मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 761–770
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 761–770
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- मार्क्स दर्शन ७५९ वस्तुतः ईमानदारीकी बात यही है कि मार्क्सवादी, ईश्वरवादी दोनोंका समन्वय हो नहीं सकता । अन्ततः जो ईश्वरवादी हैं, उन्हें मार्क्सवाद छोड़ना ही पड़ेगा । मार्क्सकी अर्थनीति ईश्वर एवं धर्मके रहते-रहते चल ही नहीं सकती । ईश्वरवादी मार्क्सवादी बनकर या तो मार्क्सवादियोंको धोखा देते हैं या अपनेको धोखा देते हैं । जब भौतिक सूक्ष्म वस्तुओंके ज्ञानमें अणुवीक्षण आदि अनेक साधन अपेक्षित होते हैं, तब परमाणु एवं आकाशसे भी परम सूक्ष्म अहं महान् अव्यक्त एवं इन सबसे परम सूक्ष्म स्वप्रकाश सत्स्वरूप परमेश्वर बिना साधनोंके कैसे बुद्ध्यारूढ़ हो सकता है । स्वधर्मानुष्ठानद्वारा शुद्धान्त: करण प्राणी विवेक, वैराग्य, शान्ति, दान्ति, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा-समाधान एवं मुमुक्षुत्व आदिसे युक्त होकर उपनिषद्, गीता, ब्रह्मसूत्रका विचार करनेसे परमेश्वरको समझ सकता है । शंकराचार्य- उदयनाचार्यके तर्कोंको सुनकर कोई समझदार पुरुष नहीं कह सकता कि ईश्वर भीरु मस्तिष्ककी कल्पना है या अन्धविश्वासकी चीज है । अभय सत्त्वशुद्धि ज्ञानयोगव्यवस्थितिपूर्ण तर्क एवं योगाभ्यासजनित एकाग्रता आदि जिसके समझनेके साधन हैं, उसे अन्धविश्वासकी बात समझना बड़ी भयंकर मूर्खता है । भूत-प्रेतकी कल्पनाने ही परिष्कृत होकर निर्गुण ब्रह्मकल्पनाका रूप ले लिया, यह कथन भी अनभिज्ञतामूलक है, लाखों बरस पहलेसे ही सबकी मान्यता साथ- साथ चली आ रही है । तामस प्राणियोंके लिये भूत -प्रेत, सात्त्विकोंके लिये देवी- देवता एवं सर्वोच्च अधिकारीके लिये सगुण परमेश्वर एवं साक्षात्कार सम्पन्न अत्यन्त अन्तर्मुखके लिये निर्गुणब्रह्मका उपदेश है । तत्त्वविद् भी व्यावहारिक दृष्टिसे सबका सम्मान करता है । कर्मकाण्ड, देवता आदिकी व्यावहारिक सत्ता तत्त्ववित्को ही नहीं, अपितु सर्वज्ञशिरोमणि ईश्वरको भी मान्य है । उत्पत्तिके साधन और न्याय मार्क्सवादी कहते हैं कि ' न्याय भी सदा एक- सा नहीं रहता; किंतु उसमें रद्दोबदल होता रहता है । जैसे प्राचीन भारतमें शूद्रोंका विद्या पढ़ना अन्याय और एक पुरुषको दो पत्नियाँ रखना न्याय था । विधवाका सती
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७६० मार्क्सवाद और रामराज्य होना महापुण्य था, परंतु आज वह अपराध है । न्याय क्या है, इसका निर्णय रहता है उन लोगोंके फैसलेपर, जिनके हाथमें शक्ति रहती है । जिस श्रेणीके हाथमें पैदावारके साधन होते हैं, वही न्याय- अन्यायका निर्णय करती है । जिससे उनके हितोंकी रक्षा हो, उनके हाथमें शक्ति बनी रहे, उसी ढंगके तरीकोंको वे न्याय