मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 671–680

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 671–680

पृष्ठ 671

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- मार्क्स दर्शन ६६ ९ होता है, यह श्रुतियों एवं युक्तियोंसे सिद्ध है । यहाँ वाद - प्रतिवाद, समन्वय आदिका सिद्धान्त व्यभिचरित एवं अत्यल्पदेशीय ही सिद्ध होता है । पाश्चात्य वैज्ञानिक कहते हैं ' कि गणितशास्त्रके किसी अंक चिह्नको लीजिये ‘ + क ' । इसका प्रतिषेध है ' -क ' । यदि ' क ' से गुणाकर हम इसका प्रतिषेध करते तो इसका फल होता है ' क ' । प्रतिषेधके प्रतिषेधसे मूल अंक फिर लौट आया, लेकिन और ऊँचे स्तरपर अपने वर्गफलके रूपमें । इसमें कोई हानिकी बात नहीं है । यही नतीजा क और क के गुणासे भी प्राप्त होता है; क्योंकि ' क ' के वर्गमूलमें सदा दोनों अंक रहते हैं ' क ' और ' क' । संख्याणुगणितके द्वारा किसी गणितकी समस्याका हल तो इसका और भी अच्छा उदाहरण है । दो अंक चिह्न ' क ' और 'ख ' ले लीजिये । जिनके परिवर्तनका आपसी सम्बन्ध निर्धारित है । यानी किसी एकमें परिवर्तन हो तो दूसरेमें परिवर्तनका स्थिरीकरण उस उक्त सम्बन्धसे हम कर सकते हैं । यदि हम दोनोंका प्रतिषेध करें तो घटते घटते ये दोनों अंक नहींके बराबर हो जाते हैं । लेकिन उनका पूर्व सम्बन्ध ज्यों -का- त्यों बना रहता है । इसको अंकमें हम है के, योंअबरखइस सकतेप्रतिषेधकेहैं । संख्याणुसंख्याद्वारा जब''खक'' हमलेकिनउस यहसमस्याकोसम्बन्धहलबराबरकर लेते हैं, तो हम फिर मूल अंकपर उपनीत होते हैं । पूर्व प्रतिषेधका प्रतिषेध और समस्याका हल हो गया । ' उपर्युक्त उदाहरण भी वस्तुतः प्रतिषेधके प्रतिषेधका नहीं । धन-ऋणका बढ़ाव - घटावके रूपमें विरोध होनेसे यद्यपि धनका प्रतिषेध ऋणको कहा जा सकता है, ऋणके गुणनसे निकलनेवाले फलभूत वर्गफल संख्याको भी प्रतिषेधका प्रतिषेध कहा जा सकता है, परंतु केवल वह धनके रूपमें ही मूल संख्याके रूपमें है, वस्तुतः उसका रूप पृथक्- पृथक् है । जैसे अंकुर- कारणभूत यवका दाना और अंकुरका फलभूत यवके दाने पृथक् - पृथक् हैं । संख्याणुगणितका भी उदाहरण, इस सम्बन्धमें अनुकूल नहीं है । मूलका प्रतिषेध शून्यवत् ' क' अवश्य प्रतिषेधका प्रतिषेध है । उनके

