भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 141–150
भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 141–150
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७० नाट्यशास्त्रम् जर्जर प्रार्थनात्वं महेन्द्रप्रहरणं सर्वदानवसूदनम् । (एक )!निर्मितस्सर्वदेवैश्च सर्वविघ्ननिबर्हण ॥। १३ ॥ II
नृपस्य विजयं शंस रिपूणां च पराजयम् ।
गोब्राह्मणशिवं चैव नाट्यस्य च विवर्धनम् ॥ १४ ॥
हे जर्जर! तुम इन्द्र के समस्त दैत्यों का संहार करने वाले आयुध हो । समस्त देवताओं ने तुम्हारा निर्माण सम्पूर्ण विघ्नों के निवारणार्थ किया है । तुम हमारे राजा को विजय एवं शत्रुओं को पराभव प्रदान करो, गौ एवं ब्राह्मण का मंगल करो तथा नाट्य की उन्नति करो ॥ १३-१४ ॥ क
पूजन विधि- एवं कृत्वा यथान्यायमुपास्यं नाट्यमण्डपे ।
निशायां तु प्रभातायां पूजनं प्रकमेदिह ॥ १५ ॥
इस प्रकार नियमानुसार पूजन करके तथा रात्रि में नाट्यमण्डप में ही रहकर विद्वान् (नाट्याचार्य ) को चाहिए कि रात्रि के प्रभातकाल में बदलते ही पुनः पूजनविधि प्रारम्भ कर दे ॥ १५ ॥
रङ्गमञ्च पूजन के शुभ नक्षत्र- आर्द्रायां वा मघायां वा याम्ये पूर्वेषु वा त्रिषु । आश्लेषामूलयोर्वापि कर्तव्यं रङ्गपूजनम् ॥ १६ ॥
आर्द्रा, मघा, भरणी अथवा पूर्वशब्दयुक्त तीन' ( पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्व भाद्रपाद ) नक्षत्रों अथवा आश्लेषा या मूल नक्षत्र में रङ्गपूजन करना चाहिये || १६ || पूजन विधि- आर्येण तु युक्तेन शुचिना दीक्षितेन च । INTHS रङ्गस्योद्योतनं कार्यं देवतानां च पूजनम् ॥ १७ ॥ THES TE
एकाग्रचित्त, पवित्र तथा दीक्षा लिए हुए आचार्य के द्वारा रङ्गस्थल को (दीप आदि जलाकर ) प्रकाशित करना चाहिये तथा देवताओं की पूजा करनी चाहिए ॥ १७ ॥
१. पूर्वेषु वा त्रिषु— “तानि पूर्वफाल्गुनी पूर्वाषाढा पूर्वाभाद्रपदा (अभिनवगुप्त) ।
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तृतीयोऽध्यायः ७१ देवताओं की स्थापना
दिनान्ते दारुणे घोरे मुहूर्ते यमदैवते ।
आचम्य तु यथान्यायं देवता वै निवेशयेत् ॥ १८ ॥
दिवस के अवसान के समय ऐसे भीषण दारुणमुहूर्त में जिसके अधिष्ठातृ देवता भूतगण हैं, नियमपूर्वक आचमन करके देवताओं को स्थापित करना चाहिए ॥ १८ ॥
पूजनोपयोगी पदार्थ- रक्ताः प्रतिसरा: सूत्र रक्तगन्धाश्च पूजिताः । p रक्ताः सुमनसश्चैव यवैस्सिद्धार्थकैर्लाचं॑ रक्षतैः यच्च" रक्तशालितण्डुलैफलं भवेत्: ॥। १ ९ ॥ नागपुष्पस्य चूर्णेन वितुषाभिः प्रियङ्गुभिः ॥ २० ॥
उपर्युक्त ( पूजाविधि में ) लालरंग के प्रतिसर ( सूत्रनिर्मित गांठों से युक्त कंकण) सूत्र अभिन्दनीय लाल सुगन्धित द्रव्य, लालरंग के पुष्प एवं लाल रंग के फल, जौ, सिद्धार्थक ( सरसों ), धान, साबुत चावल, शालि तण्डुल, नागदन्त का चूर्ण, तथा भूँसी रहित प्रियंगु होने चाहिये ॥ १ ९ -२० ॥
