भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 191–200
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 191–200
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७८ नाट्यशास्त्रम् इस प्रकार जर्जर का पूजन कर एवं उसे बलि प्रस्तुत करने के उपरान्त मन्त्र तथा आहुतियों के साथ अग्नि में हवन कार्य करे ॥ ८३ ॥
हुताश ' एव दीप्ताभिरुल्काभिः परिमार्जनम् ।
नृपतेर्नीच कुर्याद्दीप्यभिवर्द्धनम् ॥ ८४ ॥
इसी अग्नि से जलाई जाने वाली मशाल को राजा तथा नर्तकी के दीप्तिवर्धन हेतु चारों ओर घुमाए ॥ ८४ ॥
अभिद्योत्य सहातोद्यैर्नृपतिं नर्तकीस्तथा ।
मन्त्रपूतेन तोयेन पुनरभ्युक्ष्य तान् वदेत् ॥ ८५ ॥
महाकुले प्रसूताः स्थ गुणौघैश्चाप्यलङ्कृताः ।
यो जन्म गुणोपेतं तद्वो भवतु नित्यशः ॥ ८६ ॥
और समस्त वाद्यों के साथ राजा तथा नर्तकियों को प्रकाशित कर फिर मन्त्रों से पवित्र जल से उनका प्रोक्षण करे । तदनन्तर उन्हें इस प्रकार कहे - आप सभी श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न और समस्त गुणों से युक्त हैं अतएव आपको अपने जन्म तथा और गुणों द्वारा जो प्राप्ति हुई है वह सदा वैसी ही बनी रहे ॥ ८७ ॥
एवमुक्त्वा ततो वाक्यं नृपतेर्भूतये बुधः ।
नाट्ययोगप्रसिद्धयर्थमाशिषस्सम्प्रयोजयेत् ॥ ८७ ॥
बुद्धिमान पुरुष इस प्रकार राजा को समृद्धि ( या प्रसन्नता ) के वचनों को कहने के पश्चात् नाट्य - प्रयोग ( अभिनय ) की प्रसिद्धि के लिये इस प्रकार आशीर्वचन कहे ॥ ८७ ॥
सरस्वती धृतिर्मेधा ह्रीः श्रीलक्ष्मीस्स्मृतिर्मतिः ।
पान्तु वो मातरः सौम्यास्सिद्धिदाश्च भवन्तु वः ॥ ८८ ॥।
देवी सरस्वती. धृति, मेधा, ही, श्री, लक्ष्मी, स्मृति, मति, सभी मातृकाएँ आपकी रक्षा करें और आपके लिए सिद्धि को प्रदान करनेवाली हों ॥ ८८ ॥
१. हुत्वा स एव - ख, ग ० । २. धूतिर्मतिः —ख ० । ३. सर्वाः - ग ० ।
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तृतीयोऽध्यायः ७ ९
घट - भेदन-होमं कृत्वा यथान्यायं हविर्मन्त्रपुरस्कृतम् ।
भिन्द्यात्कुम्भं ततश्चैव नाट्याचार्यः प्रयत्नतः ॥ ८ ९ ॥
विधिवत् हवि तथा मन्त्रों के द्वारा होम को समाप्त कर फिर नाट्याचार्य प्रयत्नपूर्वक रंगमंच पर स्थित कुम्भ को फोड़ दे ॥ ८ ९ ॥
अभिन्ने तु भवेत्कुम्भे स्वामिनः शत्रुतो भयम् ।
भिन्ने ' चैव तु विज्ञेयः स्वामिनः शत्रुसंक्षयः ॥ ९ ० ॥
इस कुम्भ के न फूटने पर राजा को शत्रु से भय उत्पन्न होता है तथा कुम्भ के टूट • जाने पर स्वामी के शत्रुओं का विनाश हो जाता है ॥ ९ ० ॥