पृष्ठ 672

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६७० मार्क्सवाद और रामराज्य निर्धारित परस्पर सम्बन्धके आधारपर उसके प्रतिषेधसे मूलपर पहुँचते हैं, परंतु यह अपेक्षा- बुद्धिकी ही कलाबाजी है । इसके प्रतिषेधके प्रतिषेधसे प्रतियोगी सत्त्व - व्यवस्थापन जैसी कोई चीज नहीं निकलती । एक अपेक्षा- बुद्धिसे वही वस्तु पहली या दूसरी, छोटी या बड़ी हो सकती है, परंतु वस्तुतः वह विरोधात्मक नहीं हो सकती । ऐतिहासिक द्वन्द्ववाद कहा जाता है कि ' इतिहासके लिये भी यही बात लागू है । सब सभ्य जातियोंका, जो एक निर्दिष्ट अवस्थाको पार कर चुकी हैं, आरम्भ भूमिके सामृद्धिक स्वामित्वसे होता है । कृषिके विकासके लिये एक स्तरपर भूमिका सामूहिक स्वामित्व उत्पादन-क्रियाके लिये बाधकस्वरूप बन जाता है । इसका अन्त किया जाता है, इसका प्रतिषेध होता है और कुछ बीचके स्तरोंको पारकर व्यक्तिगत सम्पत्तिमें रूपान्तरित हो जाता है, व्यक्तिगत सम्पत्तिसे ही कृषिका ऊँचे स्तरपर विकास होता है, लेकिन व्यक्तिगत सम्पत्ति ही आगे चलकर कृषि उत्पादनकी क्रियाके लिये बाधकस्वरूप हो जाती है । अब इसके प्रतिषेधकी और भूमिपर सामूहिक स्वामित्वकी माँग होने लगती है, लेकिन यह मूलरूपसे बहुत भिन्न होगा, जिसमें आधुनिक आविष्कारोंका पूरा उपयोग किया जा सकेगा । ' पर यह कहना भी संगत नहीं है । भूमिपर सामूहिक स्वामित्व ऐतिहासिक नहीं है । ईश्वर- निर्मित भूमि ईश्वरकी थी । बलिकी पत्नी विन्ध्यावलिने भगवान् वामनसे कहा था कि आपने क्रीड़ाके लिये ही जगत्की रचना की है, परंतु दुर्बुद्धि- लोग उसे अपना समझने लगते हैं । आप सर्वकर्ता हैं, आपहीद्वारा जीवोंमें भी कर्तृत्व सफल होता है, फिर बलि आदि आपको क्या दे सकते हैं- क्रीडार्थमात्मन इदं त्रिजगत् कृतं ते स्वाम्यं तु तत्र कुधियोऽपर ईश कुर्युः । कर्तुः प्रभोस्तव किमस्त आवहन्ति त्यक्तह्रियस्त्वदवरोपितकर्तृवादाः ॥ (श्रीमद्भा० ८ । २२ । २०)

पृष्ठ 673

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- मार्क्स दर्शन ६७१ ईश्वरके उत्तराधिकारी ब्रह्मा, इन्द्र, मनु आदि हुए । धर्म- नियन्त्रणकी स्थिति कमजोर पड़नेपर मात्स्यन्याय -निराकरणके लिये जनताने मनुको शासक बनाया । तदनन्तर विभिन्न व्यक्ति भी व्यष्टिभूमिके ही स्वामी हुए । प्राणियोंका कर्मद्वारा सृष्टिमें हाथ होता है, कर्मोंके अनुसार ही और भोग-साधन प्राप्त होते हैं । हिरण्यगर्भ, मन आदिको कर्मानुसार समष्टि- भोग-साधन मिलते हैं, सामान्य जीवोंको भी व्यष्टि- भोगसाधन कर्मोंके अनुरूप ही मिलते हैं । कोई वस्तु ईश्वर या प्रकृतिद्वारा निर्मित है, एतावता वह सबकी है - ऐसा नहीं कहा जा सकता । एक स्त्री भी प्रकृतिद्वारा निर्मित होती है, तो भी उसपर माता -पिताका ही स्वत्व होता है । पश्चात् उनके द्वारा दिया हुआ स्वत्व पति आदिको मिलता है या स्वयं वह जिसे स्वत्व समर्पण करती है, उसे मिलता है । जिस रूपमें भूमि, आकाशादिपर कभी सामूहिक स्वामित्व था, उस रूपमें आज भी है ही । भूमिपर सभी प्राणियोंको जीवित रहने, चलने-बैठने, श्वास लेने, अवकाश ग्रहण करनेका अधिकार सदा मिला, आज भी है, परंतु विशिष्टरूपसे भूमिका स्वामित्व भूमिपतिका ही है । भूमिपतिद्वारा दिया हुआ सीमित भूमिपतित्व अन्यलोगोंको भी प्राप्त हुआ । इसीलिये भूमिकर देनेकी प्रथा है । यह कोई भी व्यवस्था सर्वथा आगन्तुक एवं नवीन नहीं है । व्यक्तिगत सम्पत्तिसे ही कृषिका जैसे ऊँचे स्तरपर विकास हुआ, इसी प्रकार आगे भी व्यक्तिगत भूमिका अपहरण किये बिना उसका उच्चतम विकास हो सकता है । अमेरिका आदिमें भी वैसा ही विकास हो रहा है । बड़े कामोंके लिये सहकारिताके आधारपर सम्भूयोत्थान ( सम्मिलित कृषि, व्यापारादि) पहले भी होता था, यह अन्यत्र दिखाया गया है, वैसे ही अब भी हो रहा है, आगे भी हो सकेगा । अतः भूमि, सम्पत्ति आदिका अपहरण प्रतिषेधके प्रतिषेधका उदाहरण नहीं हो सकता है । उन्नत साधनोंसे फलमें उन्नति होती है । इस दृष्टिसे जब पहले या पीछे उन्नत साधन होते हैं, तब कृषि उन्नत होती है । आज भी जहाँ उन्नत साधन नहीं मिलते, वहाँ खेतीका वह निम्नरूप है । अनेक स्थानोंमें

