भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 261–270

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 261–270

पृष्ठ 261

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१३२ नाट्यशास्त्रम् अब मैं आपको चार रेचक बतलाता हूँ । इन्हें भी आप मुझसे जानिये । इन रेचकों में प्रथम पादरेचक, द्वितीय कटिरेचक, तृतीय हस्तरेचक तथा चतुर्थ ग्रीवारेचक कहलाता है ॥ २४५-२४६ ॥ रेचिताख्यः पृथग्भावे वलने चाभिधीयते ॥ २४६ ॥

उद्वाहनात्पृथग्भावाद् वलनाच्चापि ' रेचकः । यह ‘ रेचक ' पृथक् - पृथक् ( या स्वतन्त्र रूप में ) एक गोल घुमाव लेने के अर्थ में प्रयुक्त ( या अभिहित ) होता है । या इसे ' रेचक ' इसलिए भी कहते हैं कि यह ऊपर की ओर ( उठाव लेकर ) गतिशील होता है या पृथक् - पृथक् चाल से गतिशील रहता है ॥ २४६-२४७ ॥ पादरेचक— पार्श्वत्पार्श्वे तु गमनं स्खलितैश्वलितैः पदैः ॥ २४७ ॥

विविधैश्चैव पादस्य पादरेचक उच्यते । यदि स्खलित गति वाले या दो भिन्न गतियां वाले पैरों को एक बाजू से दूसरी बाजू की ओर विभिन्न गतियों द्वारा चलाया जाए तो इसे ‘ पादरेचक ’ जानिये ॥ २४७ - २४८ ॥ कटिरेचक-त्रिकस्योद्वर्तनं चैव कटीवलनमेव च ॥ २४८ ॥

तथाऽपसर्पणं चैव कटिरेचक उच्यते । यदि त्रिक को ऊपर की ओर उठाया जाए या कटि को एक चक्कर दे दिया जाए और फिर उसे पीछे की ओर हटा दिया जाए तो इसे ' कटिरेचक ' जानिये ॥ २४८ ॥

हस्तरेचक उद्वर्तनं ' परिक्षेपो विक्षेपः परिवर्तनम् ॥ २४ ९ ॥ विसर्पणं च हस्तस्य हस्तरेचक उच्यते । ०१. चलनाच्चापि ख ०, घ ० । २. कटीचलनमे – ग ० । ३. उद्वर्तनः - ख ० ॥ ४. विक्षेपपरिवर्तनम् -1 - घ ० ।

पृष्ठ 262

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चतुर्थोऽध्यायः १३३ हाथों का ऊपर की ओर उठाना, फेंकना ( परिक्षेपः ), सम्मुख करना, गोल चक्करदार घुमाव लेना तथा पीछे की ओर हटाना ( विसर्पणम् ) ‘ हस्तरेचक ' कहलाता है ॥ २४ ९ -२५० ॥ ग्रीवारेचक — उद्वाहनं सन्नमनं तथा पार्श्वस्य सन्नतिः ॥ २५० ॥

भ्रमणं चापि विज्ञेयो ग्रीवाया रेचको बुधैः । ग्रीवा का ऊपर की ओर तानना, ( या उठाना ) झुकाना, या उसे बाजू से झुका लेना, घुमाव लेना ( या गतिशील होना - भ्रमणं ) ‘ ग्रीवारेचक ' कहलाता है ॥ २५०-२५१ ॥ रेचकैरङ्गद्दारैश्च नृत्यन्तं वीक्ष्य शङ्करम् ॥

