मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 811–820
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 811–820
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माक्सय समाज-व्यवस्था ८० ९ कहनेके सिवा कि ' परमात्मा, ईश्वर, धर्मके अतिरिक्त मार्क्सवादी स्थिर आत्माका भी अस्तित्व नहीं मानता ', कोई दूसरा चारा नहीं । भला इसे दर्शन भी कैसे कहा जा सकता है? मार्क्सवादी स्वयं ही कहते हैं - ' जो दार्शनिक जिस परिस्थितिमें रहता है, उसी ढंगका उसका दर्शन होता है ', एतावता सिद्ध है कि उस दर्शनपर उस दार्शनिकके दिमागी फितूरके अतिरिक्त सत्यका अंश कुछ भी नहीं रहता । काण्टका ज्ञान-सिद्धान्त ' काण्ट इससे सहमत है कि हमारा ज्ञान अनुभवसे आरम्भ होता है और इस अनुभवकी प्रारम्भिक बात है - बाहरी वस्तुओंका अस्तित्व । वह केवल इस बातसे इनकार करता है कि यहीं इसका अन्त होता है; क्योंकि हमें ऐसी चीजोंका ज्ञान है, जो अनुभवसे परे हैं । वह इसको मान लेता है कि शेषोक्त प्रकारका ज्ञान पूर्वोक्त प्रकारके ज्ञानका अनुमान कर लेता है; क्योंकि यह कैसे सम्भव है कि पहचान ( ज्ञान ) -की शक्तिका उद्बोध न हो सिवा उन वस्तुओंके संयोगसे, जिनका प्रभाव हमारी इन्द्रियोंपर पड़ता है और जो स्वयं अपने प्रतिबिम्ब उत्पन्न करती हैं और अंशतः हमारी बुद्धिको जाग्रत् करती हैं, ताकि वह इन प्रतिबिम्बों तुलना कर सके, इनको जोड़ सके तथा अलग - अलग कर सके और इस प्रकार हमारे इन्द्रिय- लब्ध चित्रोंके सच्चे मालको वस्तुओंके ज्ञानके रूपमें परिणत करता है और जिसको हम अनुभवका नाम देते हैं । इसलिये समयके ख्यालसे हमारा कोई ज्ञान अनुभवसे पहले नहीं है, बल्कि इसके साथ ही आरम्भ होता है । ' वह आगे चलकर कहता है कि ' ज्ञानका एक और अंग है । यद्यपि हमारा ज्ञान अनुभवसे आरम्भ होता है, इसका यह अर्थ नहीं कि अनुभवसे ही सब ज्ञानकी उत्पत्ति होती है; क्योंकि इसके विपरीत यह बहुत सम्भव है कि जो कुछ हमको इन्द्रिय- संयोगसे प्राप्त होता है और जो कुछ हमारी पहचानकी शक्ति स्वयं अपना अंश मिलाती है, इन दोनोंके मिश्रणसे ही हमारा व्यावहारिक ज्ञान बनता है । लेकिन मुद्दतकी आदतसे ही हमारे अन्दर वह कौशल और एकाग्रता आती है, जिससे हम इन दोनोंको पृथक्
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८१० मार्क्सवाद और रामराज्य करनेमें समर्थ होते हैं । काण्टके पहलेके दार्शनिक दो मुख्य दलोंमें बँटे हुए थे, एक भौतिकवादी, जो इन्द्रियानुभव तथा उसके ऊपर सोच- विचारके दूसरे रास्तेद्वारा बाहरी दुनियाँसे एक ज्ञानकी उत्पत्ति बताते थे और दूसरे आदर्शवादी, जो कहते थे कि मानसमें ऐसे विचार हैं, जिनका कारण नहीं बताया जा सकता । ऐसे विचार जिनकी सार्वभौमिकता और अमूर्तरूप यह निर्देश करता है कि ये स्वयं प्राप्त हैं और सब अनुभवके