मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 621–630
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 621–630
पृष्ठ 621
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ऐतिहासिक भौतिकवाद ६१ ९ फिर उसका कितने दिनोंमें अध्ययन हो सकेगा और कौन, कब तथा क्या निष्कर्ष निकाल सकेगा और कब उसे कार्यान्वित किया जायगा? इतिहासका अभिप्राय भी गड़े मुर्दोंको उखाड़नेके तुल्य पुरानी घटनाओंको दोहराना ही नहीं, किंतु उन अतीत घटनाओंसे धार्मिक, सामाजिक, आध्यात्मिक, राजनीतिक अभ्युदयोपयोगी शिक्षण ( सबक ) प्राप्त करना ही होता है । अतएव सभी घटनाओं या सभी व्यक्तियोंको इतिहासमें स्थान नहीं मिलता और न सबका उल्लेख ही इतिहासमें सम्भव है । कितने ही मनुष्य उत्पन्न होते है, कितने ही मरते हैं, कितनी ही घटनाएँ घटती रहती हैं । उनका इतिहासमें न तो उल्लेख ही होता है और न उल्लेख करना सम्भव ही है । नगरों, ग्रामोंमें मनुष्योंके जन्मने- मरनेका लेखा-जोखा होता है, फिर भी पशुओं, पक्षियों, मच्छरोंके जन्मने- मरनेका कोई लेखा-जोखा नहीं होता । इतिहासकी दृष्टिमें सामान्य मनुष्यों एवं घटनाओंका भी यही हाल है । इतिहासका वर्ण्य-विषय मार्क्सवादी कहते हैं कि ' राजाओं, महाराजाओं, वीरपुरुषोंका वर्णन करना इतिहासका लक्ष्य न होकर समष्टि जनताकी स्वाभाविक जीवनस्थिति, उत्पादन-साधन और उनके परस्पर सम्बन्ध तथा उनके परिणामोंका निरूपण ही इतिहासका मुख्य विषय होना चाहिये । ' तदनुसार ही मार्क्सवादी प्राथमिक वर्गहीन समाज, फिर मालिक और गुलाम, फिर सामन्त एवं किसान- गुलाम, फिर पूँजीपति और मजदूर, फिर मजदूर राज्य तथा पुनः वर्गविहीन समाजकी स्थापनाका इतिहास सिद्ध करके दिखलाते हैं । दूसरे लोग पाषाण- युग, लौह - युग, यन्त्र- युग आदिकी कल्पना करते हैं । इतिहासके गोरखधन्धेसे अपने - अपने मतलबकी चीज सभी निकालते हैं, विशेष प्रामाणिक आधार खोजे बिना ही कल्पनाके महल खड़े किये जाते हैं । फिर ये सभी कल्पनाएँ हजार, दो हजार वर्षके इतिहासके भीतर ही हैं । विशेषतः मार्क्सवादी विवेचन अधिकांश रूपसे ४०० वर्षोंकी ही घटनाओंपर निर्भर है । लाखों- करोड़ों वर्षोंके इतिहासकी कौन -कौन-सी घटनाएँ आधुनिक कल्पनाओंमें साधक हैं, कौन -कौन-
पृष्ठ 622
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६२० मार्क्सवाद और रामराज्य सी बाधक हैं –इससे उनका कुछ भी मतलब नहीं । यही स्थिति अराजकतावादियोंकी भी है । घटनाएँ सब सकारण होती हैं । फिर भी सब घटनाएँ परस्पर एक - दूसरेकी कारण नहीं होतीं । कई स्थलोंपर तो घटनाएँ अव्यवहित होनेपर भी उनमें कार्य -कारण- भाव नहीं माना जाता । कौवेका बैठना और ताड़का गिरना व्यवधानशून्य होनेपर भी कार्य-कारण- सम्बन्धसे शून्य होता है । इसी आधारपर बहुत - सी घटनाओंके सम्बन्धोंको काकतालीय ही माना जाता है । इसके अतिरिक्त प्राणियों, देश तथा संसारके सौभाग्य - दौर्भाग्य