भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ — पृष्ठ 641–650
भरत नाट्यशास्त्र - नाट्य चन्द्रिका टीका १ · Chowkambha Sanskrit Series · पृष्ठ 641–650
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५५० नाट्यशास्त्रम् ( नाट्य शास्त्र के तीन प्रमुख अध्याय- प्रथम ( नाटयोत्पत्ति ), द्वितीय (नाटयमण्डप), षष्ठ (रसाध्याय ) एवं उस पर उपलब्ध अभिनवभारती का संपादन एवं अनुवाद किया गया है॥ यत्र तत्र विचारों की संगति हेतु मूलग्रन्थ एवं अभिनवभारती में नवीन पाठभेदों की भी परिकल्पना की गई है । ) १८. नाट्यशास्त्र ( मराठी अनुवाद ) अनु ० गोदावरी केलकर, पूना, १६२८ । अभिनवगुप्तप्रणीताभिनवभारतीसहितम्- ( प्रथम भाग), १६. नाट्यशास्त्रम् सं०, अनु० मधुसूदन शास्त्री, वाराणसी, सं ० २०२८ । ( विस्तृत भूमिका के पश्चात् नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय से लेकर सप्तम अध्याय तक के मूल का अभिनव कृत अभिनव भारती एवं मधुसूदनी- संस्कृत एवं बालक्रीडा नामक हिन्दी अनुवाद सहित प्रस्तुतीकरण किया गया है । ) २०. नाट्यशास्त्रम् (द्वितीय भाग ), विवरण पूर्वोक्त, सं ० २०३५ । ( पूर्वोक्त टीकाओं सहित नाट्यशास्त्र के आठवें अध्याय से अठारह अध्याय का प्रस्तुतिकरण है । ) संग्रह ( सरस्वती महल लाइब्रेरी ), तंजौर, १ ९ ५३ । २१. नाट्यशास्त्र २२. नान्यदेवकृत भरतभाष्य, मं ० प्रा० ग्रं ० में संगृहीत हस्तलिखित ग्रन्थ । २३. अशोकमल्लविरचित नृत्याध्याय, सं० वाचस्पति गैरोला, इलाहाबाद, १६६७ । को पन्द्रह प्रकरणों में विभाजित किया गया है । ( हस्तप्रकरण सम्पूर्ण, अंगमूलभागप्रकरण, चारी प्रकरण आदि नाट्यशास्त्र के सन्दर्भ में विशेषत: पाठ्य हैं । ) 24. The Natya- Darpana of Ramachandra and Gunachandra.. A Critical Study, K. H. Trivedi, L. D. Institute of Indology, Ahmedabad, 1966. लाल भाई दलपत भाई सीरीज ( ९ ) के अन्तर्गत यह पुस्तक दो भागों में विभाजित है । प्रथम भाग नाट्यदर्पण के सभी विषयों की व्याख्या प्रस्तुत करता है एवं द्वितीय भाग में संस्कृत के अन्य काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों के संदर्भ में नाट्यदर्पण का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है । प्रथम भाग के अध्यायों के नाम नाट्यदर्पण के शीर्षकों के आधार पर हैं यथा ( १ ) नाटक. निर्णय, ( २ ) प्रकरणादि रूपकभेद, ( ३ ) वृत्त, रस, भाव एवं अभिनय तथा ( ४ ) विविध विषय । प्रत्येक अध्यय नाट्यदर्पण के चार विवेकों से संबन्धित
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- सन्दर्भ ग्रन्थ सूची ५५१ हैं । पहले नाट्यदर्पणकार के मत को पूर्णतया प्रस्तुत किया गया है एवं तत्पश्चात् उसकी समालोचना की गई है । द्वितीय भाग के अन्तर्गत पंचम अध्याय में रामचन्द्र गुणचन्द्र का जीवन परिचय है । षष्ठ अध्याय के तीन उपभाग हैं । प्रथम नाट्यशास्त्रादि का नाट्यदर्पण पर ऋण, द्वितीय में ध्वन्या- लोकादि ग्रन्थों का नाट्यदर्पण पर प्रभाव एवं तृतीय में उत्तरवर्ती ग्रन्थों परः नाट्यदर्पण के प्रभाव की परिचर्चा हुई है । सप्तम में नाट्यदर्पण का मूल्यांकना करने का प्रयास किया गया है । ) 25. Nataka -Lakshana -Ratnakosha of Sagaranandin. Ed. Myles Dillon, Oxford University, Press, London, 1937. 