भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १
Natya Shastra of Bharat Muni Part 1 Pradipa Hindi Vyakhya Babu Lal Shukla Shastri Chowkambha Sanskrit Series · 729 पृष्ठ · 73 खण्ड
विषय सूची
- केवल या और सिन्हा विशेषज्ञ लाभ हिन्दी नाट्य शास्त्र शुक्ल शास्त्री बाबूलाल चौरवम्भा संस्कृत संस्थान को ब • इस है और • सि तत्व ब रौनक अ निखार सिंघ भाप… 1–10
- ( ८ ) ४ या ५ वर्षों पूर्व से ही सन्दर्भ ग्रन्थ अनुशंसित हो चुका है । मैं उन सभी मनीषी प्राध्यापकों एवं नाट्यविद्या के अन्वेषक एवं अधीतिजन का भी आभारी हूँ… 11–20
- ( ६ ) द्वादशाध्याय में मण्डलों का लक्षण, संख्या तथा प्रयोग आदि का विशद निरूपण किया गया है । त्रयोदशाध्याय में गति प्रचार का निरूपण है… 21–30
- ( १६ ) नाट्यशास्त्र का प्रस्तुत संस्करण नाट्यशास्त्र के आलोचनात्मक संस्करण के अभाव ने इसके अनुवाद, व्याख्यान आदि कार्यों को अनेक वर्षों तक सम्भव नहीं होने… 31–40
- ( २६ ) अश्मचुट्ट तथा नखकुट्ट - इन दोनों आचार्यों का भरतपुत्र के रूप में नाट्यशास्त्र में उल्लेख मिलता है… 41–50
- ( ३६ ) इनका स्थितिकाल एकादश शताब्दी का पूर्वाधं है, अतः काव्यप्रकाश कार मम्मट के ये किचित् पूर्व में विद्यमान थे यह स्पष्ट है… 51–60
- ( ४६ ) तथा उसे तण्डु द्वारा प्राप्त करने का आदेश दिया । मुनि ने इस आदेश को सहर्ष स्वीकार किया और तण्डु से ताण्डव की शिक्षा प्राप्त कर उस ताण्डव का… 61–70
- ( ५६ ) मानकर संक्षेप में यहाँ अध्यायगत विवरण प्रस्तुत किया से विचार पुनरुक्त गया है ) । के निर्माण के पश्चात् देवगणों नाट्यशास्त्र के तृतीय अध्याय से… 71–80
- ( ६६ ) अधिक प्रसार हो सकता है क्योंकि उसमें शंका समाधान की पर्याप्त गुंजाइश होती है और इससे बौद्धिक विवरण का पर्याप्त आधार मिल जाता है… 81–90
- ( ७६ ) साधारणीकरण व्यापार को स्वीकार करते हैं, किन्तु इनका यह साधारणी-करण व्यापार सर्वसाधारण से सम्बद्ध है जिसमें विभावादि का सम्बन्ध नायक-नायिकादि से दूर… 91–100
- ( = ) ) तथा आवश्यक परिष्कार एवं सुझावों को निर्देशित करने की अध्येता एवं सुधीजन से विनम्र अभ्यर्थना है उनके द्वारा प्राप्त सभी सुझाव अगले संस्करण में… 101–110
- ( ६६ ) पृष्ठ हास्य - भेद ( ५३-६२ ) --३० ) ३२० करुणरस ( ६३-६४ ) ३२५ रौद्ररस ( ६५-६७ ) ३२७ | वीररस ( ६८-६९ ) ३३७ भयानकरस ( ७०–७३ ) ३३ ९ | ' बीभत्सरस ( ७४-७५… 111–120
- १० नाट्यशास्त्रम् कर्तराक्षं हिरण्याक्षं कुशलं दुस्सहन्तथा । जालं ' भयानकश्चैव बीभत्सं सविचक्षणम्… 121–130
- २० नाट्यशास्त्रम् यस्मादनेन ते विघ्नाः सासुराः जर्जरीकृताः । तस्माजर्जर इत्येव ' नामतोऽयं भविष्यति । ७३… 131–140
