मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 91–100

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 91–100

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आधुनिक विचारधारा ८७ लिखित नियमोंके अनुसार निर्णय करते थे । इस प्रकार संसद्, कार्यपालिका, न्यायपालिका — राज्यके इन तीनों अंगोंकी स्थापना हुई । युद्ध एवं शान्ति-सम्बन्धी कार्योंको कार्यपालिकाके जिम्मे किया गया और न्यायाधीशकी नियुक्ति संसद्के जिम्मे; परंतु न्यायपालिकाको कार्यपालिकाका अंग माना गया । इस तरह शक्ति-विभाजनकी बात भी आ जाती है । इसीके अनुसार फ्रांसके लेखक मांटेस्क्यूने ' व्यक्तिगत स्वतन्त्रता ' का समर्थन किया । लॉककी राज्य संस्था स्वामी नहीं, किंतु एक सेवक है । उसे जनस्वीकृतिकी आवश्यकता थी । व्यक्ति और उसकी सम्पत्ति अर्थात् जीवनस्वतन्त्रता और सम्पत्तिकी सुरक्षा तथा नैसर्गिक नियमोंको लिपिबद्ध करना उसका कर्तव्य था । राजाके मनमाने शासन करने एवं संसद्के कार्यक्रम एवं निर्वाचनमें हस्तक्षेप करने, देशको विदेशी सत्ताके अधीन करने, संरक्षणकार्यमें असफल होने आदिकी हालतमें कार्यपालिकाका विरोध किया जा सकता है एवं उसे हटाया जा सकता है । लॉकके मतानुसार ' संसद् यद्यपि राज्यका प्राण है तथापि उसे भी नैसर्गिक नियमोंके विपरीत नियम-निर्माणका अधिकार नहीं । संसद् न मनमाने नियम बना सकती है, न नियम बनानेका भार किसी व्यक्ति या संस्थाको दे सकती है । ऐसी स्थितिमें नागरिक समाजद्वारा उसे पदच्युत करके दूसरी संसद् बनायी जा सकती है ।' लॉक किसी राजाका जन्मसिद्ध असाधारण अधिकार नहीं मानता था और निरपेक्ष राजाके अपने मुकदमेमें स्वयं न्यायाधीश माननेको सर्वथा न्यायरहित मानता था । राजाको सभी अधिकार जनताद्वारा मिले होते हैं । जनता अन्यायी राजासे अपने दिये हुए अधिकारोंको वापस ले सकती है । उसके मतमें नागरिक समाज ही सर्वोत्कृष्ट संस्था है । नागरिक लोगोंको सदा अधिकार रहता है कि नियमोल्लंघन करनेवाले राजा या संसद्को वैधानिक ढंगसे अथवा हिंसाद्वारा अलग कर दें । लॉकके मतानुसार ' सर्वोत्कृष्ट सत्ता जनतामें ही निहित होती है, परंतु स्वतन्त्रताके लिये सतर्कता अत्यावश्यक है । ' उसके विचारसे ' सतर्कता स्वतन्त्रताकी भगिनी है! शासनके कार्योंको देखते रहना, उसमें

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८८ मार्क्सवाद और रामराज्य त्रुटि होनेपर विरोध करना आवश्यक है । जनता एक सुप्तसत्ताधारी है । किन्हीं विशेष परिस्थितियोंमें ही वह अपनी सत्ताका प्रयोग करती है । इस मतसे समाज ही सर्वश्रेष्ठ है । शासक उसीके प्रति उत्तरदायी होता है और नैतिक नियमोंके परतन्त्र होता है । सरकार एक संरक्षकमात्र है, भोक्ता नहीं । जैसे किसी अभिभावकको किसी बालकके शिक्षणके