मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 741–750
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 741–750
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- मार्क्स दर्शन ७३९ इस प्रकार उद्घाटन हो जाता है । करोड़ों बार दुहरानेसे मनुष्यके अभ्यास और अनुभव चेतनामें तर्क संकेतका रूप धारण कर लेते हैं । तथाकथित तर्कसंगत विचारके सार्वभौमरूपोंका ऐतिहासिक आधार यही है । ' वस्तुतः यह परिभाषा अन्योन्याश्रय- दोषसे युक्त है । ज्ञानका निश्चय होनेपर ही ज्ञान-सम्बन्धका निश्चय होगा और ज्ञान -सम्बन्ध निश्चय होनेसे ज्ञानका निश्चय होगा । साथ ही ज्ञान और चेतना- दोनों एक ही वस्तु हैं; फिर ' ज्ञान -सम्बन्धोंकी चेतना ज्ञान है, ' इसका यह अर्थ हुआ कि ज्ञान - सम्बन्धोंका ज्ञान ही ज्ञान है । इस तरह आत्माश्रय दोष भी है । जबतक ज्ञान नहीं विदित है, तबतक ज्ञान-सम्बन्धोंका भी ज्ञान कैसे होगा? इसी प्रकार ' वस्तुविषयक, आत्मविषयक तथा जीवधारी मनुष्यके रूप और बाहरी दुनियाके चेतनाको ज्ञान कहते हैं ', यह परिभाषा भी अपूर्ण है; क्योंकि ज्ञान और चेतना दोनों एक ही वस्तु हैं । फिर ' ज्ञानके लक्षणकी जिज्ञासा अमुक सम्बन्धकी चेतना ज्ञान है ' इतना कह देनेसे वह कैसे पूर्ण होगी? इसके अतिरिक्त सम्बन्ध-चेतना यदि ज्ञान है तो प्रश्न होगा कि वस्तु - चेतना ज्ञान है या नहीं? सम्बन्ध - चेतना ही वस्तुकी चेतना है, यह कहना भी असंगत है; क्योंकि सम्बन्ध सम्बन्धीसे भिन्न ही होता है । अतएव सम्बन्ध - सम्बन्धीका आधाराधेय भाव होता है । जैसे घट-ज्ञान पट-ज्ञानका लक्षण नहीं होता, उसी तरह वस्तु सम्बन्ध -ज्ञान वस्तु- ज्ञानका लक्षण नहीं हो सकता । इसी प्रकार बाहरी दुनियाके व्यापक और विशिष्ट तफसीलोंके बीचका सम्बन्ध भी ज्ञान नहीं कहा जा सकता । सम्बन्ध द्विष्ठ होता है; अर्थात् दो सम्बन्धियोंमें रहता है, जैसे संयोग । जिन दो वस्तुओंका संयोग होता है, उन दोनोंमें ही सम्बन्ध रहता है । ज्ञान आत्मामें ही रहता है । इसके अतिरिक्त सम्बन्ध स्वयं ही ज्ञेय पदार्थ है, उसका भी ज्ञान होता है, फिर वह स्वयं ही ज्ञान कैसे हो जायगा? इसी तरह ' दृष्टिभूत वस्तु तथा उसकी कल्पनाके बीचका सम्बन्ध जिसमें और जिसके द्वारा हम अस्तित्वका अनुभव करते हैं, वह ज्ञान है ', यह भी कहना गलत है; क्योंकि अनुभव भी तो ज्ञान ही है । चेतना, अनुभव, ज्ञान आदि 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_24_2_Front