सुकुमारप्रयोगेण नृत्यतिस्म ' च पार्वती ।

मृदङ्गभेरीपटहैर्भाण्डडिण्डिमगोमुखैः ॥

पणवैर्दर्दुरैश्चैव सर्वातोद्यैः प्रवादितैः ।

दक्षयज्ञे विनिहते सन्ध्याकाले महेश्वरः ॥

नानाङ्गहारैः प्रानृत्यल्लयतालवशानुगैः । इन रेचक तथा अंगहारों से युक्त शिव को नृत्य भी सुकुमार प्रयोगों से युक्त एक नृत्य किया । और २५१ ॥ २५२ ॥ २५३ ॥ करते देख पार्वती ने इस नृत्य की मृदंग भेरी, पटह, भाण्ड, डिण्डिम, गोमुख, पणव तथा दर्दुर नामक वाद्यों द्वारा संगत की गई । ऐसा होने पर दक्ष के यज्ञ के ध्वंस के पश्चात् किसी सन्ध्या में भगवान शिव ने अनेक लय तथा ताल के अनुसार ( गतिशील अनेक ) अंगहारों से युक्त होकर नृत्य किया ॥ २५१-२५४ ॥ पिण्डीबन्धांस्ततो दृष्ट्रा नन्दिभद्रमुखा गणाः ॥ २५४ ॥

१. पार्श्वश्व - ख ० । २. नृत्यन्ती चैव पार्वतीम् ख ० । ३. झञ्झा - ख ० । ४. दर्द राद्यैश्च नानातोद्यैः – घ ० । ५. प्रमादितः ख ० । ६. तालवशानुगम् — ख ० । ७. डिण्डिमभ्रान्तितोग ० ।

पृष्ठ 263

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१३४ नाट्यशास्त्रम् चक्रस्ते ' नाम पिण्डीनां बन्धमासां सलक्षणम् । तब नन्दी तथा भद्रमुख प्रभृति गणों ने पिण्डीबन्धों को ( जो कि इस

प्रकार के नृत्य में विद्यमान थे ) देखकर उनके लक्षण तथा नाम रख लिये ।

पिण्डीबन्ध - नाम तथा स्वरूप-ईश्वरस्येश्वरी ' पिण्डी नन्दिनश्चापि पट्टसी ॥

चण्डिकाया भवेत्पिण्डी तथा वै सिंहवाहिनी ।

तापिण्डी भवेद्विष्णोः पद्मपिण्डी स्वयंभुव ॥

शक्रस्यैरावती पिण्डी झषपिण्डी " तु मान्मथी ।

शिखिपिण्डी कुमारस्य रूपपिण्डी भवेच्छ्रियः ॥

धारापिण्डी च जाह्नव्याः पाशपिण्डी यमस्य च वारुणी च नदीपिण्डी याक्षी स्याद्धनदस्य तु इलपिण्डी बलस्यापि सर्पपिण्डी तु भोगिनाम् गाणेश्वरी महापिण्डी दक्षयज्ञविमर्दिनी त्रिशूलाकृति संस्थाना रौद्री स्यादन्धकद्विषः एवमन्यास्वपि तथा दैवतासु तथाक्रमम् ध्वजभूताः प्रयोक्तव्या पिण्डीबन्धाः सुचिह्निताः २५५ ॥ २५६ ॥ २५७ ॥

॥ २५८ ॥

|| २५ ९ ॥

॥ २६० ॥

। ये पिण्डीबन्ध - जिनके नाम विभिन्न देवगण तथा देवियों के नाम पर रखे गए - इस प्रकार हैं— ईश्वर की पिण्डी का नाम ईश्वरी, नन्दी की पट्टसी चण्डिका की ( पिण्डी ) सिंहवाहिनी, विष्णु की तार्क्ष्य, स्वयंभू ( ब्रह्मा ) की पद्म, शक की ऐरावती, मन्मथ ( काम ) की झष, कुमार ( स्कन्द ) की शिखी, श्री की रूप ( उलूक? ), जाह्नवी की धारा, यम की पाश, वरुण १. चक्रुर्नामानि ——घ ० । २. बन्धांश्चैव सलक्षणान् ग ० । ३. ऐश्वरी वृषपिण्डी च ग ० । ४. पादसी ग ० । ५. झषा स्यान्मन्मथस्य तु ख; उरुपिण्डी तू मान्मथी - ग ० । ६. उलूपिण्डी- - घ ० । ७. अन्तकद्विषः - ग ० । ८. वज्रभूताः घ ० ।