लिये कुछ रुपया दिया जाता है तो वह उसका उसी कार्यमें विनियोग कर सकता है, उसे स्वयं भोग नहीं सकता । इसी प्रकार राजा राज्यका भोक्ता नहीं, किंतु संरक्षकमात्र है । इसमें विभिन्न वर्णोंके समन्वयमें कोई बाधा नहीं पड़ती।' हूकर, वर्क आदि भी इसी विचारधाराके थे । भारतीय राजनीतिमें सदासे ही समाजको सर्वश्रेष्ठ माना जाता है और उसमें वर्णाश्रमधर्मका समन्वय है । शासक धर्म एवं समाजके प्रति उत्तरदायी हैं । शासन बदलते रहते हैं, पर समाज और धर्म नहीं बदलते । राज्यके नियम धर्मशास्त्रोंके ही अनुकूल हो सकते हैं । व्यक्तिगत वैध सम्पत्तिपर आघात अन्याय माना जाता है । लॉक समाजको सत्ताधारी मानता है; साथ ही व्यक्तिको भी उच्चस्थान देता है । वह राजाको व्यक्तिका सेवक मानता है । इस सिद्धान्तको सेवाइनने बेमेल बताया । लॉकके अनुसार ' राज्यकार्य सुरक्षातक ही सीमित है । उसे नैतिकता- शिक्षा आदिके कामोंमें हाथ नहीं डालना चाहिये ।' यह विचारधारा धर्मनियन्त्रित राम - राज्यकी ही है; क्योंकि उसमें शिक्षा, सम्पत्ति एवं धर्मको सदा ही स्वतन्त्र रहना उचित समझा जाता है । राज्यलक्ष्मी चपला होती है । वह कभी देवता और कभी दानवके हाथ भी जा सकती है । उसके हाथमें शिक्षा- सम्पत्ति एवं धर्म जानेसे व्यक्ति और समाज सदाके लिये नष्ट हो जायँगे । उसीके बलपर व्यक्ति एवं समाज शासनोंमें रद्दोबदल कर सकते हैं । संसद्द्वे नामसे न सही परंतु नीतिशास्त्र एवं मन्त्रिमण्डलकी व्यवस्था सदासे ही धर्मनियन्त्रित शासनतन्त्रमें थी । आजकल समझा जाता है कि ' मानव -जातिका इतिहास उन्नतिका ही इतिहास है । ' अतः लॉकका यह कथन कि ' व्यक्ति पहलेसे ही नैतिक है, उसे नैसर्गिक नियमोंका ज्ञान था ' संगत नहीं है । यदि ऐसा ही था

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आधुनिक विचारधारा ८९ तो उसने प्राकृतिक स्थितिका त्याग क्यों किया? उसमें असुविधा, अनैतिकता क्यों आयी? उसे समाजकी आवश्यकता क्यों पड़ी? अतः नैतिकता, शिक्षा आदि सब समाजकी या व्यक्तिकी देन माननी चाहिये, परंतु रामराज्यके अनुसार इसका समाधान सरल है । जैसा कि कहा जा चुका है कि ' सत्य एवं धर्मके ह्राससे नैतिकतामें एवं ज्ञानमें कमी आयी, तभी राज्यकी अपेक्षा हुई । ' इस पक्षमें व्यक्ति और समाजकी स्थिति और सम्बन्ध सदा उसी ढंगका होता है, जैसे वृक्ष एवं वनका; सैनिकों एवं सेनाका । निरीश्वर जडवादके अनुसार ही ' उत्तरोत्तर विकास हो रहा है । पूर्वज लोग असभ्य, अज्ञानी एवं जंगली थे । ' ईश्वरवादीके यहाँ तो विज्ञानपूर्वक विश्वकी सृष्टि है । अतः सृष्टिकालमें लोग आजकी अपेक्षा अधिक ज्ञानशक्ति एवं नैतिकतासे पूर्ण थे । युगह्रासके अनुसार सत्त्व एवं शक्तिका ह्रास होनेसे ही विभिन्न प्रकारकी असुविधाएँ हुईं । धर्मनियन्त्रित शासनतन्त्रमें