रंग - प्रदीपन-भिन्ने कुम्भे ततश्चैव नाट्याचार्यः प्रयत्नतः ।
प्रगृह्य दीपिकां दीप्तां सर्व रंगं प्रदीपयेत् ॥ ९ १ ॥
इस प्रकार इस घट के फूट जाने पर नाट्याचार्य प्रयत्नपूर्वक जलता हुआ दीपक लेकर सम्पूर्ण रंगस्थल को प्रकाशित करे ॥ ९ १ ॥
क्ष्वेडितैः स्फोटितैश्चैव बल्गितैश्च प्रधावितैः ।
रङ्गमध्ये तु तां दीप्तां सशब्दां सम्प्रयोजयेत् ॥ ९ २ ॥
वह उस दीपक को लेकर अतिशय शब्द एवं सिंहनाद करते हुए, अंगुलियों को घुमाते या मरोड़ते हुए, कूदते और दौड़ते हुए इसकी प्रभा को सारे रंगमंच पर घुमा दे ॥ ९ २ ॥ शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्मृदङ्गपणवैस्तथा सर्वातोद्यैः प्रणदितैः रङ्गे युद्धानि कारयेत् ॥ ९ ३ ॥ १. भवेद्भिन्ने तु — ख ० । २. नाट्याचार्योऽप्यपेतभीः घ ० । ३. वल्गितैर्विप्रधावितैः ख ० । ४. रङ्गयुद्धानि – ख ० ।
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८० नाट्यशास्त्रम् फिर शंख और दुन्दुभिवाद्य के निर्घोष तथा मृदंग और पण वाद्यों के बजाने और सभी वाद्यों का वादन करते हुए रंगभूमि पर युद्ध की आयोजना करे ।
तत्र च्छिन्नं च भिन्नं च दारितं च सशोणितम् ।
कृत्तं ' प्रदीप्तमायस्तं निमित्तं सिद्धिलक्षणम् ॥ ९ ४ ॥
यदि इस युद्ध में योद्धाओं का कटा, फटा, चिरा या काटा हुआ घा रक्त से चमकीला या बड़ा हो जाए तो यह बड़ा शुभ शकुन माना जाता है और यह सिद्धि का सूचक होता है ॥ ९ ४ ॥ रंग - प्रतिष्ठा से शुभ - प्राप्ति तथा रंग - पूजन का माहात्म्य-सम्यगिष्टस्तु रङ्गो वै स्वामिनः शुभमावदेत् । ' पुरस्याबालवृद्धस्य तथा जनपदस्य च ॥ ९ ५ ॥ विधिपूर्वक पूजन किया हुआ ' रंगमञ्च ' राजा को शुभदाता होता है तथा इसी प्रकार यह नगर के बालकों, बूढ़ों तथा जनपद के लिये भी कल्याणप्रद होता है ॥ ९ ५ ॥
दुरिष्टस्तु तथा रङ्गो दैवतैर्दुरधिष्ठितः ।
नाट्यविध्वंसनं कुर्यान्नृपस्य च तथाऽशुभम् ॥ ९ ६ ॥
तथा रंगमञ्च की विधिवत् पूजना न की जाने पर तथा देवगण के ठीक तरह से अधिष्ठित न होने पर नाट्य का विध्वंस तथा राजा का अशुभ भी हो जाता है ॥ ९ ६ ॥
यस्त्वेवं विधिमुत्सृज्य यथेष्टं सम्प्रयोजयेत् ।
प्राप्नोत्यपचयं शीघ्रं तिर्यग्योनिश्ञ्च गच्छति ॥ ९ ७ ॥
जो व्यक्ति इस प्रकार की विधि को त्याग कर यथेष्ट ( स्वच्छन्द होकर ) अभिनयादि का मञ्च पर प्रयोग करता है वह शीघ्र ही अवनति प्राप्त करता है ॥ ९ ७ ॥ १. क्षतं प्रदीप्तमायस्तं – क ० । २. पुरस्य बालवृद्धस्य ख ० । ३. य एवं- ख ० ।
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तृतीयोऽध्यायः ८१