पृष्ठ 674

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६७२ मार्क्सवाद और रामराज्य आज भी सामूहिक खेतियोंसे व्यक्तिगत खेतियाँ उच्चकोटिकी होती हैं । दूसरी दृष्टिसे अन्न, फल आदिकी उत्पत्ति और अच्छाई तथा मात्रा पहले बहुत अच्छी थी, अब कम अच्छी है । जिन खेतोंमें पहले बीस मन अन्न पैदा होता था, उनमें आज पाँच मन भी उत्पन्न नहीं होता । पशुओं, मनुष्योंकी भी जैसी बुद्धि, शक्ति, आकार, बल - पराक्रम हजारों वर्ष पहले था, उससे आज ह्रास ही है । मनुष्योंके पुराने अस्थिपंजर तथा प्राचीन तलवारों और भालोंके बृहत् आकार इसके साक्षी हैं । समाजवादी कहते हैं कि ' यह बात इतिहाससे सिद्ध है कि पारिवारिक और वैयक्तिक सम्पत्ति एकत्रित करनेके नियम चलनेसे पहले मनुष्य हजारों वर्षतक श्रेणी- भेदके बिना आदिम समष्टिवादकी अवस्थामें रहा है ', पर यह ऐतिहासिक तत्त्व आधुनिक लोगोंका स्वगोष्ठीनिष्ठ सिद्धान्तमात्र है । संसारके सबसे प्राचीन इतिहास महाभारत और रामायण हैं, जिनकी बहुत कुछ सत्यता मोहन-जो -दड़ो तथा हड़प्पाके भूगर्भसे मिली हुई वस्तुओंसे सिद्ध होती है । उन आर्ष इतिहासों एवं अपौरुषेय वेदादि शास्त्रोंसे सिद्ध है कि न केवल मनुष्योंमें ही, किंतु देवताओं, पशुओं, वृक्षोंमें भी ब्राह्मण आदि भेद सृष्टिकालसे ही है । अवश्य यह श्रेणी-भेद शोषक तथा शोषितके आधारपर नहीं हुआ, किंतु धर्म आधारपर ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि श्रेणी- भेद और उसके अनुसार ही श्रौत- स्मार्त धर्म एवं जीविकाओंके विधान हुए, ' न वै राज्यं न राजासीन्न च दण्डो न दाण्डिकः ' ( महा० शा० ५९ । १४ ) आदि पूर्वोक्त सर्वोत्कृष्ट धर्म - नियन्त्रणके युगमें भी धर्म तथा ब्राह्म आदि श्रेणियोंकी सत्ता थी ही । ' पुराकालमें सब ब्राह्मण ही थे, क्षत्रिय आदि न थे । स्त्रियाँ भी विवाहित न होती थीं, सम्पत्ति सामूहिक होती थी । ' आदि बातें भी अत्यन्त असंगत हैं । अनादि सृष्टि-संहारकी परम्परामें मूलभूत धर्मपरम्परा भी अनादि है । तन्मूलक वर्णाश्रम धर्म पातिव्रत्यादि- धर्म भी अनादि ही हैं । कभी भी उत्पत्ति-क्रममें कार्योत्पत्तिके पहले कारण ही रहता है, वायुकी उत्पत्तिके पहले आकाश था ही । क्रम- वर्णनमें क्षत्रिय आदि उत्पत्तिके पहले ब्राह्मण ही थे, विवाह होनेके पहले स्त्रियाँ आज भी अविवाहित