पृष्ठ 264

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चतुर्थोऽध्यायः १३५ की नदी, कुबेर की याक्षी, बलराम की हली ( हलपिण्डी ); भोगियों की सर्प, गणों की दक्षयज्ञविमर्दिनी नामक महापिण्डी तथा भगवान शंकर की जिनके द्वारा अन्धकासुर का विनाश किया गया— उनके त्रिशूल की आकृति ( या चिह्न ) से अंकित रौद्री नामक पिण्डी होती है । इसी प्रकार अन्य ( अवशिष्ट ) देवों तथा देवियों की पिण्डियाँ भी उनके अपने चिह्नों से चिह्नित एवं उनके नाम के अनुसार रहना चाहिए ॥ २५६ - २६१ ॥ ताण्डव का उद्भव -रेचका अङ्गहाराश्च पिण्डीबन्धास्तथैव च ॥ २६१ ॥

सृष्ट्वा भगवता दत्तास्तण्डवे ' मुनये तदा ।

तेनापि हि ततः सम्यग्गानभाण्डसमन्वितः ॥ २६२ ॥

नृत्तप्रयोगः सृष्टो यः स ताण्डव इति स्मृतः । इस प्रकार भगवान शिव ने रेचक, अंगहार तथा पिण्डीबन्धों के सृजन कार्य को पूर्ण करने के पश्चात् उन्हें तण्डु मुनि को प्रदान कर दिया । तब उन तण्डु मुनि ने ( उन्हें ) गान तथा भाण्डवाद्य, ( वाद्य तथा गीत ) से ( ठीक प्रकार से ) संयुक्त कर जिस नृत्त प्रयोग की सर्जना की वह ' ताण्डव ' नाम से प्रसिद्ध हुआ ( तण्डु के द्वारा उद्भावित होने के कारण उसकी प्रसिद्धि ताण्डव नाम से हुई ) ॥ २६१-२६३ नृत्त का स्वरूव तथा उपयोगिता– ऋषय ऊचुः यदा प्राप्त्यर्थमर्थानां तज्ज्ञैरभिनयः कृतः कस्मान्नृत्तं कृतं ह्येतत्कं स्वभावमपेक्षते । न गीतकार्थसम्बद्धं न चाप्यर्थस्य भावकम् कस्मान्नृत्तं कृतं ह्येतद्गीतेष्वासारितेषु च ऋषिगण का प्रश्न -जब अर्थों के ( गीत तथा संवाद के — जो कि रूपक

१. स्ताण्डिने ग ० । २. नृत्य — ग ० ।

॥ २६३ ॥

॥ २६४ ॥

। में अवस्थित रहते ३. तस्मान्नृत्तं – ख ०, तस्मान्नृत्ते कृते – ग ० । ४. सम्बद्धो - ग ० ।

पृष्ठ 265

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१३६ नाट्यशास्त्रम् हैं ) उपयोग के लिए ( तज्ज्ञ ) विद्वानों ने ' अभिनय ' की सृष्टि ( या स्थापना कर दी तो इस ' नृत्य ' की सर्जना किस उद्देश्य की पूर्ति के लिए की गई? तथा इसकी प्रकृति 7 ( स्वरूप, स्थिति या लक्षण ) किस प्रकार की रखी गई? इस नृत्त की ' आसारित ' गीतों से सम्बद्ध करते हुए रचना क्यों की गई? क्योंकि यह न तो गीतों से तथा न ही उनके प्रतिपाद्य अर्थों ( संवादों ) से ही सम्बद्ध है ॥ २६३-२६५ ॥ भरत उवाच -अत्रोच्यते न खल्वर्थे कंचिन्नृत्तमपेक्षते ॥ २६५ ॥