दोनों ही चलते हैं । दौर्भाग्यसे बुरी घटनाएँ और सौभाग्यसे अच्छी घटनाएँ भी घटती हैं । अच्छी घटनाओंके मूलमें सौभाग्यके अतिरिक्त सत्प्रयत्नका भी हाथ होता है । बुरी घटनाओंमें दुर्भाग्यके अतिरिक्त प्रमाद, आलस्य, दुराचार, दुष्प्रयत्नका भी हाथ रहता है । रावणके हाथों भी बहुत -सी घटनाएँ हुईं । युधिष्ठिर एवं दुर्योधनादिके द्वारा भी अनेक ढंगकी घटनाएँ घटीं । देवों - असुरोंसे सम्बन्धित घटनाओंके बारेमें भी यह बात कही जा सकती है । बुरी घटनाओंका वर्णन बुरे कामोंसे बचने और सावधान होनेके लिये होता है तथा अच्छी घटनाओंका वर्णन गुणग्रहण एवं प्रोत्साहनके लिये होता है । इसीलिये रामायणके अध्ययनसे यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये कि राम- भरत आदिके समान बर्तना चाहिये, रावणादिकी तरह नहीं । महाभारत पढ़कर यह पाठ सीखना चाहिये कि युधिष्ठिरादिके समान बर्तन करना चाहिये, दुर्योधन आदिके समान नहीं— ' रामादिवद् वर्त्तितव्यं न तथा रावणादिवत् । युधिष्ठिरादिवद् वर्त्तितव्यं न दुर्योधनादिवत्॥ ' सदाचार, सद्धर्म, सत्कर्म, सदुद्योग, सद्धनार्जन एवं सदुपायोंका शिक्षण ऐतिहासिक सद्घटनाओंसे सीखा जा सकता है । सत्पुरुषोंके भी कुत्सित आचारोंका अनुसरण नहीं किया जा सकता । ' यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ' यह स्वभावोक्ति है । प्राणीकी स्वाभाविक प्रवृत्ति श्रेष्ठ पुरुषोंके अनुकरण करनेकी होती है, अतः श्रेष्ठ पुरुषोंको शास्त्रानुसारी सदाचार- पालनका विशेष ध्यान रखना चाहिये । प्राणियोंको भी श्रेष्ठोंके शास्त्रानुसारी सुचरितोंका ही अनुकरण करना चाहिये,
पृष्ठ 623
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ऐतिहासिक भौतिकवाद ६२१ दुश्चरितोंका नहीं । इसीलिये वैदिक ऋषिने कहा है कि जो हमारे सुचरित हों, उन्हें ही तुम आचरणमें लाओ, दुश्चरितोंको नहीं -' यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि, नो इतराणि ' ( तैत्तिरीयोपनिषद् १।११।२ ) । अध्यात्म-दृष्टिसे विज्ञान-वैराग्यकी विवक्षासे ही विभिन्न महापुरुषोंकी घटनाओंका वर्णन किया जाता है । उक्त प्रयोजनसे भिन्न वाग्वैभवसे अन्य कोई परमार्थ नहीं है । श्रीशुकदेवजीने परीक्षित्को बतलाया था कि मैंने जो संसारमें यश फैलाकर स्वर्ग जानेवाले महापुरुषोंकी कथाएँ कहीं हैं, उनका अभिप्राय विज्ञान, वैराग्यके प्रतिपादनमें ही है । कितना ही बलवान्, बुद्धिमान्, धनवान् सम्राट् क्यों न हो, सबको ही कालके गालमें जाना पड़ता है । स्वधर्मानुष्ठान, परोपकार एवं साक्षात्कार ही जीवनका सार है । प्रपंचका अधिष्ठान आत्मा ही सत् है । इस प्रकार वैराग्य, विज्ञान-सम्पादनके अतिरिक्त वाग्वैभवको छोड़कर कोई परमार्थता नहीं है । हाँ, जगत्कारण सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् चेतन भगवान्की कथाओंका वर्णन तो भक्तिके लिये भी उपयोगी है—
