालीद्वारा मार्क्स विभिन्न परिवर्तनों, क्रान्तियों एवं मानसिक, सामाजिक घटनाओंको उत्पन्न करनेवाले मूलस्रोतोंका पता लगाना चाहता था, इसलिये इतिहास - संचालन करनेवाले नियमोंका उसने पता लगाया । उसका कहना था--'' मनुष्योंके विवेक एवं विचारोंमें परिवर्तन करनेवाली तथा विभिन्न सामाजिक प्रणालियों और पारस्परिक विरोधकी सृष्टि करनेवाली प्रधानशक्ति, विचारों, भावनाओं या विश्वव्यापी ज्ञानसे अथवा सर्वव्यापी आत्माके ज्ञानसे नहीं हुआ, किंतु वह जीवनकी भौतिक अवस्था एवं नियमोंद्वारा ही हुआ है । इसलिये मनुष्यजातिके इतिहासका आधार भौतिक है, अर्थात् जिस मार्गसे मनुष्य एक सामाजिक प्राणीकी हैसियतसे, प्राकृतिक परिस्थितियों, आन्तरिक, शारीरिक और मानसिक शक्तियोंकी सहायतासे अपने सांसारिक या भौतिक जीवनका निर्माण करता है और अपनी आवश्यकताओंकी पूर्तिके लिये वस्तुओंको उत्पन्न करता, बाँटता और बदलता है, वही नियम, मार्ग या तरीका जीवनका भौतिक विषय

पृष्ठ 587

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ऐतिहासिक भौतिकवाद ५८५ या अवस्था है । ' पर यहाँ यह विचारणीय है कि यदि विभिन्न परिवर्तनों, क्रान्तियों, मानसिक -सामाजिक रचनाओंको उत्पन्न करनेवाला कोई मूल स्रोत ढूँढ़ना आवश्यक है और उसका कारण मार्क्सके मतानुसार भौतिक अवस्था और भौतिक नियम ही है, तो भौतिक अवस्था एवं भौतिक नियमोंका भी कारण क्या है - यह भी जिज्ञासा स्वाभाविक तथा अनिवार्य है । व्यावहारिक बात तो यह है कि विचारशील, विवेकी पुरुष ही जड भौतिक वस्तुओंमें रद्दोबदल करता रहता है; जड वस्तु स्वयं न अपनेको जान सकती है, न अन्यको ही । हिताहित सोचना, किसी उद्देश्यसे प्रवृत्त होना- यह शुद्ध चेतनका ही धर्म है, अचेतनका नहीं । इसीलिये जैसे रेल, तार, रेडियो, वायुयान, विभिन्न शस्त्रास्त्र, कल-कारखाने, बड़े - बड़े बाँध, पुल, महान् दुर्ग - सब चेतनके विचार एवं इच्छाके ही परिणाम हैं, इसी प्रकार अन्यान्य आकाश, पृथ्वी आदिकी उत्पत्ति एवं उसके नियम एवं अवस्थाओंमें भी अवश्य ही किसी सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् समष्टि चेतनकी इच्छा एवं विचारोंको कारण मानना अनिवार्य है । किसी भी विचारमें विचार्य कुछ भौतिक वस्तुएँ एवं उनकी अवस्थाएँ भी कारण हो सकती हैं, परंतु इसका अभिप्राय इतना ही है कि जैसे घटज्ञानमें विषयरूपसे घट भी हेतु है, परंतु इतने मात्रसे चक्षुसे घटका संनिकर्ष तथा मन या अन्तःकरणका चक्षुद्वारा घटाकार परिणत होना और चेतन आत्माद्वारा उन सबका प्रकाश होना गौण या मुख्य है - यह नहीं कहा जा सकता है, किंतु ज्ञानमें तो ज्ञाता ही मुख्य है, ज्ञेय एवं प्रमाण आदि ज्ञाताके अंग होकर ही ज्ञानके साधन हैं । विवेकी ज्ञाता जीवनकी भौतिक अवस्थाओंमें रद्दोबदल करता ही रहता है । यद्यपि भौतिकवादी किसी भी सिद्धान्त, सत्य, न्याय, धार्मिक या सामाजिक नियमको शाश्वत या नित्य नहीं मानते, फिर भी अचेतन भूतोंमें अनेक शाश्वत नियम मानना अनिवार्य है, पृथ्वीका गन्धवत्त्व एवं विभिन्न बीजोंद्वारा विभिन्न प्रकारकी वस्तुओंका उत्पन्न होना, विविध प्रकारके बीजोंसे विभिन्न पुष्प, स्तवक, कुड्मल, वृक्ष एवं विभिन्न रूप,