जनवाद एवं राजतन्त्रका समन्वय है, विरोध नहीं । धर्मशास्त्र सभीपर लागू होता है अन्यथा लॉकके मतानुसार ' व्यक्ति कभी नैसर्गिक नियमोल्लंघनके नामपर विरोध करते और नागरिकता स्वीकार करने न करनेमें स्वतन्त्र होते ' तब तो राज्यका चलना ही कठिन हो जाता । ' श्रम-मिश्रणसे ही धन व्यक्तिगत होता है ' लॉकका सम्पत्ति-सम्बन्धी यह सिद्धान्त सी० एच० ड्राइवर ( C. H. Driver) के मतानुसार ' एक अस्फुटित बम ' के समान था । रेकार्डो आदिने तो श्रम द्वारा ही वस्तुका मूल्य निर्धारित किया । मार्क्सने भी श्रमको ही आधार मानकर अपना मत खड़ा किया है, परंतु धर्म-नियन्त्रित शासनकी दृष्टिसे यह सिद्धान्त भी त्रुटिपूर्ण है; क्योंकि पद्मरागमणि, वज्रमणि आदिका मूल्य उनके गुणोंपर अवलम्बित होता है, श्रमपर नहीं । इसके साथ ही यह भी समझ लेना आवश्यक है कि भूमि आदि अनेक वस्तुओंमें श्रमयोगके बिना भी पितृ-पितामहादि - परम्परासे स्वत्व प्राप्त होता है । तब भी धर्म-नियन्त्रित व्यक्ति, समाज एवं राज्यद्वारा तथा उचित वितरणद्वारा आर्थिक सन्तुलन बना रहता था । अतः बेकारी, भुखमरीका प्रश्न ही नहीं उठता था । धर्म- नियन्त्रित व्यक्ति सब एक- दूसरेके पोषक ही होते हैं, शोषक नहीं होते ।

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९० मार्क्सवाद और रामराज्य रूसोके विचार १७८९ की फ्रांसकी राज्यक्रान्तिका प्रवर्तक रूसो दस वर्षकी अवस्थामें ही एक पादरीके यहाँ नौकरी करने लगा । बुरी आदतोंके कारण वहाँसे उसे हटा दिया गया । बादमें वह दूसरी नौकरीमें लग गया । वहाँ वह पूरा झूठा, चोर और आवारा बन गया । उसे मित्रोंसे सदा ही सहायता मिलती रही । बादमें एक धनाढ्य स्त्रीके सहारे उसे पढ़नेकी सुविधा मिली । फिर वह गरीबोंमें रहने लगा । वहाँ उसने शराबकी दूकान की, नौकरानीसे मैत्री कर ली और बिना विवाहके ही पाँच बच्चे पैदा किये । पीछे १७४९ में उसने ' विज्ञान और कलाकी उन्नतिसे नैतिकताकी वृद्धि हुई या अवनति ' इस विषयपर निबन्ध लिखकर पारितोषिक प्राप्त किया । इसी निबन्ध लिखनेके प्रसंगसे उसके जीवनमें परिवर्तन हुआ । उस निबन्धमें उसने बताया कि ' विज्ञान और कलाकी वृद्धिसे नैतिकताकी वृद्धि नहीं हुई, प्रत्युत पतन हुआ ।' पश्चात् उसने अनेक पुस्तकें लिखीं और आवारा रूसो एक दार्शनिक बन गया । १७५४ में असमानताके जन्मपर उसने पुस्तक लिखी । इसमें उसने प्राकृतिक स्थिति और राज्यका जन्म बतलाया । एक लेखमें उसने ' आदर्श सामान्य इच्छा ' और ' आदर्श राज्य ' का वर्णन किया । अपनी शिक्षासम्बन्धी पुस्तकमें उसने ' धर्मप्रभावित शिक्षा ' का विरोध किया । इससे तात्कालिक पादरियों एवं सरकारने उसका विरोध किया । रूसोके समयमें किसानोंकी दशा बहुत शोचनीय थी । मध्यम वर्गमें निराशा एवं उदासीनता छायी हुई थी । रूसोके मतानुसार ' मानवमें भावनाका स्तर विवेकसे भी ऊँचा है । ' उसके अनुसार ' आधुनिक सभ्यताने मनुष्यको अनैतिक एवं व्यभिचारी बनाया है । सभ्यताके पूर्व व्यक्तिका जीवन आदर्शमय था । ' उस समयके अन्य विचारक कुशलताको महत्त्व देते थे, परंतु रूसोने स्वतन्त्रताको सर्वोच्च स्थान दिया । वह राजतन्त्रका कट्टर विरोधी था, सुतरां गरीबों और किसानोंका आदर्श दार्शनिक था । रूसोकी प्राकृतिक स्थितिमें ' मनुष्य नेक, सुखी, सीधे, चिन्तारहित, स्वस्थ, शान्तिप्रिय, एकान्तप्रिय एवं सन्तुष्ट थे । कोई निजी घर न था और

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आधुनिक विचारधारा ९ १ न सम्पत्ति ही थी । विवाह प्रथा भी नहीं थी और न कुटुम्ब ही था । भूमिके उत्पादनसे ही भौतिक इच्छाओंकी पूर्ति हो जाती थी । पूर्ण समानता, स्वतन्त्रता व्यापक थी । कोई वस्त्र -समस्या भी न थी । ' उसके मतानुसार ' प्राकृतिक युगमें आधुनिक बुराइयाँ नहीं थीं, परंतु आधुनिक भलाइयाँ भी न थीं । संक्षेपमें वह एक नेक जंगलीकी भाँति था । प्राकृतिक मनुष्योंको न्याय, अन्याय और मृत्युका भी ज्ञान नहीं था । उसमें बुराई समाजके सम्पर्कसे ही आयी । ' उसके मतानुसार ' नैतिकता समाजकी देन है । ' हॉब्सके विचारोंका उसने खण्डन किया था । भारतीय आर्ष इतिहासके अनुसार हॉब्स और रूसो दोनोंकी ही प्राकृतिक स्थितिका वर्णन असंगत है; क्योंकि अपने यहाँके मतानुसार सत्त्वगुणके विकासके समय नैतिकता और सभ्यता थी । सत्त्व-ह्रासके पश्चात् हॉब्सका चित्रण ठीक ही है । ' असमानताका जन्म ' पुस्तकमें उसने बताया है कि ‘ एक मनुष्यने एक भूमिके टुकड़ेको घेरा और कहा कि ' यह मेरा है । ' उसने अन्य भोले मनुष्योंसे उस टुकड़ेपर अपना अधिकार स्वीकार करवाया । उसके अनुसार यह मनुष्य ही सभ्यताका जन्मदाता बना । उसी तरह अन्य मनुष्योंने भी धीरे - धीरे भूमिके टुकड़ोंको अपनाया और दूसरोंसे अपना स्वामित्व स्वीकार करवाया । इस तरह व्यक्तिगत सम्पत्ति और असमानता ही सभ्यताकी जन्मदात्री है । ' वस्तुतः कई शब्दोंका दुर्भाग्य भी कभी आया करता है । उनका अर्थ सुन्दर होते हुए भी अधिकांश लोगोंद्वारा उनका प्रयोग कभी बुरे अर्थोंमें होने लगता है । ' सम्प्रदाय ' ' साम्राज्य ' ' सभ्यता' आदि शब्द इसी ढंगके हैं । इनका अर्थ बहुत श्रेष्ठ होनेपर भी पाश्चात्य देशोंमें इनका बहुत दुरुपयोग हुआ और इनका ' फिरकापरस्ती ' ' शोषण ' एवं ' असमानता ' आदिमें प्रयोग होने लगा । वस्तुतः समष्टि, व्यष्टि, अभ्युदय एवं परम निःश्रेयस, अपवर्गके अनुकूल ज्ञान-क्रिया-सम्पन्न शिष्ट व्यक्ति या समाज ही सभ्य कहा जाता है । तदनुकूल परम्परा ही सम्प्रदाय एवं उसका व्यवस्थापक ही धर्मनियन्त्रित साम्राज्य था । रामराज्यका साम्राज्य इसी कोटिका था । तभी केवल मनुष्योंके लिये ही नहीं, किंतु पशु-पक्षीको