मण्डल रचना - एतद्रव्यैर्युतं कुर्याद्देवतानां निवेशनम् ।
आलिखेन्मण्डलं पूर्वं यथास्थानं यथाविधि ॥ २१ ॥
इन (ऊपर चर्चित ) द्रव्यों के साथ देवताओं को अधिष्ठित कराना चाहिए तथा (देवताओं के अधिष्ठान के ) पहले उपर्युक्त स्थल पर नियमपूर्वक एक मण्डल की रचना कर लेनी चाहिये ॥ २१ ॥
मण्डल परिमाण एवं द्वार की विधि-
समन्ततश्च कर्तव्यं हस्ताः षोडश मण्डलम् ।
द्वाराणि चात्र कुर्वीत विधानेन चतुर्दिशम् ॥ २२ ॥
१. प्रतिसरा- सूत्रविनिर्मिता ग्रन्थिमन्तः कङ्कणविशेषाः (अभि० भा० ) । २. प्रियंगु शब्द के चार अर्थ हैं - १ – विशेष लता, २– मालकांगनी, ३– काकुन नामक अन्न, ४ –— केसर । यहाँ वितुषाभिः ( छिलका रहित ) सविशेषणयुक्त होने के कारण इसका अर्थ काकुन नामक अन्न करना ही समुचित प्रतीत होता है ।
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७२ नाट्यशास्त्रम् इस मण्डल को चारों ओर से सोलह हाथ ( वर्गाकार ) होना चाहिए एवं इसमें चारों तरफ विधानानुसार द्वार होने चाहिएए ॥॥ २२२२ ॥।
मण्डल में विविध देवों की स्थापना- मध्ये चैवात्र कर्तव्ये द्व रेखे तिर्यगूर्ध्वगे । TEP तयोः कक्ष्याविभागेन देवतानि निवेशयेत् ॥। २३ ॥ __TEPE यहीं ( मण्डल के ) बीच में खड़ी एवं आड़ी दो रेखाए बनानी चाहिये । इन्हीं २३ ॥रेखाओं से बने कोष्ठकों में देवताओं को आसीन कराना चाहिए ॥
मण्डल के मध्य भाग के देवता- पद्मोपविष्टं ब्रह्माणं तस्य मध्ये निवेशयेत् ।
आदौ निवेश्यो भगवान्सार्धं भूतगणैः शिवः ॥ २४ ॥
उस ( मण्डल ) के मध्य भाग में कमलासीन ब्रह्मा को आसीन कराना चाहिए ॥। २४ ॥ सर्वप्रथम भूतों के साथ भगवान् शिव को स्थापित कराना चाहिये
मण्डल के पूर्व दिशा के देवता- नारायणो महेन्द्रश्च स्कन्दः सूर्योऽश्विनौ शशी ।
सरस्वती च लक्ष्मीश्च श्रद्धा मेधा च पूर्वतः ॥ २५ ॥
सरस्वती, लक्ष्मी, नारायण, इन्द्र, स्कन्द, सूर्य, दोनों अश्विनीकुमार, चन्द्रमा, श्रद्धा एवं मेधा को पूर्वदिशा में (स्थापित करना चाहिए) ॥ २५ ॥
मण्डल की दक्षिण पूर्व दिशा के देवता- पूर्वदक्षिणतो वह्निर्निवेश्यः स्वाहया सह ।
विश्वेदेवाः सगन्धर्वा रुद्राः सर्पगणास्तथा ॥ २६ ॥
दक्षिण पूर्व दिशा में स्वाहा के सहित अग्नि की, गन्धर्वों सहित विश्वेदेवों, रुद्रों तथा सर्पगणों की (स्थापना करनी चाहिये ) ॥ २६ ॥
दक्षिण दिशा के देवता- दक्षिणेन निवेश्यस्तु यमो मित्रच सानुगः ॥। २७ ॥ 11 3पितृन्पिशाचानुरगान् गुह्यकांश्च निवेशयेत् पिशाचों, सर्पों, एवं दक्षिण दिशा में यम एवं अनुचरों सहित मित्र, पितृगणों, गुह्यकों को आसीन कराना चाहिए ॥ २७ ॥ प्रहरी