मूलमें हैं । ' ' काण्टकी ऐतिहासिक स्थिति यह है कि दोनों दृष्टिकोणोंके समन्वयके द्वारा उसने इस विरोधका अन्त किया और उसका यह दावा था कि इस नये दृष्टिकोणमें उसने इन दोनोंका सम्मेलन एक ऊँचे स्तरपर कराया है । उसने यह मान लिया कि स्थान, काल, कारण इत्यादि अमूर्त कल्पनाओंको केवल अनुभवमें रूपान्तरित नहीं किया जा सकता, दूसरी ओर यद्यपि ये स्वयं प्राप्त हैं । यह कल्पना नहीं की जा सकती कि ये बिलकुल ही अनुभवपर निर्भर नहीं हैं । उसका दावा था कि वास्तविकता यह है कि सब अनुभवके मूलमें पूर्व परिस्थितियोंके रूपमें ये विद्यमान हैं और इस तरह ये अनुभवके रूपोंका निर्णय करते हैं । ' ' उसने यह दलील दी कि बाहरी वस्तु और दूसरी मानव बुद्धि- ये ज्ञानके दो उद्गम नहीं हैं -ज्ञानका एक ही उद्गम है- वह है कर्ता और कर्म ( बुद्धियुक्त मनुष्य और वस्तु) -का सम्मेलन । जैसे जलका कारण अम्लजन और उद्रजनका सम्मेलन है । यहाँ यह नहीं कहा जा सकता कि जलके दो कारण हैं, किंतु दोनोंका सम्मेलनरूप एक ही कारण है । उसी तरह प्रकृतमें भी समझना चाहिये । कर्ता और कर्मका सम्मेलन ही जलका कारण है । सारा संसार हमारे लिये दृश्यमान घटनाओंकी एक परम्परा है । क्या ये दृश्य मानसकी उपज हैं, जिसके सामने ये दर्शित होते हैं या कि ये वस्तुओंके विशुद्ध प्रतिनिधि हैं? आदर्शवाद या वस्तुवाद- दोनोंमेंसे कोई नहीं और दोनों मानस और वस्तु सहयुक्त होकर दृश्य या प्रत्यक्षीकरणको उत्पन्न करते हैं । प्रत्यक्षीकरण दोनोंके सम्मेलनका ही फल है । '
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माक्सय समाज -व्यवस्था ८११ ' अनुभवसे ज्ञानका आरम्भ होता है ', इत्यादि काण्टका कथन इन्द्रिय- व्यापार आदिके अभिप्रायसे संगत होता है । इन्द्रिय, मन, अहंकार एवं बुद्धिके व्यापारोंको ही अनुभव, संकल्प आदि अनेक नाम दिये गये हैं । वस्तुतः ये सभी जड हैं । जड़ोंमें जब अपने ही प्रकाशकी शक्ति नहीं है, तब उनसे विषय -प्रकाशकी कल्पना सर्वथा निरर्थक है । मन या अन्तःकरणकी वृत्ति भी ज्ञानपदसे कही जाती है, परंतु यह सब कथन औपचारिक ही है । इन्हीं जड व्यापारोंकी उत्पत्ति और नाश कहा जा सकता है । सर्वप्रकाशक बोधका न प्रागभाव सिद्ध होगा और न तो प्रध्वंसाभाव ही । वस्तुओंके संयोगसे इन्द्रियोंपर प्रभाव पड़ता है और विषयरूपी वस्तुओंका प्रतिबिम्ब भी वृत्तिमें उत्पन्न हो बुद्धिके जागरणमें भी वस्तुओंका उपयोग होता है । फिर भी इनके द्वारा नित्य- बोधकी अभिव्यक्ति ही होती है, उत्पत्ति नहीं । जैसे काष्ठोंके संघर्षसे दाहकत्व-प्रकाशकत्वविशिष्ट अग्निका प्राकट्य होता है, ठण्डे गरम तारोंके योगसे विद्युत्प्रकाशका प्राकट्य होता है, किंवा सूर्यकान्तमणिके योगसे व्यापक सौरालोकका अग्निके रूपमें प्राकट्य होता है, स्वच्छ काँच आदिके योगसे सौरालोक चमत्कृत