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९२ मार्क्सवाद और रामराज्य भी वहाँ सरल-सस्ता न्याय मिलता था । रूसोके अनुसार ' उसी असमानताकी रक्षाके लिये पुलिस सरकार आवश्यक हुई । इन सबके द्वारा अमीरोंके अत्याचारोंको स्थायी बननेमें सहायता मिली । समाजके जन्मसे ही दुःख एवं दरिद्रताका जन्म हुआ । समाज और सभ्यताकी वृद्धिसे गरीबी, भूख, शोषण, हत्या, बीमारीकी वृद्धि हुई । रूसोने अपनी ' सामाजिक अनुबन्ध ' ( सोशल कंट्राक्ट) पुस्तकमें लिखा है कि ' मनुष्य स्वतन्त्र जन्मा, परंतु सभी ओर जंजीरोंसे जकड़ा हुआ । ' उसकी ' येमिल ’ पुस्तकमें भी ऐसे ही विचार हैं । आधुनिक लोग भी मानते हैं कि ' रूसोकी अपनी व्यक्तिगत अनुभूतिका ही यह चित्रण है । अपमान और दुःखकी प्रतिक्रियास्वरूप ही उसने यह विचार व्यक्त किया है । ' सुतरां इसमें तात्त्विक सत्यताकी अपेक्षा प्रतिक्रियाकी भावना ही अधिक है । उसका विश्वास था कि ' वह नेक था, किंतु समाजकी परिस्थितियोंने उसे आवारा बनाया । ' उसने ‘ सामाजिक अनुबन्ध ' में लिखा है कि किस प्रकार एक ऐसी संस्था स्थापित हो, जिससे प्रत्येक व्यक्ति अन्य व्यक्तियोंके साथ संघटित होते हुए भी केवल अपनी-अपनी इच्छाका पालन करे अर्थात् स्वतन्त्रता सुरक्षित रखते हुए कैसे सुव्यवस्था स्थापित की जाय । किंतु रामराज्यीय दृष्टिकोणसे बिना इच्छाओंपर नियन्त्रण किये अर्थात् बिना उन्हें सीमित बनाये कोई भी संघटन हो ही नहीं सकता । समान उद्देश्यकी पूर्तिके लिये एक सूत्रमें सबके मन और इच्छाओंका आबद्ध होना ही वास्तविक संघटन है । कहा जाता है कि ' रूसोको समस्या स्वतन्त्रता और सुव्यवस्थाका समन्वय थी । इसकी पूर्तिके लिये उसने परम्परागत अनुबन्धका प्रयोग किया । हॉब्सके अनुसार वह व्यक्तियोंद्वारा अपने सभी अधिकारोंका समर्पण आवश्यक समझता था और लॉकके अनुसार इन अधिकारोंको एक ऐसे आदर्श संघको दिया जाना ठीक मानता था, जो व्यक्तियोंकी एक राशि हो । ' रूसोके अनुसार ' अ, ब, स, द व्यक्तियोंको अपने सब अधिकार अ+ ब+ स+ द संघको इकरारनामा ( अनुबन्ध ) -के द्वारा समर्पण करना चाहिये । इसी व्यवस्थासे प्रत्येक व्यक्तिके अधिकारोंकी सुरक्षा हो

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आधुनिक विचारधारा ९३ सकती है । इस संघ- राज्यके नियम प्रत्येक व्यक्तिकी स्वीकृतिसे निर्मित होंगे । ' परंतु हॉब्सके समान ' दीर्घकायको अधिकारोंका समर्पण ' उसकी दृष्टिमें ' स्वतन्त्रताका त्याग या मानवताका त्याग है । इस समर्पणसे व्यक्ति दासतुल्य हो जाता है । दीर्घकाय ही सर्वेसर्वा बन जाता है । अतः ऐसा त्याग सिवा पागलपनके और कुछ नहीं । ' इसी तरह रूसो लॉककी प्रतिनिधि सभाका भी विरोधी था । ब्रिटेनकी निर्वाचन -प्रथाका भी वह