किंतु शोभां प्रजनयेदिति ' नृत्तं प्रवर्तितम् ।

प्रायेण सर्वलोकस्य नृत्तमिष्टं स्वभावतः ॥ २६६ ॥

मङ्गल्यमिति कृत्वा च नृत्तमेतत्प्रकीर्तितम् ।

विवाहप्रसवावाहप्रमोदाभ्युदयादिषु ॥ २६७ ॥

विनोदकरणं चेति नृत्तमेतत्प्रवर्तितम् । भरत मुनि ने ( प्रश्नों के उत्तर में ) कहा - इस विषय में जो आशंकाएँ हैं उनके विषय में बतलाया जा रहा है । यह जो कहा गया कि ' नृत्त ' किसी अर्थ विशेष की अभिव्यक्ति की उपयोगिता से रहित है — यह ठीक है; किन्तु इसे शोभा की सृष्टि के हेतु भी संयोजित किया जाता है । प्रायः सभी मनुष्य की स्वाभाविक तौर पर ' नृत्त ' इष्ट है तथा यह मंगलप्रद भी है इसीलिए इसका कथन ( सृजन ) किया है । यह ' नृत्त ' विवाह, पुत्रजन्म, जामाता की बारात में उपस्थिति के अवसर पर और विजयप्राप्ति के उपलक्ष में किये जाने वाले आमोद - प्रमोद के लिये ही बनाया गया है ॥ २६५-२६८ ॥ १. जनयतीत्यतो नृत्तमिदं स्मृतम् -- ग ० । २. कारणं - ख ० । ३. प्रकीर्तितम् - ग ० ।

पृष्ठ 266

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चतुर्थोऽध्यायः १३७ अतश्चैव प्रतिक्षेपाद्भूतसङ्घैः प्रवर्तिताः ॥ २६८ ॥

ये गीतकादौ युज्यन्ते सम्यङ्नृत्तविभागकाः । अतएव भूत गण ( के समुदाय ) ने संयोजित ( इसमें ) प्रतिक्षेपों ' की प्रशंसा की ( या प्रवर्तना की ) जो नृत्त का ठीक प्रकार से विभाजन कर गीत के प्रारंभ में — प्रयुक्त किये जाते हैं ॥ २६८-२६९ ॥ देवेन चापि ' सम्प्रोक्तस्तण्डुस्ताण्डव पूर्वकम् ॥ २६ ९ ॥

गीतप्रयोगमाश्रित्य नृत्तमेतत्प्रवर्त्यताम् ।

प्रायेण ताण्डवविधिर्देवस्तुत्याश्रयो भवेत् ॥ २७० ॥

सुकुमारप्रयोगश्च शृङ्गाररस सम्भवः । भगवान शंकर ने भी इस ताण्डव को तण्डु को बतलाते हुए कहा कि इसका गीतों से सम्बद्ध करते हुए ही प्रयोग किया जाए । प्रायः ताण्डव ( नृत्त ) देवताओं की वन्दना हेतु ही किया जाता है परन्तु यह श्रृंगाररस से युक्त तथा उससे उदभूत सुकुमार भावों भाव के प्रयोग से सम्बद्ध ( भी ) हो सकता है ॥ २६ ९ -२७१ ॥ ताण्डव की वर्धमानक के साथ योजना ( एवं प्रयोग विधि ) तस्य ' तण्डुप्रयुक्तस्य ताण्डवस्य विधिक्रियाम् ॥ २७ ९ ॥ १. प्रतिक्षेप का लक्षण नाटयशास्त्र में उपलब्ध नहीं होता । आचार्य अभि ने बतलाया है कि अतिशय स्तुति से युक्त गीत विशेष का नाम ही प्रतिक्षेप है । अन्य आचार्यों का मत है कि गीत की समाप्ति पर प्रयुक्त किये जाने वाले ' छन्दक ' आदि की नृत्त में विचित्रता उत्पन्न करने के लिये यथारुचि प्रतिक्षिति ( स्थापना ) की जाने ( इसी कारण अंगभूत होने ) से प्रतिक्षेप कहलाते हैं । ( प्रचरस्तुतियुक्तो गीतिविशेषः, प्रतिक्षेपः । अन्ये तु गीतान्ते प्रयोज्यच्छन्दकादय एव नृत्तवैचित्र्याश्रया यथारुचि प्रतिक्षिप्यमानाङ्गकाः प्रतिक्षेपाः । ( अभि ० भारती ) पृ ० १५२, Vol. I. G. O. S. Baroda Edi. ) १. भुजासङ्घः - ख ०; प्रतिक्षेपभूतसङ्घः-: - घ ० । २. प्रकीर्तिताः- ग ० । ३. वापि ग ० । ४. प्रनृत्यताम् ग ० । ५. ताण्डयप्रयु ग ० ।