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७४० मार्क्सवाद और रामराज्य पर्यायवाची शब्द हैं । उसी वस्तुका लक्षण करनेमें उसीका उपयोग होना अयुक्त है । ' अपने और बाहरी दुनियाके बीच समता और प्रभेद दोनोंका जिन दृष्टिभूत वस्तुओं और उनकी कल्पनाओंमें अनुभव करते हैं, वह ज्ञान है ', यह भी कहना अपर्याप्त है; क्योंकि दृष्टि और उनकी कल्पनाओंका भी अन्तर्भाव ज्ञानमें ही है । अतः जबतक ज्ञान या अनुभव या चेतनाका स्पष्ट लक्षण न हो जाय, तबतक इन वाक्याडम्बरोंसे काम नहीं चल सकता । इसी तरह ' मनन-क्रियाकी भीतरी दुनियामें विचित्र प्रकार एवं परिमाणकी समता और प्रभेदका मानचित्रमें चित्रित कर सकना और इन सबको सम अस्तित्व और अनुवर्तनक्रिया, प्रतिक्रिया, परस्परक्रिया और कार्य--कारणव -निर्भरताके उचित सम्बन्धोंमें सजाने तथा व्यवस्थित करनेका नाम ही ज्ञान है ', यह कथन भी शब्दाडम्बरको छोड़कर कुछ नहीं है । वस्तुतः कल्पना, मनन -क्रिया, चित्रण करना, सजाना आदि क्रिया कर्तृतन्त्र ही होती है, परंतु ज्ञान तो कृति और इच्छासे भी पहले होता है । इसीलिये 'जानाति, इच्छति, अथ करोति ' का व्यवहार होता है । अर्थात् कोई भी प्राणी जानता है, फिर इच्छा करता है, पुनश्च कर्म करता है । प्राणी जैसा संकल्प करता है, वैसी ही क्रिया करता है - यह पीछे कहा जा चुका है । कोई भी क्रिया चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक, कर्ताके परतन्त्र ही होती है । किंतु ज्ञान कर्ताकी इच्छापर निर्भर नहीं होता; प्रमाणक उपस्थितिमें कर्ताकी इच्छा न होनेपर भी ज्ञान होता है । दुर्गन्ध-ज्ञानको हम नहीं चाहते, तब भी निर्दोष घ्राणकी उपस्थितिमें दुर्गन्ध रहनेपर ज्ञान अनिवार्य ही है, यहाँ कर्ताकी स्वतन्त्रता नहीं होती है । मानस परिणाम होनेपर भी मनन-क्रिया, भावना एवं ज्ञानमें यही भेद रहता है । बाहरी दुनियाकी वास्तविकता और भीतरी दुनियाकी समता तथा भिन्नताका मनमें चित्रण करना ज्ञाता या प्रमाताका काम हो सकता है । इन सबका सम अस्तित्व और अनुवर्तनक्रिया, प्रतिक्रिया और कार्य - कारणके उचित सम्बन्धमें सजाने और व्यवस्थित करने आदिका काम भी प्रमाताका ही 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_24_2_Back
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- मार्क्स दर्शन ७४१ है, ज्ञानका नहीं । भौतिकवादियोंके यहाँ जीवित मनुष्य ही प्रमाता हो सकता है । देहसे भिन्न प्रमाता कोई आत्मा मार्क्सवादियोंको मान्य नहीं है । ज्ञान स्वयं-प्रकाश है । व्यवस्थापन करना, सजाना आदि ज्ञानका काम नहीं होता । प्रमाण भी अज्ञात ज्ञापक होता है, अकृतकारक नहीं । इसी तरह ' सम्बन्धकी चेतना ही ज्ञान है या वस्तु जगत्के अस्तित्वोंके बीचका तथा आत्मानुभूत अस्तित्वोंके बीचका सम्बन्ध एवं इन दोनों जगतोंके बीचके सम्बन्धोंके बीचकी चेतनाका नाम भी ज्ञान है ', यह भी कथन व्यर्थ है; क्योंकि वस्तुतः अस्तित्वका स्वतः सम्बन्ध नहीं होता । अस्तित्ववाली वस्तुओंका सम्बन्ध होता है और वे सम्बन्ध ज्ञेय एवं गुणविशेष होते