कहा करते हैं । पूँजीवादी समाजमें जिस तरह पूँजीपतिके कब्जेमें पूँजी बनी रहे, वही न्याय है । वे व्यक्तिकी पूँजी छीननेको महापाप बतलाते हैं । समाजमें मुनाफा कमाकर पूँजी बढ़ानेके अधिकारको न्याय कहते हैं । कम मूल्यमें सौदा खरीदकर अधिक दाममें बेचने, सौ रुपयेका काम कराकर नौकरको पचास रुपया देनेको भी न्याय कहते हैं । रूस इन सब बातोंको अन्याय समझता है । पूँजीवादी देशोंमें पूँजीपतिके हितकी बात न्याय है और रूसमें मजदूरोंके हितकी बात न्याय है । ' वस्तुतः ऐसी ही भ्रान्त धारणाओंके कारण भौतिकवादी अपने विरोधियोंको कुचलनेके लिये अमानवताका व्यवहार करते हैं और उसे भी न्याय समझते हैं । समाजके नामपर व्यक्तियोंकी भूमि- सम्पत्ति छीनकर विचार- स्वातन्त्र्यपर प्रतिबन्ध लगाकर व्यक्तियोंके शरीर, वाणी एवं मस्तिष्कपर ताला लगा देने -जैसे बुरे से बुरे पापको अपनी हित रक्षाका साधन समझकर उसे न्याय कहते हैं । भारतमें विद्या, ज्ञान, जानकारीपर कभी भी प्रतिबन्ध नहीं था । विदुर, धर्मव्याध, मूक आदि शूद्र एवं अन्त्यज भी परम ज्ञानवान् थे और समाजमें आदरणीय थे । बड़े - बड़े ब्राह्मण, ऋषि- महर्षि भी धर्मव्याधके पास धार्मिक परामर्शके लिये जाते थे । जिन वेदादि ग्रन्थोंका विधिपूर्वक अध्ययन पुण्यविशेषकी दृष्टिसे जिन वर्णोंके लिये विहित है, उनका अध्ययन उन्हींके लिये आज भी है, तब भी था । जो वेदादि शास्त्रके अनुसार अदृष्ट अर्थमें विश्वास रखते हैं, वे तदनुसारी नियम प्रसन्नतासे ही मानते हैं । यहाँ किसी श्रेणीके स्वार्थका प्रश्न ही नहीं उठता । जो वेदोंको किसी दूसरी श्रेणीके स्वार्थकी चीज समझते हैं, वे पुण्यकी दृष्टिसे उनका अध्ययन करना ही क्यों चाहेंगे? फिर उनके लिये निषेधका प्रश्न ही क्यों उठेगा? जो विधिपूर्वक
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- मार्क्स दर्शन ७६१ वेदाध्ययनसे जिस आधारपर किसीके लिये पुण्य मानेगा, उसी आधारपर किसीके लिये उसे पाप भी मानना ही पड़ेगा । आजकल मूर्तिपूजाके सम्बन्धमें भी यही बात । पाषाणादि मूर्तिमें देवताका अस्तित्व माननेपर ही मूर्तिपूजाका प्रश्न उठता है । जो मूर्तिमें देवताकी सत्ता नहीं मानता, उसके लिये मूर्तिपूजाका प्रसंग ही नहीं आता । प्रत्यक्षानुमानादिके आधारपर मूर्तिमें देवता सिद्ध हो, तब तो कम्युनिष्ट भी अवश्य ही मूर्तिपूजक बन जायँगे । अतः कहना होगा कि प्रत्यक्षानुमानसे मूर्तिमें देवताका अस्तित्व एवं उसकी पूजासे लाभ सिद्ध नहीं होता । केवल शास्त्रप्रमाण माननेसे ही मूर्तिमें प्रतिष्ठाविधिके द्वारा देवताका आवाहन -प्रतिष्ठापन होता है, तभी उसकी पूजासे पुण्यकी बात उठती है । फलतः मूर्तिप्रतिष्ठा पूजादिविधायक शास्त्रोंमें विश्वास रखनेवाला जब मूर्तिपूजामें प्रवृत्त होगा तो उसे उस शास्त्रकी अन्य बातें भी माननी पड़ेंगी । यदि