पृष्ठ 267

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१३८ नाट्यशास्त्रम्

वर्धमानकमासाद्य संप्रवक्ष्यामि लक्षणम् ।

कलानां वृद्धिमासाद्याक्षराणां च वर्धनात् ॥ २७२ ॥

लयस्य ' वर्धनाच्चापि वर्धमानकमुच्यते । अब मैं तण्डुमुनि द्वारा अभिहित ताण्डव की, वर्धमानक के ( लक्षण के ) साथ संयोजन विधि या लक्षण बतलाता हूँ । ( क्योंकि ) यह कला, ( मात्रा ) लय तथा अक्षरों की वृद्धि करता है इसी कारण यह ' वर्धमानक ’ कहलाता है ॥ २७१-२७३ ॥ आसारित-कृत्वा कुतपविन्यासं यथावद् द्विजसत्तमाः ॥

आसारितप्रयोगस्तु ततः कार्यः प्रयोक्तृभिः ।

तत्र तूपोहनं कृत्वा तन्त्रीगान ' समन्वितम् ॥

कार्यः प्रवेशो नर्तक्या भाण्डवाद्यसमन्वितः । हे मुनियों, यथोपयुक्त संगीत वाद्यों ( कुतपों ) की ( व्यावस्था करने ) के पश्चात् ( सूत्रधार ) ' आसारित ' का २७३ ॥ २७४ ॥ स्थापना करने प्रयोग करे | तब वीणा तथा गीत से युक्त उपोहन का प्रयोग करने के उपरान्त-नर्तकी को रंगमंच पर प्रवेश करना चाहिए जो भाण्ड ( अवनद्ध ) वाद्य के

वादन के साथ ( ताल से युक्त ) हो । २७३ - २७५ ॥

विशुद्धकरणायां तु जात्यां वाद्यं प्रयोजयेत् ॥ २७५ ॥

त्या वाद्यानुसारिण्यां " तस्याश्चारी प्रयोजयेत् ।

वैशाखस्थान के ह सर्वरेचकचारिणी ॥ २७६ ॥

इस समय प्रयुक्त संगीत विशुद्ध करणों और जातियों से युक्त हो तथा १. वर्धनान्नर्तकीनाश्च - ख; लक्ष्यस्य बन्धनाच्चापि - ग ० । २. चोपोहनं - ग ० । ३. तन्त्री भाण्डग ० । ४. गीत्या — ग ० । ०५. वाद्यानुसर्पिण्या - ग ० । ६. वैशाखस्तालकेने ह —- ग ० ।

पृष्ठ 268

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चतुर्थोऽध्यायः १३ ९ साथ में वाद्य का वादन भी किया जाए । फिर वाद्य ( ताल ) के अनुसार गति प्रदर्शित करते हुए ( यह ) नर्तकी चारी को प्रदर्शित करे ( प्रयुक्त करे ) । वह ) नर्तकी ' वैशाखस्थान ' के द्वारा सभी ( चारों प्रकार के ) रेचकों से युक्त गति को प्रदर्शित करती हुई अंजलि में पुष्पों को धारण कर मंच पर प्रवेश करे || २७५-२७६ ॥