26. Nataka -Lakshna - Ratna- Kosha. In the perspective of Ancient Indian Drama and Dramaturgy. Sidheswar Chattopadhyaya, Calcutta, 1974. २७. भरतकोष, सं ० एम ० रामकृष्ण कवि, पूना, १ ९ ६१ । २८. भारतीय नाट्यपरम्परा और अभिनयदर्पण, वाचस्पति गरौला, इलाहाबाद, १६६७ । ( पुस्तक की सामग्री को मोटे तौर पर तीन भागों में बाँटा जा सकता है । मूलग्रन्थ से पहले की सामग्री पूर्वपीठिका के रूप में छह अध्यायों में प्रस्तुत की गई है । फिर मूलग्रन्थ व उसका हिन्दी अनुवाद दिया गया है । इसके बाद उत्तरपीठिका के रूप में नृत्तमूर्तियों एवं हस्ताभिनयों की रेखानु-- कृतियां दी गई हैं । ) २६. भावप्रकाशन, शारदातनय, बड़ौदा, १६३० । 30. The Mirror of Gesture, (A Translation of Nandikeshvara's Abhinayadarpana ) A. Coomarswamy & G. K. Duggirala, Harward Oriental Press. Cambridge, 1917. ३१. वृत्तप्रकाश, विप्रदास, बम्बई, १ ९ २२ । ३२. हिन्दा नाट्यदर्पण, श्री रामचन्द्र -गुणचन्द्र विरचित व्याख्याकार आचार्य विश्वेश्वर, दिल्ली, १६६१ । ( पुस्तक के परिचय के रूप में लिखा गया डाँ० दशरथ ओझा का "नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों में नाट्यदर्पण का स्थान " शीर्षक संपादकीय लेख विशेषतः पाठ्य है )
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५५२ नाट्यशास्त्रम् सहायक सामग्री , भाग १, सं ० सीताराम चतुर्वेदी, इलाहाबाद,9. अभिनवनाट्यशास्त्र १६४ । संस्कृत में सूत्र देकर फिर प्रायः पद्यबद्ध हिन्दी रूपान्तर एवं फिर हिन्दी में उसकी पहले व्याख्या की गई है । नाट्यरचना से संबन्धित सभी एवं अभारतीय बाद, सिद्धान्त, मत या प्रयोगों का यथास्थान समावेशभारतीय है । कुल १७ अध्याय है जिसमें एक नवीन नाट्यशास्त्र के प्रतिपादन का प्रयास किया गया है । ) महेश चतुर्वेदी, दिल्ली २. अरस्तू का काव्यशास्त्र, अनु० डॉ० नगेन्द्र और वि० सं ० २०२३ । ३. आचायभरत, डॉ ० शिवशरण शर्मा, भोपाल, १ ९ ७१ । ( तेरह परिच्छेदो में ग्रन्थ को विभक्त करके उसमें नाट्यशास्त्र में सभी विषयों का विवरण दिया गया है । नाट्य रचना सम्बन्धी विषयों की अपेक्षा नाट्य प्रयोग वर्णित सम्बन्धी विषयों पर अधिक बल दिया गया नाट्यगृह, पात्र, रस, पूर्वरंग एवं अभिनय को अलग- अलग है । इस भांति अध्यायों में प्रतिपादित किया गया .4. Introduction to Bharata's Natyashastra Adya Rangacharya, Bombay, 1960. नाटक के उद्भव, ( कृति को दस अध्यायों में विभाजित किया गया है । विधान, नाटक अवतरण, नाट्यमण्डप, पूर्वरंग, अभिनय, रंगमंच - अलग अध्ययों में प्रथमके दस रूपों, गान और रससिद्धान्त का प्रतिपादन अलग किया गया है । ) The Indian Theatre, C. B. Gupta, Delhi, 1954. 5. 6. IndianInfluenceTheatre; R. K.: ItsYajnikOrigin, Londonand Development, 1933. Under a European Indian Stage ( Vol. IV ); Dr. Harendra Nath Dasgupta, 7. Calcutta, 1934, 8. Ancient Indian Theatre; D. R. Mankad, Poona, 1956.