शास्त्रोंके अनुसार ही मन्दिरस्थ प्रतिष्ठित मूर्तिमें और म्यूजियममें रहनेवाली मूर्तियों तथा आपणस्थ ( बाजारमें बिकनेवाली ) मूर्तियोंमें विशेषता सिद्ध होती है, तो उन्हीं शास्त्रोंके अनुसार यह भी मानना होगा कि अमुक- अमुक हेतुओंसे मूर्तिसे देवत्व नष्ट हो जाता है और अमुकको मूर्तिपूजासे कुछ लाभ न होगा, किंतु उलटा नुकसान होगा । यह सब बातें भी उन्हीं शास्त्रोंसे माननी पड़ेंगी । शास्त्रोंकी दृष्टिसे न्याय- अन्यायका निर्णय किसी श्रेणीके हित या अहितकी दृष्टिसे नहीं होता । ब्राह्मणको राजसूय करना अधर्म कहा गया है, क्षत्रियके लिये वही धर्म है । वैश्यके लिये वाजपेय करना अधर्म कहा गया है, वही ब्राह्मणके लिये धर्म है । इसी तरह वैश्यस्तोम, निषादस्थपति इष्टि वैश्य एवं शूद्रविशेषके लिये धर्म है, अन्यके लिये अधर्म । यहाँ उन अनुष्ठाताओंके हिताहितकी दृष्टिसे धर्माधर्मका निर्णय किया गया है, शासक या धनवान् श्रेणीकी दृष्टिसे नहीं । औषध -विशेषके सेवनका विधि- निषेध रोगियोंके हिताहितसे सम्बन्ध रखता है, शासक- शासित श्रेणियोंसे नहीं । किसी अवस्थामें किसी रोगीको किसी औषधसे लाभ हो सकता है और किसी औषधसे हानि । उसी
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७६२ मार्क्सवाद और रामराज्य दृष्टिसे विधि- निषेध होता है । हर जगह श्रेणी-स्वार्थकी बात जोड़ना कलुषित मनोवृत्तिका ही परिचायक है । इसी तरह अवस्था-विशेषमें दो पत्नीका होना तब भी धर्म था और अब भी धर्म है । अवस्था - विशेषमें वही तब भी अधर्म था और अब भी अधर्म है । यदि सन्तानके लिये, पिण्ड - श्राद्धके लिये, अपने पूर्वजोंका नाम चलानेके लिये, पूर्व पत्नीकी सम्मतिसे ही दूसरा विवाह किया जाय तो इसमें अन्याय-जैसी कोई बात नहीं । कोई विधवा सती न होकर वैधव्य- धर्म पालन करे, तब भी उसकी सद्गति शास्त्रसम्मत है । वह धर्म उसपर लादा नहीं जाता, उसकी इच्छापर निर्भर है । यहाँ उसीके हिताहितका सम्बन्ध है, अन्यका स्वार्थ नहीं । अथ च विधवाका सती होना तब भी धर्म था और अब भी धर्म है । कानून बन जानेमात्रसे धर्म - अधर्ममें भेद नहीं पड़ता । ईश्वरीय धर्माधर्ममें सरकारें रद्दोबदल, हस्तक्षेप करनेमें सर्वथा असमर्थ हैं; क्योंकि धर्माधर्मका वास्तविक फल देना सरकारोंके हाथकी बात ही नहीं है । इसी तरह रूसी कानूनसे व्यक्तिगत सम्पत्ति छीनना भी धर्म नहीं हो सकता । वस्तुतः जो कानून स्वार्थकी दृष्टिसे बनाये जाते हैं, कोई भी तटस्थ विवेचक उन कानूनोंको न्याय नहीं कह सकता । न्याय स्व- पर- पक्षपातविहीन होता है, जिसके आधारपर रामचन्द्रने एक विद्वान् बलवान् धनवान् ब्राह्मण एवं नगण्य श्वानके विवादमें अपराधी ब्राह्मणको ही दण्ड दिया था । धोबीके मुकाबले सीतातकको वनवास दिया था । शाहजहाँने हकीकतरायके मृत्युदण्डके बदलेमें काजीको भीषण दण्ड दिया, जो