यज्ञेन सम्मितं ' ह्येतद्रङ्गदैवत पूजनम् ।
अपूजयित्वा रङ्गन्तु नैव प्रेक्षां प्रयोजयेत् ॥ ९ ८ ॥
रंगस्थ देवगण का यह पूजन वैदिक यज्ञ के समान होता है अतएव बिना रंगपूजन किये प्रेक्षा ( रूपक या खेल ) का प्रदर्शन या अभिनय
नहीं करना चाहिए । । ९ ८ ॥
पूजिताः पूजयन्त्येते मानिता मानयन्ति च ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन कर्तव्यं रङ्गपूजनम् ॥ ९९ ॥
रंगस्थल के ( प्रतिष्ठापित ) देवगण पूजे जाने पर पूज्य बनाते हैं तथा मानित होने पर उन्हें भी सम्मान प्राप्त करवाते हैं । अतएव सभी प्रयत्नों के साथ रंग का पूजन किया जाना चाहिए ॥ ९९ ॥
न तथाशु दहत्यग्निः प्रभञ्जनसमीरितः ।
यथा ह्यपप्रयोगस्तु प्रयुक्तो दहति क्षणात् ॥ १०० ॥
आँधी से प्रेरित अग्नि भी उतनी शीघ्रता से नहीं जलती जितनी ( शीघ्रता से ) दूषित विधि के द्वारा किया गया नाट्यप्रयोग क्षणमात्र में प्रयोक्ता को ध्वस्त कर देता है ॥ १०० ॥
शास्त्रज्ञेन विनीतेन शुचिना दीक्षितेन च ।
नाट्याचार्येण शान्तेन कर्तव्यं रङ्गपूजनम् ॥। १०१ ॥
इसलिए शास्त्र के ज्ञाता, विनम्र, पवित्र, व्रत की दीक्षा ग्रहण करने वाले तथा शान्त स्वभाव वाले नाट्याचार्य के द्वारा रंगमञ्च का पूजन किया जाना चाहिए ॥ १०१ ॥
स्थानभ्रष्टन्तु यो दद्याद् बलिमुद्विग्नमानसः ।
मन्त्रहीनो यथा होता प्रायश्चित्ती भवेत्तु सः ॥ १०२ ॥
१. सम्मतं - ख ० । २. तथा प्रदहत्यग्निः क ० । ३. सार्द्धश्व - क ० । ६ ना ० शा ० प्र ०
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८२ नाट्यशास्त्रम् जो मनुष्य को चित्त के उद्वेग के कारण अयोग्य स्थान में बलि प्रदान कर देता है वह मन्त्रहीन आहुति देने वाले होता के समान प्रायश्चित्त का भागी होता है ॥ १०२ ॥
' इत्ययं यो विधिर्दृष्टो रङ्गदैवतपूजने ।
नवे नाट्यगृहे ' कार्यः प्रेक्षायाश्च प्रयोक्तृभिः ॥ १०३ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे रङ्गदैवतपूजनं नाम तृतीयोऽध्यायः समाप्तः । इस प्रकार रंगदैवत पूजन की जो विधि बतलाई गई है, उसे प्रयोक्तागण नये नाट्यगृह के निर्माण तथा प्रदर्शन हेतु अभिनयादि प्रस्तुत किये जाने के अवसर पर अवश्य प्रयुक्त करें ॥ १०३ ॥
भरतमुनिप्रणीत नाट्ययशास्त्र की प्रदीपव्याख्या का ' रंगदैवतपूजन ' नामक तृतीय अध्याय सम्पूर्ण । 11308 की IS ME कलाक er fra Ists 1 ffer १. एवमेव विधि - ग ० । २. कार्यं प्रेक्षायान्तु ग ० । of one of
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III अथ चतुर्थोऽध्यायः
