भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १
Natya Shastra of Bharat Muni Part 1 Natya Chandrika Hindi Tippani Sadhu Rastogi · Chowkambha Sanskrit Series · 654 पृष्ठ · 66 खण्ड
विषय सूची
- हिन्दी नाट्य शास्त्र सुधा रस्तोगी कृष्णदास अकादमी • वाराणसी वाराणसी कृष्णदास संस्कृत सीरीज -१०५ नाट्यशास्त्रम् सटिप्पण' नाट्यचन्द्रिका'… 1–10
- २ नाट्यशास्त्रम् जाने की संभावना में सन्देह सहज हो जाता है । इस प्रकार की प्रयोग- मूलक, वैज्ञानिक और विराट् फलक वाली कृति अनेक जीवनव्यापी साधनाओं से ही… 11–20
- १२ नाट्यशास्त्रम् विषय श्लोक पृष्ठ ब्रह्मा द्वारा विघ्ननिवारण के लिए विश्वकर्मा द्वारा नाट्यशाला का निर्माण करवाना ७९ -८३ २६ नाट्यगृह की रक्षा के लिए… 21–30
- २२ नाट्यशास्त्रम् विषय श्लोक पृष्ठ ( १३ ) वृश्चिकापसृत अंगहार का लक्षण २०२.२०४ १३८ ( १४ ) भ्रमर अंगहार का लक्षण २०४-२०६ १३ ९ ( १५ ) मत्तस्खलित अंगहार ला… 31–40
- ३२ नाट्यशास्त्रम् विषय श्लोक पृष्ठ ३. शंका ३३-३५ २९ १ ४. असू ३६-३७ २ ९३ ५. मद ३८.४६ २ ९ ३ ६. श्रम ४७ २९५ ७. आलस्य ४८ २ ९ ६: ८. दैन्य ४९ २९ ६ ९. चिन्ता… 41–50
- ४२ नाट्यशास्त्रम् विषय श्लोक पाश्चेष्टाओं के पाँच भेद (१३९ ७ ( १ ) नतपाप चेष्टा का लक्षण २३४२३५ ( १६ ) ) (२) उन्नत पार्श्व चेष्टा का लक्षण २३६ (FF) - ( ३)… 51–60
- भाँति अपेक्षित हैं इन सबनाट्यशास्त्रम्तथ्यों को आप भली प्रकार बताने की है; जैसी उक्ति है— ' दृश्यं श्रव्यं च यत्… 61–70
- १४ नाट्यशास्त्रम् कालियं भ्रमरं चैव तथा पीठमुखं मुनिम् । । ३३ । 11 नखकुट्टाश्मकुट्टौ च षट्पदं सोत्तमं तथा नखकुट्ट, ६२. ५७. कालिय, ५८. भ्रमर, ५ ९: पीठमुख,… 71–80
- २४ नाट्यशास्त्रम् कारण से अभिनय में यह बिघ्न हो रहा है, देवराज इन्द्र [ कारण जानने के लिये ] ध्यानावस्थित हो गए । ६७… 81–90
- ३४ नाट्यशास्त्रम् क्लीबानां धाष्टर्य करणमुत्साहः शूरमानिनाम् । विबोधश्च वैदुष्यं विदुषामपि । ११०… 91–100
- १४४ नाट्यशास्त्रम् मध्यम नाट्यमण्डप का परिमाण -- चतुःषष्टिकरान्कुर्याद्दीर्घत्वेन तु मण्डपम् । द्वात्रिंशतं च विस्तारान्मर्त्यानां यो भवेदिह । १७… 101–110
- ५० नाट्यशास्त्रम् ही बलि मन्त्रोच्चार के साथ देनी चाहिये ' । ४०-४१ । ब्रह्मण, राजा तथा कार्यकर्ताओं का भोज्यपदार्थ –. स्थापने ब्राह्मणेभ्यश्च दातव्यं… 111–120