- ३० नाट्यशास्त्रम् और यही नाट्य श्रुति, स्मृति, सदाचार तथा शेष ( बचे हुए ) अर्थों की कल्पना करने वाला तथा लोकरंजनकारी होगा । १२३… 141–150
- ३८ नाट्यशास्त्रम् ( जूं का अण्डा ), जूं, जौ, अंगुली, हस्त तथा दण्ड ये नौ नाप के उत्तरोत्तर बढ़ते हुए परिमाण हैं… 151–160
- ४८ नाट्यशास्त्रम् कम्पने परचक्रात्तु भयं भवति ' दारुणम् । दोषैरेतैर्विहीनं तु स्तम्भमुत्थापयेच्छिवम् । ६१… 161–170
- ५८ नाट्यशास्त्रम् इसके पश्चात इनके ऊपर आठ खम्भे रखे । इनके ऊपर विधे हुए मुँह वाले आठ हाथों के शहतीरों ( पीठ ) को रखा जाए और इन शहतीरों के मुँह एक दूसरे… 171–180
- ६८ नाट्यशास्त्रम् चाहिए । गन्धर्व, अग्नि तथा सूर्य को रक्तवर्ण ' की मालाएँ और चन्दन प्रदान किया जाना चाहिए… 181–190
- ७८ नाट्यशास्त्रम् इस प्रकार जर्जर का पूजन कर एवं उसे बलि प्रस्तुत करने के उपरान्त मन्त्र तथा आहुतियों के साथ अग्नि में हवन कार्य करे । ८३… 191–200
- ८८ नाट्यशास्त्रम् ' अपसर्पस्तु विज्ञेयस्तथा चार्धनिकुट्टकः । द्वात्रिंशदेते सम्प्रोक्ता अंगद्वारास्तु नामतः । २७… 201–210
- [ फलक २ नाट्यशास्त्र, अ ० ४ ] स्वस्तिकरेचितम् । मण्डलस्वस्तिकम् । ( पृ ० ९ ५, लो ० ६७ ) ( पृ ० ९ ५, लो ० ६८ ) कटिच्छिन्नम् । अर्द्धरेचितम्… 211–220
- नाट्यशास्त्र, अ ० ४ ] [ फलक १२ गृधावलीकम् । सन्नतम् । ( पृ ० १० ९, लो ० १३४ ) ( पृ ० १० ९, श्लो ० १३५ ) सूची । अर्धसूची… 221–230
- १०२ नाट्यशास्त्रम् भी रेचित दशा में हो एवं शेष ( सम्पूर्ण ) अंग ' वैशाखस्थान में रहें तो इस करण को ‘ वैशाखरेचित ' कहते है । ९ ७ - ९ ८… 231–240
- ११२ नाट्यशास्त्रम् ( पैर के तलवों का घिसते हुए आगे बढ़ना ) हों तो उसे ' प्रसर्पितक ' करण कहते हैं । १४८-१४९ । अलात ' च पुरः कृत्वा द्वितीयञ्च द्रुतक्रमम्… 241–250
- १२२ नाट्यशास्त्रम् ततश्च करमावर्त्य ' रूपृष्ठे निपातयेत् । १ ९ ७ । उरुवृत्तं ततः कुर्यादाक्षिप्तं पुनरेव हि । नितम्बं करिहस्तं च कटिच्छिन्नं तथैव च… 251–260
- १३२ नाट्यशास्त्रम् अब मैं आपको चार रेचक बतलाता हूँ । इन्हें भी आप मुझसे जानिये । इन रेचकों में प्रथम पादरेचक, द्वितीय कटिरेचक, तृतीय हस्तरेचक तथा चतुर्थ… 261–270
- १४२ नाट्यशास्त्रम् पिण्डीबन्धस्तु पिण्डत्वाद्गुल्मः शृङ्खलिका भवेत् । २ ९ ० । जालोपनद्धा च लता सनृत्तो भेद्यकः स्मृतः… 271–280
- १५२ नाट्यशास्त्रम् पूर्वरङ्गं महाभागा गदतो मे निबोधत । पादभागाः कलाश्चैव परिवर्तास्तथैव च । ६… 281–290
- १६२ नाव्यशास्त्रम् ' प्ररोचना – यदि सूत्रधार या नाट्यविशेषज्ञ द्वारा रूपक के कार्यों का हेतु तथा युक्ति की सहायता लेकर सिद्धसदृश कथन किया जाय तो ( उसे ) '… 291–300