एवं तु पूजनं कृत्वा मया प्रोक्तः पितामहः ।
' आज्ञापय विभो ' क्षिप्रं कः प्रयोगः प्रयुज्यताम् ॥ १ ॥
इस प्रकार विधिवत् पूजन करने के उपरान्त मैंने पितामह ब्रह्मा से कहा- हे प्रभो! आप शीघ्र आज्ञा दीजिए कि किस नाटक को खेला जाए ( या मैं किस रचना को प्रयोग रूप में उपस्थित करूँ! ) ॥ १ ॥
ततोऽस्म्युक्तो भगवता योजयामृतमन्थनम् ।
एतदुत्साहजननं सुरप्रीतिकरं तथा ॥ २ ॥
तब ( मुझे ) पितामह ब्रह्मा बोले — हे वत्स, ' अमृतमन्थन का संयोजन करो । ( क्योंकि ) यह देवगणों को प्रिय है और उनके उत्साह को बढ़ाने वाला है ॥ २ ॥
योऽयं समवकारस्तु धर्मकामार्थसाधकः ।
मया प्राग्ग्रथितो विद्वन्स प्रयोगः प्रयुज्यताम् ॥ ३ ॥
हे विद्वन्! मैंने जिस समवकार की रचना की है वह धर्म, काम तथा अर्थ का साधक है । आप उसी ' नाट्य ' का अब प्रयोग करें ॥ ३ ॥
तस्मिन्समवकारे तु प्रयुक्ते देवदानवाः ।
हृष्टाः समभवन्सर्वे कर्मभावानुदर्शनात् ॥ ४ ॥
१. ' अमृतमन्थन ' का वृत्तान्त पुराणों में अतिशय प्रसिद्ध है । अनेक पुराणों में यह कथा है ( दे ० श्रीमद्भागवत तथा म ० भा ० प ० १, अध्या ० १७-१६ तथा विष्णु ० पु ० अं ० १ इत्यादि ) १. प्रभो - ग ० । २. महत् ग ० । ३. समस्त कार्यस्य – ख ० । ४. प्रग्रथितो घ ० ।
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८४ नाट्यशास्त्रम् इस समवकार ' के प्रस्तुत किये जाने पर देवता तथा दैत्यगण ( अपने ) कर्म ( अभिनय आदि ) तथा भावों ( विचारों, कल्पनाओं ) को देखकर प्रसन्न हुए ॥ ४ ॥
कस्यचित्त्वथ कालस्य मामादाम्बुजसम्भवः नाट्यं सन्दर्शयामोऽद्य त्रिनेत्राय महात्मने फिर किसी समय मुझसे कमलयोनि भगवान् ( अपने ) इसी नाट्य को अब महात्मा शंकर के सम्मुख ततः सार्धं सुरैर्गत्वा वृषभाङ्कनिवेशनम् समभ्यर्च्य ' शिवं पञ्चादुवाचेदं पितामहः मया समवकारस्तु योऽयं सृष्टः सुरोत्तम श्रवणे दर्शने चास्य प्रसादं कर्तुमर्हसि
।
॥ ५ ॥
ब्रह्माजी बोले- हम प्रस्तुत करेंगे ॥ ५ )
।
॥ ६ ॥
।
॥ ७ ॥
तब पितामह ब्रह्मा देवगणों के साथ भगवान शिव के निवास स्थान पर जाकर और भगवान शिव की विधिवत् अर्चना कर ( फिर ) उनसे बोले । हे देवाधिदेव! मैंने जिस समवकार की रचना की है उसे सुनने तथा देखने की कृपा कीजिये ॥ ६-७ ॥
पश्याम इति देवेशो द्रुद्दिणं वाक्यमब्रवीत् ।
ततो मामाह भगवान् सज्जो भव महामते ॥ ८ ॥
भगवान शंकर ने ब्रह्माजी से कहा- ' हम इसे अवश्य देखेंगे ' । तब भगवान पितामह मुझ ( भरत ) से बोले – हे मुने! इस प्रयोग के प्रदर्शन की तैयारी कीजिए ॥ ८ ॥
ततो हिमवतः पृष्ठे नानानगसमाकुले ।