होता है, उसी तरह वृत्तियोंके योगसे व्यापक अखण्ड बोध चमत्कृत होता है । इस तरह अनुभव और ज्ञानका भिन्न-भिन्न अर्थोंमें प्रयोग केवल ज्ञानकी उपाधियोंमें ही होता है । वस्तुतः स्वतन्त्र नित्य नीरूप चित्प्रकाश ही अनुभव एवं ज्ञान आदि शब्दोंका लक्ष्य अर्थ है । व्यावहारिक ज्ञान- पहचान, अनुभव, इनकी उत्पत्ति, विनाश, स्पष्टता, अस्पष्टता, एकता एवं अनेकता – ये भी बातें इन्द्रिय, मन, अहंकार एवं बुद्धिके ही विभिन्न व्यापारोंसे सम्भव हैं, परंतु एक समान प्रकाश तो सर्वत्र एक-सा ही रहता है । उसी एक नित्यप्रकाशको ही किन्हीं पाश्चात्योंने मानसमें स्वयंसिद्ध माना है । अतएव ' अनुभवकी स्पष्टता या उसका निरूपण बाह्यवस्तुसापेक्ष है ' - यह काण्टका कथन भी इसी दृष्टिसे संगत होता है । बुद्धियुक्त मनुष्य और बाह्यवस्तुओंसे अनुभव उत्पन्न होता है, यह कथन भी वृत्तिरूप ज्ञानके सम्बन्धमें है । बुद्धिवृत्तिरूप ज्ञानके उत्पन्न होनेपर उसीके द्वारा नित्य ज्ञानका प्राकट्य होता है । यद्यपि
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८१२ मार्क्सवाद और रामराज्य परमार्थ सत्य यही है कि सम्पूर्ण संसार मानसकी ही उपज है । इतना ही क्यों? मानस भी तो अखण्ड बोधका ही एक भ्रान्तिसिद्ध रूप है । क्या हम देखते नहीं कि स्वप्नका देह, स्वप्नका प्रपंच, स्वप्नका सभी दृश्य एक ढंगके बोधका ही विवर्त है । कुछ निम्नस्तरकी दृष्टिसे मानस और बाह्यवस्तुओंके सम्मेलनसे प्रत्यक्षीकरण आदि व्यापारके भासक साक्षीका अपलाप नहीं किया जा सकता । ' हीगेलके बहुतेरे सिद्धान्तोंका मूल काण्टके दर्शनमें मिलता है । जब काण्टने सब सम्भव ज्ञानके क्षेत्रको उन रूपोंमें सीमित कर दिया, जिनमें मनुष्य बाहरी दुनियाँको देखता है तो उसने हीगेलके इस वाक्यकी नींव डाली कि जो कुछ वास्तव है, वह तर्कसंगत है और जो कुछ तर्कसंगत है, वह वास्तव है । यह ठीक है कि काण्टने अस्वीकार किया कि वस्तुस्वरूप कोई ज्ञान प्राप्त हो सकता है, लेकिन हीगेलको दो दिशाओंमें यह असम्बद्ध मालूम हुआ । पहली बात तो यह है कि इस सिद्धान्तके अनुसार कि ' विचाररूप ' के अन्दरकी वास्तविकताको देनेवाला अनुभव ही है । वस्तुस्वरूप नामक विचाररूप तभी सत्य हो सकता है, जब इसकी उत्पत्ति किसी अनुभवसे ही हो । दूसरी बात यह है कि दृश्यगत घटनाओंमें तथा इनके और बुद्धि बीचके सम्बन्धमें ही अनुभवका निवास है । एंजिल्सने इसीका भाषान्तर करके कहा ' यदि हम किसी वस्तुके सभी गुणोंको जान लें, तो वस्तुस्वरूपके विषयमें कुछ आविष्कार करना बाकी नहीं रह जाता, सिवा इसके कि वह वस्तु हमारे बाहर है और उसका अस्तित्व हमारे ऊपर निर्भर नहीं है । ' ' इन्द्रियानुभूतिवादियों ( लॉक इत्यादि) के खण्डनकी क्रियामें काण्टके सिद्धान्तोंने उसको यह कहनेके लिये बाध्य किया कि हम पृथक् रूपसे केवल गुणोंका