नैर्ऋत्यकोण व पश्चिम दिशा के देवता- नैर्ऋत्यां राक्षसांश्व व भूतानि च निवेशयेत् । पश्चिमायां समुद्रांश्च वरुणं यादसां पतिम् ॥ २८ ॥
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तृतीयोऽध्यायः ७.३ नैऋत्यकोण में (दक्षिण एवं पश्चिम दिशा का मिलन बिन्दु) राक्षसों तथा भूतों को और पश्चिम दिशा में सागरों एवं जल के अधिपति वरुण को स्थापित करना चाहिये ॥ २८ ॥ ELE FIERE PE FAIR BESIF - वायव्य कोण के देवता राज्य fe fur वायव्यायां दिशि तथा सप्तः वायून्निवेशयेत् । तत्रैव विनिवेश्यस्तु गरुडः पक्षिभिः सह ॥ २९ ॥
वायव्य (उत्तर पश्चिम ) कोण में सप्तविध पवनों ( मरुद्गणों ) को (स्थापित करना चाहिये ) एवं इसी स्थान पर पक्षियों के साथ गरुड को भी आसीन कराना चाहिये ॥ २ ९ ॥ १. सप्तवायु —ऋग्वेद में सात सात पवनों के सात समूह मानकर ४ ९ मरुद्गण माने गये हैं । यजुर्वेद के १७वे अध्याय के ८० मन्त्र से ८५ मन्त्र तक ६ मन्त्रों में क्रमश: मरुतों के सात सात के छः गणों (समूहों) के नाम दिये गये हैं तथा ३ ९वें अध्याय के सातवें श्लोक में सातवें गण के सात मरुतों के नाम दिये गये हैं । वे नाम इस प्रकार हैं- SHE JEF क मरुतों का प्रथमगण (यजुर्वेद १७-८० ) - १. शुक्रज्योति २.चित्रज्योति ३. सत्यज्योति ४. ज्योतिष्मान् ५. शुक्र ६. ऋतपा ७. अत्यंहा । मरुतों का द्वितीयगण (यजुर्वेद १७-८१ ) - क १. ईदृङ २. अन्यादृङ् ३. संदृ ४ प्रतिसंदृ ५. मित ६. सम्मित ७. सभरा । मरुतों का तृतीयगण (यजुर्वेद १७-८२ ) १. ऋत २. सत्य ३. ध्रुव ४. धरुण ५. धर्ता ६. विधर्ता ७ विधरय । मरुतों का चतुर्थंगण ( यजुर्वेद १७-८३ )- p १. ऋतजित् २. सत्यजित् ३. सेनजित् ४. सुषेण ५. अन्तिमित्र ६. दूरमित्र ७. अमित्र । भाव मरुतों का पंचमगण ( यजुर्वेद १७-८४ ) - १. ईदृक्षास २. एतादृक्षस् ३. सदृक्षास ४. प्रतिसदृक्षास ५. मित्तास ६. सम्मि- तास ७. सभरसृ । सेक
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७४ नाट्यशास्त्रम् उत्तर दिशा के देवता- 135 न निवेशयेत् । एक बैंक नाट्यस्य मातृश्च तथा यक्षनाथ सगुह्यकान् ॥ ३० ॥
उत्तर दिशा में धनाधिपति कुबेर को एवं नाट्यमाताओं एवं गुह्यकों सहित यक्षों को भी स्थापित करे ॥ ३० ॥
मण्डल की पूर्व दिशा के देवता- SPIE तथैवोत्तरपूर्वायां नन्द्याद्यांश्च गणेश्वरान् । ब्रह्मर्षिभूतसंघांश्च यथाभागं 2 निवेशयेत् ॥ ३१ ॥ क
इसी भाँति उत्तर पूर्व दिशा में नन्दी आदि गणेश्वरों को और ब्रह्मर्षियों व भूतों के समुदायों को यथा स्थान स्थापित करना चाहिए ॥ ३१ ॥
मण्डल की चारों दिशाओं में स्तम्भों के देवता- स्तम्भे सनत्कुमारं तु दक्षिणे दक्षमेव च । ग्रामण्यमुत्तरे स्तम्भे पूजार्थं संनिवेशयेत् ॥ ३२ ॥