उसकी ही श्रेणीका था । सगरने अपने पुत्र असमंजसको देशबहिष्कृत कर दिया था । अपराधी पुत्रको भी दण्ड देना, निरपराध शत्रुको भी दण्ड न देना ही न्याय कहलाता है । विश्वासघात, मित्रद्रोह, चोरी, व्यभिचार, परपीड़न आदि अधर्म- अन्याय हैं । इसी प्रकार औचित्य- अनौचित्य, सत्य एवं सिद्धान्तोंके सम्बन्ध भी मार्क्सवादी कहते हैं कि ' ये कोई भी स्थिर नहीं होते । ' पर यदि सर्वसम्मत प्रमाण, न्याय, औचित्य, सत्यको आधार न माना जाय तो फिर कोई सिद्धान्त स्थिर करनेके लिये पुस्तकादि लिखनेका प्रयास भी मार्क्सने
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- मार्क्स दर्शन ७६३ क्यों किया? फिर तो उचित- अनुचित, प्रमाण- अप्रमाण, सत्तर्क - असत्तर्कसे कोई भी कुछ भी सिद्ध कर सकता है । फिर जब सभी सिद्धान्तों, सत्योंकी यही हालत है, तब मार्क्सद्वारा प्रचारित सिद्धान्तोंकी भी यही हालत होगी । मार्क्स और धर्म भौतिकवादियोंका कहना है कि ' सभ्य मनुष्यका विश्वास है कि आध्यात्मिक शक्ति सदा मंगलमय है, लेकिन असभ्य मनुष्यके लिये यह शक्ति निष्ठुर है, इसलिये सदा ही उसको विपत्तिमें डालती रहती है । पत्थर जब गिरकर आदमीको घायल करता है, अचानक पेड़की डाल टूट जाती है, तब यह सब प्रकारके भूतों या पेड़के भूतकी शैतानीको छोड़कर और क्या है? जबतक औजार - हथियारोंके ज्ञानकी वृद्धि नहीं हुई, तबतक असभ्य मनुष्य भूतोंको वशीभूत करनेके लिये मन्त्र-तन्त्रके ही फेरमें पड़ा रहा । हथियार - औजारोंके ज्ञान बढ़नेके साथ - साथ प्राकृतिक शक्तिपर मनुष्यकी प्रभुता बढ़ने लगी । ' भौतिक शक्ति निष्ठुर ही नहीं है, बल्कि यह भलाई भी कर सकती है ', जब इस धारणाका जन्म हुआ, तब असभ्य मनुष्यके प्रेततत्त्वपर सभ्यताकी मुहर पड़ी । प्रेत-तत्त्व असभ्य मनुष्यका है, देवता-तत्त्व इसके ऊपरकी सीढ़ी है - जो सभ्य मनुष्यका है । आदिम असभ्य मनुष्यके लिये प्रकृति निष्ठुर भयावह है । प्रकृति रहस्यका भेद जानकर सभ्य मनुष्य कहने लगा-' मंगलमयी विश्वजननी । ' यह परिवर्तन अकस्मात् एक दिनमें नहीं हो गया । आदिम भूत- प्रेतोंने सभ्य होकर यह रूप ग्रहण किया है । आदिम मनुष्यका प्रेत-तत्त्व सभ्यताकी सीढ़ीपर चढ़कर सूक्ष्म बन गया है । प्रकृति-जगत्को चलानेवाली है असंख्य निष्ठुर प्रेतोंकी शक्ति; और इसी प्राथमिक कल्पनाका संशोधितरूप है देवताओंकी कल्पना । ये सब देवता प्रकृति-जगत्के एक- एक हिस्सेके मालिक हैं । ये भलाई भी करते हैं और बुराई भी कर सकते हैं । जल, अग्नि, वायु- सभी प्राकृतिक शक्तियाँ किसी-न-किसी देवताके अधीन हैं । देव- समाज भी मनुष्यसमाजके साँचेपर ढला हुआ है । ये असंख्य देवता घटते घटते एक ईश्वरतक पहुँचे ।