समालोचक था । निर्वाचनके बाद भी व्यक्ति दासतुल्य ही हो जाता है । उसके मतानुसार ' आलस्यके कारण व्यक्ति या व्यक्तिगत समूह न स्वयं सुरक्षित रह सकता है, न राज्यद्वारा ही सुरक्षित रह सकता है । करोंके रूपमें धन देकर, सेनाद्वारा व्यक्तिगत रक्षा और प्रतिनिधियोंद्वारा सुव्यवस्थाका प्रबन्ध करना मूर्खता ही है । ' लॉकके मतानुसार ' सभ्यतासे पहले भी व्यक्ति विवेकशील एवं न्याय-अन्यायका ज्ञाता था । ' यही विचार रूसोके समयके व्यक्तिवादियोंका था । रूसोने उसका खण्डनकर यूनानी ग्रीक दर्शनके अनुसार बतलाया कि ' यह सब राज्यद्वारा ही सम्भव हो सकता है । राज्यके द्वारा ही व्यक्ति व्यक्तित्वको भी पा सकता है । उसके बिना मनुष्य मक्खीके तुल्य है । अधिकार, कर्तव्यपरायणता, स्वतन्त्रता, आत्मोत्थान, सम्पत्ति, नैतिकता और न्याय- अन्यायका ज्ञान राज्यद्वारा सम्भव है । ' यह सब व्यक्तिवादका उत्तर था । यहाँ भी रूसोके कथनमें पूर्वापरविरोध है । एक ओर वह समाज और सभ्यताको तथा राज्यसरकार आदि संस्थाओंको गरीबी, भुखमरी, अत्याचारका सहायक मानता है । उसके पहले व्यक्तिको नैतिक एवं नेक मानता है और दूसरी ओर राज्यके बिना व्यक्तियोंको मक्खीतुल्य बतलाता है । रूसो आदर्श राज्यको ही सत्ताधारी मानता था । अर्थात् इस राज्यकी सामान्य इच्छाको सत्ताधारी मानता था । लॉकका राज्य संरक्षक मात्र था, सत्ताधारी नहीं । हॉब्सका ' दीर्घकाय ' ही सब कुछ था । रूसोने अपने जनवादी राज्यको एक अवयवीकी भाँति माना है । ' सत्ताधारी जनसभा या धारासभा इसका सिर है । नियम एवं परम्परा मस्तिष्क; न्यायाधीश, सरकारी कर्मचारी मस्तिष्कके स्नायु; व्यापार-

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९४ मार्क्सवाद और रामराज्य व्यवसाय और कृषि मुख और उदर; आय रक्त और नागरिक शरीरके अंगोंकी भाँति हैं । राज्य एवं नागरिकोंके सम्बन्ध अवयव एवं अवयवीके सम्बन्धके तुल्य हैं । अवयवोंकी सुव्यवस्था अवयवीकी सुव्यवस्थापर एवं अवयवीकी सुव्यवस्था अवयवोंकी सुव्यवस्थापर निर्भर है । अर्थात् राज्य एवं नागरिकोंकी सुव्यवस्था एवं प्रगति अन्योन्याश्रित है । ' उसके अनुसार ' सामान्य इच्छा सदा ही नागरिकोंकी सामान्य इच्छाका प्रतिनिधित्व करेगी और वह उनके स्थायी हितका प्रतिनिधित्व करेगी । ' इसी आधारपर रूसोने यह भी कहा था कि ' नागरिक सदा ही राज्यहितमें व्यक्तिगत हित देखेगा, सदा राज्यकी सामान्य इच्छाके अनुसार ही सोचेगा । ऐसा न करनेवाला नागरिक भ्रान्त है । ऐसे भ्रान्तको राज्यकी इच्छाका अनुसरण करनेके लिये बाध्य किया जायगा, अर्थात् उसे स्वतन्त्र होनेके लिये राज्यद्वारा बाध्य किया जाना चाहिये । ' वस्तुतः यह सामान्य इच्छा एक प्रत्यक्ष जनवादी संघ हॉब्सके दीर्घकायके ही तुल्य सर्वेसर्वा है और वह निरपेक्ष है । मनुष्यकी