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-, सन्दर्भ ग्रन्थ सूची ५५३ 9. Indian Aesthetics and Science of Language; Tarapada Chakra-- barti, Calcutta, 1971. ( यह पुस्तक जादवपुर विश्वविद्यालय से पी ० एच०डी० के लिए स्वीकृत शोधप्रबन्ध का परिष्कृत एवं मुद्रित रूप है । कुल मिलाकर आठ अध्याय हैं। जिनके द्वारा काव्यशास्त्र पर व्याकरण के प्रभाव को परखने का प्रयास किया गया है । विशेषत: दृष्टव्य अध्यायों में से प्रथम अध्याय काव्यकला पर चिन्तन से सम्बन्धित है । चतुर्थ अध्याय में वाच्यवाचक सम्बन्ध की व्याख्या की गई है । लक्षण के सम्बन्ध में भरत की आदिमान्यता का वर्णन करते हुए परिचर्चा की गई है । ) 10. The Aesthetic Experience according to Abhinavagupta ( 2nd 11. EdnOn.the); RanieroDramaticGnoliSystem, Varanasiof the, 1968Hindus,; H. H. Wilson, - Calcutta, 1971, 12121. Contributions to the History of the Hindu Drama; M. M. Ghosh, Calcutta, 1958. 13. Classical Sanskrit Literature; A. B. Keith, Caleutta, 1947 १४. काव्यसमीक्षा, विक्रमादित्य राय, वाराणसी, १ ९ ६७ । 15. A Critical Survey of the Ancient Indian Theatre. Prof. D. Subba Rao, Included as Appendix 6 of the Natya Shastra, Vol. I (Second Edition ), Baroda, 19562 ( पृ० ४२३-४५४ में भरतकृत नाट्यशास्त्र के द्वितीय अध्याय के आधार: पर तीन प्रकार की नाट्यशालाओं का परिचय दिया गया है । सात रेखा चित्रों द्वारा तीन प्रकार के नाट्यगृहों की स्थिति, आकार एवं समायोजना पर प्रकाश डाला गया है । पृ० ४२५-४२५ में कुछ बहुचचिस परन्तु क्लिष्ट परिभाषिक शब्दों की व्याख्याएँ प्रस्तुत की गई हैं । ) 16. Comparative Aesthetics Vol. I; ( Indian Aesthetics ), Dr. K. C. Pandey, 1959. ( लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा डी० लिट्० की उपाधि हेतु स्वीकृत शोध-प्रबन्ध होने के साथ- साथ यह पुस्तक भारतीय स्वतन्त्रकलाशास्त्र का प्रायः सर्वांगीण ज्ञान कराने वाला ग्रन्थ है । इसे सात अध्यायों में बाँटा गया है । प्रथम अध्याय में भारतीय स्वतन्त्रकलाशास्त्र के इतिहास का वर्णन है ।
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५५४ नाट्यशास्त्रम् द्वितीय अध्याय में शैवदर्शन के उन सिद्धान्तों को प्रकाश में लाया गया है । जिनके आधार पर अभिनवगुप्त की सौन्दर्य की सौन्दर्य शास्त्रीय धारणाएँ प्रस्तुत की गई हैं । चतुर्थ अध्याय में अभिनवगुप्त की मान्यताएँ दी गई हैं । पाँचवे अध्याय में महिम भट्ट के सिद्धान्त का प्रतिपादन एवं खण्डन किया गया है । छठे अध्याय में संस्कृत नाट्य की विधाओं का अनुशीलन एवं सातवें तथा अन्तिम अध्याय में सौन्दर्यशास्त्र, जिसे स्वतन्त्रकला शास्त्र कहा गया है, की काव्यशास्त्रीय परम्परा का समालोचन किया गया है । ) 17. Types of Sanskrit Drama: D. R. Mankad, D. Karavadu, 1930: 18. Drama in Sanskrit Literature; R. V. Jagirdar M. A., Bombay, 1947 19. The Theatre of Hindu; H. H. Wilson, V. Raghavan, K. R. Pishasoroti and A. C. Vidyabhushana, Calcutta, 1955. 