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७६४ मार्क्सवाद और रामराज्य सभ्यताकी सीढ़ीपर चढ़कर वस्तु-जगत्के विषयमें मनुष्यका ज्ञान ज्यों- ज्यों बढ़ने लगा, त्यों- त्यों देवताओंकी संख्या घटने लगी । मनुष्य ज्यों अगणित पदार्थोंमें एक मेल देखने लगा, त्यों देवताओंका बहुत्व भी एकत्वमें परिणत हो गया । ' ' पहले भूत या चैतन्य? इस प्रश्नका आदिम असभ्य जातियोंके प्रेत-तत्त्वसे बहुत निकट सम्बन्ध है । इस बातको स्मरण रखना चाहिये कि आदिम असभ्य मनुष्यको जीवनकी प्राथमिक बातें सोचनी पड़ी थीं । अनुमानके ऊपर प्रतिष्ठित मन्त्र-तन्त्रोंके द्वारा उसको जीवन- धारणका कौशल सीखना पड़ा था । उसकी यह कोशिश चाहे जितने बचपनकी हो, उसका मूल है जीवन- धारणकी अभिलाषा । इसलिये जीवन- मरणके रहस्यने आदिम मनुष्यको काफी चिन्तित कर डाला था । मनुष्यका शरीर जीवित - अवस्थामें एक प्रकारका और मरनेपर दूसरे प्रकारका क्यों होता है, जागरण, निद्रा, स्वप्न, रोग और व्याधि- ये सब क्यों होती हैं, स्वप्नमें जो मनुष्य-मूर्तियाँ दिखायी देती हैं, वे सब क्या हैं, स्वप्नमें मनुष्योंकी जो छाया - मूर्तियाँ दिखायी देती हैं, वही शायद जीवनकी कुंजी है, शायद इस छायामूर्तिका शरीर छोड़ना ही मृत्यु है- असभ्य मनुष्यकी प्रेतात्माकी धारणा इसी प्रकार बनी है । यहाँ इस धारणाकी ऐतिहासिक आलोचना करनेकी आवश्यकता नहीं, लेकिन इसमें सन्देह नहीं कि यही प्रेतात्मा सभ्यताके साबुनमें धुलकर चैतन्य परमात्मा आदि बन गयी है । मानव आत्माके विषयमें असभ्य जातियोंकी धारणा है कि यह सूक्ष्म भापकी तरह है । इसके शरीर त्याग देनेसे मृत्यु हो जाती है । ' ' मनुष्य तथा अन्य उन्नत प्राणियोंके शरीर धारणके लिये श्वासक्रिया बहुत ही आवश्यक है । मरते समय श्वासक्रिया क्षीण होते- होते बन्द हो जाती है । आदिम असभ्य जातियोंने भी इसको देखा था । इसीलिये श्वासक्रियाको ही उन्होंने आत्मा मान लिया था । आस्ट्रेलियाके आदिम निवासियोंकी भाषामें ' श्वास ' और ' आत्मा ' इन सबके लिये एक ही शब्द है । हिब्रू तथा सभी आर्य भाषाओंके भाषा-विज्ञानमें श्वास और आत्मबोधक शब्दोंका निकट सम्बन्ध है । यूनानी ' साइक ' और ' न्यूमा ',
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- मार्क्स दर्शन ७६५ लैटिन 'एनिमस', ' एनिमा', ' स्पिरीट्स ', इनका रूप परिवर्तन इसी प्रकारसे हुआ है । ' इसपर कहना यह है कि यद्यपि मस्तिष्क अतिभौतिक प्रतीत न हो, तथापि यह तो नहीं कहा जा सकता कि जिससे जो निश्चित हो, वह उसका स्वरूप ही होता है । यदि ऐसी ही बात हो, तब तो ज्ञानसे ही सब ज्ञेय निश्चित किया जाता है, यहाँ तक कि मस्तिष्क भी ज्ञानसे ही निश्चित किया जाता है, फिर क्या भौतिकवादी सबको ही ज्ञानस्वरूप माननेको तैयार हैं? यदि नहीं, तब तो भले ही भौतिक मस्तिष्कसे ही ईश्वर विदित हो, परंतु वह भौतिक नहीं कहा जा सकता । स्वयं इन्द्रियाँ नीरूप एवं सूक्ष्म हैं, परंतु उनसे रूपादिमान् स्थूल प्रपंच विदित होता