- १७२ नाट्यशास्त्रम् पाँच डग भरकर आगे आना ब्रह्मदेव के पूजनार्थ किया जाता है । अब इन पाँचों डगों के क्रमशः स्थापन का विधान बतलाता हूँ । ६ ९ -७०… 301–310
- १८२ नाट्यशास्त्रम् इस नाटक ( आदि दृश्यकाव्य ) के निर्माता कवि को यश मिले तथा उसका धर्म भी ( गुण, अद्दष्ट पुण्य ) विस्तृत हो और इस काव्यात्मक यज्ञ के… 311–320
- १ ९ २ नाट्यशास्त्रम् इसमें शम्या ' दो कला की तथा ताल एक कला की, पुनः शम्या एक कला की तथा सन्निपात ' दो कला के प्रमाण वाला होता है । १४२… 321–330
- २०२ नाट्यशास्त्रम् एष वः कथितो विप्राः पूर्वरङ्गाश्रितो विधिः भूयः किं कथ्यतां सम्यङ्नाट्य वेदविधिं प्रति । १८१… 331–340
- षष्ठोऽध्याय मुनिजन का भरत से प्रश्न— पूर्वङ्गविधि श्रुत्वा पुनराहुर्महर्षयः । भरतं मुनयः सर्वे प्रश्नान्पञ्चभिधत्स्व नः । १… 341–350
- २२२ नाट्यशास्त्रम् संचारी भाव- #IDE IFFIER STER fo fem is us the निर्वेदग्लानिशङ्काख्यास्तथास्यामदश्रमाः I आलस्यञ्चैव दैभ्यश्च चिन्ता मोहः स्मृतिर्धृतिः… 351–360
- २३२ नाट्यशास्त्रम् बिना [ या उसके अभाव में ] स्थायीभाव के अनुमापक हेतु के न होने के कारण स्थायीभाव की प्रतीति नहीं हो सकती और यदि शब्द से स्थायी-भाव की… 361–370
- २४२ नाट्यशास्त्रम् विना कथं बुद्धावारोपयितुं शक्यः । य एवं रोदितीति चेत्स्वा त्मापि मध्ये नटस्यानुप्रविष्ट इति गलितोऽनुकार्यानुकर्तृभावः… 371–380
- २५२ नाट्यशास्त्रम् यह आश्चर्य की बात है कि प्रमेय की सिद्धि में रचना का प्रथम आधार बिना किसी आलम्बन जैसा होता है; किन्तु एक बार आधार बन जाने पर ऊपर उनके… 381–390
- २६२ नाट्यशास्त्रम् जाता है । अतएव कहा है कि ' दृश्य और श्रव्य ' दोनों काव्य के प्रकार रसास्वाद के उपाय हैं… 391–400
- २७२ नाट्यशास्त्रम् सूत्र में ग्रहण किया जाता तो वह उलटा कष्टदायक ( असङ्गत ) हो जाता । केवल औचित्य निर्वाह की दृष्टि से ऐसा कहा जाता है कि ‘ स्थायिभाव रस… 401–410
- २८२ नाट्यशास्त्रम् भिर्द्रव्र्व्यञ्जनौषधिभिश्च षाडवादयो रसा निर्वर्तन्ते तथा नानाभावो -पगता ' अपि स्थायिनो भावा रसत्वमाप्नुवन्तीति… 411–420
- २ ९ २ नाट्यशास्त्रम् मनोरंजन या आह्लाद के साधन बनते हैं ( या एक दूसरे को भावित करते हैं ) । ३८ । यथा बीजाद्भवेद् वृक्षो वृक्षात् पुष्पं फलं यथा… 421–430
- ३०२ नाट्यशास्त्रम् सम्भोगो विप्रलम्भश्च । तत्र सम्भोगस्तावद्द्तु - माल्यानुलेपनालङ्कारे-विभावों के ) विषय की मानसिक उद्भावना होती है और इसी उद्भावना के… 431–440