20. Theories of Rasa and Dhvani, A. Sankaran, Madras, 1920. २१. नाट्यकला, रघुवंश, दिल्ली, १ ९ ६१ । २२. नाट्यशास्त्र की भारतीय परम्परा और दशरूपक ( धनिक की वृत्ति सहित) हजारी प्रसाद द्विवेदी तथा पृथ्वीनाथ द्विवेदी, दिल्ली, १ ९ ६३ । (भूमिका मूल एवं अनुवाद । भूमिका में नाट्यवेद एवं नाट्य तथा -नाट्यशास्त्र की चर्चा करते हुए नाट्यवेद के दोनों अंगों - विधि एवं शास्त्र की विवेचना की गई है तथा नाट्यशास्त्र के अधिकारी एवं रूढ़ियों का निरूपण किया गया है । नाट्यशास्त्र के विभिन्न अंगों यथा रस, भाव, अभिनय, धर्मी, वृत्ति, प्रवृत्ति, सिद्धि, स्वर, आतोद्य, गान एवं रंग का उल्लेख हुआ है । वर्तमान नाट्यशास्त्र के स्वरूप एवं परवर्ती नाट्यग्रन्थों की परिचर्चा की गई है । अन्त में नाट्यशास्त्र के सन्दर्भ में यावनी परम्परा का उल्लेख हुआ है । ) २३. नाट्यसमीक्षा, दशरथ ओझा, दिल्ली, सं ० २०१६ । २४. नाट्यनिबन्ध, दशरथ ओझा, दिल्ली, १६७२ । २५. नाट्य दर्शन शान्तिगोपाल पुरोहित जयपुर १ ९ ७० । 26. Natya, Nritta, and Nritya Their, Meaning, and Relation; PIE REK. M.पृVarma० २३ पर, Calcuttaनाट्य के, उद्गम1957,: एवं पृ० ४५ पर तत्सम्बन्धी धारणाओं पर प्रकाश डाला गया है । इसी भांति पृ० २२ पर नृत्त के उद्गम एवं पृ० ५३ में तत्सम्बन्धी धारणाओं व पृ० ३० पर नृत्तके उद्गम तथा पृ० ६७
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- सन्दर्भ ग्रन्थ सूची ५५५ पर नृत्य की धारणाओं का विवेचन प्रस्तुत किया गया है । इन तीनों के पारस्परिक सम्बन्ध की भी परिचर्चा की गई है । ) २७. प्राचीन भारतीय लोकधर्म वासुदेवशरण अग्रवाल, अहमदाबाद, १६६४ । २८. प्राचीनभारतेर नाट्यकला ( बांगला ), मनमोहन घोष, कलकत्ता, १६४५ । २६. प्राचीन भारत में संगीत, धर्मावती श्रीवास्तव, वाराणसी, १६६७ । 30. Bibliography ofthe Sanskrit Drama, Schular, New York, 1906: ३१. भरत और भारतीय नाट्यकला, सुरेन्द्रनाथ दीक्षित, दिल्ली, १६७० यह विहार विश्वविद्यालय द्वारा पी ० एच ० डी ० की उपाधि के लिए स्वीकृत शोध प्रबन्ध है । सम्पूर्ण प्रबन्ध ग्यारह अध्यायों में विभाजित है । प्रथम में भरत का व्यक्तित्व एवं नाट्यशास्त्र का सामान्य परिचय है । द्वितीय नाट्योत्पत्ति से सम्बन्धित है । तृतीम में नाट्यमण्डप का परिचय चतुर्थ में नाट्य सिद्धान्त की व्याख्या एवं पंचम में रस एवं भाव की विवेचना करते हुए भरत एवं परवर्ती आचार्यों के विचारों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है । छठा अध्याय अभिनय विज्ञान से सम्बन्धित है एवं सातवाँ नाटक के प्रस्तुतीकरण से । आठवें में नाट्यप्रयोगविज्ञान का विश्लेषण हुआ है । नव में नाट्य की रूढ़ियों का और दसवें में नृत्य की अनुरंजक कलाओं, यथा गीत, वाद्य एवं नृत्य का आनुषंगिक रूप से विवेचना हुआ है । अन्तिम अध्याय में आधुनिक भारतीय रंगमंच की आलोचना की गई है । ) ३२. भरतनाट्यशालाओं के रूप, राय गोविन्दचन्द्र, वाराणसी, १६५८ । ३३. भारतीय पाश्चात्त्य रंगमंच, पं ० सोताराम चतुर्वेदी, लखनऊ, १ ९ ६४ । ३४. भारतीय संगीत का इतिहास, डा० शरच्चन्द्र