पुष्पाञ्जलिधरा भूत्वा प्रविशेद्रङ्गमण्डपम् ।

पुष्पाञ्जलिं विसृज्याथ रङ्गपीठं परीत्य च ॥ २७७ ॥

प्रणम्य देवताभ्यश्च ततोऽभिनयमाचरेत् । ( देवगण हेतु ) और गोल चक्कर लगाते हुए अपने हाथों से उसे रंगमंच पर विकीर्ण कर देवताओं को प्रणाम करे और फिर विभिन्न गीत एवं मुद्राओं के प्रदर्शन के साथ अभिनय प्रारम्भ करे ॥ २७७-२७८ ॥ यत्राभिनेयं गीतं स्यात्तत्र वाद्यं न योजयेत् ॥ २७८ ॥

अङ्गहारप्रयोगे तु भाण्डवाद्यं विधीयते । जब अभिनय को किसी गीत के अनुसार प्रदर्शित किया जा रहा हो तब उसके साथ वाद्य ( संगीत ) की योजना ( संगत ) नहीं की जानी चाहिए, किन्तु अंगहारों के प्रयोग की दशा में भाण्डवाद्य ( अवनद्धवाद्य, मृदंग या भाण्ड ) की योजना ( अवश्य ) की जाए ॥ २७८-२७९ ॥ समं रक्तं विभक्तं च स्फुटं शुद्धप्रहारजम् ॥ २७ ९ ॥ नृत्ताङ्गग्राहि वाद्यज्ञैर्वाद्यं योज्यं तु ताण्डवे । ताण्डव में जिस वाद्य की योजना की जाए वह वाद्य सम, रक्त, विभक्त तथा स्फुट हो और स्पष्ट प्रहारों के कारण शुद्ध ताल को उत्पन्न करते हुए नृत्त के विभागों को यथोचित रूप से बतलाता हो ॥ २७ ९ -२८० ॥ प्रयुज्य गीतवाद्ये तु निष्क्रामन्नर्तकी ततः ॥ २८० ॥

अनेनैव विधानेन प्रविशन्त्यपराः पृथक् । १. प्रयोजयेत् — ग ० । २. गीतमेवं - ग ० । ३. पुनः - ग ० ।

पृष्ठ 269

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१४० नाट्यशास्त्रम् अन्याश्चानुक्रमेणाथ पिण्डी बम्धन्ति याः ' स्त्रियः ॥ २८१ ॥

4 तावत्पर्यस्तकः कार्यो यावत् पिण्डी न बध्यते ।

पिण्डों बध्वा ततः सर्वा निष्क्रामेयुः स्त्रियस्तु ताः ॥ २८२ ॥

इस प्रकार गीत का वाद्यों के साथ प्रदर्शन कर नर्तकी रंगमंच से निष्क्रमण करे और फिर इसी प्रकार अन्य ( ( उसी के समान अन्य पर प्रविष्ट हों । ये नर्तकियाँ क्रमशः ( इसी ) विधान के अनुसार तब की रचना ( या प्रदर्शन ) न करें जब तक सभी ( क्रमशः ( पूरा ) नहीं करतीं । इसके पश्चात् वे ' पर्यस्तक ' को प्रारंभ कर दें और ' पिण्डीबन्ध ' के ( प्रयोग के ) पूर्ण हो ये नर्तकियाँ भी मंच से निष्क्रमण करें ॥ २८०-२८२ ॥