पृष्ठ 675

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- मार्क्स दर्शन ६७३ होती हैं । आज भी घट बननेके पहले मृत्तिका ही रहती है, परंतु इससे ब्राह्मणादि वर्णों तथा विवाहादि धर्मोकी अनादितामें कोई बाधा नहीं आती । अतएव इन सबोंका उत्पत्ति-क्रम- वर्णनमें ही तात्पर्य है । आकाशसे वायु, वायुसे तेज एवं तेजसे जल तथा जलसे पृथ्वीकी उत्पत्ति होती है । यह कहा जा सकता है कि पृथ्वी, जलके उत्पत्तिके पहले तेज ही था, तेजसे भी पहले वायु ही था, वायुसे भी पहले आकाश था और कुछ नहीं था । उसी तरह भगवान्‌की मुखशक्तिसे ब्राह्मणकी उत्पत्तिके पश्चात् बाहुकी शक्तिसे क्षत्रियकी उत्पत्ति हुई । तत्पश्चात् उदर या ऊरुसे वैश्य, पादसे शूद्रकी उत्पत्ति हुई । उत्पत्तिक्रममें पौर्वापर्य होता ही है, उसीमें अभावका व्यवहार होता है । जबकि अनादि वेदोंद्वारा ही प्रतिकल्पकी सृष्टि होती है और अनादि वर्णाश्रम धर्मका प्रतिपादन होता है । अनादि ही पातिव्रत धर्मका प्रतिपादन है, तब अमुक वर्ण या अमुक धर्म पहले नहीं था- इत्यादि कल्पनाएँ निराधार एवं अप्रमाणित हैं । जीव ईश्वरके समान ही धर्माधर्म भी अनादि हैं । तदनुसार ही तद्बोधक शास्त्र एवं तदनुयायी वर्णाश्रम धर्म भी अनादि हैं । ब्राह्म आदि विवाहोंसे सवर्णामें उत्पन्न ही ब्राह्मणादि वर्ण हैं, अतः विवाह आदि सभी अनादि हैं । श्वेतकेतु आदिकी कथाएँ गुणवादसे लक्ष्यार्थमें पर्यवसित हैं, वाच्यार्थमें नहीं । अर्थात् कुन्तीको देवताओंसे संतानोत्पादनमें प्रवृत्त करनेके लिये यह अर्थवाद है और अर्थवाद भी जहाँ प्रमाणान्तरसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादक होता है, वहाँ भूतार्थवाद न होकर गुणवाद ही होता है अर्थात् उसका वाच्यार्थमें कुछ भी तात्पर्य न होकर प्रशंसा या निन्दाद्वारा प्रवृत्ति या निवृत्तिमें ही तात्पर्य होता है । सिद्धान्ततः ह्रास-विकासका चक्र ही सिद्ध है । तदनुसार कभी ब्राह्मणोंकी बहुलता, कभी शूद्रोंकी बहुलता होती है, अर्थात् कभी ज्ञान- विज्ञानप्रधान मनुष्योंकी बहुलता होती है, कभी शिल्पादियथाकर्म - प्रधानकृतयुगेमनुष्योंकी-पूर्वमेकवर्णमभूत् किल । तथा कलियुगस्यान्ते शूद्रीभूताः प्रजास्तथा ॥ ( मत्स्यपुराण १४३ । ७८ ) 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_22_1_Front