(पूर्वदिशा में स्थित) स्तम्भ पर सनत्कुमार को, दक्षिण (स्तम्भ ) पर दक्ष को एवं उत्तर स्तम्भ पर ग्रामणी को पूजा के लिए स्थापित करना चाहिए ॥ ३२ ॥
उपसंहार- अनेनैव विधानेन यथास्थानं यथाविधि ।
सुप्रसादानि सर्वाणि दैवतानि निवेशयेत् ॥ ३३ ॥
इस विधान के अनुरूप समस्त देवताओं को भलीभाँति प्रसन्न करके विधि- पूर्वक उचित स्थान पर आसीन कराना चाहिए ॥ ३३ ॥
देव पूजन का उपक्रम— स्थाने स्थाने यथान्यायं विनिवेश्य तु देवताः । एक तासां प्रकुर्वीत ततः पूजनं तु यथार्हतः ॥ ३४ ॥
मरुतों का षष्ठगण ( यजुर्वेद १७-८५) - १. स्वतवान् २. प्रधासी ३. सान्तपन ४. गृहमेधी ५. क्रोडी ६. शाकी ७. उज्जेषी । मरुतों का सप्तम गण ( यजुर्वेद ३ ९-७ ) - १. उग्र २. भीम ३. ध्वान्त ४. धुनि ५ सासह्वान् ६. अभियुग्वा । गरुड पुराण ६.५८-६४ में मरुतों के इन सातों गणों के नामम मिलते हैं कुछ 715 नामों में अन्तर है ।
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७५ तृतीयोऽध्यायः प्रत्येक स्थान पर यथानुकूल देवताओं को आसीन कराकर उनकी यथायोग्य पूजा करनी चाहिए ॥ ३४ ॥
देवमालाओं के वर्ण—
देवताभ्यस्तु दातव्यं सितमाल्यानुलेपनम् ।
रक्तमाल्यानुलेपनम् ॥ ३५ ॥
गन्धर्ववह्निसूर्येभ्यो देवताओं को सफेद रङ्ग की मालाएँ व अनुलेपन देना चाहिए । गन्धर्वो मालाएँ और अनुलेपन (प्रदान करनी अग्नि, और सूर्य को लालरंग की चाहिये ) ॥ ३५ ॥
देव पूजन विधि- गन्धं माल्यं च धूपं च यथावदनुपूर्वशः । बलि पूजां यथाविधि ॥ ३६ ॥ दत्त्वा ततः प्रकुर्वीत
यथायोग्य गन्ध, मालाएँ एवं धूप अर्पण समस्त देवताओं को क्रमानुसार करके उन्हें विधिपूर्वक बलि प्रदान करके पूजा करनी चाहिए ॥ ३६ ॥
विभिन्न देवों के नैवेद्य- ब्रह्माणं मधुपर्केण पायसेन सरस्वतीम् । सम्पूज्या मोदकैरथ ॥ ३७ ॥ शिवविष्णुमहेन्द्राद्याः
खीर से एवं शिव, विष्णु एवं इन्द्र इत्यादि ब्रह्मा की मधुपर्क' से, सरस्वती की
की पूजा लड्डुओंघृतौदनेनद्वारा करनीहुतभुक्सोमाचाहिए ॥ ३७ ॥ तु गुडौदनैः ।
विश्वेदेवाः सगन्धर्वा मुनयो मधुपायसैः ॥ ३८ ॥
घी और चावल से अग्नि, गुड़ व चावल से रवि शशि और मधु व खीर से विश्वेदेवों तथा गन्धवों सहित मुनियों की पूजा करनी चाहिए ॥ ३८ ॥
यममित्रौ च सम्पूज्यावपूपैर्मोदकैस्तथा । पितॄन्पिशाचानु रगान् सर्पिःक्षीरेण तर्पयेत् ॥ ३ ९ ॥ यम एवं मित्र की अर्चना पुओं तथा लड्डुओं से करनी चाहिये तथा पितरों पिशाचों और सर्पों को घी एवं दुग्ध द्वारा तृप्त करना चाहिये ॥ ३ ९ ॥ १- २. श्री घोष के विचार में यहाँ श्वेतवर्ण से पवित्रता एवं कल्याण की भावना का प्रदर्शन किया गया है, तथा रक्तवर्ण शक्ति का प्रतीक है । रंगों की इस मनोवैज्ञानिक अभिव्यक्ति का अनौचित्य सिद्ध करना हमें अभिप्रेत नहीं है ३. मधु, धृत एवं दधि आदि का मिश्रित रूप, जिसका अर्पण वैदिक काल से ही अति सम्माननीय है ।