श्रीधर परांजपे, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी, १ ९ ६६ । ( पृ० २७३-४७५ विशेषतः दृष्टव्य है । यहाँ "ता ", "रि" "ग " इन भागों में विभक्त करके भरतकालीन संगीत का विश्लेषण किया गया है । "सा " में नाट्यशास्त्र के संगीतपक्ष का विस्तृत दर्शन है । "र" के अन्तर्गत नाट्यशास्त्र के टीकाकारों के संगीत विषयक योगदान की चर्चा की गई है । "ग " के अन्तर्गत नाट्यशास्त्र में उल्लिखित एवं कुछ अनुल्लिखित संगीताचार्यो का मूल्यांकन किया गया है । मुख्य विषय हैं:- संगीत के स्वर एवं श्रुति-
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५५६ नाट्यशास्त्रम् व्यवस्था, ग्राम, मूच्र्छना, वीणादि, वाद्य, तालपद्धति, नृत्यकला एवं संगीत ) प्रवर्तक आदि । के 35. Mansara, an Encyclopaedia of Hindu Architecture; P. K... Acharya, Mansara Secries Vol. VII, London, 1946: ( - - द्रष्टव्य पृ०२७३ २७७ नाट्यगृह का सामान्य परिचय देते हुए क भरत द्वारा उल्लिखित तीनों प्रकार के नाट्यगृहों का सुरुचिपूर्ण रेखांकन किया गया है । ) 36. A Monograph on Bharata's Natyashastra; Indian Dramatology ग ace P.S.R. Appa Rao and P. Sri Ram Sastry, N. M P., 1967., वि ( 43 पुस्तक में १६ अध्याय हैं जिनमें नाट्यशास्त्र एवं भरत के परिचय से लेकर नाट्यशास्त्र के सभी सामान्य विषय यथा रस, भाव नाटक के रूप, नृत्य, गीत, वाद्य, रंगमंच, गति, चारी आदि सभी की विवेचना की गई है । विशेषतः परिशिष्ट काफी महत्त्वपूर्ण है जिनमें ( १ ) में सम्पूर्ण नाट्यशास्त्र की विषय सामग्री का अध्यायपरक विस्तृत वर्णन है । ( २ ) में नाटक के विभिन्न ( ) तत्त्वों से रसों के सम्बन्ध की सारणी दी गयी है । ३ में नाटक के दसों रूपों नि ( ), की विशिष्टता की प्रदर्शक सारणी दी गयी है । ४ में केशबन्ध शिरस्त्राण न ( ) बवं वेशभूषाओं के रेखा चित्र दिए गए हैं । ५ में नाट्यशास्त्र में वर्णित प्र ( ) 4 हस्त मुद्राओं के रेखाचित्र है । ६ में रामप्पा मन्दिर से उद्धृत नृत्य की मुद्राओं के रेखांकन है । भारत की पाँच मुख्य नृत्य शैलियों की भी मुद्राएं [ ] दिए 4 प्रदर्शित की गई हैं तथा ७ में तीनों प्रकार के नाट्यगृहों के रेखाचित्र हैं । ] 37. गएUniversal History of Music; S. M Tagore, The Chowkhamba. ४ Sanskrit Series Office, Benaras, 1963. ३८. रूपक रहस्य, श्यामसुन्दर दास, प्रयाग, स ० १ ९ ६७ । ४ ३६. रंगमंच और नाटक की भूमिका, लक्ष्मीनारायण लाल, दिल्ली, १ ९ ६५ । भ 40. The Laws and Practice of Sanskrit Drama, Vol. I; SN2 Shastri, Chowkhamba Sanskrit Series Varanasi, 1961; न (आठ अध्यायों में पुस्तक विभक्त है जिसमें नाटक के सभी अंगोपांग ४ विवेचित हैं । विशेषतः परिशिष्ट में दी गयी सारणियाँ बहुत ही विश्लेषणात्मक हैं । ) वि -४१. लोकधर्मी नाट्यपरम्परा, श्याम परमार, काशी, १६५६ ।