पृष्ठ 676

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६७४ मार्क्सवाद और रामराज्य मार्क्सवादी कहते हैं कि ' दर्शनके क्षेत्रमें स्वयं द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद ही एक ऐसा उदाहरण है । पहलेके भौतिकवादका प्रतिषेध हुआ आदर्शवाद और इस आदर्शवादका प्रतिषेध हुआ फिर भौतिकवाद । लेकिन यह भौतिकवाद यान्त्रिक भौतिकवाद नहीं, बल्कि द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद है । दार्शनिक क्षेत्रमें एक और उदाहरण है, रूसोके समतावादका तथ्य । रूसोके अनुसार प्राकृतिक बर्बर युगमें सब मनुष्य समान थे । रूसो भाषाको भी इस प्राकृतिक अवस्थाका विकार मानता है, उसके अनुसार एक ही जातिके पशुओंके बीचकी समताको उन पशु- मनुष्योंके लिये भी लागू करना चाहिये, जिनको हैकलने एक आनुमानिक श्रेणीयुक्त किया है, आलालीमूक । लेकिन इन पशु-मनुष्योंको अन्य पशुओं की अपेक्षा एक सुविधा थी, उन्नतिकी शक्ति और यही असमताका कारण थी । इसलिये असमतामें भी रूसो उन्नतिका कारण देखता है । लेकिन यह उन्नति विरोधपूर्ण थी । यह साथ -ही- साथ अवनति भी थी । उन्नतिका मार्ग यही था कि मनुष्य व्यक्तिगतरूपसे पूर्णताकी ओर कदम बढ़ाता, लेकिन यही कदम मनुष्य-जातिके लिये अवनतिका भी कदम था । सभ्यताका हर एक कदम असमताकी ओर अग्रसर होता था । यह निर्विरोध सत्य है और वैधानिक नियमका मूल सत्य भी है कि लोग सरदारोंको चुनते हैं अपनी स्वतन्त्रताकी रक्षाके लिये, न कि उसका अन्त करनेके लिये । फिर भी ये सरदार अवश्य ही लोगोंको सतानेवाले बन जाते हैं और यहाँतक सताते हैं कि यह असमता चरम सीमापर पहुँचकर अपने विपरीत बन जाती है और समताका कारण बन जाती है; क्योंकि निरंकुश शासकके सामने सब समान हैं, सब शून्य हैं । लेकिन यह शासक तभीतक प्रभु है, जबतक वह जबरदस्त है और जब वह निकाला जाता है, तब जबरदस्तीकी शिकायत नहीं कर सकता । शक्ति ही उसकी प्रभुता बनाये रखती है । अन्तमें शक्तिसे ही उसका पतन होता है । सब प्राकृतिक और सही रास्तेपर ही चलते हैं । इस प्रकार असमता फिर एक बार समतामें रूपान्तरित हो जाती है । लेकिन यह मूक प्राथमिक मनुष्यकी प्राकृतिक समता नहीं है, यह समाजकी उन्नत समता है । सतानेवाले 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_22_1_Back