- ३३२ नाट्यशास्त्रम् करुण तथा श्रृंगार रस के पारस्परिक विभेद करुणस्तु ' शापक्लेशविनिपतितेष्टजनविभवनाशवबन्ध समुत्थो निरपेक्षभावः औत्सुक्यचिन्तासमुत्थः… 441–450
- ३२२ नाट्यशास्त्रम् जिसमें आँखें तथा गाल कुछ सिकुड़न लिए हों, ध्वनि अल्पता तथा मधुरता लिए हो एवं समय के अनुकूल हो और जिसमें मुख प्रसन्नता के कारण लाल हो… 451–460
- ३३२ नाट्यशास्त्रम् इसका कारण यह है कि वे स्वाभावतः रौद्र स्वरूपवाले हुआ करते हैं, क्योंकि उनकी अनेक भुजायें एवं अनेक मुख होते हैं, वे चारों ओर बिखरे हुए… 461–470
- ३४२ नाट्यशास्त्रम् करचरणवेपथुस्तम्भगात्रसंकोच हृदयकम्पेन ' शुष्कोष्ठ तालु कण्ठैभयानको नित्यमभिनेयः । ७३… 471–480
- ३५२ नाट्यशास्त्रम् ध्यात्मध्यानधारणोपासन सर्वभूतदयालिङ्गग्रहणादिभिरनुभावैरभिनयः ने स्थायी भावों में निर्वेद को न रखकर उसका व्यभिचारिभावों में ही… 481–490
- ३६२ नाट्यशास्त्रम् जिसमें न दुःख हो, न सुख हो, न द्वेष, न मत्सर हो । जो सभ प्राणियों में समता बुद्धि रखे उसे शान्त रस समझना चाहिये । ८६ । किया… 491–500
- ३७२ नाव्यशास्त्रम् नाट्यकार के नाट्य - रचना में निगूढ़ भावों को दर्शकों को बोधगम्य बनाने के लिये जो वाणी, शरीर के अवयवों तथा चेहरों के रंगों द्वारा भाव का… 501–510
- ३८२ नाट्यशास्त्रम् ' शोक ' ( नामक स्थायी भाव ) का उद्भव प्रियजन के वियोग ( नाश ) सम्पत्तिनाश, ( प्रिय या ) इष्ट व्यक्ति के वध, बन्धन तथा दुःख के अनुभव… 511–520
- ३ ९ २ नाट्यशास्त्रम् तत्वज्ञान आदि विभावों के द्वारा होती है । स्त्री तथा नीच एवं कुत्सित पात्रों में होनेवाला इस भाव का अभिनय रोना, साँसे भरना, उसांसे… 521–530
- ४०२ नाट्यशास्त्रम् अत्रार्ये भवतः -ऐश्वर्य भ्रंशेष्टद्रव्यक्षयजा ' बहुप्रकारा तु । ' हृदयवितपगता नृणां चिन्ता समुद्भवति । ५०… 531–540
- ४१२ नाट्यशास्त्रम् इस विषय में एक आर्या है: -विद्या की प्राप्ति, रूप, वैभव, तथा घन आदि के ( आकस्मिक ) लाभ से नीचप्रकृति के पुरुषों में गर्व उत्पन्न होता… 541–550
- ४२२ नाट्यशास्त्रम् वात, पित्त तथा कफ ( में से किसी एक की विकृति ) के कारण ' व्याधि ” उत्पन्न होती है । ज्वर आदि इसके विभेद हैं… 551–560
- ४३२ नाट्यशास्त्रम् स्वरभेदो ' भयहर्षक्रोधजरारौक्ष्यरोगमदजनितः । श्रममूर्च्छा मदनिद्राभिघात मोहादिभिः प्रलयः । ९९… 561–570
- ४४२ नाट्यशास्त्रम् नाट्य आस्आदनात्मा एवं साक्षात्कारात्मक प्रत्यक्षज्ञान से ग्राह्य होने वाला रसात्मक पदार्थ है और इस अलौकिक रसात्मक नाट्य का जो शास्त्र… 571–580
- ४५२ नाट्यशास्त्रम् प्राचीन काल में ( भी ) यही परिपाटी प्रचलित थी तथा इसी कारण भास आदि नाव्यकारों की रचना में नान्दी पाठ कहीं नहीं मिलता और ' नान्द्यन्ते… 581–590