कथा इमास्ते कथिता महीयसां विताय लोकेषु यशः परेयुषाम् ।
विज्ञानवैराग्यविवक्षया विभो वचोविभूतीर्न तु पारमार्थ्यम्॥
तमेवयस्तूत्तमश्लोकगुणानुवादःनित्यं शृणुयादभीक्ष्णं कृष्णेऽमलांसङ्गीयतेऽभीक्ष्णममङ्गलघ्नःभक्तिमभीप्समानः ।॥ ( भागवत १२ । ३ । १४-१५ ) मार्क्सवादियोंके मतानुसार ' वर्ग संघर्ष, वर्ग- विद्वेष एवं वर्ग-विध्वंसका इतिहास ही इतिहास ' माना जाता है, परंतु वस्तुतः वही मानवका इतिहास नहीं है । वाद, प्रतिवाद, संवादका भी यही ध्येय नहीं है, किंतु आत्मसाक्षात्कार, स्वधर्मानुष्ठान, क्षमा, दया, परोपकार, त्याग, तपस्या आदि ही इतिहासका ध्येय है । अवश्य ही खाने -कमाने, लड़ाई- झगड़े और संघर्षकी भी घटनाएँ होती हैं, परंतु वे आदर्श एवं अनुकरणीय नहीं हैं । उनके द्वारा उत्थानानुकूल रचनात्मक शिक्षा नहीं ग्रहण की जा सकती । मनुष्योंमें ही क्यों, पशु-पक्षियों, कीड़ों - मकोड़ोंमें भी खाने - पीने, विषयोपभोगके लिये संघर्ष चलता है । कइयोंमें तो खूब जमकर लड़ाई
पृष्ठ 624
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६२२ मार्क्सवाद और रामराज्य होती है । बन्दरों, मुर्गों, तीतरों, भेड़ों आदिमें भी गहरी लड़ाई होती है । उनमें भी जातिभेदके आधारपर प्राबल्य -दौर्बल्य होता है । मुर्गोंमें यह प्रसिद्ध है । किसी भी लड़ाईमें दो गुट हो सकते हैं । मजदूरोंकी ही आपसमें जब कभी लड़ाई होने लगती है, तब उनमें दो गुट बन जाते हैं । कभी जातिभेदसे संघर्ष होता है, कभी धर्मभेदसे, कभी जीविकाभेदसे और कभी सिद्धान्तभेदसे भी संघर्ष चलता है । कई कूटनीतिज्ञोंद्वारा कृत्रिम गुट बना डाले जाते हैं । आजकल तो स्त्री- पुरुषोंमें भी संघर्ष उत्पन्न करनेकी चेष्टा चल रही है । घटनाएँ चेतनके परतन्त्र होती हैं, किंतु चेतन घटनाओंके परतन्त्र नहीं होता । चेतनकी परतन्त्रता इसी प्रकार अस्थायीरूपसे सम्भव होती है । जैसे एक दौड़नेवाले चेतन व्यक्तिने अपने आप स्वतन्त्रतापूर्वक स्वेच्छासे दौड़ना प्रारम्भ किया । वह दौड़ने, न दौड़ने या बैठ जानेमें पहले स्वतन्त्र है; किंतु बादमें दौड़नेसे उत्पन्न होनेवाले वेगके बढ़ जानेपर वह परतन्त्रताका अनुभव करता है । फिर उसे ठहरना होता है तो कुछ पहलेसे ही उसे अपनी गति मन्द करनेका प्रयत्न करना पड़ता है । मोटर आदिका दौड़ना रोकनेके लिये तो और भी पहलेसे गति मन्द करनेके लिये प्रयत्न करना पड़ता है । मनन करनेवाला मन्ता चेतन मनका प्रयोक्ता है, वह स्वतन्त्र है, परंतु मननजन्य वेगके बढ़ जानेपर मननको सहसा रोक देना मन्ताके वशकी बात नहीं होती । मनन रोकनेके लिये मन्ताको यमनियमादि- अष्टांगयोग करने पड़ते हैं । आये दिन हम देखते हैं कि मनुष्य परिस्थिति बनाता है और उसका सामना करता है । यदि ऐसा न हो, प्राणी परिस्थितिका एक जडयन्त्र ही हो, तब तो पुरुषार्थके लिये स्थान ही न रह जाय । वैज्ञानिक कितनी ही बार यन्त्रोंके निर्माणमें तथा संचालनमें असफल होते हैं, कितनी ही बार रेल, मोटर एवं वायुयानोंकी दुर्घटनाएँ होती हैं; फिर भी हिम्मती लोग घबराते नहीं, संकटपूर्ण परिस्थितिका मुकाबला करते हैं । सम्पत्ति -विपत्ति, अनुकूलता -प्रतिकूलता - सभीमें वाद, प्रतिवाद, संवादकी कथा जुड़ सकती है । उन्नति भी पाप- पुण्य, भलाई- बुराई