बहुभूतगणाकीर्णे रम्यकन्दरनिर्झरे ॥ ९ ॥
१. समवकार तथा ' डिम ' - रूपकों के भेद । इनके लक्षण ना ० शा ० अ ० २० में है । ' त्रिपुरदाह ' - भगवान शिव ने त्रिपुर दैत्य की तीनों नगरियों को भस्म कर उसका संहार किया था और इसी कारण वे ' त्रिपुरान्तक ' कहलाए । १. अभ्यर्च्य च - ग ० । २. बहुतद्रुमाकीर्णे - ख ० ।
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चतुर्थोऽध्यायः ८५
पूर्वरने कृते पूर्व तत्रायं द्विजसत्तमाः ।
तथा त्रिपुरदाहश्च डिमसंज्ञः प्रयोजितः ॥ १० ॥
हे श्रेष्ठ मुनिगण! तब उस हिमालय पर्वत के प्रदेश पर — जो अनेक पर्वतों से घिरा हुआ था, जिसमें अनेक भूत्तगण विद्यमान थे तथा जो सुरम्य कन्दराओं और सोतों से युक्त था । वहाँ मैंने पूर्वरंग विधान के पश्चात् इस अमृतमन्थन समवकार तथा त्रिपुरदाह नामक डिम ' का अभिनय ( प्रयोग ) प्रस्तुत किया ॥ ९ -१० ॥
ततो भूतगणाः हृष्टाः कर्मभावानुकीर्तनात् ।
महादेवश्च सुप्रीतः पितामहमथाब्रवीत् ॥ ११ ॥
तब सभी भूतगण कार्य तथा भावों के अभिनय ( प्रयोग ) को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और भगवान् शिव भी अतिशय सन्तुष्ट होकर पितामह ब्रह्माजी से बोले! ११ ॥
अहो नाट्यमिदं सम्यक्त्वया ' सृष्टं महामते ।
यशस्यं च शुभार्थीच पुण्यं बुद्धिविवर्धनम् ॥ १२ ॥
हे महामते! यह नाट्य प्रयोग आपने बहुत ही श्रेष्ठ निर्माण किया है जो यशःप्रदाता, शुभ अर्थों का साधक, पवित्र और बुद्धि का संवर्धक है ॥१२ ॥
मयापीदं स्मृतं नृत्यं सन्ध्याकालेषु नृत्यता ।
नानाकरणसंयुक्तैरङ्गारैर्विभूषितम् ॥ १३ ॥
पूर्वरङ्गविधावस्मिन् त्वया सम्यक्प्रयोज्यताम् ' । सन्ध्या के समय नृत्य करते हुए जब मैंने नृत्य का निर्माण किया तब मैंने इसे ( नृत्य ) अंगहारों ' से - जो करणों से मिलकर निर्मित १. अंगहार का अर्थ होता है शरीर का हलन चलन । आचार्य अभिनव-गुप्त ने अंगहार पद की व्याख्या इस प्रकार की है- " अंगानां देशान्तरे समुचिते १. दृष्टं ख ० । २. नृत्तं – ग ० । ३. प्रयुज्यताम् — ग ० ।
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८६ नाट्यशास्त्रम् होते हैं - युक्त करते हुए और भी सुन्दर बनाया है । तुम इन अंगहारों का ' नाटक ' की पूर्वरंगविधि में प्रयोग करो ॥ १३ ॥
पूर्वरंग के दो प्रकार-वर्धमानक योगेषु ' गीतेष्वासारितेषु च महागीतेषु चैवार्थान् सम्यगेवाभिनेष्यसि यश्चायं पूर्वरङ्गस्तु त्वया शुद्धः प्रयोजितः एभिर्विमिश्रितश्चायं चित्रो नाम भविष्यति वर्धमानक, आसारित, गीत और महागीत ( के की अवस्था में ( इसके ) भावों को ठीक प्रकार से ॥ १४ ॥