- ५८. नाट्यशास्त्रम् रंगपीठ भूमि शोधन विधि- पूरणे मृत्तिका चात्र कृष्णा देया प्रयत्नतः । ६ ९ । लाङ्गलेन समुत्कृष्य निर्लोष्ठतृणशर्करम्… 121–130
- II नाट्यशास्त्रम् करनी चाहिए । ८ ९- ९ ० । प्रेक्षक-पीठ निर्माण-विधि- स्तम्भानां बाह्यतश्चापि सोपानाकृति पीठकम् । ९ ०… 131–140
- ७० नाट्यशास्त्रम् जर्जर प्रार्थनात्वं महेन्द्रप्रहरणं सर्वदानवसूदनम् । (एक )!निर्मितस्सर्वदेवैश्च सर्वविघ्ननिबर्हण । । १३… 141–150
- 2 ८० नाट्यशास्त्रम् गन्धर्वो afe का मन्त्र- नारदस्तुम्बुरुश्च व विश्वावसुपुरोगमाः । ! परिगृह्णन्तु मे सर्वे गन्धर्वा बलिमुद्यतम् । ६१… 151–160
- नाट्यशास्त्रम् मया समवकारस्तु योऽयं सृष्टः सुरोत्तम! । श्रवणे दर्शने चास्य प्रसादं कर्तुमर्हसि । ७… 161–170
- १०० नाट्यशास्त्रम् ६३ पताकाञ्जलि वक्षःस्थं प्रसारितशिरोधरम् । ६६ । निहञ्चितांसकूटी च तल्लीनं करणं स्मृतम्… 171–180
- ११० नाट्यशास्त्रम् उ अञ्चितः स्यात्करो वामः सव्यश्चतुर एव तु । ९९ । दक्षिण: कुट्टितः पादश्चतुरं तत्प्रकीर्तितम्… 181–190
- १२० नाट्यशास्त्रम् सूचीपादो नतं पार्श्वमेको वक्षःस्थितः करः । १३१ । द्वितीयश्चावितो गण्डे गण्डसूची तदुच्यते… 191–200
- NOT ७ स्वस्तिकरेचितम् ८ मण्डलस्वस्तिकम् १० अर्धनिकुट्टकम् ९ निकुट्टकम् ११ कटिच्छिन्नम् १२ अर्धरेचितकम् १३ वक्षः स्वस्तिकम् १४ उन्मत्तकम् १५ स्वस्तिकम् १६… 201–210
- ६७ विवर्तितकम् ६८ गजक्रीडितकम् ६ ९ तलसंस्फोटितम् ७० गरुडप्लुतम् ७१ गण्ड सूची ७२ परिवृत्तम् ७३ पाश्र्वजान ७४ गृधावली कम् ७५ सन्नतम् ७६ सूची ७७ अर्धसूची ७८… 211–220
- १३२ नाट्यशास्त्रम् करणों का उपसंहार - यानि स्थानानि याश्चार्यो व्यायामे कथितानि तु । १६ ९ । पादप्रचारस्त्वेषां तु करणानामयं भवेत्… 221–230
- १४२ नाट्यशास्त्रम् -पुनरावृत्ति की जाए और नूपुर तथा भुजङ्गत्रासित, तत्पश्चात् रेचित' और मण्डल करणों का प्रयोग किया जाए और कन्धों को सिकोड़ लिया जाए और फिर… 231–240
- १५२ नाट्यशास्त्रम् अतश्चैव प्रतिक्षेपाद् भूतसङ्घैः प्रवर्तिताः । २६६ । विवाह, बालक के जन्म, बारात के अवसर, मनोरंजन तथा विजयोल्लास के अवसर पर यह नृत्त… 241–250
- नाट्यशास्त्रम्१६२ [ तत्त्वं चानुगतं चापि ओघं च करणान्वितम् । स्थिरे तत्त्वं प्रयोक्तव्यं मध्ये चानुगतं भवेत्… 251–260