पृष्ठ 677

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- मार्क्स दर्शन ६७५ सताये - जानेवाले हो जाते हैं, प्रतिषेधका प्रतिषेध हो जाता है । ' उपर्युक्त कथन भी असंगत ही है; क्योंकि किसी भी शास्त्रार्थमें जब एक पक्षका खण्डन होता है, तब वह दूसरे प्रकारसे अपने खण्डित पक्षका समर्थन करता है । जैसे द्वैत-अद्वैत पक्षके ही शास्त्रार्थकी बात लीजिये । श्रीमध्वके द्वैतका खण्डन मधुसूदनने ' सिद्धान्तबिन्दु ' ग्रन्थके द्वारा किया । उसका खण्डन करके ' न्यायामृत ' द्वारा पुनः द्वैतका प्रतिष्ठापन हुआ । उसका खण्डन पुनः ' अद्वैतसिद्धि ' द्वारा हुआ । पुनश्च ' न्यायामृत- तरङ्गिणी ' द्वारा उसका प्रतिष्ठापन हुआ, पुनश्च ' गौड़ब्रह्मानन्दी ' द्वारा उसका खण्डन हुआ, ' न्यायभास्कर ' द्वारा पुनः प्रतिष्ठापन हुआ । ' न्यायेन्दुशेखर ' द्वारा पुनः खण्डन होनेपर पुनः प्रतिष्ठापनार्थ प्रयत्न हुआ, परंतु एतावता उनके पहलेके द्वैत और अद्वैतसे पिछले द्वैत- अद्वैतमें कोई भेद नहीं हुआ । इसी तरह जडवाद एवं भौतिकवादका भले ही सहस्रों बार खण्डन तथा मण्डन हो, तथापि वस्तुत्वमें कोई अन्तर नहीं पड़ता । ऐसे प्रतिषेधके प्रतिषेधको प्रतिप्रसव कहा जाता है । दर्शनशास्त्रोंमें सिद्धान्ततः भी इसके उदाहरण मिलते हैं । जैसे संन्यासका विधान, पुनश्च कलियुगके लिये निषेध, पुनश्च कलिमें भी वर्णविभाग वैदिकधर्म- प्रवृत्ति - पर्यन्त विधानद्वारा प्रतिषेधके प्रतिषेध होनेसे विधानका प्रतिप्रसव होता है । यह निर्दोष उदाहरण है । इसी प्रकार व्याकरणकी दृष्टिसे राम शब्दके प्रथमा या द्वितीयाके द्विवचनमें ' राम औ ' इस स्थितिमें ' वृद्धिरेचि ' से वृद्धि प्राप्त होती है । उसका बाधकर ' प्रथमयोः पूर्वसवर्णः ' से पूर्वसवर्ण दीर्घ प्राप्त होता है । पुनश्च ' नादिचि ' से उसका बाध होकर ' वृद्धिरेचि ' से वृद्धि हो जाती है । तब ' रामौ ' शब्द बनता है 1। भौतिकवाद एवं आदर्शवादके तत्त्वोंमें कोई भी अन्तर नहीं है । यह नहीं कहा जा सकता कि वस्तुतः पहले भौतिकवादका खण्डन हो गया था और अब वह पुनः सिद्ध ही हो गया है । रूसो, हैकेल आदिकोंके मन: कल्पित इतिहासकी अपेक्षा ऋषियोंके आर्ष इतिहासका महत्त्व कहीं अधिक है । तदनुसार सृष्टिकालके वसिष्ठ, अत्रि आदि उच्चकोटिके महामानव थे । उनके धर्म, योग, वेदान्त आदिके सिद्धान्त आजके सभ्य 698 Markasvad Aur Ramrajya_ Section_22_2_Front

पृष्ठ 678

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६७६ मार्क्सवाद और रामराज्य कहे जानेवाले नरपशुओंको दुर्विज्ञेय ही हैं । उनमें जो आध्यात्मिक समता थी, वह आज भी है ।