।
॥ १५ ॥
। योग या सम्बन्ध ) अभिनय कर सकोगे । आपने जो पूर्वरंग प्रयुक्त किया वह शुद्ध पूर्वरंग है पर जब ये वर्धमानक आदि इसमें संसक्त होंगे तो इनके मिश्रण हो जाने से इस ( पूर्वरंग ) का ' चित्र पूर्वरङ्ग ' नाम हो जाएगा ॥ १४–१६ ॥ अंगहार-श्रुत्वा महेश्वरवचः प्रत्युक्तस्तु स्वयंभुवा ॥ १६ ॥
प्रयोगमङ्गहाराणामाचक्ष्व सुरसत्तम ।
ततस्तण्डुं समाहूय प्रोक्तवान् भुवनेश्वरः ॥ १७ ॥
प्रयोगमहाराणां आचक्ष्व भरताय वै । महेश्वर के वचनों को सुन ब्रह्माजी बोले हे देवाधिदेव, आप ‘ अंगहारों ' के विषय में बतलाइये । प्रापणप्रकारोऽङ्गहारः । हरस्य चायं हारः प्रयोगः । अंगनिर्वत्यों हारोऽङ्गहारः ( अभि ० भार ० Vol. I. पृ ० ११ ) । अर्थात् वह प्रधान नृत्यप्रकार जो संक्षिप्त ( छोटे ) करणों के द्वारा निष्पन्न होता हो, अङ्गहार है । १. योगेन - घ ० २. एतद्वि - क ० । ३. प्रयुक्तश्व – ग ० । ४. सुरसत्तमः – घ ० । ५. भरतायोपदिश्यताम् क ० ।
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चतुर्थोऽध्यायः ८७ तब ( त्रिभुवनाधिपति भगवान् ) शिव ने तण्डु को बुलाकर कहा-' भरतमुनि ' को अंगहारों का विधान बतला दीजिये ॥ १६-१७ ॥ ततो वै ' तण्डुसम्प्रोक्तांस्त्वङ्गद्दारान् महात्मना ॥ १८ ॥
नानाकरणसंयुक्तान् व्याख्यास्यामि सरेचकान् । तब ( महामना ) तण्डु के द्वारा मुझे जो करणों तथा रेचकों से युक्त अंगहार बतलाए गये अब मैं उनकी व्याख्या करूँगा ॥ १८-१९ ॥ स्थिरहस्तोऽङ्गद्दारस्तु तथा पर्यस्तकः स्मृतः ॥
सूचीविद्धस्तथा चैव ह्यपविद्धस्तथैव च ।
आक्षिप्तस्तु विज्ञेयस्तथा चोद्घट्टितस्स्मृतः ॥
विष्कम्भश्चैव सम्प्रोक्तस्तथा चैवापराजितः ।
विष्कम्भापसृतश्चैव मत्ताक्रीडस्तथैव च ॥
स्वस्तिको रेचितश्चैव पार्श्वस्वस्तिक एव च ।
वृश्चिकासृतः प्रोक्तो भ्रमरश्च तथापरः ॥
मत्तस्खलितकश्चैव मदाद्विलसितस्तथा ।
गतिमण्डलको ज्ञेयः परिच्छिन्नस्तथैव च ॥
' परिवृत्त रेचितः स्यात्तथा वैशाखरेचितः ।
परावृत्तोऽथ विज्ञेयस्तथा चैवाप्यलातकः ॥
पार्श्वच्छेदोऽथ सम्प्रोक्तो विद्युद्भ्रान्तस्तथैव च ऊरूवृत्तस्तथा चैव स्यादालीढस्तथैव च ॥
रेचितश्चापि विज्ञेयस्तथैवाच्छुरितः स्मृतः ।
आक्षिप्तरेचितश्चैव सम्भ्रान्तश्च तथापरः ॥
१ ९ ॥
२० ॥
२१ ॥
२२ ॥
२३ ॥
२४ ॥
।
२५ ॥
२६ ॥
१. ततो ये तण्डुना प्रोक्तास्त्वङ्गहारा महात्मना ख ०, घ ० । २. तान्वः - घ ० । ३. वृश्विकश्चैव सम्प्रोक्तो- घ ० । ४. चमरश्च ग ० । ५. गति मण्डलोऽथ ग ० । ६. रेचितोऽथ ग ० ।