पृष्ठ 588

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५८६ मार्क्सवाद और रामराज्य रस, गन्धसे युक्त फलोंका उत्पन्न होना, जलका निम्न प्रदेशकी ओर बहना, अग्निका ऊर्ध्वमुख प्रज्वलन, वायु एवं आकाशके निश्चित धर्म शाश्वत ही हैं । समुद्रमें विभिन्न तिथियोंमें नियन्त्रित समयपर ज्वारभाटाका आना, चन्द्रमाका नियमित ह्रास- विकास कितना शाश्वत है- यह सुस्पष्ट है । जिस प्रकार भौतिक नियम शाश्वत हैं, वैसे ही ज्ञाता, चेतन एवं ईश्वरादिके नियम शाश्वत हैं, अतएव धार्मिक, सामाजिक एवं न्यायसम्बन्धी अपरिगणित धर्म भी शाश्वत है । ईश्वरीय नियम, धार्मिक सिद्धान्त, न्याय एवं सत्यके अनुसार विवेकी प्राणी शारीरिक, मानसिक एवं भौतिक परिस्थितियोंकी सहायतासे अपनी आवश्यकताओंकी पूर्तिके लिये वस्तुओंको उत्पन्न करता, बाँटता तथा रद्दोबदल भी करता है, परंतु जहाँ आध्यात्मिक धार्मिक दृष्टिसे तथा विवेकके विरुद्ध शारीरिक मानसिक तथा बाह्य भौतिक परिस्थितियाँ, परस्त्री, परधन- हरणके अनुकूल भले ही हों, तथापि एक विवेकी पुरुष उनका विरोध ही करता है । नदीके तीव्र प्रवाहमें पड़ा हुआ मुर्दा ही निर्विरोध धाराका अनुसरण करता है, परंतु जीवित प्राणी अवश्य ही विरोध करता है, प्रवाह चीरकर लक्ष्यकी ओर बढ़ता है । प्रवाहका किंचित् अनुसरण भी प्रवाह अतिक्रमणके ही अभिप्रायसे करता है । समुद्रमें नाव डालकर वायुके अनुसार भटकनेवाला प्राणी निरुद्देश्य ही होता है । जिसका कोई लक्ष्य होता है, वह विरुद्ध भीषण झंझावातका मुकाबला करके लक्ष्यकी ओर बढ़ता है, यदि उसमें सर्वथा असमर्थ रहा तो उसी जगह लंगर डालकर नावको रोक देता है- 'जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी दीजै ' का दुरुपयोग करनेवाले अवसरवादी सर्वथा अविश्वसनीय ही हुआ करते हैं । उत्पादन -शक्तियाँ और नियम कहा जाता है कि उत्पादन-शक्तियाँ दो प्रकारकी हैं- एक चेतन, दूसरी अचेतन । अचेतन शक्तियोंके अन्तर्गत भूमि, जल, वायु, कच्चा माल, औजार, मशीनें आदि आ जाती हैं । चेतन शक्तियोंमें मजदूर, आविष्कारक, अन्वेषक, इंजीनियर आदि आ जाते हैं । जातिगत गुण अर्थात् किसी मनुष्य - समूहकी जन्म - सिद्ध योग्यताका भी चेतन शक्तियोंमें

पृष्ठ 589

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ऐतिहासिक भौतिकवाद ५८७ अन्तर्भाव है । सबसे अधिक महत्त्व शारीरिक और मानसिक श्रम करनेवाले श्रम- जीवियोंका है । उनके द्वारा ही पूँजीवादी समाजमें विनिमय मूल्यकी सृष्टि होती है । दूसरा महत्त्व आधुनिक यन्त्रविद्याका है, जिसके कारण आज समाजमें उथल- पुथल हो रहा है । मार्क्सके मतानुसार ' मनुष्य उत्पादक कार्य और उसकी आवश्यकताके प्रभावानुसार अपने समाज, राज्य, धर्म- दर्शन और विधानसम्बन्धी सिद्धान्तोंकी रचना करता है । भौतिक, आर्थिक अवस्था इसकी आधार-भित्ति-स्वरूप है । उससे उत्पन्न होनेवाली धार्मिक, राजनीतिक, दार्शनिक आदि प्रणालियाँ उसके ऊपर बने हुए भवनोंके समान होती हैं । ये भवन जितने अंशोंमें अपनी आधारभित्तिके अनुरूप होते हैं, उतने ही दृढ़ होते हैं, उतनी ही उन्नति और समृद्धि होती है । सामाजिक दशाओंके द्वारा सम्पत्ति-सम्बन्धी नियम बनाये जाते हैं और मनुष्योंके उन पारस्परिक सम्बन्धोंका निर्णय किया जाता है, जिनसे उत्पत्तिका कार्य चलता है । उत्पादनके नियमोंका निर्णय समाजके मनुष्य ही करते हैं, जैसे और नियमोंका निर्णय समाजके मनुष्य ही करते हैं । जैसे मनुष्य प्राकृतिक सामग्री और शक्तियोंकी सहायतासे भाँति- भाँतिकी वस्तुओंका निर्माण करते हैं, उसी प्रकार मस्तिष्कपर उत्पादक- शक्तियोंकी प्रतिक्रियाके फलस्वरूप सामाजिक, राजनीतिक और न्यायसम्बन्धी विधानों तथा धार्मिक, चारित्रिक, दार्शनिक सिद्धान्तोंका भी निर्णय वे ही करते हैं । ' उत्पादक- उत्पादन -शक्तियों और उनके द्वारा होनेवाले परिणामोंपर विचार करते हुए यह कभी न भूलना चाहिये कि उच्चावच अनन्तानन्त सब भौतिक पदार्थ भोग्य हैं । वे अपने लिये नहीं, किंतु भोक्ताके लिये होते हैं । भोक्ता भोग्यके लिये नहीं होता, किंतु भोग्य भोक्ताके लिये होता है । पलंग अपने लिये नहीं, किंतु सोनेवाले भोक्ताके लिये होता है । करोड़ों रुपयोंकी माला, मालाके लिये नहीं, अपितु पहननेवालेके लिये होती है, अतएव पलंग यदि छोटा पड़ जाय तो पलंगमें सुधार होना चाहिये, न कि सोनेवालेको काट - पीटकर पलंगके लायक बनाना चाहिये । माला छोटी पड़ती है, सिरसे गलेमें नहीं उतरती, तो मालाको तोड़कर