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- सन्दर्भ ग्रन्थ सूची ५५७ गीत के ४२. श्रृंगाररस का शास्त्रीय विवेचन, डा० इन्द्रपालसिंह, चौखम्भा वाराणसी, १६६७ । P.K.. ( सम्पूर्ण पुस्तक में संस्कृत के शास्त्रीय ग्रन्थों से शृङ्गार रस सम्बन्धी अंशों का आकलन किया गया है एवं यथावसर व्याख्या भी की गई है । कुल मिलाकर देते हुए छह अध्याय हैं । प्रथम अध्याय रस की अभिव्यक्ति से संबधित है । द्वितीय में रेखांकन भोजकृत श्रृंगाररस का विवेचन है । तृतीय में नाट्यशास्त्रगत, चतुर्थ में दशरूपक गत, पंचम में साहित्यदर्पण गत एवं छठे में भावप्रकाश गत शृंङ्गार रस का ology, विवेचन किया गया है । ) 43. Seven Words in Bharata -What Do They Signify, K. M. Verma, परिचय Bombay, 1958. के रूप, भरत के नाट्यशास्त्रत्र में पाठ लेखन से संबंधित सोत शब्द ( १ ) सूत्र, गई है । (२ ) भाष्य, ( ३ ) संग्रह, ( ४ ) कारिका, ( ५ ) निरुक्त, ( ६ ) अनुवंश्य एवं ( ७) स्त्र की निदर्शन की व्याख्या त्रिविध रूपेण की गई है । ( अ ) अभिनवगुप्तादि पूर्वाचार्यो के विभिन्न निरूपण दिए गए हैं, ( ब ) लेखक की अपनी व्याख्या प्रस्तुत की गई है, ( स ) सोंरूपों नाट्यशास्त्र की विविध समस्याओं के संदर्भ में नई व्याख्या की उपयोगिता रस्त्राण प्रदर्शित की गई है । ) 44: The Sanskrit Drama in its Origin, Development, Theory and न्य की Practice, A. B. Keith, London, 1954. मुद्राएं 45: Sanskrit Drama S. K. De, ( Cultural Heritage of India Series, त्र दिए Vol. III), Sri Ramkrishna Birth Centenary Committee, Calcutta, 1937. hamba ४६-- संस्कृत नाट्यशास्त्र ना विकास नी रूपरेखा ( गुजराती ), डी० आर० मनकद, अहमदाबाद, १ ९ ४३ । ४७ – संस्कृतनाट्यकला, रामलखन शुक्ल, १ ९७० । दिल्ली, ( सम्पूर्ण पुस्तक को नो अध्यायों में विभक्त करके नाट्य के उद्भव, प्रकार, भाव, रस, रंगमंच आदि पर चर्चा की गई है । संस्कृत के नाट्याचार्यों के ही मत S: N नहीं दिए गए हैं, अपितु विल्सन, मनकद, कीथ प्रभृति विदेशी विद्वानों के भी मतों की समीक्षा की गयी है । ) गोपांग ४८ -संस्कृत नाट्यविद्धान्त, रमाकान्त त्रिपाठी, वाराणसी, १ ९ ६७ । बहुत ही ( प्रथम अध्यायों में रूपक के बारह भेदों के अतिरिक्त अन्य प्रभेदों की भी विवेचना की गई है । द्वितीय अध्याय में नाटकीय तत्त्वों पर प्रकाश डाला गया है । तृतीय में नायक नायिका भेद एवं अलङ्कारों की चर्चा की गई है । चौथे ना० ३६
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५५८ नाट्यशास्त्रम् में वृत्ति एवं अभिनय की परिचर्चा हुई है । पांचवे में रस का विवेचन किया गया है एवं अन्तिम अध्याय में रसभेद प्रस्तुत किए गए हैं । ) 49 Some Concepts of Alamkara Shastra, V. Raghavan, Adyar, 1942. 50. History of Sanskrit Poetics (two volumes) S. K. De, Calcutta, 1960. 51. A History of Sanskrit Poetics, P. V. Kane, Delhi, 1961. 52. History and Culture of Indian People: Vol. II, The Age of Imperial Unity), Ed. R. C. Majumdar, Bombay, 1953, ( 2nd edition ). 53. History ofIndian Literature, A. M. Winternitz, ( English Trans- lation by Subhadra Jha ), Calcutta, Vol. I ( 1927), Vol. II ( 1933). 