पृष्ठ 625
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ऐतिहासिक भौतिकवाद ६२३ दोनोंकी होती है । शैतानवर्गकी भी उन्नति एवं अवनति होती है । इसी तरह एक सज्जन और सज्जनवर्गकी भी उन्नति एवं अवनति हो सकती है । सभीका समर्थन इतिहाससे मिल सकता है । फिर भी सज्जन लोग सज्जनोंके इतिवृत्तसे ही शिक्षा ग्रहण करेंगे और सज्जनोचित उपायसे ही उन्नतिका प्रयत्न करेंगे । आर्ष, प्रामाणिक रामायण, महाभारत आदि इतिहासोंके आधारपर तो बतलाया जा चुका है कि कृतयुगमें सत्त्वप्रधान धर्मनियन्त्रित मनुष्य राज्य, राजा तथा दण्ड-विधान आदिके बिना ही एकमात्र धर्मसे नियन्त्रित होकर सब काम आपसमें ही चला लेते थे । उस समय सत्त्व-प्रधान एवं धर्म-नियन्त्रित होनेके कारण अपराधी भी कोई नहीं होता था । इसका कारण यह भी था कि सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् स्वच्छ परमेश्वरके अधिक संनिहित प्राणियोंमें स्वच्छता अधिक थी । जो वस्तु स्वच्छ कारणसे अधिक सन्निहित होती है, वह उतनी ही स्वच्छ होती है । जैसे आकाशसे उत्पन्न वायु पृथ्वीकी अपेक्षा अधिक स्वच्छ है । तेज वायुकी अपेक्षा कुछ कम, किंतु जलादिकी अपेक्षा अधिक स्वच्छ है । तेजकी अपेक्षा जल कुछ कम स्वच्छ है, परंतु पृथ्वीकी अपेक्षा अधिक स्वच्छ है । पृथ्वी पार्थिव प्रपंचकी अपेक्षा अधिक स्वच्छ है । इसी तरह परमेश्वरसे उत्पन्न ब्रह्मा और ब्रह्मासे उत्पन्न वसिष्ठादि महर्षि अधिक स्वच्छ, सात्त्विक एवं सर्वज्ञ थे । परमेश्वरसे उत्तरोत्तर दूर परम्परा सृष्ट प्राणियोंके सत्त्वमें तथा सर्वज्ञता आदिमें भी उत्तरोत्तर न्यूनता आती गयी । तदनुकूल ही रजस्तमोगुणकी वृद्धि होनेसे पाप एवं अपराधकी भी वृद्धि होती गयी । जहाँ सत्त्व एवं धर्मकी प्रधानता है, वहाँ धर्मनियन्त्रण ही पर्याप्त है । जहाँ सत्त्व एवं धर्मकी न्यूनता होती है, वहाँ बाह्य नियन्त्रण भी अपेक्षित होता है । जलकी जैसे निम्न प्रदेशकी ओर स्वभावतः प्रवृत्ति होती है, वैसे ही इन्द्रियोंकी अपने विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धकी ओर स्वाभाविकी प्रवृत्ति होती है । सुन्दर शब्द, सुन्दर स्पर्श, सुन्दर रूप, सुन्दर रस, सुन्दर गन्ध, सुन्दर भूषण -वसन, सुन्दर स्त्री आदिकी ओर इन्द्रियोंका स्वाभाविक खिंचाव होता है । इन्द्रियाँ और मन सुन्दरतामात्र देखकर किसी वस्तुकी ओर प्रवृत्त होते हैं । ' यह मेरा है या पराया, यह
पृष्ठ 626