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१७६० नाट्यशास्त्रम्
तु मांसेन सुरासीथुफलासवैः ।
अर्चयेद् भूतसंघांश्च चणकैः पललाप्लुते ॥ ४० ॥
पके हुए अनाज, माँस, सुरा, मिष्ठान्न, फलों के आसव ( रस ) और पलल ( ( माँस ) से युक्त चनों से भूतसमुदायों की पूजा करनी चाहिए' ॥ ४० ॥
अनेनैव विधानेन संपूज्या मत्तवारणी ।
पक्वामेन तु मांसेन सम्पूज्या रक्षसां गणाः ॥ ४१ ॥
इसी नियम के अनुसार मत्तवारणी का भी पूजन करना चाहिये । राक्षसों के समूह की पूजा पके हुए या कच्चे मांस से करनी चाहिए ॥ ४१ ॥
सुरामांसप्रदानेन दानवान्प्रतिपूजयेत् । शेषान्देवगणांस्तज्ज्ञ: सापूपोत्कारिकौदनः ॥ ४२ ॥
सुरा एवं मांस के अर्पण द्वारा दानवों की अर्चना करनी चाहिए तथा पूजनविधि के ज्ञाता को चाहिए कि बचेहुए देवताओं की । पूजा पुओं, लपसी, एवं भात से करे ॥ ४२ ॥
मत्स्यैश्च पिष्टभक्ष्यैश्व सागरान्सरितस्तथा ।
सम्पूज्य वरुणं चापि दातव्यं घृतपायसम् ॥ ४३ ॥
सागरों व नदियों को मछलियों तथा पिठ्ठी के बने पदार्थों से ( पूजित करना चाहिए) तथा वरुणनानामूलफलैश्वापिकी पूजा करके घी मिश्रितमुनीन्सम्प्रतिपूजयेत्खीर देना चाहिये॥। ४३ ॥ वायूंच पक्षिणश्चैव विचित्रैर्भक्ष्यभोजनैः ॥ ४४ ॥
विविध प्रकार के मूलों और फलों से मुनियों की, भलीभांति पूजा करनी चाहिए तथा पवनों एवं पक्षियों की नानाविध भक्ष्य वस्तुओं से पूजा करनी चाहिए ॥ ४४ ॥
मातृर्नाट्यस्य सर्वास्ता धनदं च सहानुगैः । अपूपैर्लाजिकामिश्रैर्भक्ष्यभोज्यैश्व पूजयेत् ॥ ४५ ॥ नाट्यमाताओं की एवं अनुयायियों के सहित कुबेर की पूजा पुओं तथा लावा
युक्त भक्ष्य व भोज्य वस्तुओं से करनी चाहिए ॥ ४५ ॥
१. इस श्लोक में ' सीथु ' शब्द का प्रयोग उपयुक्त नहीं प्रतीत होता क्योंकि यह शब्द कोषों में नहीं प्राप्त होता । इसके स्थान पर 'सीधु' शब्द होना चाहिये जिसका अर्थ गुड़ की शराब है । 'पल्लाप्लुतैः' के स्थान पर पयसाप्लुतैः यह 'ज' प्रति का पाठान्तर उचित प्रतीत होता है क्योंकि माँस का वर्णन पहले कर चुके हैं । फिर मांस द्रव (तरल ) • पदार्थ नहीं है अतः उससे चने आप्लुप्त ( भीगे हुए ) नहीं हो सकते । पयसाप्लुतैः .(दूध से भीगे हुए ) यहीं पाठ उचित
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तृतीयोऽध्यायः ७७%
एवमेषां बलिः कार्यो नानाभोजनसंश्रयः ।
पुनर्मन्त्रविधानेन बलिकर्म च वक्ष्यते ॥ ४६ ॥
इस प्रकार इन [ देवताओं ] को विविध प्रकार के भोजनों से समन्वित बलि देनी चाहिए । मन्त्रपूर्वक बलिकर्म का वर्णन आगे किया जायेगा ॥ ४६ ॥