हैं, चेतना या ज्ञान नहीं । इसी प्रकार आत्मा मार्क्सवादमें देह - भिन्न है ही नहीं । अनुभव-ज्ञानसे भिन्न कोई वस्तु नहीं होती, फिर आत्मानुभूत अस्तित्वोंका सम्बन्ध भी स्वयं अनुभव या ज्ञानस्वरूप नहीं हो सकता । विचार वस्तु-जगत्को ठीक- ठीक प्रतिफलित, प्रतिबिम्बित करता है, इसकी निश्चयता ही ज्ञान है । यहाँ भी वस्तुतः वस्तुका अन्तःकरणमें प्रतिफलन या प्रतिबिम्बन ही विचार या निश्चय कहलाता है । यहाँ भी निश्चय, ज्ञान, विचारादि समानार्थक हैं । यहाँ भी अन्योन्याश्रय आदि दोष उपस्थित होते हैं । भारतीय नैयायिकोंकी दृष्टिसे सर्वव्यवहारहेतु आत्मगुणको ही ज्ञान माना जाता है । सुस्पष्ट है कि संसारके सभी व्यवहार तथा व्यापार ज्ञानमूलक हैं । संसारमें अकामकी कोई भी क्रिया नहीं होती और सभी काम संकल्पमूलक ही होते हैं । वेदान्तकी दृष्टिसे काम, संकल्प, विचिकित्सा, श्रद्धा, अश्रद्धा, ह्री, धी, भय - ये सभी मनके धर्म हैं । नैयायिकोंके तथा वैशेषिकोंके अनुसार आत्ममन: संयोगसे उत्पन्न होनेवाले ये सब आत्माके ही गुण हैं । सामाजिक व्यवस्था कम्युनिष्ट यह मानते हैं कि ' मनुष्य जिस किसी भी अवस्थामें रहा हो, उसके समक्ष कुछ सिद्धान्त, नियम एवं आदर्श रहे हैं ' परंतु उनके
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७४२ मार्क्सवाद और रामराज्य मतानुसार ' समाजकी अवस्था बदलनेके साथ उनके सिद्धान्तों, नियमों एवं आदर्शोंमें भी परिवर्तन होता रहता है । ' उनकी इस मान्यताका मूल कारण यही है कि ' सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, विश्वस्रष्टा ईश्वर उनकी समझमें आता ही नहीं । ' अतएव सर्वदेश- कालके अनुसार निर्धारित शाश्वत सिद्धान्तों, सत्यों एवं नियमोंपर उनका विश्वास नहीं जमता । सबसे बड़ा दोष तो यह है कि ‘ वे परिस्थिति- परतन्त्र मनुष्योंकी परिस्थित्यनुसारिणी विचार- धाराओंको ही दर्शनोंका स्रोत मानते हैं, जो एक प्रामाणिककी दृष्टिमें अत्यन्त हेय एवं नगण्य है । ' वे कहते हैं कि ' विचारोंके जीवनकी बदलती हुई परिस्थितियाँ ही विभिन्न विचारधाराएँ उत्पन्न करती हैं । किसी विशिष्ट समयकी विशिष्ट परिस्थितियोंमें जीवनका विकास होनेसे विचारकोंके संस्कार एवं विचारधाराएँ एक विशिष्ट मार्गपर ढल जाती हैं । वे तदनुसार ही सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवनके उद्देश्य एवं आदर्श निश्चित करनेका प्रयत्न करते हैं ।' उनके मतानुसार ' सुकरात, अरस्तू, अफलातून आदि दार्शनिकोंने भी अपनी जीवनस्थितिके अनुसार ही अपने विचार व्यक्त किये । ' इन बातोंसे यह स्पष्ट है कि इन विचारकोंने प्रमाणके आधारपर तत्त्वकी दृष्टिसे किसी सत्यवस्तुका विचार नहीं किया । मार्क्सकी भी यही हालत थी, वह भी गरीबोंकी श्रेणीमें उत्पन्न हुआ था । अतः उसे भी अपनी परिस्थितिके अनुसार ही विचार करना पड़ा । इससे स्पष्ट है कि इन किन्हीं भी विचारोंका वस्तुस्थितिसे कोई सम्बन्ध नहीं । किंतु भारतीय दर्शनोंकी स्थिति ऐसी नहीं । यहाँ तत्त्वके सम्बन्धमें परिस्थितिका प्रभाव रोककर भी प्रमाणके बलसे काम लिया जाता है । प्रामाणिक निर्णय अमीर - गरीब, सुखी - दुखी, सम्पन्न-विपन्न, नौकर- मालिक- सबका एक- सा ही रहता है । आलोकसहकृत मन: संयुक्त निर्दोष चक्षुद्वारा सभी लोग रूपवान् पदार्थके सम्बन्धमें एकमत ही होंगे । उसी प्रकार निर्दोष श्रोत्रादिसे शब्दादि ज्ञान भी सबको एक -से ही होंगे । इस सम्बन्धमें परिस्थिति अकिंचित्कर ही रहेगी । इसीलिये शुक-जैसे महाविरक्त, वसिष्ठ-जैसे महान् श्रोत्रिय एवं राम-म-जैसे सम्राट् आदिकोंके धर्म, दर्शन आदिके
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- मार्क्स दर्शन ७४३ सम्बन्धमें एक ही ढंगके विचार थे । उनके तत्त्व-निर्णयपर परिस्थितियों या सम्पत्ति -विपत्ति आदिका कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता था । कम्युनिष्ट कहते हैं कि ' मनुष्य सर्वज्ञ परमेश्वर एवं शास्त्रोंके अनुसार होनेवाली सामाजिक व्यवस्थापर सन्तुष्ट नहीं होता । अपनी व्यवस्थामें उसे त्रुटियाँ मालूम पड़ती हैं; वह उनमें परिवर्तनकर फिर आगे बढ़ता है । पुनश्च उनमें आनेवाली रुकावटोंका अनुभवकर उसमें रद्दोबदल करता है । इस प्रकारके परिवर्तनोंसे ही विकास होता है । ' परंतु अल्पज्ञ मनुष्यकी बनायी हुई व्यवस्थासे कभी भी शान्तिकी आशा नहीं की जा सकती । मार्क्सवादी अपनी व्यवस्थाको ' अन्तिम व्यवस्था ' कहते हैं । मजदूरों - पूँजीपतियोंके संघर्षको ही वे संघर्षकी अन्तिम कड़ी कहते हैं, परंतु विकास-क्रममें इसे भी अन्तिम कैसे कहा जा सकता है? वस्तुतः जैसे समय - समयपर असत्य- अधर्मके विस्तारसे सत्य एवं धर्म भी कुछ समयके लिये दब जाता है, तथापि अन्तमें सत्य और धर्मकी ही विजय होती है, वैसे ही ईश्वरीय व्यवस्था भी जो सर्वज्ञद्वारा सर्वदेश- काल एवं सर्वहितकी दृष्टिसे निर्धारित की गयी है, कभी- कभी दब-सी जाती है । पर अन्तमें उसीकी विजय एवं स्थिरता रहती है । अल्पज्ञोंद्वारा निर्धारित व्यवस्था थोड़े ही दिनोंमें दोषपूर्ण प्रतीत होने लगती है । अतः उसमें परिवर्तन आवश्यक प्रतीत होता है । इस तरह कोई भी मनुष्य मार्क्सके समान ही अपनी व्यवस्थाको ही सर्वोत्कृष्ट एवं अन्तिम समझता है, परंतु उससे भी उत्तम योजना लेकर दूसरे भी सामने आ ही जाते हैं । कई तार्किक बड़े - बड़े प्रयत्नसे दिव्य तर्कोंद्वारा कोई व्यवस्था उपस्थित करते हैं, पुनश्च उससे भी अच्छा तर्क लेकर दूसरे महाशय सामने आ जाते हैं । यत्नेनानुमितोऽप्यर्थः कुशलैरनुमातृभिः । 11 अभियुक्ततरैरन्यैरन्यथैवोपपाद्यते (ब्रह्म० शां० भा० १ । १ । १ ) पर ईश्वरीय व्यवस्था हजारों नहीं लाखों वर्षोंसे सफल होती हुई चली आ रही है । संसारकी सभी सरकारोंने उसे मान्यता भी दी है । प्रायः