प्रत्यक्षीकरण नहीं करते । सम्पूर्ण प्रत्यक्षकारी संज्ञा क्रियाशील प्रत्यक्षीकरणमें सम्पूर्ण बाहरी वास्तविकताके द्वारा संशोधित और परिवर्तित होती है । हीगेलने इन दोनों सम्पूर्णोंको एक विकासमान सम्पूर्णके धनात्मक और ऋणात्मकरूपमें माना और इस प्रकार पूर्ण आदर्शवादको पहुँचे । ' काण्टने कर्ता और कर्म ( वस्तु ) - के विरोधात्मक एकत्वको अपनी दर्शन - व्यवस्थाका केन्द्र बनाया । लेकिन उसकी इस
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- माक्सय समाज व्यवस्था ८१३ कल्पनामें यह असंगति थी कि एक ही ओर यानी कर्ताकी ओर ही यह एकत्व क्रियाशील तथा फलोत्पादक है । हीगेलने इस असंगतिको दूर किया और इस बुनियादपर अपनी सारी प्रथाका निर्माण किया कि सत्यका अवस्थान न केवल शुद्ध कर्तामें और न केवल शुद्ध वस्तुमें है, बल्कि इनके बीच क्रियाशील सम्बन्धमें है -जिस सम्बन्धके द्वारा कर्ता और वस्तु, दोनोंमें क्रमवर्धनशील रूपान्तर होता रहता है । आदर्शवादके स्तरपर यह कल्पना हमको ले जाती है, माक्सय विश्वकल्पनाकी ओर । आदर्शवादने क्रियाशील पक्षको विकसित किया, लेकिन केवल अमूर्तरूपमें द्वन्द्वमान, तर्क और विचारके व्यापक नियमोंके विकासमें तथा मनुष्यकी मस्तिष्क- क्रियाकी सीमाओंको रेखांकित करनेमें । वस्तुओंके द्वारा रक्तमांससम्पन्न मनुष्य- व्यवहारके क्रियाशील पक्षका विकास भौतिकवादियोंने किया नहीं और आदर्शवादी अपने आदर्शवादके कारण कर न सके । ' 'प्रारम्भमें दिये गये ज्ञानकी परिभाषाका द्वन्द्वात्मकरूप अब समझा जा सकता है । मनुष्यके बाहर स्थित प्रकृति ही ज्ञानका उद्गम है । ज्ञानप्रक्रिया मनुष्य और वस्तुके बीच एक क्रिया-प्रतिक्रिया है, जो मनुष्य और वस्तुको भिन्न बना देती है, ज्ञात होनेके कारण । ज्ञात वस्तु अपने पहले रूपसे विभिन्न बन जाती है और ज्ञानी मनुष्य भी अपने पहले रूपसे भिन्न है । ज्ञानका मूल है मनुष्यकी व्यावहारिक क्रिया- वस्तुओंके द्वारा, अनुभवके द्वारा । ज्ञानप्राप्तिकी पहली सीढ़ी है इन्द्रियानुभूति । इन्द्रियानुभूति कोई ऐसी चीज नहीं है, जो मनुष्य- अवयवके साथ सदा एक-सी बनी रहती हो । यह इन्द्रियानुभूति एक विशेष उपज है और यह पैदा होती है पशुओंकी इन्द्रियानुभूतिसे भिन्नरूपमें; ऐतिहासिक, सामाजिक प्रयोगकी बुनियादपर । सामाजिक ज्ञानका विकास इन्द्रियानुभूति तथा युक्तियुक्त ज्ञान दोनोंको समृद्ध करता है । किसी भी असभ्य मनुष्यके विचार और इन्द्रियानुभूतिका स्तर इतना निम्न होता है कि किसी सभ्य मनुष्यसे उसकी तुलना नहीं हो सकती । उसके निम्नस्तर और अत्यन्त सीमित पार्थिव आचार - व्यवहारपर ही उसके विचार और इन्द्रियानुभूति दोनों ही निर्भर हैं । ज्ञानकी दूसरी सीढ़ी है तर्कबुद्धि । यह बुद्धि भी प्रयोग और व्यवहारके द्वारा आती है । '