पृष्ठ 590

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५८८ मार्क्सवाद और रामराज्य सुधारना ठीक है; पहननेवालेका सिर छीलकर मालाका गले उतारना बुद्धिमानी नहीं । ठीक इसी प्रकार भोक्ता नित्य, चेतन, आत्माके लौकिक- पारलौकिक हितकी दृष्टिसे भौतिक वैभव एवं उनके रद्दोबदलका उपयोग किया जा सकता है, परंतु आत्माके लौकिक, पारलौकिक हितोंके विपरीत असर डालनेवाले भौतिक प्रभावोंको हर प्रकार रोकना ही उचित है । जैसे स्थूल देह सूक्ष्म मनके अधीन रहता है, वैसे ही देह, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सभी संहत आत्माके लिये होते हैं, वैसे ही देहादिसंघात स्वविलक्षण स्वप्रकाश असंहत आत्माके लिये हैं । रथादि अचेतनकी प्रवृत्ति सारथि चेतनसे अधिष्ठित होती है, वैसे ही जड देहादिकी प्रवृत्ति चेतन आत्मासे अधिष्ठित होती है । देहादि यदि आत्माके अधीन न हों तो भारभूत हो जाते हैं, इसी तरह अचेतन भौतिक सभी व्यवस्थाएँ भी समष्टि चेतन - नियन्त्रित रहकर ही सुख- साधक हो सकती हैं । आधुनिक वैज्ञानिक लोग जड प्रकृतिवशीकारके लिये प्रयत्नशील होते हैं । आधिभौतिक बड़ी - से - बड़ी उन्नति यदि आत्माके अनुकूल है, आत्माके नियन्त्रणमें है, तभी उसका महत्त्व है, अन्यथा वह भार- भूत दुःखरूप ही है । इस तरह भौतिक अवस्थाके अनुसार चेतनके सब नियमोंमें रद्दोबदल अत्यन्त असंगत है, आंशिक रूपसे भौतिक अवस्थाओंका उपयोग एवं अनुसरण मान्य है ही । फिर भी चेतनपर अचेतनका हावी हो जाना कथमपि उचित नहीं है, चेतन उत्पादक होनेसे एवं भोक्ता भी होनेसे महत्त्वपूर्ण है, वह पूँजी एवं यन्त्र दोनोंपर ही अधिकारी होता है, अतः चेतनसे अचेतनकी तुलना ही नहीं हो सकती । फिर भी श्रमजीवीको श्रमका फल जैसे मिलना आवश्यक है, वैसे ही पूँजीपतिको पूँजीका फल भी मिलना आवश्यक है और यह कम्युनिष्टको भी मानना ही होगा, भले ही उसकी दृष्टिमें ही यह फल व्यक्तिको न मिलकर समाजको मिले । यहाँ रामराज्यके अनुसार आधुनिक शोषक पूँजीवाद या व्यक्तियोंका अधिनायकवाद या निःस्वत्ववाद नहीं मान्य है, किंतु वह पूँजी सबको मान्य है, जिसके द्वारा यन्त्र एवं आविष्कारक, अन्वेषक एवं श्रमजीवियोंका भी काम चला है । आधुनिक रूपमें आजकल भी व्यक्ति बैंकोंमें रुपया