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७४४ मार्क्सवाद और रामराज्य सभी सरकारोंने व्यक्तियों एवं जातियोंकी धार्मिक स्वाधीनता एवं दायभाग आदिके सम्बन्धमें धार्मिक व्यवस्थाओंको स्वीकृत किया है । धर्म- नियन्त्रित मनुष्य सदा ही एक- दूसरेका पोषक रहा । उच्छृंखल होते ही उसमें ' मात्स्यन्याय ' फैलता और वह एक- दूसरेका शोषक बन जाता है । उसी अवस्थामें प्रबल दुर्बलका घातक बनता है; धनवान्, शक्तिमान् निर्धन एवं शक्तिहीनका शोषक या भक्षक बन जाता है । जीवरूपसे सब समान होते हुए भी एक जीव दूसरे जीवोंको अपने उपयोगमें लाता है । उसी तरह मनुष्यताके नाते सब समान होनेपर भी एकका दूसरेके उपयोगमें आना पहले भी और आज भी अनिवार्य ही है । अंगांगिभाव, शेष- शेषिभावको उपकार्योपकारकरूपसे आदरणीय बना लिया जा सकता है । जैसे बेगार पहले कुछ शूद्रोंसे ही ली जाती थी, आज श्रमदानके रूपमें वही बेगार बड़े - से - बड़े लोगोंसे भी ली जा रही है । पाप- पुण्य और शोषण मार्क्सवादी कहते हैं कि ' प्रबल मनुष्य दुर्बल मनुष्योंको अपनी गुलामीमें जकड़े रखनेके लिये ही अपनी शक्तियोंका प्रयोग करता था और तदर्थ ही उसने अनेक सिद्धान्त बनाये । बहुतोंने निर्बलोंको सन्तोषका पाठ पढ़ाया और साधन-सम्पन्नोंको भी दया, सहानुभूति एवं त्यागका उपदेश किया; इस जीवनमें एवं मृत्युके बाद दूसरे जीवनमें सुखादि लानेका विश्वास दिलाया । व्यक्तियोंको समझाया गया कि ' ये गुण व्यक्तिगत पूर्णताके लक्षण हैं और ऐहलौकिक- पारलौकिक सुखके साधक हैं । इन सभी उपदेशोंकी तहमें शान्ति एवं व्यवस्थाकी इच्छा और उद्देश्य ही मुख्य है । ' उनके मतानुसार ' इसी इच्छाने धर्मको जन्म दिया है । फिर भी समाजके भीतर आनेवाली असमानताके कारण असन्तोष एवं अशान्तिकी सम्भावना बनी ही रहती है । इसीलिये समाजहितैषियोंने सदा ही असमानता दूर करने और समानता लानेका प्रयत्न किया । सभी सन्तों एवं धर्मोंने समानताका गुण गाया है । ' उपर्युक्त कथनका सार यह है कि वस्तुतः धर्म, सन्तोष, दया, त्याग, सहानुभूति वास्तवमें कोई महत्त्वकी चीज नहीं । केवल शोषकोंके कुछ
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- मार्क्स दर्शन ७४५ पिट्टुओंने शोषितोंके आँसू पोंछने, उन्हें शान्त रखने, विद्रोह न करनेके लिये ही इन सबको गढ़ रखा है । चार्वाकोंने भी धर्मके सम्बन्धमें ऐसी ही उलटी सीधी कल्पना की है । वस्तुतः महात्मा, आप्तकाम, परम विरक्त महर्षियोंने परम सूक्ष्म ऋतम्भरादृष्टिसे अपौरुषेय वेदादिशास्त्रोंके आधारपर कर्मका निर्णय किया है । श्रीकृष्ण