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥

(गीता ५।१८ ) सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधु च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते( गीता॥ ६।९ ) विद्वान् सदा ही सर्वत्र समब्रह्मका दर्शन करता है, यही समता है । शरीर -बुद्धि या कर्म अथवा उसके फलकी दृष्टिसे न कभी समता थी, न होनेवाली है । पशुतुल्य मनुष्य असंस्कृत मूक तभी होता है, जब उसका सद्गुरु-सम्बन्ध नहीं होता । आज भी यह बात स्पष्ट है । जहाँ शिक्षण है, वहाँ ज्ञान - विद्या विकसित होती है; जहाँ शिक्षण नहीं है, वहाँ विकास नहीं होता । ईश्वरने ब्रह्माको नियुक्त करके उसे नित्य वेदोंका उपदेश दिया— ' यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । ' (श्वेता० उप० ६ । १८ ) ब्रह्माने सनकादिको एवं मरीचि आदिकोंको उत्पन्न करके उन्हें वेदादि शास्त्रोंका उपदेश किया है । जिन मनुष्योंका प्रमादवश उक्त सम्पर्क टूट गया, वे ही पशुतुल्य हो गये हैं । हॉब्स, लाक, रूसो आदिकी कल्पनाएँ परस्पर भी टकराती हैं । हॉब्सके मतानुसार ‘ आदिम प्राणी समताकी स्थितिमें नहीं था, किंतु खूँखार था । ' लाकका ' आदिम मनुष्य बहुत नेक था ', रूसोका भी ऐसा ही था । सुकरातके अनुसार ' मनुष्य स्वभावसे ही सामाजिक प्राणी है ' इनके अनुबन्धीय राज्यको भी अन्य दार्शनिक अनैतिहासिक कहते हैं । हैकलका अनुमान केवल उसका दिमागी फितूर ही है । मनुष्यों एवं पशुओंके वैषम्यका कारण उनके जन्मान्तरीय कर्म मानने पड़ेंगे । निर्हेतुक शक्तिवैषम्यकी उपपत्ति हैकलके पास कुछ नहीं है । मनुष्योंमें भी कर्मतारतम्यसे ही 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_22_2_Back

पृष्ठ 679

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- मार्क्स दर्शन ६७७ उन्नतिकी शक्तिमें तारतम्य होता है और इसका भी अन्तिम उद्देश्य है, उस आध्यात्मिक स्तरपर समता स्थापित करना, जिससे अधिक उन्नति हो ही नहीं सकती । व्यक्तिगत उन्नतिकी ओर कदम बढ़ाना कभी भी अवनतिका कारण नहीं होता । व्यक्तिका समुदाय ही समाज है, व्यक्तिगत उन्नतिसे समाजकी उन्नति सुतरां सम्भव होती । उन्नति एवं सभ्यताका कोई भी कदम अवनतिका कदम नहीं है । क्या कोई विद्वान् बलवान् बनता है, एतावता किसीका नुकसान होता है? इतनी सहज- सी चीजको आधुनिक सभ्योंने कितने उल्टे रूपमें ग्रहण किया है? यदि किसी ऊँचे स्थानपर १०० मनुष्य चढ़नेके लिये अग्रसर होते हैं और यदि कुछ आलसियों, दीर्घसूत्रियोंको पीछे छोड़कर कुछ लोग आगे बढ़ते हैं तो स्पर्धासे दूसरे भी आगे बढ़नेके लिये दीर्घसूत्रता और आलस्य छोड़ेंगे ही । अतः आगे कदम बढ़ानेसे यदि विषमता होती है, तो यह भी उन्नत स्तरपर समताकी ओर ले जानेका ही प्रयत्न है । मुखिया, सरदार या राजाको सदा ही धर्मनियन्त्रित होना आवश्यक है । उच्छृंखल होना धर्महीनताका परिणाम है, सरदार या राजा होनेके कारण नहीं । धर्महीन राज्योंमें ही उच्छृंखल या निरंकुश शासक होते हैं; वेन, रावणादि इसके उदाहरण हैं । मनु, इक्ष्वाकु, नृग, नल, मान्धाता, राम, युधिष्ठिर आदि धर्मनियन्त्रित राजाओंमें निरंकुशताका लेश भी नहीं हो सकता था । समाजवादी ढंगकी समता उच्चकोटिकी होगी, यह उनके अपने घरकी ही कल्पना है । मुर्गों, कबूतरोंकी तरह साम्यवादी बन्धनमें मनुष्योंको सर्वथा परतन्त्र कर देना ही अगर समानता है, तो इससे कोई भी समझदार दूर ही रहना चाहेगा । यदि प्रकृति ही सबको सही रास्तेपर चलाती है, तब तो संसारमें प्रचलित शिक्षण- व्यवस्था एवं दण्डविधान पागलपन ही ठहरेगा और समाजवादियोंका भी प्रचार और उपदेश सब व्यर्थ ही सिद्ध होगा । अतः इसे प्रतिषेधके प्रतिषेधका उदाहरण समझना व्यर्थ है । प्रतिषेध कभी भी कारण नहीं हो सकता है । यदि प्रतिषेध ही कारण है, तब तो अवश्य