54. Hindu Music, S. M. Tagore, Benaras, 1965. ( मुख्यतः द्रष्टव्य सामग्री में पृ० १७५-१८५ तक गानविषयक लेख हैं । पृ० १ ९४-१९ ७ में वीणा का परिचय दिया गया है । विद्वानों पृ० २ ९७-३०७ में विभिन्न के संगीत एवं नृत्य विषयक लेख संकलित किए गए हैं । ) लेख व निबन्ध 1 Alamkara and Aesthetic Realisation- A Critical Review Mukherjee, Anv., III -2.1,4, March, 1969., R. 2. Abhinayam, K. V. Srinivasa Iyengar, AIOC, HII, Summaries Pp. XXX- XXXII., 3. Adibharata, Dr. Mankad, ABORI, Vol XXIII 4. Adibharata and the Natyasarvasvadipika ABORI, XV., Manomohan Ghosh, 5. Indian Aesthetics, M. Hiriyanna, AIOC, I Proceedings - Vol. II, pp. 229-50. 6. Indian Aesthetics: a Critical Study; P. B. Adhikari, Acharya- Pushpanjali Volume ( Commorative Volume prensented D. Bhandarkar), Calcutta, 1940, pp. 63-67. to 7. Indian drama- a bird's eye view, V. Raghvan, Mah- Raval Jayanti Abhinandana Granth, Durgapur- 1950, pp. 132-37. Rajat 8. Uprupakas; V. Raghavan, Drama Seminar, Sangit Nataka Academy, New Delhi. 9. Aesthetic Experience in the light of the Abhasavada Summaries, pp. 110-11.; AIOC, XI,
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सन्दर्भ-ग्रन्थ सूची 448 10. The Ancient Indian Theatre; K. R. Pisharoti, Raja Sie Anna- malai Chattiyar Coom. Vol. Annamalainagar- 1941, pp. 338-349. 11. The Origin of the drama; T Appanna, Raja Sir Annamalai Chettiar Comm. Vol., Annamalainagar- 1941, pp. 107-117. 12. Curtain in Ancient India; S.K. De, Bharti Vidya, Vol. IX. 13. Concepts of Lakshana Vrittis, V. Raghavan, J. O. R., Madras Vol. vii. 14. The Concept of Sthayibhava in Indian Poetics; D. D. Vadekara ABORI, XXIV. 15. The Concept of Suggestion in Hindu Aesthetics A Volume of Studies in Indelogy; P. S. Naidu, Poona- 1941, pp. 294-301. presented to Prof. P. V. Kane, 16. The curtain in ancient Indian Diamond Jubilee theatre, S. K. De, K.M. Munshy 1948, pp. 125-131.Volume (Bhartiya Vidya, Vols 9) Bombay- 17. Gleanings from the Abhinayabharati Kane, Commemorative of Abhinavagupta; P V. Poona - 1934, pp. 385-400Essays. Presented to Prof K. B. Pathak, 18. Date of Bharata's Natyashastra; M.M. 25, Calcutta. Ghosh, J.O.L. Parts 23/ 19. Theatre Architecture in Ancient India IV -VI, 1931-1933; V. Raghvan, Triveni 20. Thoughts on Indian Music; R. Srinivasan, Har Comm, Vol., Ajmer, 1937, pp. 519-521. Bilas Sarda २१ - नाट्यशास्त्र को भारतीय परम्परा, डॉ० हजारी, ५७ ॥, आलोचना अक्तूबर प्रसाद द्विवेदी 22. Nandi in Theory; Urmilla Dave I, H. Q., xvii, 1941.23. Natya, who first introduced on earth? H.R. Vol. V. Divekar, ABORI, 24. Natyashastra and its influence on Indian Krishnaswami Rao, AIOC-III Summaries p. 74life. and Art; o 25. Natyashastra, the expression of emotion; P. S. Naidu X, Summaries pp. 144-45. - AIOC