- १७२ नाट्यशास्त्रम् जाता है । अवतरण -- गायकों तथा गायिकाओं को अपने निर्दिष्ट स्थान पर आसीन कराने को 'अवतरण ' कहते हैं । १७… 261–270
- १८२ नाट्यशास्त्रम् के प्रयोग पर देवी उमा को संतुष्टि मिलती है' और महाचारी के प्रयोग से भूतगण तुष्ट हो जाते हैं । ४५-५२… 271–280
- १ ९ २ नाट्यशास्त्रम् अवकृष्टा ध्रुवा की विधि- चतुर्थकारः पूजां तु स कृत्वान्तर्हितो भवेत् । ततो गेयावकृष्टा तु चतुरश्रा स्थिता ध्रुवा । १०२… 281–290
- २०२ नाट्यशास्त्रम् त्र्य पूर्वरंग में त्रिपदीगमन - केवलं परिवर्ते तु गमने त्रिपदी भवेत् । दिग्वन्दने पञ्चपदी चतुरश्रे विधीयते । १४६… 291–300
- २१२ नाट्यशास्त्रम् सा ध्रुवा परिवर्ताख्या त्रिलया त्रियतिस्तथा । परिवर्तास्तु चत्वारः पाणयस्त्रय एव च… 301–310
- : २२२ नाट्यशास्त्रम् एते ह्यष्टौ रसाः प्रोक्ता द्रुहिणेन महात्मना । . पुनश्च भावान्वक्ष्यामि स्थायिसञ्चारितत्त्वजान् । १६… 311–320
- २३२ नाट्यशास्त्रम् वह यह है, इस प्रकार की प्रतीति होती है । शंकुक स्पष्ट कहते हैं कि रसानुभव-काल में होने वाला ज्ञान न तो सन्देह रूप है, न वास्तविक तत्त्व… 321–330
- २४२ नाट्यशास्त्रम् इसीलिए किसी भी दूसरे विशेष से असंपृक्त ( अनुपहित ) रहने के कारण वह रसना अर्थात् अस्वाद का विषय बनती हुई न तो लौकिक प्रतीति है, न मिथ्या… 331–340
- -२५२ नाट्यशास्त्रम् • कहा गया है कि आवादित की जाने वाली वस्तु की सज्ञा 'रस' है । ' कथमास्वाद्यते रसः… 341–350
- २६२ नाट्यशास्त्रम् हे तो परस्थ हास्य कहा जाता है । ' अत्रानुवंश्ये आर्ये भवतः — विपरीतालङ्कारैविकृताचाराभिधानवेषैश्च… 351–360
- २७२ नाट्यशास्त्रम् इसका प्रयोग किया जाना चाहिए । स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, आवेग, सम्भ्रम, प्रहर्ष, हैं… 361–370
- २८२ नाट्यशास्त्रम् जत्वमाप्नुवन्ति तत्रैव चान्येऽल्पबुद्धयस्तेषामेवानुचरा भवन्ति तथा विभावा-नुभावव्यभिचारिणः स्थायिभावानुपाश्रिता भवन्ति… 371–380
- नाट्यशास्त्रम् २९ २ मुख वै वर्ण्यस्वरभेदवे पशु शुष्कोष्ठकण्ठायाससाधर्म्या-नमुखशोषणजिह्वापरिलेहन दिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः… 381–390
- ३०२ नाट्यशास्त्रम् २-वातकृत आवेग - वातकृत आवेग का अभिनय वायु से विपरीत दिशा की ओर मुख करना, आंखों को मलना, वस्त्र से मुख या अंगों को छिपाना तथा वायु -से… 391–400