ही है । इसी तरह मस्तिष्क आदिद्वारा अभौतिक आत्मा, ब्रह्म आदिका बोध होता ही है । परिवर्तनशील भौतिकवादियोंका भूत ही नयी-नयी पोशाकोंमें भले उपस्थित हो, उपनिषदोंका ब्रह्म तो सदासे ही औपाधिकरूपमें अनेक रस और निरुपाधिकरूपसे एकरस ही रहा है और वैसे ही रहेगा । जिसको भौतिकवादी वस्तु कहते हैं, वही अवस्तु है । जिसे वे अवस्तु समझते हैं, विचारकी दृष्टिसे वही वस्तु है । स्थूलदर्शी कार्यको ही वस्तु समझता है । एक स्थूलदर्शी पटको सत्य मानता है, परंतु एक सूक्ष्मदर्शी तन्तुभिन्न पटको ही असत् कहता है । इसी तरह कारणपरम्पराका विचार करते हुए तन्तु भी अंशुसे भिन्न असत् है । अंशु भी बिनौलामात्र है, बिनौला भी पृथ्वीमात्र है, पृथ्वी भी जलमात्र ही है, जल तेजसे भिन्न होकर कुछ नहीं ठहरता । तेज वायुमात्र है, वायु आकाशमात्र ठहरता है; किंतु स्थूलदर्शीको यह सब ढोंग ही जँचता है । अन्तिम सत्यका विचार सर्वदा ही उपयुक्त है, चाहे श्रेणीविभाजित जीवन हो, चाहे समष्टिवादी जीवन । सभीके लिये विक्षेपशून्य, निष्प्रपंच, सत्य, स्वप्रकाश ब्रह्म अपेक्षित है । इन्द्र भी अनन्त आनन्दसामग्री भुलाकर निष्प्रपंच सौषुप्त सुखकी ओर प्रवृत्त होता है । कोई कितना भी निर्द्वन्द्व, शान्त एवं सुखी क्यों न हो, सुषुप्तिकी निष्प्रपंचताके बिना उसे विश्राम नहीं मिलता । ' ईश्वरको न युक्तिसे जाना जा सकता है, न उसे प्रकाशित
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७६६ मार्क्सवाद और रामराज्य किया जा सकता है ' यह काण्टका कथन तथा ' ईश्वर वाङ्मनसगोचर नहीं है ' यह हिन्दूदर्शनोंका कथन, यह सिद्ध नहीं करते कि ईश्वर अवास्तव एवं असत् है । किंतु उनका अभिप्राय यही है कि श्रद्धा, समाधान तथा एकाग्रताके बिना ईश्वरका साक्षात्कार नहीं हो सकता । ईश्वरके अस्तित्वमें अनुमान, आगमादि अनेकों प्रमाण हैं । श्रुति ब्रह्म या आत्माको साक्षात् अपरोक्ष ही बतलाती है-' यदेव साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म । ' ( बृहदा० उप० ३।५।१ ) विज्ञाता प्रमाता प्रमाणानपेक्षरूपसे ही स्वतः सिद्ध होता है । संशय, विपर्यय एवं अज्ञान मिटानेके लिये ही प्रमाण अपेक्षित होते हैं । आत्मा अन्यत्र संदिहान होता हुआ भी स्वयं असंदिग्ध है, अन्यत्र विपर्ययज्ञानवान् होता हुआ भी स्वयं अविपर्यस्त रहता है । अन्यत्र अनुमिमान होता हुआ भी ( अनुमान करता हुआ भी ) स्वयं अपरोक्ष रहता है । फिर प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय आदि सभी जिस अखण्ड बोधके अनुग्रहसे भासित होते हैं, उसे किससे सिद्ध किया जाय? यही बात 'विज्ञातारमरे केन विजानीयात्' इत्यादि श्रुतियोंद्वारा कही गयी है । अतएव प्रमाणसिद्ध एवं स्वत:सिद्ध ईश्वर या ब्रह्म परमकल्याणकारी होनेसे ग्राह्य, उपास्य एवं ज्ञेय है । अनादि स्वतःसिद्ध वस्तुको