ब्रह्मा की बलि का मन्त्र- देवदेव! महाभाग! सर्वलोकपितामह! ।
मन्त्रपूतमिमं सर्व प्रतिगृह्णीष्व मे बलीम् ॥ ४७ ॥
हे सर्वश्रेष्ठ, परमसुभग, समस्त लोकों के पितामह' मन्त्रों से पवित्र मेरी इस बलि को सम्पूर्णतया स्वीकार कीजिए ॥ ४७ ॥
ट्रको महादेव की बलि के मन्त्र- देवदेव! महादेव! गणेश! त्रिपुरान्तक! प्रगृह्यतां बलिर्देव! मन्त्रपूतो मयोद्यतः ॥ ( महादेव महायोगिन्देवदेव सुरोत्तम् । ४८ ॥ संप्रगृह्य बलिं देव रक्ष विघ्नात्सदोत्थितात् ॥) हे देवों में श्रेष्ठ, गणाधिपति, त्रिपुरासुरमर्दक, महादेव शिव! मन्त्रों से पवित्र जो बलि मैं भेंट कर रहा हूँ, यह ग्रहण करिये ॥ ४८ ॥
(हे महादेव, महायोगी, देवों में श्रेष्ठ, सुरों में महानतम देव! इस बलि को भली प्रकार ग्रहण करके, सर्वदा बाधा देने वाले विघ्नों से [नाट्य की ] रक्षा करिए ) । विष्णु की बलि का मन्त्र- नारायणामितगते! पद्मनाभ! सुरोत्तम! प्रगृह्यतां बलिर्देव! मन्त्रपूतो मयार्पितः ॥ ४९ ॥
हे अबाधगति वाले, पद्मनाभ, देवों में श्रेष्ठ विष्णु! मन्त्रों से पवित्र मेरे द्वारा अर्पित इस बलि को स्वीकार करें ॥ ४ ९ ॥ इन्द्र की बलि का मन्त्र- पुरन्दरामरपते! वज्रपाणे! शतक्रतो! प्रगृह्यतां बलिर्देव! विधिमन्त्रपुरस्कृतः ॥ ५० ॥ हे पुरन्दर, सुरपति, वज्रहस्त, शतक्रतु इन्द्र विधिपूर्वक दी जाने वाली इस
मन्त्रयुक्त बलि को ग्रहण कोजिए ॥ ५० ॥
१. यह मन्त्र ब्रह्मा के प्रति बलि प्रदानार्थ है ।
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७८ -नाट्यशास्त्रम् स्कन्द् की बलि का मन्त्र- देवसेनापते! स्कन्द! भगवन्! शङ्करप्रिय! बलिः प्रीतेन मनसा षण्मुख! प्रतिगृह्यताम् ॥ ५१ ॥
हे देवताओं के सेनापति, शंकर के प्रिय, छः मुख वाले स्कन्दकुमार! इस बलि को मुदित मन से स्वीकार कीजिये ॥ ५१ ॥
सरस्वती की बलि का मन्त्र- देवदेवि! महाभागे! सरस्वती! हरिप्रिये प्रगृह्यतां बलिर्मातर्मया भक्तया समर्पितः ॥ ५२ ॥
सरस्वती! मेरे हे देवताओं की पूजनीय परमसौभाग्यशीला, हरिवल्लभा, माता द्वारा भक्तिपूर्वक समर्पित बलि को अंगीकार कीजिए ॥ ५२ ॥
राक्षसों की बलि का मन्त्र - नानानिमित्तसम्भूताः पौलस्त्याः सर्व एव तु ।
राक्षसेन्द्रा! महासत्त्वाः! प्रतिगृह्णीत मे बलिम् ॥ ५३ ॥
हे विविध कारणों से उत्पन्न, पुलस्त्य ऋषि को सन्तानों, महाशक्तिशाली राक्षसेन्द्रो! मेरी बलि को ग्रहण कीजिए ॥ ५३ लक्ष्मी की बलि मन्त्र-I!! लक्ष्मीः सिद्धिर्मतिर्मेधा सर्वलोकनमस्कृताः । मन्त्रपुतमिमं देव्यः प्रतिगृह्णन्तु मे बलिम् ॥ ५४ ॥
सारे संसार के लिए पूज्या हे लक्ष्मी, सिद्धि एवं मेधा देवयों! आप मन्त्रों से पुनीत मेरी बलि को स्वीकार कीजिए ॥ ५४ ॥