सद्भावनापर रूसोका अटूट विश्वास था । उसके अनुसार ' राजनीति और प्रचारकोंद्वारा विशुद्ध मनुष्य प्रवंचनामें डाला जाता है । राजनीतिक दल, समाचारपत्र आदि यन्त्र ऐसी प्रवंचनाके स्रोत हैं । ये यन्त्र नागरिकोंको कृत्रिमरूपसे संस्थाओंमें विभक्त कर देते हैं । दलोंकी इच्छासे उसके सदस्य प्रभावित भी होते हैं । इन दलों या यन्त्रोंद्वारा कई सामान्य इच्छाएँ बन जाती हैं । अतः ऐसे राजनीतिक दल या संघ आदर्श सुव्यवस्थामें अनावश्यक ही नहीं, किंतु बाधक भी होते हैं । इनके न रहनेपर राज्य और नागरिकोंमें सीधा सम्बन्ध रहता है, नागरिक सदा ही दल या संस्थाओंकी अपेक्षा राज्यके हितमें ही अपना हित समझेंगे । वे सामान्य इच्छाके अनुसार जीवन -यापन करना ठीक समझते हैं । ' इसीलिये रूसो ' अद्वैतवादी दार्शनिक ' समझा जाता है । ' संघों, दलोंको समाप्त करनेके लिये उनकी संख्या बहुत बढ़ा देनी चाहिये । इससे वे स्वयं अस्तित्वहीन हो जाते हैं । ' रूसो प्राचीन नैसर्गिक स्वतन्त्रताकी प्राप्ति सम्भव नहीं समझता था, परंतु एक उच्च नैतिक नागरिक स्वतन्त्रताकी प्राप्ति सम्भव

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आधुनिक विचारधारा ९५ मानता था । इसके मतानुसार ‘ नागरिकोंकी सभा भी नियमनिर्णयकी अधिकारिणी है; प्रतिनिधि सभा नहीं । नियमोंको कार्यान्वित करनेके लिये कार्यपालिका होती है । कार्यपालिका नागरिकोंकी सभाके प्रति पूर्ण उत्तरदायी होती है । यह कार्यपालिका ही सरकार होती है । ' रूसोके मतानुसार ' ऐसा जनवाद अपने सदस्योंसे स्थायी सतर्कताकी आशा रखता है । यद्यपि ऐसे जनवादको सदा ही खतरा रहता था । उसका आदर्श वाक्य था ' मैं खतरनाक स्वतन्त्रताको शान्तिपूर्ण दासत्वसे अच्छी समझता हूँ। ' ऐसे नागरिक ही इस व्यवस्थाको स्थायी बना सकते हैं । ' रूसोका यह ऐतिहासिक वाक्य है कि 'जनवाणी ही देववाणी है । ' उसने सामान्य इच्छाको निरपेक्ष, अदेय, अविभाज्य, स्थायी एवं सत्य माना है । उसने हॉब्सकी ' निरपेक्षता ' और लॉककी ' जनस्वीकृति ' का मिश्रण किया है । उसने हॉब्सकी निरपेक्षताको जनवादी रूप और लॉककी जनस्वीकृतिको सक्रिय रूप दिया । रूसोकी पुस्तकोंसे क्रान्तिकी ज्वाला धधक उठी, परंतु वह स्वयं क्रान्तिकारी नहीं था । उसने १७५२ के अपने एक भाषणमें कहा कि ' क्रान्तिको उतना ही भयानक मानना चाहिये, जितना कि उन बुराइयोंको –जिन्हें क्रान्ति दूर करना चाहती है । उसने जेनेवाके नागरिकोंको लिखा था कि ' आप स्वतन्त्रता अवश्य प्राप्त कीजिये; परंतु मानव - हत्याके विरुद्ध दासताको पसन्द कीजिये । ' नियम बनानेका कार्य किसी राष्ट्र सम्पूर्ण नागरिकोंद्वारा हो सकना सम्भव नहीं होता । जनताद्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियोंद्वारा ही वह सम्भव होता है । अतः