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८१४ मार्क्सवाद और रामराज्य वृत्तिरूप ज्ञानका ही क्षेत्र किन्हीं रूपोंमें सीमित हो सकता है । निर्विषय, निर्दृश्य शुद्धबोधके सम्बन्धमें यह नहीं कहा जा सकता । साथ ही बाह्यरूप भी सीमित नहीं है । केवल जो कुछ मानवबुद्धिग्राह्य है, वही सब कुछ नहीं है । मनुष्यकी अल्पज्ञता तो स्पष्ट ही है । यदि हम वस्तुका सभी गुण जान लें तो वस्तुस्वरूपके विषयमें कुछ आविष्कार बाकी नहीं रह जाता । एंजिल्सका यह विचार भी आकाशकुसुमकी कल्पना ही है । स्वानिक दृश्यवस्तु जैसे द्रष्टापर ही निर्भर होती है, उसी तरह जाग्रत्- प्रपंच भी द्रष्टापर ही निर्भर है । इसीलिये हीगेलको चेतनसे अचेतनकी उत्पत्ति माननेको बाध्य होना पड़ा । काण्ट और हीगेलके इस भेदमें कोई त नहीं है कि कर्ता और कर्मका क्रियाशील एकत्व क्रियाशील तथा फलोत्पादक है या क्रियाशील सम्बन्ध फलोत्पादक है; क्योंकि ज्ञान स्वयं चेतन एवं प्रकाशात्मक होनेसे कर्ताकी जातिका है, अतः कर्ताकी ओर फलोत्पत्तिका व्यवहार होता है — यह काण्टका अभिप्राय है । निर्विकार, निर्दृश्य अखण्ड बोधमें विषयोपराग स्वतः सम्भव नहीं है । अतः दृक्, दृश्य, चेतन, अचेतनके अन्योन्याध्याससे ही व्यावहारिक सप्रपंच ज्ञान होता है । यही हीगेलका अभिप्राय है । मार्क्सके अनुसार ' मनुष्य एवं वस्तुके बीचकी क्रिया - प्रतिक्रिया ही ज्ञानप्रक्रिया है और ज्ञानका मूल मनुष्यकी व्यावहारिक क्रिया है । इन्द्रियानुभूति और तर्क-बुद्धि ही प्रयोग एवं व्यवहारके द्वारा युक्तियुक्त ज्ञानका निर्माण करती है । ' जहाँतक व्यावहारिक वृत्तिरूप-ज्ञानकी बात है, सांख्यवादी भी यही मानते हैं । इतना अवश्य है कि सांख्योंका मनुष्य रक्त- मांस - अस्थिपंजरमात्र नहीं; किंतु वह चेतन असंग आत्मा है और उसी दृष्टिसे द्रष्टा तथा दृश्य, कर्ता और कर्म, भोक्ता तथा भोग्यका भेद भी सिद्ध होता है अथवा इससे निम्नस्तरपर उतरें तो कह सकते हैं कि सूक्ष्म सत्त्वात्मक बुद्धितत्त्व ही कर्ता या ज्ञाता है । तामस, राजस, स्थूल -प्रपंच वस्तु है । यही कर्ता, कर्म, ज्ञाता एक ज्ञेयका भेद है, परंतु मार्क्सके अनुसार ' भूत ही सब कुछ है । उसका ही परिणाम वस्तु है और उसीका परिणाम मनुष्य है । ' फिर उसकी क्रिया-प्रतिक्रियासे भी अति विलक्षण प्रकाशरूप ज्ञान किस तरह उत्पन्न हो सकेगा, यह विचारणीय विषय है ।
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- माक्र्सय समाज व्यवस्था ८१५ व्यवहार और तथ्य मार्क्सवादी कहते हैं किं ' भूत पहले या मानस, यह प्रश्न एक दूसरे रूपमें भी जीवनके सामने उठ खड़ा होता है । प्रयोग पहले या सिद्धान्त? व्यवहार पहले या तथ्य? इसका उत्तर हमको जीवनपथमें एक विशिष्ट दिशाकी ओर ले जाता है । इस विषयमें मार्क्सवादी दृष्टिकोण भी अपनी विशेषता रखता है । कुछ लोग कहते हैं कि