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६२४ मार्क्सवाद और रामराज्य ग्राह्य है या त्याज्य ', यह विवेक तो धर्मनियन्त्रित, शास्त्रसंस्कृत मन ही कर सकता है । मनके अधिक विषयप्रवण एवं रागी हो जानेपर उसके नियन्त्रणके लिये फिर शास्त्रके अतिरिक्त नरक एवं राजदण्ड आदिका भय भी अपेक्षित होता है । यही कारण है कि जब सत्त्व- धर्ममें कमी हुई, रजोगुण, तमोगुणकी वृद्धि हुई और अधर्मका विस्तार हुआ, तब इन्द्रियोंपर नियन्त्रण भी कम हो गया । फिर तो राग-प्रवण मन सुन्दर परधन तथा परकलत्रादिके अपहरणमें प्रवृत्त होने लगा । तभी मात्स्यन्याय फैला और प्रजा उद्विग्न होकर नियन्त्रण एवं व्यवस्था चाहने लगी । तभी परमेश्वरानुगृहीत, चन्द्र- सूर्यादि अष्टलोकपालोंके अंशोंसे युक्त राजाका प्रादुर्भाव हुआ और उसपर भी धर्मका नियन्त्रण हुआ । धर्मनियन्त्रित राजा धर्म- प्रसार, दण्ड - विधान आदिद्वारा मात्स्यन्यायको हटानेमें समर्थ हुआ । वैवस्वत मनु, इक्ष्वाकु, मान्धाता, दिलीप, गाधि, अलर्क, शिबि, रन्तिदेव, हरिश्चन्द्र, रामचन्द्र, युधिष्ठिरादि राजा पूर्ण धर्मनियन्त्रित, दयालु, परोपकारी और प्रजारक्षणार्थ अपना सर्वस्व बलिदान करनेवाले हो गये हैं । रामचन्द्रका प्रजारंजनार्थ सर्वत्याग प्रसिद्ध है । शिबि, रन्तिदेव आदि नरेन्द्रोंने केवल प्रजाके ही नहीं, पशु- पक्षियोंतकके हितार्थ अपने राज्य, धन, प्राण- सब कुछका त्याग किया है । इन्हें शोषक एवं अन्यायी कहना शुद्ध उच्छृंखलताका ही प्रदर्शन करना है । धर्मनियन्त्रित राजा, जनप्रतिनिधियोंका शासन ही ऐहिक, आमुष्मिक, अभ्युदय और परम निःश्रेयसका मार्ग प्रशस्त कर सकता है । उसके बिना मात्स्य न्याय फैलता है । सभीका शासनमें भाग लेना सम्भव न होनेसे प्रतिनिधिकी कल्पना करनी पड़ती है । प्रतिनिधि मुख्यसे भिन्न होता ही है, किंतु वह मुख्यका अपेक्षित एवं निश्चित कार्यकारी होता है । स्वेच्छात्मक संस्थाओं या अराजकतावादी संघको भी तो यूरोप या संसारके लिये प्रतिनिधि निश्चित करना ही पड़ता है । हाँ, प्रतिनिधि योग्य होना उचित है । अराजकतावादकी नींव है व्यक्ति और मार्क्सवादकी नींव है समाज । प्रथम पक्षमें समूहकी स्वाधीनताकी पहली सबसे बड़ी शर्त है व्यक्तिकी स्वतन्त्रता । तदनुसार सब कुछ व्यक्तिकी स्वाधीनताके लिये ही होना
पृष्ठ 627
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ऐतिहासिक भौतिकवाद ६२५ चाहिये । दूसरे पक्षमें स्वाधीनताकी सबसे बड़ी शर्त है जनताकी स्वाधीनता, अतः सब कुछ जनताके लिये ही होना चाहिये । रामराज्यवादीकी दृष्टिमें व्यष्टि और समष्टिका अभेद है, अतएव दोनोंका समन्वय ही सिद्धान्त है । समष्टिके द्वारा व्यष्टिको अभ्युदयकी सुविधा मिलती है और व्यष्टि द्वारा समष्टिका निर्माण होता है । समाजवादी तथा अराजकतावादी दोनोंहीके सिद्धान्तोंके आधारभूत इतिहास अल्पदेशीय हैं । मार्क्सके अनुभवका क्षेत्र इंग्लैण्डका श्रमिक आन्दोलन ही था । अधिक-से - अधिक फ्रांस, जर्मनी तथा इंग्लैण्डके, तत्रापि लगभग ४०० वर्षतकके ही इतिहासपर उसका सिद्धान्त प्रतिष्ठित है । अतः उसका क्या प्रामाण्य?