- ३१२ नाट्यशास्त्रम् इस विषय में दो आर्या हैं - उन्माद नामक भाव की उत्पत्ति इष्टजनों या धन का नाश, गहरी चोट, वातपित्त- कफ का प्रकोप तथा अनेक प्रकार के… 401–410
- ३२२ नाट्यशास्त्रम् ११५ । त्रासश्च मरणञ्चैव वैवर्ण्यं च भयानके । ७ -स्वेद एवं १- वेपथु २ स्वरभेद ३-रोमांच ४-गद्गद ५-स्तम्भ ६-मरण ८-वैवर्ण्यये आठ भाव भयानक… 411–420
- ३३२ नाट्यशास्त्रम् अवधूत सिर का लक्षण तथा विनियोग- यदधः सकृदाक्षिप्तमवधूतं तु तच्छिरः । सदेशावाहनालोपसंज्ञादिषु तदिष्यते । २८… 421–430
- ३४२ नाट्यशास्त्रम् [ १५ ] जिस दृष्टि में पुतलियां स्थिर न हों, जो देखने में मटकी हुई और व्याकुल सी दिखाई पड़ती हो एवं जिसमें नेत्र विस्फारित तथा उभरे हुए… 431–440
- ३५२ नाट्यशास्त्रम् 'घूर्ण', काँपते हुए गालों को 'कम्पित', सिकुड़े हुए गालों को ' कुञ्चित' एवं नैसर्गिक अवस्था में स्थित गालों को ' सम ' कहते हैं… 441–450
- ३६२ नाट्यशास्त्रम् असंयुक्त हस्त मुद्राओं के लक्षण- प्रसारिताः समाः सर्वाः यस्याङ्गुल्यो भवन्ति हि । । कुञ्चितश्च तथाङ्गुष्ठः स पताक इति स्मृतः । १८… 451–460
- ३७२ नाट्यशास्त्रम् मणिबन्धन विश्लिष्टप्रविरलचलिताङ्गुलिकराभ्याम् । कार्यों विवर्तिताभ्यां विकसितकमलोत्पलाभिनयः । ८३… 461–470
- ३८० नाट्यशास्त्रम् अधिक कुछ नहीं किया जा सकता आदि कथनों का प्रदर्शन सिया जाता है । १३२-१३३ । अंगुल्यो यस्य हस्तस्य ह्यन्योन्यान्तरनिस्सृताः । १३३… 471–480
- ३९ ० नाट्यशास्त्रम् मध्यप्रसारिताङ्गुष्ठौ ज्ञेयौ सूचीमुखौ तदा । १ ९ २ । दोनों सर्पशीर्ष हस्तों की एक दूसरे मतानुसार जब स्वस्तिक अवस्थिति में मध्यमा अंगुली… 481–490
- ४०० नाट्यशास्त्रम् १ - "छिन्ना" चेष्टा का प्रयोग व्यायाम, शीघ्रता तथा चारों ओर देखने में किया जाता है… 491–500
- ४१० नाट्यशास्त्रम् चारियों के द्वारा ही वृत्त व्याप्त है, चारियों के द्वारा ही विभिन्न चेष्टाये की जाती है… 501–510
- ४२० नाट्यशास्त्रम् चेष्टाओं की प्रधानता होती है । जब पैरों की चेष्टा ( गति ) की प्रधानता हो तो हाथों की चेष्टा पैरों की चेष्टा के अनुसार उनके बाद होनी… 511–520
- नाट्यशास्त्रम् ४३० अशुद्ध ( दूषित ) हो, जो थका हुआ हो, जो भूखा-प्यासा हो,,जिसनेजिसकाभरपेटशरीरखा -पी लिया हो ऐसे व्यक्ति को व्यायाम नहीं करना चाहिए… 521–530