पृष्ठ 680

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६७८ मार्क्सवाद और रामराज्य ही मसलकर, जलाकर भी जौके दानेका प्रतिषेध होता ही है, फिर उससे अंकुरकी उत्पत्ति क्यों नहीं होती? यदि विशिष्ट प्रतिषेधसे अंकुरकी उत्पत्ति है, तो कहना पड़ेगा कि वह प्रतिषेध नहीं है, किंतु परिणामोपयोगी विकारमात्र है, प्रतिषेध या विनाश अभावात्मक ही है, विशेषता प्रतियोगीमें ही हो सकती है, अभावमें नहीं; क्योंकि कार्यके लिये विशिष्ट कारणका अन्वेषण होता है, प्रतिषेध या अभावका अन्वेषण नहीं होता । अतः प्रतिषेधसे या प्रतिषेधके प्रतिषेधसे किसी भी विशिष्टकार्यसिद्धिकी कल्पना व्यर्थ है । इसके अतिरिक्त प्रतिषेधका प्रतिषेध भावात्मक ही होता है । जैसे किसीको भ्रमवशात् रजतमें अरजत-बुद्धि होती है । तब वह कहता है कि ' नेदं रजतम्', पुनश्च जब उसका बोध होता है, तब उस प्रतिषेधका प्रतिषेध होता है—' इदं नारजतम्' । यह अरजत नहीं है, इसका फल होता है, रजतका व्यवस्थापन । प्रकृतिमें जिस बीजका प्रतिषेध होकर अंकुरकी उत्पत्ति होती है, उस अंकुरके प्रतिषेधसे भी उस बीजका पुनः व्यवस्थापन नहीं होता । अतः वस्तुतः यहाँपर प्रतिषेधका प्रतिषेध हुआ ही नहीं । अंकुरको प्रतिषेधका फल किसी तरहसे कहा भी जाय, परंतु वह प्रतिषेधरूप नहीं हो सकता और बीजको भी अंकुर प्रतिषेधका फल भले ही कहा जाय, परंतु अंकुरको प्रतिषेध अंकुर फल नहीं कहा जा सकता, अंकुरका कारणभूत बीज अन्य है, बीजसे अंकुरादि क्रमसे उत्पन्न फलरूप बीज उससे भिन्न होता है । पिता - पुत्रमें जैसे भेद होता है, वैसे ही प्रथम बीज एवं बीजजन्य फलभूत बीजोंमें भेद है । एक पिताके अनेक पुत्र होते हैं, वैसे ही एक बीजसे सैकड़ों फल उत्पन्न होते हैं । अतः यहाँ भी अन्तिम बीज प्रतिषेधका प्रतिषेध स्वरूप नहीं हो सकता । वस्तुतः प्रतिषेधके प्रतिषेधका व्यवहार वहीं होता है, जहाँ प्रतिषेधके प्रतिषेधसे प्रथम प्रतिषेधके प्रतियोगीका सत्त्व-व्यवस्थापन किया जाता है । जैसे रजतनिषेधका निषेध करके रजतके सत्त्वका व्यवस्थापन किया जाता है । कहा जाता है कि ' विचारजगत् और द्वन्द्वन्याय तर्कशास्त्रका साधारण नियम है, ' हाँ ' ' हाँ ' है और ' नहीं ' ' नहीं ' । इसके विपरीत द्वन्द्वमान कहता