बुद्ध्यारूढ करनेके लिये युक्ति, श्रुति आदि अपेक्षित होती है । इतिहास घटनाओंका ही होता है, फिर भी औपचारिकरूपसे ' तर्ह्यव्याकृतमासीत्', ' सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' इत्यादि श्रौत इतिहासके आधारपर सर्वकारण- स्वप्रकाश ब्रह्मका अस्तित्व सिद्ध होता ही है । तदनुगुण युक्ति भी श्रुतिने ही दी है । जैसे अन्न ( पृथ्वी ) -रूप अंकुरसे जलरूपी बीजका पता लगता है, जलरूपी अंकुरसे तेजरूपी मूलका पता लगता है, वैसे ही तेजरूपी अंकुरसे सद्रूपी मूलका पता लगता है -' तेजसा सौम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ । ' दार्शनिक पण्डितोंके इन तत्त्वविचारोंको गलत कहना बुद्धिकी अजीर्णताका ही द्योतक है । वास्तविक अभिज्ञता और व्यावहारिक ज्ञानसे तो भौतिकवादियोंने ही शत्रुता कर रखी है । विश्वके उपादानकारणरूपसे, विश्वके निमित्तकारणरूपसे, विश्वके आधार या अधिष्ठानरूपसे, विश्वके प्रकाशक तथा व्यवस्थापकरूपसे, कर्मफलदातारूपसे, सर्वशासकरूपसे
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- मार्क्स दर्शन ७६७ ईश्वरकी सिद्धि होती ही है । जैसे दर्पणके अन्दर प्रतिबिम्ब भासित होता है, वैसे ही अनन्त चिद्रूप दर्पणमें मनुष्य, पश्वादि, जंगम- स्थावरादि सभी प्रपंच भासित होते हैं । काष्ठपर व्यक्त अग्निको काष्ठसे भिन्न समझना ही पड़ेगा, ज्ञान या चेतनाको मनुष्यादि देहोंसे भिन्न समझना ही पड़ेगा । आदिम जंगली मनुष्योंके वस्तु और चेतनासम्बन्धी विचारोंको इतिहासके बलसे सिद्ध करनेकी दुश्चेष्टा निराधार है । यह इतिहास कपोलकल्पित, मिथ्या एवं पूरा मनगढ़न्त है । जड़वादियोंका इतिहास-सम्बन्धी मनोराज्य केवल विनोदका विषय है । कोई प्रमाणचक्षु पुरुष इसे केवल भौतिकवादियोंका दिमागी फितूर ही कहेगा । प्रामाणिक आस्तिकोंके इतिहासोंके अनुसार तो विश्वकारण ईश्वरकी संतानें ईश्वरीय ज्ञानरूप वेदादि शास्त्रोंद्वारा पूर्णरूपसे शिक्षित ही होती हैं । उत्तरोत्तर जहाँ- कहीं सच्छिक्षा एवं सत्संगमें विच्छेद हुआ, वहीं असभ्यता, अज्ञता एवं मिथ्या धारणाएँ बनती हैं । भौतिकवादियोंकी यह धारणा नितान्त असत्य है कि ' अध्यात्मवादियोंकी अतिभौतिक देवता, ईश्वर या ब्रह्म इत्यादि कल्पनाएँ हैं और इनका मूल असभ्यों, जंगलियोंकी तन्त्र -मन्त्र, भूत- प्रेतकी कल्पनाएँ हैं । ' जिन्होंने सच्चे इतिहासोंका अध्ययन किया है, रामायण, महाभारत, पुराणों, उपपुराणों, तन्त्रों, आगमों एवं मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेदों एवं उनके आरण्यक, उपनिषदोंका मनन किया है और जिन्होंने व्यास, वसिष्ठ एवं श्रीकृष्णभगवान्के दिव्य दर्शनोंका अध्ययन किया है, उनको यह समझनेमें कठिनाई न होगी । भौतिकवादी जिन बाह्य भौतिक वस्तुओंको सत्य मानते हैं, देवता, ईश्वर, ब्रह्मकी बात तो पृथक् रहे, भूत-प्रेतकी