- ४. भात्रों को सूचो ( नाट्यशास्त्र छठा एवं सातवाँ अध्याय ) DEBIF'S नाम विवरण श्लोक समी पृष्ठ ३०१अ अग्निकृत आवेगभेद आवेगभेद ३०२ अनुभाव का लक्षण ७1५ २८०… 531–540
- नाट्यशास्त्रम् ४५० हस्तकर्म विवरण श्लोक पृष्ठ ऊर्ध्वमण्डली नृत्तहस्त २०३ ३ ९ १ ऊर्ध्वसंस्थ बाहुकरण २२० ३९५ ५९.६० ३६८क कपित्थ कपोत ह १३०-१३३ ३७ ९ रहस्… 541–550
- ४६० नाट्यशास्त्रम् १३२,,अतः परं प्रवक्ष्यामि ६६ अधमेषु प्रकीर्णाश्च ३८६ १७५, १७८, २० ९, २१०, अधरोष्ठ गदरञ्जनम् ३६७ २१४, २२७, ३३३, ३५६, अधस्ताद् रङ्गपीठस्य… 551–560
- ४७० नाट्यशास्त्रम् २१७ करमावर्तितं कृत्वा १२९ कस्मात् बहुत्वाज्ज्ञानानाम् १२८ कस्माद् भवन्तो नाट्यस्य ३० करमावृत्तकरणम् १४७ कस्मान्नृत्तं कृतं ह्येतद् १५१… 561–570
- ४८० नाट्यशास्त्रम् दश प्रयोक्तृभिः स्तम्भाः ६३ दृष्टा मया भगवतः १७ •दशाख्याश्च शताख्याश्च ३६३ दृष्टिर्भयानकात्यर्थं ३३५ दष्टं च दन्तक्रियया ३५३… 571–580
- ४९० नाट्यशास्त्रम् बलिप्रधानैर्होमैश्च ३७ ब्रह्मोत्तरं तथैवास्तु १ ९ ३ बहवोऽर्थाविभाव्यन्ते २८० ब्राह्मणांस्तर्पयित्वा तु ४८, ५२ बहिः पावस्थितोऽङ्गुष्ठः… 581–590
- वाट्यशास्त्रम् ५०० २९.७ २५६ व्यसनाभिघातभय ० वीरो महेन्द्रदेवः स्यात् १३६ २०२ व्यंसित वामहस्त च वृत्त ह्य त्याने विप्राः १३३ ३७६ व्यंसितापसृत सव्यम्… 591–600
- नाट्यशास्त्रम् ५१० अध्याय /श्लोक पृष्ठ प्रतीक ३३५ अद्भुत दृष्टि- विनियोग ८५१० २७२ अद्भुतरस के अनुभाव की ६… 601–610
- नाट्यशास्त्रम् ५२० / प्रतीक अध्याय श्लोक करि पृष्ठ ३९ १ ९/ २०१० गरुडपक्ष नृत्तहस्त SSIF ११ ९ ४ । १३१5 गरुडप्लुतक करण 2SIF ७… 611–620
- ५३० नाट्यशास्त्रम्SP / प्रतीक कल अध्याय श्लोक पृष्ठ- भाण्डवाद्य प्रयोगविधि ४३१३-३१८ १६५.१६६-eye की निरुक्ति ७ अध्याय का प्रारम्भिक गद्य २७८४० ९ भावशब्द… 621–630
- नाट्यशास्त्रम् ५४० अध्याय/श्लोक पृष्ठ प्रतीक ८ । ५१ के बाद प्रक्षिप्त ३३६ शान्ता रसदृष्टि ३२८. ८1११ शारीर अभिनय के ३ भेद ९/ ५७ ३६७ शिखर असंयुक्त हस्त… 631–640
- ५५० नाट्यशास्त्रम् ( नाट्य शास्त्र के तीन प्रमुख अध्याय- प्रथम ( नाटयोत्पत्ति ), द्वितीय (नाटयमण्डप), षष्ठ (रसाध्याय ) एवं उस पर उपलब्ध अभिनवभारती का… 641–650
- ५६० नाट्यशास्त्रम् 26. Spuren griechischen Einflusses im Schauspiel buch ( Natya- shastra ) dos Bharata Muni, M. Lindenau Festschrit Erast Windisch —… 651–654