प्रतिनिधिसभाका विरोध भी रूसोका अयौक्तिक है । ' सभ्य समाजने व्यक्तिको दुःखी, अनैतिक, व्यभिचारी बनाया ' यह भी रूसोकी धारणा भ्रान्तिपूर्ण है । विशिष्ट विचारशील लोग ही मार्गदर्शक हो सकते हैं । ' राब्सपीयरने रूसोको ' राज्यक्रान्तिका देवता' घोषित किया था । रूसो व्यक्तिवादका समर्थन करते हुए पूर्ण अराजकतावादी स्वतन्त्रताका समर्थक बन जाता है और सभ्य समाजका कट्टर विरोधी प्रतीत होता है । वह स्वतन्त्रता, नैतिकता एवं समाजका विरोध मानता था । इसी आधारपर

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९६ मार्क्सवाद और रामराज्य फ्रांसीसियोंने तत्कालीन समाजका विरोध किया, व्यक्तिगत सुरक्षाके लिये संघर्ष किया और क्रान्तिके पश्चात् ' राष्ट्रिय सभा ' की घोषणा हुई । यह विचारधारा भविष्यके व्यक्तिवादियोंकी पृष्ठभूमि बनी; क्योंकि व्यक्तिवादी भी स्वतन्त्रता तथा समाजका परस्पर विरोध मानते थे । वार्करने रूसोके लेखको ‘ व्यक्तिवादका प्राण ' कहा था, परंतु अन्यत्र रूसो अधिनायकवादका भी समर्थक प्रतीत होता है, जैसा पहले दिखाया जा चुका है कि ' राज्य बिना व्यक्ति मक्खी- तुल्य है । ' राज्यद्वारा व्यक्तिको स्वतन्त्र होनेके लिये बाध्य किया जाना वह ठीक मानता था । राज्यद्वारा निर्मित नागरिक धर्मका उल्लंघन करनेवाले नागरिकको फाँसीका दण्ड देना उचित समझता था । इसीलिये व्हानने रूसोको ' व्यक्तित्वका शत्रु ' भी कहा है । हाँ, वह यह अवश्य कहता है कि ' सामान्य इच्छाका स्रोत जनमत है । ' एक तरफ वह कहता है — ' मनुष्य जन्मा स्वतन्त्र परंतु सभी ओर जंजीरोंसे जकड़ा हुआ ' और उसी पुस्तकमें राज्यकी निरपेक्षताका भी वर्णन करता है । उसका यह भी कहना है कि ' पूर्ण स्वतन्त्रता किसी देशमें ही सम्भव है, सब जगह नहीं । ' वह स्वतन्त्रताका जलवायुसे भी घनिष्ठ सम्बन्ध मानता है । व्यक्तिगत सम्पत्तिको उसने समाज और राज्यकी धात्री बताया और उसे ही दरिद्रता और दासताकी जननी भी । किंतु वही अन्यत्र सम्पत्तिको भली वस्तु भी बताता है । ' येमिल ' में भी उसने व्यक्तिगत सम्पत्तिके आधारको न्याययुक्त माना है । उसकी रक्षा राज्यका कर्तव्य बताया है और ' कार्सिका ' पुस्तकमें कहा है कि ' व्यक्तिगत सम्पत्तिका अन्त नहीं किया जा सकता है । इस तरह कहीं वह इस ' सम्पत्तिका शत्रु ' प्रतीत होता है और कहीं उसका ' पुजारी ' । इसी तरह कही ' स्वतन्त्रताका अग्रदूत ' तो कहीं ' दासताका अग्रदूत' । जनवादके विपरीत वह सीमित राजतन्त्रका भी समर्थक बना । कहीं शिक्षाकी स्वतन्त्रताको ठीक कहा तो कहीं उसका राजतन्त्र होना ठीक कहा । कहीं कलाकी निन्दा की तो कहीं प्रशंसा । कहा जाता है कि ' रूसोका जीवन जैसे अव्यवस्थित था, वैसा ही उसका दर्शन भी । ' रामराज्यकी दृष्टिमें खल प्राणीकी सम्पत्ति अवश्य शोषणका कारण