एवं शंकराचार्य-जैसे तार्किकों, दार्शनिकोंने जिसका पूर्णरूपसे समर्थन किया है, भौतिकवादियोंकी बहिर्मुख दृष्टिमें वह समझमें न आये, तो क्या आश्चर्य? सृष्टिमें ही सत्त्व, रज, तम तीनों गुणोंका क्रमेण अभिभव-उद्भव होता रहता है । फलस्वरूप दैवी, आसुरी शक्तियाँ देश विदेशमें समय- समयपर उद्भूत होती रहीं । दैवी शक्तिके लोग आत्मा, ईश्वर, शास्त्र तथा धर्म लेकर चलते थे और दूसरे उसके विरुद्ध । हिरण्यकशिपुने भी जैसी विधिकी व्यवस्था थी, उससे विपरीत व्यवस्था बनानेकी प्रतिज्ञा की । ' अन्यथेदं विधास्येऽहमयथापूर्वमोजसा ॥ ' जर्मनीमें हीगेल, एडवर्ड आदि विचारकोंने भी इस सम्बन्धमें अपना मत व्यक्त किया है । समाज – विकासकी कुंजी ' सोशलिज्म ' का अर्थ है ' समाजवाद' और साम्यवादका अर्थ है समाजमें समानता लाना । समाजवादका अभिप्राय यह है कि ' समाज ही उत्पादन -साधनोंका स्वामी हो । व्यक्तिके स्थानपर समाजका शासन होना ही समाजवाद है । ' फ्रांसके सेंट साइमन और इंग्लैण्डके राबर्ट्स ओबेनने (जिनका जन्म क्रमशः १७६० और १७७१ में हुआ था ) पहले - पहल साम्यवादी विचारधारा फैलायी । उनके विचार थे कि ' सरकारकी बागडोर महात्माओं एवं वैज्ञानिकोंके हाथमें होनी चाहिये । ' मार्क्सवादी कहते हैं कि ' चूँकि ये विचार धार्मिक भावनाके थे, इसलिये वे लोग वास्तविकतासे परिचित न हो सके । ' फ्रांसके लुई ब्लां (जिसका जन्म सन् १८११ में हुआ था ) ने आधुनिक समाजवादका रूप व्यक्त किया और मजदूरोंके हाथमें राजनैतिक सत्ता देना आवश्यक समझा । फिर भी मार्क्सवादी अपने समाजवादको उन सबसे विलक्षण कहते हैं । एंजिल्सका कहना है कि ' समाजवाद शब्दका प्रयोग अनेक बेसिर- पैरकी हवाई आयोजनाओंके
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७४६ मार्क्सवाद और रामराज्य लिये हुआ है । परोपकारकी भावनाओंद्वारा मजदूरोंकी अवस्था सुधारनेके ऐसे सैकड़ों प्रयत्नोंसे भी इस शब्दका सम्बन्ध रहा है, जो एक तरफ मजदूरोंके कल्याणकी फिक्र करते हैं और दूसरी ओर पूँजी तथा उसके मुनाफेको भी सुरक्षित रखना चाहते हैं । ' इसीलिये ' कम्युनिष्ट मैनीफेस्टो ' का ' समाजवादी मैनीफेस्टो ' नाम नहीं रखा गया । फ्रांसके प्रौधोंने भी कहा कि ' मजदूरोंके साधनहीन होनेसे उन्हें अपने परिश्रमका पूरा फल नहीं मिलता । साधनोंसे मालिक बिना परिश्रम किये ही मजदूरोंके परिश्रमका फल हथिया लेता है । ' अतः प्रौधोंने ' समाजको सब सम्पत्तिका मालिक ' होना ठीक समझा । इनमेंसे अनेकोंने स्त्री - पुरुषोंके सामाजिक बन्धनोंको भी अनावश्यक समझा । फलतः इनके बहुत अनुयायी आचारहीन भी हो गये । जिसका समाजपर बुरा असर पड़ा । मार्क्सकी मुख्य विशेषता यह बतायी जा सकती है कि ' उसने मनुष्य - समाजके इतिहासकी घटनाओंको कार्य - कारणकी