प्रयोग और सिद्धान्तमें कोई समन्वय नहीं हो सकता । प्रयोग इस गन्दी, स्थूल, असत्य, मायावी दुनियाँकी चीज है । सिद्धान्त चिरसत्य, शिव और सुन्दर है । दोनोंका क्या सम्बन्ध है? ‘ सिद्धान्त दर्शन-ज्ञान ही सब कुछ है, इसके अतिरिक्त कुछ है ही नहीं ', इस तरहके विचार रखनेवाले लोग मकड़ीकी भाँति अपने भीतरसे सिद्धान्तको निकालते हैं । दूसरे लोग हैं, जो प्रयोगसे एकदम इनकार तो नहीं करते; किंतु वे सिद्धान्तको ही प्रधान मानते हैं । उनकी दृष्टिमें सिद्धान्त प्रयोगकी संतान नहीं है, वह एक स्वयम्भू तत्त्व है । ऐसे मतवालोंके लिये प्रयोगका आश्रित होना निम्नकोटिके लोगोंको ही शोभा देता है । सिद्ध - महर्षि इसके ऊपर हैं । यह गौर करनेकी बात है कि प्राचीन भारतका प्रगतिशील युग प्रयोग-निर्भर ही था, जैसा कि अलबेरूनीद्वारा उद्धृत आर्यभट ( ४७६ ई० ) -के निम्न सूत्रसे स्पष्ट हो जाता है । ' सूर्यकी किरणें जो कुछ प्रकाशित करती हैं, वही हमारे लिये पर्याप्त है । उनसे परे जो कुछ है और वह अनन्त दूरतक फैला हो सकता है, उसका हम प्रयोग नहीं कर सकते । जहाँ सूर्यकी किरणें नहीं पहुँचतीं, वहाँ इन्द्रियोंकी गति नहीं और जहाँ इन्द्रियोंकी गति नहीं, उसे हम जान नहीं सकते । ' ' पूर्वोक्त दृष्टिकोण श्रेणी-विभाजित समाजका और उस समाजमें शारीरिक और मानसिक श्रमके विभाजनका परिणाम है । पूँजीवादमें शारीरिक और मानसिक श्रमका विच्छेद पूरे तौरपर हो जाता है । श्रम इस विभाजनके कारण प्रयोगसे बिलकुल स्वतन्त्र होकर सिद्धान्तका निर्माण होता है और विद्वत्तापूर्ण तथ्योंका आविष्कार होता है, जो व्यवहारकुशल लोगोंकी अवज्ञाके पात्र बन जाते हैं । इस प्रकार उत्पन्न प्रयोग और सिद्धान्तका विच्छेद पूँजीवादी विचारधाराकी रक्षणशील
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८१६ मार्क्सवाद और रामराज्य संकीर्णताके कारण अधिक गहरा बन जाता है और जो आजके दिन ढोंगपूर्ण विचारोंके लिये जिम्मेदार हैं । विज्ञानकी विभिन्न शाखाओंके अध्ययनसे भी हम इसी नतीजेपर पहुँचते हैं कि प्रयोग ही सिद्धान्तका जनक है । देशविजय और व्यापारने भूगोलको जन्म दिया । पैदावार तथा उद्योग और लड़ाईके औजारोंने खनिज -विज्ञानकी सृष्टि की । कृषिमें बीज बोनेके लिये ऋतुओंके ज्ञानकी आवश्यकता हुई । इस आवश्कताके कारण नक्षत्रशास्त्रकी रचना हुई । इसी नक्षत्रशास्त्रकी शाखा-उपशाखाके रूपमें आलोक- विज्ञान ( दूरबीन आदिका आविष्कार ) तथा पदार्थ -विज्ञानकी सृष्टि हुई । व्यावहारिक उपयोगिता ही यन्त्रगति शास्त्रका जनक है । जैसे नील नदीकी सतहको उठाकर खेत सींचनेकी आवश्यकता इत्यादि । इतर धातुओंको सोनेमें परिवर्तित करनेकी चेष्टासे रसायनशास्त्रकी उत्पत्ति हुई । रसायनशास्त्रके पर्यायवाची अंग्रेजी शब्द केमिस्ट्रीकी उत्पत्ति है मिस्र - भाषाके शब्द कीमियासे । गणितशास्त्र एक ऐसा शास्त्र है, जो सबसे अधिक बुद्धिप्रसूत और प्रयोगसे असम्बन्धित जान पड़ता है । लेकिन इसके इतिहासके अध्ययनसे भी यही विचारधारा पुष्ट होती है । खेतोंकी नाप-जोखसे ज्यामिति (रेखागणित ) -का सम्बन्ध है और जिस समय रोम - अधिपति आगस्टसने सिकंदरियाके हीरोको रोमन -राज्यका नकशा खींचनेके लिये नियुक्त किया, उससे भी ज्यामिति- शास्त्रने काफी पोषण प्राप्त किया । ' साइंस ऐट दी क्रास रोड्स ' ( विज्ञान - चौमुहानेपर ) नामक लेखमें हेसेनने न्यूटनपर जो प्रकाश डाला है, उससे इस भ्रमका निराकरण होता है कि न्यूटन किसी द्युलोकका स्वप्नद्रष्टा है, जिसका पार्थिव व्यवहारसे कोई संस्पर्श नहीं है । उसने यह दिखलाया है कि न्यूटनने जिन समस्याओंका समाधान किया है, उनकी उत्पत्ति उस समयके मानव- समाजकी व्यावहारिक आवश्यकताओंसे ही हुई है । ' ' भूत पहले या मानस ' यह प्रश्न इस अभिप्रायसे है कि दृक्- दृश्य, ज्ञान- ज्ञेय इनमेंसे कौन पहलेसे है? यदि मानसका अर्थ उस मानससे है, जो कि एक आन्तर इन्द्रिय या सूक्ष्म पंचमहाभूतोंके समष्टि सात्त्विक अंशोंसे निर्मित अन्तःकरणरूपसे प्रसिद्ध है, तब अधिक
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माक्सय समाज -व्यवस्था ८१७ मतभेद नहीं रह जाता । प्रयोग पहले या सिद्धान्त, व्यवहार पहले या तथ्य? कोई भी समझ सकता है कि प्रमाण से ही प्रमेयकी सिद्धि होती है । कभी भी बोधसे ही बोध्यकी सिद्धि होती है । फिर बोध तो वह वस्तु है कि प्रमाण भी उसीसे सिद्ध होता है । इस बोधका प्रागभाव एवं प्रध्वंस समझनेके लिये भी बोध आवश्यक ही है । जड अबोधसे उसका प्रागभाव समझना कठिन ही नहीं असम्भव है । बोधमें सविशेषता लानेके लिये इन्द्रिय-मन आदिका व्यापार आवश्यक होता है । प्रयोगोंसे नियमों एवं सिद्धान्तोंकी जानकारी होती है, निर्माण नहीं होता । किन- किन वस्तुओंमें क्या- क्या गुण हैं, यह हमारी जानकारीसे पहले भी कम- से - कम भौतिकवादीको तो मान्य होना ही चाहिये । इसलिये व्यापार, विजय - यात्राके कारण भौगोलिक स्थितिका ज्ञान होता है, निर्माण नहीं । इसी प्रकार पैदावार, उद्योग, लड़ाई और औजारोंने खनिजके ज्ञानमें सहायता की है, परंतु इनके कारण खनिजका निर्माण नहीं हुआ । कृषिके कारण ऋतुओंका ज्ञान भले ही हुआ हो, परंतु ऋतुओंका अस्तित्व कृषिके कारण नहीं हुआ । प्रयोगके आधारपर विद्यमान वस्तुका ही ज्ञान और उपयोग कहा जा सकता है । अग्निकी उष्णता, जलकी शीतलता, वायुकी प्रवहण-शीलता हमारे प्रयोगके आधारपर नहीं बनी । इस तरह प्रयोग और आवश्यकताके अनुसार गुण-उपयोगिता एवं सिद्धान्तोंका ज्ञान होता है, परंतु गुण-उपयोगिता और सिद्धान्त पहलेसे ही होते हैं । इतना ही क्यों? सभी प्रवृत्तियोंमें संकल्प या ज्ञान हेतु होते हैं । क्रियाओं, अनुभवोंसे जानकारीमें विशेषताएँ होती हैं । ये ज्ञान भी सदा प्रयोगोंके आधारपर नहीं होते । व्यवहारमें देखते हैं कि जो गाँवके किसान खेती करते हैं, उन्हें इतना कृषिविज्ञान नहीं रहता, जितना पुस्तकों और प्रयोगशालाओंके द्वारा विद्यार्थियोंको होता है । सदा संग्राम करनेवालोंको भी इतना परिज्ञान नहीं होता, जितना एक फील्डमार्शलको और मजदूरोंको शिल्पका इतना ज्ञान नहीं होता, जितना इंजीनियरोंको । बुद्धिका महत्त्व तो सभीको मान्य होना ही चाहिये । सहस्रों मनुष्य
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८१८ मार्क्सवाद और रामराज्य जो काम नहीं कर पाते, वह काम बुद्धिनिर्मित मशीनोंसे सरलतासे हो जाता है । इसी तरह लाखों वर्षोंकी वृत्तियोंसे भी जो ज्ञान सम्पन्न नहीं होता, वह ज्ञान शान्त-समाहित, योग- शक्तिसम्पन्न मनसे हो जाता है । जैसे बुद्धिनिर्मित दूरवीक्षण या सूक्ष्मवीक्षणसे दूर- सूक्ष्म वस्तुओंका ज्ञान हो सकता है, वैसे ही योग-जन्यशक्ति-विशिष्ट मनसे बाह्य प्रयोगके बिना भी अनेक वस्तुओं, उनके गुणों एवं सिद्धान्तोंका ज्ञान हो जाता है । ' जहाँ सूर्यकी किरणें नहीं पहुँचतीं, वहाँ इन्द्रियोंकी गति नहीं और जहाँ इन्द्रियोंकी गति नहीं, उसे हम जान नहीं सकते ' - यह कथन योगज- ज्ञानविहीन व्यक्तियोंके लिये ही ठीक है । यह भी रूपवान् वस्तुके ही सम्बन्धमें कहा गया है । शब्द और स्पर्शके सम्बन्धमें सूर्यकिरणें प्रकाश नहीं फैला सकतीं; फिर भी श्रोत्रत्वके द्वारा उनका ज्ञान होता ही है । प्रकृति -परमाणु आदिका ज्ञान अनुमानसे होता है । इन्द्रियों, मन एवं बुद्धिमें सूर्यकी किरणें नहीं पहुँचतीं; फिर भी उनका ज्ञान साक्षीसे होता ही है । रेडियो, टेलीविजनद्वारा इस समय अतिदूरस्थ शब्द एवं रूपका अनुभव किया ही जा रहा है । यह सामान्य इन्द्रियगतिसे भिन्न ही यान्त्रिक शक्तिका चमत्कार है । इसी तरह यौगिक चमत्कार भी है । रसायनशास्त्रके कारण भी जिन -जिन सम्बन्धोंसे जिन -जिन धातुओंमें सुवर्ण बननेकी शक्ति है, उन्हीं धातुओंसे उन्हीं सम्बन्धोंके द्वारा सुवर्णनिष्पत्ति होती है । इसी तरह क्या गणित क्या अन्य विषय - सबमें सिद्धान्त स्थायी ही होते हैं । उनकी जानकारीके लिये ही शिक्षा प्रयोग आदि अपेक्षित होते हैं । मार्क्सवादी कहते हैं कि ' अनुभव सामाजिक प्रयोगोंका परिणाम तथा जोड़ है । लेनिनके शब्दोंमें अनुभवमें हमारी बुद्धिपर अनिर्भर होकर बुद्धिके विषयोंका आविर्भाव होता है । ' मौसमी हवा और सामुद्रिक धाराएँ जीवरूपके आविर्भावके बहुत पहलेसे थीं । मानव ज्ञान और सामाजिक प्रयोगके आविर्भावके करोड़ों वर्ष पहले ये वर्तमान थीं, लेकिन बहुत दिनोंकी समुद्रयात्राके अनुभवसे ही इन हवाओं और धाराओंका ज्ञान सम्भव हो सका । फिर लेनिनके ही शब्दोंमें वह इसी रूपमें अनन्तकालसे चली आ रही है । युक्तियुक्त बुद्धिका आधार है, मानव-व्यवहार, जो