पृष्ठ 628
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नवम परिच्छेद मार्क्स-दर्शन मार्क्स प्रयोग तथा अनुभवद्वारा प्राप्त ज्ञानको ही वास्तविक ज्ञान मानता है । ‘ डाइलेक्टिस' ( द्वन्द्वमान ) -की चर्चा हम पहले कर आये हैं । यह एक यूनानी शब्द है, जिसका अर्थ है दो मनुष्योंका वार्तालाप । इसमें एक तर्ककी स्थापना की जाती है, फिर उसका खण्डन होता है, जिससे नये तर्ककी उत्थापना होती है । इस प्रकार एक नीचे दर्जेके सत्यसे ऊँचे दर्जेके सत्यपर पहुँचते हैं । यह एक क्रमोन्नतिकी प्रक्रिया है, इसमें स्थिरता नहीं है, वेग है । यही प्रक्रिया सारी प्रकृतिमें वर्तमान है । मानव-समाज और प्रकृतिके इतिहाससे ही द्वन्द्वमानके नियम निकाले गये हैं । ये नियम व्यापकरूपसे सब प्रकारकी गतिके नियम हैं । इनमें तीन मुख्य हैं, १ - परिमाणका गुणमें तथा गुणका परिमाणमें परिवर्तन करनेका नियम, २ - विरोधियोंके अन्तःप्रवेशका नियम तथा स्वयं विपरीतानुवर्तनका नियम और ३ - प्रतिषेधके प्रतिषेधका नियम । इन तीनों नियमका विस्तार हीगेलने विचारके नियमोंके रूपमें किया है । पहला नियम उसके तर्कशास्त्रके पहले खण्डमें है, जिसका नाम है अस्तित्वका सिद्धान्त ( डाक्ट्रिन ऑफ बीइंग्स ) । दूसरा नियम दूसरे खण्डमें है, जिसका नाम है सत्ताका सिद्धान्त ( डाक्ट्रिन ऑफ एसेन्स ) । तीसरा नियम है, उसकी सारी प्रथाका बुनियादी नियम । मार्क्स इन नियमोंको प्राकृतिक नियमोंके रूपमें देखता है । ' पहला नियम जिसे हम यों कह सकते हैं कि प्रकृतिमें गुणात्मक परिवर्तन भूत या गतिके परिमाणमें कमी या बेशीके कारण होता है । प्रकृतिमें गुणोंका प्रभेद निर्भर है रासायनिक संघटनके प्रभेद नियमपर या गति या शक्तिके परिमाण या रूपपर । इसलिये भूत या गति घटाये - बढ़ाये बिना किसी वस्तुके गुणोंमें परिवर्तन करना सम्भव नहीं । दूसरे नियमकी पूर्ति हम यों भी कर सकते हैं कि हर एक वस्तु दो विरोधी भावोंका संयोग है; अर्थात् हर वस्तुमें और वस्तु -चिन्तन क्रियाके लिये भी यही
पृष्ठ 629
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
- मार्क्स दर्शन ६२७ लागू है । दोनों पहलू हैं, भावात्मक और अभावात्मक; धनात्मक और ऋणात्मक । दूसरे शब्दोंमें सत्य विरोधात्मक है । अतिभौतिकवादी इस सहज सत्यकी उपलब्धि नहीं कर सकता, इसलिये कि वह हर वस्तुको स्थिररूपमें देखता है । लेकिन यह जगत् और इसके पदार्थ सदा चंचल हैं । ' ' पीछे हमने देखा है कि गतिमात्र इस प्रकारके विरोधात्मक सत्यका उदाहरण है । किसी वस्तुके स्थानपरिवर्तनको हम यों ही समझ सकते हैं कि वह वस्तु एक ही समयपर एकाधिक स्थानपर है तथा एक ही स्थानपर है भी और नहीं भी है । इस विरोधाभासका हल है गति । ' अध्यात्मवादीका इस सम्बन्धमें कहना है कि द्वन्द्वमान कोई व्यापक या स्थिर सिद्धान्त नहीं है; क्योंकि विचार करनेपर वह वाद-विवाद, तर्क-प्रतितर्कमें भी सही नहीं उतरता । तर्कके सम्बन्धमें यही कहा जा सकता है कि वह प्रमाणान्तरोंके समान प्रतिष्ठित नहीं होता । कोई तार्किक अपने तर्कसे एक वस्तुको प्रतिष्ठित करता है, दूसरा कोई उससे भी बड़ा तार्किक और उत्कृष्ट तर्कसे पहले तर्कको तर्काभास सिद्ध करके प्रथमतर्कसिद्ध व्यवस्थाका खण्डनकर अन्य उत्कृष्ट व्यवस्थाको प्रतिष्ठित करता है । इसी प्रकार उत्तरोत्तर खण्डन-मण्डन चलता रहता है— ' यत्नेनानुमितोऽप्यर्थः कुशलैरनुमातृभिः । अभियुक्ततरैरन्यैरन्यथैवोप-पाद्यते ॥ ' परंतु इस तरह तो तर्क ही अप्रतिष्ठित ठहरते हैं, फिर उनके द्वारा किसी भी अर्थकी सिद्धि नहीं हो सकती । फिर तो तर्कद्वारा किसी भी सत्यपर पहुँचना सम्भव नहीं है, परम सत्यतक पहुँचनेकी बात तो दूर रही । अनवस्थित तर्कके आधारपर ही द्वन्द्वमान सिद्धान्त बनानेका प्रयत्न किया जाता है, किंतु अनवस्थित तर्क किसी भी सत्यका बोधक नहीं हो सकता । अतः ऐसे आधारपर आधारित द्वन्द्वमानके आधारपर किसी सिद्धान्तपर पहुँचना कैसे सम्भव है? यद्यपि रामराज्यवादी तर्कको सर्वथा अप्रतिष्ठित नहीं मानते । वे कहते हैं कि कतिपय तर्कोंका अप्रतिष्ठितत्व देखकर ही तर्कजातीय होनेसे विमत तर्कका भी अप्रतिष्ठितत्व अनुमित किया जाता है, परंतु
पृष्ठ 630
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६२८ मार्क्सवाद और रामराज्य यदि सभी तर्क अप्रतिष्ठित हैं तो तर्कोंका अप्रतिष्ठितत्व सिद्ध करनेवाला तर्क भी अप्रतिष्ठित ही होगा । फिर स्वतः अप्रतिष्ठित तर्कके बलपर तर्कोंका अप्रतिष्ठितत्व कैसे सिद्ध होगा? इस तरह कहना होगा कि सत्यबोधक तर्क या प्रमाणान्तरसंवादी तर्क अप्रतिष्ठित नहीं होता । जो तर्क प्रतिष्ठित होता है, वह तो निश्चितरूपसे वस्तु तत्त्वका बोधक होता है । फिर उसका तर्कान्तरसे खण्डन भी नहीं हो सकता और न उसके द्वारा सिद्ध विषयका ही खण्डन हो सकता है । न उससे उत्कृष्ट तर्कका उत्थान होता है और न उसके द्वारा उत्कृष्ट सत्यके सिद्धकी ही आशा रहती है । सुतरां प्रत्यक्ष एवं आगममें इस न्यायका संचार नहीं हो सकता; क्योंकि किसी भी तर्कान्तर या प्रमाणान्तरसे निर्दोष प्रत्यक्षागमका बोध नहीं होता । इस तरह जब विचार या तर्कके स्वजातीय, विजातीय प्रमाणोंमें ही खण्डन - मण्डन, साधन-बाधनकी परम्परा नहीं चलती, तब भौतिक विषयोंमें द्वन्द्वमान सिद्धान्तरूपसे कैसे लागू होगा? परिमाणका गुणमें परिवर्तन तथा गुणका परिमाणमें परिवर्तनका नियम अवश्य कहीं उपलब्ध हो सकता है, परंतु यह नियम अव्यभिचरित नहीं है । मृत्तिकासे घट, तन्तुसे पट बनता है; प्रकृतिमें जलानयन, अंगप्रावरण, शीतापनयनका सामर्थ्य नहीं होता, परंतु कार्योंमें यह सब होता है । यहाँ मूलकारणसे भिन्न किसी भी वस्तु - अन्तरका प्रवेश नहीं है, फिर भी कारणसे कार्यकी भिन्नता नहीं होती । जैसे शिविकावाहक प्रत्येक रूपसे मार्गदर्शनादि कार्य करते हैं, किंतु मिलकर शिविकावहन कार्य करते हैं । इसी तरह तन्तु आदि जो कार्य नहीं कर पाते, वह कार्य तन्तुनिर्मित पटादि कर सकते हैं । इसी तरह वेदान्तरीतिसे शब्दगुणवाले आकाशसे उत्पन्न वायुमें शब्द, स्पर्श दो गुण हो जाते हैं । फिर वायुसे उत्पन्न तेजमें शब्द, स्पर्श, रूप तीन गुण हो जाते हैं । तेजसे उत्पन्न जलमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस चार गुण हो जाते हैं । जलसे उत्पन्न पृथ्वीमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध पाँच गुण होते हैं । पृथ्वी जलमें, जल तेजमें जब लीन हो जाता है, तब गुणोंकी कमी होती जाती है । परमकारण स्वप्रकाश ब्रह्म चेतन सर्वथा निर्गुण एवं निर्विशेष माना जाता है । कार्यकी ओर