श्रृंखलामें जोड़ दिया । प्रकृतिके समान ही मनुष्य- समाजके विकास एवं परिवर्तनके नियम हैं । समाजका रूप और संघटन किसी बाह्यशक्तिसे नहीं, बल्कि स्वयं मनुष्य - समाजके विचारों, निश्चयों और कार्योंसे होता है । आगे भी समाजका रूप आवश्यकतानुसार बदला जा सकता है । पूँजीवादी प्रणाली अपने विकाससे समाजमें इस प्रकारकी स्थिति उत्पन्न कर देती है कि उसका आगे बढ़ना असम्भव हो जाता है और पूँजीवादी समाजको विनाशकी ओर बढ़ाता है, अतः श्रेणी - संघर्षके द्वारा समाजवाद विकसित होता है । ' रामराज्यवादीका इसपर कहना है कि जड प्रकृतिमें समीक्ष्यकारिता नहीं बन सकती । कोई समीक्ष्यकारी व्यक्ति या समूह आक्रमणकारी या आक्रमणका सामना करनेके लिये परस्परविचारसे निश्चित कार्यक्रम बनाता है । अमुक अश्वारोही, अमुक गजारोही, अमुक रथारोही, अमुक वायुयानारोही होकर तलवार, भाला, बर्छा, बन्दूक, तोप, विस्फोटक तथा अंगार ( बम्ब ) आदि लेकर आक्रमण या मुकाबला करेगा । अवसर आनेपर वह पूर्वसंकेतानुसार वैसा ही करता है । पर अचेतन प्रकृति या
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- मार्क्स दर्शन ७४७ उसके जडकार्यमें या घटनाओंमें समीक्ष्यकारिता सर्वथा असम्भव है । अतएव प्रकृति या प्रकृति-कार्य किसीमें भी स्वतन्त्ररूपसे नियमित प्रवृत्ति नहीं हो सकती । निरीश्वरवादी सांख्योंमें भी ' नद्याः कूलं पिपतिषति ' (नदीका किनारा गिरना चाहता है ) के समान प्रकृतिके विचार या ईक्षणको गौण या औपचारिक ही माना है । नदीका किनारा जड है, उसमें गिरनेकी इच्छा नहीं हो सकती; किंतु आसन्न पतन अर्थात् शीघ्र गिरना देखकर इस प्रकारका वाक्य प्रयोग किया जाता है । जैसे अचेतन रथादिकी प्रवृत्ति चेतन सारथ्यादिद्वारा अधिष्ठित होनेसे ही होती है, वैसे ही अचेतन प्रकृति या उसके कार्य जड- वर्गकी प्रवृत्ति भी चेतन-नियन्त्रित ही होती है । घटनाएँ उसी अचेतनकी हलचलमात्र हैं । वे स्वयं भी जड हैं । उनके नियम या कार्यकारणभाव - कुछ भी स्वतन्त्र नहीं हो सकते । मीमांसकोंका अचेतन कर्म भी ईश्वराधिष्ठित होकर ही फल देता है, उनके कार्यकारणभाव भी ईश्वरनियन्त्रित ही हैं - ' ईक्षतेर्नाशब्दम्' (ब्रह्मसूत्र १ । १ । ५) शांकरभाष्य आदिमें यह विषय विस्तारसे वर्णित है । अचेतन यन्त्रोंकी नियमित प्रवृत्तिके मूलमें भी किसी चेतनको ही अनिवार्यरूपसे सबका नियामक मानना पड़ता है । किसी -किसी घटनाका परस्पर कार्य- कारणभाव होता है, यह कोई मार्क्सकी नयी बात नहीं है । दण्ड, चक्र, चीवर, कुलालादिके व्यापारकी घटना घटनिर्माण ( घटना ) -का कारण है । तन्तु, तूरी, वेमा, तन्तुवायादिकी हलचलें पटनिर्माणका कारण हैं । संग्रामसे धन, जन, शक्तिका अपक्षय होता है । उससे किसीकी हानि और अन्तमें किसीको लाभ भी होता है- यह कार्य - कारणभाव मान्य ही है । सब घटनाओंका कार्य-कारणभाव सर्वथा ही असंगत है । यदि सभी घटनाओंका परस्पर कार्य--कारणभाव हो तो कार्यकारणभावकी कल्पना ही समाप्त हो जाती है । किसीका कोई कारण होकर अन्यका अकारण हो, तभी कार्य - कारण- भावकी विशेषता होती है । कुलालका पिता भी यद्यपि कुलालजननद्वारा घटका कारण कहा जा सकता है तथा बाणनिर्माता भी किसीके वधमें परम्परया कारण हो सकता है, परंतु तार्किकोंने ऐसे कारणोंको ' अन्यथासिद्ध ' कहा है । अन्यथा-सिद्धिशून्य
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७४८ मार्क्सवाद और रामराज्य कार्याव्यवहित पूर्वक्षणवर्तीको ही कारण कहा जाता है । कालान्तरभावी स्वर्गादिके प्रति अग्निहोत्रादि पूर्वक्षणवर्ती नहीं हो सकता । अतः बीचमें अपूर्व ( अदृष्टरूप ) व्यापार मानकर उसके द्वारा कार्य -कारणभाव निश्चित होता है । ‘ तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकत्व' ही व्यापार है । अग्निहोत्रादिजन्य होकर अग्निहोत्रादिजन्य स्वर्गका जनक अदृष्ट है ।, -, काकके बैठने तालके गिरनेमें यद्यपि कार्य-कारणभावव प्रतीत होता है तथापि ' काकतालीयन्याय' का अकार्यकारणभाव स्पष्ट ही है । इसके अतिरिक्त ' इति - ह - आस ' ( इतिहास ) ऐसा हुआ- इस ऐतिह्यको ही इतिहास कहते हैं । ' वटे यक्षः ' यह प्रसिद्धि इतिहास नहीं है । अन्धपरम्पराकी प्रसिद्धि अप्रमाण और आप्तपरम्पराकी प्रसिद्धि प्रमाण होती है । इसीलिये अतीत घटनाओंके सम्बन्धमें वचन या लेख ही प्रमाण होते हैं । कुछ अंशोंमें अनुमान भी सहायक होते हैं । करोड़ों वर्षोंकी अगणित घटनाओंका उल्लेख हो ही नहीं सकता । यदि एक-एक वर्षकी घटनाओंका एक-एक पन्नेमें भी संकलन करें तो भी करोड़ों पन्नोंका इतिहास होगा । उसे कौन कितने दिनमें पढ़ेगा, फिर कब निष्कर्ष निकालेगा? सम्पूर्ण घटनाओंका ज्ञान न होनेसे अधूरी घटनाके अधूरे ज्ञानसे निकाला हुआ निष्कर्ष भी अधूरा ही होगा । फिर घटनाओंकी सच्चाई जाननेमें भी पर्याप्त भ्रम रहता है, आँखों -देखी घटनाओंके सम्बन्धमें विभिन्न संवाददाताओं, समाचार एजेंसियोंमें पर्याप्त मतभेद रहता है । समाचारपत्रों एवं सम्पादकीय लेखोंमें जाते -जाते एक ही घटनाका रूप सैकड़ों ढंगका बन जाता है । इसीलिये पुरानी घटनाओंका पढ़ना- लिखना गड़े मुर्दोंके उखाड़ने जैसा ही व्यर्थ होता है । म्यूनिसिपलबोर्डोंमें मनुष्योंके ही जनमने- मरनेका लेखा-जोखा होता है, मच्छरों -मक्खियोंके जीने - मरनेका लेखा-जोखा नहीं रहता; क्योंकि उनका कोई महत्त्व नहीं होता । वैसे ही प्रतिवर्ष इतिहासमें मुख्य- मुख्य व्यक्तियों एवं घटनाओंका ही उल्लेख होता है, लाखों ही नहीं, करोड़ों व्यक्तियों एवं घटनाओंका उल्लेख छोड़ दिया जाता है; क्योंकि लेखक उनका महत्त्व नहीं मानता,