कल्पना भी उनसे अधिक सत्य है । इसीलिये उपनिषद् या गीताके जिस निर्गुण ब्रह्मको भौतिकवादी अन्तिम कल्पना मानते हैं, उस कल्पनाके साथ भी भूत-प्रेत एवं देवताओंकी कल्पनाएँ हैं । यह समझना नितान्त भ्रम है. कि विकासक्रमसे भिन्न-भिन्न कालोंकी ही यह कल्पनाएँ हैं । एक उच्चकोटिका ब्रह्मदर्शन परमार्थ- दृष्टिमें सजातीय- विजातीय-स्वगतभेदशून्य ब्रह्मतत्त्व बतलाता है, परंतु बही अन्य अधिकारियोंके लिये ईश्वरकी उपासना बतलाता है । कुछ और ढंगके अधिकारियोंके लिये
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७६८ मार्क्सवाद और रामराज्य सगुण ईश्वरकी आराधना, अन्य लोगोंके लिये विभिन्न देवताओंकी आराधना बतलाता है । अन्य ढंगके लोगोंके लिये प्रेत -पिशाचकी आराधना भी उचित मानता है । ' बृहदारण्यक ' आदि उपनिषदोंमें भी निर्गुण ब्रह्म, ईश्वर और साथ-ही-साथ अनेक देवताओंका भी वर्णन है । भारत, रामायण, गीता आदिमें तो सबका वर्णन है ही । यदि पिछली - पिछली कल्पनाएँ उत्तरोत्तर कल्पनाओंकी दृष्टिसे असत्य हैं, तब तो उनको मिथ्या ही कहना चाहिये । किसीके लिये भी उनकी ग्राह्यता एवं उपासनाका उपदेश कैसे हो सकता है? इसलिये व्यावहारिक दृष्टिसे प्रेत, पिशाच आदि सभी तत्त्वोंका अस्तित्व है । प्रेतादि केवल कल्पना नहीं, उनकी देवयोनिमें गणना है । परलोकविद्यावालोंकी दृष्टिसे प्रेत-तत्त्वकी सिद्धि होती है । भूतावेश, प्रेतावेश आज भी वैसी ही सत्य वस्तु है, जैसी पुराने कालमें । इसके अतिरिक्त भौतिकवादियोंकी प्रेतकल्पनाका युग कितना पुराना है? जब मानवका इतिहास ही लाखों नहीं हजारों ही वर्षोंका है, तब उनके प्रेतकल्पनाका युग भी उनकी दृष्टिमें हजारों वर्षका ही पुराना है, परंतु आर्ष इतिहासके अनुसार निर्गुण ब्रह्मकी कल्पना तो लाखों वर्ष पुरानी है । द्वापरके कृष्ण, त्रेताके राम और सृष्टिके मूल कारण ब्रह्मा, विष्णु एवं महेशकी अतिप्राचीन दृष्टिमें भी निर्गुण ब्रह्मकी सत्ता स्वत: सिद्ध है । भौतिकवादियोंके तथाकथित मनगढ़न्त मिथ्या इतिहासोंकी अपेक्षा इतिहासोंकी तथ्यता कहीं अधिक श्रेष्ठ है । अतएव जागरण, निद्रा तथा स्वप्नके आधारपर देह -भिन्न आत्माका निर्णय करना, प्राणधारणसे जीवन, प्राणराहित्यसे मरण आदिकी धारणा जंगली असभ्योंकी नहीं, किंतु सभ्यशिरोमणि महादार्शनिकोंकी भी यही धारणा थी और आज भी है । श्रीशंकराचार्यका कहना है कि जो स्वप्न, जागर एवं सुषुप्तिको जानता है, वही आत्मा है, भूतसंघ नहीं -' यत्स्वप्नजागरसुषुप्तमवैति नित्यं तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसङ्घः । ' भागवतमें कहा गया है कि स्वप्न, सुषुप्ति बुद्धिकी वृत्तियाँ हैं, जिस द्रष्टासे इनका बोध या प्रकाश होता है, वही अध्यक्ष पर पुरुष है –' बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति वृत्तयः ।