पिण्डीबन्धेषु वाद्यं तु कर्तव्यमिह वादकैः ।

पर्य चित्रौधकरणान्वितम् ॥।

तत्रोपवनं भूयः कार्य पूर्ववदेव हि ।

ततश्चासारितं भूयो गायनं तु प्रयोजयेत् ॥

पूर्वेणैव विधानेन प्रविशेच्चापि नर्तकी । ) नर्तकियों मंच तक ‘ पिण्डीबन्ध ' ) अपना प्रदर्शन प्रदर्शित करना जाने के उपरान्त २८३ ॥ २८४ ॥ गीतकार्थं त्वभिनयेद् द्वितीयासारितस्य तु ॥ २८५ ॥

तदेव च पुनर्वस्तु नृत्तेनापि प्रदर्शयेत् । इन पिण्डीबन्धों के मंच पर प्रदर्शन के अवसर पर बादकों द्वारा वाद्यों का ऐसा वादन किया जाए जो अनेक या विचित्र ओघ तथा करणों से युक्त हो और जो ' पर्यस्तक ' के समय प्रयुक्त वाद्य वादन जैसा ( स्वरूपवाला ) रहता हो । तब पुनः पूर्ववत् ‘ उपोहन ' का प्रयोग किया जाए और पुनः ‘ आसारित ’ १. ताः ग ० । २. पर्यस्ततः ग ० ३. अथोपवहनं - ग ० । ४. गीतकार्थप्रयोगश्च – ग ०; गीतकार्थं प्रयोजयेत् — घ ० ।

पृष्ठ 270

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चतुर्थोऽध्यायः १४१ का भी ( प्रयोग हो ) । एक ' गीत ' की भी पुनः योजना की जाए और एक नर्तकी पूर्ववत् मंच पर प्रविष्ट हो और वह उस गाए जाने वाले गीत की विषय वस्तु को — जो द्वितीय आसारित प्रयोग के अवसर पर गायी गयी

थी — उपयुक्त नृत्य ( की मुद्राओं ) के ( प्रदर्शन ) द्वारा अभिनीत करे ।

आसारिते ' समाप्ते तु निष्कामेन्नर्तकी ततः ॥

पूर्ववत्प्रविशन्त्यन्याः प्रयोगः स्यात्स एव हि ।

एवं पदे पदे कार्यों विधिरासारितस्य तु ॥

भाण्डवाद्यकृते चैव तथा गानकृतेऽपि च ।

" एका तु प्रथमं योज्या द्वे द्वितीयं तथैव च ॥

तिस्रो यस्तु तृतीयं तु चतस्रस्तु चतुर्थकम् । इस प्रकार ' आसारित ' विधि को पूर्ण कर वह

चली जाए ।

२८६ ॥

२८७ ॥

२८८ ॥

नर्तकी मंच से तब पूर्ववत् अन्यनर्तकियाँ मंच पर प्रविष्ट हों और इसी प्रकार यही ' नृत्त प्रयोग ' पुनः प्रदर्शित करें । इस प्रकार प्रत्येक पद - गति पर ' आसारित ' प्रयोग की विधि का अनुसरण किया जाए । ( भाण्ड ) वाद्य के वादक तथा गीत के गायक भी इसी का अनुसरण करें । पहिले गीत का एक पाद एक बार गाया जाए । दूसरा पाद ( पदवस्तु ) दो बार, तीसरा तीन बार तथा चौथा चार बार गाया जाए ॥ २८६ - २८८ ॥ पिण्डीनां विधयश्चैव चत्वारः सम्प्रकीर्तिताः ॥ २८ ९ ॥ पिण्डी शृङ्खलिकाचैव लताबन्धोऽथ भेद्यकः । ' पिण्डी ' के चार प्रकार होते हैं - यथा - पिण्डी, शृङ्खलिका, लताबन्ध तथा भेद्यक ॥ २८ ९ ॥ १. आसारित समाप्तौ च घ ० । २. प्रविशेच्चान्याः ग ० । ३. वाद्यकृतश्चैव – ग ० । ४. गानकृतोऽपि च - ग ० । ५. एकान्तु प्रथमं कुर्याद् द्वे द्वितीयन्तु वस्तुकम् — ग ० । ६. श्रृंखलिता ग ० ।