- ४६२ नाट्यशास्त्रम् है । स्वर का गुञ्जन तत्व ही स्वरूप है यह बात आगे गेयाधिकार प्रकरण. ( ना ० शा ० २६ ) में विस्तार से कही जाएगी… 591–600
- ४७२ नाट्यशास्त्रम् इस प्रकार द्विभूमि नाट्यमण्डप होने पर गीत ( तथा वाद्यों में ) विद्य-मान स्वरों की गम्भीरता नाट्यमण्डप में घूम कर एक दूसरे की प्रतिध्वनि… 601–610
- ४८२ नाट्यशास्त्र २८-३३. करणों के समूहों को निदर्शित कर अङ्गहारों का प्रयोग किया जाता है इनमें जब एक करण के साथ लगे हुये दूसरे करण को प्रस्तुत किया जाता है… 611–620
- ४ ९ २ नाट्यशास्त्र ( ३० ) पादापविद्धक ९ ० - ९ १. इस करण में दोनों कटकामुख हस्त- ( ना ० शा ० ९ ६० ) उलट कर नाभिप्रदेश से आठ अंगुल की दूरी पर न्यस्त करते… 621–630
- ५०२ नाव्यशास्त्रम् मुद्रा वाले हस्त को गण्ड ( कपोल ) प्रदेश का स्पर्श करते दूसरे अलपल्लव हुए रखा जाता है । या सूच्यास्य ( ना ० शा ० २… 631–640
- ५१२ नाट्यशास्त्रम् ( २ ) पर्यस्तक १७३-१७५. इस अङ्गहार के आरम्भ में तलपुष्पपुट करण ( ना ० शा ० ४ । ६१ ) को और फिर क्रमशः अपविद्ध ( ना ० शा ० ४… 641–650
- * ५२२ नाट्यशास्त्र ( ना ० शा ० ४ । ८३ ), नितम्ब ( ना ० शा ० ४ । १४६ ), करिहस्त, उरोमण्डल ( ना ० शा ० ४… 651–660
- ५३२ नाटयशास्त्र ६३००-३०१. गुरु शब्द से दो मात्रा के बराबर काल तथा लघु या अल्प शब्द से एक मात्रिक काल का ग्रहण होता है परन्तु अर्धमात्रा का काल भी अल्प… 661–670
- ५४२ नाट्यशास्त्र: प्रकार के पूर्वरंग में लागू होगा । इसलिये यदि इन अंगों का अतिशय प्रयोग या प्रसंग रखा जाएगा तो यह प्रयोक्ता तथा प्रेक्षक दोनों को ही… 671–680
- ५५२ G नाव्यशास्त्र को आवेग होकर भी धैर्य से दबता हुआ अपनी उचित दशा में आच्छादित सा रहता है न कि वह उत्पन्न ही नहीं होता… 681–690
- ५६२ एवं शुद्धो भयेचित्रः एवं सङ्कल्प्य भगवान् एवं सर्वा ध्रुवाः कार्याः एवं हि सर्वभावानाम् एवं पोहनं कृत्वा एवं पोहनानाञ्च एवमन्यास्वपि तथा एवमष्टकलः… 691–700
- ५७२ नूपुरश्च तथा पादः नूपुरश्चरणो वामः पुराक्षिप्तके चैव नृत्तं तत्र प्रयोक्तव्यम् नृत्तप्रयोगः सृष्टो यः नृत्ताङ्गग्राहि वाद्यज्ञैः नृत्ताध्वव्यायामात्… 701–710
- ५८२ शिखिपिण्डी कुमारस्य शिर उद्वाहनकम्पैः शिरःपर्वस्थितो ब्रह्मा शिरःप्रकम्प स्वेदाद्यैः शिरसस्तूपरिस्थाय शिरस्ते रक्षतु ब्रह्मा शिवविष्णुमहेन्द्राद्याः… 711–720
- ५ ९ २ नाट्यशास्त्र .१८६ १८ १८७ १२ १८८ ७ १ ९ २ १८ १ ९ ८ ९ २१२ ४ २१२ ८ २१२ २ २१३ 6 २२३ ९ २२३ २४ २२४ १५ २४ २३ • २२६ ८ २२८ ७ २२ ९ ५ २३७ १६ २४० १ २४६ २३ २४८ 99… 721–729