वायु की बलि का मन्त्र!!!!! सर्वभूतानुभावज्ञ लोकजीवन मारुत प्रगृह्यतां बलिर्देव! मन्त्रपूतो मयोद्यतः ॥ ५५ ॥
हे समस्त भूतों की भावनाओं ( अनुभावों ) के ज्ञाता तथा संसार के जीवनदायक वायुदेव! आप मेरे द्वारा अर्पित तथा मन्त्रों से पवित्र इस बलि को ग्रहण कीजिए ॥ ५५ ॥
अग्नि की बलि का मन्त्र- देववक्त्र! सुरश्रेष्ठ! धूमकेतो! हुताशन! ।
भक्त्या समुद्यतो देव! बलिः सम्प्रति गृह्यताम् ॥ ५६ ॥
१. अनुभाव -प्रो० घोष के विचार में यह शब्दशक्ति का द्योतक है ।
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तृतीयोऽध्यायः ७९ हे देवताओं के मुखरूप', देवों में श्रेष्ठ, धुएँ की ध्वजा वाले, आहुतियों के भक्षक अग्निदेव! मेरे द्वारा अर्पित बलि को भलीभाँति ग्रहण कीजिए ॥ ५६ ॥
सूर्य की बलि का मन्त्र- सर्वग्रहाणां प्रवर! तेजोराशे! दिवाकर! ।
भक्त्या मयोद्यतो देव! बलिः सम्प्रति गृह्यताम् ॥ ५७ ॥
हे समस्त ग्रहों में श्रेष्ठ, तेजपुञ्ज सूर्यदेव! मेरे द्वारा भक्तिपूर्वक प्रस्तुत कारकी गयी बलि को भलीभाँति ग्रहण कीजिए ॥ ५७ ॥
चन्द्र की बलि का मन्त्र- प्रगृह्यतामेष सर्वग्रहपते! सोमबलिर्मन्त्रपूतो! द्विजराज! जगत्प्रिययोद्यतः! ॥ ५८ ॥ हे समस्त ग्रहों के स्वामी, ब्राह्मणश्रेष्ठ, लोकप्रिय चन्द्रदेव! मेरे द्वारा प्रस्तुत,
मन्त्रों से पवित्र इस बलि को ग्रहण कीजिए ॥ ५८ ॥ TEP नन्दी आदिगणों की बलि का मन्त्र- महागणेश्वराः! सर्वे! नन्दीश्वरपुरोगमाः ।शक्श प्रगृह्यतां बलिर्भक्त्या मया सम्प्रति चोदितः ॥ ५९ ॥ हे नन्दीश्वर -प्रभृति समस्त महागणेश्वरों! मेरे द्वारा श्रद्धापूर्वक प्रेरित
(समर्पित ) बलि को ग्रहण कीजिए ॥ ५ ९ ॥ पितृगणों की बलि का मन्त्र- नमः पितृभ्यः सर्वेभ्यः प्रतिगृह्णत्वमं बलिम् । (भूतेभ्यश्च नमो नित्यं येषामेष बलिः प्रियः । ) कामपाल! नमो नित्यं यस्यायं ते विधिः कृतः ॥ ६० । हे समस्त पितृगणों! आप नमस्कार सहित इस बलि को स्वीकार कीजिए । (उन भूतों को भी सदा नमस्कार है जिन्हें यह बलि प्रिय है ) । (हे कामपाल'! ऐसे आपको सदा प्रणाम है जिनके लिए यह बलि प्रस्तुत की गयी है ॥ काम६० ॥ १. देववक्त्र - अग्नि को वेदों में भी देवताओं का मुख बताया गया है क्योंकि (अ) शरीर में मुख के समान अग्नि भी देवताओं में अग्रगण्य व सर्वोत्तम है । (ब ) समस्त देवताओं के प्रति जो भी आहुतियाँ दी जाती हैं वह 'स्वाहा' मन्त्रपूर्वक अग्नि को ही अर्पित की जाती हैं । अग्निरूपी मुख से ही देवता अपना-अपना भाग ग्रहण करते हैं । २. कामपाल - बलराम की उपाधि है । किन्तु यहाँ इस अर्थ की प्रासं- गिकता संदिग्ध है । डा० रघुवंशवंश काका मतमत है कि कामपाल शिव बलरा का नाम है । TRE